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शुक्रवार, 13 मार्च 2026
विश्व किडनी दिवस पर एसजीपीजीआई में वॉकाथॉन व जागरूकता कार्यक्रम, अंगदान का दिया संदेश
रील दे रहा है सर दर्द और कंधे का दर्द
रील दे रहा है सर दर्द
लखनऊ। यदि सिर दर्द, माइग्रेन या कंधे-गर्दन के दर्द में दो-तीन महीने तक दवा लेने के बावजूद आराम नहीं मिल रहा और दवा बंद करते ही दर्द फिर शुरू हो जाता है, तो केवल दवाओं पर निर्भर रहना समाधान नहीं है। इसके पीछे अक्सर गर्दन के आसपास की मांसपेशियों और नसों में तनाव जिम्मेदार होता है। ऐसे मामलों में नर्व ब्लॉक तकनीक प्रभावी उपचार साबित हो सकती है।
यह जानकारी संजय गांधी पीजीआई के पेन क्लिनिक मैनेजमेंट विभाग के प्रोफेसर संदीप खुबा, प्रोफेसर सुजीत गौतम,प्रो चेतना तथा विभागाध्यक्ष प्रो. संजय धीराज ने दी। उन्होंने बताया कि इस विषय पर विभाग की ओर से दो दिवसीय संगोष्ठी आयोजित की जा रही है, जिसमें दर्द के आधुनिक उपचार और नर्व ब्लॉक तकनीक के बारे में शिक्षकों व युवा चिकित्सकों को प्रशिक्षण दिया जाएगा।
विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक दर्द निवारक दवाएं लेने से किडनी और लिवर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए जिन मरीजों में दर्द बार-बार लौट आता है, उनमें कारण का सही मूल्यांकन कर उपचार किया जाना चाहिए।
उन्होंने बताया कि भारत में लगभग 60 से 65 प्रतिशत लोग जीवन में कभी न कभी सिर दर्द से प्रभावित होते हैं। इनमें से 30 से 35 प्रतिशत मरीजों में टेंशन टाइप हेडेक तथा 20 से 25 प्रतिशत में माइग्रेन पाया जाता है। इसके पीछे मोबाइल पर्व रील देखना बड़ा कारण है।
लगातार मोबाइल देखने से गर्दन की मांसपेशियों में लगातार तनाव के कारण वहां की नसें प्रभावित हो जाती हैं। ऐसे मरीजों में सिंपैथेटिक नर्व ब्लॉक या अन्य नर्व ब्लॉक प्रक्रियाओं से दर्द के संकेतों को अस्थायी रूप से रोककर राहत दी जाती है। इस तकनीक में विशेष सुई के माध्यम से प्रभावित नस के आसपास दवा दी जाती है, जिससे दर्द का चक्र टूट जाता है और मरीज को लंबे समय तक राहत मिल सकती है।
उन्होंने सलाह दी कि लगातार सिर या गर्दन के दर्द से परेशान मरीजों को विशेषज्ञ से परामर्श लेकर पेन क्लिनिक में जांच करानी चाहिए।
मोबाइल देखने से गर्दन पर पड़ता है 25 किलो का भार
विशेषज्ञों के अनुसार मोबाइल फोन को झुककर देखने की आदत सिर और गर्दन के दर्द का बड़ा कारण बन रही है। सामान्य स्थिति में गर्दन पर सिर का भार लगभग 5 से 6 किलोग्राम होता है, लेकिन जब व्यक्ति मोबाइल देखने के लिए सिर झुका लेता है तो यह भार बढ़कर 25 से 30 किलोग्राम तक हो जाता है। लंबे समय तक ऐसा होने से गर्दन की मांसपेशियां तनावग्रस्त हो जाती हैं और आसपास की नसों पर दबाव पड़ने लगता है, जिससे सिर दर्द, कंधे का दर्द और माइग्रेन की समस्या बढ़ सकती है।
गुरुवार, 12 मार्च 2026
एफएसएच हार्मोन को रोककर हड्डियां मजबूत करने की नई उम्मीद,
एफएसएच हार्मोन को रोककर हड्डियां मजबूत करने की नई उम्मीद,
हड्डियों की कमजोरी (ऑस्टियोपोरोसिस) के इलाज के लिए वैज्ञानिकों ने एक नई संभावित रणनीति की ओर संकेत किया है। विशेषज्ञों के अनुसार शरीर में बनने वाले फॉलिकल स्टिम्युलेटिंग हार्मोन (एफएसएच) को नियंत्रित या अवरुद्ध करके हड्डियों की घनता बढ़ाई जा सकती है। शोध से यह भी संकेत मिले हैं कि इससे शरीर की अतिरिक्त चर्बी कम करने और अल्ज़ाइमर जैसे तंत्रिका अपक्षयी रोगों से सुरक्षा में भी मदद मिल सकती है।
यह जानकारी लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के मेडिसिन विभाग द्वारा आयोजित भाटिया–मिश्रा स्मृति व्याख्यान में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चिकित्सक-वैज्ञानिक डॉ. मोने ज़ैदी ने दी। उन्होंने बताया कि अब तक एफएसएच हार्मोन को मुख्य रूप से प्रजनन प्रणाली से जुड़ा माना जाता था, लेकिन हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि यह हड्डियों के निर्माण और क्षय की प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है।
डॉ. ज़ैदी के अनुसार एफएसएच ऑस्टियोक्लास्ट नामक कोशिकाओं को सक्रिय कर सकता है, जो हड्डियों को तोड़ने का कार्य करती हैं। यदि इस हार्मोन की क्रिया को रोका जाए तो हड्डियों के टूटने की प्रक्रिया कम हो सकती है और अस्थि द्रव्यमान बढ़ सकता है।
उन्होंने बताया कि प्रयोगात्मक अध्ययनों में एफएसएच को अवरुद्ध करने से हड्डियों की मजबूती बढ़ने, शरीर की वसा कम होने और मस्तिष्क की कोशिकाओं को सुरक्षा मिलने के संकेत मिले हैं। वैज्ञानिकों ने एफएसएच को रोकने वाली एंटीबॉडी पर भी शोध किया है, जो भविष्य में अस्थि क्षय, मोटापा और तंत्रिका संबंधी बीमारियों के इलाज के लिए नई दवाओं के विकास का आधार बन सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत में अनुमानित 5 से 6 करोड़ लोग ऑस्टियोपोरोसिस या कम अस्थि घनत्व की समस्या से प्रभावित हैं। खासकर महिलाओं में रजोनिवृत्ति के बाद हड्डियों की कमजोरी का खतरा काफी बढ़ जाता है।
डॉ. ज़ैदी ने अपनी प्रारंभिक चिकित्सा शिक्षा केजीएमयू (पूर्व में किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज) से प्राप्त की और बाद में लंदन के हैमरस्मिथ अस्पताल तथा लंदन विश्वविद्यालय से उच्च प्रशिक्षण और शोध किया।
कार्यक्रम की शुरुआत मेडिसिन विभागाध्यक्ष प्रो. वीरेन्द्र आतम के स्वागत संबोधन से हुई। वक्ता का परिचय प्रो. कौसर उस्मान ने कराया और सत्र का संचालन डॉ. मेधावी गौतम ने किया। इस अवसर पर प्रो. के. के. सावलानी ने भाटिया–मिश्रा स्मृति व्याख्यान की परंपरा और शैक्षणिक महत्व पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कई वरिष्ठ व सेवानिवृत्त संकाय सदस्य—डॉ. सी. जी. अग्रवाल, डॉ. एस. के. दास, डॉ. ए. के. त्रिपाठी और डॉ. अशोक चन्द्र—की उपस्थिति रही। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. ओझा, पैरामेडिकल विज्ञान के अधिष्ठाता डॉ. के. के. सिंह तथा अन्य संकाय सदस्य भी मौजूद रहे।
इस कार्यक्रम में लगभग 150 संकाय सदस्य, रेज़िडेंट चिकित्सक और एमबीबीएस विद्यार्थी शामिल हुए। अंत में डॉ. दीपक भगचंदानी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
बॉक्स 1 : क्या है एफएसएच हार्मोन
एफएसएच (फॉलिकल स्टिम्युलेटिंग हार्मोन) पिट्यूटरी ग्रंथि से निकलने वाला हार्मोन है।
इसे पहले केवल प्रजनन प्रक्रिया से जुड़ा माना जाता था।
नए शोध बताते हैं कि यह हड्डियों के टूटने-बनने की प्रक्रिया और शरीर की वसा पर भी असर डाल सकता है।
बॉक्स 2 : वैज्ञानिकों ने क्या शोध किया
वैज्ञानिकों ने पाया कि एफएसएच बढ़ने पर ऑस्टियोक्लास्ट कोशिकाएं सक्रिय हो जाती हैं, जो हड्डियों को तोड़ती हैं।
प्रयोगात्मक अध्ययनों में जब एफएसएच के प्रभाव को रोका गया तो
हड्डियों का क्षय कम हुआ
नई हड्डी बनने की प्रक्रिया बढ़ी
शरीर की चर्बी में कमी देखी गई।
इस आधार पर वैज्ञानिक मानते हैं कि एफएसएच को लक्ष्य बनाकर नई दवाएं विकसित की जा सकती हैं।
बॉक्स 3 : एफएसएच हार्मोन को कैसे रोका गया
शोध में एफएसएच को ब्लॉक करने वाली विशेष एंटीबॉडी विकसित की गई।
इस एंटीबॉडी ने शरीर में एफएसएच के रिसेप्टर से जुड़कर उसके प्रभाव को कम किया।
पशु प्रयोगों में इससे अस्थि घनत्व बढ़ने और हड्डियों की मजबूती में सुधार देखा गया।
वैज्ञानिक अब इसके मानव उपयोग के लिए सुरक्षित दवाओं के विकास पर काम कर रहे हैं।
बुधवार, 11 मार्च 2026
गुर्दे में परेशानी से भी हो सकता है हाइपरटेंशन
प्रदूषण और प्लास्टिक के उपयोग से खराब हो रही किडनी
प्रदूषण और प्लास्टिक के उपयोग से खराब हो रही किडनी
विश्व गुर्दा दिवस आज
2.40 लाख सीकेडी के मरीज हैं उत्तर प्रदेश में जो कुल जनसंख्या का दस प्रतिशत है
2.5 पीएम के जरिए रक्त में प्रवेश कर सकते हैं प्लास्टिक जो किडनी को प्रभावित करता है
सीकेडी के प्रमुख लक्षण
• पेशाब में बदलाव
• हाथ, पैर, टखने या आंखों के नीचे सूजन
• सामान्य काम करने में जल्दी थक जाना
• खुजली और रूखी त्वचा
• भूख न लगना और मुंह में अजीब स्वाद या धातु जैसा स्वाद
• सांस लेने में कठिनाई
• बिना कारण लगातार ब्लड प्रेशर बढ़ना
• पेट या पीठ दर्द
लखनऊ
प्रदूषण, प्लास्टिक का अत्यधिक उपयोग और बढ़ती गर्मी (ग्लोबल वार्मिंग) का गंभीर असर सिर्फ पर्यावरण पर ही नहीं, बल्कि हमारे स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है।
एसजीपीजीआई में नेफ्रोलॉजी विभाग के अध्यक्ष प्रो. डॉ. नारायण प्रसाद के अनुसार, हवा में मौजूद सूक्ष्म कण, प्लास्टिक के माइक्रोपार्टिकल्स और बढ़ती गर्मी किडनी की कार्यक्षमता को धीरे-धीरे कमजोर कर सकते हैं।
दरअसल, हवा में मौजूद सूक्ष्म कण जैसे पीएम 2.5 फेफड़ों के जरिए रक्त में प्रवेश कर सकते हैं और किडनी तक पहुंच जाते हैं, जिससे किडनी की फिल्टर करने की क्षमता कम हो सकती है और क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) का खतरा बढ़ जाता है।
उत्तर प्रदेश में करीब दो करोड़ 40 लाख सीकेडी के मरीज हैं, जो कुल जनसंख्या का लगभग 10 प्रतिशत है।
प्रो. प्रसाद का कहना है कि वर्तमान में दुनिया भर में प्लास्टिक का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है। जब प्लास्टिक टूटता है तो माइक्रोप्लास्टिक व नैनोप्लास्टिक बनते हैं, जो भोजन, पानी और हवा के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। यह बात कई शोध में साबित हो चुकी है कि अधिक मात्रा में नैनोप्लास्टिक किडनी कोशिकाओं के आकार, कार्य और जीवित रहने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।
लंबे समय तक माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क से किडनी की संरचना और फिल्टरिंग क्षमता में असामान्य बदलाव हो सकते हैं। इसके अलावा अत्यधिक गर्मी में काम करने वाले लोगों में डिहाइड्रेशन और हीट-स्ट्रेस बढ़ जाता है। पानी की कमी से किडनी पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और लंबे समय में किडनी रोग का जोखिम बढ़ सकता है।
पिछले पांच वर्षों में किसानों एवं मजदूरों में क्रॉनिक किडनी डिजीज के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है।
एक अध्ययन में कैडमियम, आर्सेनिक और मरकरी जैसे विषैले धातुओं को किडनी रोग से जुड़ा पाया गया। ये तत्व अक्सर दूषित पानी, औद्योगिक कचरे और कृषि रसायनों के माध्यम से शरीर में पहुंचते हैं।
बताया कि विश्व गुर्दा दिवस का इस वर्ष का विषय जलवायु परिवर्तन के गुर्दों की बीमारियों पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में जागरूकता फैलाना है।
डायबिटीज व हाई ब्लड प्रेशर भी सीकेडी के लिए जिम्मेदार
प्रो. नारायण प्रसाद ने बताया कि मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा व डिसलिपिडेमिया भी सीकेडी के खतरे को बढ़ाते हैं। इसकी वजह से पेशाब में एल्ब्यूमिन के रिसाव होता है और धीरे-धीरे ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट में गिरावट आती है, जिससे गुर्दे की विफलता बढ़ जाती है।
हालांकि समय पर बीमारी की पहचान और सही इलाज से मरीज पूरी तरह ठीक भी हो सकता है।
उन्होंने कहा, क्रोनिक किडनी रोग को धीमा करने और रोकने के लिए प्रतिदिन 500 से 700 कैलोरी तक प्रतिबंध के साथ वजन कम करना, 150 मिनट का एरोबिक व्यायाम, रोजाना 0.8 ग्राम प्रति किलोग्राम प्रोटीन का सेवन, और हर दिन पांच ग्राम से कम नमक का सेवन जरूरी है।
रविवार, 8 मार्च 2026
चांसलर कप इंटर यूनिवर्सिटी क्रिकेट टूर्नामेंट के फाइनल में एसजीपीजीआई की जीत
चांसलर कप इंटर यूनिवर्सिटी क्रिकेट टूर्नामेंट के फाइनल में एसजीपीजीआई की जीत
लखनऊ। चांसलर कप इंटर यूनिवर्सिटी क्रिकेट टूर्नामेंट के फाइनल में संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) की टीम ने ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय की टीम को 4 विकेट से हराकर खिताब अपने नाम कर लिया।
यह टूर्नामेंट 28 फरवरी से 8 मार्च 2026 के बीच जनभवन के खेल मैदान में आयोजित किया गया, जिसका मुख्य आयोजन जनभवन और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम तकनीकी विश्वविद्यालय की ओर से किया गया। प्रतियोगिता में लखनऊ के आठ विश्वविद्यालयों ने भाग लिया।
फाइनल मुकाबले में एसजीपीजीआई के निदेशक पद्मश्री प्रो. राधा कृष्ण धीमन ने टॉस जीतकर पहले क्षेत्ररक्षण का निर्णय लिया। पहले बल्लेबाजी करते हुए भाषा विश्वविद्यालय की टीम 12 ओवर में 80 रन ही बना सकी।
81 रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए एसजीपीजीआई की शुरुआत अच्छी नहीं रही, लेकिन प्लेयर ऑफ द मैच पवन पाल और प्रवीण ने 15 गेंद शेष रहते टीम को जीत दिला दी। शाम को खेले गए मैत्री मैच में भी एसजीपीजीआई ने आखिरी गेंद पर जीत हासिल की।
पीजीआई में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का आयोजन
पीजीआई में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का आयोजन
एनीमिया , स्तन और सर्वाइकल कैंसर का कराते रहना चाहिए जांच
लखनऊ। संजय गांधी पीजीआई में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर महिला सशक्तिकरण और स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए। संयोजन जनरल हॉस्पिटल की वरिष्ठ चिकित्सक व नोडल अधिकारी डॉ. प्रेरणा कपूर ने किया, जिसमें संस्थान के फैकल्टी सदस्य, रेजिडेंट डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ और कर्मचारियों ने भाग लिया।
कार्यक्रम के दौरान डॉ. अंजू रानी, डॉ. पियाली भट्टाचार्य, डॉ. निधि, डॉ. इंदु लता और डॉ. रचना अग्रवाल ने महिला स्वास्थ्य, शिक्षा और जागरूकता से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर जानकारी दी। उन्होंने बताया कि महिलाओं को एनीमिया से बचाव के लिए आयरन युक्त भोजन, हरी सब्जियां, दाल और फलों का सेवन करना चाहिए तथा समय-समय पर हीमोग्लोबिन की जांच करानी चाहिए। साथ ही स्तन कैंसर और सर्वाइकल कैंसर की शुरुआती जांच, गर्भावस्था के दौरान नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।
जूनियर रेजिडेंट्स ने महिलाओं की उपलब्धियों पर आधारित क्विज प्रतियोगिता आयोजित की। नर्सिंग अधिकारियों ने कविता और अनुभव साझा करते हुए कार्यस्थल और परिवार के बीच संतुलन की चुनौतियों पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर अस्पताल की महिला सफाईकर्मियों और सहायिकाओं को सम्मानित कर उनके योगदान की सराहना की गई।
इसी क्रम में इंडियन सोसाइटी ऑफ एनेस्थीसियोलॉजिस्ट्स (आईएसए) लखनऊ चैप्टर की महिला चिकित्सकों और एसजीपीजीआई के डॉक्टरों ने “सैरिथॉन – वॉक इन साड़ी” का आयोजन किया। इसके बाद आम नागरिकों को सीपीआर, सांस की नली में अवरोध होने पर प्राथमिक सहायता, रिकवरी पोजीशन और मिर्गी के दौरे के दौरान देखभाल जैसे जीवनरक्षक कौशलों का प्रशिक्षण दिया गया।
आयोजन में डॉ. हेमलता, डॉ. दिव्या श्रीवास्तव, डॉ. संदीप साहू, श्रीमती नीमा पंत, डॉ. रचना, डॉ. अलका, डॉ. रुचि वर्मा, डॉ. सपना यादव, डॉ. वैशाली अग्रवाल, डॉ. आयुषी बग्गा और डॉ. इंदुबाला की सक्रिय भागीदारी रही।
शनिवार, 7 मार्च 2026
एसजीपीजीआई में एनएएमएस सेल का उद्घाटन, चिकित्सा शिक्षा व अनुसंधान को मिलेगा नया मंच
एसजीपीजीआई में एनएएमएस सेल का उद्घाटन, चिकित्सा शिक्षा व अनुसंधान को मिलेगा नया मंच
प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों के साथ मिलकर मिलकर बीमारियों के खिलाफ चलेगा जागरूकता अभियान
लखनऊ। संजय गांधी पीजीआई में शनिवार को नेशनल एकेडमी आफ मेडिकल साइंस (एनएएमएस इंडिया) के सहयोग से स्थापित एनएएमएस सेल का उद्घाटन किया गया। इस पहल का उद्देश्य देश में संक्रामक और गैर-संक्रामक रोगों के बढ़ते बोझ को कम करने के लिए चिकित्सा शिक्षा, प्रशिक्षण और अनुसंधान को मजबूत करना है। संस्थान के निदेशक एवं एनएएमएस सेल के संरक्षक प्रोफेसर आर.के. धीमन ने कहा कि एसजीपीजीआई का मूल जनादेश—रोगी देखभाल, शिक्षण और अनुसंधान—एनएएमएस इंडिया की अवधारणा से पूरी तरह मेल खाता है। इस साझेदारी से चिकित्सा शिक्षा और शोध गतिविधियों को नई गति मिलेगी। उन्होंने बताया कि संस्थान एनएएमएस इंडिया के साथ मिलकर भारत स्तर पर विभिन्न संक्रामक और गैर-संक्रामक रोगों के बोझ को नियंत्रित करने और कम करने के लिए विभिन्न कार्यबल विकसित करेगा। एनएएमएस सेल के नोडल अधिकारी प्रो संदीप साहू ने बताया कि उनकी टीम के नेतृत्व में यह सेल उत्तर प्रदेश के 85 से अधिक मेडिकल कॉलेजों में “हब-एंड-स्पोक मॉडल” के आधार पर कार्य करेगा। इसके तहत फैकल्टी और मेडिकल छात्रों के नेतृत्व विकास, शिक्षण, प्रशिक्षण और अनुसंधान गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाएगा। उद्घाटन समारोह में प्रोफेसर राजेंद्र प्रसाद (अध्यक्ष, एनएएमएस उत्तर प्रदेश राज्य), संस्थान के डीन प्रोफेसर शालीन कुमार, एनेस्थेसियोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो संजय धीराज, कार्यकारी रजिस्ट्रार कर्नल वरुण बाजपेयी, एनएएमएस सेल की सदस्य डॉ. दिव्या श्रीवास्तव और डॉ. सुरेंद्र सिंह भी मौजूद रहे। कार्यक्रम के दौरान प्रो राजेंद्र प्रसाद ने “छाती के एक्स-रे की नैदानिक व्याख्या” विषय पर उद्घाटन व्याख्यान दिया और चिकित्सकों को रोगों की शुरुआती पहचान में एक्स-रे की भूमिका के बारे में विस्तार से जानकारी दी। संस्थान के चिकित्सा अधीक्षक और अस्पताल प्रशासन विभाग के प्रोफेसर राजेश हर्षवर्धन ने कहा कि इस सेल की स्थापना से राज्य में चिकित्सा अनुसंधान, प्रशिक्षण और अकादमिक सहयोग को नया मंच मिलेगा।
शुक्रवार, 6 मार्च 2026
एआइ से ल्यूपस की जांच में नई सटीकता,
एआइ से ल्यूपस की जांच में सटीकता, इलाज की सफलता का भी लगेगा अनुमान
कुमार संजय
एआइ से ल्यूपस की जांच में नई सटीकता, इलाज की सफलता का भी लगेगा अनुमान कुमार संजय ल्यूपस जैसी जटिल ऑटो प्रतिरक्षी बीमारी की जांच अब और अधिक सटीक हो सकेगी।संजय गांधी पीजीआई ने एम्स नई दिल्ली, पीजीआई चंडीगढ़ और आईआईटी दिल्ली के सहयोग से एआइ( कृत्रिम बुद्धिमत्ता) आधारित न्यूरल नेटवर्क प्रणाली विकसित की है, जो जांच की सूक्ष्म तस्वीरों का विश्लेषण कर नए पैटर्न पहचानने के साथ इलाज की दिशा और उसकी सफलता का आकलन करने में मदद करेगी। क्लीनिकल इम्यूनोलॉजी विभाग के प्रो. रूद्रापन चटर्जी के अनुसार, ल्यूपस की पुष्टि के लिए एंटी न्यूक्लियर एंटीबॉडी (एएनए) जांच की जाती है। इस जांच में माइक्रोस्कोप के माध्यम से स्लाइड पर बनने वाले विशेष पैटर्न को देखकर बीमारी का निर्धारण किया जाता है। कई बार बहुत सूक्ष्म पैटर्न मानवीय आंख से छूट जाते हैं या उनकी पहचान में भ्रम हो जाता है। नई विकसित प्रणाली ऐसे मामलों में स्पष्ट और सटीक विश्लेषण उपलब्ध कराएगी। पीजीआई के क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी विभाग की पूर्व प्रमुख और एम्स बीबी नगर की निदेशक प्रोफेसर अमिता अग्रवाल के मुताबिक अब तक इस नेटवर्क में 5 हजार से अधिक एएनए पैटर्न की तस्वीरें अपलोड की जा चुकी हैं। सहयोगी संस्थानों में हुई जांच की डिजिटल तस्वीरों को सुरक्षित कर आईआईटी दिल्ली भेजा गया, जहां विशेषज्ञों ने उन्हें प्रणाली में सम्मिलित कर विश्लेषण के लिए प्रोग्रामिंग कर रहे है। विश्लेषण के दौरान कुछ नए पैटर्न सामने आए हैं और पहले अनदेखे रहे संकेतों की भी पहचान संभव हुई है। एम्स नई दिल्ली के प्रो. रंजन गुप्ता और पीजीआई चंडीगढ़ के डॉ. माली भावा भी इस शोध दल का हिस्सा हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पैटर्न की सटीक जानकारी मिलने से न केवल बीमारी की पुष्टि अधिक विश्वसनीय होगी, बल्कि मरीज के लिए उपयुक्त इलाज तय करने और उपचार की प्रगति पर नजर रखने में भी सहायता मिलेगी।
क्या है ल्यूपस ल्यूपस
ऑटो प्रतिरक्षी बीमारी है, जिसमें शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता अपने ही स्वस्थ ऊतकों और अंगों पर हमला करने लगती है। इससे त्वचा, जोड़ों, किडनी, हृदय और अन्य अंग प्रभावित हो सकते हैं। इसके प्रमुख लक्षणों में अत्यधिक थकान, जोड़ों में दर्द, बुखार तथा चेहरे पर तितली के आकार का दाग शामिल हैं। समय पर जांच और नियमित उपचार से इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है। प्रति 1 लाख आबादी में लगभग 20 से 70 लोग ल्यूपस से प्रभावित हो सकते हैं। भारत की जनसंख्या को देखते हुए यह संख्या लगभग 3 लाख से 10 लाख लोगों के बीच हो सकती है। यह बीमारी महिलाओं में पुरुषों की तुलना में लगभग 8 से 9 गुना अधिक पाई जाती है, खासकर 15 से 45 वर्ष की आयु वर्ग में। चूंकि जागरूकता और जांच की सुविधाएं बढ़ रही हैं, इसलिए आने वाले वर्षों में पंजीकृत मामलों की संख्या और अधिक स्पष्ट हो सकती है।
गुरुवार, 5 मार्च 2026
43 कंपनियों का 3.53 लाख करोड़ माफ
43 कंपनियों का 3.53 लाख करोड़ ‘हेयरकट’: जनता पर पड़ता बोझ और अर्थव्यवस्था का बड़ा सवाल
भारत आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आधार पर देश वैश्विक स्तर पर शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और आर्थिक विकास की रफ्तार भी कई विकसित देशों से तेज बताई जाती है। लेकिन जब इस विकास को आम नागरिक की जिंदगी से जोड़कर देखा जाता है, तो तस्वीर उतनी चमकदार नहीं दिखती। प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत अब भी कई देशों से पीछे है और वैश्विक रैंकिंग में लगभग 140 के आसपास स्थान बताया जाता है।
इसी पृष्ठभूमि में कॉरपोरेट कर्ज और बैंकों द्वारा लिए गए “हेयरकट” का मुद्दा लगातार बहस का विषय बना हुआ है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 43 बड़ी कंपनियों पर करीब 5.44 लाख करोड़ रुपये का कर्ज बकाया था। दिवालिया प्रक्रिया के बाद बैंकों को इनमें से केवल लगभग 1.90 लाख करोड़ रुपये ही वापस मिल सके। यानी करीब 3.53 लाख करोड़ रुपये का हिस्सा बैंकों को छोड़ना पड़ा, जिसे वित्तीय भाषा में “हेयरकट” कहा जाता है।
भले ही इसे तकनीकी रूप से कर्ज माफी नहीं कहा जाता, लेकिन आम जनता के नजरिये से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इतनी बड़ी रकम का नुकसान कौन उठाता है। बैंकों का पैसा दरअसल जनता का ही पैसा होता है—क्योंकि वही पैसा लोगों की जमा पूंजी, सरकारी निवेश और टैक्स के रूप में बैंकिंग व्यवस्था में आता है। जब हजारों करोड़ रुपये की वसूली नहीं हो पाती, तो उसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
इसी कारण आलोचक यह सवाल उठाते हैं कि जब बड़ी कंपनियों के कर्ज में इस तरह भारी “हेयरकट” लिया जाता है, तो वही उदारता किसानों, छोटे व्यापारियों या आम नागरिकों के कर्ज के मामले में क्यों नहीं दिखाई देती। देश में लाखों किसान आज भी कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं। कई राज्यों में किसानों की आत्महत्या की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं।
यदि तुलना की जाए तो कहा जाता है कि 3.53 लाख करोड़ रुपये जैसी विशाल राशि से किसानों का कर्ज कई बार तक राहत देने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता था, या फिर स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के क्षेत्रों में बड़े स्तर पर निवेश किया जा सकता था।
यही कारण है कि आर्थिक नीतियों को लेकर यह बहस तेज होती जा रही है कि विकास का वास्तविक लाभ किसे मिल रहा है। एक ओर देश की जीडीपी तेजी से बढ़ने के दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर बड़ी आबादी अब भी महंगाई, बेरोजगारी और कम आय की समस्या से जूझ रही है।
भारत की अर्थव्यवस्था के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या विकास का लाभ केवल कुछ बड़े कॉरपोरेट समूहों तक सीमित रहेगा, या फिर उसकी पहुंच गांवों, किसानों और आम नागरिकों तक भी होगी।
आने वाले समय में नीति-निर्माताओं के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती होगी कि आर्थिक फैसलों में पारदर्शिता और संतुलन सुनिश्चित किया जाए, ताकि देश की संपत्ति का लाभ केवल कुछ हाथों में सिमटने के बजाय देश की पूरी जनता तक पहुंचे।
सामाजिक समरसता मंच और भारत रक्षा दल ने मिलकर किया यूजीसी का विरोध
सामाजिक समरसता मंच और भारत रक्षा दल ने मिलकर किया यूजीसी का विरोध
सामाजिक समरसता मंच एवं भारत रक्षा दल ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में आज श्री लक्ष्मी गणेश मंदिर एलडीए कॉलोनी में होली मिलन के कार्यक्रम के साथ-साथ यूजीसी के मुद्दे पर आगामी 8 मार्च को दिल्ली के रामलीला मैदान में होने वाली विशाल रैली में लोगों को चलने के लिये अपील के निम्मित हुई।मीटिंग की अध्यक्षता कमल किशोर शर्मा ने एवं संचालन भारत रक्षा दल ट्रस्ट के श्रीनिवास राष्ट्रवादी ने किया।इस मौके पर सामाजिक समरसता मंच के संयोजक दुर्गेश पांडेय, क्षेत्र के प्रबुद्ध समाजसेवी श्याम कृष्ण राय ,पंडित शिव बिहारी द्विवेदी,संजय त्रिपाठी,दीपा त्रिवेदी,संध्या सिन्हा,डाक्टर शशि मिश्रा,सरोज बाला सोनी,रवि शंकर चौबे, आहुलवालिया, चंद्रा शुक्ला, कमलेश शुक्ला, वेद श्रीवास्तव संदीप शुक्ला, रवि शंकर चौबे, विशाल गुप्ता, नवीन श्रीवास्तव, संजय मिश्रा सहित सैकड़ो लोग मौजूद थे।मीटिंग में इस मुद्दे पर भविष्य पर होने वाले बड़े आंदोलन की संभावनाओं को देखते हुए क्षेत्रशह बैठकों और लोगो को इस मुद्दे पर जागरूक करने पर बोल देते हुए सभी को होली की बधाई ज्ञापित कर कार्यक्रम का समापन किया गया । सभी लोगों ने कहा कि यूजीसी का जो कानून है यह समाज को बांटने वाला है हम जाट विहीन समाज की तरफ जा रहे है। जाति के आधार पर भेदभाव सामाजिक स्तर पर खत्म हो रहा लेकिन सरकार इसको बढ़ावा दे रही है। जाति के आधार पर बनने वाले कानून खत्म कर इंसानियत का कानून होना चाहिए तभी एक मजबूत देश बनेगा।
पीजीआई में अत्याधुनिक न्यूरो-ओटोलॉजी लैब का उद्घाटन
पीजीआई में अत्याधुनिक न्यूरो-ओटोलॉजी लैब का उद्घाटन, जटिल श्रवण रोगों की जांच व इलाज में मिलेगी मदद
बच्चों में सुनने की समस्या का समय से पहचान जरुरी
लखनऊ। संजय गांधी पीजीआई में वर्ल्ड हियरिंग डे 2026 के अवसर पर अत्याधुनिक न्यूरो-ओटोलॉजी लैब का उद्घाटन किया गया। संस्थान के निदेशक प्रो. आर. के. धीमान ने इस लैब का शुभारंभ किया। इस मौके पर मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रो. देवेंद्र गुप्ता और न्यूरोसर्जरी विभागाध्यक्ष प्रो. अवधेश जायसवाल भी मौजूद रहे।
नई न्यूरो-ओटोलॉजी लैब में श्रवण और संतुलन से जुड़ी बीमारियों की जांच के लिए अत्याधुनिक उपकरण लगाए गए हैं। इनकी मदद से सामान्य और जटिल कोक्लियर इम्प्लांट मामलों की बेहतर योजना बन सकेगी और मरीजों के इलाज को अधिक सटीक बनाया जा सकेगा। विशेषज्ञों के अनुसार यह लैब कान से जुड़े तंत्रिका तंत्र की समस्याओं, चक्कर आने की शिकायत और बच्चों में सुनने की क्षमता से जुड़ी दिक्कतों की पहचान में विशेष रूप से सहायक होगी।
इस अवसर पर न्यूरोसर्जरी विभाग की न्यूरो-ओटोलॉजी यूनिट के प्रमुख डॉ. रवि शंकर ने कहा कि बच्चों में सुनने की समस्या की समय पर पहचान बेहद जरूरी है। यदि शुरुआती अवस्था में इसका पता चल जाए तो बच्चे के भाषण, भाषा विकास, सीखने की क्षमता और सामाजिक विकास पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उन्होंने कहा कि समुदाय की भागीदारी से बच्चों में श्रवण समस्याओं की पहचान और उपचार को और बेहतर बनाया जा सकता है।
कार्यक्रम में एसजीपीजीआई परिसर स्थित केंद्रीय विद्यालय के विद्यार्थियों ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया और श्रवण स्वास्थ्य से संबंधित जानकारी प्राप्त की। इसके अलावा कोक्लियर इम्प्लांट सर्जरी करा चुके बच्चों के अभिभावकों तथा संभावित मरीजों के परिजनों ने भी कार्यक्रम में हिस्सा लिया और अपने अनुभव साझा किए।
प्रो. धीमान ने कहा कि सुनने की कमी एक “मूक विकलांगता” है, जो धीरे-धीरे बढ़ती है, लेकिन समय पर जांच और उपचार से इसे काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार के सहयोग से पीजीआई बच्चों के श्रवण स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।
कार्यक्रम का आयोजन वर्ल्ड हियरिंग डे 2026 की थीम “कम्युनिटीज टू क्लासरूम्स – हियरिंग केयर फॉर एवरी चाइल्ड” (कम्युनिटीज टू क्लासरूम्स – हियरिंग केयर फॉर एवरी चाइल्ड) के तहत किया गया।
सोमवार, 2 मार्च 2026
अंगदान करने वाले दो परिवारों को मिले 10-10 हजार रुपये
अंगदान करने वाले दो परिवारों को मिले 10-10 हजार रुपये
राज्य अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (सोटो) की ओर से हाल में दो ब्रेन डेड रोगियों के अंगदान करने वाले परिवारों को 10-10 हजार रुपये दिये गए हैं। सोटो के संयुक्त निदेशक व पीजीआई के एमएस डॉ. राजेश हर्षवर्धन ने बताया कि मृत अंगदाता के सम्मानजनक अंतिम संस्कार के लिए उनके परिवार को 10 हजार की आर्थिक सहायता दी जाती है। छह नवंबर 2025 को सेंट्रल कमाण्ड हॉस्पिटल में 56 वर्षीय भगवंती देवी के ब्रेन डेड घोषित किये जाने के बाद उनके विनोद कुमार यादव ने अंगदान की सहमति पर तीन मरीजों को नया जीवन मिला। वहीं 22 फरवरी को सड़क हादसे में घायल 43 वर्षीय संदीप कुमार के पीजीआई के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में ब्रेन स्टेम डेड घोषित जाने के बाद पत्नी लक्ष्मी देवी ने अंगदान की अनुमति दी थी। तीन रोगियों को नया जीवन मिला था। पीजीआई निदेशक डॉ. आरके धीमान के नेतृत्व में दोनों अंगदाताओं के परिजनों को 10-10 हजार की सहायता राशि डीबीटी के माध्यम से भेज गई है।
हेडफोन बच्चों के सुनने की क्षमता कर रहा है प्रभावित
पीजीआई में विश्व श्रवण दिवस पर जागरूकता कार्यक्रम
60 प्रतिशत मामलों में श्रवण हानि को रोकना संभव
हेडफोन बच्चों के सुनने की क्षमता कर रहा है प्रभावित
उत्तर प्रदेश में करीब एक करोड़ सुनने की परेशानी से ग्रस्त
लखनऊ।
संजय गांधी गांधी पीजीआई के हेड एंड नेक सर्जरी विभाग द्वारा विश्व श्रवण दिवस पर जागरूकता कार्यक्रम में विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अमित केशरी और डॉक्टर रूद्र प्रकाश ने बताया कि भारत में लगभग 6.3 करोड़ लोग किसी न किसी स्तर की सुनने की समस्या से प्रभावित हैं। जनसंख्या के अनुपात के आधार पर उत्तर प्रदेश में करीब 90 लाख से एक करोड़ लोग श्रवण हानि से जूझ रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या बच्चों की है। यदि बच्चों में सुनने की समस्या समय पर नहीं पहचानी जाती तो इसका सीधा असर बोलने, सीखने, पढ़ाई और सामाजिक विकास पर पड़ता है।
प्रो. केशरी के अनुसार, बच्चों में श्रवण हानि के प्रमुख कारणों में जन्मजात समस्याएं, समय से पहले जन्म, बार-बार कान में संक्रमण, तेज आवाज का संपर्क, मोबाइल व हेडफोन का अत्यधिक उपयोग और कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव शामिल हैं। उन्होंने कहा कि लगभग 60 प्रतिशत मामलों में श्रवण हानि को रोका या नियंत्रित किया जा सकता है, बशर्ते समय पर जांच और इलाज हो। उपचार में दवाइयां, सर्जरी, हियरिंग एड, कॉक्लियर इम्प्लांट और स्पीच व ऑडियोलॉजिकल थेरेपी कारगर साबित होती हैं।
प्रो केशरी ने बताया कि इस वर्ष की थीम रही— “समुदायों से कक्षाओं तक: सभी बच्चों के लिए श्रवण देखभाल”। निदेशक प्रो. आर. के. धीमान के संरक्षण में लखनऊ के दो प्रमुख विद्यालयों—द मिलेनियम स्कूल और केंद्रीय विद्यालय—में श्रवण जागरूकता व्याख्यान, स्क्रीनिंग शिविर और पोस्टर प्रतियोगिता आयोजित की गई। बच्चों की प्योर टोन ऑडियोमेट्री जांच की गई और जरूरतमंद विद्यार्थियों को एसजीपीजीआई में निःशुल्क परामर्श के लिए रेफर किया गया।
दोनों विद्यालयों के कक्षा 1 से 8 तक के 150 से अधिक बच्चों ने पोस्टर प्रतियोगिता में भाग लिया। 2 मार्च को आयोजित पुरस्कार वितरण समारोह में एसजीपीजीआई के डीन प्रो. शलीन कुमार ने बच्चों में ऐसे जागरूकता कार्यक्रमों को भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक बताया। विभाग के प्रोफेसर रुद्रा ने कहा कि समय पर जांच, सही इलाज और जागरूकता से बच्चों को श्रवण हानि से बचाया जा सकता है।
एसजीआरटी तकनीक से कैंसर रेडियोथेरेपी में क्रांतिकारी बदलाव
एसजीआरटी तकनीक से कैंसर रेडियोथेरेपी में क्रांतिकारी बदलाव
लखनऊ में राष्ट्रीय सम्मेलन, विशेषज्ञों ने रखी तकनीकी दृष्टि
कैंसर उपचार के क्षेत्र में सटीकता, सुरक्षा और गुणवत्ता को नई ऊंचाई देने वाली सतह निर्देशित विकिरण चिकित्सा (एसजीआरटी) तकनीक अब भारत में तेजी से अपनाई जा रही है। कल्याण सिंह कैंसर संस्थान के प्रो प्रमोद कुमार गुप्ता ने बताया कि यह आधुनिक तकनीक मरीज की शरीर की सतह की वास्तविक समय में निगरानी कर रेडियोथेरेपी को अत्यंत सटीक बनाती है, जिससे विकिरण केवल कैंसरग्रस्त भाग तक सीमित रहता है और आसपास के स्वस्थ अंग सुरक्षित रहते हैं।
एसजीआरटी तकनीक में कैमरा आधारित त्रि-आयामी सतह इमेजिंग प्रणाली का उपयोग किया जाता है। इसके माध्यम से उपचार के दौरान मरीज की स्थिति पर लगातार नजर रखी जाती है। यदि मरीज की पोजिशन में हल्का सा भी बदलाव होता है, तो प्रणाली स्वतः संकेत देती है या उपचार रोक दिया जाता है। इससे
मरीज की पोजिशन में होने वाली त्रुटियों में कमी आती है,
अनावश्यक विकिरण जोखिम घटता है,
हृदय, फेफड़े जैसे महत्वपूर्ण अंगों की बेहतर सुरक्षा होती है,
और उपचार के परिणाम अधिक प्रभावी होते हैं।
विशेषज्ञों ने बताया कि स्तन कैंसर के उपचार में डीप इंस्पिरेशन ब्रीथ होल्ड (डीआईबीएच) तकनीक के साथ एसजीआरटी का प्रयोग हृदय को विकिरण से बचाने में अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो रहा है। वहीं स्टीरियोटैक्टिक बॉडी रेडियोथेरेपी (एसबीआरटी) तथा श्वसन आधारित नियंत्रित उपचारों में भी यह तकनीक उच्च स्तर की सटीकता सुनिश्चित करती है।
इन सभी तकनीकी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग, कल्याण सिंह कैंसर संस्थान द्वारा आयोजित “एसजीआरटी भारत: भारत में विकिरण चिकित्सा को आगे बढ़ाना” विषयक राष्ट्रीय सम्मेलन में की गई। सम्मेलन में रेडिएशन ऑन्कोलॉजी, मेडिकल फिजिक्स और उन्नत रेडियोथेरेपी तकनीकों से जुड़े देश-विदेश के विशेषज्ञों ने भाग लिया।
सम्मेलन की प्रमुख बातें
एसजीआरटी को आधुनिक रेडियोथेरेपी की एक परिवर्तनकारी तकनीक के रूप में प्रस्तुत किया गया
सिर एवं गर्दन, स्तन तथा श्रोणि क्षेत्र के कैंसर उपचार में इसके क्लिनिकल लाभ साझा किए गए
डीआईबीएच, एसबीआरटी और श्वसन नियंत्रित उपचारों में हुई नवीन प्रगति पर तकनीकी सत्र
भारत में एसजीआरटी के भविष्य और विस्तार को लेकर विशेषज्ञ पैनल चर्चा
लाइव कार्यशाला, जिसमें एसजीआरटी तकनीक का व्यावहारिक प्रदर्शन किया गया
संस्थान के निदेशक प्रो एम एल बी भट्ट ने कहा कि इस प्रकार की उन्नत तकनीकों से कैंसर उपचार को अधिक सुरक्षित, सटीक और मरीज-केंद्रित बनाया जा सकता है।
सम्मेलन की सफलता में तकनीकी सहयोग प्रदान करने के लिए रोहित मेहता का विशेष योगदान रहा।
आयोजकों ने कहा कि ऐसे शैक्षणिक और तकनीकी सम्मेलन भारत में कैंसर उपचार को वैश्विक मानकों के अनुरूप विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026
नर्सिंग अधिकारी पर सामूहिक हमला, ए आई आर एफ ने राज्यपाल से की कड़ी कार्रवाई और सुरक्षा की मांग
बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर में नर्सिंग अधिकारी पर सामूहिक हमला,
ए आई आर एफ ने राज्यपाल से की कड़ी कार्रवाई और सुरक्षा की मांग
बी.आर.डी. मेडिकल कॉलेज, गोरखपुर में ड्यूटी पर तैनात एक नर्सिंग अधिकारी पर एमबीबीएस छात्रों द्वारा कथित रूप से सामूहिक हमला किए जाने का गंभीर मामला सामने आया है। इस घटना को लेकर ऑल इंडिया रजिस्टर्ड नर्स फडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष अनुराग वर्मा
ने उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल को पत्र लिखकर तत्काल संज्ञान लेने, निष्पक्ष जांच कराने और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।
फेडरेशन के उत्तर प्रदेश समिति की ओर से भेजे गए पत्र के अनुसार, 26 फरवरी 2026 की रात लगभग 1:30 बजे बीआरडी मेडिकल कॉलेज में यह घटना हुई। आरोप है कि ड्यूटी के दौरान 15–20 एमबीबीएस छात्रों ने नर्सिंग अधिकारी पर हमला किया, जिसमें उन्हें शारीरिक चोटें आईं। हमले के दौरान अभद्रता और अपमानजनक व्यवहार किए जाने का भी आरोप है। पीड़ित नर्सिंग अधिकारी ने इस संबंध में अस्पताल प्रशासन और संबंधित अधिकारियों को लिखित शिकायत सौंप दी है।
AIRNF ने पत्र में कहा है कि नर्सिंग अधिकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ होते हैं और 24×7 मरीजों की सेवा में तत्पर रहते हैं। ऐसे में उनके साथ हिंसा, अपमान और भय का माहौल न केवल नर्सिंग समुदाय का मनोबल तोड़ता है, बल्कि पूरे स्वास्थ्य सेवा तंत्र को कमजोर करता है। संगठन ने इसे निंदनीय और अस्वीकार्य बताते हुए कहा कि नर्सिंग पेशा केवल रोजगार नहीं, बल्कि सेवा, त्याग और मानवता का प्रतीक है, जिसकी गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य का संवैधानिक व नैतिक दायित्व है।
फेडरेशन ने मांग की है कि घटना की उच्चस्तरीय, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराई जाए तथा दोषी छात्रों के खिलाफ विधिसम्मत कड़ी कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साथ ही प्रदेश के सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में नर्सिंग अधिकारियों की सुरक्षा के लिए स्थायी सुरक्षा व्यवस्था—पुलिस सहायता केंद्र, पर्याप्त सुरक्षा गार्ड और सीसीटीवी निगरानी—लागू की जाए।
इसके अलावा, ए आईं आर एन एफ ने सभी स्वास्थ्य संस्थानों में “हेल्थकेयर वर्कर प्रोटेक्शन एक्ट” को अनिवार्य रूप से प्रभावी ढंग से लागू करने की भी मांग की है, ताकि नर्सिंग अधिकारियों सहित सभी स्वास्थ्यकर्मी सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण में कार्य कर सकें।
पत्र के अंत में संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते कठोर और उदाहरणात्मक कार्रवाई नहीं हुई, तो इससे व्यापक असंतोष की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। फेडरेशन ने राज्यपाल से इस गंभीर विषय में शीघ्र हस्तक्षेप कर न्याय और सुरक्षा सुनिश्चित करने का आग्रह किया है।
किडनी क्यों नहीं मिल पाती?—भारत में अंग प्रत्यारोपण की सच्चाई पर गंभीर सवाल
किडनी क्यों नहीं मिल पाती?—भारत में अंग प्रत्यारोपण की सच्चाई पर गंभीर सवाल
“मुझे किडनी क्यों नहीं मिल पा रही?”—यह सवाल हाल ही में 90 वर्ष से अधिक उम्र के एक बुज़ुर्ग ने अपने परिजन से किया। यही प्रश्न आज भारत में लाखों किडनी रोगियों की पीड़ा को दर्शाता है। वरिष्ठ नागरिक और चिकित्सक संजय गांधी पीजीआई के क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी विभाग की पूर्व प्रमुख प्रोफेसर सीता नाइक के एक लेख ने एक बार फिर देश में किडनी प्रत्यारोपण की जमीनी हकीकत और उससे जुड़े नैतिक, सामाजिक व कानूनी पहलुओं पर बहस छेड़ दी है।
लेख के अनुसार, ब्रिटेन में लगभग 7,000 लोग किडनी प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा में हैं और हर साल करीब आधे मरीजों को किडनी मिल जाती है। वहीं भारत में स्थिति बेहद गंभीर है। करीब 14 करोड़ की आबादी वाले देश में लगभग दो लाख मरीज किडनी के इंतज़ार में हैं, लेकिन सालाना केवल 6,000 के आसपास ही प्रत्यारोपण हो पाते हैं। यानी 100 में से सिर्फ 3 मरीजों को ही नई किडनी नसीब हो पाती है।
भारत में पहली किडनी प्रत्यारोपण सर्जरी 1971 में क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर में हुई थी। बाद में प्रत्यारोपण को कानूनी और नैतिक ढांचे में लाने के लिए 1994 में मानव अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम (THOTA) लागू किया गया। इस कानून के तहत केवल नज़दीकी रिश्तेदार या विशेष परिस्थितियों में अनुमति लेकर अन्य दाता अंगदान कर सकते हैं। अंगों की खरीद-फरोख्त को पूरी तरह अवैध और अनैतिक माना गया।
हालांकि, हकीकत यह है कि मांग और आपूर्ति के बड़े अंतर ने अवैध अंग व्यापार को जन्म दिया है। गरीब और हाशिए पर खड़े लोग इस नेटवर्क का आसान शिकार बनते हैं, जिसमें बिचौलिये से लेकर कुछ स्वास्थ्यकर्मी तक शामिल पाए गए हैं।
इस संदर्भ में लेख में ईरान का उदाहरण दिया गया है, जहां 1988 से किडनी की नियंत्रित बिक्री को कानूनी मान्यता है। वहां प्रतीक्षा सूची नहीं है और सरकारी निगरानी में मरीजों को अपेक्षाकृत कम लागत में किडनी मिल जाती है। दाता को सीधे भुगतान किया जाता है।
लेख में यह भी उल्लेख है कि हाल ही में द गार्डियन में प्रकाशित एक लेख में इस बात पर सवाल उठाया गया कि क्या केवल ‘परोपकार’ के भरोसे अंगदान की जरूरतें पूरी हो सकती हैं। लेखक का तर्क है कि यदि समाज गरीबों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए ठोस कदम नहीं उठाता, तो केवल शोषण के डर से भुगतान आधारित व्यवस्था को खारिज करना भी पाखंड हो सकता है।
संजय गांधी पीजीआई के नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो नारायण प्रसाद के मुताबिक भारत में उच्च रक्तचाप और मधुमेह के बढ़ते मामलों के चलते भविष्य में किडनी फेल्योर के मरीज और बढ़ने की आशंका है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या मौजूदा नीति पर्याप्त है, या फिर इस संवेदनशील मुद्दे पर नए सिरे से खुली और ईमानदार बहस की जरूरत है।
यह रिपोर्ट न तो अंगों की बिक्री की खुली वकालत करती है और न ही मौजूदा कानूनों को खारिज करती है, लेकिन यह जरूर कहती है कि “किडनी क्यों नहीं मिल पाती?”—इस सवाल से अब मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।
कॉर्निया प्रत्यारोपण को नई रफ्तार, 11 से बढ़कर 21 होंगे आई बैंक व ट्रांसप्लांट सेंटर
पीजीआई में नेत्र मंथन
प्रदेश में कॉर्निया प्रत्यारोपण को नई रफ्तार, 11 से बढ़कर 21 होंगे आई बैंक व ट्रांसप्लांट सेंटर
लखनऊ।
प्रदेश में कॉर्निया प्रत्यारोपण की बढ़ती आवश्यकता को देखते हुए स्टेट ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (सॉट्टो–उ.प्र.) ने बड़ा कदम उठाया है। वर्तमान में प्रदेश में संचालित 11 सरकारी कॉर्निया रिट्रीवल (आई बैंक) और प्रत्यारोपण सेंटरों की संख्या बढ़ाकर 21 करने की योजना पर काम शुरू कर दिया गया है। इस योजना को अगले 18 महीनों में चरणबद्ध रूप से लागू करने का लक्ष्य रखा गया है।
यह जानकारी संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान के चिकित्सा अधीक्षक एवं सॉट्टो–उ.प्र. के संयुक्त निदेशक प्रो. राजेश हर्षवर्धन तथा नेत्र विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. विकास कन्नौजिया ने ‘नेत्र मंथन’ कार्यक्रम के दौरान दी। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश में हर वर्ष लगभग 18 हजार मरीजों को कॉर्निया प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है, जबकि वर्तमान में केवल 1200 से 1500 प्रत्यारोपण ही हो पा रहे हैं। इस अंतर के कारण हजारों लोग दृष्टिहीनता का सामना कर रहे हैं।
राज्य-स्तरीय मंथन सत्र
उत्तर प्रदेश में कॉर्नियल दान एवं प्रत्यारोपण की वर्तमान स्थिति और भावी दिशा पर केंद्रित राज्य-स्तरीय विचार-मंथन सत्र का आयोजन 28 फरवरी 2026 को डी. के. छाबड़ा सभागार, एसजीपीजीआईएमएस, लखनऊ में किया गया। इस सत्र का संयुक्त आयोजन सॉट्टो–उ.प्र., अस्पताल प्रशासन विभाग और नेत्र विज्ञान विभाग द्वारा किया गया।
कार्यक्रम में चिकित्सा शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव श्री अमित कुमार घोष ने योजना को सहमति प्रदान करते हुए सरकार के पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं की सहभागिता से नेत्रदान के प्रति सकारात्मक वातावरण बनेगा और कॉर्नियल प्रत्यारोपण सेवाओं का तेजी से विस्तार संभव होगा।
कॉर्नियल अंधत्व: गंभीर जनस्वास्थ्य चुनौती
सत्र में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, देश में हर वर्ष प्राप्त किए गए कॉर्निया और वास्तविक प्रत्यारोपण में उपयोग हुए कॉर्निया के बीच बड़ा अंतर बना रहता है। गुणवत्ता, संक्रमण और समयबद्धता के कारण अनेक कॉर्निया प्रत्यारोपण के योग्य नहीं रह पाते।
नेशनल ऑर्गन और टिशु ट्रांसप्लांट (नॉटो) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में कॉर्नियल अंधत्व से पीड़ित लोगों की संख्या लगभग 10 से 12 लाख है और प्रतिवर्ष 20 से 25 हजार नए मामले जुड़ते हैं। यह समस्या बाल्यावस्था अंधत्व के प्रमुख कारणों में भी शामिल है।
कॉर्नियल अंधत्व के प्रमुख कारणों में
कॉर्निया संक्रमण (बैक्टीरियल, फंगल और वायरल),
आंखों में आघात एवं रासायनिक चोटें,
मोतियाबिंद सर्जरी के बाद उत्पन्न जटिलताएं,
विटामिन-ए की कमी,
जन्मजात कॉर्नियल विकार,
तथा पारंपरिक हानिकारक नेत्र उपचार प्रथाएं शामिल हैं।
विशेषज्ञों ने कहा कि समयबद्ध दान और सुदृढ़ प्रत्यारोपण व्यवस्था से इस अंधत्व को अधिकांश मामलों में रोका और उपचारित किया जा सकता है।
पीजीआई में जल्द शुरू होंगी सेवाएं
प्रो. विकास कन्नौजिया ने बताया कि संस्थान में एक वर्ष के भीतर कॉर्निया रिट्रीवल और प्रत्यारोपण सेवाएं शुरू कर दी जाएंगी। मृत्यु के छह घंटे के भीतर कॉर्निया प्राप्त करना गोल्डन आवर माना जाता है।
उन्होंने बताया कि 100 सफल प्रत्यारोपण के लिए औसतन 170 कॉर्निया की आवश्यकता होती है, क्योंकि तकनीकी कारणों से लगभग 70 कॉर्निया अनुपयोगी हो जाते हैं। कॉर्निया रिट्रीवल प्रशिक्षित ऑप्थैल्मिक टेक्नोलॉजिस्ट द्वारा किया जा सकता है, जबकि प्रत्यारोपण केवल विशेषज्ञ नेत्र सर्जन द्वारा ही किया जाता है।
संस्थान के निदेशक प्रो. आर. के. धीमन ने कहा कि आवश्यक मानव संसाधन, उपकरण और लॉजिस्टिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। उन्होंने प्रत्यारोपण समन्वयकों की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
विशेषज्ञों के विचार
नॉटो के निदेशक डॉ. अनिल कुमार ने कहा कि अंग और ऊतक दान की सुदृढ़ संस्कृति विकसित करने के लिए केवल जन-जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं हैं। अस्पतालों में संभावित दाताओं की समयबद्ध पहचान, परिजनों से संवेदनशील संवाद और पारदर्शी आवंटन व्यवस्था आवश्यक है।
आगरा मेडिकल कॉलेज की नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. शेफाली मजूमदार ने कहा कि डेटा-आधारित दृष्टिकोण, डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम, अस्पताल-आधारित दाता पहचान और प्रत्यारोपण समन्वयकों का प्रशिक्षण इस तंत्र को मजबूत बना सकता है।
साझा संकल्प
विचार-मंथन सत्र में यह निष्कर्ष निकला कि आई बैंक नेटवर्क के विस्तार, तकनीक आधारित निगरानी, जन-जागरूकता और संस्थागत समन्वय से कॉर्निया दान और प्रत्यारोपण के बीच की खाई को पाटा जा सकता है।
कार्यक्रम का समापन इस संदेश के साथ हुआ—
“जीवन से परे सोचें, आज ही नेत्रदाता बनें।”
अगर आप चाहें तो मैं
आरोप सिद्ध नहीं हुए, पर राजनीति बदल गई
आरोप सिद्ध नहीं हुए, पर राजनीति बदल गई
भारतीय लोकतंत्र में “आरोप की राजनीति”, गिरफ्तारी और सत्ता परिवर्तन का यथार्थ
भारतीय राजनीति में अब यह लगभग स्थापित सच बन चुका है कि किसी नेता को दोषी साबित करना आवश्यक नहीं है—उस पर आरोप लगा देना, जांच शुरू करा देना और गिरफ्तारी की स्थिति बना देना ही पर्याप्त है।
न्यायालय बाद में क्या कहेगा, यह राजनीति के लिए अब गौण हो चुका है।
इस प्रवृत्ति ने न केवल विपक्षी दलों को, बल्कि सत्ता पक्ष को भी हथियार दिया है, ताकि वह अपने ही सहयोगियों या असहज नेताओं को रास्ते से हटा सके।
अरविंद केजरीवाल: आरोप, गिरफ्तारी और राजनीतिक क्षरण
दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे अरविंद केजरीवाल पर शराब नीति सहित कई आरोप लगे। अब तक कोई अंतिम न्यायिक निर्णय ऐसा नहीं है जिससे यह कहा जा सके कि वे दोषी सिद्ध हुए हैं।
फिर भी जांच एजेंसियों की कार्रवाई और गिरफ्तारी ने उनके राजनीतिक नैरेटिव को गहरी चोट पहुंचाई।
यहां यह स्पष्ट दिखता है कि गिरफ्तारी स्वयं सजा में बदल चुकी है, भले ही दोष सिद्ध न हुआ हो।
कांग्रेस: अदालत से बरी, राजनीति से बाहर
2004–2014 के दौरान सत्ता में रही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सरकार पर एक के बाद एक बड़े घोटालों के आरोप लगे—
2G स्पेक्ट्रम घोटाला
कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला
कोलगेट, आदर्श हाउसिंग जैसे मामले
अदालतों ने वर्षों बाद कहा—आरोप सिद्ध नहीं हुए।
लेकिन तब तक कांग्रेस सत्ता और भरोसे—दोनों से बाहर हो चुकी थी।
हेमंत सोरेन:
सत्ता पक्ष में रहकर भी आरोप, इस्तीफा और सत्ता परिवर्तन
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का मामला इस बहस को और गहरा करता है।
उन पर कथित रूप से जमीन आवंटन और पद के दुरुपयोग जैसे आरोप लगे। मामला न्यायिक प्रक्रिया में था, कोई अंतिम दोष सिद्ध नहीं हुआ था, फिर भी उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।
यहां महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि—
यह कार्रवाई सत्ता के भीतर की परिस्थितियों में हुई
आरोप सिद्ध होने से पहले ही राजनीतिक निर्णय ले लिया गया
न्यायिक प्रक्रिया से पहले ही राजनीतिक सजा दे दी गई
यह उदाहरण बताता है कि आरोप की राजनीति केवल विपक्ष बनाम सत्ता तक सीमित नहीं, बल्कि सत्ता के अंदर भी इसका प्रयोग होता है।
नया और खतरनाक ट्रेंड
आरोप + गिरफ्तारी + इस्तीफा = राजनीतिक अंत
आज भारतीय राजनीति में एक नया फार्मूला उभर आया है—
आरोप लगाओ
जांच बैठाओ
गिरफ्तारी या इस्तीफे की स्थिति बनाओ
नैतिकता का दबाव बनाओ
सत्ता परिवर्तन कर लो
बाद में अदालत कुछ भी कहे—
राजनीति अपना काम कर चुकी होती है।
कानून व्यवस्था में अनिवार्य सुधार
“जब तक आरोप सिद्ध न हों, गिरफ्तारी क्यों?”
अब यह केवल राजनीतिक प्रश्न नहीं, संवैधानिक प्रश्न बन चुका है।
आवश्यक कानूनी बदलाव
जब तक किसी व्यक्ति पर लगे आरोप प्रथम दृष्टया ठोस और निर्णायक रूप से सिद्ध न हों, तब तक गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए।
इसके पीछे तर्क:
गिरफ्तारी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नष्ट कर देती है
राजनीतिक जीवन समाप्त हो जाता है
जनता अदालत से पहले फैसला कर लेती है
विपक्ष या सत्ता—दोनों को अनुचित लाभ मिलता है
सुप्रीम कोर्ट और संविधान की मूल भावना
सर्वोच्च न्यायालय कई बार कह चुका है कि—
“गिरफ्तारी अंतिम विकल्प होनी चाहिए, पहला नहीं।”
फिर भी राजनीतिक मामलों में गिरफ्तारी पहला हथियार बन चुकी है।
लोकतंत्र के सामने गंभीर खतरा
आज खतरा यह नहीं है कि दोषी बच जाएंगे,
खतरा यह है कि—
निर्दोषों को दोषी की तरह दंडित किया जा रहा है—बिना सजा, बिना फैसले।
यदि आरोप सिद्ध होने से पहले गिरफ्तारी और इस्तीफे की राजनीति को नहीं रोका गया,
तो लोकतंत्र में न्याय नहीं,
बल्कि डर और धारणा शासन करेगी।
यह लड़ाई किसी एक नेता की नहीं,
हर नागरिक के अधिकार और स्वतंत्रता की है।
सोमवार, 23 फ़रवरी 2026
बेटे ने पिता को गोली मारकर हत्या की, ड्रम में छिपाए शव के टुकड़े
लखनऊ में दिल दहला देने वाला हत्याकांड
बेटे ने पिता की गोली मारकर हत्या की, शव के टुकड़े कर ड्रम में छिपाया
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के आशियाना थाना क्षेत्र स्थित एलडीए कॉलोनी सेक्टर-एल से एक ऐसा हत्याकांड सामने आया है, जिसने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है। यहां एक बेटे ने अपने ही पिता की लाइसेंसी राइफल से गोली मारकर हत्या कर दी और वारदात को छिपाने के लिए शव के टुकड़े कर उन्हें घर में रखे एक नीले ड्रम में छिपा दिया। पुलिस ने आरोपी बेटे को गिरफ्तार कर लिया है और उससे लगातार पूछताछ की जा रही है।
पुलिस के अनुसार मृतक की पहचान मानवेंद्र प्रताप सिंह (49 वर्ष) के रूप में हुई है। वह पेशे से पैथोलॉजी लैब संचालक थे और काकोरी क्षेत्र में भी उनकी लैब संचालित होती थी। कई ब्रांच है। मानवेंद्र सिंह 20 फरवरी से लापता थे। उनके बेटे अक्षत प्रताप सिंह, जो बीकॉम का छात्र है, ने आशियाना थाने में उनके गुमशुदा होने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी।
गुमशुदगी की कहानी के पीछे छिपा था अपराध
गुमशुदगी दर्ज कराते समय अक्षत ने पुलिस को बताया था कि 20 फरवरी की सुबह करीब 6 बजे उसके पिता ने उसे जगाकर कहा कि वह दिल्ली जा रहे हैं और 21 फरवरी की दोपहर तक वापस आ जाएंगे। जाते समय उन्होंने घर का दरवाजा बंद करने को कहा था। इसके बाद उनके तीनों मोबाइल फोन बंद आने लगे और वह घर वापस नहीं लौटे, जिससे परिवार चिंतित हो गया।
पुलिस ने जब जांच शुरू की तो मानवेंद्र सिंह के मोबाइल की अंतिम लोकेशन काकोरी स्थित उनकी लैब में मिली, लेकिन वहां मोबाइल फोन नहीं मिला। इस दौरान पुलिस को बेटे अक्षत की गतिविधियों पर संदेह हुआ और उससे पूछताछ की गई।
बयान बदलता रहा आरोपी
पूछताछ के दौरान अक्षत लगातार पुलिस को गुमराह करता रहा। पहले उसने दावा किया कि उसके पिता ने आत्महत्या कर ली है। बाद में उसने अपना बयान बदला और स्वीकार किया कि उसी ने पिता की हत्या की है। इसके बाद पुलिस ने उससे कड़ाई से पूछताछ की, जिसमें पूरी साजिश का खुलासा हुआ।
अक्षत ने पुलिस को बताया कि 20 फरवरी की सुबह करीब 4:30 बजे उसका अपने पिता से किसी बात को लेकर विवाद हो गया। विवाद इतना बढ़ गया कि वह गुस्से में अपनी लाइसेंसी राइफल लेकर आया और पिता पर गोली चला दी। गोली लगते ही मानवेंद्र सिंह की मौके पर ही मौत हो गई।
शव के टुकड़े कर सबूत मिटाने की कोशिश
हत्या के बाद आरोपी ने शव को ठिकाने लगाने की योजना बनाई। वह शव को तीसरे फ्लोर से ग्राउंड फ्लोर पर एक खाली कमरे में ले आया और वहां शव के टुकड़े कर दिए। हाथ-पैर और कुछ अन्य हिस्सों को कार में भरकर सदरौना इलाके में फेंक दिया, जबकि धड़ को घर के भीतर एक कमरे में रखे नीले रंग के प्लास्टिक ड्रम में भरकर छिपा दिया।
आरोपी धड़ को भी ठिकाने लगाने की फिराक में था, लेकिन इससे पहले ही पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया। सोमवार शाम पुलिस अक्षत को लेकर उसके घर पहुंची, जहां तलाशी के दौरान नीले ड्रम से मानवेंद्र सिंह का धड़ बरामद हुआ। पुलिस अब शव के सिर और अन्य हिस्सों की बरामदगी के लिए पूछताछ कर रही है।
बहन के सामने की गई हत्या
पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि अक्षत ने अपनी बहन कृति के सामने ही पिता को गोली मारी थी। इसके बाद उसने बहन को धमकी दी कि यदि उसने किसी को कुछ बताया तो उसे भी जान से मार देगा। डर के कारण कृति ने किसी को इस घटना की जानकारी नहीं दी।
हत्या के बाद आरोपी ने कार में लगे खून के निशान साफ किए। जब चाची ने कार की सफाई को लेकर सवाल किया तो उसने कहा कि कार गंदी हो गई थी और खुद ही साफ कर दी। बाद में पुलिस को कार में खून के निशान मिलने से संदेह और गहरा हो गया।
फोरेंसिक जांच और कानूनी कार्रवाई
घटना की सूचना मिलते ही वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंचे। फोरेंसिक टीम ने घर और आसपास के इलाके से अहम साक्ष्य जुटाए। हत्या में इस्तेमाल की गई लाइसेंसी राइफल भी बरामद कर ली गई है। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है।
मृतक की पत्नी का करीब नौ साल पहले निधन हो चुका है। परिवार में बेटा अक्षत और बेटी कृति हैं। कृति एपीएस में 11वीं कक्षा की छात्रा है। मानवेंद्र सिंह के छोटे भाई उत्तर प्रदेश पुलिस में कार्यरत हैं और वर्तमान में सचिवालय में तैनात हैं।
इलाके में दहशत का माहौल
एलडीए कॉलोनी सेक्टर-एल में इस जघन्य हत्याकांड के बाद पूरे इलाके में दहशत का माहौल है। घर के बाहर लोगों की भारी भीड़ जमा है। उत्तर प्रदेश पुलिस का कहना है कि आरोपी के खिलाफ साक्ष्यों के आधार पर हत्या और साक्ष्य मिटाने से जुड़ी गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
यह घटना राजधानी लखनऊ में हाल के वर्षों की सबसे सनसनीखेज और दिल दहला देने वाली वारदातों में से एक मानी जा रही है।
मानवेंद्र प्रताप सिंह बेहद धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे।
नियमित रूप से पूजा-पाठ करते थे और धार्मिक आयोजनों में सक्रिय भागीदारी निभाते थे। क्षेत्र में उनकी पहचान एक शांत, सरल और संस्कारवान व्यक्ति के रूप में थी। वह अक्सर कथा, भंडारा और धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल रहते थे तथा कई बार अपने स्तर से भंडारे का आयोजन भी कराते थे। पड़ोसियों और परिचितों के अनुसार मानवेंद्र सिंह का व्यवहार सौम्य था और वह कभी किसी से ऊंची आवाज में बात करते नहीं देखे गए।
एलडीए कॉलोनी सेक्टर-एल में रहने वाले लोगों का कहना है कि मानवेंद्र मंदिर जाना नहीं भूलते थे और धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन में भी उनकी गहरी रुचि थी। यही कारण है कि उनकी इस तरह नृशंस हत्या की खबर से पूरा इलाका स्तब्ध है। लोग यह मानने को तैयार नहीं हैं कि इतना धार्मिक और पारिवारिक व्यक्ति इतनी भयावह साजिश का शिकार हो सकता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि मानवेंद्र सिंह अक्सर कहते थे कि “धर्म और संस्कार ही परिवार को जोड़कर रखते हैं।” ऐसे व्यक्ति की हत्या, वह भी अपने ही बेटे के हाथों, समाज के लिए एक गहरी चेतावनी और सोचने का विषय बन गई है।
पड़ोसियों और रिश्तेदारों का मानना है कि यदि समय रहते पारिवारिक तनाव को समझ लिया गया होता, तो शायद यह दर्दनाक घटना टाली जा सकती थी। फिलहाल इस जघन्य हत्याकांड ने लखनऊ में लोगों को झकझोर कर रख दिया है और हर कोई यही सवाल कर रहा है कि संस्कार, संवाद और परिवार के बीच बढ़ती दूरी आखिर किस दिशा में समाज को ले जा रही है।
रिश्ते का खून
बड़ा बनने के जुनून में ‘राजा’ बेटे ने किया कत्ल
राजधानी लखनऊ के आशियाना इलाके में रिश्तों को शर्मसार करने वाला एक दिल दहला देने वाला हत्याकांड सामने आया है। यहां एक बेटे ने अपने ही पिता की गोली मारकर हत्या कर दी और बाद में शव के टुकड़े कर उन्हें ठिकाने लगाने की तैयारी करने लगा। आरोपी बेटे की पहचान ‘राजा’ के रूप में हुई है। पुलिस जांच में सामने आया है कि आरोपी बड़ा आदमी बनने के जुनून में इस कदर अंधा हो गया कि उसने अपने ही जन्मदाता की जान ले ली।
एक दिन पहले घर लाया था आरी, डांट से था नाराज
जांच में यह भी सामने आया है कि वारदात से एक दिन पहले ही आरोपी घर में आरी लेकर आया था। उस दिन भी पिता ने उसे किसी बात पर डांटा था, जिससे वह अंदर ही अंदर नाराज चल रहा था। पुलिस का मानना है कि यह हत्या अचानक नहीं बल्कि पहले से सोची-समझी साजिश का हिस्सा थी।
गोली मारकर हत्या, शव छिपाने की साजिश
घटना वाले दिन आरोपी ने पिता को गोली मार दी। हत्या के बाद उसने शव के टुकड़े किए और उन्हें छिपाने के लिए घर में रखे एक नीले ड्रम का इस्तेमाल किया। पुलिस को घर से करीब 20 लीटर एसिड भी बरामद हुआ है। आशंका है कि आरोपी शव को गलाने की तैयारी कर रहा था ताकि सबूत पूरी तरह मिटाए जा सकें।
कानपुर रोड के कॉलेज में बीकॉम कर रहा था आरोपी
पुलिस जांच में सामने आया है कि राजा कानपुर रोड स्थित एक कॉलेज में बीकॉम लास्ट ईयर की पढ़ाई कर रहा था। पढ़ाई के साथ-साथ वह अपने पिता के कारोबार में भी दखल देने लगा था। इसी को लेकर घर में तनाव का माहौल बना रहता था।
सीसीटीवी में नहीं दिखा बाहर निकलना
पुलिस ने घटनास्थल और आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की जांच की। फुटेज में आरोपी के घर से बाहर निकलने के स्पष्ट दृश्य नहीं मिले, जिससे पुलिस को शक हुआ कि वारदात घर के अंदर ही अंजाम दी गई है।
इंस्पेक्टर भाई पहली मंजिल पर रहते थे
बताया गया है कि आरोपी का भाई, जो पेशे से इंस्पेक्टर है, उसी मकान की पहली मंजिल पर रहता है। हालांकि घटना के समय वह घर पर मौजूद नहीं था। पुलिस इस बिंदु पर भी गहन जांच कर रही है।
मोहल्ले में मातम, दहशत का माहौल
घटना के बाद पूरे मोहल्ले में सन्नाटा और दहशत का माहौल है। पड़ोसियों का कहना है कि इस घर से पहले बेटे की हंसी और चहल-पहल सुनाई देती थी, लेकिन अब वहां मातम पसरा है। किसी को विश्वास नहीं हो रहा कि एक बेटा इतना क्रूर हो सकता है।
पुलिस को मिले अहम सुराग
पुलिस ने आरोपी को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है। हत्या में इस्तेमाल हथियार, एसिड और अन्य सबूत जब्त कर लिए गए हैं। पुलिस का कहना है कि मामले की हर कड़ी को जोड़ा जा रहा है और जल्द ही पूरे घटनाक्रम का खुलासा किया जाएगा।




























