बुधवार, 9 सितंबर 2026

Half of Doctors' Work Is About To Be Over

 



Half of Doctors' Work Is About To Be Over


Now the Doctor Will Talk to the Patient and AI Will Write the Report


Lucknow. A major change is coming to hospitals very soon. In the near future, the doctor will talk to the patient and AI running in the background will write the entire report. It sounds like something out of a movie, but trials have already started abroad and it is expected that this system could be seen in India very soon.


In fact, Microsoft's new generative AI model named Dragon Copilot has shown in the US that it can reduce doctors' reading and writing work by up to 50 percent.


How will it work? It is called Ambient Listening Technology. When the doctor and patient talk in the room, this AI will quietly listen to everything and automatically prepare its documentation. The doctor will not have to repeatedly look at the computer and type. His entire focus will be only on the patient. That is why it is now being said that in the coming time, AI will not just be a tool, but a clinical collaborator for doctors - a true partner.


Shedding light on this upcoming change is Clinical AI Expert Mansi Goyal. Mansi works as a Data Scientist at the US-based company Lucem Health. She works on EHR data of millions of patients to build AI that can detect heart rhythm disorders, liver disease and Type 1 diabetes at an early stage.


Mansi says, the earlier AI used to ask only one question - "Is there pneumonia in this X-ray?". But the new AI that is coming will do reasoning. It will connect a patient's five-year-old history, lab reports and medicines together to tell what the real disease could be.


But Mansi also gives a warning that even when this technology comes to a country like India, AI will not be able to replace doctors everywhere. When a patient has to be told about a serious illness like cancer, what is needed there is not a machine, but a human heart.


Therefore, in the future, AI can do small and low-risk tasks like filling forms, but for high-risk tasks like changing the dose of medicine and taking decisions in an emergency, today and tomorrow, the supervision of a doctor will remain final.

डॉक्टरों का आधा काम होगा कम अब मरीज से बात करेगा डॉक्टर और रिपोर्ट लिखेगी एआई

 




डॉक्टरों का आधा काम होगा कम


अब मरीज से बात करेगा डॉक्टर और रिपोर्ट लिखेगी एआई


लखनऊ। हॉस्पिटल में बहुत जल्द एक बड़ा बदलाव आने वाला है। आने वाले समय में डॉक्टर मरीज से बात करेगा और पीछे-पीछे उसकी पूरी रिपोर्ट एआई लिख देगी। सुनने में फिल्म जैसा लगता है, पर विदेशों में ये ट्रायल शुरू हो चुका है और उम्मीद है कि भारत में भी ये थीम बहुत जल्द देखने को मिल सकती है।


दरअसल माइक्रोसॉफ्ट के ड्रैगन कोपायलट नाम के नए जेनरेटिव एआई मॉडल ने अमेरिका में डॉक्टरों का लिखने-पढ़ने वाला पचास परसेंट तक काम कम करके दिखाया है।


ये कैसे काम करेगा? इसे एम्बिएंट लिसनिंग टेक्नोलॉजी कहते हैं। जब डॉक्टर और मरीज कमरे में बात करेंगे, तो ये एआई चुपचाप सब सुनेगी और खुद ही उसका डॉक्यूमेंटेशन तैयार कर देगी। डॉक्टर को बार-बार कंप्यूटर की तरफ देखकर टाइप नहीं करना पड़ेगा। उसका पूरा ध्यान सिर्फ मरीज पर रहेगा। इसीलिए अब कहा जा रहा है कि आने वाले समय में एआई सिर्फ एक टूल नहीं, बल्कि डॉक्टर का क्लिनिकल कोलैबोरेटर यानी सच्चा साथी बन सकती है।


इस आने वाले बदलाव पर रोशनी डाल रही हैं क्लिनिकल एआई एक्सपर्ट मानसी गोयल**। मानसी अमेरिका की कंपनी **लुसेम हेल्थ में डेटा साइंटिस्ट के तौर पर काम करती हैं। वे करोड़ों मरीजों के ईएचआर डेटा पर काम करके ऐसी एआई बना रही हैं जो दिल की धड़कन की गड़बड़ी, लिवर की बीमारी और टाइप वन डायबिटीज को शुरू में ही पकड़ ले।


मानसी कहती हैं पहले वाली एआई सिर्फ एक सवाल पूछती थी - "क्या इस एक्स-रे में निमोनिया है?"। लेकिन आने वाली नई एआई रीजनिंग करेगी। वो मरीज की पांच साल पुरानी हिस्ट्री, लैब रिपोर्ट और दवाओं को एक साथ जोड़कर बताएगी कि असली बीमारी क्या हो सकती है।


लेकिन मानसी एक चेतावनी भी देती हैं कि भारत जैसे देश में जब ये टेक्नोलॉजी आएगी भी, तो भी एआई हर जगह डॉक्टर की जगह नहीं ले पाएगी। जब मरीज को कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के बारे में बताना हो, तो वहां मशीन नहीं, इंसान का दिल चाहिए।


इसलिए भविष्य में छोटे और लो-रिस्क काम जैसे फॉर्म भरना एआई कर सकती है, पर दवा की डोज बदलना और इमरजेंसी में फैसला लेना जैसे हाई-रिस्क काम में आज भी और कल भी डॉक्टर की देखरेख ही आखिरी होगी।

मंगलवार, 8 सितंबर 2026

11 साल तक सीने में फंसी रही लोहे की कील, पीजीआइ में निकला

 





11 साल तक सीने में फंसी रही लोहे की कील, पीजीआइ में निकला 


दर्द से परेशान होकर पहुंचे थे ट्रामा

आपरेशन के दौरान टूट गया था धातु


 लखनऊ


कुशीनगर के रहने वाले 53 साल के अब्दुल कादिर पिछले 11 साल से सीने में दर्द लेकर घूम रहे थे, लेकिन उन्हें पता ही नहीं था कि दर्द की वजह क्या है। उनके सीने के अंदर एक लोहे का टुकड़ा फंसा हुआ था।


दरअसल 2014 में अब्दुल कादिर का एक्सीडेंट हो गया था, जिसमें उनके दाहिने हाथ की हड्डी टूट गई थी। 2015 में हाथ का आपरेशन हुआ। आपरेशन के दौरान हड्डी में छेद करने के लिए जिस औजार का इस्तेमाल होता है, उसी की नोक टूटकर उनके सीने में चली गई। डाक्टरों की भाषा में इसे ड्रिल बिट (बरमा - हड्डी में छेद करने वाली ड्रिल मशीन की नोक) कहते हैं।


इसके बाद कई साल तक उनका हाथ का इलाज चलता रहा, लेकिन सीने में फंसी इस नोक का किसी को पता ही नहीं चला। वह 11 साल तक इसी दर्द के साथ जीते रहे। दवा खाते, दर्द थोड़ा कम होता फिर बढ़ जाता।


आखिरकार वह   एपेक्स ट्रॉमा सेंटर पहुंचे। यहां डाक्टरों ने जांच की तो सीने के अंदर धातु की चीज दिखाई दी।


इसके बाद ट्रॉमा सर्जरी, हड्डी रोग और एनेस्थीसिया विभाग के डॉक्टरों ने मिलकर प्लान बनाया और ऑपरेशन करके उस बाहर निकाल दिया। 



सर्जरी करने वाली टीम

एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के

 

* प्रो. अमित कुमार सिंह - एडिशनल चीफ, ट्रॉमा सर्जरी (टीम लीड)

* प्रो. अमित कुमार - एडिशनल प्रोफेसर, ऑर्थोपेडिक्स

* डा. आदित्य - सीनियर रेजिडेंट, ट्रॉमा सर्जरी

* डा. वरुण गुप्ता - सीनियर रेजिडेंट, ट्रॉमा सर्जरी

* प्रो. वंश - एडिशनल प्रोफेसर, एनेस्थीसिया


एसजीपीजीआई में राष्ट्रीय पोषण माह पर जन-जागरूकता कार्यक्रम






एसजीपीजीआई में राष्ट्रीय पोषण माह पर जन-जागरूकता कार्यक्रम

संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान में नेशनल न्यूट्रिशन मंथ 2026 के अवसर पर आज पोषण एवं स्वास्थ्य के प्रति जन-जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य संदेश “डिस्कवर द पावर ऑफ न्यूट्रिशन - ईट राइट, लिव वेल” रहा।

कार्यक्रम का आयोजन कार्डियोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. आदित्य कपूर, डॉ. एल के भारती, वरिष्ठ आहारविद् अर्चना सिन्हा, डॉ. शिल्पी त्रिपाठी, रीता आनंद एवं डॉ. निरुपमा सिंह द्वारा किया गया। इसमें लगभग 220 प्रतिभागियों ने भाग लिया।

कार्यक्रम में संतुलित आहार के महत्व पर चर्चा हुई। साथ ही प्रो. आदित्य कपूर एवं डॉ. प्रेरणा कपूर के नेतृत्व में कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन (सीपीआर) एवं बेसिक लाइफ सपोर्ट (बीएलएस) का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया।

इस दौरान रोगी किचन सेवा में उत्कृष्ट कार्य करने वाले 10 कर्मचारियों - जेराल्ड गिल्बर्ट, मंदीप कुमार शर्मा, विनोद, नवनीत कुमार, कमल किशोर, सूर्यराम, शिवशंकर, ओमप्रकाश, अवधेश कुमार और शिव प्रसाद यादव को अवॉर्ड ऑफ एक्सीलेंस से सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम में “पावर ऑफ न्यूट्रिशन: गेटवे टू हेल्थ” विषय पर क्रॉस टॉक एवं पैनल डिस्कशन का भी आयोजन हुआ।

सोमवार, 7 सितंबर 2026

SGPGI में पहली बार: बिना ऑपरेशन के माइक्रोवेव से पिघलाया पैराथायरॉइड ट्यूमर

 



 SGPGI में पहली बार: बिना ऑपरेशन के माइक्रोवेव से पिघलाया पैराथायरॉइड ट्यूमर


लखनऊ। संजय गांधी पीजीआई ने बिना चीर-फाड़ के इलाज के क्षेत्र में एक बड़ी सफलता हासिल की है। संस्थान के डॉक्टरों ने 60 साल के एक बुजुर्ग मरीज के गले में बनी पैराथायरॉइड ग्रंथि की गांठ को बिना ऑपरेशन के सिर्फ माइक्रोवेव तकनीक से खत्म कर दिया। इस तरह का अत्याधुनिक इलाज SGPGI में पहली बार किया गया है।


बताया गया कि बुजुर्ग मरीज लंबे समय से परेशान थे। उनके खून में कैल्शियम का लेवल लगातार बढ़ा हुआ आ रहा था। इसकी वजह से कमजोरी और दूसरी दिक्कतें हो रही थीं। SGPGI में जब उनकी गहन जांच की गई तो पता चला कि उन्हें प्राइमरी हाइपर पैराथायरॉइडिज्म है। इसका कारण गले में बाईं तरफ नीचे वाली पैराथायरॉइड ग्रंथि में बना ट्यूमर यानी लेफ्ट इंफीरियर पैराथायरॉइड एडेनोमा था।


आमतौर पर ऐसे मामलों में गर्दन में चीरा लगाकर ऑपरेशन करके गांठ को निकाला जाता है और मरीज को बेहोश करना पड़ता है। लेकिन डॉक्टरों ने तय किया कि इस मरीज का इलाज बिना चीरे वाली तकनीक से किया जाएगा। इसके लिए इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी विभाग की टीम ने अल्ट्रासाउंड गाइडेड माइक्रोवेव एब्लेशन का सहारा लिया।


इस प्रक्रिया में डॉक्टरों ने अल्ट्रासाउंड मशीन से देखते हुए एक बेहद पतली सुई गांठ तक पहुंचाई और माइक्रोवेव तरंगों से उसे अंदर ही जला दिया। पूरी प्रक्रिया लोकल एनेस्थीसिया में की गई। मरीज को जनरल एनेस्थीसिया देने की जरूरत नहीं पड़ी। सबसे बड़ी बात यह रही कि शरीर पर न तो कोई चीरा लगा और न ही कोई निशान पड़ा। प्रक्रिया के बाद मरीज की हालत पूरी तरह सामान्य रही और महज 8 घंटे के अंदर ही उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।


यह जटिल प्रक्रिया प्रो. सबरेत्नम एम, प्रो. रजनीकांत, डॉ. मिथुन राम, डॉ. मिथलेश वांचू, डॉ. मीनाक्षी सुहालका, डॉ. फिरदौस, डॉ. शिखर अग्रवाल, डॉ. सईदुर रहमान और नर्सिंग ऑफिसर श्रीमती कौशल की संयुक्त टीम ने की। वहीं एंडोक्राइन विभाग के डॉ. अंबिका टंडन और डॉ. अमन बंसल ने मरीज के हार्मोन से जुड़े मूल्यांकन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


SGPGI के निदेशक पद्मश्री प्रो. आर के धीमन ने इस सफलता पर पूरी टीम को बधाई दी है। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि बताती है कि सही मरीजों में यह बिना चीरे वाली तकनीक कितनी कारगर है।

एसजीपीजीआई : दिल तक पहुंचे ट्यूमर को निकाला, दो मासूमों को मिला नया जीवन





 एसजीपीजीआई : दिल तक पहुंचे ट्यूमर को निकाला, दो मासूमों को मिला नया जीवन


लखनऊ


 बाल कैंसर जागरूकता माह में एसजीपीजीआई, लखनऊ के पीडियाट्रिक सर्जिकल सुपरस्पेशियलिटीज विभाग ने बड़ी सफलता हासिल की है। कैंसर से जूझ रहे दो छोटे बच्चों की बेहद जटिल सर्जरी कर उन्हें नया जीवन दिया गया। दोनों की हालत अब स्थिर है।


पहला मामला बिहार की ढाई साल की बच्ची का है। बच्ची की दाहिनी किडनी में विल्म्स ट्यूमर था। यह ट्यूमर इतना खतरनाक था कि किडनी से निकलकर शरीर की मुख्य नस इंफीरियर वेना कावा के रास्ते दिल के दाहिने हिस्से राइट एट्रियम तक पहुंच गया था। बच्ची को पहले नौ साइकिल कीमोथेरेपी दी गई। फिर कार्डियोपल्मोनरी बायपास यानी हार्ट-लंग मशीन पर लेकर पीडियाट्रिक सर्जरी और सीटीवीएस विभाग की संयुक्त टीम ने ट्यूमर वाली किडनी, यूरेटर और दिल तक फैले ट्यूमर थ्रोम्बस को सफलतापूर्वक निकाल दिया।


दूसरा मामला शाहजहांपुर के चार वर्षीय बच्चे का है, जिसे पेट में बड़ी गांठ और बुखार था। जांच में पैंक्रियाज के हेड में बड़ा ट्यूमर मिला जो ड्यूओडेनम को जकड़ चुका था। टीम ने सीधे सर्जरी का फैसला लेकर बच्चे की जटिल व्हिपल सर्जरी यानी पैंक्रियाटिकोड्यूओडेनक्टॉमी की। इसमें पैंक्रियाज का हेड, ड्यूओडेनम और कॉमन बाइल डक्ट निकालकर पाचन तंत्र का जटिल पुनर्निर्माण किया गया। बच्चा अब मुंह से खाना ले रहा है।


विभागाध्यक्ष प्रो. बसंत कुमार ने कहा कि बच्चों में पेट में बिना कारण गांठ, लगातार बुखार, वजन घटना और कमजोरी को नजरअंदाज न करें। समय पर पहचान और विशेषज्ञ केंद्र में इलाज से जीवन बचाया जा सकता है।



सफल सर्जरी करने वाली टीम

नेतृत्व: प्रो. बसंत कुमार, विभागाध्यक्ष, पीडियाट्रिक सर्जिकल सुपरस्पेशियलिटीज, एसजीपीजीआईएमएस


पीडियाट्रिक सर्जिकल सुपरस्पेशियलिटीज विभाग: प्रो. बसंत कुमार, प्रो. अंकुर मंडेलिया, डॉ. अंजू वर्मा, डॉ. तरुण कुमार


सीटीवीएस विभाग: प्रो. शांतनु पांडे, डॉ. अरीब खान


एनेस्थीसिया विभाग: डॉ. आशीष कन्नौजिया, डॉ. पल्लव सिंह, डॉ. कोमल पासवान

शनिवार, 5 सितंबर 2026

कैंसर के बेहतर इलाज के लिए लखनऊ के कैंसर संस्थान और एम्स रायबरेली ने मिलाया हाथ



कैंसर के बेहतर इलाज के लिए लखनऊ के कैंसर संस्थान और एम्स रायबरेली ने मिलाया हाथ

कैंसर के बेहतर इलाज के लिए लखनऊ के कैंसर संस्थान और एम्स रायबरेली ने मिलाया हाथ

लखनऊ। कैंसर के इलाज को और बेहतर बनाने के लिए बड़ी पहल हुई है। कल्याण सिंह सुपर स्पेशलिटी कैंसर इंस्टीट्यूट (केएसएसएससीआई), लखनऊ और एम्स रायबरेली के बीच एमओयू साइन हुआ है। एमओयू पर केएसएसएससीआई के निदेशक प्रो. एमएलबी भट्ट और एम्स रायबरेली की निदेशक प्रो. अमिता जैन ने दस्तखत किए।

इस मौके पर रिसर्च ऑफिसर डॉ. सुरेंद्र कुमार श्रीवास्तव, संस्थान के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. विजय वरुण, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. बृजेंद्र कुमार समेत कई अधिकारी और चिकित्सक मौजूद रहे।

विशेषज्ञों ने बताया कि एमओयू के बाद दोनों संस्थान मिलकर कैंसर के इलाज और शोध के क्षेत्र में काम करेंगे। कैंसर की नई रिसर्च, मरीजों की बीमारी की जल्द पहचान और बेहतर जांच के साथ ही एडवांस इलाज की सुविधाओं को बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा। दोनों संस्थानों के डॉक्टर और विशेषज्ञ एक-दूसरे के अनुभव और विशेषज्ञता का लाभ उठाएंगे।

इसके साथ ही नई तकनीक और इलाज के आधुनिक तरीकों पर भी मिलकर काम किया जाएगा। ग्रामीण क्षेत्रों में कैंसर की रोकथाम और समय पर जांच को लेकर जागरूकता कार्यक्रम चलाने की भी योजना है। इससे गांव-गांव तक लोगों को कैंसर के लक्षण, बचाव और समय पर इलाज के प्रति जागरूक करने में मदद मिलेगी।

पेट में गोली से फट गई छोटी आंत, डेढ़ लीटर खून जमा होने के बाद भी युवक की बची जान

 



पेट में गोली से फट गई छोटी आंत, डेढ़ लीटर खून जमा होने के बाद भी युवक की बची जान

तुरंत बड़े ऑपरेशन में 15 सेंटीमीटर आंत काटकर निकाली, 48 घंटे वेंटिलेटर पर रहा



लखनऊ


लखनऊ के एपीआई अंसल में 14 अगस्त की रात बड़ी वारदात हुई। गोसाईंगंज के उदवतखेड़ा निवासी 35 वर्षीय पंकज कुमार यादव को लूट के दौरान चोरों ने पेट में गोली मार दी। गोली लगने से काफी खून बह गया और वह शॉक में चले गए। परिजन गंभीर हालत में उन्हें संजय गांधी पीजीआइ के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर लेकर पहुंचे।

यहां डॉक्टरों ने मरीज को देखते ही रिससिटेशन यानी हालत संभालने की प्रक्रिया शुरू की और बिना देर किए इमरजेंसी लैपरोटॉमी यानी पेट का बड़ा ऑपरेशन किया। ऑपरेशन के दौरान पेट में करीब डेढ़ लीटर खून जमा मिला। गोली से छोटी आंत यानी इलियम बुरी तरह फट गई थी। मरीज की जान बचाने के लिए डॉक्टरों ने छोटी आंत का करीब 15 सेंटीमीटर हिस्सा काटकर निकाल दिया।

ऑपरेशन के दौरान मरीज को कई बार खून चढ़ाना पड़ा। सर्जरी के बाद 48 घंटे तक उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया। इसके बाद आईसीयू में कई दिनों तक लगातार निगरानी और गहन इलाज किया गया। डॉक्टरों की टीम ने दिन-रात मेहनत कर मरीज को गंभीर स्थिति से बाहर निकाला। अब पंकज की हालत स्थिर है और उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है।


ट्रॉमा सर्जन की टीम ने किया जटिल ऑपरेशन


इस जटिल ऑपरेशन को ट्रॉमा सर्जन एडिशनल चीफ प्रोफेसर अमित कुमार सिंह ने सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर आदित्य और डॉक्टर वरुण गुप्ता के साथ किया। एनेस्थीसिया टीम में एडिशनल प्रोफेसर डॉक्टर गणपत प्रसाद, डॉक्टर राफत शमीम और सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर दीक्षा शामिल रहीं। ऑपरेशन थिएटर और आईसीयू की पूरी स्टाफ टीम ने भी इलाज में सहयोग किया।

संस्थान के निदेशक प्रोफेसर आर.के. धीमन ने पूरी टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह मामला बताता है कि गंभीर गोली लगने के बाद भी समय पर इलाज, तत्काल सर्जरी और बेहतर क्रिटिकल केयर से मरीज की जान बचाई जा सकती है।

उन्होंने बताया कि एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में 24 घंटे इमरजेंसी ट्रॉमा और सर्जरी की सुविधा उपलब्ध है और यह सुविधा पूरी तरह निशुल्क दी जाती है। यह कितने शब्द की खबर है

घुटने के दर्द से राहत के लिए कूल्ड आरएफए तकनीक बिना सर्जरी मिलेगी राहत

 

पीजीआइ 


 घुटने के दर्द से राहत के लिए 

कूल्ड आरएफए तकनीक


 बिना सर्जरी मिलेगी राहत


64 वर्षीय महिला को नई तकनीक से मिली राहत


, लखनऊ


लखनऊ की 64 वर्षीय निवासी श्रीमती शांति देवी (नाम बदला हुआ) वर्षों से घुटने के असहनीय दर्द से परेशान थीं और घुटना बदलने की सर्जरी से डरती थीं। इलाज के लिए उन्होंने संजय गांधी पीजीआइ के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में संपर्क किया, तो विशेषज्ञों ने कूल्ड रेडियोफ्रीक्वेंसी एब्लेशन तकनीक से उनका उपचार किया, जिससे उन्हें चलने-फिरने में काफी राहत मिल गई।


इसी के साथ ही एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में कूल्ड रेडियोफ्रीक्वेंसी एब्लेशन (कूल्ड आरएफए) तकनीक स्थापित हो गई है। इससे बिना बड़ी सर्जरी के ऑस्टियोआर्थराइटिस के मरीजों को लंबे समय तक दर्द से राहत मिलेगी। यह नई सुविधा पीजीआई के फिजिकल मेडिसिन एंड रिहैबिलिटेशन (पीएमआर) विभाग में शुरू की गई है।


कैसे काम करती है पीजीआई की यह नई तकनीक?


कूल्ड आरएफए में अल्ट्रासाउंड या एक्स-रे गाइडेंस से दर्द पहुंचाने वाली नसों को सटीकता से पहचान कर नियंत्रित तापमान से शांत किया जाता है। यह डे-केयर प्रक्रिया है, इसमें टांका-चीरा नहीं लगता, अस्पताल में कम रुकना पड़ता है और बुजुर्गों के लिए भी पूरी तरह सुरक्षित है।


पीएमआर विभाग के अतिरिक्त प्रोफेसर डॉ. सिद्धार्थ राय ने कहा, "पीजीआई में यह तकनीक स्थापित होने से उन मरीजों को बड़ा विकल्प मिला है जो सर्जरी नहीं कराना चाहते। यह रोजमर्रा की जिंदगी को बेहतर बनाती है।"


एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के प्रमुख प्रो. अरुण श्रीवास्तव ने कहा, "पीजीआई हमेशा नई तकनीक लाने के लिए प्रतिबद्ध है। कूल्ड आरएफए की स्थापना क्रॉनिक दर्द के इलाज में एक महत्वपूर्ण कदम है।"

 बॉक्स: क्या है ऑस्टियोआर्थराइटिस?

ऑस्टियोआर्थराइटिस घुटने के जोड़ की कार्टिलेज घिसने से होने वाली बीमारी है, जिसमें लगातार दर्द, जकड़न और चलने-फिरने में दिक्कत होती है। यह खासतौर पर बढ़ती उम्र में आम है।

टेक्नोलॉजिस्ट को लगातार सीखना जरूरी, क्योंकि तकनीक बदल रही है मानकीकरण की मांग ,

 

नई यात्रा का स्वागत और पुराने योगदान को सम्मान टेक्नोलॉजिस्ट को लगातार सीखना जरूरी, क्योंकि तकनीक बदल रही है मानकीकरण की मांग ,


 लखनऊ। "


सेलिब्रेटिंग फ्रेश जर्नी एंड ऑनरिंग पास्ट कंट्रीब्यूशन" विषय पर मेडिटेक एसोसिएशन की ओर से कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस मौके पर नई टेक्नोलॉजी का स्वागत किया गया और हाल में ही सेवानिवृत कर्मचारियों के योगदान का सम्मान किया गया। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रो. देवेंद्र गुप्ता ने कहा कि किसी भी चिकित्सा संस्थान में टेक्नोलॉजिस्ट की भूमिका महत्वपूर्ण है। वे इससे पहले तीन संस्थानों में काम कर चुके हैं, उनके अनुभव की तुलना में यहां के टेक्नोलॉजिस्ट काफी कर्मठ हैं। पुराने कर्मचारियों ने मरीज सेवा के साथ रिसर्च में भी अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि संस्थान स्तर के मामले आपस में बैठकर हल किए जाएंगे, जबकि वित्तीय मामलों में शासन की मंजूरी जरूरी है। चिकित्सा अधीक्षक प्रो. राजेश हर्षवर्धन ने कहा कि संगठन केवल समस्याओं को उठाने का माध्यम नहीं, बल्कि आपस में जुड़ने और बेहतर समन्वय बनाने का जरिया है। समस्याएं कभी खत्म नहीं होतीं, पर संवाद और सहयोग से समाधान निकलता है। अनुशासन बहुत जरूरी है। पुराने कर्मचारियों के अनुभव से नए सीखें और नए से पुराने नई तकनीक सीखें। एसोसिएशन अध्यक्ष मनोज कुमार सिंह ने आभार जताया। महामंत्री राकेश कुमार निगम ने मानकीकरण की मांग रखी। पूर्व अध्यक्ष डीके सिंह और पूर्व महामंत्री सरोज वर्मा मैं नए टेक्नोलॉजिस्ट का स्वागत किया।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

जब 'कैंसर' का डर हुआ खत्म... 30 वर्षीय युवक की जिंदगी में लौटी लंबे जीवन की उम्म

 




 जब 'कैंसर' का डर हुआ खत्म... 30 वर्षीय युवक की जिंदगी में लौटी लंबे जीवन की उम्मीद 


पीजीआइ में दुर्लभ बीमारी से ग्रस्त युवक को मिली राहत, 


ऑपरेशन के बाद हिस्टोपैथोलॉजी रिपोर्ट ने दूर की कैंसर की आशंका


 


 कभी-कभी जांच रिपोर्ट और लक्षण ऐसी तस्वीर पेश करते हैं कि मरीज और डॉक्टर दोनों के सामने कैंसर की आशंका सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है। 30 वर्षीय एक युवक के साथ भी ऐसा ही हुआ। बिना दर्द के बढ़ता पीलिया, तेजी से घटता वजन और पित्त नली में रुकावट जैसे संकेत पित्ताशय या पित्त नली के कैंसर की ओर इशारा कर रहे थे। कई जगह इलाज के बाद युवक को संजय गांधी पीजीआइ के सर्जिकल गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी विभाग लाया गया। जांच में नहीं हो सकी बीमारी की पुष्टि प्रो. अशोक कुमार की देखरेख में पहले एंडोस्कोपी के जरिए पित्त का बहाव सामान्य किया गया। इसके बाद सीटी स्कैन, एमआरआई और अन्य जांचें हुईं, लेकिन यह तय नहीं हो सका कि बीमारी कैंसर है या नहीं। कैंसर की प्रबल आशंका को देखते हुए डॉक्टरों ने ऑपरेशन का फैसला लिया। लैप्रोस्कोपी से बनाई नई पित्त नली प्रो. अशोक कुमार और उनकी टीम ने दूरबीन विधि से प्रभावित पित्ताशय और पित्त नली को निकालकर नई पित्त नली का पुनर्निर्माण किया। ऑपरेशन के बाद निकाले गए ऊतकों की हिस्टोपैथोलॉजी जांच कराई गई, जिसकी रिपोर्ट का परिवार बेसब्री से इंतजार कर रहा था। रिपोर्ट में सामने आई दुर्लभ बीमारी जांच में पता चला कि युवक को कैंसर नहीं, बल्कि ग्रैनुलोमेटस कोलेसिस्टाइटिस और ग्रैनुलोमेटस कोलेडोकोलाइटिस नामक दुर्लभ सूजन संबंधी बीमारी थी। बाद में यह सुनिश्चित करने के लिए अन्य जांचें भी कराई गईं कि सूजन किसी दूसरी गंभीर बीमारी से जुड़ी नहीं है। सभी रिपोर्ट सामान्य रहीं। प्रो. अशोक कुमार के अनुसार, पित्ताशय और पित्त नली की कुछ दुर्लभ सूजन संबंधी बीमारियां जांच में कैंसर जैसी दिखाई देती हैं। ऐसे मामलों में अंतिम पुष्टि केवल हिस्टो पैथोलॉजी से ही संभव होती है। उन्होंने सलाह दी कि बिना दर्द के पीलिया, लगातार वजन घटना या पित्त नली में रुकावट जैसे लक्षणों को नजरअंदाज न करें और गैस्ट्रो विशेषज्ञ से समय पर परामर्श लें। हर मामला कैंसर नहीं होता और सही जांच व उपचार से मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो सकता है। गैस्ट्रो सर्जरी विभाग के प्रो. अशोक कुमार और उनके सहयोगी डा. रोहित सिंह के इस दुर्लभ मामले को अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल क्यूरियस ने स्वीकार किया है।

बुधवार, 2 सितंबर 2026

कल्याण सिंह कैंसर संस्थान में पोषण सप्ताह पर जागरूकता कार्यक्रम



कल्याण सिंह कैंसर संस्थान में पोषण सप्ताह पर जागरूकता कार्यक्रम


 कीमो-रेडियोथेरेपी के दौरान शरीर की प्रोटीन और कैलोरी की बढ़ जाती है जरूरत 



लखनऊ। कल्याण सिंह अति विशिष्ट कैंसर संस्थान में राष्ट्रीय पोषण सप्ताह 2026 पर आयोजित कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने कहा कि कैंसर के इलाज में दवा के साथ सही पोषण आधी जंग है। 

क्या खाएं, क्या नहीं - विशेषज्ञों की राय

रोगियों को हाई प्रोटीन आहार जैसे अंडा, दालें, पनीर, दही, सोया, लीन चिकन, एंटीऑक्सीडेंट युक्त फल-सब्जियां, हरी पत्तेदार सब्जियां, पपीता, अमरूद, अनार, और ज्वार-बाजरा, दलिया, ओट्स जैसे साबुत अनाज लेना चाहिए। साथ ही दिन में 2.5 से 3 लीटर पानी, नारियल पानी, छाछ और सूप से हाइड्रेशन बनाए रखना जरूरी है। 


वहीं प्रोसेस्ड और रेड मीट, सॉसेज, बेकन, पैकेज्ड नमकीन, कोल्ड ड्रिंक, मैदा, ज्यादा चीनी, तला-भुना, अधिक नमक-अचार, कच्चा-अधपका भोजन, बाहर का कटा फल, शराब और तंबाकू से पूरी तरह परहेज करना चाहिए, क्योंकि ये इम्यूनिटी घटाते हैं और इंफेक्शन का खतरा बढ़ाते हैं।

डॉ. गीतिका पंत के मार्गदर्शन में हुआ आयोजन

यह कार्यक्रम पैडियाट्रिक ऑन्कोलॉजी विभाग की अतिरिक्त प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. गीतिका पंत के मार्गदर्शन में आयोजित हुआ। कार्यक्रम का उद्देश्य कैंसर देखभाल में संतुलित पोषण के प्रति जागरूकता बढ़ाना था।

कीमो-रेडियोथेरेपी में बढ़ जाती है प्रोटीन की जरूरत

कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. गीतिका पंत के स्वागत संबोधन से हुई। उन्होंने कहा कि कीमो-रेडियोथेरेपी के दौरान शरीर की प्रोटीन और कैलोरी की जरूरत बढ़ जाती है। सही डाइट न मिलने पर वजन घटना और कमजोरी बढ़ती है। डायटिशियन सुगंधा ने ‘कैंसर केयर में पोषण का महत्व’ पर थीम टॉक दी और छोटे-छोटे, बार-बार भोजन की सलाह दी।

निदेशक बोले - समग्र उपचार पर फोकस

मुख्य अतिथि निदेशक प्रो. एम.एल.बी. भट्ट ने कहा कि संस्थान में समग्र उपचार के तहत पोषण परामर्श पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। विशिष्ट अतिथि डॉ. पूनम तिवारी, विभागाध्यक्ष, डायटेटिक्स, राम मनोहर लोहिया संस्थान ने भी पोषण के वैज्ञानिक पहलुओं पर प्रकाश डाला। अंत में डायटिशियन साक्षी द्वारा क्विज प्रतियोगिता आयोजित की गई, जिसमें प्रतिभागियों ने उत्साह से भाग लिया।

मंगलवार, 1 सितंबर 2026

तीन साल के बच्चे के खून से निकाला जानलेवा कोलेस्ट्रॉल

 



तीन साल के बच्चे के खून से निकाला जानलेवा कोलेस्ट्रॉल


पीजीआई में हुआ देश का पहला मामला, इतनी कम उम्र में प्लाज्मा एक्सचेंज से एचओएफएच का इलाज


854 मिलीग्राम/डेसीलीटर था कोलेस्ट्रॉल, 20 सप्ताह तक हर सप्ताह प्लाज्मा एक्सचेंज से मिली राहत






संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एसजीपीजीआइ) के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग में दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित तीन साल के बच्चे का सफल इलाज किया गया है। बच्चे के खून में कोलेस्ट्रॉल का स्तर 854 मिलीग्राम/डेसीलीटर तक पहुंच गया था। दवाओं से पर्याप्त फायदा नहीं होने पर विशेषज्ञों ने प्लाज्मा एक्सचेंज के जरिए खून से अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल निकालने का फैसला किया। बच्चे में होमोजाइगस फैमिलियल हाइपरकोलेस्ट्रोलेमिया (एचओएफएच) की पुष्टि हुई थी।

मेडिकल जेनेटिक्स विभाग में बीमारी की पहचान के बाद बच्चे को ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग भेजा गया। विशेषज्ञों ने बच्चे की कम उम्र और वजन को ध्यान में रखते हुए विशेष प्लाज्मा एक्सचेंज की योजना तैयार की। करीब 20 सप्ताह तक हर सप्ताह यह प्रक्रिया की गई। प्रत्येक प्रक्रिया के बाद कोलेस्ट्रॉल के स्तर में औसतन करीब 70 प्रतिशत तक कमी आई।

प्लाज्मा एक्सचेंज के दौरान मशीन की मदद से कोलेस्ट्रॉल से प्रभावित प्लाज्मा को अलग किया गया और उसकी जगह उपयुक्त द्रव दिया गया। इसके बाद बच्चे की बाकी रक्त कोशिकाओं को शरीर में वापस पहुंचाया गया। सभी प्रक्रियाओं को बच्चे ने अच्छी तरह सहन किया और कोई बड़ी जटिलता नहीं हुई। इलाज के दौरान त्वचा पर जमा कोलेस्ट्रॉल में भी कमी देखी गई।

परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए कुछ प्रक्रियाएं निःशुल्क भी की गईं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह देश का पहला मामला है, जिसमें इतनी कम उम्र के बच्चे में एचओएफएच के प्रबंधन के लिए प्लाज्मा एक्सचेंज तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। संस्थान के निदेशक प्रो. आरके धीमान ने पूरी टीम को बधाई दी।

क्या है एचओएफएच

होमोजाइगस फैमिलियल हाइपरकोलेस्ट्रोलेमिया (एचओएफएच) एक बेहद दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी है, जो करीब पांच लाख लोगों में किसी एक को होती है। इसमें शरीर खून से खराब कोलेस्ट्रॉल यानी एलडीएल (लो-डेंसिटी लिपोप्रोटीन) को प्रभावी ढंग से बाहर नहीं निकाल पाता। इससे कम उम्र में ही त्वचा, रक्त वाहिकाओं और अन्य ऊतकों में कोलेस्ट्रॉल जमा होने लगता है। ऐसे मरीजों में हृदय की धमनियों में रुकावट, हृदय के वाल्व में बीमारी और कम उम्र में हार्ट अटैक का खतरा काफी बढ़ जाता है।

इलाज करने वाली टीम

ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग: डा. भरत सिंह, प्रो. प्रीति एल्हेंस (विभागाध्यक्ष), प्रो. अनुपम वर्मा और डा. अजय जोसेफ

मेडिकल जेनेटिक्स विभाग: डा. अमिता मोइरांगथेम

सोमवार, 31 अगस्त 2026

पीजीआई के डॉ. ज्ञान चंद को मिला बेस्ट पेपर अवार्ड

 



पीजीआई के डॉ. ज्ञान चंद को मिला बेस्ट पेपर अवार्ड




पीजीआई के वरिष्ठ एंडोक्राइन सर्जन डॉ. ज्ञान चन्द को रोबोटिक थायरॉयड सर्जरी में शोध के लिए बेस्ट पेपर अवार्ड मिला है। कोलकाता में एसोसिएशन ऑफ मिनिमल एक्सेस सर्जंस ऑफ इंडिया (अमासी) के 21वें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में डॉ. ज्ञान ने एएमएएसई बेस्ट पेपर अवॉर्ड का पहला पुरस्कार जीता। डॉ. ज्ञान चंद ने 170 रोबोटिक थायरॉयड सर्जरी के नतीजों पर शोध किया। इसमें ट्रांसओरल और बाइलेटरल एक्सिलो-ब्रेस्ट बाबा तकनीक की तुलना की गई। शोध को बेहतर वैज्ञानिक योगदान और मरीजों के लिए उपयोगिता के आधार पर सर्वश्रेष्ठ चुना गया।

रविवार, 30 अगस्त 2026

35 साल के मनुज के अंगदान से तीन मरीजों को जिंदगी की उम्मीद

 




35 साल के मनुज के अंगदान से तीन मरीजों को जिंदगी की उम्मीद

ब्रेन हेमरेज के बाद लोहिया संस्थान में हुई मौत, परिजनों ने किया अंगदान का फैसला; 


लोहिया में  एक किडनी और पीजीआई में हुआ एक  किडनी और लिवर का हुआ ट्रांसप्लांट


ब्रेन हेमरेज के गंभीर 35 वर्षीय बाराबंकी निवासी मनुज कुमार मिश्रा जिंदगी की जंग हार गए, लेकिन उनके अंगदान से तीन मरीजों को नई जिंदगी की उम्मीद मिली है। मनोज को बाथरूम में नहाते समय गिर गए थे । इसके बाद ब्रेन हेमरेज होने पर उन्हें पहले निजी अस्पताल ले जाया गया। हालत गंभीर होने पर लोहिया संस्थान में भर्ती कराया गया, जहां चिकित्सकों के प्रयास के बावजूद उनकी जान नहीं बच सकी। ब्रेन डेथ घोषित होने के बाद परिजनों ने अंगदान का फैसला लिया।

अंगदान की सूचना मिलते ही संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एसजीपीजीआई) के प्रोफेसर हर्षवर्धन ने सभी संबंधित विभागों को अलर्ट कर दिया।  इसके बाद सभी संबंधित विभागों के बीच समन्वय स्थापित कर प्रत्यारोपण की तैयारी शुरू की गई। सोटो के प्रमुख एव चिकित्सा अधीक्षक 

प्रोफेसर हर्षवर्धन को शनिवार दोपहर करीब दो बजे अंगदान की सूचना मिली थी। अंगों को हार्वेस्ट करने और उनका आवंटन करने की प्रक्रिया में सुबह करीब छह बज गए। इससे पहले ही एसजीपीजीआइ के सभी संबंधित विभागों को अलर्ट कर दिया गया था और विभागों ने अपनी तैयारियां पूरी कर ली थीं।

मनुज की एक किडनी लोहिया संस्थान में 44 वर्षीय अयोध्या निवासी महिला के लिए उपयोग की गई।  लोहिया संस्थान के 

यूरोलॉजी विभाग और ऑर्गन रिट्रीवल एवं किडनी ट्रांसप्लांट विभाग के 

प्रो. ईश्वर दयाल

डॉ. आलोक श्रीवास्तव

डॉ. संजीत सिंह और नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रो. अभिलाष चंद्रा

प्रो. नम्रता राव ,निश्चेतना विभाग से 

प्रो. पीके दास

डा. निधि शुक्ल

ने अहम भूमिका निभाया। 

 

वहीं एसजीपीजीआई में किडनी प्रत्यारोपण के लिए प्रोफेसर नारायण प्रसाद ,प्रो अनुपमा कौल , प्रो रवि शंकर , टेक्नोलॉजिस्ट महेश कुमार  ने चार मरीजों की जांच की। इनमें 34 वर्षीय एक महिला, जो पिछले चार साल से डायलिसिस पर थी, के लिए किडनी उपयुक्त पाई गई।

लिवर प्रत्यारोपण के लिए भी चार मरीजों की जांच की गई, जिसमें 32 वर्षीय एक पुरुष को लिवर प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त पाया गया। हेपेटाइटिस  के संक्रमण के कारण इनको लिवर फैलियर की परेशानी थी। 

रविवार शाम करीब चार बजे संस्थान  में अंग प्रत्यारोपण की प्रक्रिया शुरू की गई, जो देर रात तक जारी रही। 

 लिवर ट्रांसप्लांट 32 वर्षीय पुरुष है, जिसे हेपेटाइटिस-बी और सी के कारण लिवर फेल्योर था।

लिवर ट्रांसप्लांट की टीम का नेतृत्व प्रोफेसर सुप्रिया शर्मा ने किया जिसमें डॉ. राहुल, डॉ. प्रदीप, डॉ. सारंगी और विभागाध्यक्ष प्रो. अनु बिहारी शामिल रहे।

मरीज को अब लिवर ट्रांसप्लांट रिकवरी आईसीयू में शिफ्ट कर दिया गया है और फिलहाल उसकी स्थिति स्थिर है।

 किडनी प्रत्यारोपण की प्रक्रिया प्रोफेसर एम एस. अंसारी, प्रोफेसर संजय सुरेखा और प्रोफेसर उदय प्रताप सिंह की टीम ने शुरू की।  एनेस्थीसिया विभाग से लीवर और किडनी ट्रांसप्लांट के में प्रोफेसर दिव्या श्रीवास्तव, प्रोफेसर तपस सिंह,डा. तन्वी भार्गव और डा. तृप्ति सिंह शामिल रही। 

पीजीआइ निदेशक प्रोफेसर आरके धीमान और लोहिया के निदेशक प्रो सी एम सिंह ने ट्रांसप्लांट टीम को बधाई दी।  कहा कि संस्थान मल्टी-ऑर्गन ट्रांसप्लांट की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

मनोज के परिजनों के इस फैसले से तीन मरीजों के जीवन में नई उम्मीद जगी है। अंगदान ने यह संदेश दिया कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी उसके अंग जरूरतमंद मरीजों को जीवन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। 




लोहिया संस्थान की टीम 


ब्रेन स्टेम डेथ सर्टिफिकेशन टीम

डा. पीके मौर्या

डा. ऋतु करौली

डा. एसएस नाथ

डा. अरविंद कुमार सिंह






फॉरेंसिक विभाग

डा. प्रदीप

डा. आलोक


अंगदान काउंसलिंग टीम

सुभाष शुक्ला ,

डा. संदीप कुमार यादव

डा. एसएस नाथ

कानूनी एवं प्रशासनिक सहयोग

हेड कांस्टेबल कमलेश यादव

विवेक यादव

स्पाइन की सर्जरी में अब चोट का खतरा होगा लगभग शून्य, एसजीपीजीआई ने बनाया नया ड्रिलिंग डिवाइस


 स्पाइन की सर्जरी में अब चोट का खतरा होगा लगभग शून्य, एसजीपीजीआई ने बनाया नया ड्रिलिंग डिवाइस


 लखनऊ

स्पाइन की जटिल सर्जरी के दौरान स्पाइनल कॉर्ड को चोट से बचाने के लिए संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एसजीपीजीआई) के न्यूरोसर्जरी विभाग ने नया और सुरक्षित स्पाइन-ड्रिलिंग सेफ्टी डिवाइस विकसित किया है। इसे विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. वेद प्रकाश मौर्य ने डिजाइन किया है। डिवाइस को भारत सरकार के इंडियन पेटेंट ऑफिस से पेटेंट भी मिल चुका है।

यह उपकरण खासतौर पर स्प्लिट कॉर्ड मैलफॉर्मेशन टाइप-1 में बनने वाले बोनी स्पर (हड्डी के बढ़े हुए हिस्से) को सुरक्षित तरीके से ड्रिल कर हटाने में मदद करेगा। इस तरह की सर्जरी में ड्रिलिंग के दौरान स्पाइनल कॉर्ड में चोट की आशंका करीब 40 से 50 प्रतिशत तक रहती है। नए डिवाइस के इस्तेमाल से ड्रिल और न्यूरल टिश्यू के बीच सीधे संपर्क की आशंका कम होगी, जिससे इस तरह की इंजरी का खतरा लगभग शून्य तक पहुंचने की उम्मीद है।

यह डिवाइस स्पाइनल कॉर्ड की ओर ड्रिल से पैदा होने वाली गर्मी के ट्रांसमिशन को भी कम करता है। इससे सर्जरी के दौरान मरीज की सुरक्षा की एक अतिरिक्त परत मिलेगी।

स्प्लिट कॉर्ड मैलफॉर्मेशन एक दुर्लभ जन्मजात समस्या है, जो बच्चों में अधिक देखी जाती है। तेजी से बढ़ने के दौरान बोनी स्पर स्पाइनल कॉर्ड को नुकसान पहुंचा सकता है। सर्जरी में इसे हटाना जरूरी होता है।

यह इनोवेशन यूनिट चीफ प्रो. अरुण कुमार श्रीवास्तव के मार्गदर्शन और न्यूरोसर्जरी विभागाध्यक्ष प्रो. अवधेश कुमार जायसवाल के नेतृत्व में विकसित हुआ। एसजीपीजीआई निदेशक प्रो.  आर.के. धीमन ने टीम को बधाई देते हुए स्वदेशी मेडिकल इनोवेशन, सर्जिकल रिसर्च और मरीजों की सुरक्षा के प्रति संस्थान की प्रतिबद्धता पर जोर दिया।

शनिवार, 29 अगस्त 2026

न्यूरोइंटरवेंशन तकनीक से बच्चों के दिमाग की नसों की बनावट में खराबी का इलाज संभव

 



न्यूरोइंटरवेंशन  तकनीक  से बच्चों के दिमाग की नसों की बनावट में खराबी का इलाज संभव


  संस्थान में 24 घंटे स्ट्रोक यूनिट है संचालित 


 जन्मजात खराबी से हो सकता है स्ट्रोक



लखनऊ


 बच्चों में दिमाग की नसों की जन्मजात खराबी यानी चाइल्डहुड सेरेब्रोवैस्कुलर मालफॉर्मेशन गंभीर बीमारी हो सकती है। इसमें दिमाग की रक्त वाहिकाएं सामान्य तरीके से विकसित नहीं होतीं और नसों के बीच असामान्य जुड़ाव बन जाता है। इससे दिमाग में रक्तस्राव, दौरे और स्ट्रोक तक का खतरा हो सकता है। समय पर पहचान और आधुनिक इलाज से बच्चे को गंभीर जटिलताओं से बचाया जा सकता है। यह जानकारी संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआइ) के न्यूरोइंटरवेंशन रेडियोलॉजिस्ट प्रो. विवेक सिंह ने संस्थान में आयोजित  इंडियन सोसाइटी ऑफ न्यूरोरेडियोलॉजी (आईएसएनआर) मिड-टर्म सीएमई-2026 में दी।

प्रो. विवेक सिंह ने बताया कि बच्चों में दिमाग की रक्त वाहिकाओं की कई तरह की जन्मजात विकृतियां देखी जाती हैं। इनमें सेरेब्रल एवीएम, वेन ऑफ गैलेन मालफॉर्मेशन, पियल आर्टिरियोवेनस फिस्टुला और स्यूडोएन्यूरिज्म प्रमुख हैं। इनकी वजह से दिमाग में खून का प्रवाह असामान्य हो जाता है। कई बार बीमारी का पता तब चलता है जब बच्चे को अचानक दौरा पड़ता है, तेज सिरदर्द होता है, शरीर के किसी हिस्से में कमजोरी आती है या ब्रेन हेमरेज हो जाता है।

उन्होंने बताया कि इलाज बीमारी के आकार, स्थान और उसकी गंभीरता पर निर्भर करता है। न्यूरोइंटरवेंशन आधुनिक इलाज की ऐसी तकनीक है, जिसमें बिना बड़ी सर्जरी के शरीर की नस के रास्ते कैथेटर को दिमाग की प्रभावित नस तक पहुंचाया जाता है। इसके जरिए असामान्य रक्त वाहिकाओं में विशेष पदार्थ डालकर उनके रक्त प्रवाह को बंद किया जा सकता है। कुछ बच्चों में सर्जरी या रेडियोसर्जरी की भी जरूरत पड़ सकती है। सही मरीज का सही समय पर इलाज बेहद महत्वपूर्ण है।

एसजीपीजीआई के रेडियोडायग्नोसिस विभाग की प्रमुख प्रो. अर्चना गुप्ता ने बताया कि संस्थान बच्चों और वयस्कों में जटिल न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के लिए आधुनिक इमेजिंग और कम चीरा लगाने वाली उपचार सुविधाओं को लगातार मजबूत कर रहा है। संस्थान में 24 घंटे स्ट्रोक यूनिट भी संचालित है।

प्रो. विवेक सिंह ने बताया कि बच्चों में स्ट्रोक और रक्त वाहिकाओं की जन्मजात विकृतियों के इलाज के लिए रेडियोलॉजी, न्यूरोइंटरवेंशन, न्यूरोलॉजी और बाल चिकित्सा विशेषज्ञों की संयुक्त टीम की जरूरत होती है। प्रस्तावित एडवांस्ड पीडियाट्रिक सेंटर में बच्चों को जांच से लेकर उपचार तक की सुविधाएं एक ही स्थान पर उपलब्ध कराने की दिशा में काम किया जा रहा है।

 सीएमई में  देशभर के विशेषज्ञ बच्चों में स्ट्रोक, ब्रेन वैस्कुलर मालफॉर्मेशन और आधुनिक न्यूरोइंटरवेंशन , मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी, कैरोटिड इंटरवेंशन और इंट्राक्रेनियल  प्रशिक्षण दिया जाएगा।

गोलियां पेट को चीरकर आर-पार हुईं, पीजीआइ की टीम ने बचाई युवक की जान

 

गोलियां पेट को चीरकर आर-पार हुईं, पीजीआइ की टीम ने बचाई युवक की जान



लखनऊ


 भूमि विवाद में गोली लगने से गंभीर रूप से घायल गोंडा के अभय पांडेय की जान पीजीआई के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के डॉक्टरों ने बचा ली। गोलियां उनके पेट, छोटी आंत के शुरुआती हिस्से (डुओडेनम) और बड़ी आंत के एक हिस्से (सीकम) को चीरते हुए लगी थीं। पेट में करीब एक लीटर खून जमा हो गया था। डाक्टरों ने समय पर ऑपरेशन कर उनकी हालत संभाली। करीब दो सप्ताह के इलाज के बाद अभय को 25 अगस्त को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

गोंडा निवासी अभय पांडेय, पुत्र राज कुमार पांडेय, को नौ अगस्त को नवाबगंज के पास खरगूपुर गांव में कथित तौर पर भूमि विवाद के चलते गोली मार दी गई थी। हालत गंभीर होने पर उन्हें पीजीआई के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर लाया गया।

 जांच के बाद 11 अगस्त को उनकी सर्जरी की। ऑपरेशन के दौरान पेट में करीब एक लीटर खून मिला। गोलियों से पेट के अंदर कई जगह गंभीर चोटें आई थीं। ट्रॉमा टीम ने क्षतिग्रस्त हिस्सों की मरम्मत कर रक्तस्राव को नियंत्रित किया।

ऑपरेशन के बाद अभय को गहन निगरानी में रखा गया। ट्रॉमा सर्जरी, एनेस्थीसिया और आईसीयू की टीम ने मिलकर उनकी देखभाल की। धीरे-धीरे उनकी हालत में सुधार हुआ और 25 अगस्त को उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

ऑपरेशन करने वाली टीम में 

एडिशनल चीफ एवं ट्रॉमा सर्जन प्रो. अमित कुमार सिंह, , डा. वरुण गुप्ता और डा. आदित्य सिंह शामिल रहे। एनेस्थीसिया टीम में डा. गणपत प्रसाद, डा. प्रतीक सिंह बैस, डा. दीक्षा, डा. निखिल और डा. नबील रहे। ओटी टेक्नीशियन अमित यादव और आईसीयू टीम के ओम प्रकाश, मयंक बंसल, राहुल कुमार, दिव्यांशी और पायल नेगी ने भी इलाज में सहयोग किया।

निदेशक प्रोफेसर आरके धीमान ने पूरी टीम को बधाई दी। उन्होंने गंभीर पेट की चोट के इस मामले में ट्रॉमा सर्जरी, एनेस्थीसिया, ओटी और आईसीयू टीम के बेहतर तालमेल की सराहना की।

गुरुवार, 27 अगस्त 2026

राखी के धागे से बंधा रिश्ता, जरूरत पड़ने पर जिंदगी की डोर भी थाम सकता है

 





राखी के धागे से बंधा रिश्ता, जरूरत पड़ने पर जिंदगी की डोर भी थाम सकता है


बहन ने छोटे भाई को किडनी देकर बचाई जिंदगी


 वाराणसी के कौशिक और गाजीपुर के अरविंद का संजय गांधी पीजीआई में हुआ किडनी ट्रांसप्लांट




किसी परिवार को जब पता चलता है कि उसके अपने की किडनी खराब हो गई है और जिंदगी बचाने के लिए किडनी ट्रांसप्लांट कराना पड़ेगा, तो वह पल परिवार के लिए बेहद कठिन होता है। बीमारी के सदमे के साथ सबसे बड़ा सवाल सामने आता है कि किडनी कौन देगा। ऐसे समय में परिवार का कोई अपना आगे बढ़कर किडनी दान करने का फैसला करता है तो निराशा के बीच उम्मीद की नई किरण दिखाई देती है। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान में ऐसे ही दो मामलों में बहनों ने अपने भाइयों को किडनी देकर नई जिंदगी दी।



भाई की जिंदगी के लिए बहन बनीं किडनी डोनर



वाराणसी के सिंधोरा थाना क्षेत्र के ग्राम बुंची, पोस्ट राजपुर (मंगारी), तहसील पिंडरा निवासी कौशिक कुमार मिश्रा पुत्र लालचंद्र मिश्रा की किडनी खराब हो गई थी। परिवार के सामने ट्रांसप्लांट ही जिंदगी बचाने का रास्ता था। ऐसे मुश्किल समय में उनकी बहन अनीता मिश्रा आगे आईं और उन्होंने अपनी किडनी भाई को दान करने का फैसला किया। कौशिक मिश्रा का किडनी ट्रांसप्लांट मार्च 2026 में संजय गांधी पीजीआई, लखनऊ में हुआ।

अनीता मिश्रा ने कहा, “भाई को बीमारी की हालत में देखकर मन बहुत परेशान था। मेरे मन में एक ही बात थी कि अगर मेरी किडनी से उसकी जिंदगी बच सकती है तो इससे बड़ा मेरे लिए कुछ नहीं है।  आज उसके लिए कुछ करने का मौका मिला तो मैंने अपना फर्ज निभाया। सबसे बड़ी खुशी इस बात की है कि आज मेरा भाई हमारे बीच स्वस्थ जिंदगी की ओर बढ़ रहा है।”



अरविंद के लिए ज्ञानती ने किया अंगदान



इसी तरह गाजीपुर की रहने वाली ज्ञानती ने अपने छोटे भाई अरविंद कुमार को किडनी देकर उसकी जिंदगी बचाने का फैसला किया। अरविंद की किडनी खराब होने की जानकारी मिलने के बाद परिवार गहरे तनाव में था। बीमारी के साथ यह चिंता भी थी कि ट्रांसप्लांट के लिए किडनी कौन देगा। ऐसे समय में बड़ी बहन ज्ञानती आगे आईं और अपनी किडनी देने का फैसला किया। अरविंद का किडनी ट्रांसप्लांट अक्तूबर 2025 में संजय गांधी पीजीआई, लखनऊ में हुआ।

परिवार के लिए यह पल बेहद भावुक था। एक तरफ भाई की बीमारी ने सभी को चिंता में डाल दिया था, वहीं बहन के इस फैसले ने परिवार में उम्मीद और खुशी लौटा दी। बहन के त्याग ने भाई को नई जिंदगी मिलने का रास्ता साफ किया।



राखी के धागे से कहीं मजबूत निकला रिश्ता



रक्षाबंधन पर बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है और बदले में अपनी रक्षा का वचन लेती है। लेकिन इन दोनों बहनों ने इस रिश्ते को एक अलग ही अर्थ दे दिया। जिस भाई से बहन अपनी रक्षा का वचन लेती है, उसकी जिंदगी की रक्षा के लिए खुद आगे आ गई। किडनी खराब होने की खबर से जिस परिवार में डर, बेचैनी और अनिश्चितता छा गई थी, बहन के अंगदान के फैसले ने वहां उम्मीद और खुशी लौटा दी।



 बहनों की संख्या कम



प्रो. नारायण प्रसाद और किडनी ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर विजय प्रताप सोनकर के अनुसार, किडनी दान करने वालों में मां और पत्नी की संख्या सबसे अधिक रहती है। पिछले पांच वर्षों में बहनों द्वारा किडनी दान करने के मामले करीब नौ से अधिक नहीं रहे हैं। इसके पीछे सामाजिक सोच, शादी के बाद ससुराल पक्ष की सहमति और अंगदान को लेकर बनी गलत धारणाएं बड़ी वजह हैं।

सोनकर ने कहा, “अंगदान को लेकर समाज में अभी भी कई भ्रांतियां हैं। सही चिकित्सकीय जांच में स्वस्थ पाए जाने के बाद किडनी दान करने वाला व्यक्ति सामान्य जीवन जी सकता है। किसी अपने को जीवन देने का फैसला समाज के लिए भी सकारात्मक संदेश है।”



किडनी दान सिर्फ चिकित्सा नहीं, रिश्ते की भी परीक्षा



ट्रांसप्लांट टीम के हिमांशु ने कहा, “किडनी ट्रांसप्लांट सिर्फ एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं, बल्कि भावनाओं और रिश्तों से जुड़ा फैसला भी है। जब कोई बहन अपने भाई की जिंदगी बचाने के लिए आगे आती है तो वह पूरे परिवार के लिए बेहद भावुक और खुशी का क्षण होता है।”



प्रो. नारायण प्रसाद के मुताबिक, उचित चिकित्सकीय जांच के बाद किडनी दान करने वाला व्यक्ति सामान्य और स्वस्थ जीवन जी सकता है। इसलिए अंगदान को लेकर डर और भ्रम के बजाय वैज्ञानिक जानकारी को महत्व देना जरूरी है।



बीमारी की खबर से छाई मायूसी, बहन के फैसले से लौटी मुस्कान



किडनी खराब होने की जानकारी मिलते ही परिवार के सामने सिर्फ बीमारी नहीं होती, बल्कि इलाज, ट्रांसप्लांट, खर्च और भविष्य की कई चिंताएं एक साथ खड़ी हो जाती हैं। ऐसे में जब बहन अपनी किडनी देने के लिए आगे आती है तो परिवार को लगता है कि मुश्किल वक्त में भी कोई उनके साथ मजबूती से खड़ा है।

अनीता और ज्ञानती ने सिर्फ अपनी किडनी दान नहीं की, बल्कि अपने भाइयों और पूरे परिवार को दोबारा मुस्कुराने की वजह दी। इन दोनों बहनों ने साबित किया कि भाई-बहन का रिश्ता सिर्फ राखी के धागे तक सीमित नहीं है। जरूरत पड़ने पर बहन अपने शरीर का एक हिस्सा देकर भी भाई की जिंदगी की रक्षा कर सकती है।


1 कौशिक और किडनी देने वाली बहन अनीता 

2 अरविंद को किडनी देने वाली बहन ज्ञानती

एसजीपीजीआई में स्वदेशी एसएमए दवा की शुरुआत, 15 बच्चों को मुफ्त मिला इलाज

 



एसजीपीजीआई में स्वदेशी एसएमए दवा की शुरुआत, 15 बच्चों को मुफ्त मिली पहली खेप

विदेशी दवा के मुकाबले करीब 50 गुना कम लागत में इलाज

100 से अधिक बच्चे पंजीकृत, 50 से ज्यादा दवा के इंतजार में


स्पाइनल मस्कुलर एट्रॉफी (एसएमए) से पीड़ित बच्चों के लिए संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) में बड़ी पहल हुई है। राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति (एनपीआरडी) के तहत संस्थान में भारत में निर्मित आरएनए स्प्लाइसिंग मॉडिफायर रिसडिप्लाम (नैटस्मार्ट) उपलब्ध कराया गया। गुरुवार को चिकित्सा आनुवंशिकी विभाग में 15 बच्चों को दवा  निशुल्क वितरित की गई।

रिसडिप्लाम मुंह से दी जाने वाली दवा है, जो शरीर में एसएमएन प्रोटीन के उत्पादन को बढ़ाने में मदद करती है। यह प्रोटीन मोटर न्यूरॉन कोशिकाओं के लिए जरूरी होता है। इससे मांसपेशियों की ताकत और मोटर क्षमता को बनाए रखने में मदद मिलती है और बीमारी की प्रगति धीमी हो सकती है। एसएमए में मोटर न्यूरॉन कोशिकाएं प्रभावित होने से बच्चों में मांसपेशियों की कमजोरी, शरीर में ढीलापन, चलने-फिरने में देरी और बाद में सांस लेने में परेशानी हो सकती है, जबकि उनकी बुद्धि सामान्य रहती है।

विदेशी कंपनियों की दवाओं की कीमत बहुत अधिक होने के कारण एसएमए का इलाज परिवारों पर भारी पड़ता है। विशेषज्ञों के मुताबिक 20 किलो वजन वाले बच्चे के लिए विदेशी ओरल दवा की कीमत करीब एक से दो करोड़ रुपये सालाना तक थी, जबकि भारत में निर्मित दवा करीब 3.5 लाख रुपये सालाना में उपलब्ध है। यानी लागत लगभग 50 गुना कम हो गई है।

एसजीपीजीआई में 100 से अधिक बच्चे पंजीकृत हैं और 50 से ज्यादा दवा की प्रतीक्षा में हैं। कार्यक्रम में निदेशक पद्मश्री प्रो. आरके धीमान ने विभाग को बधाई दी और बच्चों को दवा वितरित की। बच्चों ने उन्हें राखी बांधी। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रो. देवेंद्र गुप्ता, संयुक्त निदेशक सामग्री प्रबंधन प्रकाश सिंह और खरीद अधिकारी गंगा विष्णु मौजूद रहे। दवा की खरीद में संयुक्त निदेशक सामग्री प्रबंधन कार्यालय का विशेष योगदान रहा।

विभागाध्यक्ष डॉ. कौशिक मंडल के नेतृत्व में टीम ने दवा उपलब्ध कराने के प्रयास किए। टीम में डॉ. दीप्ति सक्सेना, डॉ. अमिता एम., डॉ. हसीना ए. सैत, डॉ. अंशिका श्रीवास्तव, डॉ. प्रज्ञा काफ्ले, डॉ. पूजा मोटवानी और डॉ. आदर्श शामिल हैं। छह रेजिडेंट डॉक्टरों, वार्ड स्टाफ और अंजू लता गुप्ता का भी योगदान रहा। डॉ. प्रज्ञा काफ्ले, डॉ. पूजा मोटवानी, डॉ. हसीना और डॉ. आदर्श की विशेष भूमिका रही।