सोमवार, 13 नवंबर 2017

पीजीआइ में नियमावली में बदलाव के लिए मुख्यमत्री और राज्यपाल ने निदेशक को दिया निर्देेश

पीजीआइ में नियमावली में बदलाव के लिए मुख्यमत्री और राज्यपाल ने निदेशक को दिया निर्देेश


महासंघ ने मुख्यमत्री और राज्यपाल से की थी मांग

जागरणसंवाददाता। लखनऊ 

संस्थान की नियमावली 2011 की  खास धारा में बदलाव के लिए मुख्यमंत्री योगी अादित्यनाथ और राज्यपाल ने  संस्थान के  निदेशक प्रो. राकेश कपूर को निर्देशित किया है कि वह सात दिसंबर तक इस मामले में नियमानुसार अावश्यक कारवाई करें। इस  मामले को लेकर कर्मचारी महासंघ पीजीआइ की अध्यक्ष सावित्री सिंह ने हाल में ही मुख्यमंत्री और राज्यपाल  मुलाकात कर नियमवाली में बदलाव की मांग की थी जिस पर मुख्य मंत्री के सचिव रिग्जियान सैम्फिल ने निदेशक को अलावा चिकित्सा शिक्षा विभाग के अधिकारियों को भी निर्देशित किया है। इस नियमावली के पहले संस्थान में एम्स दिल्ली में वेतन भत्ते लगते ही एसजीपीजीआइ में यह लागू हो जाता था लेकिन बीएसपी के शासन काल में नियमावली में एक एेसा प्रावधान लाया गया जिसमें एम्स के भत्ते लागू करने से पहले शासन से अनुमति लेना जरूरी किया गया।  सलाहकार एवं टीनएअाई के सदस्य अजय कुमार सिंह का कहना है कि शासन में फाइल लंबे समय तक घूमती रहती है जिससे कर्मचारियों और अधिकारियों को समय पर उनका हक नही मिलता है। इससे कर्मचारियों में रोष व्याप्त है। दूसरी तरफ संस्थान की अपर निदेशक जयंत नारलेकर ने निर्दश पर संस्थान में एक समिति बनाया है जो इस मामले पर अपर निदेशक को रिपोर्ट देगी

रविवार, 12 नवंबर 2017

पेट में अच्छे बैक्टीरिया की कमी से बन सकते है बीमारी का टोकरा

पेट में अच्छे बैक्टीरिया की कमी से बन सकते है बीमारी का टोकरा

सीजेरियन से पैदा होने वाले लोगो के पेट में कम होते है अच्छे बैक्टीरिया
पेट में अच्छे बैक्टीरिया की कमी से  दिमाग, पेट, मोटापा सहित कई परेशानी की आशंका
जागरणसंवाददाता। लखनऊ

यदि आप का जंम सीजेरियन ( आपरेशन) के जरिए हुआ है तो आप में पेट के साथ दिल, डायबटीज. मोटापे, शारीरिक विकास में कमी की परेशानी सामान्य प्रसव के जंम लेने वाले लोगों के मुकाबले अधिक होगी। वैज्ञानिकों ने देखा है कि आपरेशन के जरिए जंम लेने वाले लोगों के गट बायोटा ( पेट में अच्छे बैक्टीरिया) की संख्या कम होती क्योंकि वह मां से अच्छे बैक्टीरिया ग्रहण नहीं कर पाते है। सामान्य प्रसव से जंम लेने वाले लोग जंम लेने समय प्रसव के दौरान प्रसव मार्ग से अच्छे बैक्टारिया ग्रहण कर लेते हैं।  इसे नए तथ्य का खुलासा फंक्शन गैस्ट्रो इंटेस्टाइनल डिजीजीस( फिगिड) में विशेषज्ञों ने किया । संजय गांधी पीजीआइ के गैस्ट्रोइंट्रोलाजिस्ट प्रो.यूसी घोषाल और अमेरिका के प्रो. डोगलेश ड्रासमैन   ने बताया कि हम लोगों ने सीजेरियन और सामान्य प्रसव से जंम लेने वाले में गट बैक्टीरिया का अध्ययन किया तो देखा इस तथ्य का खुलासा हुआ। यह भी बताया कि उम्र बढने के साथ अच्छे बैक्टीरिया की संख्या बढाना संभव नहीं होता क्योंकि शरी का इम्यून सिस्टम इसे स्वीकार नहीं करता। इस लिए सीजेरियन से जंम लेने वाले लोगों को प्रो बायोटिक युक्त अहारा शामिल करना चाहिए। 

गड़बडा जाता है बैक्टीरिया का अनुपात
प्रो. घोषाल ने बताया कि पेट में दो तरह के बैक्टीरिया होते है । कुछ अच्छे होते तो कुछ खराब होते है दोनों के बीच अनुपात रहता है। पेट में हमेशा अच्छे बैक्टीरिया की संख्या अदिक होनी चाहिए । बताया कि फर्मी क्यूट अच्छा बैक्टीरिया है। बैक्टीरायड, क्लोस्ट्रीडिया यह खराब बैक्टीरिया है। देखा गया है कि जिनमें अच्छे बैक्टीरिया की संख्या कम होती है उनमें पेट के भीतरी अंगों के कार्य प्रणाली वाली परेशानी अधिक होती है। पेट में अच्छे बैक्टीरिया की संख्या बढाने के लिए रोज दही का सेवन करना चाहिए। इससे भी फायदा न मिले तो प्रो बायोटिक दवाएं दी जाती है। 


चरक सूत्र को माडर्न मेडिकल साइंस ने किया स्वीकार
प्रो. घोषाल ने कहा कि आर्युवेद में कहा गया है कि पित्त , बायु और कफ ही सारी बीमारी की जड़ है। इस चरक सूत्र को माडर्न मेडिकल साइंस ने स्वीकार किया है। कहा कि इसके कारण पेट. दिल, एलर्जी, दिमाग की परेशानी होती है। इस लिए इन तीनों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।   

पेट के भीतरी अंगों की चाल में गड़बडी के कारण हो सकता है डिस्पेप्सिया
संजय गांधी पीजाआइ के पेट रोग विशेषज्ञ प्रो. अभय वर्मा ने बताया कि फंक्शनल बावेल डिजीज में कब्ज. डिस्पेप्सिया  और आईबीएस तीन तरह की परेशानी होती है। बताया कि हमारी अपीडी में आने वाले 30 से 40 फीसदी लोगों में इसकी परेशानी रहती है । 20 से 25  फीसदी लोगो में डिस्पेप्सिया के साथ कब्ज की परेशानी तो इतने ही लोगों में तीनो परेशानी रहती है। डिस्पेप्सिया में पेट में भारीपन, पेट में जलन, गैस बनने की परेशानी होती है। यदि यह परेशानी 6 महीने से अधिक समय तक है यह डिस्पेप्सिया की परेशानी होती है।  

....वेस्टर्न स्टाइल कमोड बना रहा है कब्ज का शिकार

फंक्सनल गैस्ट्रो इंटेस्टाइल डिजीज पर इंटरनेशनल सीएमई


.....वेस्टर्न स्टाइल कमोड बना रहा है कब्ज का शिकार

देशी कमोड पर बैठने से पेट पर पड़ता है दबाव
 पूरा खुलता है मल द्वार के अंदर का रास्ता

जागरणसंवाददाता। लखनऊ

पश्चिमी सभ्यता वाले कमोड के कारण चार से पांच फीसदी लोग कब्ज के शिकार हो रहे है। पेट साफ न होने की परेशानी को लेकर दिन भर बेचैन रहते है। लंबे समय कमोड पर बैठे रहते है। इनके पेट के अंदर की कार्यप्रणाली बिल्कुल ठीक होती फिर भी परेशानी रहती है। एेसे लोग केवल कमोड बदल कर कब्ज की परेशआनी से छुटकारा पा सकते हैं। संजय गांधी पीजीआइ के गैस्ट्रोइंट्रोलाजी विभाग द्वारा फंक्सनल गैस्ट्रो इंटेस्टाइनल डिजीजस( फगिड) पर अायोजित इंटरनेशनल सीएमई में प्रो.यूषी घोसाल और अमेरिका के प्रो. डोगलेश ड्रासमैन  ने बताया कि कब्ज के कई कारण हो सकते है। कुछ कराणों में दवा काम करती है लेकिन कुछ मामलों में दवा काम नहीं करती है। शोध में देखा गया है कि वेस्टर्न स्टाइल वाले कमोड इस परेशानी का बडा कारण साबित हो रहा है। बताया कि मल द्वार के अंदर का रास्ता एक खास कोण पर झुका  रहता है जिससे मल लीक नहीं करता । जब हम मल विसर्जित करने के लिए वेस्टर्न कमोड पर बैठते है वह कोण का झुकाव पूरा नहीं खुलता जिससे मल पूरा खाली नही होता। देशी कमोड पर बैठने से यह कोण पूरा खुल जाता है मल पूरा निकल जाता है। हम लोगों ने दोनों स्थित में बेरियम एक्स-रे कर इस कोण का अध्ययन करने के बाद यह कह रहे हैं। शोध को लो  यूरीन ट्रैक्ट सिम्पटम जर्नल ने स्वीकार किया है। उद्घाटन समारोह मे संस्थान के निदेशक प्रो.राकेश कपूर ने कहा कि पेट की बीमारी तेजी से बढ रही है। हमारे और पश्चिमी देश में कारण और लक्षण अलग है इस लिए यह सीएमई काफी कारगर साबित होगी। भारत के मरीजों में सही समय पर परेशानी की जानकारी मिलेगी।   


कब्ज की परेशानी जनाने के लिए बनाया इंडियन गाइडलाइन


रोम फाइंडेशन के विशेष सदस्य सिंगापुर के प्रो. को एन गिवी, इजराइल के प्रो.एमी डी सपरबर और संजय गांधी पीजीआइ के प्रो. यूसी घोषाल और प्रो. अभय वर्मा ने कहा कि अभी तक अमेरिकी पैमाने पर या गाइड लाइन में भारतीयों में कब्ज  की परेशानी की डायग्नोसिस होती है। अमेरिका में सामान्य व्यक्ति सप्ताह में चार से पाच बार मल विसर्जित करता है इसलिए यदि वहां पर तीन बार से कम मल विसर्जित होता है तो कब्ज की परेशानी मानी जाती है। हमारे देश में व्यक्ति दिन में दो बार जाता है फिर भी कब्ज की परेशानी बताया तो इसे नजंरदाज कर दिया जाता है। हम लोगों ने भारतीयों में कब्ज की परेशानी पता करने के लिए नई गाइड लाइन बनायी जिसमें मरीज की परेशानी के अाधार पर परेशानी तय करनी है। देखा गया है कि लोग दिन में दो बार जाते है फिर पेट साफ न होने की परेशानी होती है। इस लिए पेशेट रिपोर्टड अाउट कम पर अमल करने की जरूरत है। 

यह परेशानी तो कब्ज
- दिन में दो बार मल विसर्जित करने के बाद लंबे समय तक कमोड पर बैठना
- मल विसर्जन के जोर लगाना
- ऊंगली से मल निकलाना
- पेट साफ न होने की परेशानी से बेचैनी 

जैसा कारण वैसा इलाज

प्रो. यूसी घोषाल, प्रो. जिअौ बारबारा  और प्रो. अभय वर्मा ने बताया कि कब्ज के लिए  अमेरिका में केवल पांच दवाएं हमारे यहां 20 से अधिक दवाएं है । कब्ज के 20 फीसदी मामलों में बडी अांत की चाल में कमी । 30 फीसदी मामलों में मल द्वार का रास्ता पूरा न खुला है। बाकी 50 फीसदी मामलों में फाइबर युक्त भोजन न लेना, पानी कम पीना, व्यायाम का शारीरिक मूवमेंट कम होना है। 50 फीसदी मामलों में दवा काम करती है जिसमें अांत की चाल में कमी या माल द्वार( स्फिंटर) न खुलने की परेशानी होती है। बाकी 50 फीसदी मामलों में लाइफ स्टाइल मोडीफिकेशन और बायोफीड बैक तकनीक से इलाज हो जाता है। 

60 फीसदी लोगों में पेट की परेशानी का कारण पेट की चाल में गड़बडी

पेट की परेशानी से ग्रस्त 60 फीसदी लोगों में पेट की परेशानी का कारण पेट के भीतरी अंग छोटी अांत. बडी अांत , अामाशय में चाल में कमी या अधिकता होती है।  यह बात पेट का डाक्टर भी नहीं समझ पाते है। डाक्टर  भी मरीज की इंडोस्कोपी जांच भी करते है । बनावटी कमी न होने के कारण परेशानी का कारण नहीं मिल पाता। मरीज परेशानी लेकर भटकता रहता है। इंडोस्कोप से पेट के अंदर बनावटी खराबी का पता लगता है । पेट के अंदर के अंगो की चाल की  परेशानी को फंक्शनल बावेल डिजीज कहते है। 

एक मंच पर अाए पांच संगठन 

इस परेशानी के बारे में जानकारी देने के लिए एशिय़न एक्सपर्ट ग्रुप इन आाईबीएस, रोम फाउडेशन, शांति पब्लिक एजूकेशन एंड डिवलेपमेंट , बंगला देश सोसाइटी अाफ गैस्ट्रोइंट्रोलाजी, इंडियन मोर्टलिटी एंड फंक्शनल डिजीज सोसाइटी के साथ मिल कर संजय गांधी पीजीआइ का गैस्ट्रो इंट्रोलाजी विभाग  सीएमई का अायोजन  कर रहा है। 

बुधवार, 8 नवंबर 2017

उंचाहार घटने के शिकार.....जग रही है उम्मीद की किरण

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.....जग रही है उम्मीद की किरण
उंचाहार की घटना के शिकार पांचों  फिलहाल इंफेक्शन से  मुक्त 

डीप बर्न के कारण सबसे खतरा था संक्रमण

कुमार संजय । लखनऊ

ऊंचाहार एनटीपीसी व्यालर फटने की घटना के शिकार परिजनों की दुअा और संस्थान के डाक्टरों , पैरामेडिकल स्टाफ की मेहनत से इनके जिंदगी की उम्मीद की किरण दिख रही है। इन पांचो मरीजों पर सबसे बडा खतरा इंफेक्शन का था जिससे फिलहाल यब बचे हुए हैं। इंफेक्शन से बचाने के लिए टीम कई स्तर पर कई तरह की कोशिश कर रही है।  स्पेशल वार्ड में भर्ती मरीजों को बचाने के लिए प्लास्टिक सर्जन प्रो. अंकुर भटनागर और उनके साथी दूसरे विभाग के विशेषज्ञों से भी सलाह ले रहे हैं। संस्थान के निदेशक प्रो.राकेश कपूर ने कहा कि इन मरीजों को बचाने के लिए हर स्तर पर हर संभव कोशिश हो रही है। कई विभाग के विशेषज्ञों की टीम है जिसमें पैरामेडिकल , सकाय सदस्य शामिल है। फिलहार सभी मरीज की हालत स्थिर है। स्पेशल वार्ड में    उमा शंकर पाण्डेय(28), हरी कृष्न(27) , श्री राम( 30) , राकेश सिंह (35) किशन मालवीय (25) स्पेशल वार्ड में भर्ती है। प्रो. अंकुर भटनागर  और सहयोगी  अनुपमा ने बताया कि हम लोगों ने सपेशल  वार्ड को बर्न वार्ड  में तब्दील कर दिया है। सबसे बडी चुनौती इंफेक्शन रोकना था  क्योंकि सभी मरीजों में डीप बर्न है जिसके कारण दो से तीन दिन बाद इंफेक्शन की अाशंका थी।  सभी 30 से 40 फीसदी बर्न है। जिसे क्रिटिकल बर्न माना जाता है। हम लोगों ने तय किया है कि वार्ड में ड्रेसिंग नहीं करेंगे वार्ड से लगे एक एरिया को ड्रेसिंग बाथ बनाया जाएगा इससे वार्ड में इंफेक्शन की अाशंका कम होगी। योजना फिलहाल सफल रही है सभी मरीज स्टेबिल किसी मरीज में बुखार नहीं है। बर्न भी सूख रहा है लेकिन अभी अागे क्या हो सकता इस बारे में कहना संभव नहीं है।



काम आ गया स्वाइन फ्लू के लिए बना नया वार्ड


संजय गांधी पीजीआइ के निदेशक प्रो.राकेश कपूर ने नए बने और बंद पडे  स्वाइन फ्लू वार्ड को दो घंटे में  एक्टीवेट करा कर ऊंचाहार के घटना में शिकार लोगों के इलाज के लिए तैयार कराया । यह एक बडी चुनौती थी जिसका संस्थान ने सामना किया।  रात 12 बजे तक वह खदु वार्ड को एक्टीवेट कराने के लिए व्यवस्था को देखते रहे। वार्ड को एक्टीवेट कराने के लिए सबसे पहले कई विभागों के संकाय सदस्यों , नर्सेज, पेशेंट हेल्पर की टीम बनायी सभी विभागों से स्टाफ लिया गया। इसके बाद उपकरणों को बेड के साथ फिट किया गया। एचआरएफ से आवश्यक दवाएं , ड्रेसिंग के लिए समान सहित कई व्यवस्था की गयी। एचआरएफ के इंचार्ज आरए यादव, आर के शर्मा , एपीआरओ एपी ओझा, पीआरओ आशुतोष सोती, एकाउंट के दीप चंद , डिप्टी एमएस सुनील शिशु, अस्पताल प्रशासन के प्रो. राजेश हर्षवर्धन  सहित कई अधिकारी हर स्तर रात दो बजे सारे इंतजाम पूरे किए। पल्मोनरी मेडिसिन के हेड प्रो.आलोक नाथ, प्लास्टिक सर्जरी के प्रो. अंकुर भटनागर ने वार्ड में क्या जरूरत पडेगी पूरा मैनेज किया। निदेशक प्रो.राकेश कपूर ने बताया कि वार्ड बन कर तैयार था लेकिन एक्टीवेट नहीं था क्यों कि स्वाइन फ्लू का सीजन खत्म हो गया था। इस आपदा को देखते हुए सबके सहयोग से दो घंटे में वार्ड एक्टीवेट किया इस वार्ड में 11 बेड 

पीजीआइ में बनेगा स्ट्रोक रिसपांस टीम

पीजीआइ में ब्रेन स्ट्रोक के इलाज में चुनौतियों पर चर्चा


चार घंटे के अंदर अस्पताल पहुंचने पर लगने वाले समय में कमी की जरूरत
पीजीआइ में बनेगा स्ट्रोक रिसपांस टीम 
फिलहाल न्यूरोलाजी के डाक्टर अान काल होते है उपलब्ध
जागरणसंवाददाता। लखनऊ
ब्रेन स्ट्रोक के इलाज में समय की अहम भूमिका है । देखा गया है कि साढे चार घटे के अंदर यदि मरीज को खास दवाआरटी-पीए रसायन( एक्टीलाइज)  दे दी जाए तो स्ट्रोक के कुप्रभाव मरीज में कम हो जाते है। संजय गांधी पीजीआइ में चार घंटे के अंदर अस्पताल पहुंचने पर खास देने का इंतजाम है। मरीज के पहुंचने के बाद कैसे जल्दी इलाज मिले और क्या हो इलाज की दिशा पर सीएमई का अायोजन किया गया।  संस्थान के रेडियोलाजी विभाग के प्रमुख प्रो. अारवी फडके, प्रो. विवेक सिंह, न्यूरो लाजी विभाग के प्रमुख प्रो. सुनील प्रधान, प्रो. संजीव झा, प्रो.वीके पालीवाल, क्रिटकल केयर मेडिसिन के प्रो.अारके सिंह सहित अन्य ने संस्थान में समय को कम करने के साथ इलाज के अन्य विकल्पों  पर चर्चा की जिसमें कहा गया कि स्ट्रोक रिसपांस टीम बनाने की जरूरत है जिसमें न्यूरोलाजी, रेडियोलाजी सहित अन्य की टीम हो जो सूचना मिलने के बाद तुरंत एक्सन में अा जाए इसके साथ एचअारएफ से एक मिनट दवा मिल जाए । विशेषज्ञों ने कहा कि हमारे यहां जागरूकता की कमी के कारण चार घंटे के अंदर एक फीसदी से कम लोग पहुंच पाते है। लक्षण प्रकट होते ही यदि मरीज  को तुरंत लाया जाए तो कम से लखनऊ के अास-पास जिले के मरीज चार घंटे में पहुंच सकते हैं। प्रो.विवेक सिंह ने बताया कि दवा के अलावा दिमाग की नस में बने थक्के को हम लोग विशेष डिवाइस से खीच कर निकाल कर रक्त प्रवाह दिमाग में सामान्य करते है। इलाज की दिशा सीटी स्कैन के बाद ही तय होती है। 

क्या है चुनौतिया
-ब्रेन स्ट्रोक को पहचाना
- स्ट्रोक के बाद चार घंटे के अंदर अच्छे संस्थान में पहुंचाना
- अस्पताल में पहुंचने के बाद स्ट्रोक रिसपांस टीम का तेजी से एक्सन
- 20 से 25 मिनट के अंदर सीटी स्कैन कर स्ट्रोक का प्रकार पता कर दवा या इलाज देना
- दवा की उपलब्धता 

मंगलवार, 7 नवंबर 2017

मुख्यमंत्री से नियमवाली में बदलाव के लिए मिला पीजीआइ संघ

मुख्यमंत्री से नियमवाली में बदलाव के लिए मिला पीजीआइ संघ

नियमावली में बदलाव न होने से सही समय पर नही मिल रहा है हक 

जागरणसंवाददाता। लखनऊ 

कर्मचारी महासंघ पीजीआइ की अध्यक्ष सावित्री सिंह, महामंत्री एसपी यादव , सलाहकार अजय कुमार सिंह ने मंगलवार को मुख्यमंत्री योगी अादित्य नाथ से मंगलवार को उनके अावास पर  मुलाकात कर संस्थान की नियमावली 2011 में बदलाव को लेकर ज्ञापन दिया। मुख्यमंत्री ने अाश्वासन दिया इस पर जो भी संभव होगा किया जाएगा। संस्थान के कर्मचारी संस्थान के नियमवाली में उस नियम का विरोध कर रहे है जिसमें कहा गया है कि संस्थान में एम्स के समान वेतन और भत्ते लेने के लिए शासन से वित्तीय अनुमति लेनी होगी। इस नियम के कारण फाइल शासन के गलियारे में महीनों घूमती रहती है इस संस्थान के संकाय सदस्यों और कर्मचारियों को उन हक समय से नहीं मिलता है। संघ ने मुख्य मंत्री को कुछ दिन पहले मांग पत्र भेजा था जिस पर मुख्यमंत्री  ने मांग पर कारवाई के लिए अधिकारियों को निर्देशित किया जिसमें चार दिसंबर तक समय दिया गया है। सही अनुपात में कैडर पुर्नगठन किया जाए। इसके अलावा संस्थान में जो कर्मचारियों की समस्याएं या अनुपालन लंबित है उस पर जल्दी फैसला लिया जाए। 

पीजीआइ और रूस मिल कर बढाएंगे टेली मेडिसिन का दायरा

पीजीआइ और रूस मिल कर बढाएंगे टेली मेडिसिन का दायरा

दोनों देशों के बीच तकनीक अादान -प्रदान के लिए हुअा करार

लो कास्ट टेली मेडिसिन सिस्टम विकसित करने पर होगा काम 

जागरण संवाददाता। लखनऊ 

भारत और रूस के ऱिश्ते के 70 वी वर्ष गांठ पर संजय  गांधी पीजीआइ में दोनों देशों को टेली मेडिसिन विशेषज्ञों ने करार किया है। इसके तहत इंडो रसियन फ्लेटफार्म बनेगा जो टेली मेडिसिन के विस्तार के हर स्तर पर एक दूसरे को मदद करेंगे। संस्थान के टेली मेडिसिन विभाग के प्रमुख प्रो.एसके मिश्रा, प्रो.यूसी घोषाल  रूस के डा. मिखालइल नाटेजन, डा. के सर्गी स्टेनेलोवेविच , डा. ई वान सहित अन्य ने बताया कि दोनों देश की 50 फीसदी से अदिक आाबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है जहां पर अस्पताल और डाक्टर की व्यवस्था करना संभव नहीं है एेसे में टेली मेडिसिन ही एक बढिया विकल्प साबित हो सकता है। भारत में संजय गांधी पीजीआइ टेली मेडिसिन के क्षेत्र में 20 साल से काम कर रहा है । इस लिए इस संस्थान के जुड़ कर हम लोग तकनीक अादान प्रदान करेंगे। विशेषज्ञों ने बताया कि हम लोगों की कोशिश लो बजट टेली मेडिसिन सिस्टम दोनों देशों में स्थापित हो। कुछ तकनीक हमारे देश में अच्छी है तो कुछ रूस में दोनों में सहयोग होने से इस नई तकनीक का देश में विस्तार संभव है। हम लोग संयुक्त प्रोजेक्ट पर काम करेंगे। रूस के प्रतिनिधियों ने देश के कई सेंटरों से चल रही गतिविधियों को देखा और समझा। यूरेसिया डिवीजन के संयुक्त सचिव जीवी श्री निवासन , संस्थान के निदेशक प्रो. राकेश कपूर ने देश के टेली मेडिसिन सिस्टम के बारे में जानकारी देते हुए इस दिशा में रूस के सात काम करने की इच्छा जतायी। 

चेस्ट एक्स -रे देख साफ्टवेयर बताएगा टीबी

रूस के डा. मिखाइल नाटेजन ने बताया कि हम लोगों ने टेली मेडिसिन सिस्टम के लिए फुलोरो मेट्री नाम का एक साफ्ट वेयर बनाया है जो चेस्ट -एक्स-रे को फीड करते ही बता टीबी की जानकारी दे देघा। इस साफ्टवेयर का फायदा सुदुर इलाकों में रहने वाले मरीजों को मिलेगा।   

ब्रिक्स देशों से जुडेगा पीजीआइ टेली मेडिसिन

प्रो.एसके  मिश्रा ने बताया कि टेली मेडिसिन के जरिए पीजीआई ब्रिक्स( ब्राजील, रूस, चीन, साउथ अफेरिका)  देशों से जुडने की योजना पर काम कर रहा है। इसके लिए ब्रिक्स से मदद लेने की योजना पर काम हो रहा है । इससे हम लोग वहां के लोगों से मेडिकल के क्षेत्र में जानकारी ले सकते है और जानकारी दे सकते है। इसके साथ इलाज में भी सलाह लिया जाएगा। बताया कि देश के 50 मेडिकल कालेजों को पीजीआइ टेली मेडिसिन सिस्टम से जोडा जा रहा है। इन मेडिकल कालेजों में हमारे विशेषज्ञ पढाएंगे साथ ही इलाज में भी मदद करेंगे। पीजीआई टेली मेडिसिन सिस्टम से देश के 42 सेंटर जुडे है जिसमें मेडिकल कालेज के अलावा विदेश के संस्थान शामिल है।     

गोरखपुर के डा. अालोक की प्रतिभा-- प्रोस्टेट कैंसर को कंफर्म करेगा टूल



गोरखपुर के डा. अालोक ने अमेरिका में दिखायी प्रतिभा
  
प्रोस्टेट कैंसर को  कंफर्म करेगा टूल


भारतीय मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक ने बनाया टूल
कुमार संजय । लखनऊ

गोरखपुर शहर के रूस्तमपुर इलाके के  रहने वाले डा. अालोक द्दिवेदी  अमेरिका जाने के पांच साल के अंदर ही अपनी प्रतिभा के जरिए स्थायी पोजिशन हासिल कर लिया। एक एेसा सांख्यकी टूल बनाया जिससे प्रोस्टेट कैंसर के एेसे मामले जिसमें प्रचलित जांच से बीमारी की पुष्टि नहीं हो पाती थी उसकी भी पुष्टि संभव हो गयी है। इस टूल के जरिए केवल अमेरिका ही नहीं पूरे विश्व के मरीजों को राहत मिलने की उम्मीद जगी हैै। हाल में ही एसजीपीजीआइ में अायोजित  इंडियन एसोसिएशन फार मेडिकल स्टेस्टेक्सि की सम्मेलन में भाग लेने अाए भारतीय मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक डा. अालोक दिवेदी ने प्रोस्टेट कैंसर के एेसे मामले जिसमें प्रोस्टेट स्पेस्फिक एंटीजन( पीएचएस) से कैंसर की पुष्टि नहीं होती एेसे मामलों में पीएसए के स्तर एमअारअाई के गुण को मिला कर कैंसर की पुष्टि करने के लिए नया टूल विकसित किया है। इस टूल की वैधता पर जर्नल अाफ एमअारअाई ने मुहर लगा दी है। डा. अालोक ने बताया कि पीएसए का स्तर चार से दस के बीच होता है तो प्रोस्टेट कैंसर कहना कठिन होता है एेसे में कई बार बीमारी का पता नहीं लग पाता है एेसे मामलों में एमअारअाई कराते है । एमअारअाई की इमेज के गुण और पीएसए के बीच कोरीलेशन के अाधार पर एक सांख्यिकी टूल बनाया है जिसको लागू कर कैंसर की पुष्टि कर काफी पहले अलाज की दिशा तय की जा सकती है। उम्र बढने के साथ प्रोस्टेट कैंसर की अाशंका बढ़ जाती है कैंसर का सही समय पर पता न लगने पर कैंसर शरीर के दूसरे अंगों में फैल जाता है जब इलाज कठिन होता है।

स्पाइन में कैसी है गांठ बताना संभव

डा. अालोक ने बताया कि हमने किंग जार्ज मेडिकल विवि के डा. अनीत परिहार और डा. दुर्गेश दि्वेदी के साथ मिल कर एक और सांख्यिकी टूल बनाया जिसमें एसडीआर( सिंगल इंटरेंश रेडिएशन)  और एडीसी( एप्रिजल डिफ्यूजन) के बीच रीलेशन के अाधार पर बताया जा सकता है कि यह किस तरह की गांठ है। स्पाइन में गांठ कई बार कैंसर, कई नांन कैंसर और इंफेक्शन के कारण गांठ होती है। हर गांठ का इलाज अलग होता है कई बार इनमें भिन्नता नहीं हो पाती है एेसे में इलाज की दिशा तय करना संभव नहीं होता।  इसके लिए हमने सांख्यिकी टूल तैयार किया है जिससे भिन्नता की जा सकती है। इस टूल को अमेरिकन जर्नल अाफ न्यूरोलाजी ने स्वीकार किया है। 

गुरुवार, 2 नवंबर 2017

स्किज़ोफ्रेनिया में किस तरह का इलाज होगा सफल बताएंगा पैमाना

पीजीआइ में इंडियन सोसाइटी फार मेडिकल स्टेस्टिक्स का अधिवेशन

स्किज़ोफ्रेनिया में किस तरह का इलाज होगा सफल बताएंगा पैमाना

दैनिक जीवन में सांख्यिकी की अहम भूमिका- राज्यपाल

जागरण संवाददाता। लखनऊ
ब्लड प्रेशर , बुखार नापने का पैमाना है लेकिन मानसिक स्थित नापने के लिए कोई पैमाना नहीं था । मानसिक स्थित नापने के लिए विशेषज्ञों ने पैमाना बनाया है ऐसे ही मानसिक बीमारी स्किज़ोफ्रेनिया  बीमारी की गंभीरता और इलाज की दिशा तय करने के लिए पैमाना नेशनल इंस्टीट्यूट आफ मेंटल हेल्थ( निमहांस) बंगलौर के प्रो. डीके शुभाकृष्णना की टीम ने तैयार किया है। संजय गांधी पीजीआइ में आयोजित इंडियन सोसाइटी फार मेडिकल स्टेस्टिक्स के 35 वें वार्षिक अधिवेशन में बताया कि सोशल आक्युपेशनल फंक्शन स्केल के जरिए इस बीमारी से ग्रस्त मरीजों में बताया जा  सकता है कि बीमारी की गंभीरता कितनी है। इलाज घर या अस्पताल में कहां संभव है। इलाज के बाद बीमारी कितनी कम हुई। इसके लिए जो स्केल बनाया गया है वह कोई उपकरण नहीं है इसमें डाक्टर कुछ सवाल मरीज से , घर वालों से पूछते है जिसके आधार पर बीमारी की स्थित का आकलन किया जाता है। स्केल को और अधिक लोगों में वैलीडेट करने की जरूरत है। हमने इस बीमारी से ग्रस्त 25 लोग घर में इलाज लेने वाले, 25 अस्पताल में इलाज लेने वाले और 25 इलाज के बाद ठीक हो रहे है लोगों पर स्केल का इस्तेमाल कर स्थित का आकलन किया है। अधिवेशन के उद्घाटन के मुख्य अतिथि राज्यपाल श्री राम नाइक ने कहा कि बिना स्टेस्टिक्स के विज्ञान संभव नहीं है। दैनिक दिन चर्या को लय बद्ध करने में भी इसका अहम रोल है। इस मौके पर निदेशक प्रो.राकेश कपूर, संयुक्त निदेशक एवं बायो स्टेस्टेक्सि विभाग के प्रो. उत्तम सिंह , आयोजक प्रो. सीएम पाण्डेय में सांख्यिकी की शोध में भमिका पर जानकारी दी। 

क्या है  स्किज़ोफ्रेनिया


 एक मानसिक विकार है। इस परेशानी से ग्रस्त व्यक्ति  असामान्य सामाजिक व्यवहार तथा वास्तविक को पहचान पाने में असमर्थता होती है। लगभग 1% लोगो में यह विकार पाया जाता है। इस रोग में रोगी के विचार, संवेग, तथा व्यवहार में आसामान्य बदलाव आ जाते हैं जिनके कारण वह कुछ समय लिए अपनी जिम्मेदारियों तथा अपनी देखभाल करने में असमर्थ हो जाता है। स्किज़ोफ्रेनिया का शाब्दिक अर्थ है - 'मन का टूटना'।
-सिज़ोफ्रेनिया के कुछ प्रमुख लक्षण हैं, 
-रोगी अकेला रहने लगता है,
-वह अपनी जिम्मेदारियों तथा जरूरतों का ध्यान नहीं रख पाता,
-रोगी अक्सर खुद ही मुस्कुराता या बुदबुदाता दिखाई देता है,
-रोगी को विभिन्न प्रकार के अनुभव हो सकते हैं जैसे की कुछ ऐसी आवाजे सुनाई देना जो अन्य लोगों को न सुनाई दें, कुछ ऐसी वस्तुएं, लोग, या आकृतियाँ -दिखाई देना जो औरों को न दिखाई दे, या शरीर पर कुछ न होते हुए भी सरसराहट, या दबाव महसूस होना, आदि,
-रोगी को ऐसा विश्वास होने लगता है कि लोग उसके बारे में बातें करते है, उसके खिलाफ हो गए हैं, या उसके खिलाफ कोई षड्यंत्र रच रहे हो,
-उसे नुकसान पहुँचाना चाहते हो, या फिर उसका भगवान् से कोई सम्बन्ध हो, आदि,
-रोगी को लग सकता है कि कोई बाहरी ताकत उसके विचारो को नियंत्रित कर रही है, या उसके विचार उसके अपने नहीं है,
-रोगी असामान्य रूप से अपने आप में हंसने, रोने, या अप्रासंगिक बातें करनें लगता है,
-रोगी अपनी देखभाल व जरूरतों को नहीं समझ पाता,
-रोगी कभी-कभी बेवजह स्वयं या किसी और को चोट भी पंहुचा सकता है,
-रोगी की नींद व अन्य शारीरिक जरूरतें भी बिगड़ सकती हैं


लोकल डाटा के जरिए बने वहां के लिए योजना

सोसाइटी के वरिष्ठ सदस्य एवं बीएचयू के पूर्व प्रो. डीसीएस रेड्डी ने कहा कि किसी भी योजना को लागू करने से पहले जहां योजना लागू करनी वहां की स्थित के बारे में डाटा का इस्तेमाल करना चाहिए। इसके लिए लोकल स्टडी की जरूरत है। कहा कि आयोडीन की कमी हर जगह नहीं है लेकिन आयोडीन नमक पूरे देश को खिलाया जा रहा है। इस लिए जहां पर कमी है वहां पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। इसी तरह फ्लोरोसिस की परेशानी कुछ खास जगहों पर वहां पर योजना लागू करने की जरूरत है लेकिन देखा जा रहा है कि नेशनल डाटा के आधार पर पूरे देश में योजना लागू कर  दी जाती है।    

उंचाहार - की घटना की शिकार -रोली के अांसू बयां कर रहे है दर्द

रोली के अांसू बयां कर रहे है दर्द
इनके सिवा मेरा तो कोई सहारा नहीं बचा लीजिए साहब
 3.30 बजे हुई बात कहा जल्दी आएंगे अब तो पहचान भी नहीं रहे है
कुमार संजय। लखनऊ

बलिया के खूटा बहुरवा पाल चंद्र के रहने वाले 35 वर्षीय राकेश सिंह की पत्नी रोली सिंह के अांसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। संजय गांधी पीजीआइ के इमरजेंसी वार्ड के सामने बावली सी वार्ड के अंदर जाने वाले हर सफेद कोट वाले लोगों का पैर पकड़ कर गुहार कर ही है बचा लीजिए मेरे पति दुनिया में मेरा कोई नहीं है। उनके बिना मै भी मर जाउंगी । उनके बिना जिंदगी का कोई मतलब है। रो -रो कर पति के जिंदगी के लिए गुहार करते रोली सिंह कहती है फरवरी में शादी के दो साल पूरा होंगे । अबी कोई बच्चा भी नहीं है। भगवान ने मेरे साथ बडा अन्याय किया है। शाम को 3.30 बजे बात हुई कई बाते हुई कहा कि जल्दी घर अा रहा हूं । साथ लें अाउंगा लेकिन 4.30 के अास -पास किसी साथी का फोन अाया कि उनको चोट लग गयी है घबडाने की जरूरत नहीं है लेकिन मन नहीं माना तुरंत बलिया से बस पकड़ लिया। पता चला कि रायबरेली में भर्ती है वहां पहुंची तो डाक्टर ने लखनऊ के लिए भेज दिया। मै भी यहां अा गयी लेकिन अब तो वह पहचान भी नहीं रहे हैं। इनके साथ ही रहती थी लेकिन दीपावली में बलिया अा गयी थी ..कुछ दिन साथ क्या छूटा यह हो गया। 
रोली सिंह ने बताया कि प्लांट में वह दस -12 लोगों को लेकर बिजली का काम करते थे। 


शुक्र है दोनों भाई साथ नहीं थे

ऊंचाहार के फरीदीपुर के रहने वाले 26 वर्षीय श्री राम के भाई राम पाल कहते है कि भाई प्लांट में वेल्डिंग का काम कर रहा था उसी समय यह हादसा हुअा भाई पूरी तरह सुलस गया । पहले एनटीपीसी से अस्पताल में ले गए फिर रायबरेली ले गए वहां से पीजीआइ भेजा गया। मैं भी प्लांट  में ही काम करता हूं शुक्र में प्लांट के दूसरी यूनिट में काम कर रहा था घटने की तुरंत जानकारी के बाद भाई को लेकर चल पडें। हम लोग ठेकेदार के अंदर काम करते हैं। भाई को सात हजार महीना मिलता था कुछ मै भी कमा लेता जिससे घर चलता है। भाई के पत्नी माधुरी है और तीन साल का एक लड़का है। बस भाई बच जाए हम लोग फिर घर चला लेंगे। रामपाल ने बताया कि भाभी को अभी यही बताया है कि भाई की हालत ठीक है लेकिन अब भाभी भी अा रही है। कुछ हो गया तो ..यह कहते है रामपाल के अांसू दिल की जज्बात की गवाही देने लगते हैं। 


दस मिनट में चार्ज हो जाएगी बैठरी- दिल पर खतरे पर बजेगा एलार्म

तो दिल पर खतरे से अागाह करेगा एलार्म 


10 मिनट में जार्ज हो जाएगी बैटरी
एसटीपीआई ऐसे तमाम योजनाओं के लिए तैयार कर रहा है वातावरण 
कुमार संजय। लखनऊ

- आने वाले दिनों में संभव है कि दिल की धड़कन बिगड़ते ही आप के फोन का एलार्म बज उठेगा या आप के डाक्टर जान जाएंगे कि दिल में कुछ गड़बडी है और वह तुरंत आप को भर्ती के लिए घर में एंबूलेंस भेज देंगे। 
- अभी आप का फोन जार्ज होने में एक घंटा लगता है लेकिन आने वाले दिनों में आप का फोन दस मिनट में चार्ज हो जाएगा। संभव है कि दूर से ही वाई फाई से फोन चार्ज कर लें
- अभी अनिद्रा की परेशानी होने पर स्लीप लैब में रात भर इलेक्ट्रोड लगा कर नींद की स्थित देखी जाती है लेकिन आने वाले दिनों में घंटे स्लीप लैब में बैठ कर एक छोटा चा चिप लगा दिया जाएगा जिससे नींद की स्थित आप को स्मार्ट फोन में रिकार्ड हो जाएगी। 

ऐसे एक नहीं हजारों आइडिया पर काम हो रहा है। इस तरह की आइडिया पर काम करने वाले लोगों को साफ्ट वेयर टेक्नोलाजी पार्क आफ इंडिया(एसटीपीआई) के    वातावरण दे रहा है। एसटीपीआई के  महानिदेशक डा. ओंकार राय ने बताया कि इसके लिए देश में सेंटर आफ एक्सीलेंस और इंक्युबेटर सेंटर बनाए जा रहे हैं। स्टार्ट अप इंडिया प्रोग्राम के तहत तमाम नई मेडिकल कम्युनिकेशन एंड इंफार्मेशन सिस्टम के साथ ही रोज मर्रा की जिंदगी में राहत देने वाले तकनीक पर काम हो रहा है। बताया एक सेंटर दिल्ली विवि में स्थापित किया गया है यहां पर इलेक्ट्रो प्रेन्योर पार्क में दिल के जांच के लिए देशी उपकरण तैयार किया जा रहा है। डा. ओमकार ने कहा कि इंफार्मेशन टेक्नोलाजी के सर्विस सेक्टर हमारी भागीदारी पूरी दुनिया में 56 फीसदी है लेकिन उत्पाद में एक फीसदी से भी कम है। अब हमें उत्पाद के क्षेत्र में काम करना होगा इसी लक्ष्य को लेकर काम हो रहा है। स्टार्ट अप इंडिया  में 90 फीसदी भागीदारी आईटी सेक्टर की है। इस लिए यह कह सकते है कि हम आई टी उत्पाद में भी भागीदारी बढा सकते है। इसी लिए हम लोग नए आईडिया पर काम कर रहे हैं। डा. राय ने कहा कि स्टेसटिक्स का इस लक्ष्य में अहम भूमिका है। 

पीजीआइ --दो घंटे में निदेशक ने एक्टीवेट कराया वार्ड

दो घंटे में निदेशक ने एक्टीवेट कराया वार्ड
रात 12 बजे तक निदेशक खुद करते रहे निगरानी
जागरण संवाददाता। लखनऊ

संजय गांधी पीजीआइ के निदेशक प्रो.राकेश कपूर को जैसे ही घटना की जानकारी मिली तुरंत स्वाइन फ्लू वार्ड को एक्टीवेट कराने के लिए काम शुरू कर दिए। रात 12 बजे तक वह खदु वार्ड को एक्टीवेट कराने के लिए व्यवस्था को देखते रहे। वार्ड को एक्टीवेट कराने के लिए सबसे पहले कई विभागों के संकाय सदस्यों , नर्सेज, पेशेंट हेल्पर की टीम बनायी सभी विभागों से स्टाफ लिया गया। इसके बाद उपकरणों को बेड के साथ फिट किया गया। एचअारएफ से अावश्यक दवाएं , ड्रेसिंग के लिए समान सहित कई व्यवस्था की गयी। एचअारएफ के इंचार्ज अारए यादव, अार के शर्मा , एपीअारओ एपी अोझा, पीअारअो अाशुतोष सोती, एकाउंट के दीप चंद , डिप्टी एमएस सुनील शिशु, अस्पताल प्रशासन के प्रो. राजेश हर्षवर्धन  सहित कई अधिकारी हर स्तर रात दो बजे सारे इंतजाम पूरे किए। पल्मोनरी मेडिसिन के हेड प्रो.अालोक नाथ, प्लास्टिक सर्जरी के प्रो. अंकुर भटनागर ने वार्ड में क्या जरूरत पडेगी पूरा मैनेज किया। निदेशक प्रो.राकेश कपूर ने बताया कि वार्ड बन कर तैयार था लेकिन एक्टीवेट नहीं था क्यों कि स्वाइन फ्लू का सीजन खत्म हो गया था। इस अापदा को देखते हुए सबके सहयोग से दो घंटे में वार्ड एक्टीवेट किया इस वार्ड में 11 बेड है। 

बर्न वार्ड में तब्दील हो गया स्वाइिन फ्लू वार्ड

प्लास्टिक सर्जरी के प्रो. अंकुर भटनागर और प्रो. अनुपमा ने बताया कि हम लोगों ने वार्ड को बर्न वार्ड  में तब्दील कर दिया है। अब सबसे बडी चुनौती इंफेक्शन रोकना है क्योंकि सभी मरीजों में डीप बर्न है जिसके कारण दो से तीन दिन बाद इंफेक्शन की अाशंका है। सभी 30 से 40 फीसदी बर्न जो क्रिटिकल बर्न माना जाता है। हम लोगों ने तय किया है कि वार्ड में ड्रेसिंग नहीं करेंगे वार्ड से लगे एक एरिया को ड्रेसिंग बाथ बनाया जाएगा इससे वार्ड में इंफेक्शन की अाशंका कम होगी। फिलहाल वार्ड में पांच मरीज भर्ती है 

अब एमअारअाई से ही संभव है ब्रन ट्यूमर और ग्लायोमा में भेद

अब एमअारअाई से ही संभव है ब्रन ट्यूमर और ग्लायोमा में भेद

स्टेटिसयन की है नए शोध , इलाज और जांच में अहम भूमिका





अब एमआरआई से ही दिमाग में ट्यूमर या ग्लायोमा का भेद करना  संभव संजय गांधी पीजीआई के बायोस्टेस्टियन प्रो.सीएम पाण्डेय ने सहयोगियो के साथ किया । इस खोज को अमेरिकन जनरल अाफ न्यूरोलाजी ने भी स्वीकार किया है। इंडियन सोसाइटी फार मेडिकल स्टेटिक्स के 35 वें वार्षिक अधिवेशन के मौके पर मेडिकल साइंस में स्टेटिक्स की भूमिका पर प्रो.सीएम पाण्डेय, झांसी मेडिकल कालेज के प्रो.वीएल वर्मा, जिपमर पांडीचेरी के प्रो.अजीत सहाय ने बताया कि दिमाग में ट्यूमर या ग्लायोमा है यह पहले एमअारआाई से से नहीं लग पाता था क्योंकि एमअारई की इमेज दोनों में एक तरह दिखती थी। हम ने इमेज की बैकग्राउंड के गुण के अाधार पर तकनीक स्थापित की जिससे दोनों के बीच अंतर स्थापित किया जा सकता है। अब मरीजों में इस्तेमाल भी हो रहा है। ब्रेन ट्यूमर और ग्लायोमा दोनों के इलाज में काफी अंतर है। एेसे ही बायो स्टेटिक्स के जरिए ही नई दवा कितनी कारगर है। नई जांच कितनी उपयोगी है यह तथ्य स्थापित किया जा सकता है।  हम लोग शोध में मिले परिणाम की गणना कर सही तथ्य स्थापित करते है। इसी सभी मेडिकल कालेज में हम लोगों की तैनाती है । देश में अाठ संस्थानों  में पूरा विभाग स्थापित है। हमारी सोसाइटी है जिसका वार्षिक अधिवेशन दो से चार नवंबर तक तक होने जा रहा है। इसमें दो सौ से अधिक विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं। 

आर्युवैदिक दवा नुकसान नहीं करती है कितना सही

सभी लोग कहते है कि अार्युवैदिक दवा नुकसान नहीं करती लेकिन इसको लेकर वैज्ञानिक तथ्य नहीं है। यह तभी कहा जा सकता है इस पर शोध हो अाज कोई वैज्ञानिक शोघ नहीं हुअा है। 

स्टेटिक्स है  नर्सिग की जनक

स्टेटिसयन ने देखा कि अस्पताल में मरने वाले की संख्या सीमा पर लड़ने वाले लोगों से सात गुना अधिक है। हम लोगों ने ब्रिटेन की महारानी को बताया कि अस्पताल में इलाज तो डाक्टर कर रहे है लेकिन देख -भाल न होने के कारण मरीजों में संक्रमण हो रहा है । सही समय पर मरीज दवाएं नहीं खा रहे है जिसके कारण मौत हो रही है। इस जानकारी के बाद मरीजों के देख भाल के लिए डाक्टरों की सहायता के लिए सहायक लगाए गए यही से नर्सिग की शुरूअात हुई।

मंगलवार, 31 अक्टूबर 2017

स्तन कैंसर के इलाज के दौरान लापरवाही पड़ सकती है भारी

स्तन कैंसर के इलाज के दौरान लापरवाही पड़ सकती है  भारी

कीमोथिरेपी के दौरान लापरवाही से हो सकता है संक्रमण


जागरणसंवाददाता। लखनऊ 

गोरखपुर की 45 वर्षीया रजनी पेशे से स्त्री रोग विशेषज्ञ है। स्तन कैंसर की परेशानी होने पर इलाज के लिए कीमोथिरेपी शुरू गयी । थिरेपी शुरू करने के साथ इन्हें तमाम एहतियात दी गयी लेकिन इन्होंने एहितायत नहीं बरता और मरीज भी देखती रहीं। किसी मरीज में टीबी जिससे इन्हे एमडीअार टीबी हो गयी जिससे तमाम परेशानी का समान करना पड़ा। स्तन कैंसर से पहले टीबी का इलाज करने में काफी समय खराब हो गया। एेसा केवल इनके साथ नहीं हुअा संजय गांधी पीजीआई के इंडोक्राइन सर्जन प्रो.ज्ञान चंद के मुताबिक 15 से 20 फीसदी मरीज कैंसर के इलाज के दौरान डाक्टरी सलाह न मानने के कारण इलाज के दौरान संक्रमण के शिकार हो जाते है जिससे इलाज तो बाधित होता है साथ ही मौत तक हो जाती है। विशेषज्ञों के मुताबिक  मरीज में इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है। इस कारण इनमें संक्रमण की अाशंका बढ़ जाती है।

पढे लिखे भी खतरे से अंजान
 प्रो.ज्ञान ने बताया कि कम पढे लिखी महिलाएं स्तन कैंसर का पता न लगा पाएं यो तो हो सकती है लेकिन राजधानी के बडे स्कूल की शिक्षिका के स्तन में गांठ हुई तो वह इलाज के लिए स्त्री रोग विशेषज्ञ के पास चली गयी जिसके कारण इनमें कैंसर का पता लगने में 6  महीने लग गया। हमारे पास अाते -अाते कैंसर इतना बढ़ गया कि पूरा स्तन निकालना पड़ा। 

75 फीसदी एडवांस स्टेज में अाती है विशेषज्ञ के पास 

प्रो. ज्ञान चंद  75 फीसदी महिलाएं कैंसर के एडवांस स्टेज में अाती है जिसमें स्तन को बचाना संभव नहीं हो पाता। इनमें पहले कीमोथिरेपी करके गांठ को छोटा करना पड़ता है फिर स्तन को निकालना पड़ता है।  

नर्सेज की योग्यता दरकिनार करने की खबर पर पीजीआइ प्रशासन हरकत में अाया

नर्सेज की योग्यता दरकिनार करने की खबर पर पीजीआइ प्रशासन हरकत में अाया

संयुक्त निदेशक ने दिया गल्ती ठीक करने का अाश्वासन

जागरणसंवाददाता। लखनऊ 


नर्सेज की नियुक्ति में एम्स की अहर्ता दर किनार करने की खबर छपने पर संजय गांधी पीजीआइ के अधिकारी हरकत में अाए। संस्थान प्रशासन के फटकार के बाद मंगलवार को प्रशासनिक भवन में हड़कंप मचा रहा । सूत्रों का कहना है कि कुछ अधिकारी तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत कर अपने को सही बता रहे है। दैनिक जागरण में सोमवार को यह खबर प्रकाशित की थी जिसमें कर्मचारी नेताअों ने अहर्ता पर सवाल खडा किया था।    नर्सेज के लिए योग्यता बीएससी नर्सिग रखी गयी है । जीएनएम को योग्य नही माना गया है। एेसा पहले एम्स दिल्ली , ऋषिकेश, भुवनेश्वर ने किया था वहां पर नर्सेज की वैकेंसी निकली तो केवल बीएससी नर्सिग मांगा गया था ।  सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल में हम लोगों ने अपील किया था जिसमें कहा था कि पूरे देश यहां तक कि यूरोपियन देशों में भी जीएनएम को नर्स के योग्य माना गया लेकिन एम्स ऋषिकेश, रायपुर अौर भुवनेश्वर ने हाल में जो जगह निकाली उसमें नर्स के केवल बीएससी नर्सिग को योग्य माना जो कि सरासर गलत था। ट्रिब्यूनल के अादेश पर इन संस्थानों ने बाद में शुद्धि पत्र निकाला जिसमें जीएनएम को भी योग्य माना गया। ट्रेंड नर्सेज एसोसिएशन के सदस्य अजय कुमार सिंह ने कहा कि संस्थान में एम्स के सामन योग्यता होनी चाहिए लेकिन यहां पर कैडर पुनर्गठन में योग्यता में बदलाव किया गया जिसे ठीक करने का अाश्वासन संयुक्त निदेशक प्रो. उत्तम सिंह ने दिया है।  

सोमवार, 30 अक्टूबर 2017

पीजीआइ ने नर्सेज के लिए एम्स की अहर्ता को किया दर किनार

पीजीआइ ने नर्सेज के लिए एम्स की अहर्ता को किया दर किनार

एम्स में नर्स के लिए जीएनएम  योग्य लेकिन पीजीआइ में नहीं 
कर्मचारी महासंघ ने किया इस बदलाव का विरोध

जागरणसंवाददाता। लखनऊ

कर्मचारी महासंघ की अध्यक्ष सावित्री सिंह, संघ के सलाहकार एवं ट्रेंड नर्सेज एसोसिएशन के सदस्य अजय कुमार सिंह, एसपी राय ने संस्थान के नर्सेज संवर्ग के  कैडर पुनर्गठन में इंट्री लेवल यानि नर्स ग्रेड टू पर नियुक्ति के लिए एम्स की योग्यता दर किनार करने पर रोष जताया है। कहना है कि नर्सेज के लिए योग्यता बीएससी नर्सिग रखी गयी है । जीएनएम को योग्य नही माना गया है। एेसा पहले एम्स दिल्ली , ऋषिकेश, भुवनेश्वर ने किया था वहां पर नर्सेज की वैकेंसी निकली तो केवल बीएससी नर्सिग मांगा गया था ।  सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल में हम लोगों ने अपील किया था जिसमें कहा था कि पूरे देश यहां तक कि यूरोपियन देशों में भी जीएनएम को नर्स के योग्य माना गया लेकिन एम्स ऋषिकेश, रायपुर अौर भुवनेश्वर ने हाल में जो जगह निकाली उसमें नर्स के केवल बीएससी नर्सिग को योग्य माना जो कि सरासर गलत था। ट्रिब्यूनल के अादेश पर इन संस्थानों ने बाद में शुद्धि पत्र निकाला जिसमें जीएनएम को भी योग्य माना गया। जब एम्स में जीएनएम को योग्य माना तो पीजीआइ में योग्य न मानना गलत है। संस्थान प्रशासन से कहा है कि एम्स के समरूप योग्यता रखें क्यों कि संस्थान में एम्स की समतुल्यता है।  कहा कि  पीजीआइ ने भी हाल में संविदा पर तैनाती में केवल बीएससी नर्सिग को प्राथमिकता देने को कहा जो गलत है। नर्सेज  सेवा के लिए जीएनएम ही असली योग्याता है । बीएसएसी या एमएससी यह एकेडमिक है।  जीएनएम केवल नर्स ही बन सकती है लेकिन बीएससी या एमएससी टीचर भी बन सकती है इसलिए जीएनएम को ही इस सेवा में प्राथमिकता दी जाए। 

सूबे में मरीजों के जांच में नाम पर घोटाला


सूबे में मरीजों के जांच में नाम पर घोटाला 
खून जांचने वालों के सर्टिफिकेट निकले फर्जी



सूबे के सरकारी अस्पतालों में खून की मुफ्त जांच में जमकर खेल हो रहा है। जिस कंपनी को जांच का ठेका दिय गया है उसने स्वास्थ्य केंद्रों पर अप्रशिक्षित व अयोग्य कर्मी तैनात कर रखे हैं। उनके सर्टिफिकेट भी फर्जी हैं। यह सभी रोजाना हजारों मरीजों की जांच कर उनकी जान से खिलवाड़ कर रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग की जांच में यह बात सामने आई है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के तहत प्रदेश की सीएचसी और जिला अस्पतालों में पीपीपी मॉडल पर मुफ्त रक्त जांच योजना शुरू की गई है। इसकी जिम्मेदारी कृष्णा डायग्नोस्टिक सेंटर को सौंपी गई है। लेकिन कंपनी ने काम शुरू करते ही मरीजों की जिंदगी दांव पर लगा दी है। अगस्त में कंपनी द्वारा अस्पतालों में मरीजों की जांच में अनियमितता बरते जाने की बात सामने आई थी। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग ने जांच कराई तो पता चला कि कंपनी के कर्मचारी अप्रशिक्षित हैं और उनके डिप्लोमा फर्जी हैं।1स्वास्थ्य महानिदेशक ने 11 अक्टूबर की अपनी रिपोर्ट में बताया कि कंपनी 222 सीएचसी व सात जिला अस्पताल में जांच कर रही है। वहीं सीएचसी से लेकर डायग्नोस्टिक सिस्टम में कुल 400 कर्मी तैनात होना बताए गए हैं। इसमें से 210 लैब टेक्नीशियन व लैब असिस्टेंट के प्रमाण पत्र उपलब्ध कराए गए हैं। इसमें से 141 कर्मियों के प्रमाण पत्र फर्जी होने की आशंका व दो का अयोग्य होना बताया गया। योजना में 822 सीएचसी व 95 जिला अस्पताल शामिल हैं।
स्वास्थ्य विभाग की जांच में सामने आया सच
पीपीपी मॉडल जांच में धांधली, मरीजों से हो रहा खिलवाड़मरीजों से खुला खिलवाड़1पीपीपी मॉडल पर जांच में मरीजों की जिंदगी से खुला खिलवाड़ किया जा रहा है। इसमें एमसीआइ के सकरुलर वर्ष 2014 व एनएबीएल के मानकों को दरकिनार कर अप्रशिक्षित लोगों से इंटरवेंशन व डायग्नोस्टिक संबंधी काम लिए जा रहे हैं।

योग्यता के ये थे मानक
शासन ने सैंपल कलेक्शन के लिए 12वीं विज्ञान वर्ग के अभ्यर्थी को ही योग्य माना था। इसके अलावा इन अभ्यर्थियों के पास सीएमएसटी-डीएमएलटी या फिर बीएमएलटी डिप्लोमा के साथ-साथ छह माह का अनुभव अनिवार्य था। 


सीएचसी पर 25 तरह के टेस्ट होने थे, जिला अस्पताल में 63 जांचें होनी थी।1कंपनी ने रीप्रजेंटेंशन दिया था। इसे मैंने खारिज कर दिया है। कार्रवाई के लिए पत्र डीजी हेल्थ को भेज दिया है।.....प्रशांत कुमार, अपर मुख्य सचिव, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य

कृष्णा डायग्नोस्टिक सेंटर ने मानकों को नजरंदाज किया है। उसके कर्मियों के प्रमाण पत्र भी फर्जी होने की आशंका है। इस संबंध में रिपोर्ट तैयार कर ली गई है। शीघ्र कार्रवाई होगी।...डॉ. पद्माकर सिंह, डीजी हेल्थ

मैं बाहर हूं, इस समय कुछ नहीं बता सकती हूं।.....पल्लवी जैन, मैनेजिंग डायरेक्टर, कृष्णा डायग्नोस्टिक


जांच में यह हुआ उजागर
-कंपनी ने 400 कर्मियों की तैनाती बताई, प्रमाण पत्र सिर्फ 210 के प्रस्तुत किए
-यह 210 कर्मी लैब टेक्नीशियन व लैब अटेंडेंट बताए गए
-इनमें 23 कर्मियों ने बुलंदशहर के एक पैरामेडिकल कॉलेज के दस्तावेज लगाए, इन पर रोल नंबर व इनरोलमेंट नंबर ही नहीं दर्ज हैं1
-12 कर्मियों के ऐसे प्रमाण पत्र हैं जिन पर पाठ्यक्रम का नाम ही अंकित नहीं हैं, आखिर कौन सा डिप्लोमा है इसका पता ही नहीं
-69 कर्मियों के इंटर के प्रमाण पत्र ही नहीं संलग्न किए गए
-दो कर्मियों के प्रमाण पत्र विज्ञान वर्ग के बजाय कला वर्ग के लगे मिले1
-रिपोर्ट में कर्मियों के प्रमाण पत्र फर्जी होने की आशंका व्यक्त की गई है1

रविवार, 29 अक्टूबर 2017

महासंघ नर्सेज के कैडर पुनर्गठन में गड़बडी पर अाक्रोशित

महासंघ  नर्सेज के कैडर पुनर्गठन  में गड़बडी पर अाक्रोशित
पदों के अनुपात में गडबडी को ठीक करने की मांग
 संयुक्त निदेशक प्रशासन ने दिया अाश्वासन


जागरणसंवाददाता। लखनऊ

कर्मचारी महासंघ पीजीआइ की अध्यक्ष सावित्री सिंह , सलाहकार अजय कुमार सिंह , एसपी राय ने नर्सेज के कैडर पुनर्गठन में कमी पर सावल खडा किया है। संस्थान प्रशासन से कहा कि नर्सेज के कैडर पुनर्गठन  में पदो के अनुपात में गडबडी है।  संस्थान में कुल नर्सेज की संख्या  1114  है। अनुपात में  गडबडी के कारण इंट्री लेवल नर्सिग ग्रेड टू के पद अधिक है लेकिन अागे प्रमोशनल पदों की संख्या कम हो गयी है। अनुपात में अनियमिता के कारण उच्च पदों की संख्या कम हो गयी है। इसके कारण नर्सिग अाफीसर, असिस्टेंट नर्सिग सुपरिनटेंडेट, नर्सिग सुपरिनटेंडेंट के पदों की संख्या कम हो गयी है। 1114 की संख्या पर गणना के अनुसार  एएनएस की 153 है जबकि 186 होना चाहिए। सिस्टर ग्रेड वन का पद 235 रखा है जबकि 351 होना चाहिए। नर्सिग सुपरिनटेंड का पद 6 दिया जबकि नौ होना चाहिए। इंट्री लेवल ( नर्सेज ग्रेड टू) पर पदों की संख्या के अाधार पर उच्च पदों की संख्या तय की जाती है। कैडर रिसटचरिंग में अनुपात 2008 के अाधार पर रखा गया है उस समय कुल नर्सेज की संख्या 745 थी अब 1114 नर्सेज की संख्या है जिसके अाधार पर उच्च पदों की संख्या होनी चाहिए।  संयुक्त निदेशक प्रशासन प्रो. उत्तम सिंह से इस मुद्दे पर वार्ता के बाद सावित्री सिंह ने बताया कि वह हमारी बात पर सहमत है कहा कि गल्ती में सुधार किया जाएगा। 

ब्रेन स्ट्रोक साबित हो रहा है विकलांगता और मौत का तीसरा बडा कारण

ब्रेन स्ट्रोक साबित हो रहा है विकलांगता और मौत का तीसरा बडा कारण

15 फीसदी युवा भी हो रहे है ब्रेन स्ट्रोक के  शिकार
पीजीआइ में स्ट्रोक के 4.5 घंटे के अंदर पहुचने वाले लोगों के लिए विशेष ध्यान 


  जागरणसंवाददाता। लखनऊ
ब्रेन स्ट्रोक मौत और विकलांगता का तीसरा सबसे बड़ा कारण है। सर्दियों के मौसम में इसकी आशंका 53 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। वर्ल्ड स्ट्रोक डे (29 अक्तूबर) के मौके संजय गांधी पीजीआइ के न्यूरोलाजी विभाग के प्रमुख प्रो,सुनील प्रधान, प्रो, संजीव झा , प्रो.वीके पालीवाल और प्रो.विनीता मनी ने कहा कि हमारे पास ब्रेन स्ट्रोक के जो मरीज अते है उनमें से अधिकांस मामलों में  उच्च रक्त चाप बडा कारण होता है। कहा कि  ब्रेन स्ट्रोक मृत्यु और विकलांगता का एक प्रमुख कारण है। जीवनशैली और खान-पान की आदतों में बदलाव के कारण उम्रदराज लोग ही नहीं बल्कि युवा भी तेजी से इसकी चपेट में आ रहे हैं। स्ट्रोक के शिकार लोगों में करीब 28 प्रतिशत 65 वर्ष से कम आयु के हैं और 10-15 प्रतिशत लोग 40 वर्ष से कम आयु के। इसका इलाज भी काफी महंगा होता है, इसलिए जरूरी है कि इसके लक्षणों को पहचान कर तुरंत ही इसका उपचार किया जाए। शारीरिक रूप से सक्रिय रह कर काफी हद तक स्ट्रोक से बचा जा सकता है। हम लोग 4.5 घंटे के अंदर पहुंचने वाले मरीज पर विशेष ध्यान देते है जिससे उनमें परेशानी कम हो जाती है।