शनिवार, 25 अप्रैल 2026

यूपी के पहले हार्ट ट्रांसप्लांट की मरीज को मिली छुट्टी, ट्रांसप्लांट टीम का सम्मान

 








“यह चिकित्सा इतिहास का स्वर्ण अध्याय”: डिप्टी सीएम बृजेश पाठक


यूपी के पहले हार्ट ट्रांसप्लांट की मरीज को मिली छुट्टी, ₹4 हजार लेकर पहुंचे परिवार को एसजीपीजीआई ने दिया ₹15 लाख का जीवनदान


उत्तर प्रदेश के पहले सफल हृदय प्रत्यारोपण के बाद मरीज को स्वस्थ होकर अस्पताल से छुट्टी मिलना प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था के लिए “स्वर्ण अध्याय” है। यह बात उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने संजय गांधी पीजीआइ में आयोजित सम्मान समारोह में कही। उन्होंने कहा कि एसजीपीजीआई की टीम ने न केवल चिकित्सा क्षेत्र में इतिहास रचा है, बल्कि मानवता और संवेदनशीलता की ऐसी मिसाल पेश की है, जिस पर पूरा प्रदेश गर्व कर सकता है।

सीतापुर की 43 वर्षीय रचना, जिनका राज्य का पहला सफल हार्ट ट्रांसप्लांट हुआ था, अब पूरी तरह स्वस्थ होकर “नया दिल–नई जिंदगी” के साथ सामान्य जीवन की ओर लौट रही हैं। शनिवार को उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। लंबे समय से डायलेटेड कार्डियोमायोपैथी और गंभीर हार्ट फेल्योर से जूझ रहीं रचना के लिए हृदय प्रत्यारोपण ही अंतिम विकल्प बचा था।

12 अप्रैल को दिल्ली से एयर एम्बुलेंस के जरिए दाता हृदय लाया गया और लखनऊ में ग्रीन कॉरिडोर बनाकर उसे समय पर संस्थान पहुंचाया गया। सटीक समय प्रबंधन और विभिन्न एजेंसियों के समन्वय ने इस जटिल ऑपरेशन को सफल बनाया।

₹4 हजार से 15 लाख तक: संवेदनशीलता की मिसाल

इस पूरी कहानी का सबसे भावुक पहलू आर्थिक स्थिति रही। मरीज के पति अजय अग्निहोत्री महज चार हजार रुपये लेकर अस्पताल पहुंचे थे, जबकि पूरे इलाज में करीब 15 लाख रुपये खर्च हुए—करीब 9 लाख एयर एम्बुलेंस और 6 लाख सर्जरी पर। इसके बावजूद संस्थान ने पूरा खर्च उठाकर मरीज को नया जीवन दिया।

सम्मान समारोह में टीम को सराहा

डिप्टी सीएम बृजेश पाठक ने ट्रांसप्लांट से जुड़े डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों को सम्मानित करते हुए कहा कि यह उपलब्धि टीमवर्क, समर्पण और सेवा भावना का उत्कृष्ट उदाहरण है।

कार्यक्रम में संस्थान के निदेशक आर.के. धीमन सहित वरिष्ठ चिकित्सक मौजूद रहे।

अब सामान्य जीवन की ओर मरीज

सर्जरी के बाद रचना तेजी से स्वस्थ हुईं। अब वह बिना सहारे चल रही हैं और सामान्य बातचीत कर पा रही हैं। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान डिप्टी सीएम से संवाद करते हुए उन्होंने हाथ जोड़कर आभार व्यक्त किया। उनके पति ने इसे “दूसरा जन्म” बताया।

अब अगला कदम—लंग्स ट्रांसप्लांट

निदेशक आर.के. धीमन ने बताया कि हार्ट ट्रांसप्लांट की सफलता उत्तर प्रदेश में बहु-अंग प्रत्यारोपण कार्यक्रम की मजबूत शुरुआत है। संस्थान अब लंग्स ट्रांसप्लांट की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, जिससे गंभीर मरीजों को और बेहतर इलाज मिल सकेगा।


 सम्मानित ट्रांसप्लांट टीम 


 सीवीटीएस (कार्डियोवैस्कुलर एंड थोरैसिक सर्जरी)

 प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, लीड सर्जन – प्रो. एस. के. अग्रवाल

सीवीटीएस विभाग – प्रोफेसर – प्रो. शांतनु पांडे

सीवीटीएस विभाग – पूर्व प्रोफेसर (एम्स नई दिल्ली) – प्रो. मिलिंद होते

सीवीटीएस विभाग – कार्डियक सर्जन – डॉ. विजय अग्रवाल

सीवीटीएस विभाग – असिस्टेंट प्रोफेसर – डॉ. अब्दुलमुनज़िल मुंशी

सीवीटीएस विभाग – असिस्टेंट प्रोफेसर – डॉ. सिद्धार्थ वी. सिंह सोम

सीवीटीएस विभाग – पीडीएफ – डॉ. अरीब अहमद खान

सीवीटीएस विभाग – सीनियर रेजिडेंट – डॉ. अवनिंद्र एम. त्रिपाठी

सीवीटीएस विभाग – सीनियर रेजिडेंट – डॉ. सौरभ त्रिपाठी

सीवीटीएस विभाग – सीनियर रेजिडेंट – डॉ. विवेक कृष्णा

सीवीटीएस विभाग – सीनियर रेजिडेंट – डॉ. हर्ष बी. वैद्य

 कार्डियोलॉजी

 प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, लीड कार्डियोलॉजिस्ट – प्रो. आदित्य कपूर

कार्डियोलॉजी विभाग – प्रोफेसर – प्रो. सत्येंद्र तिवारी

कार्डियोलॉजी विभाग – प्रोफेसर – प्रो. रूपाली खन्ना

कार्डियोलॉजी विभाग – एडिशनल प्रोफेसर – डॉ. अंकित साहू


 

एनेस्थीसिया विभाग – प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष – प्रो. संजय धीरज

एनेस्थीसिया विभाग – प्रोफेसर, लीड एनेस्थीसियोलॉजिस्ट एवं इंटेंसिविस्ट – प्रो. पुनीत गोयल

एनेस्थीसिया विभाग – प्रोफेसर – डॉ. अमित रस्तोगी

एनेस्थीसिया विभाग – असिस्टेंट प्रोफेसर – डॉ. पल्लव सिंह

एनेस्थीसिया विभाग – सीनियर रेजिडेंट – डॉ. नितिन त्रिवेदी

एनेस्थीसिया विभाग – सीनियर रेजिडेंट – डॉ. आनंदिता कश्यप

एनेस्थीसिया विभाग – सीनियर रेजिडेंट – डॉ. मालिका धवल

एनेस्थीसिया विभाग – सीनियर रेजिडेंट – डॉ. श्रद्धा गंगेले

एनेस्थीसिया विभाग – एसटीओ – चंद्रेश कुमार कश्यप

एनेस्थीसिया विभाग – टेक्नीशियन – अर्जुन कुमार

एनेस्थीसिया विभाग – टेक्नीशियन – रुचि सिंह

 परफ्यूजनिस्ट

परफ्यूजनिस्ट यूनिट – सीनियर टेक्निकल ऑफिसर – राज कुमार यादव

परफ्यूजनिस्ट यूनिट – टेक्निकल ऑफिसर – संदीप कुमार



नर्सिंग ओटी आईसीयू 


नर्सिंग विभाग – असिस्टेंट नर्सिंग सुपरिंटेंडेंट – कलावती पाल

नर्सिंग विभाग – नर्सिंग ऑफिसर – अरविंद

नर्सिंग विभाग – सीनियर नर्सिंग ऑफिसर – श्वेता

नर्सिंग विभाग – असिस्टेंट नर्सिंग सुपरिंटेंडेंट – प्रेम लता

नर्सिंग विभाग – नर्सिंग ऑफिसर – नमन

नर्सिंग विभाग – नर्सिंग ऑफिसर – कुलदीप

नर्सिंग विभाग – डिप्टी नर्सिंग सुपरिंटेंडेंट – अल्का मोहन

नर्सिंग विभाग – असिस्टेंट नर्सिंग सुपरिंटेंडेंट – नीलम श्रीवास्तव

नर्सिंग विभाग – असिस्टेंट नर्सिंग सुपरिंटेंडेंट – सुरेंद्र जादौन

नर्सिंग विभाग – असिस्टेंट नर्सिंग सुपरिंटेंडेंट – दानवीर सिंह

नर्सिंग विभाग – असिस्टेंट नर्सिंग सुपरिंटेंडेंट – रीमा त्रिपाठी

नर्सिंग विभाग – नर्सिंग ऑफिसर – वर्षा सैनी

नर्सिंग विभाग – नर्सिंग ऑफिसर – निहारिका वर्मा

नर्सिंग विभाग – नर्सिंग ऑफिसर – हेमंत मंगल

नर्सिंग विभाग – नर्सिंग ऑफिसर – तान्या

नर्सिंग विभाग – नर्सिंग ऑफिसर – नीतू

नर्सिंग विभाग – नर्सिंग ऑफिसर – अनामिका राजपूत

नर्सिंग विभाग – नर्सिंग ऑफिसर – इतु

नर्सिंग विभाग – नर्सिंग ऑफिसर – हिमांशी

नर्सिंग विभाग – एएनएस – कमलेश यादव

 नेफ्रोलॉजी

नेफ्रोलॉजी विभाग – प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष – प्रो. नारायण प्रसाद

 सपोर्ट विभाग / स्टाफ

मनोचिकित्सा विभाग – असिस्टेंट प्रोफेसर – डॉ. रोमिल सैनी

डाइटेटिक्स – सीनियर डाइटीशियन – अर्चना सिन्हा

फिजियोथेरेपी – फिजियोथेरेपिस्ट – नवीन विश्वकर्मा

फिजियोथेरेपी – फिजियोथेरेपिस्ट – कृति

रोटो पीजीआई  चंडीगढ़) – कंसल्टेंट – मिलन के. बगला

 अन्य प्रशासनिक व सहयोगी

प्रशासन – एचआरएफ – आर. के. शर्मा

प्रशासन – सीएमएस – प्रो. देवेंद्र गुप्ता

प्रशासन – जेडीएमएम – प्रकाश सिंह

वित्त – फाइनेंस ऑफिसर – शशि भूषण सिंह तोमर

वित्त – अधिकारी – आदर्श श्रीवास्तव

सीटो उत्तर प्रदेश – एमएस एवं प्रभारी – डॉ. राजेश हर्षवर्धन

पीजीआई कर्मचारी महासंघ चुनाव परिणाम घोषित: धर्मेश कुमार अध्यक्ष निर्वाचित, सीमा शुक्ला महामंत्री बनीं






 पीजीआई कर्मचारी महासंघ चुनाव परिणाम घोषित: धर्मेश कुमार अध्यक्ष निर्वाचित, सीमा शुक्ला महामंत्री बनीं

लखनऊ। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान के कर्मचारी महासंघ चुनाव के परिणाम शनिवार को घोषित कर दिए गए। कड़े मुकाबले के बीच विभिन्न पदों पर विजेताओं ने जीत दर्ज की। मतगणना देर तक चली, जिसके बाद आधिकारिक परिणाम जारी किए गए।

अध्यक्ष पद पर धर्मेश कुमार ने 596 मत प्राप्त कर जीत हासिल की, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंदी मनोज वर्मा को 381 वोट मिले।

वरिष्ठ उपाध्यक्ष के दो पदों पर अजय कुमार (497) और मंजू लता यादव (481) विजयी रहीं। अन्य प्रत्याशियों में सुनीता सिंह (428), दीप्ति वर्मा (383) और रामपाल (207) को क्रमशः वोट मिले।

उपाध्यक्ष पद पर डॉ. नीलमणि ने 630 मत पाकर जीत दर्ज की, जबकि अंकुश वैद को 380 वोट मिले।

महामंत्री पद पर सीमा शुक्ला ने 719 मतों के साथ शानदार जीत हासिल की। उनके प्रतिद्वंदी ललित मोघा को 380 वोट मिले।

संयुक्त मंत्री पद पर सुनील कुमार (482) ने अभयानंद मिश्रा (465) को कड़े मुकाबले में हराया।

कोषाध्यक्ष पद पर संदीप कुमार ने 725 मत पाकर जीत दर्ज की, जबकि वीरेंद्र यादव को 453 वोट मिले।

संगठन मंत्री पद पर अंकिता पांडेय (407) विजयी रहीं, उन्होंने वैभव श्रीवास्तव (366) को हराया।

कार्यालय मंत्री पद पर बृज भूषण यादव ने 571 मत हासिल कर जीत दर्ज की, जबकि चंद्र प्रभा को 447 वोट मिले।

प्रचार मंत्री पद पर सुनील रूपजी (467) विजयी रहे, उन्होंने प्रीती मौर्या (326) को हराया।

वहीं, कार्यकारिणी सदस्य के रूप में श्रीकृष्ण पाल सिंह, गौरव श्रीवास्तव, ज्ञान सिंह, निखिल सक्सेना, वसीम अहमद और श्रीमती अचला मिश्रा निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए गए।

चुनाव अधिकारी टी. एस. नेगी ने बताया कि पूरी चुनाव प्रक्रिया शांतिपूर्ण और निष्पक्ष तरीके से संपन्न हुई। उन्होंने सभी विजयी उम्मीदवारों को बधाई देते हुए कहा कि कर्मचारियों ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाई है।

इस चुनाव के परिणामों के साथ ही अब नई कार्यकारिणी पर कर्मचारियों की उम्मीदें टिक गई हैं, जो आने वाले समय में उनके हितों और अधिकारों की लड़ाई को दिशा देगी।

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

केएसएससीआई और आईआईटीआर के बीच विषविज्ञान अनुसंधान को लेकर समझौता


 केएसएससीआई और आईआईटीआर के बीच विषविज्ञान अनुसंधान को लेकर समझौता 


औद्योगिक व पर्यावरणीय रसायनों से होने वाली बीमारियों पर होगा  


 डायग्नोस्टिक टेस्ट विकसित करने पर फोकस




लखनऊ। कल्याण सिंह अति विशिष्ट कैंसर संस्थान और भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान के बीच शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (एम ओ यू) पर हस्ताक्षर एवं आदान-प्रदान किया गया। यह पहल विषविज्ञान (टॉक्सिकोलॉजी) के क्षेत्र में अनुसंधान को नई दिशा देने के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर रासायनिक प्रभावों के अध्ययन को मजबूत करेगी।

इस अवसर पर केएसएससीआई के निदेशक प्रो. मदन लाल ब्रह्म भट्ट तथा आईआईटीआर के निदेशक डॉ. भास्कर नारायण मौजूद रहे। दोनों संस्थानों ने औद्योगिक, कृषि और पर्यावरणीय कारकों से उत्पन्न स्वास्थ्य चुनौतियों के समाधान के लिए मिलकर काम करने पर सहमति जताई। समझौते के तहत वैज्ञानिक ज्ञान के विस्तार, नवाचार को बढ़ावा देने और सतत स्वास्थ्य पद्धतियों के विकास पर विशेष जोर दिया जाएगा। साथ ही, औद्योगिक और पर्यावरणीय रसायनों से होने वाली बीमारियों की पहचान के लिए सरल, सटीक और त्वरित जांच तकनीकों के विकास पर भी संयुक्त शोध किया जाएगा। इन तकनीकों को आम मरीजों तक पहुंचाने की दिशा में भी काम किया जाएगा।

यह समझौता सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यावरण सुरक्षा और वैज्ञानिक प्रगति के प्रति दोनों संस्थानों की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे न केवल शोध को गति मिलेगी, बल्कि नीतिगत निर्णय लेने में भी मदद मिलेगी और जन-जागरूकता बढ़ेगी।

कार्यक्रम में केएसएससीआई के डीन डॉ. प्रमोद कुमार गुप्ता, चिकित्सा अधीक्षक डॉ. वरुण विजय तथा आईआईटीआर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. के.सी. कल्बे और डॉ. के.एम. अंसारी सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

79.6% बच्चों को भ्रम—मच्छर से फैलता है हेपेटाइटिस

 







 

79.6% बच्चों को भ्रम—मच्छर से फैलता है हेपेटाइटिस-बी


लखनऊ के 329 स्कूली बच्चों पर शोध, केवल 19.8% को तीन डोज टीकाकरण की जानकारी

लखनऊ।

स्कूली बच्चों में हेपेटाइटिस-बी को लेकर जागरूकता बेहद कम है और गलतफहमियां चिंताजनक स्तर पर मौजूद हैं। लखनऊ में हुए एक अहम शोध में सामने आया है कि 79.6% बच्चों को यह गलत जानकारी है कि हेपेटाइटिस-बी मच्छर से फैलता है, जबकि वास्तविकता इससे अलग है।

यह अध्ययन संजय गांधी पीजीआईएमएस और एरा मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञों द्वारा 329 स्कूली बच्चों पर किया गया। शोध को इंडियन जर्नल ऑफ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी ने स्वीकार किया है। अध्ययन में 8वीं से 10वीं कक्षा के 12 से 19 वर्ष के छात्रों को शामिल किया गया।

क्या कहता है शोध

66.6% बच्चों को पता था कि यह एक वायरस है

केवल 4.9% को लगा कि यह युवाओं को भी हो सकता है

93.9% बच्चों ने इसे खाने-पीने से फैलने वाला माना

91.5% ने सामान्य संपर्क को कारण समझा

79.6% ने मच्छर को फैलाव का माध्यम बताया

41.4% को टीके की जानकारी थी

सिर्फ 19.8% को तीन डोज टीकाकरण का ज्ञान था

यह अध्ययन डॉ. आफताब हुसैन, प्रो. अमित गोयल, डॉ. सुरेंद्र सिंह, डॉ. नंदा छवि, डॉ. गीतिका श्रीवास्तव और डॉ. श्रीश भटनागर की टीम ने किया।

बॉक्स: किन क्षेत्रों में सबसे कम जानकारी

बीमारी का फैलाव – 25.6%

संक्रमण के रास्ते – 28.1%

इलाज की जानकारी – 16.7%

बॉक्स: क्या है हेपेटाइटिस-बी

यह एक गंभीर वायरल लिवर बीमारी है, जो संक्रमित खून, दूषित सुई, असुरक्षित संबंध या मां से बच्चे में फैलती है। समय पर इलाज न होने पर लिवर सिरोसिस और कैंसर तक का खतरा रहता है।

बॉक्स: बचाव कैसे करें

जन्म के बाद और समय पर 3 डोज का टीकाकरण

सुरक्षित इंजेक्शन और ब्लड ट्रांसफ्यूजन

जागरूकता और सही जानकारी

विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूली स्तर पर जागरूकता अभियान चलाकर इस बीमारी के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

कैंसर संस्थान में डॉक्टरों की कमी से इलाज पर संकट 🔴 इलाज पर गहराता संकट

 


वेतन विसंगति ने तोड़ा सिस्टम: कैंसर संस्थान में डॉक्टरों की कमी से इलाज पर संकट

🔴 इलाज पर गहराता संकट | मरीजों को फिर बाहर का रास्ता

विका




लखनऊ: उत्तर प्रदेश में कैंसर इलाज को लेकर बड़े दावों के बीच जमीनी हकीकत चिंता बढ़ा रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की महत्वाकांक्षी योजना के तहत बने कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान को टाटा मेमोरियल अस्पताल की तर्ज पर विकसित करने की बात कही गई थी, लेकिन वेतन विसंगति और नीतिगत फैसलों की देरी ने इस प्रोजेक्ट की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है।

हालात यह हैं कि संस्थान में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी हो गई है, जिसका सीधा असर कैंसर मरीजों के इलाज पर पड़ रहा है। प्रदेश में हर साल करीब 2 से 2.5 लाख नए कैंसर मरीज सामने आते हैं, जबकि अनुमानित कुल मरीजों की संख्या 4 से 5 लाख के बीच मानी जाती है। ऐसे में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी एक बड़े स्वास्थ्य संकट की ओर इशारा कर रही है।

भर्ती निकली, डॉक्टर नहीं मिले

संस्थान ने 74 डॉक्टरों की भर्ती निकाली, लेकिन 50 से भी कम आवेदन आए। इससे साफ है कि डॉक्टर यहां काम करने में रुचि नहीं दिखा रहे।

इस समय संस्थान में केवल 35 नियमित डॉक्टर हैं, जबकि रोजाना 350–400 गंभीर मरीज ओपीडी में पहुंच रहे हैं और 300 बेड लगभग फुल रहते हैं।

शासन स्तर पर फैसलों में देरी

संस्थान प्रशासन ने डॉक्टरों को SGPGIMS और लोहिया संस्थान के बराबर वेतन देने का प्रस्ताव भेजा, लेकिन इसे मंजूरी नहीं मिली।

शासी निकाय की बैठकों में भी कोई ठोस निर्णय न होने से डॉक्टरों में असंतोष बढ़ा है।

परिणाम यह हुआ कि पिछले साल 94 पदों के इंटरव्यू में चयनित 21 में से सिर्फ 10 डॉक्टरों ने ज्वाइन किया, बाकी बेहतर वेतन और सुविधाओं के कारण अन्य संस्थानों में चले गए।

महत्वपूर्ण विभाग बिना विशेषज्ञ के

रेडियोलॉजी, मेडिकल ऑन्कोलॉजी और प्लास्टिक सर्जरी जैसे अहम विभागों में डॉक्टरों की कमी है।

एमआरआई और सीटी स्कैन जैसी जरूरी जांच के लिए निजी केंद्रों पर निर्भरता बढ़ गई है, जिससे इलाज की प्रक्रिया धीमी और महंगी हो रही है।

6 साल में बड़ा पलायन

पिछले छह वर्षों में

27 डॉक्टर

60 नर्सिंग स्टाफ

10 टेक्नीशियन

संस्थान छोड़ चुके हैं

यह आंकड़े दिखाते हैं कि समस्या सिर्फ भर्ती की नहीं, बल्कि डॉक्टरों को रोक पाने में विफलता की भी है।

मरीजों पर सीधा असर

डॉक्टरों की कमी के कारण

इलाज में देरी

लंबी वेटिंग

बाहर रेफर होने की मजबूरी

बढ़ रही है। कई मरीजों को अभी भी दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों का रुख करना पड़ रहा है।

सवाल खड़े करती स्थिति

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते वेतनमान, स्थायी नियुक्ति और कार्य परिस्थितियों में सुधार नहीं किया गया, तो यह संस्थान अपनी क्षमता के अनुरूप काम नहीं कर पाएगा।

प्रदेश में तेजी से बढ़ रहे कैंसर मामलों के बीच यह स्थिति यह संकेत देती है कि नीतिगत देरी और प्रशासनिक स्तर पर धीमी कार्रवाई का सीधा असर मरीजों पर पड़ रहा है।


रविवार, 19 अप्रैल 2026

पीजीआई कर्मचारी महासंघ का चुनाव, दस पदों पर मुकाबला 24 अप्रैल को होगा मतदान

 

पीजीआई कर्मचारी महासंघ का चुनाव, दस पदों पर मुकाबला 24 अप्रैल को होगा मतदान



 संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान के कर्मचारी महासंघ के चुनाव का बिगुल बज चुका है। महासंघ का चुनाव 24 अप्रैल को आयोजित किया जाएगा, जिसमें विभिन्न पदों के लिए उम्मीदवारों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिलेगा। चुनाव में कुल 10 पदों पर मतदान होगा। दो हजार से अधिक कर्मचारी मतदान में भाग लेंगे। अध्यक्ष के एक पद के लिए 5 उम्मीदवार मैदान में हैं। वरिष्ठ उपाध्यक्ष के दो पदों के लिए 5 उम्मीदवार, जबकि उपाध्यक्ष के एक पद पर 3 प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं। महामंत्री के एक पद के लिए 3 उम्मीदवार, संयुक्त मंत्री के एक पद पर 4, और कोषाध्यक्ष के एक पद पर 3 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। इसके अलावा संगठन मंत्री के एक पद के लिए 5 उम्मीदवार, कार्यालय मंत्री के एक पद पर 5 तथा प्रचार मंत्री के एक पद पर भी 5 प्रत्याशी चुनावी मैदान में हैं। कार्यकारिणी के 6 सदस्य पहले ही निर्विरोध निर्वाचित हो चुके हैं। इन पदों के लिए नामांकन प्रक्रिया 17 अप्रैल को पूरी कर ली गई थी। मतदान 24 अप्रैल को संपन्न होगा और उसी दिन शाम 6 बजे से मतगणना शुरू कर दी जाएगी। परिणाम आने तक गिनती लगातार जारी रहेगी। चुनाव अधिकारी टी. एस. नेगी ने बताया कि चुनाव की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। उन्होंने कहा, “24 अप्रैल को निर्धारित समय पर शांतिपूर्ण और निष्पक्ष मतदान कराया जाएगा। सभी उम्मीदवारों को बराबरी का अवसर दिया जा रहा है। मतदान समाप्त होते ही शाम 6 बजे से मतगणना शुरू कर दी जाएगी और परिणाम उसी दिन घोषित कर दिए जाएंगे।” उन्होंने कर्मचारियों से अधिक से अधिक संख्या में मतदान करने की अपील करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत बनाने में सभी की भागीदारी जरूरी है।

शनिवार, 18 अप्रैल 2026

खराब खानपान, मोटापा और डायबिटीज से लीवर रोग बन रहा ‘साइलेंट महामारी’

 







विश्व लीवर डे विशेष: बदलती जीवनशैली से बढ़ता सिरोसिस संकट, समय रहते पहचान ही बचाव की कुंजी


खराब खानपान, मोटापा और डायबिटीज से लीवर रोग बन रहा ‘साइलेंट महामारी’




 लीवर सिरोसिस अब केवल शराब से जुड़ी बीमारी नहीं रह गई है, बल्कि बदलती जीवनशैली के कारण यह तेजी से फैलती “साइलेंट महामारी” का रूप ले रही है। 19 अप्रैल – विश्व लिवर डे के मौके पर विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि समय रहते पहचान और जीवनशैली में सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गंभीर हो सकती है।


 


संजय गांधी पीजीआई के गैस्ट्रोएंट्रॉलजी विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार, यहां इलाज के लिए आने वाले मरीजों के आंकड़े बताते हैं कि 43.2 फीसदी मामलों में शराब लीवर सिरोसिस का सबसे बड़ा कारण है। इसके बाद नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज (एनएएफएलडी) यानी फैटी लिवर 14.4 फीसदी, हेपेटाइटिस बी वायरस 11.5 फीसदी और हेपेटाइटिस सी 6.2 फीसदी मामलों में जिम्मेदार पाए गए हैं।


 


संस्थान के विशेषज्ञ प्रो. अंशुमान एल्हेंस का कहना है कि यह बदलाव केवल बीमारी का नहीं, बल्कि लोगों की जीवनशैली में आए बड़े परिवर्तन का संकेत है। “यदि समय रहते स्क्रीनिंग, जागरूकता और जीवनशैली में सुधार नहीं किया गया, तो लीवर रोग साइलेंट महामारी बन सकता है। सिरोसिस लाइलाज नहीं है, लेकिन देर से पकड़ में आने पर यह खतरनाक जरूर हो जाता है,” उन्होंने कहा।


 


क्या है सिरोसिस की शुरुआत


 


सिरोसिस अचानक नहीं होता। इसकी शुरुआत फैटी लिवर  से होती है, जिसमें लीवर में चर्बी जमा होती है। इसके बाद हल्की सूजन (फाइब्रोसिस) और धीरे-धीरे लीवर कोशिकाएं खराब होने लगती हैं। शुरुआती चरण में मरीज को थकान, भूख कम लगना, पेट में सूजन या वजन में बदलाव जैसे लक्षण दिखते हैं, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।


 


नई दवाएं और इलाज में प्रगति


 


विशेषज्ञ प्रो. गौरव पाण्डेय के अनुसार, हाल के वर्षों में लीवर रोगों के इलाज में उल्लेखनीय प्रगति हुई है।हेपेटाइटिस बी के लिए टेनोफोविर और एंटेकाविर जैसी दवाएं वायरस को नियंत्रित कर लीवर को नुकसान से बचाती हैं।हेपेटाइटिस सी में डायरेक्ट-एक्टिंग एंटीवायरल थेरेपी से 90 फीसदी से अधिक मरीज पूरी तरह ठीक हो सकते हैं।फैटी लिवर डिजीज में अभी सीमित दवाएं हैं, लेकिन विटामिन ई और पियोग्लिटाजोन कुछ मरीजों में लाभकारी पाए गए हैं।


 


सिरोसिस की रफ्तार कैसे करें कम


-शराब का पूर्ण त्याग


-संतुलित आहार (कम वसा और कम चीनी)


-रोजाना कम से कम 30 मिनट व्यायाम


-वजन और ब्लड शुगर नियंत्रण


-हेपेटाइटिस बी का टीकाकरण, हेपेटाइटिस सी की जांच


-समय-समय पर लिवर फंक्शन टेस्ट


 


क्यों बढ़ रहा है खतरा


 


विशेषज्ञों के अनुसार, शहरी जीवन शैली, जंक फूड, मोटापा और बढ़ता शराब सेवन इस बीमारी के प्रमुख कारण हैं। चिंताजनक बात यह है कि अब बच्चों में भी फैटी लिवर के मामले बढ़ रहे हैं, जो भविष्य में गंभीर लीवर रोगों का संकेत है।


 


विशेषज्ञों की सलाह:


लीवर से जुड़ी बीमारियां अक्सर देर से सामने आती हैं, इसलिए नियमित जांच, संतुलित जीवन शैली और समय पर इलाज ही इससे बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है।

3 घंटे से ज्यादा इंस्टाग्राम , बढ़ा रहा डिप्रेशन-एंग्जायटी का खतरा

 




3 घंटे से ज्यादा इंस्टाग्राम ,  बढ़ा रहा डिप्रेशन-एंग्जायटी का खतरा







  डिजिटल दुनिया में घंटों स्क्रॉल करना अब आम बात हो गई है, लेकिन यही आदत युवाओं की मानसिक सेहत पर भारी पड़ रही है। हाल ही में हुए एक शोध ने चौंकाने वाले आंकड़ों के साथ बताया है कि इंस्टाग्राम का ज्यादा इस्तेमाल करने वाले युवाओं में डिप्रेशन, एंग्जायटी और स्ट्रेस तेजी से बढ़ रहा है।16 से 25 साल के 300 युवाओं पर किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि 93 फीसदी युवा रोजाना इंस्टाग्राम इस्तेमाल करते हैं, जबकि हर 3 में से 1 युवा (32 फीसदी) रोज 3 घंटे से ज्यादा समय इस प्लेटफॉर्म पर बिताता है। देखा गया कि इंस्टाग्राम का उपयोग बढ़ने के साथ मानसिक समस्याएं भी बढ़ती हैं।हल्के उपयोगकर्ताओं की तुलना में भारी उपयोगकर्ताओं में डिप्रेशन के मामले काफी अधिक  पाए गए। एंग्जायटी में भी उल्लेखनीय वृद्धि । सबसे ज्यादा असर स्ट्रेस पर दिखा । यानी, उपयोग का स्तर बढ़ते ही मानसिक दबाव भी “स्टेप-बाय-स्टेप” बढ़ता गया। सोशल मीडिया का असर सिर्फ समय पर नहीं, बल्कि “क्या देखा जा रहा है” इस पर भी निर्भर करता है।   क्यों बढ़ रहा है मानसिक दबाव इंस्टाग्राम पर दिखने वाली “परफेक्ट लाइफ” अक्सर वास्तविक नहीं होती, लेकिन युवा उसे सच मान लेते हैं। इससे:   -खुद की जिंदगी से असंतोष   -आर्थिक और सामाजिक तुलना   -लगातार बेहतर दिखने का दबाव बढ़ने लगता है।     क्या करें युवा   -स्क्रीन टाइम 2 घंटे के भीतर रखने की कोशिश करें   -माइंडफुल स्क्रॉलिंग अपनाएं—क्या देख रहे हैं, इस पर ध्यान दें   -हफ्ते में एक दिन “डिजिटल डिटॉक्स” रखें   -रियल लाइफ एक्टिविटी (खेल, पढ़ाई, दोस्त) को प्राथमिकता दें     किसने किया शोध:  एमिटी यूनिवर्सटी पुणे और एमिटी लखनऊ से  सुरभि निम्बालकर, काशिफ हसन, अरीना ज़ेड मिर्ज़ा, आशा अधिकारी ने इंस्टाग्राम उपयोग और मानसिक स्वास्थ्य (डास-21 स्केल के आधार पर) विषय पर शोध किया जिसे एनल आफ न्यूरोलॉजी ने स्वीकार किया है।


सोमवार, 13 अप्रैल 2026

उत्तर प्रदेश में पहली बार सफल हुआ हृदय प्रत्यारोपण

 




एसजीपीजीआइ उत्तर प्रदेश में पहली बार सफल हुआ हृदय प्रत्यारोपण


 


दिल्ली से एयर एम्बुलेंस द्वारा लाया गया दाता हृदय, ग्रीन कॉरिडोर से लखनऊ पहुंचा कर गंभीर हार्ट फेल्योर मरीज को मिला नया जीवन




उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं के इतिहास में रविवार का दिन स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया, जब संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआइ), ने राज्य का पहला सफल हृदय प्रत्यारोपण कर नई चिकित्सा उपलब्धि हासिल की। यह जटिल प्रत्यारोपण 41 वर्षीय महिला में किया गया।  डायलेटेड कार्डियोमायोपैथी नामक गंभीर बीमारी से पीड़ित थी। इस बीमारी में हृदय की मांसपेशियां अत्यधिक कमजोर हो जाती हैं और शरीर को पर्याप्त रक्त पंप नहीं कर पाता है, जिससे मरीज गंभीर हार्ट फेल्योर की स्थिति में पहुंच जाता है। चिकित्सकों के अनुसार मरीज की जान बचाने के लिए हृदय प्रत्यारोपण ही अंतिम विकल्प बचा था।


 प्रत्यारोपण के लिए हृदय दिल्ली से लाया गया। दिल्ली के एक डोनर ने मृत्यु के बाद अपने हृदय, लिवर और गुर्दे दान किए थे। लिवर और गुर्दों का प्रत्यारोपण दिल्ली में ही किया गया, जबकि हृदय के लिए स्टेट आर्गन टिशू ट्रांसप्लांट (सोटो) के संयुक्त निदेशक और पीजीआई के चिकित्सा अधीक्षक प्रो. राजेश हर्ष वर्धन से आरएमएल दिल्ली के ट्रांसप्लांट कोआर्डीनेटर मिलन ने संपर्क किया। संस्थान की हृदयरोपण टीम की सहमित के बाद प्रो. हर्षवर्धन ने भेजने को कहा जिसके बाद  शनिवार को नौ बजे विशेष एयर एम्बुलेंस से तत्काल लखनऊ भेजा गया। लखनऊ पहुंचने पर प्रशासन और ट्रैफिक पुलिस की मदद से ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया, जिससे दाता हृदय को 20 मिनट समय में एसजीपीजीआई पहुंचाया जा सका। संस्थान की कार्डियोथोरेसिक एंड वैस्कुलर सर्जरी (सीवीटीएस) विभाग, कार्डियोलॉजी विभाग, एनेस्थीसिया विभाग, राज्य अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (सोटो), रीजनल आर्गन एंड टिशू ट्रांसप्लांट (रोटो) तथा दिल्ली के डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल की टीमों ने मिलकर इस मिशन को सफल बनाया। निदेशक प्रो. आर.के. धीमन ने कहा कि यह केवल एक सफल ऑपरेशन नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में मल्टी आर्गन प्रत्यारोपण प्रणाली के नए युग की शुरुआत है। संस्थान पहले से गुर्दा प्रत्यारोपण में अग्रणी रहा है और हाल के वर्षों में लिवर प्रत्यारोपण कार्यक्रम को भी मजबूती मिली है। अब हृदय प्रत्यारोपण शुरू होने से प्रत्यारोपण केंद्र के रूप में स्थापित हो रहा है। विशेषज्ञ ने कहा कि प्रत्यारोपण पूरी तरह सफल रहा है। गहन देखभाल में रखा गया है।  


 


ऑपरेशन में शामिल प्रमुख टीम


सीवीटीएस विभाग से प्रो. एस.के. अग्रवाल, प्रो. शांतनु पांडे, प्रो. मिलिंद होते, डॉ. विजय अग्रवाल सहित विशेषज्ञ सर्जनों ने प्रत्यारोपण का नेतृत्व किया। कार्डियोलॉजी विभाग से प्रो. आदित्य कपूर, प्रो. रूपाली खन्ना, प्रो. सत्येन्द्र तिवारी और डॉ. अंकित साहू ने मरीज की हृदय संबंधी निगरानी संभाली। एनेस्थीसिया टीम में प्रो. पुनीत गोयल, डॉ. अमित रस्तोगी, डॉ. पल्लव सिंह समेत कई विशेषज्ञ शामिल रहे। परफ्यूज़निस्ट राज कुमार यादव और संदीप कुमार तथा नर्सिंग आफीसर कलावती पाल, अरविंद, श्वेता, प्रेमलता नमन और कुलदीप ने पूरी प्रक्रिया को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


 


मुख्यमंत्री और राज्यपाल ने दी बधाई


राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने एसजीपीजीआइ टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह सफलता प्रदेश के लिए गौरव का विषय है और इससे गंभीर हृदय रोगियों को राज्य में ही विश्वस्तरीय उपचार उपलब्ध होगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे प्रदेश की उन्नत स्वास्थ्य सेवाओं की बड़ी उपलब्धि बताते हुए कहा कि सरकार मल्टी आर्गन ट्रांसप्लांट कार्यक्रमों को हर संभव सहयोग देती रहेगी। उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने कहा कि एयर एम्बुलेंस और ग्रीन कॉरिडोर की व्यवस्था ने यह साबित किया है कि उत्तर प्रदेश अब जटिल चिकित्सा चुनौतियों का सामना करने में पूरी तरह सक्षम है।


ऐसे होता है हार्ट ट्रांसप्लांट 

हृदय प्रत्यारोपण (हार्ट ट्रांसप्लांट) एक बहुत जटिल  सर्जरी है जिसमें खराब हो चुके दिल को निकालकर दानदाता का स्वस्थ दिल लगाया जाता है। पहले तैयारी होती है

जब किसी मरीज का दिल इतना कमजोर हो जाता है कि दवाइयाँ या अन्य इलाज काम नहीं करते, तब डॉक्टर उसे ट्रांसप्लांट के लिए चुनते हैं।

दाता (डोनर) का दिल मिलते ही ऑपरेशन तुरंत शुरू करना पड़ता है, क्योंकि निकाला गया दिल केवल 4–6 घंटे तक ही सुरक्षित रहता है। . मरीज को हार्ट-लंग मशीन से जोड़ा जाता है

ऑपरेशन शुरू होने पर मरीज को बेहोश किया जाता है।

फिर शरीर को कार्डियोपल्मोनरी बायपास मशीन (हार्ट-लंग मशीन) से जोड़ा जाता है।

यह मशीन अस्थायी रूप से:

खून को पंप करती है

उसमें ऑक्सीजन मिलाती है

पूरे शरीर में पहुंचाती है

यानी ऑपरेशन के दौरान दिल बंद रहता है, लेकिन शरीर चलता रहता है।


सर्जन सीने की हड्डी खोलते हैं।

इसके बाद बीमार दिल को शरीर से अलग किया जाता है, लेकिन उसकी मुख्य बड़ी रक्त नलिकाएँ (महाधमनी, फुफ्फुसीय धमनी, शिराएँ) बचाकर रखी जाती हैं।


दाता का स्वस्थ दिल लाकर उसी जगह रखा जाता है।

फिर डॉक्टर बहुत महीन टांकों से इन मुख्य रक्त नलिकाओं को जोड़ते हैं:

एओर्टा (महाधमनी)

पल्मोनरी आर्टरी

सुपीरियर वेना कावा

इन्फीरियर वेना कावा

इसे तकनीकी भाषा में एनास्टोमोसिस कहते हैं—यानी रक्त नलिकाओं का जोड़ना।


जब सारी नलिकाएँ जुड़ जाती हैं:

हार्ट-लंग मशीन धीरे-धीरे हटाई जाती है

खून नए दिल में भेजा जाता है

अक्सर नया दिल खुद धड़कने लगता है

कभी-कभी हल्का इलेक्ट्रिक शॉक देकर धड़कन शुरू कराई जाती है


दिल की धड़कन, रक्तचाप, ऑक्सीजन सब जांची जाती है।

सब ठीक हो तो छाती बंद कर ICU में भेज दिया जाता है।

कुल समय

सामान्यतः 6 से  8 लगता है


एसजीपीजीआई में 14 अप्रैल को नए मरीजों की ओपीडी बंद, पुराने मरीजों का होगा उपचार

 




अंबेडकर जयंती पर एसजीपीजीआई में 14 अप्रैल को नए मरीजों की ओपीडी बंद, पुराने मरीजों का होगा उपचार

लखनऊ, 13 अप्रैल। डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती के अवसर पर 14 अप्रैल (मंगलवार) को संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई), लखनऊ में सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया है। इस कारण संस्थान की ओपीडी में नए मरीजों का पंजीकरण नहीं किया जाएगा, यानी मंगलवार को नए मरीज नहीं देखे जाएंगे।

हालांकि जिन पुराने मरीजों को पहले से ओपीडी परामर्श की तारीख दी गई है, उनका उपचार निर्धारित समय पर होगा। विभिन्न विभागों में जिन रोगियों की जांच पहले से तय है, उनकी जांचें भी यथावत संपन्न कराई जाएंगी। पूर्व निर्धारित सभी ऑपरेशन भी तय कार्यक्रम के अनुसार होंगे।

संस्थान प्रशासन के अनुसार 24 घंटे संचालित प्रयोगशाला सेवाएं और आकस्मिक (इमरजेंसी) सेवाएं सामान्य रूप से चलती रहेंगी। ओपीडी का सैंपल कलेक्शन बंद रहेगा, जबकि प्रशासनिक भवन और शैक्षणिक ब्लॉक भी अवकाश के कारण बंद रहेंगे।

रविवार, 12 अप्रैल 2026

वर्तमान व्यवस्थाएं समाज में विभाजन पैदा कर रही हैं,

 


यूजीसी, एससी-एसटी एक्ट और जातीय आरक्षण के विरोध में बनी रणनीति


आशियाना बैठक में बड़े सम्मेलन की घोषणा, पहले चरण में प्रदेशभर के ब्राह्मणों को किया जाएगा आमंत्रित

लखनऊ। सामाजिक समरसता मंच के संयोजक दुर्गेश पांडे के आवाहन पर अखिल भारतीय चाणक्य परिषद के साथ आशियाना सेक्टर-एल में आयोजित बैठक में यूजीसी नियमों, एससी-एसटी एक्ट तथा जाति आधारित आरक्षण के विरोध को लेकर रणनीति तैयार की गई। बैठक की अध्यक्षता परिषद के अध्यक्ष पंडित कृपा निधान त्रिपाठी ने की, जिसमें सामाजिक एकता और संगठन विस्तार पर विस्तार से चर्चा हुई।

बैठक में बताया गया कि आने वाले समय में बड़े स्तर पर एक सम्मेलन आयोजित किया जाएगा, जिसमें पहले चरण में प्रदेशभर के ब्राह्मण समाज के लोगों को आमंत्रित किया जाएगा। इसके बाद दूसरे चरण में सभी सवर्ण वर्गों का एक विशाल सम्मेलन आयोजित करने की योजना बनाई गई है। आयोजकों का कहना है कि इन सम्मेलनों के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों को एक मंच पर लाकर साझा रणनीति तैयार की जाएगी।

सामाजिक समरसता मंच के संयोजक दुर्गेश पांडे ने कहा कि समाज में समरसता स्थापित करने के लिए सभी हिंदुओं को संगठित करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्थाएं समाज में विभाजन पैदा कर रही हैं, जिन पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।

पंडित कृपा निधान त्रिपाठी ने कहा कि अखिल भारतीय चाणक्य परिषद हिंदू एकता को मजबूत करने के लिए निरंतर कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि किसी भी परिस्थिति में समाज की एकजुटता खंडित नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार यूजीसी कानून, एससी-एसटी एक्ट और जाति आधारित आरक्षण समाज को बांटने का कार्य कर रहे हैं।

बैठक में डॉ. राम तेज पांडे, उमाशंकर तिवारी, दद्दन मिश्रा, सोनू शुक्ला, गोपाल तिवारी, गोविंद मिश्रा, पारस पाण्डेय, उत्कर्ष, राजेश द्विवेदी, पंडित जेपी शर्मा पंडित सुरेश बाजपेई और संदीप शर्मा सहित कई लोगों ने अपने विचार व्यक्त किए। अंत में व्यापक जनजागरण अभियान चलाने और संगठन को मजबूत करने का निर्णय लिया गया।

शनिवार, 11 अप्रैल 2026

कानों में लगातार सुनाई देने वाली भनभनाहट, सीटी या घंटी जैसी आवाज से परेशान टिनिटस मरीजों के इलाज में बड़ा बदलाव आने वाला है।





टिनिटस मरीजों के लिए राहत की नई उम्मीद: उम्र के हिसाब से होगा इलाज, कानों की भनभनाहट पर वैज्ञानिकों का बड़ा खुलासा


 टिनिटस मरीजों के लिए राहत की नई उम्मीद: उम्र के हिसाब से होगा इलाज, कानों की भनभनाहट पर वैज्ञानिकों का बड़ा खुलासा



  अब कानों में लगातार सुनाई देने वाली भनभनाहट, सीटी या घंटी जैसी आवाज से परेशान टिनिटस मरीजों के इलाज में बड़ा बदलाव आने वाला है। वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि टिनिटस केवल कान की समस्या नहीं, बल्कि दिमाग के नेटवर्क से जुड़ी बीमारी है और इसकी प्रकृति उम्र के साथ बदलती है। इस खोज से अब मरीजों को उनकी उम्र और मानसिक स्थिति के अनुसार अधिक सटीक, व्यक्तिगत और प्रभावी इलाज मिल सकेगा। कई लोगों को बिना किसी बाहरी आवाज के कानों में लगातार आवाज सुनाई देती रहती है। यह स्थिति टिनिटस कहलाती है, जो नींद, ध्यान, कामकाज और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डालती है। अब तक इसका इलाज सामान्य तौर पर एक जैसी पद्धति से किया जाता रहा, लेकिन नए शोध ने साबित किया है कि हर उम्र के मरीज में यह बीमारी अलग तरह से असर करती है। हाल ही में प्रकाशित इस अध्ययन में 120 लोगों को शामिल किया गया, जिनमें 60 टिनिटस मरीज और 60 स्वस्थ व्यक्ति थे। इन्हें दो आयु वर्गों—19 से 35 वर्ष और 45 से 65 वर्ष—में बांटा गया। वैज्ञानिकों ने फंक्शनल एमआरआई और डीटीआई जैसी आधुनिक ब्रेन स्कैन तकनीकों से दिमाग की गतिविधियों और आपसी कनेक्टिविटी का विश्लेषण किया। शोध में सामने आया कि युवा मरीजों में सुनने और भावनाओं से जुड़े मस्तिष्क क्षेत्र अधिक सक्रिय रहते हैं, जबकि दिमाग का नियंत्रण तंत्र कमजोर हो जाता है। इसका मतलब यह है कि युवा मरीज दिमाग में पैदा हो रही आवाज को नजरअंदाज नहीं कर पाते, इसलिए उन्हें परेशानी अधिक महसूस होती है। वहीं अधिक उम्र के मरीजों में दिमाग के फ्रंटल और सेरिबेलम हिस्से ज्यादा सक्रिय पाए गए, जो यह दिखाता है कि दिमाग इस समस्या से सामंजस्य बैठाने की कोशिश करता है। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ ध्यान और याददाश्त से जुड़े नेटवर्क कमजोर होने लगते हैं, जिससे परेशानी जटिल हो जाती है। शोध में यह भी पाया गया कि टिनिटस की गंभीरता और मरीज की चिंता या तनाव के स्तर के अनुसार दिमाग के नेटवर्क में बदलाव अलग-अलग होते हैं। यही कारण है कि एक ही इलाज सभी मरीजों पर समान रूप से असरदार नहीं होता। हेड नेक सर्जरी विभाग के प्रमुख प्रो. अमित केशरी ने कहा कि यह अध्ययन टिनिटस उपचार के क्षेत्र में नई दिशा देता है। अब इलाज तय करते समय मरीज की उम्र, मानसिक स्थिति और दिमागी नेटवर्क के बदलावों को ध्यान में रखना होगा, जिससे उपचार अधिक प्रभावी बनाया जा सके। यह शोध सेंटर फॉर बायोमेडिकल रिसर्च के डॉ. हिमांशु आर. पांडेय, डॉ. नीरज सिन्हा, डॉ. उत्तम कुमार तथा प्रो. अमित केशरी ने संयुक्त रूप से किया है। “ऑडिटरी नेटवर्क प्लास्टिसिटी इन टिनिटस अक्रॉस द अडल्ट लाइफस्पैन: इनसाइट्स फ्रॉम एफ-एम-आर-आई एंड स्ट्रक्चरल कनेक्टिविटी” विषयक यह शोध प्रतिष्ठित जर्नल हियरिंग रिसर्च ने स्वीकार किया है।

पीजीआई के फैकल्टी फोरम के प्रो. मोहन गुर्जर बने अध्यक्ष, प्रो. विवेक सिंह सचिव निर्वाचित

 












पीजीआई के फैकल्टी फोरम के प्रो. मोहन गुर्जर बने अध्यक्ष, प्रो. विवेक सिंह सचिव निर्वाचित

 लखनऊ

 संजय गांधी पीजीआइ फैकल्टी फोरम के चुनाव में  क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर  मोहन गुर्जर फैकल्टी फोरम के अध्यक्ष पद पर निर्वाचित हुए हैं। रेडियोडायग्नोसिस विभाग के प्रोफेसर  विवेक सिंह सचिव पद पर निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए गए। वहीं, बाल शल्य चिकित्सा विभाग के प्रो विजय दत्त उपाध्याय कोषाध्यक्ष पद पर निर्विरोध चुने गए।

सदस्य पदों पर बायोस्टैटिस्टिक्स एवं हेल्थ इन्फॉर्मेटिक्स विभाग के प्रो. प्रभाकर मिश्रा, एनेस्थीसियोलॉजी विभाग के प्रो. रुद्राशीष हलदर, रेडियोथेरेपी विभाग की प्रो. एवं विभागाध्यक्ष डॉ. पुनीता लाल, कार्डियोलॉजी विभाग के प्रो. नवीन गर्ग, नेत्र विज्ञान विभाग की अतिरिक्त प्रोफेसर डॉ. रचना अग्रवाल तथा न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रो. अनंत मेहरोत्रा निर्वाचित हुए हैं।  10 और 11 अप्रैल 2026 को आयोजित फैकल्टी फोरम चुनाव के परिणाम घोषित कर दिए गए हैं। चुनाव में संकाय सदस्यों ने उत्साहपूर्वक भागीदारी निभाई और कुल 141 मत डाले गए, जिनमें एक मत अमान्य घोषित किया गया।

चुनाव अधिकारी प्रोफेसर उत्तम सिंह ने परिणामों की घोषणा की। 

  निदेशक प्रोफेसर आर. के. धीमन ने नव निर्वाचित टीम को बधाई देते हुए आशा व्यक्त की कि नई टीम संकाय हितों की मजबूती, शैक्षणिक सहयोग के विस्तार और संस्थान के बहुआयामी विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। नवगठित फैकल्टी फोरम से संस्थान में शैक्षणिक और प्रशासनिक समन्वय को नई गति मिलने की उम्मीद है।


फोलिक एसिड देकर और हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी का समय से पता कर दिया जा सकता है मां और शिशु को स्वस्थ जीवन

 





फोलिक एसिड देकर और हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी का समय से पता कर दिया जा सकता है मां और शिशु को स्वस्थ जीवन


लखनऊ। सुरक्षित मातृत्व का अर्थ गर्भावस्था, प्रसव और प्रसव के बाद मां और शिशु को समुचित चिकित्सकीय देखभाल उपलब्ध कराना है, जिससे मातृ, भ्रूण और नवजात मृत्यु व बीमारियों को कम किया जा सके। संजय गांधी पीजीआई के मातृ एवं प्रजनन स्वास्थ्य विभाग की प्रोफेसर इंदु लता के अनुसार, समय पर चिकित्सा हस्तक्षेप और नियमित निगरानी से अधिकांश जटिलताओं को रोका जा सकता है।

उत्तर प्रदेश में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य अभी भी चुनौती बना हुआ है। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम  2018-20 के अनुसार राज्य में मातृ मृत्यु अनुपात  167 प्रति एक लाख जीवित जन्म था, जो घटकर करीब 150 के आसपास पहुंचा है, लेकिन यह राष्ट्रीय औसत से अधिक है। वहीं नवजात मृत्यु दर  उत्तर प्रदेश में लगभग 30 प्रति हजार जीवित जन्म के आसपास दर्ज की गई है, जो देश में ऊंचे स्तरों में गिनी जाती है।

प्रो. इंदु लता बताती हैं कि गर्भावस्था की पहली तिमाही में 400 माइक्रोग्राम फोलिक एसिड देना जरूरी है, जिससे भ्रूण में न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट जैसी जन्मजात विकृतियों की रोकथाम की जा सकती है। दूसरी और तीसरी तिमाही में नियमित एएनसी जांच, लेवल-2 अल्ट्रासाउंड, ब्लड टेस्ट, आयरन और कैल्शियम का सेवन तथा टेटनस टॉक्सॉइड के टीके सुरक्षित गर्भावस्था के लिए आवश्यक हैं।

उन्होंने कहा कि हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी जैसे गर्भावधि मधुमेह, उच्च रक्तचाप, एनीमिया, थायरॉयड, जुड़वां गर्भ या पूर्व जटिलताओं वाले मामलों की समय पर पहचान और इलाज बेहद जरूरी है। समय पर प्रबंधन से जटिलताओं और मृत्यु के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

सरकार द्वारा प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान और जननी सुरक्षा योजना जैसी योजनाएं चलाकर संस्थागत प्रसव और निःशुल्क जांच को बढ़ावा दिया जा रहा है।

प्रो. इंदु लता के अनुसार, यदि गर्भावस्था की शुरुआत से ही सही पोषण, नियमित जांच और हाई-रिस्क मामलों की पहचान सुनिश्चित हो, तो मां और शिशु दोनों को स्वस्थ जीवन दिया जा सकता है।

बॉक्स: उत्तर प्रदेश में शिशु मृत्यु और जन्मजात विकृतियां—स्थिति और कारण

जन्मजात विकृतियां 

विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, भारत में लगभग 2-3% शिशु किसी न किसी जन्मजात विकृति के साथ पैदा होते हैं। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में यह संख्या हर वर्ष लाखों जन्मों के अनुपात में महत्वपूर्ण बन जाती है।

नवजात मृत्यु 

उत्तर प्रदेश में लगभग 30 शिशु प्रति 1000 जीवित जन्म के पहले 28 दिनों के भीतर मृत्यु का शिकार हो जाते हैं।

गर्भावस्था के दौरान शिशु मृत्यु 

राज्य में अनुमानित रूप से 20-25 प्रति 1000 जन्म स्टिलबर्थ (मृत जन्म) के रूप में दर्ज किए जाते हैं।

प्रमुख कारण:

समय से पहले जन्म 

कम जन्म वजन 

जन्म के समय सांस न आना 

संक्रमण (सेप्सिस)

जन्मजात विकृतियां 

गर्भावस्था में मां की बीमारियां (डायबिटीज, हाई बीपी, एनीमिया)

रोकथाम कैसे संभव:

गर्भावस्था की शुरुआत से फोलिक एसिड का सेवन

नियमित एएनसी जांच और अल्ट्रासाउंड

हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी की समय पर पहचान

संस्थागत प्रसव और नवजात की विशेष देखभाल

यह आंकड़े बताते हैं कि समय पर पहचान, उचित पोषण और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के जरिए मातृ और शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

प्रो. यू.के. मिश्रा का निधन, पीजीआइ के न्यूरोलॉजी विभाग के “नींव के स्तंभ” नहीं रहे

 



प्रो. यू.के. मिश्रा का निधन, पीजीआइ के न्यूरोलॉजी विभाग के “नींव के स्तंभ” नहीं रहे


ईमानदारी, सरलता और अनुशासन के लिए जाने जाते थे, कई अहम प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी संभालीं 


 संजय गांधी पीजीआइ के न्यूरोलॉजिस्ट और पूर्व निदेशक रहे प्रोफेसर यूके मिश्रा का आज दिल्ली में निधन हो गया। वह इलाज के लिए दिल्ली गए थे, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से चिकित्सा जगत और संस्था में शोक की लहर है। प्रो. मिश्रा को संस्थान में न्यूरोलॉजी विभाग की नींव रखने वाले प्रमुख चिकित्सकों में गिना जाता था। उन्होंने न केवल इस विभाग की शुरुआत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि इसे देश के अग्रणी केंद्रों में स्थापित करने में भी योगदान दिया। उनके मार्गदर्शन में अनेक युवा डॉक्टरों ने न्यूरोलॉजी के क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल की। प्रो मिश्रा के सहयोगी रहे वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी राकेश कुमार निगम वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी एसपी सिंह ने कहा कि वह अपने सरल, ईमानदार और अनुशासित व्यक्तित्व के लिए जाने जाते थे। संस्थान में उन्हें समय-समय पर चिकित्सा अधीक्षक (एमएस) से लेकर कार्यवाहक निदेशक तक की जिम्मेदारियां सौंपी गईं, जिन्हें उन्होंने पूरी निष्ठा के साथ निभाया। प्रशासनिक कार्यों के साथ-साथ वह अधिकारियों और कर्मचारियों के समान व्यवहार करते थे । वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी सुधीर कुमार चौरसिया ने कहा कि कोई अपनी गलती स्वीकार कर लेता, तो वह दंड देने के बजाय उसे सुधारने का अवसर देते थे—यह उनके उदार स्वभाव की पहचान थी। प्रोफेसर यूके मिश्रा की छात्रा रही प्रो रुचिका टंडन ने कहा कि न्यूरोलॉजी के क्षेत्र में प्रो. मिश्रा का शोध कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने विशेष रूप से स्ट्रोक (ब्रेन अटैक), मिर्गी, न्यूरो-इन्फेक्शन (जैसे जापानी इंसेफलाइटिस) और नसों से संबंधित बीमारियों पर कई अहम अध्ययन किए। उनके शोध पत्र राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स में प्रकाशित हुए, जिससे भारत में न्यूरोलॉजी के उपचार और समझ को नई दिशा मिली। प्रो. मिश्रा हमेशा मरीजों की सेवा के लिए तत्पर रहते थे और संस्थान के विकास को अपना व्यक्तिगत दायित्व मानते थे। उनके जाने से चिकित्सा क्षेत्र को अपूरणीय क्षति हुई है। प्रोफेसर मिश्रा के छात्र रहे प्रो वीके पालीवाल ने कहा कि उनका योगदान और व्यक्तित्व हमेशा प्रेरणा देता रहेगा। कर्मचारी महासंघ के पूर्व महामंत्री धर्मेश कुमार नर्सिंग स्टाफ एसोसिएशन की पूर्व अध्यक्ष सीमा शुक्ला ने बताया कि प्रोफेसर मिश्रा उत्तर प्रदेश में न्यूरोलॉजी के क्षेत्र में स्थापक और विस्तारक माने जाते हैं।प्रो मिश्रा के

468 शोध पत्र राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल्स में प्रकाशित हो चुके हैं 
न्यूरोलॉजी के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान को दर्शाते हैं।” प्रोफेसर मिश्रा के साथ काम कर चुके लोगों ने बताया कि आज ही 10 अप्रैल को प्रोफेसर मिश्रा का जन्मदिन भी था।

गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

केएसएसएससीआई को मिला 20 व्हीलचेयर मरीजों की सुविधा हेतु सराहनीय पहल

 



केएसएसएससीआई को मिला 20 व्हीलचेयर  मरीजों की सुविधा हेतु सराहनीय पहल


इंडिया पेस्टीसाइड्स लिमिटेड व रोटरी क्लब के सहयोग से आयोजन, निदेशक प्रो. एम.एल.बी. भट्ट ने बताया जनसेवा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

लखनऊ। कल्याण सिंह सुपर स्पेशलिटी कैंसर इंस्टीट्यूट, लखनऊ में शुक्रवार को एक सराहनीय सामाजिक पहल के अंतर्गत 20 व्हीलचेयर का वितरण किया गया। यह व्हीलचेयर रोटरी क्लब के  के.के. श्रीवास्तव के सौजन्य से इंडिया पेस्टीसाइड्स लिमिटेड द्वारा प्रदान की गईं।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि संस्थान के निदेशक प्रो. एम.एल.बी. भट्ट रहे। इस अवसर पर संस्थान के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. वरुण विजय भी उपस्थित रहे। वहीं इंडिया पेस्टीसाइड्स लिमिटेड की ओर से  एस.पी. गुप्ता एवं  नरेन्द्र ओझा ने कार्यक्रम में सहभागिता की।

कार्यक्रम के दौरान प्रो. एम.एल.बी. भट्ट ने इस पहल को मरीजों की सुविधा और सेवा में एक महत्वपूर्ण योगदान बताते हुए कहा कि ऐसे प्रयास न केवल मरीजों को सहूलियत प्रदान करते हैं, बल्कि समाज में सेवा और सहयोग की भावना को भी मजबूत करते हैं। उन्होंने भविष्य में भी इस प्रकार के सहयोग की अपेक्षा व्यक्त की।

संस्थान प्रशासन ने दानदाताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए इसे जनसेवा की दिशा में एक प्रेरणादायक कदम बताया। कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों ने इस पहल की सराहना करते हुए इसे जरूरतमंद मरीजों के लिए बेहद उपयोगी बताया।

केएसएसएससीआई और मिमांसा एआई के बीच समझौता, कैंसर शोध में एआई का होगा इस्तेमाल

 



केएसएसएससीआई और मिमांसा एआई के बीच समझौता, कैंसर शोध में एआई का होगा इस्तेमाल


एआई आधारित क्लीनिकल रिसर्च, शुरुआती पहचान और डिजिटल हेल्थ इनोवेशन को मिलेगा बढ़ावा

लखनऊ:

कैंसर इलाज और शोध के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए कल्याण सिंह सुपर स्पेशलिटी कैंसर संस्थान  और मिमांसा एआई के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते का उद्देश्य ऑन्कोलॉजी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग को बढ़ावा देना है।

इस अवसर पर संस्थान के निदेशक प्रो. एम.एल.बी. भट्ट और मिमांसा एआई के डॉ. विभु अग्रवाल ने एम ओ यू पर हस्ताक्षर किए। इस दौरान डॉ. वरुण विजय, डॉ. अभिनव तिवारी और रिसर्च ऑफिसर डॉ  सुरेंद्र श्रीवास्तव भी मौजूद रहे।

इस साझेदारी के तहत एआई आधारित क्लीनिकल रिसर्च को बढ़ावा दिया जाएगा, जिससे कैंसर की शुरुआती पहचान  को और अधिक सटीक बनाया जा सकेगा। साथ ही डिजिटल हेल्थ इनोवेशन और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता के क्षेत्र में भी संयुक्त प्रयास किए जाएंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस पहल से कैंसर उपचार की गुणवत्ता में सुधार होगा और मरीजों को आधुनिक, सटीक और प्रभावी इलाज उपलब्ध हो सकेगा। यह कदम भविष्य में कैंसर देखभाल को नई दिशा देने वाला साबित होगा।

रोबोटिक टोटल थायरॉयडेक्टॉमी तकनीक से सफल ऑपरेशन, कम दर्द और तेज़ रिकवरी से युवक पूरी तरह स्वस्थ

 









पीजीआइ 

रोबोटिक टोटल थायरॉयडेक्टॉमी तकनीक से सफल ऑपरेशन, कम दर्द और तेज़ रिकवरी से युवक पूरी तरह स्वस्थ




जटिल थायराइड ग्रंथि की परेशानी से ग्रस्त हरदोई निवासी 25 वर्षीय युवक में जटिल रोबिटक सर्जरी कर परेशानी करने में सफलता संजय गांधी पीजीआइ के इंडोक्राइन सर्जन प्रो.ज्ञान चंद ने हासिल की है। सर्जरी के बाद  गर्दन और छाती में दबाव और सांस लेने और खाना निगलने की परेशानी छुटकारा मिल गया।

 इस जटिल सर्जरी के साथ 200 रोबोटिक एंडोक्राइन सर्जरी सफलतापूर्वक पूर्ण की हैं। प्रो. ज्ञान चंद के मुताबिक इस  25 वर्षीय युवक में पिछले 18 वर्षों से गर्दन के सामने सूजन की समस्या थी, जो धीरे-धीरे बढ़ रही थी। मरीज को हाइपोथायरायडिज्म था और वह नियमित रूप से दवा (थायरोनॉर्म 62.5 माइक्रोग्राम प्रतिदिन) ले रहा थे। इलाज के लिए आए तो  जांच के दौरान थायरॉयड ग्रंथि का व्यापक बढ़ाव पाया गया, जिसकी निचली सीमा स्पर्श से महसूस नहीं हो रही थी, जिससे रेट्रोस्टर्नल विस्तार की संभावना थी। अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन में बड़ा मल्टीनोड्यूलर गॉइटर, रेट्रोस्टर्नल विस्तार तथा लिम्फोसाइटिक थायरॉयडाइटिस की पुष्टि हुई। इस में  स्थिति आमतौर पर रोबोटिक या न्यूनतम इनवेसिव सर्जरी के लिए चुनौतीपूर्ण मानी जाती है।पूर्ण प्रीऑपरेटिव मूल्यांकन के बाद मरीज का रोबोटिक टोटल थायरॉयडेक्टॉमी  ऑपरेशन के दौरान दोनों लोब बड़े पाए गए, जिसमें दाहिना लोब मेडियास्टिनम तक फैला हुआ था और इस्तमस मोटा था। रिकरेंट लैरिंजियल नर्व और पैराथायरॉयड ग्रंथियों को सुरक्षित रखा गया।निकाले गए थायरॉयड का कुल वजन 149 ग्राम था। ऑपरेशन के बाद मरीज की स्थिति पूरी तरह स्थिर रही। उसकी आवाज सामान्य रही और कैल्शियम स्तर भी सामान्य पाया गया।इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के लिए संस्थान के निदेशक प्रो आर  के धीमन ने  टीम  को बधाई  दी है। प्रो. ज्ञान चंद ने बताया कि रोबोटिक एंडोक्राइन सर्जरी  सुरक्षित, सटीक और कॉस्मेटिक रूप से बेहतर विकल्प के रूप में साबित हो हो रहा है। सर्जरी के बाद गले पर कोई निशान नहीं पड़ता है।

रविवार, 5 अप्रैल 2026

जब दवा कारगर नहीं, तब राहत देता है डीबीएस

 




जब दवा कारगर नहीं, तब राहत देता है डीबीएस


लोहिया पार्क में पार्किंसंस जागरूकता वाकथान




लखनऊ। पार्किंसंस रोग से जूझ रहे ऐसे मरीज, जिन पर दवाएं असर नहीं कर रहीं, उनके लिए डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (डीबीएस) एक कारगर विकल्प बनकर उभरा है। संजय गांधी पीजीआई में इस तकनीक से अब तक दस मरीजों को राहत मिल चुकी है।यह जानकारी संस्थान के न्यूरोलॉजी विभाग की प्रो. रूचिका टंडन ने पार्किंसंस डिजीज एंड मूवमेंट डिसऑर्डर सोसाइटी की लखनऊ शाखा द्वारा आयोजित  वॉकथॉन के बाद मरीजों और उनके तीमारदारों को दी।

उन्होंने बताया कि पार्किंसंस में कुछ वर्षों बाद “ऑफ टाइम” या “फ्लक्चुएशन्स” की स्थिति आ जाती है, जब दवाओं का असर कम होने लगता है और लक्षण अचानक बढ़ जाते हैं। ऐसे मामलों में डीबीएस तकनीक काफी प्रभावी साबित हो सकती है। 

पीजीआई की न्यूरोलॉजिस्ट 

 डॉ. अमृता मोर ने

 पार्किंसन रोग के मोटर

 और नॉन-मोटर लक्षणो

 के बारे में जानकारी दी।

सोसाइटी के प्रमुख न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. प्रदीप गुप्ता ने बताया कि पार्किंसंस मरीजों और उनके परिजनों के लिए निशुल्क “आशा की पाठशाला” का आयोजन किया जाता है।   डा. गुप्ता के बताया कि पार्किंसंस के मरीज न केवल शारीरिक, बल्कि मानसिक तनाव का भी सामना करते हैं। ऐसे में इस तरह की पहल उन्हें नई उम्मीद और हौसला देती है। 


 


 


 क्या है डीप ब्रेन स्टिमुलेशन


 


डीप ब्रेन स्टिमुलेशन सर्जिकल तकनीक है, जो उन पार्किंसंस मरीजों के लिए उपयोगी है, जिन पर दवाएं प्रभावी नहीं रह जातीं। इसमें दिमाग के विशेष हिस्सों में छोटे इलेक्ट्रोड लगाए जाते हैं।ये इलेक्ट्रोड एक बैटरी (पेसमेकर जैसे उपकरण) से जुड़े होते हैं।यह उपकरण हल्के इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजता है।इससे दिमाग की असामान्य गतिविधि नियंत्रित होती है और लक्षणों में राहत मिलती है।


 


क्या है पार्किंसंस


 न्यूरोलॉजिस्ट प्रोफेसर ए के ठक्कर बताया कि धीरे-धीरे बढ़ने वाली न्यूरोलॉजिकल (तंत्रिका तंत्र से जुड़ी) बीमारी है, जो दिमाग के उस हिस्से को प्रभावित करती है जो शरीर की हरकतों (मूवमेंट) को नियंत्रित करता है।

इस बीमारी में दिमाग में डोपामिन नामक रसायन कम बनने लगता है, जिससे शरीर की गतिविधियां प्रभावित होने लगती हैं।हाथ, पैर या शरीर में कंपन (ट्रेमर), चलने-फिरने में धीमापन, मांसपेशियों में जकड़न, संतुलन बनाने में कठिनाई और बोलने और लिखने में बदलाव होता है। डिप्रेशन और चिंता, नींद की समस्या और कुछ मामलों में याददाश्त में कमी भी होता है।

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

रोबोटिक सर्जरी: सुरक्षित और सटीक







 




रोबोटिक सर्जरी: सुरक्षित और सटीक 

लखनऊ। गंभीर और जटिल ऑपरेशन में रोबोटिक सर्जरी तेजी से कारगर साबित हो रही है। यह तकनीक न केवल ऑपरेशन को अधिक सटीक बनाती है, बल्कि मरीजों के लिए सुरक्षित और कम कष्टदायक विकल्प भी है।   इस तकनीक का सबसे बड़ा लाभ छोटे चीरे हैं। पारंपरिक सर्जरी के मुकाबले इसमें बड़े कट नहीं लगते, जिससे मरीज को कम दर्द होता है और संक्रमण का खतरा भी काफी घट जाता है। यही वजह है कि मरीज जल्दी स्वस्थ होकर सामान्य जीवन में लौट पाते हैं।  पीजीआई में रोबोकॉप्स कार्यशाला में संस्थान के पीडियाट्रिक सर्जन प्रोफेसर विजय उपाध्याय ने बताया कि  रोबोटिक सर्जरी में सर्जन को थ्री-डी हाई-डेफिनिशन विजन मिलता है। यह शरीर के अंगों और नसों को कई गुना बड़ा और स्पष्ट दिखाता है, जिससे ऑपरेशन की सटीकता बढ़ती है और गलती की संभावना कम हो जाती है।

कार्यक्रम अध्यक्ष और विभाग के प्रमुख प्रो. बसंत कुमार ने कहा कि रोबोटिक सर्जरी में रक्तस्राव कम होता है और मरीज की स्थिति स्थिर रहती है। कम रक्तस्राव, कम थकान और बेहतर विज़न की वजह से लंबे समय तक चलने वाली जटिल सर्जरी भी सुरक्षित और प्रभावी हो जाती है। इससे ऑपरेशन की सफलता दर बढ़ती है और मरीज जल्दी ठीक होकर अस्पताल से घर लौटता है।