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रविवार, 19 जुलाई 2026
कॉर्निया दान बढ़ाने को बनेगा रोडमैप, एसजीपीजीआई में टास्क फोर्स की बैठक
मां पीतांबरा सिद्धपीठ: जहां हल्दी के सरोवर से हुआ देवी का प्राकट्य, मां धूमावती का दुर्लभ मंदिर और अश्वत्थामा की पूजा की जनश्रुति आज भी है जीवंत
मां पीतांबरा सिद्धपीठ: जहां हल्दी के सरोवर से हुआ देवी का प्राकट्य, मां धूमावती का दुर्लभ मंदिर और अश्वत्थामा की पूजा की जनश्रुति आज भी है जीवंत
मध्य प्रदेश के दतिया में स्थित मां पीतांबरा सिद्धपीठ देश के सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि शक्ति साधना, तंत्र परंपरा और गहन आध्यात्मिक आस्था का केंद्र है। यहां मां पीतांबरा (बगलामुखी) के साथ मां धूमावती की भी पूजा होती है। नवरात्र के दौरान लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। देश के बड़े राजनेताओं, उद्योगपतियों, न्यायपालिका से जुड़े लोगों और साधकों की भी इस सिद्धपीठ में गहरी आस्था रही है।
क्यों पड़ा मां पीतांबरा नाम?
"पीतांबरा" शब्द दो संस्कृत शब्दों से बना है—पीत अर्थात पीला और अंबर अर्थात वस्त्र। यानी पीले वस्त्र धारण करने वाली देवी।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सतयुग में जब भयंकर तूफान और प्राकृतिक प्रलय से सृष्टि संकट में पड़ गई, तब भगवान विष्णु ने गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र स्थित हरिद्रा (हल्दी) सरोवर के तट पर कठोर तप किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति हल्दी के स्वर्णिम जल से मां बगलामुखी के रूप में प्रकट हुईं और संसार को विनाश से बचाया। चूंकि देवी का प्राकट्य हल्दी के पीले जल से हुआ था, इसलिए उन्हें पीतांबरा कहा गया। आज भी उनकी पूजा में पीले वस्त्र, हल्दी, पीले पुष्प, चने की दाल और बेसन के लड्डू का विशेष महत्व है।
मां बगलामुखी कौन हैं?
मां बगलामुखी सनातन धर्म की दशमहाविद्याओं की आठवीं महाविद्या हैं। उन्हें स्तंभन शक्ति की देवी कहा जाता है। स्तंभन का अर्थ है अन्याय, असत्य, हिंसा और नकारात्मक शक्तियों के प्रभाव को रोकना। धार्मिक मान्यता है कि मां अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और उन्हें साहस, विजय तथा न्याय प्राप्त करने का आशीर्वाद देती हैं।
दतिया में कैसे हुई सिद्धपीठ की स्थापना?
दतिया स्थित इस सिद्धपीठ की स्थापना वर्ष 1935 में पूज्य स्वामीजी महाराज ने की थी। उन्होंने यहां कठोर तप और साधना की, जिसके बाद यह स्थान सिद्धपीठ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। आज भी देशभर से साधक विशेष अनुष्ठान और शक्ति साधना के लिए यहां आते हैं।
छोटी-सी खिड़की से होते हैं मां के दर्शन
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि श्रद्धालु मां के सीधे दर्शन नहीं करते, बल्कि गर्भगृह की एक छोटी-सी खिड़की से दर्शन करते हैं। मान्यता है कि मां का तेज अत्यंत प्रखर है, इसलिए यह व्यवस्था बनाई गई है।
राजसत्ता की देवी क्यों कहलाती हैं?
दतिया की मां पीतांबरा को राजसत्ता की देवी भी कहा जाता है। वर्षों से यह मान्यता रही है कि यहां विशेष पूजा और अनुष्ठान करने से नेतृत्व क्षमता, प्रतिष्ठा और सफलता का आशीर्वाद मिलता है। इसी कारण देश के अनेक राजनेता, मंत्री, उद्योगपति और प्रशासनिक अधिकारी यहां गुप्त रूप से पूजा-अर्चना और यज्ञ कराते रहे हैं।
1962 के भारत-चीन युद्ध की प्रसिद्ध मान्यता
मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित मान्यताओं में वर्ष 1962 का भारत-चीन युद्ध शामिल है। स्थानीय परंपरा के अनुसार तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के अनुरोध पर यहां 51 कुंडीय महायज्ञ कराया गया था। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद चीन ने युद्धविराम की घोषणा की। मंदिर परिसर में उस यज्ञ की यज्ञशाला आज भी मौजूद है। हालांकि, इस घटना की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है और इसे धार्मिक आस्था एवं स्थानीय परंपरा के रूप में देखा जाता है।
किन-किन लोगों ने किए दर्शन?
इस सिद्धपीठ में पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी सहित अनेक राष्ट्रीय नेताओं ने दर्शन किए। सिंधिया राजघराने की विशेष आस्था यहां रही है। राजमाता विजयाराजे सिंधिया नवरात्र में यहां नौ दिनों तक साधना करती थीं। माधवराव सिंधिया, वसुंधरा राजे, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह, उमा भारती और शिवराज सिंह चौहान भी यहां दर्शन कर चुके हैं।
वनखंडेश्वर महादेव की अद्भुत महिमा
मंदिर परिसर में स्थित वनखंडेश्वर महादेव का शिवलिंग अत्यंत प्राचीन माना जाता है। स्थानीय मान्यता है कि इसकी स्थापना महाभारत काल में पांडवों ने की थी। श्रद्धालु मां पीतांबरा के दर्शन के बाद यहां भगवान शिव का जलाभिषेक और पूजा अवश्य करते हैं।
मां धूमावती का दुर्लभ मंदिर
पीतांबरा पीठ की सबसे बड़ी विशेषताओं में मां धूमावती का मंदिर भी शामिल है। मां धूमावती दशमहाविद्याओं की सातवीं महाविद्या हैं। उनका स्वरूप वैराग्य, तप, धैर्य और विपरीत परिस्थितियों में भी आत्मबल का प्रतीक माना जाता है।
यह मंदिर अत्यंत दुर्लभ माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इसके कपाट सामान्य समय में बंद रहते हैं और केवल आरती या निर्धारित समय पर ही दर्शन होते हैं। श्रद्धालु मानते हैं कि मां धूमावती की कृपा से भय, रोग, आर्थिक संकट और जीवन की कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति प्राप्त होती है।
अश्वत्थामा से जुड़ी रहस्यमयी जनश्रुति
पीतांबरा पीठ से जुड़ी सबसे रहस्यमयी मान्यताओं में महाभारत के अमर योद्धा अश्वत्थामा का नाम भी आता है। स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार अश्वत्थामा आज भी ब्रह्ममुहूर्त में अदृश्य रूप से मंदिर में आकर मां पीतांबरा और वनखंडेश्वर महादेव की पूजा करते हैं। कहा जाता है कि कई बार मंदिर खुलने से पहले पूजा के ताजे फूल और चढ़ावा दिखाई देते हैं। हालांकि, इसका कोई ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है और इसे स्थानीय आस्था का विषय माना जाता है।
यहां किस उद्देश्य से लोग आते हैं?
श्रद्धालु यहां मुख्य रूप से—
शत्रु बाधा से मुक्ति
न्यायालय के मामलों में सफलता
मानसिक शांति
परिवार की सुख-समृद्धि
करियर और व्यवसाय में उन्नति
चुनाव और नेतृत्व में सफलता
आध्यात्मिक साधना
भय और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा
की कामना लेकर आते हैं।
मां पीतांबरा को क्या चढ़ाया जाता है?
हल्दी
पीले पुष्प
चने की दाल
पीले वस्त्र
बेसन के लड्डू
नारियल
मौसमी फल
मां पीतांबरा का सरल मंत्र
ॐ ह्लीं बगलामुख्यै नमः॥
या
ॐ पीताम्बरायै नमः॥
इन मंत्रों का 11, 21 या 108 बार श्रद्धापूर्वक जाप किया जा सकता है।
मां धूमावती का सरल मंत्र
ॐ धूं धूमावत्यै नमः॥
इस मंत्र का भी श्रद्धापूर्वक जाप किया जा सकता है। तांत्रिक बीज मंत्रों और विशेष साधना के लिए गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक माना गया है।
नवरात्र में विशेष महत्व
चैत्र और शारदीय नवरात्र में यहां विशेष हवन, दुर्गा सप्तशती पाठ, शक्ति साधना और अखंड पूजा होती है। इन दिनों लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं और पूरा मंदिर पीले फूलों तथा आकर्षक विद्युत सज्जा से सुसज्जित रहता है।
आस्था और इतिहास का संगम
मां पीतांबरा सिद्धपीठ भारत की शक्ति उपासना परंपरा का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां मां बगलामुखी के पीतांबरा स्वरूप, मां धूमावती की दुर्लभ उपासना, वनखंडेश्वर महादेव की प्राचीन मान्यताएं और अश्वत्थामा से जुड़ी जनश्रुतियां इस स्थान को अत्यंत विशिष्ट बनाती हैं। यही कारण है कि हर वर्ष लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचकर मां के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं।
शुक्रवार, 17 जुलाई 2026
कैंसर संस्थान ब्रेनस्टेम ट्यूमर की आठ घंटे चली जटिल सर्जरी सफल, 16 वर्षीय किशोर को मिला नया जीवन
ब्रेनस्टेम ट्यूमर की आठ घंटे चली जटिल सर्जरी सफल, 16 वर्षीय किशोर को मिला नया जीवन
कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान (केएसएसएससीआई) के न्यूरोसर्जरी विभाग ने ब्रेनस्टेम जैसे अत्यंत संवेदनशील हिस्से में स्थित जटिल ट्यूमर की सफल सर्जरी कर 16 वर्षीय किशोर को नया जीवन दिया है। करीब आठ घंटे तक चली इस उच्च जोखिम वाली सर्जरी के बाद मरीज पूरी तरह स्वस्थ होकर अस्पताल से डिस्चार्ज हो चुका है।
ब्रेनस्टेम मस्तिष्क का वह महत्वपूर्ण भाग है, जो सांस लेना, हृदय की धड़कन, रक्तचाप और शरीर की कई आवश्यक गतिविधियों को नियंत्रित करता है। इस क्षेत्र में ट्यूमर की सर्जरी बेहद चुनौतीपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि थोड़ी सी भी चूक मरीज के लिए गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है।
सर्जरी का नेतृत्व संस्थान के चीफ मेडिकल सुपरिंटेंडेंट एवं न्यूरोसर्जरी विभागाध्यक्ष प्रो. विजेंद्र कुमार ने किया। ऑपरेशन के दौरान अत्याधुनिक न्यूरोनेविगेशन सिस्टम, नर्व मॉनिटरिंग सिस्टम और ऑपरेटिंग माइक्रोस्कोप की मदद से ट्यूमर को सावधानीपूर्वक हटाया गया, जिससे मस्तिष्क की महत्वपूर्ण नसों और संरचनाओं को सुरक्षित रखा जा सका।
इस जटिल ऑपरेशन में डॉ. अमित कुमार उपाध्याय, डॉ. रवि रंजन और डॉ. संजीव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एनेस्थीसिया टीम का नेतृत्व डॉ. रिचा राय ने किया, जिनकी सतत निगरानी से पूरी प्रक्रिया सुरक्षित ढंग से संपन्न हुई।
संस्थान के निदेशक प्रो. एम.एल.बी. भट्ट ने इस सफलता पर पूरी टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह उपलब्धि संस्थान में उपलब्ध आधुनिक तकनीक, विशेषज्ञ चिकित्सकों की दक्षता और गुणवत्तापूर्ण कैंसर उपचार के प्रति प्रतिबद्धता का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि संस्थान जटिल से जटिल न्यूरोसर्जरी और कैंसर उपचार के लिए मरीजों को विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए निरंतर प्रयासरत है।
मंगलवार, 14 जुलाई 2026
पीजीआई में दीक्षा समारोह मेधा को मिला सम्मान 279 को मिली डिग्री
पीजीआई के 30वें दीक्षांत समारोह में 279 विद्यार्थियों को मिली उपाधि
प्रो. नारायण प्रसाद को मिला गवर्नर मेडल फॉर बेस्ट टीचर अवॉर्ड
संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीआई) के 30वें दीक्षांत समारोह में सोमवार को 279 विद्यार्थियों को उपाधियां प्रदान की गईं। राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने विद्यार्थियों को डिग्रियां प्रदान कीं। इनमें 43 एमडी/एमएस, 72 डीएम/एमसीएच, 48 पीडीसीसी, 50 बीएससी नर्सिंग, 30 बीएससी क्रिटिकल केयर एंड मेडिकल टेक्नोलॉजी, 15 एमएससी क्रिटिकल केयर एंड मेडिकल टेक्नोलॉजी, सात पीएचडी, छह पीडीएएफ और छह एमएचए शामिल रहे। समारोह में नेफ्रोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. नारायण प्रसाद को गवर्नर मेडल फॉर बेस्ट टीचर अवॉर्ड सहित 12 शिक्षकों, शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों को विभिन्न श्रेणियों में सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और राज्यमंत्री मयंकेश्वर शरण सिंह शामिल नहीं हो सके। समारोह में में मुख्य रूप से कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष धर्मेश कुमार, महामंत्री सीमा शुक्ला सहित तमाम लोग शामिल हुए। इस मौके पर चिकित्सा अधीक्षक प्रो राजेश हर्षवर्धन की पुस्तक का विमोचन हुआ।
दो सदस्यीय परिवारों को भी मिले आयुष्मान योजना का लाभ
दीक्षांत संबोधन में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने कहा कि आयुष्मान योजना में छह सदस्यीय परिवारों के कार्ड आसानी से बन जाते हैं, लेकिन दो सदस्यीय परिवारों को इसका लाभ नहीं मिल पाता। सरकार को इस दिशा में नीति बनानी चाहिए ताकि पात्र दो सदस्यीय परिवार भी योजना से वंचित न रहें। उन्होंने बताया कि कई जिलाधिकारियों से बात कर ऐसे परिवारों के आयुष्मान कार्ड बनवाए गए हैं।
उन्होंने कहा कि 300 बच्चों की हार्ट सर्जरी होने की जानकारी दी गई है, लेकिन यह भी आकलन होना चाहिए कि ऑपरेशन के बाद कितने बच्चे लंबे समय तक स्वस्थ जीवन जी रहे हैं। शोध और उपचार के परिणामों का नियमित मूल्यांकन होना चाहिए, तभी वास्तविक सुधार संभव होगा।
राज्यपाल ने कहा कि कैंसर की 70 दवाओं पर सीमा शुल्क (कस्टम ड्यूटी) समाप्त की गई है। अस्पतालों में यह भी प्रदर्शित किया जाना चाहिए कि इनमें से कितनी दवाएं मरीजों को उपलब्ध हैं। उन्होंने बताया कि संस्थान ने आईसीएमआर को 100 शोध परियोजनाएं भेजी हैं। सितंबर-अक्टूबर में उनकी समीक्षा की जाएगी कि कितना बजट मिला, कितना शोध हुआ और उसका समाज को क्या लाभ मिला।
उन्होंने जन भवन सर्वे का हवाला देते हुए कहा कि पीजीआई के कई छात्रावासों में मेस, वाई-फाई और वॉशिंग मशीन जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। पुस्तकालय में लगे 65 कंप्यूटरों की इंटरनेट गति भी धीमी है, जिससे विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होती है। परिसर के कुछ हिस्सों में गंदगी पर भी उन्होंने नाराजगी जताई। साथ ही गांव-गांव स्वास्थ्य शिविर लगाकर 30 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं और किशोरियों की नियमित स्वास्थ्य जांच कराने पर जोर दिया।
बॉक्स : बाहर से खाना न आए
राज्यपाल ने कहा कि कुछ छात्रावासों में बाहर से भोजन मंगाया जाता है। ऐसी शिकायतें मिली हैं कि इसके माध्यम से नशीले पदार्थ भी पहुंच सकते हैं। इसलिए छात्रावासों में भोजन की व्यवस्था परिसर के भीतर ही होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अक्षय पात्र जैसी संस्थाएं इस दिशा में अच्छा विकल्प हो सकती हैं।
बॉक्स : एक वर्ष में नंबर-1 बनने का लक्ष्य
राज्यपाल ने कहा कि एसजीपीआई देश के शीर्ष तीन चिकित्सा संस्थानों में शामिल है। अब अगले एक वर्ष में देश का नंबर-1 संस्थान बनने का लक्ष्य निर्धारित कर उस दिशा में कार्य करना चाहिए।
कोई भी मरीज बिना इलाज वापस न जाए
उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने कहा कि कोई भी मरीज बिना इलाज वापस नहीं जाना चाहिए। यदि तत्काल बेड उपलब्ध न हो तो मरीज को एंबुलेंस में भी आवश्यक उपचार उपलब्ध कराया जाए।
शोभायात्रा के दौरान रुकवाया राष्ट्रगीत
दीक्षांत समारोह की शोभायात्रा के दौरान राष्ट्रगीत शुरू हो गया। इस पर मंच पर मौजूद राज्यपाल ने संकेत देकर राष्ट्रगान रुकवाया और निर्देश दिया कि पहले शोभायात्रा पूरी होने दी जाए, उसके बाद राष्ट्रगान प्रस्तुत किया जाए।
अक्टूबर तक शुरू होगा एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर
संस्थान के निदेशक प्रो. आर.के. धीमन ने बताया कि अक्टूबर तक एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर का पहला चरण शुरू हो जाएगा। इसमें 12 विभागों की सेवाएं और 293 बेड उपलब्ध होंगे। इसके लिए संसाधन जुटाए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि क्वाटरनरी केयर परियोजना (पीजीआई 2.0) पर भी कार्य शुरू हो चुका है। लगभग पांच हजार करोड़ रुपये की इस परियोजना में 600 बेड और 11 विभाग होंगे। अगले पांच वर्षों में इसे पूरा करने का लक्ष्य है तथा इसमें पेपरलेस व्यवस्था लागू की जाएगी। समारोह में महानिदेशक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य डॉ. नेहा शर्मा, डीन प्रो. शालीन कुमार, रजिस्ट्रार कर्नल वरुण बाजपेयी सहित कई गणमान्य उपस्थित रहे।
सम्मानित शिक्षक, शोधकर्ता, चिकित्सक एवं विद्यार्थी
पुरस्कार
सम्मानित
गवर्नर मेडल फॉर बेस्ट टीचर
प्रो. नारायण प्रसाद (नेफ्रोलॉजी)
प्रो. एस.आर. नायक अवॉर्ड (आउटस्टैंडिंग रिसर्च इन्वेस्टिगेटर)
डॉ. चिन्मय साहू (माइक्रोबायोलॉजी)
प्रो. एस.आर. नायक अवॉर्ड (आउटस्टैंडिंग रिसर्च इन्वेस्टिगेटर)
डॉ. आलोक कुमार (मॉलिक्यूलर मेडिसिन एवं बायोटेक्नोलॉजी)
प्रो. एस.एस. अग्रवाल अवॉर्ड (रिसर्च एक्सीलेंस)
डॉ. अभिषेक शुक्ला (न्यूरोसर्जरी)
प्रो. एस.एस. अग्रवाल अवॉर्ड (रिसर्च एक्सीलेंस)
खुशी शुक्ला (पीएचडी शोधार्थी, मॉलिक्यूलर मेडिसिन एवं बायोटेक्नोलॉजी)
प्रो. आर.के. शर्मा अवॉर्ड (सर्वश्रेष्ठ डीएम)
डॉ. आदर्शा (मेडिकल जेनेटिक्स)
प्रो. आर.के. शर्मा अवॉर्ड (सर्वश्रेष्ठ एमसीएच)
डॉ. सम्प्रति दरिया (एंडोक्राइन सर्जरी)
पद्मश्री डॉ. एस.एस. सरकार गोल्ड मेडल (एमडी रेडियोडायग्नोसिस)
डॉ. महीम नाज़
सर्वाधिक इंट्राम्यूरल अनुदान
डॉ. एबल लॉरेंस (क्लीनिकल इम्यूनोलॉजी एवं रूमेटोलॉजी)
सर्वाधिक एक्स्ट्राम्यूरल ग्रांट
डॉ. सी.पी. चतुर्वेदी (हीमैटोलॉजी, एससीआरसी)
सर्वाधिक पेटेंट
डॉ. तन्मय घटक (इमरजेंसी मेडिसिन)
करुणाश्री गोल्ड मेडल (एमएससी नर्सिंग)
ललिता यादव
आयुष्य ज्योति गोल्ड मेडल (बीएससी नर्सिंग)
अमृता
एवार्ड पाने वाले पांच लोगों से उनके शोध पर बात चीत
देश को दिया 94 गुर्दा रोग विशेषज्ञ - प्रो. नारायण प्रसाद- गवर्नर मेडल फार बेस्ट टीचर
नेफ्रोलाजी विभाग के प्रमुख प्रो. नारायण प्रसाद को चिकित्सा शिक्षा, शोध और किडनी प्रत्यारोपण के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान दिया। 38 वर्षों के चिकित्सा अनुभव है। 370 शोध प्रकाशन प्रकाशित हो चुके हैं। 94 डीएम (गुर्दा रोग विशेषज्ञ) और 5 पीएचडी शोधार्थियों ने अपनी पढ़ाई पूरी की है। उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों के 15 से अधिक संस्थानों में किडनी प्रत्यारोपण कार्यक्रम शुरू कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश के उन सरकारी संस्थानों में भी किडनी प्रत्यारोपण सेवाएं शुरू कराने की योजना पर काम कर रहे हैं, जहां अभी यह सुविधा उपलब्ध नहीं है।
तेज़ ब्लड टेस्ट से गंभीर इन्फेक्शन में जान बचाने की उम्मीद प्रो. चिन्मय साहू- प्रो.एसआर नायक एवार्ड फार आउट स्टैंडिग रिसर्च
गंभीर रक्त संक्रमण (सेप्सिस) के मरीजों में सही एंटीबायोटिक शुरू करने में होने वाली देरी अब काफी कम हो सकती है। एसजीपीजीआई, लखनऊ के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के शोधकर्ताओं ने 30 मिनट में ब्लड सैंपल से बैक्टीरिया अलग करने की नई तकनीक विकसित की है। इसके बाद माल्डी टॉप मशीन से जर्म की पहचान कर डॉक्टरों को करीब 24 घंटे पहले रिपोर्ट मिल जाती है। 160 नमूनों पर परीक्षण में बैक्टीरिया की पहचान 96% और एंटीबायोटिक परिणामों में 99.8% सटीकता मिली। यह तकनीक प्रति सैंपल लगभग ₹46 की बचत भी करती है, जिससे मरीजों को समय पर सही इलाज मिलने और एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस कम करने में मदद मिल सकती है। 175 से अधिक शोध पत्र है।
ट्यूमर हटाने के बाद रक्त वाहिकाओं की सेहत में सुधार: डॉ. संप्रति डारिया- प्रो. आरके शर्मा बेस्ट एमसीएच स्टूडेंट
हार्मोन बनाने वाले दुर्लभ ट्यूमर फिओक्रोमोसाइटोमा और पैरागैंग्लियोमा पर डॉ. संप्रति डारिया के शोध में पहली बार फ्लो-मीडिएटेड डाइलेशन (एफएमडी) जैसी आधुनिक, बिना ऑपरेशन वाली जांच तकनीक से रक्त वाहिकाओं की कार्यक्षमता का आकलन किया गया। ट्यूमर हटाने के बाद रक्त वाहिकाओं की कार्यक्षमता में उल्लेखनीय सुधार हुआ, जिससे भविष्य में हृदय संबंधी जटिलताओं का खतरा कम हो सकता है।यह शोध मई 2025 में अमेरिका के मिलवॉकी (विस्कॉन्सिन) में आयोजित अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ एंडोक्राइन सर्जन्स सम्मेलन में पोडियम प्रस्तुति के रूप में प्रस्तुत किया। ऐसा करने वाली वह पहली भारतीय छात्रा हैं। उन्हें इस प्रस्तुति के लिए भारत सरकार की एएनआरएफ और आईसीएमआर की ओर से ट्रैवल ग्रांट भी मिला
मरीजों की जान बचाने और इलाज को अधिक सुरक्षित बनाने में मदद करेंगे दो नए पेटेंट- प्रो. तन्मय घटक आधिकतम पेटेंट एवार्ड
दो नए चिकित्सा उपकरणों के डिजाइन पर पेटेंट मिला हैं। इन उपकरणों से इलाज के दौरान मरीजों की सुरक्षा बढ़ेगी और जानलेवा जटिलताओं का खतरा कम होगा। पहला उपकरण 'गाइडवायर ट्रैप' है, जो गाइडवायर के गलती से शरीर के अंदर पूरी तरह चले जाने जैसी दुर्लभ लेकिन गंभीर दुर्घटना को रोकता है। दूसरा 'मार्क्ड इंट्रोड्यूसर नीडल' है, जिस पर बने विशेष निशान डॉक्टरों को सुई सही गहराई तक डालने में मदद करते हैं। इससे आसपास की नसों और अन्य अंगों को नुकसान पहुंचने का जोखिम घटता है।
हिम्मत नहीं हारी मिली सफलता- अमृता 'आयुषा ज्योति गोल्ड मेडल'
अंबेडकर नगर की अमृता ने नीट में प्रवेश के लिए प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिलने पर हार मानने के बजाय पीजीआई के कॉलेज ऑफ नर्सिंग में बीएससी नर्सिंग के प्रवेश परीक्षा दिया । सफलता मली अपनी मेहनत और उत्कृष्ट शैक्षणिक प्रदर्शन के दम पर अब उन्हें शैक्षणिक सत्र 2022–2026 के लिए प्रतिष्ठित 'आयुषा ज्योति गोल्ड मेडल' से सम्मानित किया गया। अमृता ने उत्कृष्ट अंक हासिल किया है।
कैंसर मरीजों के तीमारदारों को मिलेगा रोज़ाना नि:शुल्क पौष्टिक नाश्ता
कैंसर मरीजों के तीमारदारों को मिलेगा रोज़ाना नि:शुल्क पौष्टिक नाश्ता
कल्याण सिंह कैंसर संस्थान और श्रीमद कमल कल्याण फाउंडेशन के बीच एमओयू
कैंसर मरीजों के तीमारदारों को बेहतर सामाजिक सहयोग उपलब्ध कराने की दिशा में कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान (केएसएसएससीआई), लखनऊ ने मंगलवार को श्रीमद कमल कल्याण फाउंडेशन, लखनऊ के साथ एक महत्वपूर्ण समझौता (एमओयू) किया। इसके तहत फाउंडेशन संस्थान में भर्ती कैंसर मरीजों के तीमारदारों को प्रतिदिन नि:शुल्क ताज़ा, घर जैसा पौष्टिक नाश्ता उपलब्ध कराएगा। साथ ही विशेष अवसरों पर शाम का भोजन भी नि:शुल्क वितरित किया जाएगा।
एमओयू पर संस्थान के निदेशक प्रो. एम.एल.बी. भट्ट और श्रीमद कमल कल्याण फाउंडेशन के अध्यक्ष एवं संस्थापक ट्रस्टी राजेश गुप्ता ने हस्ताक्षर किए और दस्तावेजों का आदान-प्रदान किया।
प्रो. एम.एल.बी. भट्ट ने कहा कि संवेदनशील स्वास्थ्य सेवा केवल मरीज के इलाज तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसके साथ रहने वाले तीमारदारों की देखभाल भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक अस्पताल में रहने वाले परिजनों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। उन्होंने इस मानवीय पहल के लिए श्रीमद कमल कल्याण फाउंडेशन की सराहना करते हुए इसे समाजसेवा का उत्कृष्ट उदाहरण बताया।
फाउंडेशन के प्रतिनिधियों ने कहा कि संस्था समाजसेवा के प्रति प्रतिबद्ध है और भविष्य में भी कैंसर मरीजों तथा उनके तीमारदारों के जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाने के लिए ऐसे जनकल्याणकारी कार्यक्रमों को निरंतर जारी रखेगी।
एमओयू समारोह में संस्थान के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रो. विजेंद्र कुमार, डीन डॉ. प्रमोद कुमार गुप्ता, चिकित्सा अधीक्षक डॉ. वरुण विजय, जनसंपर्क प्रभारी डॉ. आयुष लोहिया, बाल कैंसर विभागाध्यक्ष डॉ. गीतिका पंत तथा श्रीमद कमल कल्याण फाउंडेशन के सचिव आर.के. श्रीवास्तव सहित संस्थान और फाउंडेशन के अन्य पदाधिकारी एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
रविवार, 12 जुलाई 2026
एसजीपीजीआई के 30वें दीक्षांत में डॉ. नारायण प्रसाद को मिलेगा पहला 'गवर्नर मेडल
एसजीपीजीआई के 30वें दीक्षांत में डॉ. नारायण प्रसाद को मिलेगा पहला 'गवर्नर मेडल'
279 विद्यार्थियों को मिलेंगी उपाधियां, 13 उत्कृष्ट शिक्षक, शोधकर्ता, चिकित्सक और विद्यार्थी होंगे सम्मानित
संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एसजीपीजीआई) के 30वें दीक्षांत समारोह में पहली बार नेफ्रोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. नारायण प्रसाद को बेस्ट फैकल्टी के लिए गवर्नर का गोल्ड मेडल (राज्यपाल स्वर्ण पदक) से सम्मानित किया जाएगा। 14 जुलाई को संस्थान के श्रुति प्रेक्षागृह में आयोजित समारोह में कुल 279 विद्यार्थियों को उपाधियां प्रदान की जाएंगी। जबकि 13 उत्कृष्ट शिक्षक, शोधकर्ता, चिकित्सक और विद्यार्थियों को विभिन्न प्रतिष्ठित पुरस्कारों और स्वर्ण पदकों से सम्मानित किया जाएगा। समारोह की अध्यक्षता राज्यपाल आनंदीबेन पटेल करेंगी। जबकि केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जेपी नड्डा मुख्य अतिथि के रूप में दीक्षांत संबोधन देंगे। उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक और राज्य मंत्री मयंकेश्वर शरण सिंह विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगे।
संस्थान के डीन डॉ. शालीन कुमार ने बताया कि समारोह में डीएम, एमसीएच, एमडी, पीडीसीसी तथा बीएससी नर्सिंग के प्रशिक्षु डॉक्टरों और नर्सिंग विद्यार्थियों को 279 उपाधियां प्रदान की जाएंगी। संस्थान के निदेशक डॉ. आर.के. धीमन वार्षिक प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे। राज्यपाल विद्यार्थियों की उपाधियों को डिजीलॉकर प्लेटफॉर्म पर वर्चुअली अपलोड भी करेंगी।
रजिस्ट्रार कर्नल वरुण बाजपेई के अनुसार समारोह में अनुसंधान, नवाचार, शिक्षण और शैक्षणिक उत्कृष्टता के लिए विशेष पुरस्कार दिए जाएंगे। इसके अलावा सर्वाधिक इंट्राम्यूरल अनुदान, सर्वाधिक एक्स्ट्राम्यूरल अनुसंधान वित्तपोषण तथा सर्वाधिक पेटेंट दाखिल करने वाले संकाय सदस्यों को भी सम्मानित किया जाएगा। सामाजिक सरोकारों के तहत एचपीवी टीकाकरण प्रमाण-पत्र, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को किट तथा स्कूली बच्चों को पुस्तकें वितरित की जाएंगी। संस्थान द्वारा गोद लिए गए गांवों के बच्चों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी समारोह का आकर्षण होंगी। कार्यक्रम का समापन डीन डॉ. शालीन कुमार के धन्यवाद ज्ञापन के साथ होगा।
यह होगे सम्मानित
गवर्नर मेडल फॉर बेस्ट टीचर
प्रो. नारायण प्रसाद (नेफ्रोलॉजी)
प्रो. एस.आर. नायक अवॉर्ड (आउटस्टैंडिंग रिसर्च इन्वेस्टिगेटर)
प्रो. चिन्मय साहू (माइक्रोबायोलॉजी)
प्रो. एस.आर. नायक अवॉर्ड (आउटस्टैंडिंग रिसर्च इन्वेस्टिगेटर)
डा. आलोक कुमार (मॉलिक्यूलर मेडिसिन एवं बायोटेक्नोलॉजी)
प्रो. एस.एस. अग्रवाल अवॉर्ड (रिसर्च एक्सीलेंस)
डा. अभिषेक शुक्ला (न्यूरोसर्जरी)
प्रो. एस.एस. अग्रवाल अवॉर्ड (रिसर्च एक्सीलेंस)
खुशी शुक्ला (पीएचडी शोधार्थी, मॉलिक्यूलर मेडिसिन एवं बायोटेक्नोलॉजी)
प्रो. आर.के. शर्मा अवॉर्ड (सर्वश्रेष्ठ डीएम)
डा. आदर्शा (मेडिकल जेनेटिक्स)
प्रो. आर.के. शर्मा अवॉर्ड (सर्वश्रेष्ठ एमसीएच)
डा. सम्प्रति दरिया (एंडोक्राइन सर्जरी)
पद्मश्री डॉ. एस.एस. सरकार गोल्ड मेडल (एमडी रेडियोडायग्नोसिस)
डा. महीम नाज़ (रेडियोडायग्नोसिस)
सर्वाधिक इंट्राम्यूरल अनुदान (विभाग)
प्रो. एबल लॉरेंस (क्लीनिकल इम्यूनोलॉजी एवं रूमेटोलॉजी)
सर्वाधिक एक्स्ट्राम्यूरल ग्रांट
डा. सी.पी. चतुर्वेदी (हीमैटोलॉजी, एससीआरसी)
सर्वाधिक पेटेंट
डा. तन्मय घटक (इमरजेंसी मेडिसिन)
करुणाश्री गोल्ड मेडल (एमएससी नर्सिंग)
ललिता यादव
आयुष्य ज्योति गोल्ड मेडल (बीएससी नर्सिंग)
अमृता
मंगलवार, 7 जुलाई 2026
नाक से बहने वाले ‘दिमागी पानी’ की पहचान में नई तकनीक बनी वरदान रीढ़
नाक से बहने वाले ‘दिमागी पानी’ की पहचान में नई तकनीक बनी वरदान
रीढ़ के रास्ते रंग डालने की जरूरत खत्म, नाक में लगाया गया विशेष रंग बना सहारा; 40 मरीजों में मिली सफलता
कुमार संजय
लखनऊ। पिछले छह महीनों से 27 वर्षीय एक महिला की दाईं नाक से लगातार साफ पानी बह रहा था। इसके साथ पूरे सिर में दर्द भी बना रहता था। कई जांचों के बावजूद डॉक्टर यह पता नहीं लगा पा रहे थे कि यह पानी आखिर कहां से निकल रहा है। आधुनिक जांचों में भी रिसाव की सही जगह सामने नहीं आई। आखिरकार संजय गांधी पीजीआई के विशेषज्ञों ने एक नई तकनीक का सहारा लिया। नाक के भीतर विशेष रंग लगाने के कुछ ही मिनट बाद रिसाव वाली जगह स्पष्ट दिखाई देने लगी और सफल सर्जरी कर समस्या का स्थायी समाधान कर दिया गया। यह मामला अब ऐसी नई तकनीक की सफलता का उदाहरण बन गया है, जो भविष्य में हजारों मरीजों के इलाज को आसान बना सकती है।
नाक से लगातार पानी बहना अक्सर लोग सामान्य एलर्जी, जुकाम या साइनस की समस्या समझ लेते हैं, लेकिन कई बार यह मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी की सुरक्षा करने वाले द्रव के रिसाव का संकेत होता है। इस गंभीर समस्या की पहचान और उपचार में संजय गांधी पीजीआई के विशेषज्ञों द्वारा स्थापित नई तकनीक बेहद कारगर साबित हो रही है।
मुख्य शोधकर्ता एवं न्यूरो सर्जरी विभाग के न्यूरोओटोलॉजिस्ट प्रो. रवि संकर मनोगरन के अनुसार महिला मरीज का कोई दुर्घटना या पूर्व सर्जरी का इतिहास नहीं था। जांचों से यह तो स्पष्ट हो गया था कि नाक से निकलने वाला तरल दिमागी पानी है, लेकिन रिसाव का स्रोत पता नहीं चल पा रहा था। दूरबीन आधारित सर्जरी के दौरान नाक के भीतर विशेष रंग लगाने पर रिसाव का स्थान स्पष्ट दिखाई देने लगा। इसके बाद चिकित्सकों ने उसी समय दोष को बंद कर दिया। सर्जरी के छह महीने बाद तक मरीज में दोबारा कोई रिसाव नहीं पाया गया।
प्रो. मनोगरन ने बताया कि इस सफलता के आधार पर किए गए अध्ययन में यह सामने आया है कि नाक के भीतर लगाए जाने वाले विशेष रंग की मदद से उन जटिल मामलों की भी पहचान की जा सकती है, जिन्हें आधुनिक रेडियोलॉजिकल जांचें भी नहीं पकड़ पातीं। यह शोध प्रतिष्ठित चिकित्सा पत्रिका न्यूरोलॉजी इंडिया ने स्वीकार किया है।
क्या होता है दिमागी पानी का रिसाव?
मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी एक विशेष द्रव से घिरे रहते हैं, जिसे आम बोलचाल में दिमागी पानी कहा जाता है। यह द्रव मस्तिष्क को झटकों से बचाने, पोषण पहुंचाने और तंत्रिका तंत्र के सामान्य कार्यों को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब खोपड़ी के आधार, नाक की छत या आसपास की झिल्लियों में किसी कारण से छोटा सा छेद हो जाता है तो यह द्रव नाक के रास्ते बाहर आने लगता है।
यह समस्या सिर में गंभीर चोट लगने, सड़क दुर्घटना, पूर्व सर्जरी, जन्मजात विकृति या कुछ मामलों में बिना किसी स्पष्ट कारण के भी हो सकती है। ऐसे मरीजों में एक तरफ की नाक से लगातार साफ पानी बहना सबसे प्रमुख लक्षण माना जाता है। कई बार मरीज वर्षों तक इसे सामान्य जुकाम समझकर इलाज कराते रहते हैं और वास्तविक बीमारी का पता काफी देर से चल पाता है।
क्या है नई तकनीक?
प्रो. रवि संकर मनोगरन के अनुसार अब तक दिमागी पानी के रिसाव की सटीक जगह खोजने के लिए विशेष रंग को रीढ़ की हड्डी के रास्ते शरीर के भीतर डाला जाता था। इसके बाद दूरबीन आधारित सर्जरी के दौरान विशेष फिल्टर की सहायता से रिसाव की पहचान की जाती थी। यह तरीका प्रभावी तो था, लेकिन इससे तंत्रिका तंत्र पर दुष्प्रभाव का खतरा बना रहता था। साथ ही यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत जटिल भी थी।
नई तकनीक में रंग को शरीर के भीतर डालने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसे सीधे नाक के अंदर लगाया जाता है। जब यह रंग दिमागी पानी के संपर्क में आता है तो रिसाव वाली जगह स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगती है। इससे डॉक्टरों को दोष वाली जगह तुरंत पहचानने और उसका उपचार करने में मदद मिलती है। इस पद्धति से प्रक्रिया अधिक सुरक्षित, सरल और मरीज के लिए कम जोखिम वाली बन जाती है।
40 मरीजों में सफल रहा प्रयोग
प्रो. मनोगरन ने बताया कि अब तक इस तकनीक का उपयोग 40 मरीजों में किया जा चुका है। इन सभी मामलों में नाक से निकल रहे तरल की प्रकृति और उसके स्रोत का पता लगाने में यह तकनीक बेहद उपयोगी साबित हुई। कई मरीज ऐसे थे जिनमें सीटी स्कैन, एमआरआई और अन्य उन्नत जांचों के बाद भी रिसाव का सटीक स्थान स्पष्ट नहीं हो पा रहा था।
नई तकनीक की सहायता से डॉक्टरों ने न केवल यह पुष्टि की कि नाक से निकलने वाला तरल वास्तव में दिमागी पानी है, बल्कि यह भी पता लगाया कि वह किस स्थान से बाहर आ रहा है। इससे सर्जरी अधिक सटीक हुई और उपचार की सफलता दर में भी सुधार देखने को मिला। विशेषज्ञों का मानना है कि जटिल मामलों में यह तकनीक उपचार की योजना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
क्यों खतरनाक है दिमागी पानी का रिसाव?
दिमागी पानी मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी को सुरक्षा प्रदान करता है। खोपड़ी के आधार या नाक के आसपास की हड्डियों और झिल्लियों में छेद हो जाने पर यह तरल बाहर निकलने लगता है। इससे शरीर और मस्तिष्क के बीच मौजूद प्राकृतिक सुरक्षा बाधा कमजोर हो जाती है।
यदि समय पर इलाज न कराया जाए तो मरीज को मस्तिष्क की झिल्लियों में संक्रमण जैसी गंभीर और जानलेवा जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है। संक्रमण बार-बार होने लगे तो मरीज की स्थिति और गंभीर हो सकती है। कई मामलों में लंबे समय तक सिरदर्द, चक्कर, कमजोरी और जीवन की गुणवत्ता में गिरावट भी देखी जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार एक तरफ की नाक से लगातार साफ पानी बहना, नमकीन स्वाद महसूस होना, बार-बार सिरदर्द होना, झुकने पर पानी का बहाव बढ़ जाना और बार-बार संक्रमण होना इसके प्रमुख संकेत हैं। ऐसे लक्षण दिखाई देने पर तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।
दूरबीन आधारित सर्जरी बनी सबसे सफल उपचार
प्रो. रवि संकर मनोगरन के अनुसार आज नाक के रास्ते की जाने वाली दूरबीन आधारित सर्जरी इस बीमारी के इलाज का सबसे प्रभावी और सुरक्षित तरीका बन चुकी है। इसमें बाहरी चीरा लगाने की जरूरत नहीं पड़ती और नाक के रास्ते ही रिसाव वाली जगह तक पहुंचकर उसे बंद कर दिया जाता है।
इस प्रक्रिया में आधुनिक जैविक पदार्थों और शरीर के ऊतकों का उपयोग कर दोष को बंद किया जाता है। सर्जरी के बाद मरीज को अपेक्षाकृत कम दर्द होता है, अस्पताल में कम समय रुकना पड़ता है और सामान्य जीवन में जल्दी वापसी संभव हो जाती है। यही कारण है कि दुनिया भर में यह तकनीक तेजी से लोकप्रिय हो रही है।
भविष्य के लिए उम्मीद
विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक दिमागी पानी के रिसाव की पहचान और उपचार को अधिक सुरक्षित, सटीक तथा किफायती बना सकती है। खासतौर पर उन मामलों में, जहां सीटी स्कैन या एमआरआई से रिसाव की जगह स्पष्ट नहीं हो पाती, यह तकनीक डॉक्टरों के लिए बड़ी मदद साबित हो सकती है।
प्रो. मनोगरन का कहना है कि शुरुआती परिणाम काफी उत्साहजनक हैं। यदि बड़े स्तर पर किए जाने वाले अध्ययनों में भी इसी प्रकार के परिणाम सामने आते हैं, तो आने वाले समय में यह तकनीक दिमागी पानी के रिसाव के इलाज की मानक प्रक्रिया का हिस्सा बन सकती है। इससे मरीजों को जल्दी और सटीक उपचार मिलने की संभावना बढ़ेगी तथा गंभीर जटिलताओं को भी रोका जा सकेगा।
बॉक्स : दिमागी पानी का रिसाव होने पर क्या हो सकते हैं दुष्प्रभाव?
प्रमुख लक्षण
एक नाक से लगातार साफ पानी बहना
बार-बार सिरदर्द
गले में नमकीन स्वाद महसूस होना
झुकने पर पानी का बहाव बढ़ जाना
बार-बार संक्रमण होना
गंभीर खतरे
मस्तिष्क की झिल्लियों में संक्रमण
तेज बुखार और गंभीर बीमारी
मस्तिष्क तक संक्रमण फैलने का खतरा
लंबे समय तक कमजोरी और सिरदर्द
गंभीर मामलों में जान का खतरा
थायरॉयड कैंसर का इलाज कितना सफलता होगा बता देगा स्कैन
थायरॉयड कैंसर का इलाज कितना सफलता होगा बता देगा स्कैन
बढ़ता एचटीआर बता सकता है बीमारी के बने रहने का खतरा
कुमार संजय
थायरॉयड कैंसर के मरीजों को रेडियोआयोडीन थेरेपी (आरआईटी) देने के बाद इलाज कितना सफल होगा, इसका अंदाजा अब एक खास स्कैन की मदद से पहले ही लगाया जा सकता है। संजय गांधी पीजीआइ के न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग के अध्ययन में पता चला है कि पूरे शरीर के रेडियोआयोडीन स्कैन में लीवर और जांघ के बीच रेडियोआयोडीन जमा होने का अनुपात (हिपेटिक-टू-थाई रेशियो या एचटीआर) मरीज के भविष्य के इलाज परिणामों का भरोसेमंद संकेतक बन सकता है। इससे पहले ही पता चल सकेगा कि मरीज इलाज का कितना अच्छा परिणाम मिलेगा।
60 मरीजों पर अध्ययन
अध्ययन थायरॉयड कैंसर के 60 मरीजों को शामिल किया गया। इनमें 30 मरीज ऐसे थे जिनका कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों तक फैल चुका था, जबकि 30 मरीजों में बीमारी थायरॉयड तक सीमित थी। सभी मरीजों का रेडियोआयोडीन थेरेपी से पहले तथा छह और 12 महीने बाद स्कैन और अन्य जांचें की गईं।
क्या है एचटीआर
एचटीआर लीवर और जांघ में रेडियोआयोडीन के अवशोषण की तुलना से निकाला जाने वाला अनुपात है। देखा गया कि जिन मरीजों का 12 महीने बाद एचटीआर 2.135 से कम था, उनमें बीमारी के पूरी तरह नियंत्रित होने की संभावना अधिक थी। यह मानक इलाज की सफलता का अनुमान 90 प्रतिशत संवेदनशीलता और 82 प्रतिशत विशिष्टता के साथ लगा सका।
बढ़ता एचटीआर दे सकता है चेतावनी
शोध में यह भी सामने आया कि जिन मरीजों में फॉलो-अप के दौरान एचटीआर बढ़ता गया, उनमें रेडियोआयोडीन थेरेपी का असर अपेक्षाकृत कम रहा और बीमारी के बने रहने की आशंका अधिक थी। एचटीआर में बदलाव मरीज की निगरानी और आगे की उपचार योजना तय करने में मदद कर सकता है।
पैपिलरी कैंसर में बेहतर परिणाम
60 मरीजों में से 46 को पैपिलरी और 14 को फॉलिकुलर थायरॉयड कैंसर था। कुल 31 मरीजों में इलाज के बाद पूर्ण प्रतिक्रिया मिली। यह सफलता विशेष रूप से पैपिलरी कैंसर वाले मरीजों में अधिक देखी गई।
शोधकर्ता
पीजीआइ के एंडोक्राइन सर्जरी विभाग के डा. प्रकाश सिंह और डा. विनीत मिश्रा, न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग के प्रो. प्रसांता के. प्रधान और डा मनीष ओरा तथा पैथोलॉजी विभाग की डा. योगिता खंडेलवाल और डा. बेला जैन शामिल रहे। शोध को अंतरराष्ट्रीय जर्नल न्यूक्लियर मेडिसिन कम्युनिकेशंस में प्रकाशित हुआ हैं।
शुक्रवार, 3 जुलाई 2026
एआईआरएनएफ ने भर्ती, पदोन्नति और सेवा विसंगतियां दूर करने का सौंपा ज्ञापन
समान वेतन-भत्ते और बेहतर कार्यस्थल सुविधाओं की मांग लेकर राज्यपाल से मिले नर्सिंग अधिकारी
एआईआरएनएफ ने भर्ती, पदोन्नति और सेवा विसंगतियां दूर करने का सौंपा ज्ञापन
सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में कार्यरत नर्सिंग अधिकारियों ने समान कार्य के लिए समान वेतन और भत्तों के साथ सुरक्षित एवं बेहतर कार्यस्थल की मांग उठाई है। ऑल इंडिया रजिस्टर्ड नर्सेज फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष अनुराग वर्मा 'पटेल' के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने शुक्रवार को राज्यपाल आनंदीबेन पटेल से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा।
प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि नर्सिंग अधिकारी सीमित संसाधनों और बढ़ते कार्यभार के बीच लगातार स्वास्थ्य सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन वेतन, भत्तों, पदोन्नति और सेवा शर्तों से जुड़ी कई समस्याएं अब भी लंबित हैं। ज्ञापन में चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, चिकित्सा शिक्षा विभाग और स्वशासी मेडिकल कॉलेजों में कार्यरत नर्सिंग अधिकारियों की वेतन विसंगतियां दूर कर समान कार्य के लिए समान वेतन लागू करने की मांग की गई। साथ ही एसजीपीजीआई, केजीएमयू और लोहिया संस्थान की तर्ज पर नर्सिंग, ड्रेस, परिवहन और मकान किराया भत्ता देने की मांग भी रखी गई।
फेडरेशन ने कार्यस्थल पर सुरक्षा, समयबद्ध पदोन्नति और सम्मानजनक कार्य वातावरण सुनिश्चित करने की मांग की। साथ ही आउटसोर्स और संविदा नर्सिंग कर्मियों के लिए समान कार्य के बदले समान वेतन की भी मांग उठाई। राज्यपाल ने मांगों पर सकारात्मक विचार का आश्वासन दिया।
गुरुवार, 2 जुलाई 2026
गूंजे किलकारी-सलामत रहे महतारी पीजीआई के एमआरएच विभाग की सृजन कर्ता
गूंजे किलकारी-सलामत रहे महतारी पीजीआई के एमअारएच विभाग की सृजन कर्ता
प्रो. नीता सिंह प्रो.मंदाकिनी व प्रो. संगीता यादव
सैकड़ों माताओं की सूनी गोद भरने के लिए संजय गाधी पीजीआइ की एमआरएच विभाग ने ऐसी तमाम तकनीक स्थापित की, जिससे ऐसे शिशुओं को धरती पर कदम रखने का मौका मिला जो शायद ही दुनिया देख पाते। इस विभाग का एक प्रसव हजारों दूसरे प्रसवों के बराबर है। तकनीक भी ऐसी जो देश के बड़े संस्थान एम्स दिल्ली, पीजीआइ चंडीगढ़ के अलावा किसी भी सरकारी अस्पताल में नहीं है।1डॉक्टर्स डे के मौके पर विभाग की मुखिया प्रो.मंदाकिनी प्रधान कहती हैं कि साल भर में दस हजार से अधिक महिलाओं की हाई रिस्क प्रिगनेंसी से जुड़ी परेशानी को हैंडल किया। इसके अलावा सोशल मीडिया से जरिए देश के दूर कोने में बैठे स्त्री रोग विशेषज्ञों के सलाह दे कर उलझन को सुलझाने की कोशिश भी कर रहे हैं। इस काम में प्रो.नीता सिंह और प्रो.संगीता यादव ने खूब मदद की। पेश है कुमार संजय की एक रिपोर्ट...................
:-1सोशल मीडिया सलाह का हथियार 1
भिलाई की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ.संगीता कामरा का वॉट्सएप पर संदेश आया कि एक महिला के तीन बच्चों में जन्मजात गड़बड़ी अल्ट्रासाउंड परीक्षण में मिला है। इसके कारण वह गर्भ को जारी नहीं रख सकी। भ्रूण का फोटो भी अपलोड किया। संदेश को तीनों विशेषज्ञों ने पढ़ने और फोटो का अध्ययन करने के बाद संदेश दिया कि कारण पता करना होगा। इसके लिए जांच कराने के बाद ही आगे की प्लानिंग की जाए। गर्भधारण के लिए तभी सलाह दें। इन विशेषज्ञों के सोशल मीडिया से केवल भिलाई की ही नहीं जयपुर से डॉ.सविता, डॉ.अंजू बहराइच से डॉ.राजुल सिंह व देहरादून से डॉ.रीता सहित देश के कई कोनों से विशेषज्ञा जुड़ी हुई हैं, जो कि सलाह के लिए आपस में संपर्क में रहती हैं। अब पांच सौ अधिक महिलाओं में सलाह दिया गया है। कई बार विशेष इलाज के लिए लोग पीजीआइ भेजती हैं।
1मेरे घर आई नन्ही परी1
सहारनपुर के डॉ. संजीव थापर के की प}ी में रुबेला का संक्रमण गर्भावस्था के दौरान मिला, जिसमें कहा गया कि शिशु में सुनने और बोलने की परेशानी हो सकती है इसलिए गर्भ को हटाना होगा। इन विशेषज्ञों ने परीक्षण किया, जिसमें संक्रमण नहीं मिला तो गर्भ को जारी रखने का सलाह दिया। बाद में स्वस्थ शिशु ने जन्म लिया। आज संदेश दिया मेरे घर आयी एक नन्ही परी..। इसी तरह पटना की अंजू चार बार गर्भवती हुई, लेकिन हर बार उनकी गोद खाली ही रह गयी। वह आठवीं बार गर्भवती होने के तुरंत बाद पीजीआइ आयी यहां पर पता चला कि शुगर के कारण शिशु का विकास सही नहीं हो पा रहा है। इंसुलिन की सही डोज पर रखा गया। अंजू ने स्वस्थ शिशु को जन्म दिया।
1गर्भ में ही बचाई शिशु की जान1
गर्भ में शिशु को खून चढ़ाकर अब तक चार सौ से अधिक शिशुओं को दुनिया देखने का मौका इस टीम ने दिया। एक अन्य केस में विशेषज्ञों ने बताया कि वार्ड में भर्ती अर्चना का बच्चा जब 22 सप्ताह का था, जिसके थैली में पानी सूख गया। इससे शिशु की जान को खतरा पैदा हो गया। हम लोगों ने इंट्रायूट्राइन इंफ्यूजन तीन बार करके पानी की मात्र थैली में बनाया रखा, जिससे शिशु का पूरा विकास हुआ। इसी हफ्ते आपरेशन कर स्वस्थ्य शिशु का जन्म कराया। बताया कि शिशु एक थैली में रहता है जिसमें पानी एक तय मात्र में रहता है। पानी कम या अधिक होने पर शिशु के जीवन और विकास पर खतरा रहता है। हम लोगों ने निडिन के जरिए रिंगर लेक्टेट और एंटीबायोटिक का कंबीनेशन सीधे इंजेक्ट किया फिलहाल यह तकनीक देश के गिने चुने संस्थान में उपलब्ध है।
1गर्भ में ही इलाज कर बनाती हैं स्वस्थ1
बक्सर पटना निवासी मुन्नी के तीन बच्चे दुनिया में नहीं आ पाए। चौथी बार मां बनी तो यहां आयी, पता चला कि गर्भस्थ शिशु का हीमोग्लोबीन दो से कम था। तीन बार गर्भ में खून चढ़ाने के बाद अब स्वस्थ्य शिशु के जन्म की उम्मीद है। आरएच फैक्टर भिन्नता के कारण शिशु में हीमोग्लोबीन कम होने लगता है। इससे शिशु के जीवन को खतरा रहता है। हमने अब तक चार सौ से अधिक गर्भस्थ शिशु में खून चढ़ाकर जन्म कराया है। इससे बचाव के लिए एंटी डी इंजेक्शन लगवाना चाहिए। यदि ब्लड ग्रुप के आरएच फैक्टर में भिन्नता है तो 2500 रुपये के इंजेक्शन से कई परेशानी से बच सकते हैं।
मंगलवार, 30 जून 2026
केदारनाथ से एक इंच छोटा, इटावा में बन रहा भव्य केदारेश्वर
केदारनाथ से एक इंच छोटा, इटावा में बन रहा भव्य केदारेश्वर धाम
84 फीट ऊंचे मंदिर का गर्भगृह केदारनाथ की तर्ज पर, मूल धाम के सम्मान में रखी गई एक इंच कम ऊंचाई; उत्तर और दक्षिण भारतीय स्थापत्य का अद्भुत संगम
इटावा जिले के लोहन्ना चौराहे से ग्वालियर रोड पर लायन सफारी पार्क की तरफ बढ़ते ही सड़क के बाईं ओर अचानक एक विशाल मंदिर का शिखर नजर आता है। कुछ क्षणों के लिए ऐसा भ्रम होता है मानो उत्तराखंड का केदारनाथ मंदिर मैदानों में उतर आया हो। जैसे-जैसे मंदिर करीब आता है, लगभग दस फीट ऊंचे चबूतरे पर स्थापित काले ग्रेनाइट के विशाल नंदी की प्रतिमा श्रद्धालुओं का स्वागत करती है। नंदी की दृष्टि सीधे गर्भगृह की ओर है और उसके पीछे पत्थरों से आकार ले रहा है केदारेश्वर महादेव मंदिर पहली ही नजर में अपनी भव्यता का अहसास करा देता है।
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी ऊंचाई है। करीब 84 फीट ऊंचे इस मंदिर का गर्भगृह उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर की तर्ज पर बनाया जा रहा है। निर्माणकर्ताओं के अनुसार इसकी कुल ऊंचाई जानबूझकर केदारनाथ मंदिर से लगभग एक इंच कम रखी गई है, ताकि मूल धाम के प्रति सम्मान व्यक्त किया जा सके। करीब 11 एकड़ क्षेत्र में विकसित हो रहा यह मंदिर केवल धार्मिक परियोजना नहीं है, बल्कि उत्तराखंड की नागर शैली और दक्षिण भारत की द्रविड़ मंदिर परंपरा का दुर्लभ संगम भी है। मंदिर अभी निर्माणाधीन है, लेकिन सावन शुरू होने से पहले ही यहां प्रतिदिन दो हजार से अधिक श्रद्धालुओं के आने का दावा किया जा रहा है।
यही वह मंदिर है, जिसके बारे में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कई बार सार्वजनिक मंचों से कह चुके हैं कि मंदिर के पूर्ण होने के बाद वह सबसे पहले यहां भगवान शिव के दर्शन करेंगे और उसके बाद अयोध्या जाकर रामलला के दर्शन करेंगे। उनके इस बयान के बाद यह मंदिर केवल धार्मिक कारणों से ही नहीं, बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श के केंद्र में भी आ गया।
दिलचस्प बात यह है कि इस मंदिर की कहानी किसी राजनीतिक रणनीति या चुनावी योजना से शुरू नहीं हुई थी। इसकी शुरुआत करीब 17 वर्ष पहले एक विशाल नंदी की प्रतिमा बनाने की इच्छा से हुई थी।
दरअसल, मैसूर के जयचामाराजेंद्र कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में पढ़ाई के दौरान अखिलेश यादव अक्सर प्रसिद्ध चामुंडेश्वरी मंदिर जाया करते थे। वहां स्थापित काले ग्रेनाइट के विशाल नंदी की प्रतिमा ने उनके मन पर गहरी छाप छोड़ी थी। वर्षों बाद वर्ष 2009 में नई दिल्ली में आंध्र प्रदेश के शिल्प विशेषज्ञ और मंदिर निर्माण कर रही कंपनी के निदेशक मधु बोट्टा से मुलाकात के दौरान उन्होंने उसी शैली की एक विशाल नंदी प्रतिमा इटावा में स्थापित करने की इच्छा जताई।
करीब आठ वर्षों की तैयारी के बाद वर्ष 2017 में मैसूर के नंदी की लगभग हूबहू प्रतिकृति इटावा लाई गई। जब अखिलेश यादव ने उस प्रतिमा को देखा तो वह इतने प्रभावित हुए कि यहीं से एक भव्य शिव मंदिर बनाने का विचार सामने आया। इसके बाद वर्ष 2018 में इटावा लायन सफारी पार्क के सामने शीतलपुर गांव में ट्रस्ट के माध्यम से भूमि खरीदी गई और मंदिर की परिकल्पना पर काम शुरू हुआ।
मंदिर निर्माण से पहले देश के अनेक प्राचीन शिव मंदिरों का अध्ययन किया गया। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और उत्तराखंड के मंदिरों की स्थापत्य शैली का गहन सर्वेक्षण किया गया। अंततः निर्णय लिया गया कि मंदिर का गर्भगृह उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर की शैली पर आधारित होगा, जबकि पूरा परिसर दक्षिण भारतीय द्रविड़ वास्तुकला से प्रेरित होगा। इसी कारण यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय मंदिर वास्तुकला की दो महान परंपराओं के संगम का भी प्रतीक बनकर उभर रहा है।
मंदिर को लेकर चर्चा पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर फरवरी 2024 में हुई, जब नेपाल से लाई गई शालिग्राम शिला लखनऊ स्थित समाजवादी पार्टी के प्रदेश मुख्यालय पहुंची। अगले दिन अखिलेश यादव, उनकी पत्नी डिंपल यादव और पार्टी नेताओं ने वैदिक रीति से उसकी पूजा-अर्चना की। बाद में यही शिला इटावा लाई गई और अब मंदिर के गर्भगृह में स्थापित की जा रही है। इसके बाद से यह मंदिर लगातार धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है।
आज निर्माणाधीन होने के बावजूद केदारेश्वर महादेव मंदिर केवल इटावा की पहचान नहीं बन रहा, बल्कि उत्तर प्रदेश में आस्था, प्राचीन भारतीय शिल्पकला, सांस्कृतिक विरासत और बदलते राजनीतिक विमर्श के एक नए प्रतीक के रूप में भी देखा जा रहा है। मंदिर के पूर्ण होने के बाद यह केवल श्रद्धालुओं का नया आस्था केंद्र ही नहीं, बल्कि देश के प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थलों में अपनी जगह बनाने की क्षमता भी रखता है। साभार आशीष मिश्रा इंडिया टुडे
सोमवार, 29 जून 2026
ट्रांसप्लांट के साथ आम बीमारी पर भी हो कड़ी नज़र
ट्रांसप्लांट के साथ आम बीमारी पर भी हो कड़ी नज़र
अंग प्रत्यारोपण भी जरूरी, लेकिन स्वास्थ्य नीति का केंद्र करोड़ों आम मरीज भी हों
पिछले कुछ वर्षों में किडनी, लिवर, हार्ट और फेफड़े (लंग) प्रत्यारोपण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। जिन मरीजों के लिए अंग प्रत्यारोपण ही जीवन बचाने का अंतिम विकल्प होता है, उनके लिए यह चिकित्सा विज्ञान का वरदान है। विभिन्न चिकित्सा आकलनों के अनुसार भारत में हर वर्ष लगभग 3 लाख मरीजों को किसी न किसी अंग प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है, जबकि अंगों की कमी, सीमित केंद्रों और आर्थिक कारणों से केवल 20–25 हजार मरीजों का ही प्रत्यारोपण हो पाता है। इसलिए ट्रांसप्लांट सेवाओं का विस्तार और अंगदान को बढ़ावा देना आवश्यक है।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष कहीं अधिक बड़ा है। भारत में हर वर्ष 80 लाख से अधिक लोगों की मौत हृदय रोग, कैंसर, स्ट्रोक, मधुमेह, फेफड़ों की बीमारियों, संक्रामक रोगों और अन्य गंभीर बीमारियों से हो जाती है। यानी अंग प्रत्यारोपण की जरूरत वाले लगभग 3 लाख मरीजों की तुलना में अन्य गंभीर बीमारियों से मरने वालों की संख्या 25 गुना से भी अधिक है। ऐसे में स्वास्थ्य नीति का उद्देश्य केवल ट्रांसप्लांट कार्यक्रमों का विस्तार नहीं, बल्कि उन बीमारियों के इलाज को भी सर्वोच्च प्राथमिकता देना होना चाहिए जो सबसे अधिक लोगों की जान ले रही हैं।
आंकड़े क्या कहते हैं?
भारत में अनुमानित रूप से हर वर्ष—
हृदय रोग से लगभग 30 लाख लोगों की मृत्यु होती है।
कैंसर से लगभग 10 लाख लोगों की जान जाती है।
ब्रेन स्ट्रोक से करीब 8 लाख लोगों की मौत होती है।
फेफड़ों की गंभीर बीमारियों से लगभग 10 लाख लोग दम तोड़ते हैं।
मधुमेह से लगभग 5 लाख लोगों की मृत्यु होती है।
टीबी, निमोनिया और अन्य संक्रामक रोगों से करीब 15–18 लाख लोगों की जान जाती है।
सड़क दुर्घटनाओं में प्रतिवर्ष लगभग 1.77 लाख लोगों की मौत होती है।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि ट्रांसप्लांट चिकित्सा महत्वपूर्ण है, लेकिन देश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौती अभी भी वे बीमारियां हैं जिनसे हर वर्ष लाखों लोगों की जान जा रही है।
ट्रांसप्लांट बनाम सामान्य बीमारियां: किसे कितनी जरूरत?
देश में हर वर्ष लगभग 3 लाख मरीजों को अंग प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है। दूसरी ओर करोड़ों लोग पेट, आंत, पित्ताशय, मूत्राशय, प्रोस्टेट, कैंसर, न्यूरोसर्जरी, हड्डी, स्त्री एवं प्रसूति, संक्रमण, दुर्घटनाओं और अन्य बीमारियों के इलाज के लिए अस्पताल पहुंचते हैं।
इन मरीजों में अधिकांश को ट्रांसप्लांट नहीं, बल्कि समय पर ऑपरेशन, आईसीयू, विशेषज्ञ डॉक्टर और आवश्यक दवाओं की जरूरत होती है। यदि ये सुविधाएं समय पर मिल जाएं तो लाखों लोगों की जान बचाई जा सकती है।
इलाज का खर्च भी समझना होगा
अंग प्रत्यारोपण केवल चिकित्सा की नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी सबसे महंगी प्रक्रियाओं में से एक है।
किडनी ट्रांसप्लांट का खर्च लगभग 5–10 लाख रुपये।
लिवर ट्रांसप्लांट का खर्च लगभग 20–35 लाख रुपये।
हार्ट ट्रांसप्लांट का खर्च लगभग 20–30 लाख रुपये।
लंग ट्रांसप्लांट का खर्च लगभग 25–40 लाख रुपये या उससे अधिक हो सकता है।
यहीं खर्च समाप्त नहीं होता। ट्रांसप्लांट के बाद मरीज को जीवनभर महंगी दवाएं, नियमित जांच और विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी की आवश्यकता होती है, जिस पर हर महीने हजारों रुपये खर्च होते हैं।
इसके विपरीत, अधिकांश सामान्य और सुपर स्पेशियलिटी बीमारियों—जैसे पित्ताशय, अपेंडिक्स, हर्निया, मूत्राशय, प्रोस्टेट, कैंसर की शुरुआती सर्जरी, हड्डी, स्त्री रोग और अन्य ऑपरेशन—का इलाज सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क या बहुत कम खर्च पर उपलब्ध कराया जा सकता है। निजी अस्पतालों में भी इनका खर्च सामान्यतः 50 हजार से 3 लाख रुपये के बीच होता है। अर्थात इन बीमारियों का इलाज आम लोगों की पहुंच में लाया जा सकता है, यदि सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत हों।
सबसे बड़ी चुनौती—आईसीयू की कमी
देश के अधिकांश सरकारी अस्पतालों में आईसीयू बेड की भारी कमी है। गंभीर मरीजों को समय पर आईसीयू नहीं मिल पाता। मजबूरी में उन्हें निजी अस्पतालों में भर्ती कराना पड़ता है, जहां एक दिन का आईसीयू खर्च ही हजारों से लेकर लाख रुपये तक पहुंच सकता है। अनेक परिवार इलाज के लिए कर्ज में डूब जाते हैं या अपनी जीवनभर की जमा पूंजी गंवा देते हैं।
यदि समय पर आईसीयू उपलब्ध हो जाए तो हार्ट अटैक, स्ट्रोक, सेप्सिस, दुर्घटनाओं और जटिल सर्जरी वाले हजारों मरीजों की जान बचाई जा सकती है।
प्राथमिकता क्या होनी चाहिए
अंग प्रत्यारोपण की सुविधाओं का विस्तार होना चाहिए, लेकिन स्वास्थ्य बजट का बड़ा हिस्सा उन सेवाओं पर भी खर्च होना चाहिए जिनका लाभ सबसे अधिक लोगों को मिले।
प्रत्येक राज्य की राजधानी में कम से कम 2000 बेड का आधुनिक क्रिटिकल केयर (आईसीयू) अस्पताल विकसित किया जाए।
जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में आईसीयू और आपातकालीन सेवाओं का विस्तार किया जाए।
पेट, आंत, मूत्राशय, कैंसर, न्यूरोसर्जरी और अन्य सुपर स्पेशियलिटी सर्जरी की क्षमता बढ़ाई जाए।
संक्रामक रोगों और नॉन-कम्युनिकेबल बीमारियों की रोकथाम और उपचार पर अधिक निवेश किया जाए।
आम मरीजों के लिए सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाएं।
ट्रांसप्लांट केंद्रों का क्षेत्रीय मॉडल
अत्यधिक विशेषज्ञता और महंगे संसाधनों की आवश्यकता को देखते हुए यह भी विचार किया जा सकता है कि तीन-चार राज्यों के लिए एक विश्वस्तरीय क्षेत्रीय ट्रांसप्लांट संस्थान विकसित किया जाए, जहां केवल अंग प्रत्यारोपण और उससे जुड़ी सुपर स्पेशियलिटी सेवाएं उपलब्ध हों। इससे अन्य मेडिकल कॉलेजों और सरकारी अस्पतालों में आईसीयू, सामान्य सर्जरी और गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध कराए जा सकते हैं। यह एक नीतिगत सुझाव है, जिस पर विशेषज्ञों और सरकार को व्यापक चर्चा करनी चाहिए।
भारत को ट्रांसप्लांट की आवश्यकता है, लेकिन उससे कहीं अधिक आवश्यकता है संतुलित स्वास्थ्य नीति की।
जब एक ओर लगभग 3 लाख लोगों को हर वर्ष अंग प्रत्यारोपण की जरूरत होती है, वहीं दूसरी ओर 80 लाख से अधिक लोग अन्य गंभीर बीमारियों से अपनी जान गंवा देते हैं। इसलिए स्वास्थ्य व्यवस्था का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने ट्रांसप्लांट हुए, बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि कितने हार्ट अटैक के मरीज समय पर आईसीयू तक पहुंचे, कितने कैंसर रोगियों का समय पर ऑपरेशन हुआ, कितने स्ट्रोक मरीजों को गोल्डन ऑवर में इलाज मिला और कितने गरीब परिवार बिना आर्थिक तबाही के इलाज करा सके।
आधुनिक चिकित्सा का वास्तविक उद्देश्य केवल सबसे जटिल ऑपरेशन करना नहीं, बल्कि सबसे अधिक लोगों की जान बचाना है। यही भारत की स्वास्थ्य नीति की सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।
रविवार, 28 जून 2026
सेप्सिस एक मेडिकल इमरजेंसी, हर मिनट की देरी बढ़ा सकती है खतरा:
सेप्सिस एक मेडिकल इमरजेंसी, हर मिनट की देरी बढ़ा सकती है खतरा:
डॉक्टर्स डे पर विशेषज्ञों का संदेश—समय पर पहचान और उपचार से बचाई जा सकती हैं हजारों जानें
लखनऊ। हर वर्ष लाखों लोग सेप्सिस के कारण अपनी जान गंवा देते हैं। यह केवल एक सामान्य संक्रमण नहीं, बल्कि संक्रमण के प्रति शरीर की अनियंत्रित प्रतिक्रिया है, जो कुछ ही घंटों में शरीर के कई महत्वपूर्ण अंगों को प्रभावित कर सकती है। समय पर पहचान और उपचार न मिलने पर रोगी सेप्टिक शॉक में जा सकता है और मृत्यु का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
डॉक्टर्स डे के अवसर पर संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई), लखनऊ के आपातकालीन चिकित्सा विभाग के विशेषज्ञों ने बताया कि सेप्सिस के उपचार में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका समय की होती है। चिकित्सा विज्ञान में शुरुआती एक घंटे को "गोल्डन ऑवर" माना जाता है। यदि इस दौरान रोग की पहचान कर आवश्यक जांच, उचित एंटीबायोटिक, तरल उपचार (फ्लूड रिससिटेशन) तथा जरूरत पड़ने पर वासोप्रेसर शुरू कर दिए जाएं, तो रोगी के बचने की संभावना काफी बढ़ जाती है।
विशेषज्ञों ने बताया कि एसजीपीजीआई के आपातकालीन चिकित्सा विभाग में सेप्सिस की शीघ्र पहचान और उपचार को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है। गंभीर मरीजों का व्यवस्थित क्लिनिकल आकलन किया जाता है। संक्रमण की आशंका होने पर तुरंत रक्त जांच, ब्लड कल्चर, सीरम लैक्टेट, अंगों की कार्यक्षमता का मूल्यांकन तथा आवश्यकतानुसार इमेजिंग कराई जाती है। इसके आधार पर अंतरराष्ट्रीय उपचार मानकों के अनुरूप समयबद्ध एंटीबायोटिक, तरल उपचार और अन्य जीवनरक्षक उपाय शुरू किए जाते हैं।
उन्होंने कहा कि संस्थान का उद्देश्य केवल मरीज की जान बचाना ही नहीं, बल्कि संक्रमण के वास्तविक कारण की पहचान, विवेकपूर्ण एंटीबायोटिक उपयोग तथा बहु-विषयक (मल्टीडिसिप्लिनरी) उपचार के माध्यम से बेहतर परिणाम सुनिश्चित करना भी है। इसके लिए आपातकालीन चिकित्सा, क्रिटिकल केयर, माइक्रोबायोलॉजी, संक्रामक रोग विशेषज्ञ और अन्य विभाग मिलकर समन्वित रूप से कार्य करते हैं।
विशेषज्ञों ने बताया कि भारत जैसे देश में डेंगू, स्क्रब टायफस, लेप्टोस्पायरोसिस, मलेरिया और अन्य उष्णकटिबंधीय संक्रमण भी सेप्सिस का कारण बन सकते हैं। इसलिए बुखार को सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, खासकर जब उसके साथ तेज सांस चलना, भ्रम की स्थिति, अत्यधिक कमजोरी, रक्तचाप कम होना या पेशाब कम आना जैसे लक्षण दिखाई दें। ऐसे मामलों में तुरंत अस्पताल पहुंचकर चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक है।
डॉक्टर्स डे के अवसर पर एसजीपीजीआई ने उन सभी चिकित्सकों, नर्सों, पैरामेडिकल कर्मियों और स्वास्थ्यकर्मियों के प्रति सम्मान व्यक्त किया, जो दिन-रात आपातकालीन परिस्थितियों में मरीजों का उपचार करते हुए हर मिनट जीवन बचाने का प्रयास करते हैं।
संदेश: "सेप्सिस एक मेडिकल इमरजेंसी है। जल्दी पहचान, जल्दी उपचार और टीमवर्क ही जीवन बचाने की सबसे प्रभावी कुंजी है।"
दुर्लभ ब्रेन एन्यूरिज्म से जूझ रहे 8 वर्षीय ओजस को मिली नई जिंदगी
दुर्लभ ब्रेन एन्यूरिज्म से जूझ रहे रामनगर (बाराबंकी) के 8 वर्षीय ओजस को मिली नई जिंदगी
एसजीपीजीआई में बिना स्टेंट के कॉइलिंग कर बंद किया गया एन्यूरिज्म, प्रो. विवेक सिंह बोले—“यह मामला जिंदगी भर याद रहेगा”
लखनऊ।
बाराबंकी जिले के रामनगर क्षेत्र के रहने वाले 8 वर्षीय ओजस को एसजीपीजीआई के चिकित्सकों ने एक जटिल और जानलेवा ब्रेन एन्यूरिज्म से बचाकर नई जिंदगी दी है। मस्तिष्क की रक्त वाहिनी में बने एन्यूरिज्म के कारण बच्चे में लकवे के लक्षण उभर आए थे। परिवार के सामने अपने इकलौते बेटे को बचाने की चुनौती थी, लेकिन एसजीपीजीआई के विशेषज्ञों ने आधुनिक तकनीक के जरिए सफल उपचार कर उसे स्वस्थ जीवन लौटाया।
लकवे के लक्षणों ने बढ़ाई चिंता
ओजस के पिता आदर्श कुमार मिश्रा, निवासी रामनगर, बाराबंकी, बताते हैं कि बेटे को अचानक न्यूरोलॉजिकल समस्याएं होने लगी थीं। धीरे-धीरे उसके शरीर में कमजोरी और लकवे जैसे लक्षण दिखाई देने लगे। जांच में पता चला कि मस्तिष्क की एक रक्त वाहिनी में ब्रेन एन्यूरिज्म बन गया है। यह ऐसी स्थिति होती है जिसमें रक्त वाहिनी की दीवार कमजोर होकर गुब्बारे की तरह फूल जाती है और उसके फटने पर जानलेवा रक्तस्राव हो सकता है।
बीमारी की जानकारी मिलते ही परिवार पर मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। इसके बाद ओजस को एसजीपीजीआई लाया गया, जहां वरिष्ठ रेडियोलॉजिस्ट एवं न्यूरो-इंटरवेंशनल विशेषज्ञ प्रोफेसर विवेक सिंह ने उसकी जांच की।
18 अक्टूबर 2024 को हुआ जटिल ऑपरेशन
जांच के बाद चिकित्सकों ने एंडोवैस्कुलर एम्बोलाइजेशन यानी कॉइलिंग प्रक्रिया करने का निर्णय लिया। 18 अक्टूबर 2024 को यह जटिल प्रक्रिया सफलतापूर्वक की गई। इसमें शरीर की रक्त वाहिनी के रास्ते बेहद पतले कैथेटर मस्तिष्क तक पहुंचाए गए और विशेष कॉइल्स की मदद से एन्यूरिज्म को भीतर से बंद कर दिया गया।
प्रोफेसर विवेक सिंह के अनुसार सामान्यतः ऐसे मामलों में वयस्क मरीजों को स्टेंट लगाने की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन ओजस की उम्र और रक्त वाहिनियों के आकार को देखते हुए कॉइलिंग तकनीक से ही एन्यूरिज्म को सफलतापूर्वक बंद किया गया। इससे मस्तिष्क की प्रभावित नस में रक्त का असामान्य प्रवाह रुक गया और भविष्य में उसके फटने का खतरा समाप्त हो गया।
एक सप्ताह अस्पताल में भर्ती रहा बच्चा
ऑपरेशन के बाद ओजस को लगभग एक सप्ताह तक अस्पताल में भर्ती रखा गया। इस दौरान उसकी स्थिति में लगातार सुधार होता गया। चिकित्सकों की निगरानी में उपचार पूरा होने के बाद उसे छुट्टी दे दी गई। आज वह नियमित रूप से फॉलो-अप के लिए एसजीपीजीआई आता है और पूरी तरह स्वस्थ जीवन जी रहा है।
“20 साल के करियर में यह सबसे यादगार मामलों में से एक”
प्रोफेसर विवेक सिंह बताते हैं कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से न्यूरो-इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं और एक हजार से अधिक जटिल मामलों का उपचार कर चुके हैं। इनमें अधिकांश मरीज वयस्क रहे हैं, लेकिन बच्चों में इस प्रकार का एन्यूरिज्म बेहद दुर्लभ होता है।
उन्होंने कहा, “ज्यादातर उपकरण और तकनीकें वयस्क मरीजों के लिए विकसित की गई हैं। ऐसे में किसी छोटे बच्चे की नाजुक रक्त वाहिनियों में पहुंचकर एन्यूरिज्म को सुरक्षित तरीके से बंद करना काफी चुनौतीपूर्ण होता है। ओजस का मामला इसलिए विशेष था क्योंकि यह एक बच्चे की जिंदगी से जुड़ा था। यही वजह है कि यह केस मुझे पूरी जिंदगी याद रहेगा।”
उन्होंने आगे कहा, “आज जब ओजस फॉलो-अप पर आता है और उसे पूरी तरह स्वस्थ, मुस्कुराते हुए और सामान्य बच्चों की तरह जीवन जीते देखता हूं तो मन को बहुत सुकून मिलता है। किसी बच्चे को मौत के खतरे से बाहर निकालकर सामान्य जीवन में लौटते देखना किसी भी चिकित्सक के लिए सबसे बड़ी संतुष्टि होती है।”
पिता बोले—डॉक्टर हमारे लिए भगवान से कम नहीं
ओजस के पिता आदर्श कुमार मिश्रा कहते हैं कि बीमारी का पता चलने के बाद पूरा परिवार सदमे में था। उन्हें भविष्य की चिंता सता रही थी, लेकिन प्रोफेसर विवेक सिंह और उनकी टीम ने हर कदम पर उनका हौसला बढ़ाया।
उन्होंने कहा, “जब हमें बताया गया कि बेटे के मस्तिष्क की नस में एन्यूरिज्म है और उसकी वजह से लकवे के लक्षण आ रहे हैं, तब हम पूरी तरह टूट चुके थे। लेकिन डॉक्टरों ने भरोसा दिलाया कि इलाज संभव है। आज मेरा बेटा पूरी तरह स्वस्थ है। उसे दौड़ते-भागते और सामान्य बच्चों की तरह खेलते देखना हमारे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है।”
समय पर इलाज से बची जान
विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों में ब्रेन एन्यूरिज्म के मामले बहुत कम देखने को मिलते हैं, लेकिन समय पर पहचान और उपचार न होने पर यह जानलेवा साबित हो सकता है। लगातार सिरदर्द, शरीर के किसी हिस्से में कमजोरी, बोलने में कठिनाई या लकवे जैसे लक्षण दिखाई दें तो तत्काल विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।
रामनगर, बाराबंकी के ओजस की यह कहानी आधुनिक चिकित्सा, विशेषज्ञता और समय पर उपचार की सफलता का उदाहरण है। एक समय जिस बच्चे की जिंदगी खतरे में थी, आज वही बच्चा पूरी तरह स्वस्थ होकर भविष्य के सपने संजो रहा है। वहीं, इस सफलता को याद करते हुए प्रोफेसर विवेक सिंह के शब्द इस उपलब्धि की अहमियत को बयां करते हैं—“कुछ मरीज सिर्फ केस नहीं होते, वे जिंदगी भर की याद बन जाते हैं, और ओजस उन्हीं में से एक है।”
शनिवार, 27 जून 2026
पीजीआई फैकल्टी क्लब के 40 दिवसीय समर कैंप का रंगारंग समापन,
फैकल्टी क्लब के 40 दिवसीय समर कैंप का रंगारंग समापन, बच्चों ने दी शानदार प्रस्तुतियां
संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के फैकल्टी क्लब द्वारा आयोजित 40 दिवसीय समर कैंप का भव्य समापन शनिवार को श्रुति ऑडिटोरियम में उत्साह और उमंग के साथ हुआ। 100 से अधिक बच्चों की भागीदारी वाले इस शिविर के समापन समारोह में रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने सभी का मन मोह लिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ संस्थान के निदेशक डॉ. आर. के. धीमन एवं अन्य गणमान्य अतिथियों तथा फैकल्टी क्लब की कार्यकारिणी के सदस्यों ने दीप प्रज्ज्वलित कर एवं गणेश वंदना के साथ किया।
समर कैंप के दौरान बच्चों को योग, कथक, संगीत, नाटक, बॉलीवुड डांस, कैलीग्राफी, गिटार, पाक कला और क्राफ्ट का प्रशिक्षण दिया गया। समापन समारोह में बच्चों ने इन सभी विधाओं में अपनी प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन किया। कथक की छात्राओं ने तीन ताल पर आधारित मनमोहक प्रस्तुति दी, जबकि गिटार पर प्रस्तुत धुन ने दर्शकों की खूब तालियां बटोरीं।
बच्चों ने "एक दिन मोबाइल बिन" और "एक दिन की छुट्टी" नाटकों के माध्यम से सप्ताह में एक दिन मोबाइल से दूर रहने और अधिक से अधिक पेड़ लगाने का संदेश दिया। उन्होंने सभी उपस्थित लोगों को यह संकल्प भी दिलाया कि सप्ताह में कम से कम एक दिन मोबाइल का उपयोग नहीं करेंगे और वह समय अपने परिवार के साथ बिताएंगे।
समारोह के अंत में सभी प्रतिभागियों को पुरस्कार एवं प्रमाण-पत्र देकर सम्मानित किया गया।
समर कैंप का संचालन प्रशिक्षकों संजय त्रिपाठी, आदित्य लिपटन, योगाचार्य अनूप, अनामिका मिश्रा, नैना श्रीवास्तव, दीपक, आयशा, अनुपमा श्रीवास्तव, खुशबू कक्कड़ और ऋषभ के नेतृत्व में किया गया।
समारोह में सानवी, आइज़ा, अनाईशा, अश्विका, वामिका, अनुषा, इवान, इरव, समृद्धि, काशवी, आरना, तनिष्का, रुद्रांशी, ईशानवी, अनन्या, अद्विक, अमितव, अर्नब, अद्वित, पटेल, अक्षत, इशिता, नंदिनी, अवंतिका, अद्विता, वेदांत, मुग्धा, अनय, ईशान, मिहिका, दिविता, रुशांक, उर्जित, आदित्री, जिज्ञासा, वारुष और विहान सहित अनेक बच्चों ने अपनी आकर्षक प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कार्यक्रम का संचालन प्रणव सिंह, आरुष केशरी, अनन्या एवं इस्साम जफर ने प्रभावशाली ढंग से किया। अंत में फैकल्टी क्लब की टीम ने सभी अभिभावकों, प्रशिक्षकों, सहयोगियों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि बच्चों की प्रतिभा को निखारने के लिए भविष्य में भी ऐसे रचनात्मक कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहेंगे।
बेरोजगारी के कारण बढ़ रही कुंवारों की संख्या, बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा बनी सबसे बड़ी वजह
बेरोजगारी के कारण बढ़ रही कुंवारों की संख्या, बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा बनी सबसे बड़ी वजह
स्थायी नौकरी वाले युवकों को वरीयता दे रहा वधू पक्ष, रोजगार की अनिश्चितता से बढ़ रही विवाह की औसत आयु
भारत में युवाओं के विवाह में देरी और अविवाहित रहने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। लंबे समय तक इसे घटते लिंगानुपात और कन्या भ्रूण हत्या का परिणाम माना जाता रहा, लेकिन अब एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने इस धारणा को चुनौती दी है। अध्ययन के अनुसार आज विवाह में सबसे बड़ी बाधा बेरोजगारी, अस्थायी रोजगार और आर्थिक असुरक्षा बन गई है। वधू पक्ष अब ऐसे वर को प्राथमिकता दे रहा है जिसके पास स्थायी नौकरी और आर्थिक सुरक्षा हो। इसके कारण बड़ी संख्या में युवा विवाह के दायरे से बाहर रह जा रहे हैं।
अध्ययन में कहा गया है कि भारत में विवाह की सामाजिक व्यवस्था तेजी से बदल रही है। पहले जहां परिवार और सामाजिक प्रतिष्ठा को अधिक महत्व दिया जाता था, वहीं अब नौकरी, नियमित आय और आर्थिक स्थिरता विवाह तय करने का सबसे महत्वपूर्ण आधार बन गई है। इसका सबसे अधिक असर उन युवाओं पर पड़ रहा है जो शिक्षित होने के बावजूद स्थायी रोजगार हासिल नहीं कर सके हैं।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5, 2019-21) के अनुसार 25 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 53 प्रतिशत पुरुष और करीब 23 प्रतिशत महिलाएं अब भी अविवाहित हैं। यह दर्शाता है कि विशेष रूप से युवकों में विवाह की आयु लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि रोजगार की अनिश्चितता और आर्थिक दबाव इस बदलाव के प्रमुख कारण हैं।
अध्ययन में भारतीय युवाओं को तीन वर्गों में बांटा गया है। पहला वर्ग कम शिक्षित और बेरोजगार युवाओं का है, जिन्हें विवाह के लिए सबसे अधिक इंतजार करना पड़ रहा है। दूसरा वर्ग शिक्षित लेकिन बेरोजगार युवाओं का है, जिनकी स्थिति भी लगभग ऐसी ही है। तीसरे वर्ग में वे युवा शामिल हैं जो शिक्षित होने के साथ स्थायी रोजगार में हैं। विवाह के लिए सबसे अधिक मांग इसी वर्ग के युवाओं की देखी गई है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बड़ी संख्या में युवा पहले नौकरी पाने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की कोशिश में उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और कौशल प्रशिक्षण में वर्षों बिताते हैं। इसके बाद ही वे विवाह के बारे में सोचते हैं। परिणामस्वरूप देश में विवाह की औसत आयु लगातार बढ़ रही है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि लंबे समय तक बेरोजगारी और विवाह में देरी का असर केवल सामाजिक जीवन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रभाव डालता है। बेरोजगार और लंबे समय तक अविवाहित रहने वाले युवाओं में तनाव, अवसाद, अकेलापन, आत्मविश्वास में कमी और भविष्य को लेकर निराशा जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। यदि रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं बढ़ाए गए तो आने वाले वर्षों में यह सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य की गंभीर चुनौती बन सकती है।
भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है, जहां लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। हर वर्ष लाखों युवा रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं, लेकिन गुणवत्तापूर्ण और स्थायी नौकरियों की उपलब्धता उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही। यही कारण है कि शिक्षित युवाओं में भी रोजगार को लेकर असुरक्षा बनी हुई है और विवाह जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक निर्णय लगातार टल रहे हैं।
समाजशास्त्रियों का मानना है कि विवाह का बदलता स्वरूप भारतीय समाज में आर्थिक परिस्थितियों के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है। उनका कहना है कि यदि रोजगार सृजन, कौशल विकास और युवाओं की आय सुरक्षा पर प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में विवाह की औसत आयु और बढ़ सकती है तथा अविवाहित युवाओं की संख्या में भी लगातार वृद्धि देखने को मिल सकती है। इससे पारिवारिक संरचना, सामाजिक संतुलन और जनसांख्यिकीय परिदृश्य पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ने की आशंका है।
एंडोमेट्रियल कैंसर की समय पर पहचान से बच सकती है जान, कल्याण सिंह कैंसर संस्थान में वैज्ञानिक बैठक आयोजित
एंडोमेट्रियल कैंसर की समय पर पहचान से बच सकती है जान, कल्याण सिंह कैंसर संस्थान में वैज्ञानिक बैठक आयोजित
लखनऊ। जून माह को एंडोमेट्रियल कैंसर जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है। इसी क्रम में कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान के गायनेकोलॉजिक ऑन्कोलॉजी विभाग द्वारा "एडवांसिंग अवेयरनेस, अर्ली डायग्नोसिस एंड प्रिसीजन ट्रीटमेंट इन एंडोमेट्रियल कैंसर" विषय पर वैज्ञानिक अपडेट बैठक आयोजित की गई। कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने महिलाओं में तेजी से बढ़ रहे एंडोमेट्रियल कैंसर के प्रति जागरूकता, समय पर पहचान और आधुनिक उपचार पद्धतियों पर विस्तार से चर्चा की।
बैठक की अध्यक्षता विभागाध्यक्ष प्रो. सबूही कुरैशी ने की। कार्यक्रम के सह-अध्यक्ष रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. शरद सिंह रहे। विशेषज्ञ व्याख्यान डॉ. रूमिता सिंह, डॉ. सौम्या गुप्ता और डॉ. अभिषेक तिवारी ने दिए। उन्होंने बताया कि एंडोमेट्रियल कैंसर गर्भाशय की अंदरूनी परत (एंडोमेट्रियम) में होने वाला कैंसर है और यह महिलाओं में पाया जाने वाला सबसे सामान्य स्त्री-रोग संबंधी कैंसरों में से एक है।
विशेषज्ञों ने बताया कि भारत में हर वर्ष हजारों महिलाओं में एंडोमेट्रियल कैंसर के नए मामले सामने आते हैं। बदलती जीवनशैली, मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हार्मोनल असंतुलन, देर से रजोनिवृत्ति और बढ़ती उम्र इसके प्रमुख जोखिम कारक हैं। यदि बीमारी शुरुआती चरण में पकड़ में आ जाए तो अधिकांश मरीजों का सफल इलाज संभव है, लेकिन देर होने पर कैंसर गर्भाशय से बाहर फैल सकता है और उपचार अधिक जटिल हो जाता है।
बैठक में बताया गया कि रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज) के बाद होने वाला किसी भी प्रकार का रक्तस्राव एंडोमेट्रियल कैंसर का सबसे महत्वपूर्ण चेतावनी संकेत हो सकता है। इसके अलावा मासिक धर्म के बीच असामान्य रक्तस्राव, लंबे समय तक अत्यधिक ब्लीडिंग, श्रोणि (पेल्विक) में लगातार दर्द या पानी जैसा असामान्य स्राव भी जांच की जरूरत का संकेत हो सकता है। ऐसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और तुरंत स्त्री रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।
विशेषज्ञों ने कहा कि आज आधुनिक जांच तकनीकों, मॉलिक्यूलर प्रोफाइलिंग, न्यूनतम चीरे वाली सर्जरी, टार्गेटेड थेरेपी और प्रिसीजन मेडिसिन की मदद से मरीजों को उनकी बीमारी के अनुरूप व्यक्तिगत उपचार उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे उपचार के परिणाम पहले की तुलना में अधिक बेहतर हुए हैं।
कार्यक्रम के अंत में विशेषज्ञों ने महिलाओं से नियमित स्वास्थ्य जांच कराने, असामान्य लक्षणों को गंभीरता से लेने और जागरूक रहने की अपील करते हुए कहा कि "अर्ली डिटेक्शन सेव्स लाइव्स" अर्थात समय पर पहचान ही जीवन बचाने का सबसे प्रभावी उपाय है।
सोमवार, 22 जून 2026
अटेवा की जनजागरण यात्रा का स्वागत, लता सचान बनीं प्रदेश सह प्रभारी
एसजीपीजीआई में अटेवा की जनजागरण यात्रा का स्वागत, लता सचान बनीं प्रदेश सह प्रभारी
लखनऊ। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) में अटेवा उत्तर प्रदेश के प्रदेशाध्यक्ष विजय कुमार बंधु की जनजागरण यात्रा का नर्सिंग स्टाफ एसोसिएशन (एनएसए) के नेतृत्व में भव्य स्वागत किया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में नर्सिंग अधिकारियों और स्वास्थ्यकर्मियों ने पुरानी पेंशन बहाली, निजीकरण के विरोध और कर्मचारी अधिकारों की रक्षा के आंदोलन को समर्थन देने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम में विजय कुमार बंधु ने नर्सिंग स्टाफ एसोसिएशन की अध्यक्ष लता सचान को अटेवा उत्तर प्रदेश महिला प्रकोष्ठ का प्रदेश सह प्रभारी नियुक्त किए जाने की घोषणा की। इस अवसर पर कर्मचारियों और पदाधिकारियों ने उन्हें नई जिम्मेदारी के लिए शुभकामनाएं दीं।
अपने संबोधन में विजय कुमार बंधु ने कहा कि पुरानी पेंशन बहाली केवल कर्मचारियों की मांग नहीं, बल्कि उनके सुरक्षित भविष्य और सम्मानजनक जीवन का सवाल है। उन्होंने बताया कि प्रदेशभर में चल रही जनजागरण यात्रा को शिक्षकों, स्वास्थ्यकर्मियों, अधिवक्ताओं और विभिन्न कर्मचारी संगठनों का व्यापक समर्थन मिल रहा है।
लता सचान ने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं में बढ़ते निजीकरण और संविदाकरण का असर कर्मचारियों के साथ-साथ आम जनता पर भी पड़ रहा है। उन्होंने सभी स्वास्थ्यकर्मियों से एकजुट होकर कर्मचारी हितों की लड़ाई को मजबूत करने का आह्वान किया।
इस दौरान विजय कुमार बंधु ने 25 सितंबर को लखनऊ में प्रस्तावित विशाल कर्मचारी-शिक्षक एवं पेंशन बचाओ रैली को सफल बनाने की अपील की। कार्यक्रम में मौजूद सभी कर्मचारियों ने पुरानी पेंशन बहाली तक संघर्ष जारी रखने और रैली को ऐतिहासिक बनाने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम में विवेक सागर, सुजान सिंह, भानु, मनोज, सुखलेश, मंजू, अश्वनी, अनुलीना, सुरेन्द्र, विकास, संदीप, अजय, दीप्ति समेत अनेक कर्मचारी और वरिष्ठ पदाधिकारी उपस्थित रहे।
रविवार, 21 जून 2026
3 वर्ष का सेवा विस्तार देकर अनुभवी कर्मचारियों को बनाए रखने की अपील
संजय गांधी पीजीआई कर्मचारी महासंघ ने गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु 63 वर्ष करने की मांग उठाई।
मुख्यमंत्री और राज्यपाल को भेजा ज्ञापन, 3 वर्ष का सेवा विस्तार देकर अनुभवी कर्मचारियों को बनाए रखने की अपील
पुनर्नियुक्ति की व्यवस्था समाप्त कर सभी कर्मचारियों को समान अवसर देने की मांग
लखनऊ। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान कर्मचारी महासंघ ने संस्थान के सभी गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों (नॉन-टीचिंग स्टाफ) की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष से बढ़ाकर 63 वर्ष किए जाने की मांग उठाई है। इस संबंध में मुख्यमंत्री और राज्यपाल को संबोधित एक ज्ञापन भेजा गया है।
कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष धर्मेश कुमार और महामंत्री सीमा शुक्ला ने कहा कि संस्थान में शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों के बीच सेवानिवृत्ति आयु को लेकर असमानता बनी हुई है। जहां शिक्षण संकाय के कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु 65 वर्ष है, वहीं गैर-शैक्षणिक कर्मचारी केवल 60 वर्ष की आयु तक ही सेवाएं दे पाते हैं।
उन्होंने कहा कि संस्थान में बड़ी संख्या में कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं या आने वाले वर्षों में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। इसके बाद कई विभागों में कर्मचारियों की कमी को पूरा करने के लिए तीन वर्ष तक पुनर्नियुक्ति की व्यवस्था अपनाई जा रही है। महासंघ का कहना है कि नियमित कर्मचारियों को ही सीधे 63 वर्ष तक सेवा का अवसर देना अधिक व्यावहारिक और पारदर्शी व्यवस्था होगी।
धर्मेश कुमार और सीमा शुक्ला ने कहा कि गैर-शैक्षणिक कर्मचारी प्रशासनिक, तकनीकी और संस्थागत कार्यों का वर्षों का अनुभव रखते हैं। इन कर्मचारियों की विशेषज्ञता संस्थान की कार्यप्रणाली को सुचारु रूप से चलाने, नए कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने और मरीजों को बेहतर सेवाएं उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
उन्होंने यह भी कहा कि जब संस्थान के शिक्षण संकाय को 65 वर्ष, निदेशक को 68 वर्ष और कुछ कर्मचारियों को पुनर्नियुक्ति के माध्यम से 63 वर्ष तक काम करने का अवसर मिल रहा है, तो समस्त गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों को भी समान अवसर मिलना चाहिए। महासंघ ने राज्य सरकार से मांग की है कि संस्थान हित और मरीज हित को ध्यान में रखते हुए सभी नियमित गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों को 3 वर्ष का सेवा विस्तार देते हुए सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाकर 63 वर्ष की जाए।
























