रविवार, 20 सितंबर 2026

एसजीपीजीआइ में अब 'देखो और वहीं मारो' वाला कैंसर इलाज

 

 


 एसजीपीजीआइ में अब 'देखो और वहीं मारो' वाला कैंसर इलाज


कीमो के मुकाबले बहुत कम साइड इफेक्ट 


न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग का स्थापना दिवस समारोह



एंडोक्राइन ग्लैंड के कैंसर के इलाज में अब अत्याधुनिक तकनीक थेरानोस्टिक्स से इलाज होगा। इस तकनीक में पहले कैंसर को सटीक रूप से खोजा जाता है और फिर उसी जगह पर निशाना लगाकर खत्म किया जाता है, जिससे शरीर के बाकी हिस्सों को नुकसान नहीं पहुंचता।


न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग के स्थापना दिवस पर विभाग प्रमुख प्रोफेसर पीके प्रधान ने बताया कि थेरानोस्टिक्स दो शब्दों थेरेपी और डायग्नोस्टिक्स से मिलकर बना है। इस तकनीक के पहले चरण में बहुत हल्की रेडिएशन वाली दवा डायग्नोस्टिक रेडियोट्रेसर जैसे गैलियम-68 डॉटाटेट  और गैलियम-68 पीएसएमए-11  / फ्लोरीन-18 पीएसएमए-1007  नस में दी जाती है और पेट-सीटी स्कैन किया जाता है। यह दवा सिर्फ कैंसर कोशिका पर चिपकती है और स्कैन में लाइट की तरह जलने लगती है। यह दवा एक-दो घंटे में पेशाब के रास्ते बाहर निकल जाती है। अगर पहले स्कैन में लाइट आती है, मतलब कैंसर उस दवा को पकड़ रहा है, तो दूसरे चरण में उसी दवा को ताकतवर रेडिएशन वाली दवा थेरेप्यूटिक रेडियोलिगेंड जैसे ल्यूटेटियम-177 डॉटाटेट और ल्यूटेटियम-177 पीएसएमए-617  जिसका  नाम प्लूविक्टो है, बनाकर दिया जाता है, जो उसी कैंसर वाली जगह पर चिपककर बीटा रेडिएशन से कोशिका को अंदर से ही जला देती है।


कीमो से कैसे अलग है



विशेषज्ञों के अनुसार कीमोथेरेपी में दवा पूरे खून में घूमती है, जिससे बाल झड़ना, लगातार उल्टी, खून की कमी, प्लेटलेट गिरना और बहुत कमजोरी आती है। थेरानोस्टिक्स में दवा सिर्फ कैंसर को टारगेट करती है, इसलिए साइड इफेक्ट न के बराबर होते हैं।


न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर क्या होता है

हमारे शरीर में न्यूरोएंडोक्राइन कोशिकाएं होती हैं जो नर्वस सिस्टम और हॉर्मोन सिस्टम दोनों का काम करती हैं। जब इन्हीं कोशिकाओं में गांठ बनने लगती है तो उसे न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर कहते हैं। यह सबसे ज्यादा आंत, पैंक्रियाज, फेफड़ों और पेट में होता।  भारत में यह दर लगभग 1 लाख में 3.7 लोगों में है। जांच बेहतर होने से अब इसके मामले ज्यादा पकड़ में आ रहे हैं।

यूएसआईकॉन 2027 के लिए सीएम से मांगा सहयोग, मिला आश्वासन

 

यूएसआईकॉन 2027 के लिए सीएम से मांगा सहयोग, मिला आश्वासन


लखनऊ


 जनवरी 2027 में होने वाले यूरोलॉजी के राष्ट्रीय सम्मेलन यूएसआईकॉन 2027 के सचिव संजय गांधी पीजीआई के किडनी ट्रांसप्लांट एवं यूरोलॉजिस्ट प्रोफेसर संजय सुरेका सह-सचिव डॉ. प्रतिपाल सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सहयोग और समर्थन मांगा गया। 21 से 24 जनवरी तक इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में प्रस्तावित 60वें वार्षिक सम्मेलन की जानकारी दी। उन्होंने प्रशासनिक सहयोग का अनुरोध किया। मुख्यमंत्री ने सम्मेलन को उत्तर प्रदेश की चिकित्सा क्षमता दिखाने का अवसर बताते हुए हर संभव मदद का आश्वासन दिया।सम्मेलन के अध्यक्ष और संस्थान के यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. एमएस अंसारी और केजीएमयू के यूरोलॉजिस्ट प्रो. अपुल गोयलb ने कहा कि 35 साल बाद लखनऊ में हो रहा यह सम्मेलन प्रदेश के लिए गौरव की बात है। फोटो बाई तरफ प्रोफेसर संजय सुरेका बीच में मुख्यमंत्री और दाहिने तरफ डॉक्टर प्रति पाल

रिटायरमेंट उम्र 63 साल करने समेत 20 मांगों को लेकर पीजीआई कर्मचारी 5 अक्टूबर से धरने पर*

 

*रिटायरमेंट उम्र 63 साल करने समेत 20 मांगों को लेकर पीजीआई कर्मचारी 5 अक्टूबर से धरने पर*


लखनऊ। संजय गांधी पीजीआई कर्मचारी महासंघ ने अपनी 20 सूत्रीय लंबित मांगों को लेकर आंदोलन का ऐलान किया है। महासंघ ने प्रशासन को 15 कार्य दिवस का समय देते हुए मांगों के निस्तारण की मांग की है। निर्धारित अवधि में मांगों का समाधान नहीं होने पर कर्मचारी 5 अक्टूबर से प्रशासनिक भवन के सामने अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन शुरू करेंगे।

कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष धर्मेश कुमार और महामंत्री सीमा शुक्ला ने निदेशक को पत्र भेजकर 15 कार्य दिवस का अल्टीमेटम दिया है। बताया कि कार्यकारिणी के बैठक में सर्वसम्मत से यह निर्णय लिया गया है।  समय में मांगों का निस्तारण नहीं होने पर प्रतिदिन सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक धरना-प्रदर्शन किया जाएगा। महासंघ ने आंदोलन की स्थिति के लिए संस्थान प्रशासन को जिम्मेदार बताया है।

सेवानिवृत्ति की उम्र 63 वर्ष हो: नियमित गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों को तीन वर्ष का सेवा विस्तार देते हुए सेवानिवृत्ति की उम्र 60 से बढ़ाकर 63 वर्ष की जाए।

 मानकीकरण लागू होने के बाद विभिन्न संवर्गों में पदों एवं पदोन्नति को लेकर उत्पन्न विसंगतियों का निराकरण किया जाए। एम्स की तर्ज पर निर्धारित अहर्ता पूरी करने और पद रिक्त होने पर विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की बैठक कराकर पदोन्नति दी जाए। नर्सिंग सहित सभी संवर्गों के ऐसे कर्मचारियों, जिन्होंने 30 वर्ष की सेवा पूरी कर ली है, उन्हें तृतीय एमएसीपी का लाभ दिया जाए।

इसके अलावा लेवल-9 और उससे ऊपर के कर्मचारियों को एम्स दिल्ली की तर्ज पर 5300 रुपये प्रतिमाह एचपीसीए, नर्सिंग संवर्ग में वरिष्ठ कर्मचारियों का वेतन कनिष्ठ के समान होने पर वेतन संरक्षण, एम्स की दरों पर ब्रीफकेस अलाउंस, कर्मचारियों एवं आश्रितों के लिए ओपीडी का समय दोपहर 1 से 2 बजे के स्थान पर सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक करने की मांग शामिल है।

साथ ही हिंदी आशुलिपि एवं टंकण कार्य के लिए प्रोत्साहन भत्ता, ओटी, एमएसएसओ एवं फार्मासिस्ट संवर्ग के पदनाम एम्स के समान करने तथा संस्थान के कार्मिकों के लिए इमरजेंसी विभाग में बेड की संख्या बढ़ाने की मांग भी महासंघ ने प्रमुखता से उठाई है।

शनिवार, 19 सितंबर 2026

पीजीआइ एपेक्स ट्रामा सेंटर के वन-स्टॉप शोल्डर क्लिनिक

 



पीजीआइ एपेक्स ट्रामा सेंटर के वन-स्टॉप शोल्डर क्लिनिक


 हर मंगलवार लगती है ओपीडी 


एमआरआई  और स्टेरॉयड की जरूरत कम


लखनऊ। फ्रोजन शोल्डर से जूझ रहे मरीजों के लिए संजय गांधी पीजीआइ के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में संचालित वन-स्टॉप शोल्डर क्लिनिक राहत बन रहा है। फिजिकल मेडिसिन एवं रिहैबिलिटेशन विभाग द्वारा हर मंगलवार चलने वाले इस क्लिनिक ने पिछले 12 महीनों में 175 मरीजों का सफल उपचार किया है।


यहां पॉइंट-ऑफ-केयर अल्ट्रासाउंड से जांच, अल्ट्रासाउंड-गाइडेड मिनिमली इनवेसिव प्रक्रिया और स्ट्रक्चर्ड रिहैबिलिटेशन एक ही छत के नीचे उपलब्ध है। इससे अधिकांश मरीजों में एमआई की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिससे लागत और देरी दोनों कम होती है। स्टेरॉयड का उपयोग सीमित और जरूरी होने पर ही किया जाता है, जो डायबिटीज मरीजों के लिए सुरक्षित है।


एडिशनल प्रोफेसर डॉ. सिद्धार्थ राय ने बताया कि सटीक जांच और लक्षित उपचार से कुछ ही हफ्तों में दर्द और मूवमेंट में सुधार मिल रहा है। एपेक्स ट्रॉमा सेंटर प्रमुख प्रो. अरुण के. श्रीवास्तव और निदेशक प्रो. आर.के. धीमान ने कहा कि यह एकीकृत मॉडल मरीजों की सुविधा और सिस्टम की दक्षता दोनों बढ़ाता है।

मस्तिष्क को स्वस्थ रखने के लिए नियमित पठन, अच्छी दिनचर्या और सकारात्मक सोच जरूरी :

 



मस्तिष्क को स्वस्थ रखने के लिए नियमित पठन, अच्छी दिनचर्या और सकारात्मक सोच जरूरी : 


लखनऊ। मस्तिष्क को स्वस्थ रखने के लिए नियमित रूप से अच्छी पुस्तकें पढ़ना, पर्याप्त नींद लेना, संतुलित आहार, व्यायाम और तनाव से दूरी बनाकर सकारात्मक सोच रखना बेहद जरूरी है। यह बात आज केंद्रीय विद्यालय एसजीपीजीआई में ब्रेन हेल्थ विषय पर आयोजित सिंपोजियम में मुख्य अतिथि ने कही।


केंद्रीय विद्यालय एसजीपीजीआई में आज  न्यूरोलॉजी विभाग, एसजीपीजीआईएमएस के तत्वावधान में ब्रेन हेल्थ विषय पर एक दिवसीय सिंपोजियम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों में प्रारंभिक अवस्था से ही मस्तिष्क स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता पैदा करना था।


सिंपोजियम के दौरान तीन समूहों में प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं। प्रथम समूह में कक्षा 1 से 5 तक के विद्यार्थियों के लिए "मानसिक स्वास्थ्य" विषय पर भाषण प्रतियोगिता, द्वितीय समूह में कक्षा 6 से 8 के लिए "स्किल एजुकेशन इज बेटर देन बुकिश नॉलेज" विषय पर वाद-विवाद और तृतीय समूह में कक्षा 9 से 11 तक के विद्यार्थियों के लिए "रीडिंग इज ए गुड हैबिट" विषय पर वाद-विवाद प्रतियोगिता हुई। इसमें लगभग 30 विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।


कार्यक्रम की मुख्य अतिथि न्यूरोलॉजी विभाग की विभागाध्यक्ष प्रोफेसर जयंती कलिता रहीं। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि पढ़ना एक बहुत अच्छी आदत है। निरंतर पढ़ने से हमें महान व्यक्तियों के जीवन और विचारों के बारे में सीखने को मिलता है, इसलिए सभी को एक अच्छी पुस्तक चुनकर प्रतिदिन पढ़ने की आदत डालनी चाहिए। इससे मस्तिष्क सक्रिय और स्वस्थ रहता है।


इस अवसर पर प्रोफेसर रुचिका टंडन, डॉ. प्रकाश पांडेय, डॉ. फिरोज और डॉ. रुपाली भी उपस्थित रहीं। विद्यालय के प्राचार्य डॉ. अशोक कुमार पाठक ने सभी अतिथियों का हरित स्वागत किया। न्यूरोलॉजी विभाग की ओर से सभी प्रतिभागी विद्यार्थियों को पुरस्कृत किया गया।


कार्यक्रम का संयोजन शोएब इस्लाम ने किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में विद्यालय के सभी शिक्षकों एवं कर्मचारियों का सराहनीय योगदान रहा।

रेयर डिजीज से ग्रस्त युवती में आंत से बनाई नई पेशाब की थैली





 रेयर डिजीज से ग्रस्त युवती में आंत से बनाई नई पेशाब की थैली


 



टीबी के कारण वेजाइना और मूत्राशय आपस में जुड़ गए थे, ठहर गई थी जिंदगी


 


 


कुमार संजय । लखनऊ


 संजय गांधी पीजीआइ के यूरोलॉजी विभाग के प्रो संजय सुरेका ने रेयर डिजीज से ग्रस्त युवती को रोबोटिक सर्जरी के जरिए बीमारी से मुक्ति दिलाने के लिए बडी आंत से नया मूत्राशय बनाने के साथ दूसरी परेशानी को भी दूर किया। बिहार के बेगूसराय की रहने वाली 20 वर्षीय अर्पिता पिछले छह साल से ऐसी बीमारी से जूझ रही थी, जिसमें पेशाब लगातार लीक होता रहता था। शरीर से बदबू, हर वक्त कपड़े गीले और समाज से दूरी। जांच में वजह निकली- ट्यूबरक्यूलर वेसिकोवेजाइनल फिस्टुला विद थिम्बल ब्लैडर।


 


 क्या है यह बीमारी और कितनी खतरनाक है


 


वीवीएफ में पेशाब की थैली और वेजाइना का रास्ता आपस में जुड़ जाता है। आमतौर पर यह समस्या 30 से 40 साल से अधिक उम्र की महिलाओं में बच्चेदानी निकालने या सिजेरियन ऑपरेशन के दौरान चूक से होती है।


 


लेकिन अर्पिता को हुई बीमारी दुनिया में सबसे रेयर है। उसे टीबी के कारण वीवीएफ के साथ थिम्बल ब्लैडर हो गया, यानी थैली सिकुड़ कर छोटी हो गई। मेडिकल साहित्य में इसके गिने-चुने केस ही दर्ज हैं। प्रो. संजय सुरेका के अनुसार पीजीआइ में मेरे 15 साल में यह पहला केस है।


 


इसका सबसे बड़ा खतरा यह है कि समय पर इलाज न हो तो पेशाब किडनी में वापस जाने लगता है और किडनी फेल होने का खतरा रहता है।


 


6 साल, 4 अस्पताल और फिर पीजीआई ने दिया जीवनदान


 


पिता किशोर सिन्हा ने बताया कि 2020 में बेटी को यूटीआई हुआ। उसके बाद पेशाब का फ्लो कम हो गया और बार -बार पेशाब करने जाना पड़ता था । बिहार में दो जगह दिखाया, फिर दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल गए, जहां कैथेटर डालकर निकाल दिया गया कहा गया कि ठीक हो जाएगा लेकिन आराम नहीं मिला। फिर पटना में आईजीआईएमएस में दिखाया, पर कोई फायदा नहीं हुआ।


 


रिश्तेदारों की सलाह पर 2024 में वे एसजीपीजीआई की यूरोलॉजी ओपीडी में आए। प्रो. संजय सुरेखा ने टीबी की जांच कराई तो राज खुला। किडनी की टीबी धीरे-धीरे ब्लैडर तक पहुंच गई थी।


 


रोबोटिक सर्जरी से बनाई नई थैली


 


पहले छह महीने टीबी की दवा देकर इंफेक्शन खत्म किया गया। अप्रैल में रोबोटिक सर्जरी कर जुड़े हुए हिस्से को अलग किया गया और सिकुड़ी हुई थैली को आंत से टुकड़ा लेकर नया मूत्राशय बनाया गया।विभागाध्यक्ष प्रो. एमएस अंसारी ने कहा कि यदि लगातार लीकेज की समस्या है और कोई कारण नहीं मिल रहा तो टीबी की जांच जरूर करानी चाहिए। फॉलो अप के लिए ओपीडी में आई अर्पिता के चेहरे पर मुस्कान थी। बोली, अब मैं अपनी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर पाऊंगी।

गुरुवार, 17 सितंबर 2026

एसजीपीजीआईएमएस और केंद्रीय विद्यालय पीजीआई में पोस्टर प्रतियोगिता, 24 छात्र पुरस्कृत - 50 टीबी मरीजों को लिया गोद

 

एसजीपीजीआईएमएस और केंद्रीय विद्यालय पीजीआई में पोस्टर प्रतियोगिता, 24 छात्र पुरस्कृत - 50 टीबी मरीजों को लिया गोद


  लखनऊ 


प्रधानमंत्री के 76वें जन्मदिन पर एसजीपीजीआईएमएस में पोस्टर प्रतियोगिता आयोजित हुई। पुरस्कार निदेशक  प्रो. आर.के. धीमान ने दिए। केंद्रीय विद्यालय के प्राचार्य  डॉ अशोक पाठक मौजूद रहे।  प्रथम-10 हजार, द्वितीय-7 हजार, तृतीय-5 हजार, सांत्वना-3 हजार।


कार्यक्रम में एसजीपीजीआई परिवार ने 50 टीबी मरीजों को गोद लेकर पोषण पोटली वितरित की। 76 लड़कियों को एचपीवी वैक्सीन लगाई गई।


कैटेगरी-1 : केंद्रीय विद्यालय एसजीपीजीआई (12 छात्र)

टीबी/एचपीवी - प्रथम-सृष्टि कक्षा 6, द्वितीय-अग्रिमा चंद्रा कक्षा 8, तृतीय-उपधृति साह कक्षा 10, सांत्वना-शिवांगी वर्मा कक्षा 9, प्रिधि कक्षा 10, रिद्धि पी. हुबली कक्षा 2

पर्यावरण - प्रथम-सिद्धि कुमारी कक्षा 9, द्वितीय-जिया यादव कक्षा 5, तृतीय-आकृति कक्षा 7, सांत्वना-कृष्णा सिंह कक्षा 7, यश कुमार कक्षा 5, संस्कृति गोस्वामी कक्षा 1ए


कैटेगरी-2 : कॉलेज ऑफ नर्सिंग व मेडिकल टेक्नोलॉजी (12 छात्र)

टीबी/एचपीवी - प्रथम-नैना बीएससी परफ्यूजन टेक्नोलॉजी द्वितीय सेमेस्टर, द्वितीय-श्रेया केसरवानी बीएससी रेडियोथेरेपी टेक्नोलॉजी चतुर्थ सेमेस्टर, तृतीय-वंशिका चौधरी बीएमएलटी चतुर्थ सेमेस्टर, सांत्वना-आंचल सिंह एमएससी नर्सिंग प्रथम वर्ष, अनाम फातिमा बीएससी परफ्यूजन टेक्नोलॉजी चतुर्थ सेमेस्टर, शमन खातून बीएससी नर्सिंग द्वितीय वर्ष

पर्यावरण - प्रथम-शिवांशू बीएससी ऑपरेशन थियेटर टेक्नोलॉजी इंटर्न, द्वितीय-आशिमा यादव बीपीटी तृतीय सेमेस्टर, तृतीय-दृष्टि बीएससी रेडियोडायग्नोसिस एंड इमेजिंग टेक्नोलॉजी षष्ठम सेमेस्टर, सांत्वना-साक्षी बीएससी नर्सिंग तृतीय वर्ष, प्रवीण बीएससी नर्सिंग प्रथम वर्ष, ज्योत्सना सिंह बीएससी नर्सिंग द्वितीय वर्ष

बुधवार, 16 सितंबर 2026

कैंसर संस्थान के डॉक्टर प्रमोद गुप्ता को बड़ा राष्ट्रीय सम्मान

 

कैंसर संस्थान के डॉक्टर प्रमोद गुप्ता को बड़ा राष्ट्रीय सम्मान

देश भर से सिर्फ 7 डॉक्टर चुने गए, लखनऊ के कैंसर संस्थान का नाम रोशन


लखनऊ। कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर इंस्टीट्यूट, लखनऊ के रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग के एडिशनल प्रोफेसर और डीन डॉक्टर प्रमोद कुमार गुप्ता को इस साल का सबसे बड़ा सम्मान मिला है। उन्हें रेडिएशन ऑन्कोलॉजी में बेहतरीन काम के लिए फेलोशिप ऑफ द इंडियन कॉलेज ऑफ रेडिएशन ऑन्कोलॉजी यानी फिक्रो अवार्ड 2026 के लिए चुना गया है।


ये सम्मान कोई छोटा-मोटा नहीं है। ये कैंसर के इलाज, रिसर्च, पढ़ाई और रेडिएशन ऑन्कोलॉजी में उनके सालों की मेहनत को राष्ट्रीय स्तर पर सलाम है। खास बात ये है कि इस बार पूरे देश से सिर्फ सात रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट को ये अवार्ड मिला है और उसमें  लखनऊ के डॉक्टर गुप्ता का नाम भी है।


इस मौके पर संस्थान के डायरेक्टर प्रो. एम.एल.बी. भट्ट ने डॉक्टर गुप्ता को  बधाई दी और कहा कि ये पूरे संस्थान के लिए बहुत गर्व की बात है।


बता दें कि ये अवार्ड उन्हें 4 दिसंबर 2026 को हैदराबाद में होने वाले एआरओआई के सालाना सम्मेलन एरोइकॉन 2026 में दिया जाएगा।


पूरे संस्थान परिवार की तरफ से डॉक्टर प्रमोद कुमार गुप्ता जी को दिल से बधाई और शुभकामनाएं।

सोमवार, 14 सितंबर 2026

1.2 लीटर मवाद से भरा सीना और पूरी तरह बैठा फेफड़ा पीजीआइ में जटिल सर्जरी कर बचा ली जान

 



1.2 लीटर मवाद से भरा सीना और पूरी तरह बैठा फेफड़ा पीजीआइ में जटिल सर्जरी कर बचा ली जान

 सड़क हादसे के बाद सीने में जमा हुआ था 1.2 लीटर गाढ़ा मवाद, सिंगल-लंग वेंटिलेशन पर रखकर हुई हाई-रिस्क सर्जरी


 लखनऊ 


सीने में 1.2 लीटर गाढ़ा मवाद, फेफड़ा पूरी तरह पिचक कर ध्वस्त और ऊपर से दिल, शुगर और बीपी का पुराना मरीज... ऐसी हालत में ज्यादातर जगहों पर उम्मीद ही छोड़ दी जाती है लेकिन  संजय गांधी पीजीआइ के  एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के डॉक्टरों ने  दूरबीन विधि वैट्स सर्जरी से 50 वर्षीय मरीज को बचा लिया ।


सोनभद्र के रहने वाले मेवालाल (50 वर्ष) किसान हैं और मेडिकल स्टोर चलाते हैं। 8 अप्रैल 2026 की रात बाइक-कार की टक्कर में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। जिला अस्पताल में शुरूआती इलाज तो हुआ, लेकिन सांस की दिक्कत बढ़ती गई। हालत बिगड़ने पर उन्हें  एपेक्स ट्रॉमा सेंटर लाया गया।


जांच में पता चला कि छाती के अंदर करीब 1.2 लीटर गाढ़ा मवाद भर चुका था, जिसे पायोथोरेक्स कहते हैं। फेफड़े के ऊपर मोटी झिल्ली की परत जम गई थी और फेफड़ा पूरी तरह दब कर काम करना बंद कर चुका था। चुनौती और बड़ी थी, क्योंकि मेवालाल पहले से हाई-बीपी, डायबिटीज के मरीज हैं और 2023 में दिल की नस में स्टेंट भी पड़ चुका है।


ऐसी नाजुक हालत में ऑपरेशन करना बेहद जोखिम भरा था। सर्जरी के दौरान मरीज को सिंगल-लंग वेंटिलेशन पर रखना पड़ा, यानी एक फेफड़े से ही सांस चलानी पड़ी। इसके बावजूद ट्रॉमा सर्जरी टीम ने वैट्स तकनीक से बिना बड़ा चीरा लगाए, कैमरे की मदद से छाती से सारा मवाद निकाला और फेफड़े को जकड़े हुए मोटी पील को हटाकर डी-कॉर्टिकेशन किया। इससे दबा हुआ फेफड़ा फिर से फूल सका।


ऑपरेशन के बाद दो दिन तक मरीज को आईसीयू में रखा गया। सुधार होने पर वार्ड में शिफ्ट किया गया।  14 सितंबर को पूरी तरह स्वस्थ हालत में उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया। निदेशक प्रोफेसर आरके धीमान ने टीम को बधाई दी। 


क्या है वैट्स तकनीक


वैट्स का पूरा नाम है वीडियो-असिस्टेड थोरैकोस्कोपिक सर्जरी।

इसमें छाती को बड़ा चीरने की जरूरत नहीं पड़ती। 2-3 छोटे छेद करके कैमरा और खास उपकरण अंदर डाले जाते हैं। मॉनिटर पर देखकर अंदर की सफाई और ऑपरेशन करते हैं।  दर्द कम होता है, इंफेक्शन का खतरा कम रहता है और मरीज जल्दी ठीक होता  है।


सर्जरी टीम


ट्रॉमा सर्जरी विभाग

• एपेक्स ट्रॉमा सेंटर, एडिशनल चीफ ट्रॉमा सर्जरी- डा. अमित कुमार सिंह ,  सीनियर रेजिडेंट ट्रॉमा सर्जरी,- डा. आदित्य सिंह , सीनियर रेजिडेंट

ट्रॉमा सर्जरी,- डा. वरुण गुप्ता

 

एनेस्थीसिया एवं क्रिटिकल केयर विभाग

• एनेस्थीसिया विभाग, एडिशनल प्रोफेसर - डा. गणपत • एनेस्थीसिया विभाग, एडिशनल प्रोफेसर - डा. रफात शमीम

जूनियर डा. एनेस्थीसिया — डा. आकांक्षा

सीनियर रेजिडेंट, एनेस्थीसिया — डा. सारिया

ओटी स्टाफ — राहुल

 नर्सिंग ऑफिसर ओटी —  इरिन

ओटी तकनीशियन — अमित यादव

ओटी तकनीशियन — गौरव

आईसीयू स्टाफ — देवांशी

रविवार, 13 सितंबर 2026

लैब में उगाईं हार्ट वाल्व की कोशिकाएं, परखीं दवाएं; देखा - वाल्व की बीमारी को रोकने में कारगर होगी कौन सी दवा

 





लैब में उगाईं हार्ट वाल्व की कोशिकाएं, परखीं दवाएं; देखा - वाल्व की बीमारी को रोकने में कारगर होगी कौन सी दवा


 - रूमेटिक हार्ट डिजीज पर अहम शोध में सूजन और फाइब्रोसिस की वजह का चला पता, सर्जरी टालने की जगी उम्मीद


 लखनऊ


रूमेटिक हार्ट डिजीज (आरएचडी) से जूझ रहे मरीजों के लिए राहत की खबर है। संजय गांधी पीजीआइ के वैज्ञानिकों ने लैब में हार्ट वाल्व की जीवित कोशिकाएं उगाकर यह देखा केि  वाल्व धीरे-धीरे मोटा और सख्त होकर खराब हो जाता है जिसे दवा के जरिए रोका जा सकता है। उन दवाओं का भी पता लगाया जो वाल्व को सुरक्षित रख सकती हैं। 

शोध में सामने आया है कि शरीर में लंबे समय तक रहने वाली सूजन और कुछ खास प्रोटीन वाल्व को नुकसान पहुंचाकर फाइब्रोसिस (सख्त होने की प्रक्रिया) को बढ़ाते हैं। यदि इस प्रक्रिया को शुरुआती दौर में ही नियंत्रित किया जा सके तो भविष्य में कई मरीजों को हार्ट वाल्व बदलने की सर्जरी से बचाया जा सकता है।


यह महत्वपूर्ण शोध अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका जर्नल ऑफ फिजियोलॉजी एंड बायोकैमिस्ट्री ने स्वीकार किया है। 


शोध में पाया गया कि रूमेटिक हार्ट डिजीज केवल वाल्व तक सीमित बीमारी नहीं है, बल्कि इसमें पूरे शरीर में सूजन की प्रक्रिया सक्रिय रहती है। मरीजों के खून में ऐसे कई प्रोटीन मिले जो सूजन बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं। यही सूजन धीरे-धीरे हार्ट वाल्व की कोशिकाओं में बदलाव लाकर उसे मोटा और कठोर बना देती है।


वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में हार्ट वाल्व की जीवित कोशिकाओं को उगाकर उन पर अध्ययन किया। इसमें पाया गया कि टीजीएफ-बीटा नामक प्रोटीन वाल्व की कोशिकाओं को तेजी से सख्त बनाने की प्रक्रिया को बढ़ाता है। वहीं एसबी204741 और टाडालाफिल जैसी दवाओं ने इस नुकसान पहुंचाने वाली प्रक्रिया को काफी हद तक रोकने में सफलता दिखाई।


ऐसे हुआ शोध

वैज्ञानिकों ने आरएचडी के उन मरीजों के माइट्रल हार्ट वाल्व के ऊतकों का अध्ययन किया, जिन्हें बीमारी के कारण वाल्व बदलने की सर्जरी करानी पड़ी थी। ऑपरेशन के दौरान निकाले गए खराब वाल्व के ऊतकों की आधुनिक एलसी-एमएस/एमएस प्रोटिओमिक्स तकनीक से जांच की गई। तुलना के लिए इस्कीमिक हार्ट डिजीज से पीड़ित मरीजों के माइट्रल वाल्व ऊतकों की भी इसी तकनीक से जांच की गई।


शोधकर्ताओं की भूमिका

यह शोध क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी विभाग के यंग साइंटिस्ट डॉक्टर मोहित के राय और विभाग के प्रोफेसर विकास अग्रवाल के नेतृत्व में किया गया। शोध टीम में डा. आलोक कुमार, डा. दियाब रामिरेड्डी, डा. अंजलि सिंह, कार्डियो सर्जरी विभाग के प्रमुख प्रो. सुरेंद्र के. अग्रवाल और प्रो. शांतनु पांडे शामिल रहे।

राष्ट्र प्रेरणा स्थल पर उमड़ा जनसैलाब, आत्म सम्मान रैली में भारी भीड़ ने दिखाया दम

 






राष्ट्र प्रेरणा स्थल पर उमड़ा जनसैलाब, आत्म सम्मान रैली में भारी भीड़ 

पारख महासंघ की रैली में हजारों की संख्या में पहुंचे लोग, पूर्व मंत्री कौशल किशोर बोले - भीड़ बता रही है लोग आत्मसम्मान के लिए जाग चुके हैं
आउट सोर्सिंग व्यवस्था को किया समाप्त किए जाने और एक समाज शिक्षा की उठाई मांग


दुबग्गा स्थित राष्ट्र प्रेरणा स्थल पर रविवार को आयोजित आत्म सम्मान रैली में भारी भीड़ उमड़ पड़ी। पारख महासंघ के बैनर तले आयोजित इस रैली में मैदान खचाखच भरा रहा। पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री कौशल किशोर के पहुंचने से पहले ही राष्ट्र प्रेरणा स्थल पर हजारों की संख्या में लोगों की भीड़ जुट गई थी। भीड़ में युवा, बुजुर्ग, महिलाएं और बड़ी संख्या में कार्यकर्ता शामिल रहे।

भीड़ को देखकर गदगद हुए मुख्य अतिथि पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री कौशल किशोर ने कहा कि आज उमड़ी यह भारी भीड़ इस बात का सबूत है कि समाज अपने आत्मसम्मान के लिए जाग चुका है। उन्होंने मंच से लोगों का आभार जताते हुए कहा कि यह सिर्फ भीड़ नहीं, बल्कि बदलाव की ताकत है।

मंच से रखीं 5 बड़ी मांगें

रैली को संबोधित करते हुए कौशल किशोर ने कहा कि नशा मुक्त समाज, एक समान शिक्षा और रोजगारपरक शिक्षा से ही देश विकसित होगा। उन्होंने सरकार से मांग की कि जो सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए हैं, उन्हें तुरंत खोला जाए। साथ ही युवाओं के शोषण वाली आउटसोर्सिंग व्यवस्था को खत्म किया जाए।

उन्होंने कहा कि राष्ट्र प्रेरणा स्थल पर सिर्फ एक-दो नहीं, बल्कि वीरांगना ऊदा देवी पासी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह समेत देश के सभी स्वतंत्रता सेनानियों के लिए स्मारक बनना चाहिए, ताकि यहां आने वाला हर व्यक्ति प्रेरणा लेकर जाए।

राजनीतिक अटकलों पर लगाया विराम

अपने संबोधन में उन्होंने भाजपा छोड़कर अन्य दल में जाने की चल रही चर्चाओं का भी खंडन किया। उन्होंने कहा कि मैं कहीं नहीं जा रहा हूं, ऐसी अफवाहों पर ध्यान न दें।

इस विशाल रैली में मलिहाबाद विधायक जय देवी, विधायक अमरेश रावत समेत कई ब्लॉक प्रमुख, ग्राम प्रधान, बीडीसी सदस्य और हजारों की संख्या में आम लोग मौजूद रहे। दूसरे राज्यों से भी तमाम लोग आप सम्मान रैली में भाग लेने पहुंचे। 
भारी भीड़ के कारण दुबग्गा-काकोरी मार्ग पर कुछ देर के लिए जाम की स्थिति भी बनी रही।



गुरुवार, 10 सितंबर 2026

भारतीयों में हार्ट अटैक की वजह जीन नहीं, बिगड़ती लाइफस्टाइल


 भारतीयों में हार्ट अटैक की वजह जीन नहीं, बिगड़ती लाइफस्टाइल भारत में हर चौथी मौत हृदय रोग से होती है बचाव के लिए जरूरी है ब्लड प्रेशर, शुगर, कोलेस्ट्रॉल, वजन और कमर का घेरा पर नियंत्रण 


 लखनऊ । भारतीयों में कम उम्र में बढ़ते हार्ट अटैक के खतरे पर संजय गांधी पीजीआइ में "अ हार्ट-टू-हार्ट विषय पर चर्चा हुआ" । इसमें अमेरिका में बसे किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के एलुमनाई प् फिजीशियन-फिल्ममेकर डा. निर्मल जोशी और डा. रेनू जोशी ने अपनी चर्चित डॉक्यूमेंट्री ‘द ब्राउन हार्ट’ दिखाई। फिल्म का केंद्रीय संदेश रहा - जीन बंदूक में गोली भरते हैं, ट्रिगर लाइफस्टाइल दबाती है और 80 फीसदी खतरा टाला जा सकता है। कार्यक्रम का उदघाटन संस्थान के निदेशक प्रो. डॉ. राधा कृष्ण धीमान ने किया। उन्होंने कहा, "स्वास्थ्य लग्जरी नहीं, रोज का चुनाव है। स्क्रीन टाइम, फास्ट फूड और तनाव युवा दिलों पर भारी पड़ रहा है। आदतें बदलेंगी तो दिल बदलेगा।" कार्डियोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो.  आदित्य कपूर ने कहा कि भारतीय दिल पर बात अब जल्दी और खुलकर होनी चाहिए। विज्ञान, अनुभव और कहानी मिले तो लोग समझते हैं।  प्रो. डॉ. रूपाली खन्ना ने महिलाओं में हृदय रोग के अनदेखे खतरे और देरी से पहचान पर चिंता जताई। 45 मिनट के सत्र में डॉ. जोशी दंपति ने बताया कि भारत में हर चौथी मौत हृदय रोग से है। बचाव के लिए अपने 5 नंबर जानना जरूरी है - ब्लड प्रेशर, शुगर, कोलेस्ट्रॉल, वजन और कमर का घेरा। इसके बाद हुए सवाल-जवाब सत्र में प्रो. आदित्य कपूर, प्रो. रूपाली खन्ना, प्रो. सत्येन्द्र तिवारी और डा. अंकित साहू ने शुरुआती लक्षण, स्क्रीनिंग और रोकथाम पर विस्तार से जवाब दिए।

बुधवार, 9 सितंबर 2026

Half of Doctors' Work Is About To Be Over

 



Half of Doctors' Work Is About To Be Over


Now the Doctor Will Talk to the Patient and AI Will Write the Report


Lucknow. A major change is coming to hospitals very soon. In the near future, the doctor will talk to the patient and AI running in the background will write the entire report. It sounds like something out of a movie, but trials have already started abroad and it is expected that this system could be seen in India very soon.


In fact, Microsoft's new generative AI model named Dragon Copilot has shown in the US that it can reduce doctors' reading and writing work by up to 50 percent.


How will it work? It is called Ambient Listening Technology. When the doctor and patient talk in the room, this AI will quietly listen to everything and automatically prepare its documentation. The doctor will not have to repeatedly look at the computer and type. His entire focus will be only on the patient. That is why it is now being said that in the coming time, AI will not just be a tool, but a clinical collaborator for doctors - a true partner.


Shedding light on this upcoming change is Clinical AI Expert Mansi Goyal. Mansi works as a Data Scientist at the US-based company Lucem Health. She works on EHR data of millions of patients to build AI that can detect heart rhythm disorders, liver disease and Type 1 diabetes at an early stage.


Mansi says, the earlier AI used to ask only one question - "Is there pneumonia in this X-ray?". But the new AI that is coming will do reasoning. It will connect a patient's five-year-old history, lab reports and medicines together to tell what the real disease could be.


But Mansi also gives a warning that even when this technology comes to a country like India, AI will not be able to replace doctors everywhere. When a patient has to be told about a serious illness like cancer, what is needed there is not a machine, but a human heart.


Therefore, in the future, AI can do small and low-risk tasks like filling forms, but for high-risk tasks like changing the dose of medicine and taking decisions in an emergency, today and tomorrow, the supervision of a doctor will remain final.

डॉक्टरों का आधा काम होगा कम अब मरीज से बात करेगा डॉक्टर और रिपोर्ट लिखेगी एआई

 




डॉक्टरों का आधा काम होगा कम


अब मरीज से बात करेगा डॉक्टर और रिपोर्ट लिखेगी एआई


लखनऊ। हॉस्पिटल में बहुत जल्द एक बड़ा बदलाव आने वाला है। आने वाले समय में डॉक्टर मरीज से बात करेगा और पीछे-पीछे उसकी पूरी रिपोर्ट एआई लिख देगी। सुनने में फिल्म जैसा लगता है, पर विदेशों में ये ट्रायल शुरू हो चुका है और उम्मीद है कि भारत में भी ये थीम बहुत जल्द देखने को मिल सकती है।


दरअसल माइक्रोसॉफ्ट के ड्रैगन कोपायलट नाम के नए जेनरेटिव एआई मॉडल ने अमेरिका में डॉक्टरों का लिखने-पढ़ने वाला पचास परसेंट तक काम कम करके दिखाया है।


ये कैसे काम करेगा? इसे एम्बिएंट लिसनिंग टेक्नोलॉजी कहते हैं। जब डॉक्टर और मरीज कमरे में बात करेंगे, तो ये एआई चुपचाप सब सुनेगी और खुद ही उसका डॉक्यूमेंटेशन तैयार कर देगी। डॉक्टर को बार-बार कंप्यूटर की तरफ देखकर टाइप नहीं करना पड़ेगा। उसका पूरा ध्यान सिर्फ मरीज पर रहेगा। इसीलिए अब कहा जा रहा है कि आने वाले समय में एआई सिर्फ एक टूल नहीं, बल्कि डॉक्टर का क्लिनिकल कोलैबोरेटर यानी सच्चा साथी बन सकती है।


इस आने वाले बदलाव पर रोशनी डाल रही हैं क्लिनिकल एआई एक्सपर्ट मानसी गोयल**। मानसी अमेरिका की कंपनी **लुसेम हेल्थ में डेटा साइंटिस्ट के तौर पर काम करती हैं। वे करोड़ों मरीजों के ईएचआर डेटा पर काम करके ऐसी एआई बना रही हैं जो दिल की धड़कन की गड़बड़ी, लिवर की बीमारी और टाइप वन डायबिटीज को शुरू में ही पकड़ ले।


मानसी कहती हैं पहले वाली एआई सिर्फ एक सवाल पूछती थी - "क्या इस एक्स-रे में निमोनिया है?"। लेकिन आने वाली नई एआई रीजनिंग करेगी। वो मरीज की पांच साल पुरानी हिस्ट्री, लैब रिपोर्ट और दवाओं को एक साथ जोड़कर बताएगी कि असली बीमारी क्या हो सकती है।


लेकिन मानसी एक चेतावनी भी देती हैं कि भारत जैसे देश में जब ये टेक्नोलॉजी आएगी भी, तो भी एआई हर जगह डॉक्टर की जगह नहीं ले पाएगी। जब मरीज को कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के बारे में बताना हो, तो वहां मशीन नहीं, इंसान का दिल चाहिए।


इसलिए भविष्य में छोटे और लो-रिस्क काम जैसे फॉर्म भरना एआई कर सकती है, पर दवा की डोज बदलना और इमरजेंसी में फैसला लेना जैसे हाई-रिस्क काम में आज भी और कल भी डॉक्टर की देखरेख ही आखिरी होगी।

मंगलवार, 8 सितंबर 2026

11 साल तक सीने में फंसी रही लोहे की कील, पीजीआइ में निकला

 





11 साल तक सीने में फंसी रही लोहे की कील, पीजीआइ में निकला 


दर्द से परेशान होकर पहुंचे थे ट्रामा

आपरेशन के दौरान टूट गया था धातु


 लखनऊ


कुशीनगर के रहने वाले 53 साल के अब्दुल कादिर पिछले 11 साल से सीने में दर्द लेकर घूम रहे थे, लेकिन उन्हें पता ही नहीं था कि दर्द की वजह क्या है। उनके सीने के अंदर एक लोहे का टुकड़ा फंसा हुआ था।


दरअसल 2014 में अब्दुल कादिर का एक्सीडेंट हो गया था, जिसमें उनके दाहिने हाथ की हड्डी टूट गई थी। 2015 में हाथ का आपरेशन हुआ। आपरेशन के दौरान हड्डी में छेद करने के लिए जिस औजार का इस्तेमाल होता है, उसी की नोक टूटकर उनके सीने में चली गई। डाक्टरों की भाषा में इसे ड्रिल बिट (बरमा - हड्डी में छेद करने वाली ड्रिल मशीन की नोक) कहते हैं।


इसके बाद कई साल तक उनका हाथ का इलाज चलता रहा, लेकिन सीने में फंसी इस नोक का किसी को पता ही नहीं चला। वह 11 साल तक इसी दर्द के साथ जीते रहे। दवा खाते, दर्द थोड़ा कम होता फिर बढ़ जाता।


आखिरकार वह   एपेक्स ट्रॉमा सेंटर पहुंचे। यहां डाक्टरों ने जांच की तो सीने के अंदर धातु की चीज दिखाई दी।


इसके बाद ट्रॉमा सर्जरी, हड्डी रोग और एनेस्थीसिया विभाग के डॉक्टरों ने मिलकर प्लान बनाया और ऑपरेशन करके उस बाहर निकाल दिया। 



सर्जरी करने वाली टीम

एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के

 

* प्रो. अमित कुमार सिंह - एडिशनल चीफ, ट्रॉमा सर्जरी (टीम लीड)

* प्रो. अमित कुमार - एडिशनल प्रोफेसर, ऑर्थोपेडिक्स

* डा. आदित्य - सीनियर रेजिडेंट, ट्रॉमा सर्जरी

* डा. वरुण गुप्ता - सीनियर रेजिडेंट, ट्रॉमा सर्जरी

* प्रो. वंश - एडिशनल प्रोफेसर, एनेस्थीसिया


एसजीपीजीआई में राष्ट्रीय पोषण माह पर जन-जागरूकता कार्यक्रम






एसजीपीजीआई में राष्ट्रीय पोषण माह पर जन-जागरूकता कार्यक्रम

संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान में नेशनल न्यूट्रिशन मंथ 2026 के अवसर पर आज पोषण एवं स्वास्थ्य के प्रति जन-जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य संदेश “डिस्कवर द पावर ऑफ न्यूट्रिशन - ईट राइट, लिव वेल” रहा।

कार्यक्रम का आयोजन कार्डियोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. आदित्य कपूर, डॉ. एल के भारती, वरिष्ठ आहारविद् अर्चना सिन्हा, डॉ. शिल्पी त्रिपाठी, रीता आनंद एवं डॉ. निरुपमा सिंह द्वारा किया गया। इसमें लगभग 220 प्रतिभागियों ने भाग लिया।

कार्यक्रम में संतुलित आहार के महत्व पर चर्चा हुई। साथ ही प्रो. आदित्य कपूर एवं डॉ. प्रेरणा कपूर के नेतृत्व में कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन (सीपीआर) एवं बेसिक लाइफ सपोर्ट (बीएलएस) का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया।

इस दौरान रोगी किचन सेवा में उत्कृष्ट कार्य करने वाले 10 कर्मचारियों - जेराल्ड गिल्बर्ट, मंदीप कुमार शर्मा, विनोद, नवनीत कुमार, कमल किशोर, सूर्यराम, शिवशंकर, ओमप्रकाश, अवधेश कुमार और शिव प्रसाद यादव को अवॉर्ड ऑफ एक्सीलेंस से सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम में “पावर ऑफ न्यूट्रिशन: गेटवे टू हेल्थ” विषय पर क्रॉस टॉक एवं पैनल डिस्कशन का भी आयोजन हुआ।

सोमवार, 7 सितंबर 2026

SGPGI में पहली बार: बिना ऑपरेशन के माइक्रोवेव से पिघलाया पैराथायरॉइड ट्यूमर

 



 SGPGI में पहली बार: बिना ऑपरेशन के माइक्रोवेव से पिघलाया पैराथायरॉइड ट्यूमर


लखनऊ। संजय गांधी पीजीआई ने बिना चीर-फाड़ के इलाज के क्षेत्र में एक बड़ी सफलता हासिल की है। संस्थान के डॉक्टरों ने 60 साल के एक बुजुर्ग मरीज के गले में बनी पैराथायरॉइड ग्रंथि की गांठ को बिना ऑपरेशन के सिर्फ माइक्रोवेव तकनीक से खत्म कर दिया। इस तरह का अत्याधुनिक इलाज SGPGI में पहली बार किया गया है।


बताया गया कि बुजुर्ग मरीज लंबे समय से परेशान थे। उनके खून में कैल्शियम का लेवल लगातार बढ़ा हुआ आ रहा था। इसकी वजह से कमजोरी और दूसरी दिक्कतें हो रही थीं। SGPGI में जब उनकी गहन जांच की गई तो पता चला कि उन्हें प्राइमरी हाइपर पैराथायरॉइडिज्म है। इसका कारण गले में बाईं तरफ नीचे वाली पैराथायरॉइड ग्रंथि में बना ट्यूमर यानी लेफ्ट इंफीरियर पैराथायरॉइड एडेनोमा था।


आमतौर पर ऐसे मामलों में गर्दन में चीरा लगाकर ऑपरेशन करके गांठ को निकाला जाता है और मरीज को बेहोश करना पड़ता है। लेकिन डॉक्टरों ने तय किया कि इस मरीज का इलाज बिना चीरे वाली तकनीक से किया जाएगा। इसके लिए इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी विभाग की टीम ने अल्ट्रासाउंड गाइडेड माइक्रोवेव एब्लेशन का सहारा लिया।


इस प्रक्रिया में डॉक्टरों ने अल्ट्रासाउंड मशीन से देखते हुए एक बेहद पतली सुई गांठ तक पहुंचाई और माइक्रोवेव तरंगों से उसे अंदर ही जला दिया। पूरी प्रक्रिया लोकल एनेस्थीसिया में की गई। मरीज को जनरल एनेस्थीसिया देने की जरूरत नहीं पड़ी। सबसे बड़ी बात यह रही कि शरीर पर न तो कोई चीरा लगा और न ही कोई निशान पड़ा। प्रक्रिया के बाद मरीज की हालत पूरी तरह सामान्य रही और महज 8 घंटे के अंदर ही उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।


यह जटिल प्रक्रिया प्रो. सबरेत्नम एम, प्रो. रजनीकांत, डॉ. मिथुन राम, डॉ. मिथलेश वांचू, डॉ. मीनाक्षी सुहालका, डॉ. फिरदौस, डॉ. शिखर अग्रवाल, डॉ. सईदुर रहमान और नर्सिंग ऑफिसर श्रीमती कौशल की संयुक्त टीम ने की। वहीं एंडोक्राइन विभाग के डॉ. अंबिका टंडन और डॉ. अमन बंसल ने मरीज के हार्मोन से जुड़े मूल्यांकन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


SGPGI के निदेशक पद्मश्री प्रो. आर के धीमन ने इस सफलता पर पूरी टीम को बधाई दी है। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि बताती है कि सही मरीजों में यह बिना चीरे वाली तकनीक कितनी कारगर है।

एसजीपीजीआई : दिल तक पहुंचे ट्यूमर को निकाला, दो मासूमों को मिला नया जीवन





 एसजीपीजीआई : दिल तक पहुंचे ट्यूमर को निकाला, दो मासूमों को मिला नया जीवन


लखनऊ


 बाल कैंसर जागरूकता माह में एसजीपीजीआई, लखनऊ के पीडियाट्रिक सर्जिकल सुपरस्पेशियलिटीज विभाग ने बड़ी सफलता हासिल की है। कैंसर से जूझ रहे दो छोटे बच्चों की बेहद जटिल सर्जरी कर उन्हें नया जीवन दिया गया। दोनों की हालत अब स्थिर है।


पहला मामला बिहार की ढाई साल की बच्ची का है। बच्ची की दाहिनी किडनी में विल्म्स ट्यूमर था। यह ट्यूमर इतना खतरनाक था कि किडनी से निकलकर शरीर की मुख्य नस इंफीरियर वेना कावा के रास्ते दिल के दाहिने हिस्से राइट एट्रियम तक पहुंच गया था। बच्ची को पहले नौ साइकिल कीमोथेरेपी दी गई। फिर कार्डियोपल्मोनरी बायपास यानी हार्ट-लंग मशीन पर लेकर पीडियाट्रिक सर्जरी और सीटीवीएस विभाग की संयुक्त टीम ने ट्यूमर वाली किडनी, यूरेटर और दिल तक फैले ट्यूमर थ्रोम्बस को सफलतापूर्वक निकाल दिया।


दूसरा मामला शाहजहांपुर के चार वर्षीय बच्चे का है, जिसे पेट में बड़ी गांठ और बुखार था। जांच में पैंक्रियाज के हेड में बड़ा ट्यूमर मिला जो ड्यूओडेनम को जकड़ चुका था। टीम ने सीधे सर्जरी का फैसला लेकर बच्चे की जटिल व्हिपल सर्जरी यानी पैंक्रियाटिकोड्यूओडेनक्टॉमी की। इसमें पैंक्रियाज का हेड, ड्यूओडेनम और कॉमन बाइल डक्ट निकालकर पाचन तंत्र का जटिल पुनर्निर्माण किया गया। बच्चा अब मुंह से खाना ले रहा है।


विभागाध्यक्ष प्रो. बसंत कुमार ने कहा कि बच्चों में पेट में बिना कारण गांठ, लगातार बुखार, वजन घटना और कमजोरी को नजरअंदाज न करें। समय पर पहचान और विशेषज्ञ केंद्र में इलाज से जीवन बचाया जा सकता है।



सफल सर्जरी करने वाली टीम

नेतृत्व: प्रो. बसंत कुमार, विभागाध्यक्ष, पीडियाट्रिक सर्जिकल सुपरस्पेशियलिटीज, एसजीपीजीआईएमएस


पीडियाट्रिक सर्जिकल सुपरस्पेशियलिटीज विभाग: प्रो. बसंत कुमार, प्रो. अंकुर मंडेलिया, डॉ. अंजू वर्मा, डॉ. तरुण कुमार


सीटीवीएस विभाग: प्रो. शांतनु पांडे, डॉ. अरीब खान


एनेस्थीसिया विभाग: डॉ. आशीष कन्नौजिया, डॉ. पल्लव सिंह, डॉ. कोमल पासवान

शनिवार, 5 सितंबर 2026

कैंसर के बेहतर इलाज के लिए लखनऊ के कैंसर संस्थान और एम्स रायबरेली ने मिलाया हाथ



कैंसर के बेहतर इलाज के लिए लखनऊ के कैंसर संस्थान और एम्स रायबरेली ने मिलाया हाथ

कैंसर के बेहतर इलाज के लिए लखनऊ के कैंसर संस्थान और एम्स रायबरेली ने मिलाया हाथ

लखनऊ। कैंसर के इलाज को और बेहतर बनाने के लिए बड़ी पहल हुई है। कल्याण सिंह सुपर स्पेशलिटी कैंसर इंस्टीट्यूट (केएसएसएससीआई), लखनऊ और एम्स रायबरेली के बीच एमओयू साइन हुआ है। एमओयू पर केएसएसएससीआई के निदेशक प्रो. एमएलबी भट्ट और एम्स रायबरेली की निदेशक प्रो. अमिता जैन ने दस्तखत किए।

इस मौके पर रिसर्च ऑफिसर डॉ. सुरेंद्र कुमार श्रीवास्तव, संस्थान के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. विजय वरुण, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. बृजेंद्र कुमार समेत कई अधिकारी और चिकित्सक मौजूद रहे।

विशेषज्ञों ने बताया कि एमओयू के बाद दोनों संस्थान मिलकर कैंसर के इलाज और शोध के क्षेत्र में काम करेंगे। कैंसर की नई रिसर्च, मरीजों की बीमारी की जल्द पहचान और बेहतर जांच के साथ ही एडवांस इलाज की सुविधाओं को बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा। दोनों संस्थानों के डॉक्टर और विशेषज्ञ एक-दूसरे के अनुभव और विशेषज्ञता का लाभ उठाएंगे।

इसके साथ ही नई तकनीक और इलाज के आधुनिक तरीकों पर भी मिलकर काम किया जाएगा। ग्रामीण क्षेत्रों में कैंसर की रोकथाम और समय पर जांच को लेकर जागरूकता कार्यक्रम चलाने की भी योजना है। इससे गांव-गांव तक लोगों को कैंसर के लक्षण, बचाव और समय पर इलाज के प्रति जागरूक करने में मदद मिलेगी।

पेट में गोली से फट गई छोटी आंत, डेढ़ लीटर खून जमा होने के बाद भी युवक की बची जान

 



पेट में गोली से फट गई छोटी आंत, डेढ़ लीटर खून जमा होने के बाद भी युवक की बची जान

तुरंत बड़े ऑपरेशन में 15 सेंटीमीटर आंत काटकर निकाली, 48 घंटे वेंटिलेटर पर रहा



लखनऊ


लखनऊ के एपीआई अंसल में 14 अगस्त की रात बड़ी वारदात हुई। गोसाईंगंज के उदवतखेड़ा निवासी 35 वर्षीय पंकज कुमार यादव को लूट के दौरान चोरों ने पेट में गोली मार दी। गोली लगने से काफी खून बह गया और वह शॉक में चले गए। परिजन गंभीर हालत में उन्हें संजय गांधी पीजीआइ के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर लेकर पहुंचे।

यहां डॉक्टरों ने मरीज को देखते ही रिससिटेशन यानी हालत संभालने की प्रक्रिया शुरू की और बिना देर किए इमरजेंसी लैपरोटॉमी यानी पेट का बड़ा ऑपरेशन किया। ऑपरेशन के दौरान पेट में करीब डेढ़ लीटर खून जमा मिला। गोली से छोटी आंत यानी इलियम बुरी तरह फट गई थी। मरीज की जान बचाने के लिए डॉक्टरों ने छोटी आंत का करीब 15 सेंटीमीटर हिस्सा काटकर निकाल दिया।

ऑपरेशन के दौरान मरीज को कई बार खून चढ़ाना पड़ा। सर्जरी के बाद 48 घंटे तक उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया। इसके बाद आईसीयू में कई दिनों तक लगातार निगरानी और गहन इलाज किया गया। डॉक्टरों की टीम ने दिन-रात मेहनत कर मरीज को गंभीर स्थिति से बाहर निकाला। अब पंकज की हालत स्थिर है और उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है।


ट्रॉमा सर्जन की टीम ने किया जटिल ऑपरेशन


इस जटिल ऑपरेशन को ट्रॉमा सर्जन एडिशनल चीफ प्रोफेसर अमित कुमार सिंह ने सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर आदित्य और डॉक्टर वरुण गुप्ता के साथ किया। एनेस्थीसिया टीम में एडिशनल प्रोफेसर डॉक्टर गणपत प्रसाद, डॉक्टर राफत शमीम और सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर दीक्षा शामिल रहीं। ऑपरेशन थिएटर और आईसीयू की पूरी स्टाफ टीम ने भी इलाज में सहयोग किया।

संस्थान के निदेशक प्रोफेसर आर.के. धीमन ने पूरी टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह मामला बताता है कि गंभीर गोली लगने के बाद भी समय पर इलाज, तत्काल सर्जरी और बेहतर क्रिटिकल केयर से मरीज की जान बचाई जा सकती है।

उन्होंने बताया कि एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में 24 घंटे इमरजेंसी ट्रॉमा और सर्जरी की सुविधा उपलब्ध है और यह सुविधा पूरी तरह निशुल्क दी जाती है। यह कितने शब्द की खबर है