सोमवार, 29 जून 2026

ट्रांसप्लांट के साथ आम बीमारी पर भी हो कड़ी नज़र

 


ट्रांसप्लांट के साथ आम बीमारी पर भी हो कड़ी नज़र

अंग प्रत्यारोपण भी जरूरी, लेकिन स्वास्थ्य नीति का केंद्र करोड़ों आम मरीज भी हों

 पिछले कुछ वर्षों में किडनी, लिवर, हार्ट और फेफड़े (लंग) प्रत्यारोपण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। जिन मरीजों के लिए अंग प्रत्यारोपण ही जीवन बचाने का अंतिम विकल्प होता है, उनके लिए यह चिकित्सा विज्ञान का वरदान है। विभिन्न चिकित्सा आकलनों के अनुसार भारत में हर वर्ष लगभग 3 लाख मरीजों को किसी न किसी अंग प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है, जबकि अंगों की कमी, सीमित केंद्रों और आर्थिक कारणों से केवल 20–25 हजार मरीजों का ही प्रत्यारोपण हो पाता है। इसलिए ट्रांसप्लांट सेवाओं का विस्तार और अंगदान को बढ़ावा देना आवश्यक है।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष कहीं अधिक बड़ा है। भारत में हर वर्ष 80 लाख से अधिक लोगों की मौत हृदय रोग, कैंसर, स्ट्रोक, मधुमेह, फेफड़ों की बीमारियों, संक्रामक रोगों और अन्य गंभीर बीमारियों से हो जाती है। यानी अंग प्रत्यारोपण की जरूरत वाले लगभग 3 लाख मरीजों की तुलना में अन्य गंभीर बीमारियों से मरने वालों की संख्या 25 गुना से भी अधिक है। ऐसे में स्वास्थ्य नीति का उद्देश्य केवल ट्रांसप्लांट कार्यक्रमों का विस्तार नहीं, बल्कि उन बीमारियों के इलाज को भी सर्वोच्च प्राथमिकता देना होना चाहिए जो सबसे अधिक लोगों की जान ले रही हैं।

आंकड़े क्या कहते हैं?

भारत में अनुमानित रूप से हर वर्ष—

हृदय रोग से लगभग 30 लाख लोगों की मृत्यु होती है।

कैंसर से लगभग 10 लाख लोगों की जान जाती है।

ब्रेन स्ट्रोक से करीब 8 लाख लोगों की मौत होती है।

फेफड़ों की गंभीर बीमारियों से लगभग 10 लाख लोग दम तोड़ते हैं।

मधुमेह से लगभग 5 लाख लोगों की मृत्यु होती है।

टीबी, निमोनिया और अन्य संक्रामक रोगों से करीब 15–18 लाख लोगों की जान जाती है।

सड़क दुर्घटनाओं में प्रतिवर्ष लगभग 1.77 लाख लोगों की मौत होती है।

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि ट्रांसप्लांट चिकित्सा महत्वपूर्ण है, लेकिन देश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौती अभी भी वे बीमारियां हैं जिनसे हर वर्ष लाखों लोगों की जान जा रही है।

ट्रांसप्लांट बनाम सामान्य बीमारियां: किसे कितनी जरूरत?

देश में हर वर्ष लगभग 3 लाख मरीजों को अंग प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है। दूसरी ओर करोड़ों लोग पेट, आंत, पित्ताशय, मूत्राशय, प्रोस्टेट, कैंसर, न्यूरोसर्जरी, हड्डी, स्त्री एवं प्रसूति, संक्रमण, दुर्घटनाओं और अन्य बीमारियों के इलाज के लिए अस्पताल पहुंचते हैं।

इन मरीजों में अधिकांश को ट्रांसप्लांट नहीं, बल्कि समय पर ऑपरेशन, आईसीयू, विशेषज्ञ डॉक्टर और आवश्यक दवाओं की जरूरत होती है। यदि ये सुविधाएं समय पर मिल जाएं तो लाखों लोगों की जान बचाई जा सकती है।

इलाज का खर्च भी समझना होगा

अंग प्रत्यारोपण केवल चिकित्सा की नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी सबसे महंगी प्रक्रियाओं में से एक है।

किडनी ट्रांसप्लांट का खर्च लगभग 5–10 लाख रुपये।

लिवर ट्रांसप्लांट का खर्च लगभग 20–35 लाख रुपये।

हार्ट ट्रांसप्लांट का खर्च लगभग 20–30 लाख रुपये।

लंग ट्रांसप्लांट का खर्च लगभग 25–40 लाख रुपये या उससे अधिक हो सकता है।

यहीं खर्च समाप्त नहीं होता। ट्रांसप्लांट के बाद मरीज को जीवनभर महंगी दवाएं, नियमित जांच और विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी की आवश्यकता होती है, जिस पर हर महीने हजारों रुपये खर्च होते हैं।

इसके विपरीत, अधिकांश सामान्य और सुपर स्पेशियलिटी बीमारियों—जैसे पित्ताशय, अपेंडिक्स, हर्निया, मूत्राशय, प्रोस्टेट, कैंसर की शुरुआती सर्जरी, हड्डी, स्त्री रोग और अन्य ऑपरेशन—का इलाज सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क या बहुत कम खर्च पर उपलब्ध कराया जा सकता है। निजी अस्पतालों में भी इनका खर्च सामान्यतः 50 हजार से 3 लाख रुपये के बीच होता है। अर्थात इन बीमारियों का इलाज आम लोगों की पहुंच में लाया जा सकता है, यदि सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत हों।

सबसे बड़ी चुनौती—आईसीयू की कमी

देश के अधिकांश सरकारी अस्पतालों में आईसीयू बेड की भारी कमी है। गंभीर मरीजों को समय पर आईसीयू नहीं मिल पाता। मजबूरी में उन्हें निजी अस्पतालों में भर्ती कराना पड़ता है, जहां एक दिन का आईसीयू खर्च ही हजारों से लेकर लाख रुपये तक पहुंच सकता है। अनेक परिवार इलाज के लिए कर्ज में डूब जाते हैं या अपनी जीवनभर की जमा पूंजी गंवा देते हैं।

यदि समय पर आईसीयू उपलब्ध हो जाए तो हार्ट अटैक, स्ट्रोक, सेप्सिस, दुर्घटनाओं और जटिल सर्जरी वाले हजारों मरीजों की जान बचाई जा सकती है।

 प्राथमिकता क्या होनी चाहिए

अंग प्रत्यारोपण की सुविधाओं का विस्तार होना चाहिए, लेकिन स्वास्थ्य बजट का बड़ा हिस्सा उन सेवाओं पर भी खर्च होना चाहिए जिनका लाभ सबसे अधिक लोगों को मिले।

प्रत्येक राज्य की राजधानी में कम से कम 2000 बेड का आधुनिक क्रिटिकल केयर (आईसीयू) अस्पताल विकसित किया जाए।

जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में आईसीयू और आपातकालीन सेवाओं का विस्तार किया जाए।

पेट, आंत, मूत्राशय, कैंसर, न्यूरोसर्जरी और अन्य सुपर स्पेशियलिटी सर्जरी की क्षमता बढ़ाई जाए।

संक्रामक रोगों और नॉन-कम्युनिकेबल बीमारियों की रोकथाम और उपचार पर अधिक निवेश किया जाए।

आम मरीजों के लिए सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाएं।

ट्रांसप्लांट केंद्रों का क्षेत्रीय मॉडल

अत्यधिक विशेषज्ञता और महंगे संसाधनों की आवश्यकता को देखते हुए यह भी विचार किया जा सकता है कि तीन-चार राज्यों के लिए एक विश्वस्तरीय क्षेत्रीय ट्रांसप्लांट संस्थान विकसित किया जाए, जहां केवल अंग प्रत्यारोपण और उससे जुड़ी सुपर स्पेशियलिटी सेवाएं उपलब्ध हों। इससे अन्य मेडिकल कॉलेजों और सरकारी अस्पतालों में आईसीयू, सामान्य सर्जरी और गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध कराए जा सकते हैं। यह एक नीतिगत सुझाव है, जिस पर विशेषज्ञों और सरकार को व्यापक चर्चा करनी चाहिए।


भारत को ट्रांसप्लांट की आवश्यकता है, लेकिन उससे कहीं अधिक आवश्यकता है संतुलित स्वास्थ्य नीति की।

जब एक ओर लगभग 3 लाख लोगों को हर वर्ष अंग प्रत्यारोपण की जरूरत होती है, वहीं दूसरी ओर 80 लाख से अधिक लोग अन्य गंभीर बीमारियों से अपनी जान गंवा देते हैं। इसलिए स्वास्थ्य व्यवस्था का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने ट्रांसप्लांट हुए, बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि कितने हार्ट अटैक के मरीज समय पर आईसीयू तक पहुंचे, कितने कैंसर रोगियों का समय पर ऑपरेशन हुआ, कितने स्ट्रोक मरीजों को गोल्डन ऑवर में इलाज मिला और कितने गरीब परिवार बिना आर्थिक तबाही के इलाज करा सके।

आधुनिक चिकित्सा का वास्तविक उद्देश्य केवल सबसे जटिल ऑपरेशन करना नहीं, बल्कि सबसे अधिक लोगों की जान बचाना है। यही भारत की स्वास्थ्य नीति की सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।

रविवार, 28 जून 2026

सेप्सिस एक मेडिकल इमरजेंसी, हर मिनट की देरी बढ़ा सकती है खतरा:

 




सेप्सिस एक मेडिकल इमरजेंसी, हर मिनट की देरी बढ़ा सकती है खतरा: 

डॉक्टर्स डे पर विशेषज्ञों का संदेश—समय पर पहचान और उपचार से बचाई जा सकती हैं हजारों जानें

लखनऊ। हर वर्ष लाखों लोग सेप्सिस  के कारण अपनी जान गंवा देते हैं। यह केवल एक सामान्य संक्रमण नहीं, बल्कि संक्रमण के प्रति शरीर की अनियंत्रित प्रतिक्रिया है, जो कुछ ही घंटों में शरीर के कई महत्वपूर्ण अंगों को प्रभावित कर सकती है। समय पर पहचान और उपचार न मिलने पर रोगी सेप्टिक शॉक में जा सकता है और मृत्यु का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

डॉक्टर्स डे के अवसर पर संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई), लखनऊ के आपातकालीन चिकित्सा विभाग के विशेषज्ञों ने बताया कि सेप्सिस के उपचार में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका समय की होती है। चिकित्सा विज्ञान में शुरुआती एक घंटे को "गोल्डन ऑवर" माना जाता है। यदि इस दौरान रोग की पहचान कर आवश्यक जांच, उचित एंटीबायोटिक, तरल उपचार (फ्लूड रिससिटेशन) तथा जरूरत पड़ने पर वासोप्रेसर शुरू कर दिए जाएं, तो रोगी के बचने की संभावना काफी बढ़ जाती है।

विशेषज्ञों ने बताया कि एसजीपीजीआई के आपातकालीन चिकित्सा विभाग में सेप्सिस की शीघ्र पहचान और उपचार को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है। गंभीर मरीजों का व्यवस्थित क्लिनिकल आकलन किया जाता है। संक्रमण की आशंका होने पर तुरंत रक्त जांच, ब्लड कल्चर, सीरम लैक्टेट, अंगों की कार्यक्षमता का मूल्यांकन तथा आवश्यकतानुसार इमेजिंग कराई जाती है। इसके आधार पर अंतरराष्ट्रीय उपचार मानकों के अनुरूप समयबद्ध एंटीबायोटिक, तरल उपचार और अन्य जीवनरक्षक उपाय शुरू किए जाते हैं।

उन्होंने कहा कि संस्थान का उद्देश्य केवल मरीज की जान बचाना ही नहीं, बल्कि संक्रमण के वास्तविक कारण की पहचान, विवेकपूर्ण एंटीबायोटिक उपयोग तथा बहु-विषयक (मल्टीडिसिप्लिनरी) उपचार के माध्यम से बेहतर परिणाम सुनिश्चित करना भी है। इसके लिए आपातकालीन चिकित्सा, क्रिटिकल केयर, माइक्रोबायोलॉजी, संक्रामक रोग विशेषज्ञ और अन्य विभाग मिलकर समन्वित रूप से कार्य करते हैं।

विशेषज्ञों ने बताया कि भारत जैसे देश में डेंगू, स्क्रब टायफस, लेप्टोस्पायरोसिस, मलेरिया और अन्य उष्णकटिबंधीय संक्रमण भी सेप्सिस का कारण बन सकते हैं। इसलिए बुखार को सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, खासकर जब उसके साथ तेज सांस चलना, भ्रम की स्थिति, अत्यधिक कमजोरी, रक्तचाप कम होना या पेशाब कम आना जैसे लक्षण दिखाई दें। ऐसे मामलों में तुरंत अस्पताल पहुंचकर चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक है।

डॉक्टर्स डे के अवसर पर एसजीपीजीआई ने उन सभी चिकित्सकों, नर्सों, पैरामेडिकल कर्मियों और स्वास्थ्यकर्मियों के प्रति सम्मान व्यक्त किया, जो दिन-रात आपातकालीन परिस्थितियों में मरीजों का उपचार करते हुए हर मिनट जीवन बचाने का प्रयास करते हैं।

संदेश: "सेप्सिस एक मेडिकल इमरजेंसी है। जल्दी पहचान, जल्दी उपचार और टीमवर्क ही जीवन बचाने की सबसे प्रभावी कुंजी है।"

दुर्लभ ब्रेन एन्यूरिज्म से जूझ रहे 8 वर्षीय ओजस को मिली नई जिंदगी

 

दुर्लभ ब्रेन एन्यूरिज्म से जूझ रहे रामनगर (बाराबंकी) के 8 वर्षीय ओजस को मिली नई जिंदगी

एसजीपीजीआई में बिना स्टेंट के कॉइलिंग कर बंद किया गया एन्यूरिज्म, प्रो. विवेक सिंह बोले—“यह मामला जिंदगी भर याद रहेगा”

लखनऊ।

बाराबंकी जिले के रामनगर क्षेत्र के रहने वाले 8 वर्षीय ओजस को एसजीपीजीआई के चिकित्सकों ने एक जटिल और जानलेवा ब्रेन एन्यूरिज्म से बचाकर नई जिंदगी दी है। मस्तिष्क की रक्त वाहिनी में बने एन्यूरिज्म के कारण बच्चे में लकवे के लक्षण उभर आए थे। परिवार के सामने अपने इकलौते बेटे को बचाने की चुनौती थी, लेकिन एसजीपीजीआई के विशेषज्ञों ने आधुनिक तकनीक के जरिए सफल उपचार कर उसे स्वस्थ जीवन लौटाया।

लकवे के लक्षणों ने बढ़ाई चिंता

ओजस के पिता आदर्श कुमार मिश्रा, निवासी रामनगर, बाराबंकी, बताते हैं कि बेटे को अचानक न्यूरोलॉजिकल समस्याएं होने लगी थीं। धीरे-धीरे उसके शरीर में कमजोरी और लकवे जैसे लक्षण दिखाई देने लगे। जांच में पता चला कि मस्तिष्क की एक रक्त वाहिनी में ब्रेन एन्यूरिज्म बन गया है। यह ऐसी स्थिति होती है जिसमें रक्त वाहिनी की दीवार कमजोर होकर गुब्बारे की तरह फूल जाती है और उसके फटने पर जानलेवा रक्तस्राव हो सकता है।

बीमारी की जानकारी मिलते ही परिवार पर मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। इसके बाद ओजस को एसजीपीजीआई लाया गया, जहां वरिष्ठ रेडियोलॉजिस्ट एवं न्यूरो-इंटरवेंशनल विशेषज्ञ प्रोफेसर विवेक सिंह ने उसकी जांच की।

18 अक्टूबर 2024 को हुआ जटिल ऑपरेशन

जांच के बाद चिकित्सकों ने एंडोवैस्कुलर एम्बोलाइजेशन यानी कॉइलिंग प्रक्रिया करने का निर्णय लिया। 18 अक्टूबर 2024 को यह जटिल प्रक्रिया सफलतापूर्वक की गई। इसमें शरीर की रक्त वाहिनी के रास्ते बेहद पतले कैथेटर मस्तिष्क तक पहुंचाए गए और विशेष कॉइल्स की मदद से एन्यूरिज्म को भीतर से बंद कर दिया गया।

प्रोफेसर विवेक सिंह के अनुसार सामान्यतः ऐसे मामलों में वयस्क मरीजों को स्टेंट लगाने की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन ओजस की उम्र और रक्त वाहिनियों के आकार को देखते हुए कॉइलिंग तकनीक से ही एन्यूरिज्म को सफलतापूर्वक बंद किया गया। इससे मस्तिष्क की प्रभावित नस में रक्त का असामान्य प्रवाह रुक गया और भविष्य में उसके फटने का खतरा समाप्त हो गया।

एक सप्ताह अस्पताल में भर्ती रहा बच्चा

ऑपरेशन के बाद ओजस को लगभग एक सप्ताह तक अस्पताल में भर्ती रखा गया। इस दौरान उसकी स्थिति में लगातार सुधार होता गया। चिकित्सकों की निगरानी में उपचार पूरा होने के बाद उसे छुट्टी दे दी गई। आज वह नियमित रूप से फॉलो-अप के लिए एसजीपीजीआई आता है और पूरी तरह स्वस्थ जीवन जी रहा है।

“20 साल के करियर में यह सबसे यादगार मामलों में से एक”

प्रोफेसर विवेक सिंह बताते हैं कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से न्यूरो-इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं और एक हजार से अधिक जटिल मामलों का उपचार कर चुके हैं। इनमें अधिकांश मरीज वयस्क रहे हैं, लेकिन बच्चों में इस प्रकार का एन्यूरिज्म बेहद दुर्लभ होता है।

उन्होंने कहा, “ज्यादातर उपकरण और तकनीकें वयस्क मरीजों के लिए विकसित की गई हैं। ऐसे में किसी छोटे बच्चे की नाजुक रक्त वाहिनियों में पहुंचकर एन्यूरिज्म को सुरक्षित तरीके से बंद करना काफी चुनौतीपूर्ण होता है। ओजस का मामला इसलिए विशेष था क्योंकि यह एक बच्चे की जिंदगी से जुड़ा था। यही वजह है कि यह केस मुझे पूरी जिंदगी याद रहेगा।”

उन्होंने आगे कहा, “आज जब ओजस फॉलो-अप पर आता है और उसे पूरी तरह स्वस्थ, मुस्कुराते हुए और सामान्य बच्चों की तरह जीवन जीते देखता हूं तो मन को बहुत सुकून मिलता है। किसी बच्चे को मौत के खतरे से बाहर निकालकर सामान्य जीवन में लौटते देखना किसी भी चिकित्सक के लिए सबसे बड़ी संतुष्टि होती है।”

पिता बोले—डॉक्टर हमारे लिए भगवान से कम नहीं

ओजस के पिता आदर्श कुमार मिश्रा कहते हैं कि बीमारी का पता चलने के बाद पूरा परिवार सदमे में था। उन्हें भविष्य की चिंता सता रही थी, लेकिन प्रोफेसर विवेक सिंह और उनकी टीम ने हर कदम पर उनका हौसला बढ़ाया।

उन्होंने कहा, “जब हमें बताया गया कि बेटे के मस्तिष्क की नस में एन्यूरिज्म है और उसकी वजह से लकवे के लक्षण आ रहे हैं, तब हम पूरी तरह टूट चुके थे। लेकिन डॉक्टरों ने भरोसा दिलाया कि इलाज संभव है। आज मेरा बेटा पूरी तरह स्वस्थ है। उसे दौड़ते-भागते और सामान्य बच्चों की तरह खेलते देखना हमारे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है।”

समय पर इलाज से बची जान

विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों में ब्रेन एन्यूरिज्म के मामले बहुत कम देखने को मिलते हैं, लेकिन समय पर पहचान और उपचार न होने पर यह जानलेवा साबित हो सकता है। लगातार सिरदर्द, शरीर के किसी हिस्से में कमजोरी, बोलने में कठिनाई या लकवे जैसे लक्षण दिखाई दें तो तत्काल विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

रामनगर, बाराबंकी के ओजस की यह कहानी आधुनिक चिकित्सा, विशेषज्ञता और समय पर उपचार की सफलता का उदाहरण है। एक समय जिस बच्चे की जिंदगी खतरे में थी, आज वही बच्चा पूरी तरह स्वस्थ होकर भविष्य के सपने संजो रहा है। वहीं, इस सफलता को याद करते हुए प्रोफेसर विवेक सिंह के शब्द इस उपलब्धि की अहमियत को बयां करते हैं—“कुछ मरीज सिर्फ केस नहीं होते, वे जिंदगी भर की याद बन जाते हैं, और ओजस उन्हीं में से एक है।”

शनिवार, 27 जून 2026

पीजीआई फैकल्टी क्लब के 40 दिवसीय समर कैंप का रंगारंग समापन,

 





फैकल्टी क्लब के 40 दिवसीय समर कैंप का रंगारंग समापन, बच्चों ने दी शानदार प्रस्तुतियां

 संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के फैकल्टी क्लब द्वारा आयोजित 40 दिवसीय समर कैंप का भव्य समापन शनिवार को श्रुति ऑडिटोरियम में उत्साह और उमंग के साथ हुआ। 100 से अधिक बच्चों की भागीदारी वाले इस शिविर के समापन समारोह में रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने सभी का मन मोह लिया।

कार्यक्रम का शुभारंभ संस्थान के निदेशक डॉ. आर. के. धीमन एवं अन्य गणमान्य अतिथियों तथा फैकल्टी क्लब की कार्यकारिणी के सदस्यों ने दीप प्रज्ज्वलित कर एवं गणेश वंदना के साथ किया।

समर कैंप के दौरान बच्चों को योग, कथक, संगीत, नाटक, बॉलीवुड डांस, कैलीग्राफी, गिटार, पाक कला और क्राफ्ट का प्रशिक्षण दिया गया। समापन समारोह में बच्चों ने इन सभी विधाओं में अपनी प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन किया। कथक की छात्राओं ने तीन ताल पर आधारित मनमोहक प्रस्तुति दी, जबकि गिटार पर प्रस्तुत धुन ने दर्शकों की खूब तालियां बटोरीं।

बच्चों ने "एक दिन मोबाइल बिन" और "एक दिन की छुट्टी" नाटकों के माध्यम से सप्ताह में एक दिन मोबाइल से दूर रहने और अधिक से अधिक पेड़ लगाने का संदेश दिया। उन्होंने सभी उपस्थित लोगों को यह संकल्प भी दिलाया कि सप्ताह में कम से कम एक दिन मोबाइल का उपयोग नहीं करेंगे और वह समय अपने परिवार के साथ बिताएंगे।

समारोह के अंत में सभी प्रतिभागियों को पुरस्कार एवं प्रमाण-पत्र देकर सम्मानित किया गया।

समर कैंप का संचालन प्रशिक्षकों संजय त्रिपाठी, आदित्य लिपटन, योगाचार्य अनूप, अनामिका मिश्रा, नैना श्रीवास्तव, दीपक, आयशा, अनुपमा श्रीवास्तव, खुशबू कक्कड़ और ऋषभ के नेतृत्व में किया गया।

समारोह में सानवी, आइज़ा, अनाईशा, अश्विका, वामिका, अनुषा, इवान, इरव, समृद्धि, काशवी, आरना, तनिष्का, रुद्रांशी, ईशानवी, अनन्या, अद्विक, अमितव, अर्नब, अद्वित, पटेल, अक्षत, इशिता, नंदिनी, अवंतिका, अद्विता, वेदांत, मुग्धा, अनय, ईशान, मिहिका, दिविता, रुशांक, उर्जित, आदित्री, जिज्ञासा, वारुष और विहान सहित अनेक बच्चों ने अपनी आकर्षक प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

कार्यक्रम का संचालन प्रणव सिंह, आरुष केशरी, अनन्या एवं इस्साम जफर ने प्रभावशाली ढंग से किया। अंत में फैकल्टी क्लब की टीम ने सभी अभिभावकों, प्रशिक्षकों, सहयोगियों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि बच्चों की प्रतिभा को निखारने के लिए भविष्य में भी ऐसे रचनात्मक कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहेंगे।

बेरोजगारी के कारण बढ़ रही कुंवारों की संख्या, बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा बनी सबसे बड़ी वजह





  बेरोजगारी के कारण बढ़ रही कुंवारों की संख्या, बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा बनी सबसे बड़ी वजह

स्थायी नौकरी वाले युवकों को वरीयता दे रहा वधू पक्ष, रोजगार की अनिश्चितता से बढ़ रही विवाह की औसत आयु

भारत में युवाओं के विवाह में देरी और अविवाहित रहने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। लंबे समय तक इसे घटते लिंगानुपात और कन्या भ्रूण हत्या का परिणाम माना जाता रहा, लेकिन अब एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने इस धारणा को चुनौती दी है। अध्ययन के अनुसार आज विवाह में सबसे बड़ी बाधा बेरोजगारी, अस्थायी रोजगार और आर्थिक असुरक्षा बन गई है। वधू पक्ष अब ऐसे वर को प्राथमिकता दे रहा है जिसके पास स्थायी नौकरी और आर्थिक सुरक्षा हो। इसके कारण बड़ी संख्या में युवा विवाह के दायरे से बाहर रह जा रहे हैं।

अध्ययन में कहा गया है कि भारत में विवाह की सामाजिक व्यवस्था तेजी से बदल रही है। पहले जहां परिवार और सामाजिक प्रतिष्ठा को अधिक महत्व दिया जाता था, वहीं अब नौकरी, नियमित आय और आर्थिक स्थिरता विवाह तय करने का सबसे महत्वपूर्ण आधार बन गई है। इसका सबसे अधिक असर उन युवाओं पर पड़ रहा है जो शिक्षित होने के बावजूद स्थायी रोजगार हासिल नहीं कर सके हैं।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5, 2019-21) के अनुसार 25 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 53 प्रतिशत पुरुष और करीब 23 प्रतिशत महिलाएं अब भी अविवाहित हैं। यह दर्शाता है कि विशेष रूप से युवकों में विवाह की आयु लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि रोजगार की अनिश्चितता और आर्थिक दबाव इस बदलाव के प्रमुख कारण हैं।

अध्ययन में भारतीय युवाओं को तीन वर्गों में बांटा गया है। पहला वर्ग कम शिक्षित और बेरोजगार युवाओं का है, जिन्हें विवाह के लिए सबसे अधिक इंतजार करना पड़ रहा है। दूसरा वर्ग शिक्षित लेकिन बेरोजगार युवाओं का है, जिनकी स्थिति भी लगभग ऐसी ही है। तीसरे वर्ग में वे युवा शामिल हैं जो शिक्षित होने के साथ स्थायी रोजगार में हैं। विवाह के लिए सबसे अधिक मांग इसी वर्ग के युवाओं की देखी गई है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बड़ी संख्या में युवा पहले नौकरी पाने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की कोशिश में उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और कौशल प्रशिक्षण में वर्षों बिताते हैं। इसके बाद ही वे विवाह के बारे में सोचते हैं। परिणामस्वरूप देश में विवाह की औसत आयु लगातार बढ़ रही है।

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि लंबे समय तक बेरोजगारी और विवाह में देरी का असर केवल सामाजिक जीवन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रभाव डालता है। बेरोजगार और लंबे समय तक अविवाहित रहने वाले युवाओं में तनाव, अवसाद, अकेलापन, आत्मविश्वास में कमी और भविष्य को लेकर निराशा जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। यदि रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं बढ़ाए गए तो आने वाले वर्षों में यह सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य की गंभीर चुनौती बन सकती है।

भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है, जहां लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। हर वर्ष लाखों युवा रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं, लेकिन गुणवत्तापूर्ण और स्थायी नौकरियों की उपलब्धता उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही। यही कारण है कि शिक्षित युवाओं में भी रोजगार को लेकर असुरक्षा बनी हुई है और विवाह जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक निर्णय लगातार टल रहे हैं।

समाजशास्त्रियों का मानना है कि विवाह का बदलता स्वरूप भारतीय समाज में आर्थिक परिस्थितियों के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है। उनका कहना है कि यदि रोजगार सृजन, कौशल विकास और युवाओं की आय सुरक्षा पर प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में विवाह की औसत आयु और बढ़ सकती है तथा अविवाहित युवाओं की संख्या में भी लगातार वृद्धि देखने को मिल सकती है। इससे पारिवारिक संरचना, सामाजिक संतुलन और जनसांख्यिकीय परिदृश्य पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ने की आशंका है।

एंडोमेट्रियल कैंसर की समय पर पहचान से बच सकती है जान, कल्याण सिंह कैंसर संस्थान में वैज्ञानिक बैठक आयोजित

 

एंडोमेट्रियल कैंसर की समय पर पहचान से बच सकती है जान, कल्याण सिंह कैंसर संस्थान में वैज्ञानिक बैठक आयोजित

लखनऊ। जून माह को एंडोमेट्रियल कैंसर जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है। इसी क्रम में कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान के गायनेकोलॉजिक ऑन्कोलॉजी विभाग द्वारा "एडवांसिंग अवेयरनेस, अर्ली डायग्नोसिस एंड प्रिसीजन ट्रीटमेंट इन एंडोमेट्रियल कैंसर" विषय पर वैज्ञानिक अपडेट बैठक आयोजित की गई। कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने महिलाओं में तेजी से बढ़ रहे एंडोमेट्रियल कैंसर के प्रति जागरूकता, समय पर पहचान और आधुनिक उपचार पद्धतियों पर विस्तार से चर्चा की।

बैठक की अध्यक्षता विभागाध्यक्ष प्रो. सबूही कुरैशी ने की। कार्यक्रम के सह-अध्यक्ष रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. शरद सिंह रहे। विशेषज्ञ व्याख्यान डॉ. रूमिता सिंह, डॉ. सौम्या गुप्ता और डॉ. अभिषेक तिवारी ने दिए। उन्होंने बताया कि एंडोमेट्रियल कैंसर गर्भाशय की अंदरूनी परत (एंडोमेट्रियम) में होने वाला कैंसर है और यह महिलाओं में पाया जाने वाला सबसे सामान्य स्त्री-रोग संबंधी कैंसरों में से एक है।

विशेषज्ञों ने बताया कि भारत में हर वर्ष हजारों महिलाओं में एंडोमेट्रियल कैंसर के नए मामले सामने आते हैं। बदलती जीवनशैली, मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हार्मोनल असंतुलन, देर से रजोनिवृत्ति और बढ़ती उम्र इसके प्रमुख जोखिम कारक हैं। यदि बीमारी शुरुआती चरण में पकड़ में आ जाए तो अधिकांश मरीजों का सफल इलाज संभव है, लेकिन देर होने पर कैंसर गर्भाशय से बाहर फैल सकता है और उपचार अधिक जटिल हो जाता है।

बैठक में बताया गया कि रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज) के बाद होने वाला किसी भी प्रकार का रक्तस्राव एंडोमेट्रियल कैंसर का सबसे महत्वपूर्ण चेतावनी संकेत हो सकता है। इसके अलावा मासिक धर्म के बीच असामान्य रक्तस्राव, लंबे समय तक अत्यधिक ब्लीडिंग, श्रोणि (पेल्विक) में लगातार दर्द या पानी जैसा असामान्य स्राव भी जांच की जरूरत का संकेत हो सकता है। ऐसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और तुरंत स्त्री रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।

विशेषज्ञों ने कहा कि आज आधुनिक जांच तकनीकों, मॉलिक्यूलर प्रोफाइलिंग, न्यूनतम चीरे वाली सर्जरी, टार्गेटेड थेरेपी और प्रिसीजन मेडिसिन की मदद से मरीजों को उनकी बीमारी के अनुरूप व्यक्तिगत उपचार उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे उपचार के परिणाम पहले की तुलना में अधिक बेहतर हुए हैं।

कार्यक्रम के अंत में विशेषज्ञों ने महिलाओं से नियमित स्वास्थ्य जांच कराने, असामान्य लक्षणों को गंभीरता से लेने और जागरूक रहने की अपील करते हुए कहा कि "अर्ली डिटेक्शन सेव्स लाइव्स" अर्थात समय पर पहचान ही जीवन बचाने का सबसे प्रभावी उपाय है।

सोमवार, 22 जून 2026

अटेवा की जनजागरण यात्रा का स्वागत, लता सचान बनीं प्रदेश सह प्रभारी

 


एसजीपीजीआई में अटेवा की जनजागरण यात्रा का स्वागत, लता सचान बनीं प्रदेश सह प्रभारी

लखनऊ। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) में अटेवा उत्तर प्रदेश के प्रदेशाध्यक्ष विजय कुमार बंधु की जनजागरण यात्रा का नर्सिंग स्टाफ एसोसिएशन (एनएसए) के नेतृत्व में भव्य स्वागत किया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में नर्सिंग अधिकारियों और स्वास्थ्यकर्मियों ने पुरानी पेंशन बहाली, निजीकरण के विरोध और कर्मचारी अधिकारों की रक्षा के आंदोलन को समर्थन देने का संकल्प लिया।

कार्यक्रम में विजय कुमार बंधु ने नर्सिंग स्टाफ एसोसिएशन की अध्यक्ष लता सचान को अटेवा उत्तर प्रदेश महिला प्रकोष्ठ का प्रदेश सह प्रभारी नियुक्त किए जाने की घोषणा की। इस अवसर पर कर्मचारियों और पदाधिकारियों ने उन्हें नई जिम्मेदारी के लिए शुभकामनाएं दीं।

अपने संबोधन में विजय कुमार बंधु ने कहा कि पुरानी पेंशन बहाली केवल कर्मचारियों की मांग नहीं, बल्कि उनके सुरक्षित भविष्य और सम्मानजनक जीवन का सवाल है। उन्होंने बताया कि प्रदेशभर में चल रही जनजागरण यात्रा को शिक्षकों, स्वास्थ्यकर्मियों, अधिवक्ताओं और विभिन्न कर्मचारी संगठनों का व्यापक समर्थन मिल रहा है।

लता सचान ने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं में बढ़ते निजीकरण और संविदाकरण का असर कर्मचारियों के साथ-साथ आम जनता पर भी पड़ रहा है। उन्होंने सभी स्वास्थ्यकर्मियों से एकजुट होकर कर्मचारी हितों की लड़ाई को मजबूत करने का आह्वान किया।

इस दौरान विजय कुमार बंधु ने 25 सितंबर को लखनऊ में प्रस्तावित विशाल कर्मचारी-शिक्षक एवं पेंशन बचाओ रैली को सफल बनाने की अपील की। कार्यक्रम में मौजूद सभी कर्मचारियों ने पुरानी पेंशन बहाली तक संघर्ष जारी रखने और रैली को ऐतिहासिक बनाने का संकल्प लिया।

कार्यक्रम में विवेक सागर, सुजान सिंह, भानु, मनोज, सुखलेश, मंजू, अश्वनी, अनुलीना, सुरेन्द्र, विकास, संदीप, अजय, दीप्ति समेत अनेक कर्मचारी और वरिष्ठ पदाधिकारी उपस्थित रहे।

रविवार, 21 जून 2026

3 वर्ष का सेवा विस्तार देकर अनुभवी कर्मचारियों को बनाए रखने की अपील

 

संजय गांधी पीजीआई कर्मचारी महासंघ ने गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु 63 वर्ष करने की मांग उठाई।


मुख्यमंत्री और राज्यपाल को भेजा ज्ञापन, 3 वर्ष का सेवा विस्तार देकर अनुभवी कर्मचारियों को बनाए रखने की अपील


पुनर्नियुक्ति की व्यवस्था समाप्त कर सभी कर्मचारियों को समान अवसर देने की मांग


लखनऊ। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान  कर्मचारी महासंघ ने संस्थान के सभी गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों (नॉन-टीचिंग स्टाफ) की  सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष से बढ़ाकर 63 वर्ष किए जाने की मांग उठाई है। इस संबंध में मुख्यमंत्री और राज्यपाल को संबोधित एक ज्ञापन भेजा गया है।

कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष धर्मेश कुमार और महामंत्री सीमा शुक्ला ने कहा कि संस्थान में शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों के बीच सेवानिवृत्ति आयु को लेकर असमानता बनी हुई है। जहां शिक्षण संकाय के कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु 65 वर्ष है, वहीं गैर-शैक्षणिक कर्मचारी केवल 60 वर्ष की आयु तक ही सेवाएं दे पाते हैं।

उन्होंने कहा कि संस्थान में बड़ी संख्या में कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं या आने वाले वर्षों में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। इसके बाद कई विभागों में कर्मचारियों की कमी को पूरा करने के लिए तीन वर्ष तक पुनर्नियुक्ति की व्यवस्था अपनाई जा रही है। महासंघ का कहना है कि नियमित कर्मचारियों को ही सीधे 63 वर्ष तक सेवा का अवसर देना अधिक व्यावहारिक और पारदर्शी व्यवस्था होगी।

धर्मेश कुमार और सीमा शुक्ला ने कहा कि गैर-शैक्षणिक कर्मचारी प्रशासनिक, तकनीकी और संस्थागत कार्यों का वर्षों का अनुभव रखते हैं। इन कर्मचारियों की विशेषज्ञता संस्थान की कार्यप्रणाली को सुचारु रूप से चलाने, नए कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने और मरीजों को बेहतर सेवाएं उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

उन्होंने यह भी कहा कि जब संस्थान के शिक्षण संकाय को 65 वर्ष, निदेशक को 68 वर्ष और कुछ कर्मचारियों को पुनर्नियुक्ति के माध्यम से 63 वर्ष तक काम करने का अवसर मिल रहा है, तो समस्त गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों को भी समान अवसर मिलना चाहिए। महासंघ ने राज्य सरकार से मांग की है कि संस्थान हित और मरीज हित को ध्यान में रखते हुए सभी नियमित गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों को 3 वर्ष का सेवा विस्तार देते हुए सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाकर 63 वर्ष की जाए।

शनिवार, 20 जून 2026

राज योग ध्यान से सर्जरी और सर्जरी के बाद मिलता है होता है फायदा

 



राज योग ध्यान से सर्जरी और सर्जरी के बाद मिलता है होता है फायदा ब्रेस्ट कैंसर सर्जरी से पहले राजयोग ध्यान से घटा तनाव, रिकवरी में भी मिला फायदा शोध में सामने आए सकारात्मक नतीजे


 


 लखनऊ। ब्रेस्ट कैंसर की सर्जरी से पहले राजयोग ध्यान (मेडिटेशन) कराने से मरीजों में मानसिक तनाव, घबराहट और तनाव बढ़ाने वाले हार्मोन कॉर्टिसोल का स्तर कम हो सकता है। केजीएमयू और कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर इंस्टीट्यूट के संयुक्त अध्ययन में यह बात सामने आई है। शोधकर्ताओं के अनुसार, राजयोग ध्यान करने वाले मरीजों में सर्जरी के बाद हार्ट रेट, ब्लड प्रेशर, सांस लेने की गति और मानसिक चिंता में भी स्पष्ट कमी देखी गई। इससे संकेत मिलता है कि यह तरीका सर्जरी के दौरान और उसके बाद मरीजों की रिकवरी को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। अध्ययन में ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित 60 महिला मरीजों को दो समूहों में बांटा गया। एक समूह को सर्जरी से पहले राजयोग ध्यान कराया गया, जबकि दूसरे समूह को सामान्य देखभाल दी गई। दोनों समूहों में सर्जरी से पहले और ऑपरेशन के दूसरे दिन चिंता का स्तर, हृदय गति, रक्तचाप, सांस लेने की दर और रक्त में मौजूद तनाव हार्मोन कॉर्टिसोल की जांच की गई। शुरुआत में दोनों समूहों की स्थिति लगभग समान थी, लेकिन सर्जरी के बाद राजयोग ध्यान करने वाले मरीजों में सभी मानकों में बेहतर परिणाम देखने को मिले। शोधकर्ताओं का कहना है कि राजयोग ध्यान एक सुरक्षित, सरल और बिना दवा वाला तरीका है, जिसे अस्पतालों में सहायक उपचार के रूप में अपनाया जा सकता है। इससे मरीजों का मानसिक तनाव कम होने के साथ सर्जरी के अनुभव को भी बेहतर बनाया जा सकता है। 


इन विशेषज्ञों ने किया शोध 


यह अध्ययन कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर इंस्टीट्यूट के एनेस्थीसियोलॉजी विभाग की डा. पी. श्रीलक्ष्मी, केजीएमयू के एनेस्थीसिया विभाग से डा. नेहा महेश्वरी, डा. नील कमल मिश्रा और एनेस्थीसियोलॉजी एवं क्रिटिकल केयर विभाग की डा. रजनी गुप्ता  जनरल सर्जरी विभाग के डा. जितेंद्र कुशवाहा और डा. गीतिका नंदा, एंडोक्राइन सर्जरी विभाग की डा. पूजा रमाकांत तथा पैथोलॉजी विभाग के डा. वाहिद अली भी इस शोध में शामिल रहे। शोध को अप्रैल 2026 में प्रकाशित होने वाले इंटरनेशनल जर्नल ऑफ योगा ने स्वीकार किया है। 


बॉक्स: पांच मिनट का आसान राजयोग अभ्यास शांत जगह पर बैठें और मोबाइल दूर रख दें। एक मिनट तक सामान्य और गहरी सांस लें। मन में दोहराएं, “मैं शांत हूं, मैं सकारात्मक ऊर्जा से भरा हूं।” एक से दो मिनट तक शांति और सुकून की कल्पना करें। अंत में गहरी सांस लेकर धीरे-धीरे आंखें खोलें। : रोज सिर्फ पांच मिनट का अभ्यास भी फायदेमंद हो सकता है। हालांकि यह चिकित्सा उपचार का विकल्प नहीं है, बल्कि डॉक्टरों के इलाज के साथ सहायक तरीके के रूप में अपनाया जाना चाहिए।

पीजीआइ में दो बच्चों को दुर्लभ कैंसर से नई जिंदगी, छह और आठ घंटे चली जटिल सर्जरी सफल

 






पीजीआइ में दो बच्चों को दुर्लभ कैंसर से नई जिंदगी, छह और आठ घंटे चली जटिल सर्जरी सफल

लखनऊ। संजय गांधी पीजीआइ के डाक्टरों ने दो बच्चों में  दुर्लभ और जटिल कैंसर का सफल इलाज कर उन्हें नई जिंदगी दी है। दोनों बच्चों की जटिल सर्जरी सफल रही और अब वे स्वस्थ होकर सामान्य जीवन की ओर लौट रहे हैं।

कैसे एक : 10 माह के शिशु के लिवर से निकाला गया कैंसर

 पेडियाट्रिक सर्जरी विभाग के प्रमुख प्रो. बसंत कुमार ने बताया कि पहला मामला अयोध्या के 10 माह के शिशु का था, जिसके पेट में लगातार बढ़ती हुई गांठ थी। जांच में पता चला कि उसे हेपेटोब्लास्टोमा नाम का लिवर कैंसर है, जिसने लिवर के 70 प्रतिशत से अधिक हिस्से को प्रभावित कर दिया था। ट्यूमर शरीर की सबसे बड़ी रक्त वाहिका आईवीसी के बेहद करीब था, जिससे ऑपरेशन चुनौतीपूर्ण बन गया था। पहले चार चक्र कीमोथेरेपी दी गई और उसके बाद करीब छह घंटे चली सर्जरी के जरिए ट्यूमर को सफलतापूर्वक निकाल दिया गया।

कैसे दो : 11 वर्षीय बच्चे की आठ घंटे चली व्हिपल सर्जरी

दूसरा मामला प्रयागराज के 11 वर्षीय बालक का था, जो पेट दर्द, बुखार, पीलिया और फीके रंग के मल की शिकायत के साथ पहुंचा था। जांच में अग्न्याशय (पैंक्रियास) के सिर में बड़ा ट्यूमर मिला, जो पित्त नली को दबा रहा था। बायोप्सी में यह ट्यूमर एसपीईएन (सॉलिड स्यूडोपैपिलरी एपिथीलियल नियोप्लाज्म) पाया गया, जो बच्चों में बेहद दुर्लभ होता है। इसके बाद करीब आठ घंटे चली जटिल व्हिपल सर्जरी (पीपीपीडी) कर ट्यूमर को सफलतापूर्वक हटा दिया गया।

दोनों सर्जरियों का नेतृत्व पीडियाट्रिक सर्जिकल सुपर स्पेशियलिटी विभागाध्यक्ष प्रो. बसंत कुमार ने किया। टीम में डा. तरुण कुमार, डा शुचि और डा

. आनंद शामिल रहे। हेपेटोब्लास्टोमा की सर्जरी में लिवर ट्रांसप्लांट यूनिट के डा. राहुल और डा. यश का विशेष सहयोग मिला, जबकि एनेस्थीसिया विभाग की डा. शिल्पी और उनकी टीम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रो. बसंत कुमार ने कहा कि बच्चों में कैंसर कम पाया जाता है, लेकिन यदि पेट में बिना दर्द की गांठ, लगातार पेट दर्द, पीलिया, बार-बार बुखार या वजन न बढ़ने जैसी शिकायतें हों तो तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे जटिल मामलों का इलाज उन्हीं केंद्रों पर होना चाहिए, जहां सभी विशेषज्ञ सुविधाएं एक ही स्थान पर उपलब्ध हों।

मेनोपॉज के बाद दोबारा ब्लीडिंग हो तो इसे नजरअंदाज न करें, यह गर्भाशय कैंसर का संकेत हो सकता है

 





मेनोपॉज के बाद दोबारा ब्लीडिंग हो तो इसे नजरअंदाज न करें, यह गर्भाशय कैंसर का संकेत हो सकता है

लखनऊ। मेनोपॉज के बाद दोबारा खून आना, माहवारी के बीच में ब्लीडिंग होना या लगातार पेट के निचले हिस्से में दर्द रहना गर्भाशय कैंसर के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत जांच करानी चाहिए, क्योंकि समय रहते बीमारी पकड़ में आने पर इसका इलाज संभव है।

इसी संदेश के साथ गर्भाशय कैंसर जागरूकता माह के तहत शनिवार को एसजीपीजीआई के एच.जी. खुराना ऑडिटोरियम में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में निदेशक पद्मश्री प्रो. आर.के. धीमन, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रो. देवेंद्र गुप्ता और प्रो. अंजू रानी ने गर्भाशय कैंसर से ठीक हो चुकी महिलाओं (वॉरियर्स) को सम्मानित किया। इन महिलाओं ने अपनी कहानी साझा कर दूसरों को समय पर जांच कराने के लिए प्रेरित किया। कार्यक्रम में करीब 250 महिलाओं ने हिस्सा लिया। आयोजन में डॉ. अंजू रानी, डॉ. इंदुलता साहू, डॉ. सुषमा, डॉ. निधि सिंह और जनरल हॉस्पिटल के चिकित्सकों की अहम भूमिका रही।

पीजीआई में 'मास्टर शेफ पीजीआई-2

 


पीजीआई में 'मास्टर शेफ पीजीआई-2' का आयोजन, डॉक्टरों और उनके परिवारों ने दिखाई पाक कला की प्रतिभा

लखनऊ। संजय गांधी पीजीआइ में फैकल्टी क्लब के तत्वावधान में 'मास्टर शेफ पीजीआई-2' का  आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विभिन्न विभागों के डॉक्टरों और उनके परिवार के सदस्यों ने उत्साहपूर्वक भाग लेकर अपनी पाक कला और रचनात्मकता का प्रदर्शन किया।

प्रतियोगिता में न्यूरोसर्जरी विभाग के डॉ. अनंत, गायनोकोलॉजी विभाग की डॉ. आँचल, पैथोलॉजी विभाग की डॉ. विदुषी और हीमेटोलॉजी विभाग की डॉ. रुचि को उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए 'मास्टर शेफ' के खिताब से सम्मानित किया गया।

बच्चों की श्रेणी में अनुषा को 'यंग शेफ अवॉर्ड' प्रदान किया गया, जबकि पीहू, अनाईशा और ईशान को 'मास्टर शेफ किड्स' पुरस्कार से नवाजा गया। वहीं आकर्षक प्रस्तुति और सृजनात्मकता के लिए सानवी और वासविक को 'बेस्ट प्रेजेंटेशन अवॉर्ड' दिया गया।

कार्यक्रम के निर्णायक मंडल में एमएलआरएसएम इंस्टीट्यूट के हेड शेफ मानव पाल, डॉ. मंजूषा, डॉ. बृजेश सिंह और शेफ खुशबू शामिल रहे। उन्होंने विजेताओं को सम्मानित करते हुए प्रतिभागियों की सराहना की।

खून की जांच से पहले ही पकड़ में आ सकता है अग्नाशय कैंसर, एसजीपीजीआई के शोध से जगी नई उम्मीद

 



खून की जांच से पहले ही पकड़ में आ सकता है अग्नाशय कैंसर, एसजीपीजीआई के शोध से जगी नई उम्मीद


लखनऊ। अग्नाशय कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी की पहचान अब सिर्फ खून की जांच से शुरुआती दौर में करने का रास्ता खुल सकता है। संजय गांधी पीजीआई, किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी और मेदांता अस्पताल के वैज्ञानिकों के एक संयुक्त शोध में शरीर में होने वाले ऐसे बदलावों का पता चला है, जिनकी मदद से भविष्य में बीमारी का पता काफी पहले लगाया जा सकेगा।

यह शोध अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुआ है।

एसजीपीजीआई के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के प्रो. गौरव पांडे ने बताया कि अग्नाशय कैंसर की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इसके लक्षण बहुत देर से सामने आते हैं। पेट दर्द, वजन कम होना या भूख कम लगना जैसे लक्षण तब दिखाई देते हैं, जब बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है। यही वजह है कि मरीजों का इलाज भी अक्सर देर से शुरू हो पाता है।

उन्होंने बताया कि इस अध्ययन में 35 अग्नाशय कैंसर मरीजों और 21 स्वस्थ लोगों समेत कुल 56 लोगों के खून के नमूनों का अध्ययन किया गया। मरीजों के नमूने इलाज शुरू होने से पहले लिए गए, ताकि बीमारी से जुड़े वास्तविक बदलावों को समझा जा सके।

शोध में खून में मौजूद छोटे-छोटे रासायनिक पदार्थों का विशेष तकनीक से विश्लेषण किया गया। इससे पता चला कि अग्नाशय कैंसर के मरीजों के शरीर में ऊर्जा बनाने और उसका इस्तेमाल करने का तरीका सामान्य लोगों से अलग हो जाता है।

अध्ययन में पाया गया कि मरीजों में अमीनो अम्ल का स्तर करीब 12 प्रतिशत कम था, जबकि ग्लूकोज और लैक्टेट जैसे ऊर्जा से जुड़े पदार्थों का स्तर करीब 57 प्रतिशत अधिक था। इसका मतलब है कि कैंसर कोशिकाएं तेजी से बढ़ने के लिए ज्यादा ऊर्जा जुटाने लगती हैं।

शोध में एलानिन, आइसोल्यूसिन और वेलिन नाम के तीन महत्वपूर्ण जैविक संकेतकों की पहचान हुई, जो भविष्य में बीमारी का पता लगाने में मददगार साबित हो सकते हैं।

प्रो. गौरव पांडे ने बताया कि यह अभी शुरुआती स्तर का शोध है और इसे अधिक मरीजों पर परखने की जरूरत है। अगर आगे भी ऐसे ही परिणाम मिलते हैं तो भविष्य में बिना दर्द, बिना सर्जरी और बिना जटिल जांच के सिर्फ खून की जांच से अग्नाशय कैंसर की शुरुआती पहचान करना संभव हो सकता है। इससे मरीजों का इलाज जल्दी शुरू होगा और उनके ठीक होने की संभावना बढ़ेगी।

शोध दल में किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के डॉ. सुधीर कुमार शेखर और डॉ. दिलुतपाल शर्मा, एसजीपीजीआई के जैव चिकित्सा अनुसंधान केंद्र से डॉ. उमेश कुमार और डॉ. आशीष गुप्ता, मेदांता अस्पताल के डॉ. अभय वर्मा तथा एसजीपीजीआई के प्रो. गौरव पांडे शामिल रहे।


शुक्रवार, 19 जून 2026

कैंसर संस्थान में तीमारदारों को मिलेगा निःशुल्क पौष्टिक भोजन, 'अपनी थाली' योजना शुरू

 

कैंसर संस्थान में तीमारदारों को मिलेगा निःशुल्क पौष्टिक भोजन, 'अपनी थाली' योजना शुरू

लखनऊ। मरीजों के साथ अस्पताल में रहने वाले तीमारदारों को अब कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान में निःशुल्क पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जाएगा। इसके लिए गुरुवार को संस्थान, आरएवीसी फाउंडेशन और शारदा वेलफेयर सोसायटी के बीच त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए।

समझौते के तहत "अपनी थाली" योजना संचालित की जाएगी। इसके जरिए मरीजों के परिजनों और तीमारदारों को संस्थान परिसर में ही स्वच्छ, पौष्टिक और संतुलित भोजन सम्मानपूर्वक उपलब्ध कराया जाएगा।

समझौता ज्ञापन पर संस्थान के निदेशक प्रो. एम.एल.बी. भट्ट, आरएवीसी फाउंडेशन के निदेशक रोहित पाण्डेय और शारदा वेलफेयर सोसायटी के अध्यक्ष अतुल तिवारी ने हस्ताक्षर कर दस्तावेजों का आदान-प्रदान किया।

योजना के तहत आरएवीसी फाउंडेशन अपनी कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) गतिविधि के अंतर्गत आर्थिक सहयोग देगा, जबकि शारदा वेलफेयर सोसायटी संस्थान परिसर में निर्धारित स्थान पर भोजन वितरण की व्यवस्था संभालेगी।

संस्थान प्रशासन का कहना है कि अस्पताल में लंबे समय तक भर्ती मरीजों के साथ रहने वाले परिजनों को भोजन की व्यवस्था को लेकर कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में संस्थान परिसर में ही भोजन उपलब्ध होने से उन्हें मानसिक संतोष मिलेगा और वे अपने मरीजों की बेहतर देखभाल कर सकेंगे।

संस्थान के निदेशक प्रो. एम.एल.बी. भट्ट ने कहा कि मरीजों के साथ रहने वाले तीमारदारों की सुविधा और उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी संस्थान की प्राथमिकता है। "अपनी थाली" जैसी पहल जरूरतमंद परिवारों को राहत देने के साथ कठिन समय में सम्मानजनक और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराकर मानव सेवा की भावना को मजबूत करेगी।

कार्यक्रम में संस्थान के डीन डॉ. प्रमोद कुमार गुप्ता, चिकित्सा अधीक्षक डॉ. वरुण विजय, कार्यपालक कुलसचिव डॉ. आयुष लोहिया, फूड इंचार्ज डॉ. गीतिका पंत, अनुसंधान एवं अकादमिक सलाहकार डॉ. एस. श्रीवास्तव तथा आरएवीसी फाउंडेशन के संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी राम अनुज वर्मा सहित संस्थान और संबंधित संस्थाओं के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

कैंसर संस्थान में खुलेगा प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि केंद्र, मरीजों को सस्ती दरों पर मिलेंगी दवाएं



कैंसर संस्थान में खुलेगा प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि केंद्र, मरीजों को सस्ती दरों पर मिलेंगी दवाएं

लखनऊ। कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान में जल्द ही प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि केंद्र शुरू किया जाएगा। इसके लिए गुरुवार को संस्थान, बी-पैक्स सोनई कजेरहा और सूर्य देव लक्ष्मी मेमोरियल चैरिटेबल ट्रस्ट के बीच त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए।

इस पहल का उद्देश्य कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों के मरीजों को गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाएं किफायती दरों पर उपलब्ध कराना है, जिससे उनके इलाज पर होने वाला आर्थिक बोझ कम किया जा सके।

समझौता ज्ञापन पर संस्थान के निदेशक प्रो. एम.एल.बी. भट्ट, बी-पैक्स सोनई कजेरहा के सचिव अभिषेक सहाय और सूर्य देव लक्ष्मी मेमोरियल चैरिटेबल ट्रस्ट की मुख्य ट्रस्टी अलका सिंह ने हस्ताक्षर कर दस्तावेजों का आदान-प्रदान किया।

प्रस्तावित प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि केंद्र संस्थान परिसर में संचालित होगा और भारत सरकार की प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना के दिशा-निर्देशों के अनुरूप काम करेगा। इस योजना के तहत मरीजों को बाजार में उपलब्ध ब्रांडेड दवाओं की तुलना में काफी कम कीमत पर गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।

संस्थान के निदेशक प्रो. एम.एल.बी. भट्ट ने कहा कि यह केंद्र विशेष रूप से कैंसर रोगियों और लंबे समय तक इलाज करा रहे मरीजों के लिए काफी लाभकारी साबित होगा। उन्हें एक ही परिसर में गुणवत्तापूर्ण दवाएं सस्ती दरों पर मिल सकेंगी। यह पहल मरीज-केंद्रित, सुलभ और किफायती स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की संस्थान की प्रतिबद्धता को और मजबूत करेगी।

बी-पैक्स सोनई कजेरहा और सूर्य देव लक्ष्मी मेमोरियल चैरिटेबल ट्रस्ट के प्रतिनिधियों ने भरोसा दिलाया कि सभी आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी होते ही जनऔषधि केंद्र शुरू कर दिया जाएगा और गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाओं की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी।

अधिकारियों ने बताया कि यह समझौता सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देने तथा जरूरतमंद मरीजों तक आवश्यक दवाओं की पहुंच आसान बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

इस अवसर पर संस्थान के डीन डॉ. प्रमोद कुमार गुप्ता, चिकित्सा अधीक्षक डॉ. वरुण विजय, कार्यपालक कुलसचिव डॉ. आयुष लोहिया, वित्त अधिकारी उपेंद्र तिवारी, अनुसंधान एवं अकादमिक सलाहकार डॉ. एस. श्रीवास्तव तथा सूर्य देव लक्ष्मी मेमोरियल चैरिटेबल ट्रस्ट के उपाध्यक्ष पीयूष अग्रवाल सहित संस्थान और संबंधित संस्थाओं के वरिष्ठ अधिकारी  मौजूद रहे।

मंगलवार, 16 जून 2026

फेफड़ों का संक्रमण बिगाड़ सकता है शरीर की चाल


फेफड़ों का संक्रमण बिगाड़ सकता है शरीर की चाल


  समय पर इलाज से 83 फीसदी मरीज हुए ठीक


 संक्रमण के बाद दिमाग और नसों पर भी पड़ सकता है असर


कुमार संजय

 आमतौर पर फेफड़ों के संक्रमण का कारण माना जाने वाला माइकोप्लाज्मा निमोनिए कुछ मामलों में दिमाग और तंत्रिका तंत्र को भी प्रभावित कर सकता है। इससे मरीज का चलना-फिरना डगमगा सकता है, शरीर में अचानक झटके आ सकते हैं और आंखों की हरकतें भी असामान्य हो सकती हैं। अच्छी बात यह है कि समय रहते बीमारी की पहचान और सही इलाज मिलने पर अधिकांश मरीज पूरी तरह या लगभग पूरी तरह ठीक हो जाते हैं। यह नई जानकारी  अंतरराष्ट्रीय शोधों के समीक्षा अध्ययन में सामने आयी  है। इस समीक्षा अध्ययन को मूवमेंट डिश ऑर्डर क्लिनिकल प्रैक्टिस मेडिकल जर्नल ने स्वीकार किया है। 

रिपोर्ट के मुताबिक शोधकर्ताओं ने दुनिया भर में हुए 42 मरीजों के मामलों का विश्लेषण किया। इनमें करीब 69 फीसदी मरीजों में दिमाग और नसों से जुड़ी परेशानी शुरू होने से पहले सर्दी, खांसी या फेफड़ों के संक्रमण के लक्षण मिले। सबसे अधिक मरीजों में सेरिबेलर एटैक्सिया पाया गया। इस स्थिति में व्यक्ति का संतुलन बिगड़ जाता है और चलने-फिरने में परेशानी होती है। वहीं करीब 26 फीसदी मरीजों में ऑप्सोक्लोनस-मायोक्लोनस-एटैक्सिया सिंड्रोम पाया गया, जिसमें आंखें तेजी से अनियंत्रित रूप से घूमती हैं, शरीर में झटके आते हैं और चलने में दिक्कत होती है।



संक्रमण के बाद शरीर की प्रतिक्रिया बनती है वजह



 अधिकतर मामलों में परेशानी सीधे संक्रमण से नहीं, बल्कि संक्रमण के बाद शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली की असामान्य प्रतिक्रिया के कारण होती है। कई मरीजों की जांच रिपोर्ट सामान्य मिली, जबकि कुछ में दिमाग के संतुलन नियंत्रित करने वाले हिस्से में बदलाव देखे गए।


सही समय पर इलाज मिले तो ठीक होने की संभावना ज्यादा



करीब 36 फीसदी मरीजों का इलाज केवल एंटीबायोटिक दवाओं से किया गया, जबकि 45 फीसदी मरीजों को एंटीबायोटिक के साथ प्रतिरक्षा प्रणाली को नियंत्रित करने वाली दवाएं भी दी गईं। अध्ययन में पाया गया कि 83.4 फीसदी मरीज पूरी तरह या लगभग पूरी तरह स्वस्थ हो गए।


सलाह


संजय गांधी पीजीआइ के तंत्रिका तंत्र रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर विमल कुमार पालीवाल का कहना है कि इस तरह के मामले हम लोगों के पास आते हैं। फेफड़ों के संक्रमण के बाद किसी व्यक्ति को अचानक चलने में लड़खड़ाहट, संतुलन बिगड़ने, शरीर में झटके आने या आंखों की असामान्य हरकत जैसी समस्याएं हों तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर जांच और इलाज से मरीज को गंभीर दिक्कतों से बचाया जा सकता है।


प्रमुख बातें

-42 मरीजों के मामलों का किया गया विश्लेषण

-69 फीसदी मरीजों में पहले फेफड़ों का संक्रमण मिला

-सबसे ज्यादा मामले सेरिबेलर एटैक्सिया के पाए गए

-83.4 फीसदी मरीज पूरी तरह या लगभग पूरी तरह स्वस्थ हुए


इन्होंने किया अध्ययन


अध्ययन में इरा लखनऊ मेडिकल कॉलेज के  तंत्रिका तंत्र विशेषज्ञ डा. रविंद्र कुमार गर्ग, किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय की तंत्रिका तंत्र विशेषज्ञ  डा. श्वेता पांडेय, एम्स रायबरेली की  प्रो. अमिता जैन, डा. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान की मेडिसिन विभाग की डा. ऋतु करौली, संजय गांधी पीजीआइ के तंत्रिका तंत्र विशषज्ञ प्रो. विमल कुमार पालीवाल और टीएस मिश्रा मेडिकल कॉलेज के पलमोनरी मेडिसिन के डा. संजय सिंघल शामिल रहे।

शनिवार, 13 जून 2026

खून लैब में नहीं बनता इसलिए करें डोनेट



खून देने से नहीं आती है कमजोरी शरीर करता है भरपाई


किसी की ज़िंदगी बचाने की सबसे आसान कोशिश यह हो सकती है कि हम अपना ब्लड डोनेट करें। इसे महादान कहते हैं क्योंकि सिर्फ एक यूनिट खून दान देकर भी हम 3 से 4 लोगों की ज़िंदगी बचा सकते हैं। ज्यादा नहीं तो 3-4 महीने में एक बार ब्लड डोनेट किया जा सकता है। 




अगर आपने अब तक ब्लड डोनेट नहीं किया है तो एक बार ज़रूर करें। यकीन मानें, बहुत ही ज्यादा खुशी मिलेगी। शरीर में डोपामाइन (हैपी हार्मोन) रिलीज होगा। मन चंगा रहेगा। वैसे भी हमारा शरीर उस खून के बदले उतना ही हीमोग्लोबिन महज 15 से 20 मिनट में तैयार कर लेता है। ऐसा भी नहीं है कि बहुत कमज़ोरी आती हो। लेकिन ब्लड डोनेशन से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है।


खून लैब में नहीं बनता इसलिए करें डोनेट

संजय गांधी पीजीआई के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग के प्रो प्रशांत कहते है कि इंसान के शरीर को खून की ज़रूरत हो तो इंसानी खून ही चढ़ेगा। किसी जानवर का खून तो चढ़ नहीं सकता। वहीं, इंसानी खून को बाहर यानी कहीं लैब आदि में नहीं बना सकते। जब किसी के शरीर में खून की कमी होती है तो दवा भी ऐसी दी जाती है जिससे कि शरीर में खून बनने की प्रक्रिया तेज हो। हमारे शरीर में ज्यादातर खून का निर्माण हमारी हड्डियों में मौजूद बोन मैरो में होता है। इसलिए अगर किसी शख्स की जान बचाने के लिए खून की ज़रूरत है तो वह खून कहीं और से नहीं आ सकता। उसे कोई दूसरा शख्स डोनेट करके ही पूरा कर सकता है। इसलिए ब्लड डोनेट करना ज़रूरी है। सीधे शब्दों में कहें तो खून का कोई दूसरा सोर्स नहीं है। हमारे शरीर को जब इसकी ज़रूरत होती है तो दूसरे का शरीर ही इसे पूरा कर सकता है।


ब्लड डोनेट करने से हमें भी फायदा

कल्याण सिंह कैंसर संस्थान के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग की पमुख

 प्रोफेसर अंजू दुबे के मताबिक- ब्लड डोनेट करने से शरीर में आयरन की मात्रा सही बनी रहती है।

- यह दिल के लिए भी फायदेमंद है और दिल को तसल्ली भी मिलती है कि चलो, हम किसी के काम आए।  

-कई तरह की जांच मुफ्त में हो जाती हैं क्योंकि जब कोई शख्स ब्लड डोनेट करने जाता है तो पहले उसके ब्लड की जांच की जाती है। इनमें CBC (हीमोग्लोबिन आदि देखने के लिए), HIV, HCV, HBSAG, SYPHILIS, MALARIA शामिल हैं। इससे यह तसल्ली की जाती है कि वह शख्स इन्फेक्शन फ्री है।  


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ये लोग कर सकते हैं ब्लड डोनेट  

-उम्र 18 से 65 साल के बीच हो।

-वज़न कम से कम 45-50 किलोग्राम हो, साथ ही हीमोग्लोबिन कम से कम 12.5 g/dL हो। 

-बीपी, पल्स रेट और बॉडी टेंपरेचर सामान्य हों। 

-जिस दिन वह ब्लड डोनेट करने गया हो उसे फीवर, इन्फेक्शन आदि न हो। 

-पुरुष हर 3 महीने (90 दिन) बाद और महिलाएं सामान्यतया 4 महीने (120 दिन) बाद ही दोबारा रक्तदान कर सकती हैं।


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कौन-कौन ब्लड डोनेट नहीं कर सकता?

एक सेहतमंद लोग ही ब्लड डोनेट कर सकते हैं। लेकिन ऐसा शख्स ब्लड डोनेट नहीं कर सकता:

-जो HIV पॉज़िटिव हो

-जिसे हेपेटाइटिस B या C इन्फेक्शन हुआ हो

- जो ड्रग्स लेता हो

-जो सेक्स वर्कर हो

-ज्यादातर मामलों में कैंसर, लिवर, हार्ट, किडनी, ब्रेन या लंग्स के मरीज 


ये भी न करें रक्तदान

-सर्दी, खांसी, बुखार या इन्फेक्शन हो (ठीक होने के 1 से 2 हफ्ते बाद कर सकते हैं।) 

-कोई ऐंटिबायोटिक दवा ले रहे हों (ठीक होने के 1 से 2 हफ्ते बाद कर सकते हैं।)

-हाल में मलेरिया, डेंगू या चिकनगुनिया हुआ हो (अमूमन 3 महीने या इससे ज्यादा समय बाद कर सकते हैं।)

-डेंगू के मामले में यह टाइमलाइन 6 महीने बाद की है। तब जब प्लेटलेट्स आदि सामान्य हो गई हों।

-अगर किसी ने परमानेंट टैटू बनवाया है या शरीर का कोई अंग छिदवाया है तो वह करीब 1 साल तक ब्लड डोनेट नहीं कर सकता। 

-दांत निकलवाया हो। अगर उसमें इन्फेक्शन नहीं है तो 3 से 7 हफ्ते बाद कर सकते हैं। 

-छोटी सर्जरी हुई हो तो करीब 3 महीने बाद ब्लड डोनेट कर सकते हैं।

-हाल ही में ब्लड चढ़ाया गया हो तो अमूमन एक साल तक ब्लड डाेनेट नहीं कर सकते। 

-हेपेटाइटिस, थायरॉयड या हॉर्मोंस असंतुलन, जेनेटिक डिसऑर्डर और डिप्रेशन की दवा खाते हों।

-अगर किसी को शुगर है, लेकिन वह काबू में हो। साथ ही वह अभी ओरल दवा ही ले रहा हो यानी इंसुलिन इंजेक्शन लेना शुरू न किया हो तो वह ब्लड डोनेट कर सकता है। 


महिलाएं तब नहीं कर सकतीं डोनेट

-प्रेग्नेंसी के दौरान 

-डिलीवरी के बाद कुछ महीनों बाद तक

-ब्रेस्ट फीड कराती हों तो 

-चूंकि 90 फीसदी महिलाओं को एनीमिया रहता है यानी खून की कमी रहती है। उनका ब्लड लेवल नॉर्मल से नीचे यानी 8-10 या 11 की रेंज तक रहता है, इसलिए महिलाओं को ब्लड डोनेट करने से मना किया जाता है। अगर किसी महिला का हीमोग्लोबिन लेवल सही स्तर पर हो 

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कमज़ोरी नहीं आती, शरीर ऐसे करता है भरपाई

प्रो अतुल सोनकर कहते है कि कई लोग इस बात से डरते हैं कि ब्लड डोनेट करने के बाद शरीर में खून की कमी हो जाती है जबकि ऐसा नहीं होता। एक बार में अमूमन एक यूनिट ब्लड डोनेट किया जाता है। इस 1 यूनिट में करीब 350ml ब्लड होता। इतना खून अमूमन कुछ मिनट से कुछ घंटों में ही तैयार हो जाता है, खासकर प्लाज्मा सबसे पहले। 


प्लाज्मा चंद मिनटों में बनना शुरू

खून के सबसे बड़े घटक प्लाज्मा (ब्लड का लिक्विड पार्ट) की भरपाई बहुत जल्द शुरू होती है। खून का लगभग 55% हिस्सा प्लाज्मा होता है। ब्लड डाेनेट करने के महज 15-20 मिनटों के भीतर ही शरीर आसपास के टिश्यू और ब्लड कैपिलरीज़ (खून की नलियों) से पानी खींचकर खून की मात्रा को सामान्य करने लगता है। करीब 24 घंटे में काफी हद तक सुधार हो जाता है। वहीं, 48 घंटे के भीतर ज्यादातर प्लाज्मा वापस आ जाता है। यही वजह है कि ब्लड डोनेट करने के बाद पानी पीने की सलाह दी जाती है। ऐसा भी नहीं होता कि प्लाज्मा बनना शुरू हो तो आरबीसी, प्लेटलेट्स, आयरन आदि बनना रुक जाता हो, ये सभी साथ-साथ बनने शुरू होते हैं। हां, जिसके बनने की प्रक्रिया में कम वक्त लगता है, वह पहले तैयार हो जाता है। 


प्लेटलेट्स और क्लॉटिंग फैक्टर्स

ब्लड डोनेशन के बाद बोन मैरो प्लेटलेट्स का उत्पादन बढ़ा देता है। प्लेटलेट्स की भरपाई आमतौर पर 2-5 दिनों में हो जाती है। क्लॉटिंग फैक्टर्स भी कुछ दिनों में सामान्य स्तर पर लौट आते हैं।


RBC: लाल रक्त कोशिकाएं तब बननी शुरू होती हैं...

ब्लड डोनेशन के कुछ घंटों के भीतर किडनी से एरिथ्रोपोइटिन (EPO) हार्मोन का स्राव बढ़ता है। यह हार्मोन बोन मैरो को नई RBCs बनाने का संकेत देता है। यह एक सामान्य प्रक्रिया है। इससे 3-5 दिनों में नई RBCs बनने की गति बढ़ जाती है। महज 1-2 सप्ताह में रेटिकुलोसाइट्स (अपरिपक्व RBCs) बढ़ी हुई मात्रा में दिखाई देने लगती हैं।

इसलिए जब किसी की किडनी पूरी तरह काम नहीं करती तो उसे बाहर से एरिथ्रोपोइटिन (EPO) हार्मोन का इंजेक्शन बार-बार लगाना पड़ता है।  


हीमोग्लोबिन 1-2 महीने में पुराने स्तर पर

एक यूनिट (350-450mL) ब्लड डोनेट करने के बाद हीमोग्लोबिन में सामान्यतः 1-1.5 g/dL की गिरावट आ सकती है। ज्यादातर सेहतमंद लोगों में हीमोग्लोबिन 4-8 सप्ताह (करीब 1 से 2 महीने में) में पुराने वाले लेवल के करीब पहुंच जाता है। इसलिए हमारे देश में एक बार ब्लड डोनेशन के बाद दूसरे के बीच लगभग 3 महीने का फर्क रखा जाता है।


आयरन की भरपाई सबसे धीमी 

एक यूनिट ब्लड डोनेट करने के बाद करीब 200-250mg आयरन शरीर से निकल जाता है। नई RBCs बनाने के लिए शरीर को यही आयरन वापस जुटाना पड़ता है। अगर वह शख्स सही डाइट ले। आयरन से भरपूर भोजन करे जिसमें दालें, हरी पत्तेदार सब्जियां, गुड़, तिल, सोया, राजमा आदि हो तो यह कमी महज 2 से 3 महीने में पूरी हो जाती है। 

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आपका ब्लड ग्रुप क्या है?

- ब्लड के चार मुख्य ग्रुप A, B, O और AB होते हैं। ये सभी ग्रुप प्लस और माइनस में होते हैं। इन ग्रुप के सब ग्रुप जैसे बॉम्बे ब्लड ग्रुप (hh): A1, A2, Ax, AeL आदि भी होते हैं। ये आम नहीं होते और इन्हें रेयर ब्लड ग्रुप कहा जाता है। वहीं, 'O' ग्रुप यूनिवर्सल डोनर है। इस ग्रुप के खून को सभी ग्रुप के लोगों को चढ़ाया जा सकता है। अगर इमरजेंसी है और ब्लड ग्रुप जानने का वक्त नहीं है तो तो O ग्रुप का ब्लड चढ़ा सकते हैं। 


खुद के लिए भी करें डोनेट

अगर किसी शख्स की कोई ऐसी सर्जरी पहले से तय है जिसमें खून की जरूरत पड़ेगी, तो ऐसे में वह शख्स सर्जरी से पहले ही अपने खून को निकलवाकर स्टोर करवा सकता है। इस प्रक्रिया को ऑटोलोगस ब्लड डोनेशन कहते हैं। 

 

ब्लड डोनेशन के बाद...

-अच्छे से पानी पी लें। फिर 30 से 40 मिनट आराम करें। अगर हल्का-फुल्का सिर दर्द हो भी आराम करें।

    -किसी भी तरह का भारी काम जैसे- डांस, रनिंग, जिम आदि न करें। बेहतर होगा आधे घंटे तक ड्राइव भी न करें।

-अभी गर्मी का मौसम है। बाहर तेज़ धूप होती है। इसलिए ब्लड डोनेशन के बाद फौरन ही धूप में न निकलें।

- ऐसा फ्रूट जूस या फूड जैसे बिस्किट आदि लें जिसमें शुगर की मात्रा ज्यादा हो। इससे ब्लड शुगर लेवल जल्दी ही नॉर्मल हो जाता है। 

-24 घंटे बाद तक न तो शराब पीएं और न ही स्मोकिंग करें।


- हर तीन घंटे में हेल्दी डाइट लें। बेहतर होगा कि अनार का जूस लें।



हार्ट फेलियर का खतरा पहले ही बताएंगे पांच रिस्क स्कोर

 





 हार्ट फेलियर का खतरा पहले ही बताएंगे पांच रिस्क स्कोर




 पीजीआइ और एससीटीआईएमएस के अध्ययन में भारतीय मरीजों पर भी साबित हुई उपयोगिता


 कुमार संजय


 हार्ट फेलियर जैसी गंभीर हृदय बीमारी का खतरा अब पहले ही पहचाना जा सकेगा। संजय गांधी गांधी पीजीआइ और तिरुवनंतपुरम के श्री चित्रा तिरुनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी (एससीटीआईएमएस) के विशेषज्ञों के अध्ययन में पाया गया है कि पांच अंतरराष्ट्रीय रिस्क स्कोर भारतीय मरीजों में भी हार्ट फेलियर के जोखिम, दोबारा अस्पताल में भर्ती होने की आशंका और मृत्यु के खतरे का सटीक आकलन कर सकते हैं। इन स्कोरों को नियमित चिकित्सा अभ्यास का हिस्सा बनाकर उच्च जोखिम वाले मरीजों की समय रहते पहचान की जा सकती है, जिससे जटिलताओं और मृत्यु दर को कम करने में मदद मिलेगी। शोध को इंडियन हार्ट जर्नल ने स्वीकार किया है। ढाई साल तक चले शोध में 280 मरीजों को शामिल किया गया। इनमें कुछ मरीज ऐसे थे जिनमें हार्ट फेलियर होने का जोखिम था, जबकि कुछ पहले से इस बीमारी से ग्रस्त थे। शोधकर्ताओं ने करीब 30 महीने तक इन मरीजों का फॉलोअप किया। इस दौरान जोखिम वाले समूह के लगभग 32 प्रतिशत मरीजों में नया हार्ट फेलियर विकसित हुआ। वहीं पहले से हार्ट फेलियर से पीड़ित मरीजों में 37 प्रतिशत को दोबारा अस्पताल में भर्ती होना पड़ा और करीब नौ प्रतिशत मरीजों की मृत्यु हुई।




 पांच अंतरराष्ट्रीय स्कोरों की परखी गई सटीकता




 शोध में हेल्थ एबीसी , टीआरएस-एचएफडीएम , लेस इंडेक्स , मैजिक और एच2एफपीईएफ जैसे पांच स्थापित अंतरराष्ट्रीय रिस्क स्कोर का मूल्यांकन किया गया। इनका उपयोग दुनिया के विभिन्न देशों में हार्ट फेलियर के जोखिम का अनुमान लगाने के लिए किया जाता है। अलग-अलग मरीजों में अलग स्कोर रहे प्रभावी हेल्थ एबीसी स्कोर भविष्य में हार्ट फेलियर विकसित होने के जोखिम का बेहतर अनुमान देता है। मधुमेह से पीड़ित मरीजों में टीआरएस-एचएफडीएम स्कोर अधिक उपयोगी साबित हुआ। वहीं लेस इंडेक्स दोबारा भर्ती होने और मृत्यु के खतरे की पहचान करने में सबसे प्रभावी पाया गया। मैजिक और एच2एफपीईएफ स्कोर भी जोखिम का आकलन करने में उपयोगी रहे।




 कैसे तैयार होते हैं ये स्कोर ये रिस्क स्कोर




 मरीज की उम्र, रक्तचाप, मधुमेह, किडनी की कार्यक्षमता, हृदय की पंपिंग क्षमता, सांस फूलने या शरीर में सूजन जैसे लक्षण, रक्त जांच और अस्पताल में भर्ती होने के इतिहास जैसी जानकारियों के आधार पर तैयार किए जाते हैं। विभिन्न कारकों को अंक देकर कुल स्कोर निकाला जाता है, जिससे मरीज के जोखिम स्तर का निर्धारण किया जाता है।




 समय रहते हो सकेगी पहचान




 इन स्कोरों के नियमित उपयोग से ऐसे मरीजों की पहचान पहले ही की जा सकती है, जिनमें हार्ट फेलियर या उससे जुड़ी जटिलताओं का खतरा अधिक है। इससे चिकित्सक मरीजों की निगरानी बढ़ाकर समय पर उपचार शुरू कर सकेंगे और गंभीर परिणामों को रोकने में मदद मिलेगी।




 इन्होंने किया शोध 




पीजीआइ कार्डियोलॉजी विभाग के डॉ. अनुपम कुमार, डॉ. आदित्य कपूर, डॉ. एस. हरिकृष्णन, डॉ. अर्पिता काथेरिया, डॉ. हर्षित खरे, डॉ. अरशद नजीर, डॉ. अंकित कुमार साहू, डॉ. रूपाली खन्ना, डॉ. सुदीप कुमार, डॉ. नवीन गर्ग और डॉ. सत्येंद्र तिवारी ने किया। अध्ययन में एससीटीआईएमएस, तिरुवनंतपुरम के विशेषज्ञ भी शामिल रहे।

शुक्रवार, 12 जून 2026

स्तन कैंसर सर्जरी के बाद मरीजों को मिलेगा बेहतर पुनर्वास, केएसएसएससीआई ने अस्तित्व फाउंडेशन से किया समझौता

 


स्तन कैंसर सर्जरी के बाद मरीजों को मिलेगा बेहतर पुनर्वास, केएसएसएससीआई ने अस्तित्व फाउंडेशन से किया समझौता

महिलाओं की जीवन गुणवत्ता सुधारने के लिए शुरू होगी समन्वित पुनर्वास व्यवस्था


लखनऊ। स्तन कैंसर सर्जरी के बाद मरीजों को बेहतर पुनर्वास सुविधा उपलब्ध कराने के लिए किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान (केएसएसएससीआई) ने अस्तित्व फाउंडेशन के साथ महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं। इस पहल से स्तन कैंसर का इलाज करा चुकी महिलाओं को शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से सामान्य जीवन में लौटने में मदद मिलेगी।

संस्थान के निदेशक प्रो. एम.एल.बी. भट्ट और अस्तित्व फाउंडेशन के प्रोजेक्ट मैनेजर मयंक शुक्ला के बीच हुए इस समझौते के तहत संस्थान में ब्रेस्ट कैंसर सर्जरी रिहैबिलिटेशन क्लीनिक के संचालन के लिए समन्वित कार्यप्रणाली विकसित की जाएगी। इसके माध्यम से सर्जरी के बाद मरीजों के पुनर्वास, परामर्श, फिजियोथेरेपी, कृत्रिम स्तन (प्रोस्थेसिस) संबंधी सहायता और जीवन की गुणवत्ता सुधारने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

विशेषज्ञों के अनुसार स्तन कैंसर सर्जरी के बाद कई महिलाओं को हाथों में सूजन, कंधे की जकड़न, शारीरिक असहजता और आत्मविश्वास में कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। नया कार्यक्रम इन चुनौतियों को कम करने में मदद करेगा और मरीजों को अधिक सम्मानजनक एवं आत्मनिर्भर जीवन जीने का अवसर देगा।

प्रो. भट्ट ने कहा कि यह सहयोग संस्थान में चल रहे ब्रेस्ट रिहैबिलिटेशन एवं प्रोस्थेसिस कार्यक्रम को और सशक्त बनाएगा। वहीं अस्तित्व फाउंडेशन के प्रतिनिधियों ने कैंसर से जूझ चुकी महिलाओं को समग्र सहयोग उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता जताई।

इस अवसर पर कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रमोद कुमार गुप्ता, सामुदायिक चिकित्सा विभाग के प्रमुख डॉ. आयुष लोहिया, शोध अधिकारी डॉ. सुरेंद्र कुमार श्रीवास्तव सहित अनेक चिकित्सक, शोधकर्ता और स्वास्थ्यकर्मी उपस्थित रहे।

गुरुवार, 11 जून 2026

ठेले पर खाना यानी बीमारी को निमंत्रण




लखनऊ के खुले ठेलों के खाने में खतरनाक बैक्टीरिया


81% विक्रेता बुनियादी स्वच्छता नियमों से अनजान


 94% को चाकू और कटिंग बोर्ड से संक्रमण का नहीं था ज्ञान

कुमार संजय

लखनऊ। सड़क किनारे खुले ठेलों पर बिकने वाले स्ट्रीट फूड में खतरनाक बैक्टीरिया का स्तर चिंताजनक रूप से अधिक पाया गया है। वैज्ञानिक अध्ययन में कुछ खाद्य नमूनों में बैक्टीरिया की संख्या 2.7 अरब प्रति ग्राम तक दर्ज की गई, जो खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से बेहद गंभीर स्थिति मानी जाती है। शोध में यह भी सामने आया कि 81 प्रतिशत स्ट्रीट फूड विक्रेता हाथ धोने, दस्ताने पहनने, नाखूनों की सफाई, साफ तौलिया इस्तेमाल करने और सिर ढकने जैसी बुनियादी स्वच्छता प्रक्रियाओं के प्रति जागरूक नहीं हैं, जबकि 94 प्रतिशत विक्रेताओं को यह जानकारी नहीं थी कि गंदे चाकू और कटिंग बोर्ड भी भोजन को खतरनाक रूप से दूषित कर सकते हैं।


 बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू), लखनऊ के स्कूल फॉर होम साइंसेज के खाद्य एवं पोषण विभाग की शोधार्थी रुचि वर्मा  Ruchi Verma और विभाग की प्रोफेसर सुनीता मिश्रा के निर्देशन में  किए गए अध्ययन में यह सामने आए हैं। इटालियन जर्नल ऑफ फूड सेफ्टी  ने स्वीकार कर लियाभाई। 


शोध के दौरान लखनऊ शहर के चार अलग-अलग क्षेत्रों से  खुले ठेलों और बंद दुकानों से समान प्रकार के छह-छह स्ट्रीट फूड नमूने एकत्र किए गए। प्रयोगशाला परीक्षण में पाया गया कि खुले ठेलों से लिए गए खाद्य पदार्थों में रोग पैदा करने वाले बैक्टीरिया का स्तर 6.11 से   9.44  लॉग सीएफयू प्रति ग्राम तक था। वैज्ञानिकों के अनुसार 9.44 लॉग सीएफयू प्रति ग्राम का स्तर लगभग 2.7 अरब बैक्टीरिया प्रति ग्राम के बराबर होता है, जो अत्यंत खराब सूक्ष्मजीवीय गुणवत्ता को दर्शाता है।


अध्ययन में यह भी पाया गया कि खुले वातावरण में भोजन तैयार करने और बेचने के कारण खाद्य पदार्थ धूल, प्रदूषण, मक्खियों और अन्य बाहरी स्रोतों से आसानी से दूषित हो जाते हैं। इसके विपरीत बंद दुकानों से लिए गए खाद्य नमूने अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित और स्वच्छ पाए गए।


120 स्ट्रीट फूड विक्रेताओं पर किए गए सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि अधिकांश विक्रेता व्यक्तिगत स्वच्छता और खाद्य सुरक्षा मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं। कई विक्रेता बिना हाथ धोए भोजन तैयार कर रहे थे और खाद्य सामग्री को सुरक्षित ढंग से संभालने के प्रति भी पर्याप्त जागरूकता नहीं दिखी।



बन सकता है कारण


 स्ट्रीट फूड शहरी आबादी के लिए सस्ता और लोकप्रिय विकल्प है, लेकिन स्वच्छता की अनदेखी फूड पॉइजनिंग, दस्त, उल्टी और अन्य खाद्य जनित बीमारियों का कारण बन सकती है। 



जरूरत


 स्ट्रीट फूड विक्रेताओं के लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम, खाद्य सुरक्षा जागरूकता अभियान और सख्त निगरानी व्यवस्था की आवश्यकता पर बल दिया है।


शोधकर्ताओं के अनुसार यदि स्वच्छता मानकों का पालन सुनिश्चित किया जाए तो स्ट्रीट फूड की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार लाया जा सकता है और उपभोक्ताओं को सुरक्षित भोजन उपलब्ध कराया जा सकता है।