एसजीपीजीआइ उत्तर प्रदेश में पहली बार सफल हुआ हृदय प्रत्यारोपण
दिल्ली से एयर एम्बुलेंस द्वारा लाया गया दाता हृदय, ग्रीन कॉरिडोर से लखनऊ पहुंचा कर गंभीर हार्ट फेल्योर मरीज को मिला नया जीवन
उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं के इतिहास में रविवार का दिन स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया, जब संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआइ), ने राज्य का पहला सफल हृदय प्रत्यारोपण कर नई चिकित्सा उपलब्धि हासिल की। यह जटिल प्रत्यारोपण 41 वर्षीय महिला में किया गया। डायलेटेड कार्डियोमायोपैथी नामक गंभीर बीमारी से पीड़ित थी। इस बीमारी में हृदय की मांसपेशियां अत्यधिक कमजोर हो जाती हैं और शरीर को पर्याप्त रक्त पंप नहीं कर पाता है, जिससे मरीज गंभीर हार्ट फेल्योर की स्थिति में पहुंच जाता है। चिकित्सकों के अनुसार मरीज की जान बचाने के लिए हृदय प्रत्यारोपण ही अंतिम विकल्प बचा था।
प्रत्यारोपण के लिए हृदय दिल्ली से लाया गया। दिल्ली के एक डोनर ने मृत्यु के बाद अपने हृदय, लिवर और गुर्दे दान किए थे। लिवर और गुर्दों का प्रत्यारोपण दिल्ली में ही किया गया, जबकि हृदय के लिए स्टेट आर्गन टिशू ट्रांसप्लांट (सोटो) के संयुक्त निदेशक और पीजीआई के चिकित्सा अधीक्षक प्रो. राजेश हर्ष वर्धन से आरएमएल दिल्ली के ट्रांसप्लांट कोआर्डीनेटर मिलन ने संपर्क किया। संस्थान की हृदयरोपण टीम की सहमित के बाद प्रो. हर्षवर्धन ने भेजने को कहा जिसके बाद शनिवार को नौ बजे विशेष एयर एम्बुलेंस से तत्काल लखनऊ भेजा गया। लखनऊ पहुंचने पर प्रशासन और ट्रैफिक पुलिस की मदद से ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया, जिससे दाता हृदय को 20 मिनट समय में एसजीपीजीआई पहुंचाया जा सका। संस्थान की कार्डियोथोरेसिक एंड वैस्कुलर सर्जरी (सीवीटीएस) विभाग, कार्डियोलॉजी विभाग, एनेस्थीसिया विभाग, राज्य अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (सोटो), रीजनल आर्गन एंड टिशू ट्रांसप्लांट (रोटो) तथा दिल्ली के डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल की टीमों ने मिलकर इस मिशन को सफल बनाया। निदेशक प्रो. आर.के. धीमन ने कहा कि यह केवल एक सफल ऑपरेशन नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में मल्टी आर्गन प्रत्यारोपण प्रणाली के नए युग की शुरुआत है। संस्थान पहले से गुर्दा प्रत्यारोपण में अग्रणी रहा है और हाल के वर्षों में लिवर प्रत्यारोपण कार्यक्रम को भी मजबूती मिली है। अब हृदय प्रत्यारोपण शुरू होने से प्रत्यारोपण केंद्र के रूप में स्थापित हो रहा है। विशेषज्ञ ने कहा कि प्रत्यारोपण पूरी तरह सफल रहा है। गहन देखभाल में रखा गया है।
ऑपरेशन में शामिल प्रमुख टीम
सीवीटीएस विभाग से प्रो. एस.के. अग्रवाल, प्रो. शांतनु पांडे, प्रो. मिलिंद होते, डॉ. विजय अग्रवाल सहित विशेषज्ञ सर्जनों ने प्रत्यारोपण का नेतृत्व किया। कार्डियोलॉजी विभाग से प्रो. आदित्य कपूर, प्रो. रूपाली खन्ना, प्रो. सत्येन्द्र तिवारी और डॉ. अंकित साहू ने मरीज की हृदय संबंधी निगरानी संभाली। एनेस्थीसिया टीम में प्रो. पुनीत गोयल, डॉ. अमित रस्तोगी, डॉ. पल्लव सिंह समेत कई विशेषज्ञ शामिल रहे। परफ्यूज़निस्ट राज कुमार यादव और संदीप कुमार तथा नर्सिंग आफीसर कलावती पाल, अरविंद, श्वेता, प्रेमलता नमन और कुलदीप ने पूरी प्रक्रिया को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मुख्यमंत्री और राज्यपाल ने दी बधाई
राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने एसजीपीजीआइ टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह सफलता प्रदेश के लिए गौरव का विषय है और इससे गंभीर हृदय रोगियों को राज्य में ही विश्वस्तरीय उपचार उपलब्ध होगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे प्रदेश की उन्नत स्वास्थ्य सेवाओं की बड़ी उपलब्धि बताते हुए कहा कि सरकार मल्टी आर्गन ट्रांसप्लांट कार्यक्रमों को हर संभव सहयोग देती रहेगी। उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने कहा कि एयर एम्बुलेंस और ग्रीन कॉरिडोर की व्यवस्था ने यह साबित किया है कि उत्तर प्रदेश अब जटिल चिकित्सा चुनौतियों का सामना करने में पूरी तरह सक्षम है।
ऐसे होता है हार्ट ट्रांसप्लांट
हृदय प्रत्यारोपण (हार्ट ट्रांसप्लांट) एक बहुत जटिल सर्जरी है जिसमें खराब हो चुके दिल को निकालकर दानदाता का स्वस्थ दिल लगाया जाता है। पहले तैयारी होती है
जब किसी मरीज का दिल इतना कमजोर हो जाता है कि दवाइयाँ या अन्य इलाज काम नहीं करते, तब डॉक्टर उसे ट्रांसप्लांट के लिए चुनते हैं।
दाता (डोनर) का दिल मिलते ही ऑपरेशन तुरंत शुरू करना पड़ता है, क्योंकि निकाला गया दिल केवल 4–6 घंटे तक ही सुरक्षित रहता है। . मरीज को हार्ट-लंग मशीन से जोड़ा जाता है
ऑपरेशन शुरू होने पर मरीज को बेहोश किया जाता है।
फिर शरीर को कार्डियोपल्मोनरी बायपास मशीन (हार्ट-लंग मशीन) से जोड़ा जाता है।
यह मशीन अस्थायी रूप से:
खून को पंप करती है
उसमें ऑक्सीजन मिलाती है
पूरे शरीर में पहुंचाती है
यानी ऑपरेशन के दौरान दिल बंद रहता है, लेकिन शरीर चलता रहता है।
सर्जन सीने की हड्डी खोलते हैं।
इसके बाद बीमार दिल को शरीर से अलग किया जाता है, लेकिन उसकी मुख्य बड़ी रक्त नलिकाएँ (महाधमनी, फुफ्फुसीय धमनी, शिराएँ) बचाकर रखी जाती हैं।
दाता का स्वस्थ दिल लाकर उसी जगह रखा जाता है।
फिर डॉक्टर बहुत महीन टांकों से इन मुख्य रक्त नलिकाओं को जोड़ते हैं:
एओर्टा (महाधमनी)
पल्मोनरी आर्टरी
सुपीरियर वेना कावा
इन्फीरियर वेना कावा
इसे तकनीकी भाषा में एनास्टोमोसिस कहते हैं—यानी रक्त नलिकाओं का जोड़ना।
जब सारी नलिकाएँ जुड़ जाती हैं:
हार्ट-लंग मशीन धीरे-धीरे हटाई जाती है
खून नए दिल में भेजा जाता है
अक्सर नया दिल खुद धड़कने लगता है
कभी-कभी हल्का इलेक्ट्रिक शॉक देकर धड़कन शुरू कराई जाती है
दिल की धड़कन, रक्तचाप, ऑक्सीजन सब जांची जाती है।
सब ठीक हो तो छाती बंद कर ICU में भेज दिया जाता है।
कुल समय
सामान्यतः 6 से 8 लगता है







































