70 दिन वेंटिलेटर पर रहने के बाद लौटी जिंदगी
सड़क हादसे में बुरी तरह घायल हुई 21 वर्षीय शगुन ने मौत से जीती जंग, एक फेफड़ा निकालने के बाद भी डॉक्टरों ने बचाई जान
अयोध्या की रहने वाली 21 वर्षीय शगुन के लिए 28 फरवरी 2026 का दिन जिंदगी बदल देने वाला साबित हुआ। सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल होने के बाद वह घरवालों को बेहोशी की हालत में मिली। छाती में गहरी चोट लगने के कारण उसे तुरंत लखनऊ ट्रॉमा सेंटर रेफर किया गया। हालत इतनी नाजुक थी कि कई बार डॉक्टरों को भी उसकी जिंदगी बचने की उम्मीद बेहद कम नजर आई, लेकिन करीब 70 दिन तक चले संघर्ष, इलाज और डॉक्टरों की लगातार कोशिशों के बाद आखिरकार शगुन ने मौत को मात दे दी।
3 मार्च 2026 को थोरेसिक विभाग के डॉ. शैलेंद्र ने उसका बड़ा ऑपरेशन किया। हादसे में उसका बायां फेफड़ा पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका था, इसलिए उसे निकालना पड़ा। ऑपरेशन के बाद शगुन को एनेस्थीसिया विभाग के सीसीयू-2 में भर्ती किया गया, जहां उसकी जिंदगी बचाने के लिए लगातार जद्दोजहद चलती रही।
इलाज के दौरान शगुन के दिल का दाहिना हिस्सा ठीक से काम नहीं कर पा रहा था। इसके कारण दिल के चारों तरफ पानी भर गया और ब्लड प्रेशर बेहद कम हो गया। इस गंभीर स्थिति को चिकित्सकीय भाषा में “पेरिकार्डियल टेंपोनाड” कहा जाता है। डॉक्टरों ने कैथेटर डालकर पानी बाहर निकाला, तब जाकर उसकी हालत कुछ संभली।
मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। शगुन के पास केवल दाहिना फेफड़ा बचा था, लेकिन लंबे समय तक वेंटिलेटर और गहरी सांसों के दबाव की वजह से उसमें भी हवा भर गई। इस स्थिति को “न्यूमोथोरेक्स” कहा जाता है। हवा भरने से वेंटिलेटर से सांस पहुंचना बंद होने लगा और उसकी जान पर फिर खतरा मंडराने लगा। डॉक्टरों ने तुरंत नली डालकर फेफड़े से हवा निकाली और स्थिति को नियंत्रित किया।
एक ही फेफड़े के सहारे मरीज को वेंटिलेटर से हटाना डॉक्टरों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया था। ट्रैकियोस्टॉमी और हाई फ्लो नेजल ऑक्सीजन की मदद से धीरे-धीरे उसकी सांस सामान्य कराई गई। करीब 70 दिन तक चले इस कठिन इलाज और निगरानी के बाद आखिरकार 12 मई 2026 को शगुन को सीसीयू-2 से थोरेसिक वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया।
अब शगुन खाना खा रही है, बातचीत कर रही है और सहारे से चलना भी शुरू कर चुकी है। परिवार के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं है।
इन डॉक्टरों और स्टाफ ने निभाई अहम भूमिका
सीसीयू-2 की इस पूरी टीम ने शगुन की जिंदगी बचाने में अहम भूमिका निभाई। टीम का नेतृत्व विभागाध्यक्ष डॉ. मोनिका कोहली ने किया। फैकल्टी टीम में डॉ. विपिन सिंह, डॉ. विनोद और डॉ. मयंक शामिल रहे। रेजीडेंट डॉक्टरों में डॉ. शिखा, डॉ. अख्तर, डॉ. ज्योति, डॉ. अपूर्वा और डॉ. प्रियांशी ने लगातार निगरानी और इलाज संभाला। नर्सिंग स्टाफ में डॉ. निशा, डॉ. ममता और अन्य कर्मचारियों ने दिन-रात मरीज की देखभाल की।

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