गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

पार्किंसन में कोलेस्ट्रॉल का नया रोल, चूहों पर मैग्नीशियम का असर दिखा


 


पार्किंसन में कोलेस्ट्रॉल का नया रोल, चूहों पर मैग्नीशियम का असर दिखा


पार्किंसन एक ऐसी बीमारी है जिसमें हाथ-पैर कांपते हैं, चलना-फिरना मुश्किल हो जाता है। अब वैज्ञानिकों को इसका एक नया कारण मिला है - दिमाग की कोशिकाओं में कोलेस्ट्रॉल का फंस जाना।


पहले से कहा जाता रहा है कि शरीर में मैग्नीशियम कम होने से पार्किंसन का खतरा बढ़ सकता है। जापान में 249 मरीजों और 368 स्वस्थ लोगों पर हुई जांच में देखा गया कि जो लोग ज्यादा मैग्नीशियम वाला खाना खाते थे, उनमें बीमारी का खतरा लगभग एक तिहाई कम था। अमेरिका में 20 हजार लोगों पर हुई दूसरी स्टडी में भी यही बात दिखी। पर ये दोनों स्टडी सिर्फ इशारा करती हैं, पक्का कारण नहीं बतातीं।


अब 2026 में 'नेचर न्यूरोसाइंस' नाम की बड़ी पत्रिका में एक नई स्टडी छपी है, जिसने कारण समझाने की कोशिश की है।


वैज्ञानिकों ने क्या पाया?


पार्किंसन से जिन लोगों की मौत हुई, उनके दिमाग के उस हिस्से में जहां से चलना-फिरना कंट्रोल होता है, ABCA1 नाम का एक प्रोटीन बहुत ज्यादा मिला। यह प्रोटीन कोलेस्ट्रॉल को एक जगह से दूसरी जगह ले जाता है।


चूहों पर प्रयोग में पता चला कि यही प्रोटीन जब ज्यादा काम करता है तो डोपामाइन बनाने वाले न्यूरॉन्स के अंदर कोलेस्ट्रॉल भर देता है। इससे कोशिका का सफाई सिस्टम बंद हो जाता है, गंदा प्रोटीन जमा होने लगता है और न्यूरॉन मर जाता है। यही पार्किंसन में होता है।


चूहों पर मैग्नीशियम का प्रयोग


वैज्ञानिकों ने चूहों को 24 हफ्ते तक मैग्नीशियम साइट्रेट नाम की दवा दी। यह दवा ABCA1 प्रोटीन को रोकती है।


नतीजा ऐसा रहा -

बिना दवा वाले चूहों में सिर्फ 45% डोपामाइन कोशिकाएं बचीं। सबसे ज्यादा डोज पाने वाले चूहों में 79% कोशिकाएं बच गईं।

उनके चलने-फिरने की क्षमता भी लगभग दोगुनी हो गई।

जैसे-जैसे डोज बढ़ी, दिमाग में जमा कोलेस्ट्रॉल और जहरीला प्रोटीन कम होता गया।


आम लोगों के लिए इसका क्या मतलब?


इससे लगता है कि दिमाग में कोलेस्ट्रॉल का फंसना पार्किंसन को बढ़ा सकता है और मैग्नीशियम उसे रोकने में मदद कर सकता है।


लेकिन ध्यान दें - यह प्रयोग सिर्फ चूहों पर हुआ है। दवा इंजेक्शन से दी गई थी, गोली के रूप में नहीं। इंसानों के लिए कौन सी डोज सही है, यह अभी पता नहीं है। इसलिए खुद से मैग्नीशियम की गोली लेना शुरू न करें। यह रिसर्च सिर्फ इतना कहती है कि अब इंसानों पर इसकी जांच करना जरूरी है।

डायबिटीज में किडनी फेल होने से बचाएगी ये दवा, दो बड़े ट्रायल में साबित हुआ असर

 


डायबिटीज में किडनी फेल होने से बचाएगी ये दवा, दो बड़े ट्रायल में साबित हुआ असर

 इर्बेसार्टन और लोसार्टन ने डायलिसिस के खतरे को 28 फीसदी तक घटाया, डॉक्टर बोले- प्रोटीन आते ही शुरू करना होगा इलाज


लखनऊ। टाइप टू डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए राहत की बड़ी खबर है। अब किडनी को फेल होने से बचाया जा सकता है। साल 2001 में हुए दो ऐतिहासिक परीक्षणों आईडीएनटी और रेनाल ने यह साबित कर दिया है कि एआरबीएस समूह की दवाओं से किडनी खराब होने की रफ्तार को काफी हद तक रोका जा सकता है। खास बात यह है कि यह फायदा सिर्फ ब्लड प्रेशर कम करने से नहीं मिलता, बल्कि दवा का किडनी पर सीधा सुरक्षात्मक असर होता है।

क्या कहते हैं दोनों ऐतिहासिक ट्रायल

पहला परीक्षण था **आईडीएनटी यानी इर्बेसार्टन डायबिटिक नेफ्रोपैथी ट्रायल**। इसमें 1715 मरीज शामिल किए गए थे। इन मरीजों को रोजाना इर्बेसार्टन 300 मिलीग्राम दी गई। इसका फॉलोअप 2.6 साल तक किया गया।


दूसरा परीक्षण था **रेनाल यानी रिडक्शन ऑफ एंडप्वाइंट्स इन एनआईडीडीएम विद द एंजियोटेंसिन टू एंटागोनिस्ट लोसार्टन**। इसमें 1513 मरीजों को रोजाना लोसार्टन 50 से 100 मिलीग्राम दी गई। इसका फॉलोअप 3.4 साल तक चला।


दोनों ही परीक्षणों में ऐसे मरीज लिए गए थे, जिन्हें टाइप टू डायबिटीज के साथ हाइपरटेंशन और ओवर्ट नेफ्रोपैथी थी, यानी पेशाब में प्रोटीन आना शुरू हो गया था।

किस दवा से तुलना की गई, किसमें ज्यादा फायदा

आईडीएनटी में इर्बेसार्टन की तुलना एम्लोडिपिन 10 मिलीग्राम और प्लेसीबो यानी नकली दवा से की गई। नतीजा चौंकाने वाला रहा। इर्बेसार्टन ने प्लेसीबो की तुलना में किडनी फेलियर के संयुक्त खतरे को 20 प्रतिशत और एम्लोडिपिन की तुलना में 23 प्रतिशत तक कम कर दिया।


रेनाल में लोसार्टन की तुलना सिर्फ प्लेसीबो से की गई। इसमें लोसार्टन ने 16 प्रतिशत तक खतरा कम किया।


अलग-अलग पैमानों पर देखें तो क्रिएटिनिन के दोगुना होने को रोकने में इर्बेसार्टन ने 33 प्रतिशत का फायदा दिखाया, जबकि लोसार्टन ने 25 प्रतिशत का फायदा दिखाया। यानी इस मोर्चे पर इर्बेसार्टन आगे रही।


वहीं अंतिम स्टेज की किडनी बीमारी यानी डायलिसिस की नौबत को रोकने में लोसार्टन ने 28 प्रतिशत और इर्बेसार्टन ने 23 प्रतिशत फायदा दिखाया। इस मोर्चे पर लोसार्टन थोड़ी आगे रही। दोनों ने ही यह साबित किया कि किडनी को बचाया जा सकता है।

कैसे बचाती है ये दवा किडनी को

विशेषज्ञों के अनुसार शरीर में एंजियोटेंसिन टू नाम का हार्मोन किडनी की बारीक नसों को सिकोड़ देता है। इससे किडनी के फिल्टर पर दबाव बढ़ता है और प्रोटीन पेशाब के रास्ते बाहर निकलने लगता है। इर्बेसार्टन और लोसार्टन इसी हार्मोन के रिसेप्टर को ब्लॉक कर देती हैं।


इससे किडनी के अंदर का प्रेशर कम होता है, प्रोटीन लीकेज रुकता है और क्रिएटिनिन बढ़ने की रफ्तार धीमी हो जाती है। यही कारण है कि आज देश-विदेश की सभी गाइडलाइन कहती हैं कि डायबिटीज के मरीज के पेशाब में जरा सा भी प्रोटीन आए तो एआरबीएस दवा तुरंत शुरू कर देनी चाहिए।



खर्च कितना आएगा - ज्यादा असरदार और कम असरदार दवा में फर्क




1. ज्यादा कारगर - इर्बेसार्टन 300 मिलीग्राम


बाजार में इसका ब्रांडेड नाम आईरोवेल 300 के नाम से मिलता है।

• 1 पत्ते में 10 टेबलेट का दाम - 200 से 269 रुपयेऔर कहीं जेनेरिक में 55 रुपये प्रति पत्ता भी   • एमआरपी लिस्ट पर 312 रुपये लिखा है   

एक महीने का खर्च (रोज 1 गोली के हिसाब से 30 गोली):

• ब्रांडेड लेने पर - लगभग 600 से 800 रुपये महीना • जेनेरिक लेने पर - लगभग 150 से 250 रुपये महीना 

2. थोड़ी कम कारगर पर सस्ती - लोसार्टन 50 / 100 मिलीग्राम


रेनाल ट्रायल में यही डोज इस्तेमाल हुई थी। यह सबसे ज्यादा बिकने वाली और सस्ती एआरबीएस है।

• लोसार्टन 50 मिलीग्राम - 51 रुपये प्रति पत्ता (10 गोली)   • लोसार्टन 100 मिलीग्राम - 99 से 122 रुपये प्रति पत्ता   

एक महीने का खर्च:

• लोसार्टन 50 मिलीग्राम रोज 1 गोली - लगभग 150 से 180 रुपये महीना • लोसार्टन 100 मिलीग्राम रोज 1 गोली - लगभग 300 से 360 रुपये महीना 

सीधा मतलब -

अगर डॉक्टर इर्बेसार्टन 300 लिखते हैं तो ब्रांडेड का खर्च लोसार्टन से दोगुना पड़ता है, लेकिन जेनेरिक में दोनों का खर्च लगभग बराबर आ जाता है। लोसार्टन आज भी भारत में किडनी प्रोटेक्शन के लिए सबसे किफायती विकल्प है, इसलिए सरकारी अस्पतालों में इसी को ज्यादा लिखा जाता है।



 





हेपेटाइटिस के इलाज में ऐतिहासिक सफलता: क्रॉनिक हेपेटाइटिस बी के लिए दुनिया की पहली एंटीसेंस थेरेपी 'हिब्सागो' को मंजूरी


अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने 20 अक्टूबर 2026 को क्रॉनिक हेपेटाइटिस बी के इलाज में नया इतिहास रच दिया है।  बेपिरोविरसेन ब्रांड नाम हिब्सागो को मंजूरी दे दी है। यह दुनिया की पहली एंटीसेंस ओलिगोन्यूक्लियोटाइड थेरेपी है जिसे हेपेटाइटिस बी के लिए मंजूर किया गया है। इसे कंपनी जीएसके ने बनाया है।


अब तक हेपेटाइटिस बी का इलाज आजीवन चलता था। एंटेकाविर और टेनोफोविर जैसी दवाएं वायरस को दबाए रखती हैं, लेकिन खत्म नहीं करतीं। हिब्सागो पहली बार चुनिंदा मरीजों को सस्टेन्ड फंक्शनल क्योर का मौका दे रही है, यानी इलाज पूरी तरह बंद करने के बाद भी वायरस का नियंत्रण में रहना।


कैसे काम करती है दवा

यह दवा हेपेटाइटिस बी वायरल आरएनए को टारगेट करती है। इससे वायरल प्रोटीन, खासकर एचबीएसएजी बनना कम हो जाता है। एचबीएसएजी कम होने पर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता वायरस पर लंबे समय तक नियंत्रण पा लेती है।


किन मरीजों को मिलेगी

1. बिना सिरोसिस वाले वयस्क मरीज 2. जो कम से कम 6 महीने से न्यूक्लियोसाइड एनालॉग थेरेपी पर हों 3. जिनका एचबीवी डीएनए सप्रेस्ड हो 4. जिनका एचबीएसएजी लेवल 3,000 आईयू प्रति एमएल से कम हो 

इलाज का तरीका

इसे अकेले नहीं लेना है। 24 हफ्ते तक हफ्ते में एक बार त्वचा के नीचे इंजेक्शन के रूप में मौजूदा एंटीवायरल के साथ लेना होगा। आखिरी इंजेक्शन के बाद भी कम से कम 24 हफ्ते तक पुरानी दवा जारी रखनी होगी। पहली डोज के बाद मरीज खुद इंजेक्शन लगा सकता है।


फेज थ्री बी-वेल ट्रायल के नतीजे

ट्रायल में 19 प्रतिशत मरीजों में फंक्शनल क्योर मिला, जबकि प्लेसीबो में 0 प्रतिशत था। जिनका एचबीएसएजी 1,000 से कम था, उनमें यह दर 26 प्रतिशत तक रही। फंक्शनल क्योर का मतलब है - इलाज बंद करने के बाद भी एचबीएसएजी निगेटिव रहना और एचबीवी डीएनए का पता न चलना।


सुरक्षा निगरानी

लिवर फंक्शन टेस्ट, प्लेटलेट काउंट, किडनी फंक्शन और एचबीवी डीएनए की नियमित जांच जरूरी है, ताकि लिवर रिएक्शन और थ्रोम्बोसाइटोपेनिया जैसे दुष्प्रभाव पकड़े जा सकें।


लंबे समय की निगरानी

फंक्शनल क्योर का मतलब वायरस का पूरी तरह खत्म होना नहीं है, इसलिए दोबारा संक्रमण और लिवर कैंसर की निगरानी जारी रखनी होगी।


खर्च कितना

कंपनी ने अभी कीमत नहीं बताई है, लेकिन बाजार अनुमान के मुताबिक शुरुआती लिस्ट प्राइस लगभग 13 लाख 20 हजार रुपये से 35 लाख 20 हजार रुपये प्रति कोर्स आंकी गई है। वहीं सालाना खर्च के अनुमान 44 लाख रुपये से 88 लाख रुपये तक लगाए जा रहे हैं।


जबकि भारत में पुरानी दवाएं एंटेकाविर 760 से 1,600 रुपये और टेनोफोविर 1,100 रुपये प्रति बोतल में मिलती हैं, यानी साल का खर्च 10 से 20 हजार रुपये। पुरानी दवा सस्ती पर आजीवन लेनी पड़ती है, नई दवा महंगी पर 24 हफ्ते में 5 में से 1 मरीज को दवा-मुक्त होने का मौका दे सकती है।

बुधवार, 21 अक्टूबर 2026

रोज चाय पीते हैं? तो दिल के लिए है गुड न्यूज - 5 लाख लोगों पर हुई स्टडी में बड़ा खुलासा, पर एक गलती पड़ेगी भारी!

 


रोज चाय पीते हैं? तो दिल के लिए है गुड न्यूज - 5 लाख लोगों पर हुई स्टडी में बड़ा खुलासा, पर एक गलती पड़ेगी भारी!

लखनऊ। चाय के शौकीनों के लिए एक अच्छी खबर है। दुनिया की सबसे बड़ी स्टडी में से एक ने माना है कि रोज चाय पीने की आदत आपके दिल और दिमाग की नसों को सेहतमंद रखती है।


प्रतिष्ठित Journal of Internal Medicine में प्रकाशित इस रिसर्च में चीन के 4,85,934 लोगों को करीब 9 साल तक फॉलो किया गया। इस दौरान 14,863 लोगों में वास्कुलर डिजीज (खून की नसों से जुड़ी बीमारियां) पाई गईं।


स्टडी की 5 बड़ी बातें जो आपको जाननी चाहिए:


1. दिल की बीमारी का खतरा 11% कम: जो लोग आदतन चाय पीते हैं, उनमें चाय न पीने वालों के मुकाबले वास्कुलर डिजीज का खतरा 11.2% कम पाया गया (HR 0.888)।


2. काली चाय, हरी चाय से ज्यादा फायदेमंद: इस स्टडी में हैरान करने वाली बात सामने आई। अक्सर हम हरी चाय को ज्यादा हेल्दी मानते हैं, लेकिन इस रिसर्च में काली चाय (Black Tea) का दिल की सेहत से ज्यादा लगातार सकारात्मक संबंध मिला।


3. ज्यादा कड़क नहीं, मध्यम चाय पिएं: बहुत ज्यादा तेज पत्ती वाली कड़क चाय की जगह, मध्यम ताकत की चाय ज्यादा फायदेमंद पाई गई।


4. उबलती-फूंकती गर्म चाय है खतरनाक: अगर आप एकदम 'बर्निंग हॉट' यानी मुंह जलाने वाली गर्म चाय पीते हैं, तो सावधान हो जाइए। ऐसी चाय पीने वालों में दिल की बीमारियों का खतरा 16% ज्यादा (HR 1.160) पाया गया। चाय को थोड़ा ठंडा करके पीना बेहतर है।


5. कितनी चाय है आदर्श? स्टडी के मुताबिक हफ्ते में रोज चाय पीने वालों के लिए 6 से 8 कप प्रतिदिन पर सबसे कम जोखिम देखा गया। इसका मतलब यह नहीं कि एक दिन में 8 कप पीना शुरू कर दें, बल्कि नियमित, संतुलित मात्रा में चाय फायदेमंद है।


तिहरा फॉर्मूला - सबसे ज्यादा सुरक्षा:

रिसर्च ने एक तिहरा कॉम्बिनेशन सबसे कारगर बताया है - रोज चाय + धूम्रपान न करना + ज्यादा शारीरिक गतिविधि (Physical Activity)। जो लोग इन तीनों का पालन करते हैं, उनमें दिल की बीमारी का खतरा सबसे कम, लगभग 45% तक कम (HR 0.548) पाया गया।


शोधकर्ताओं का कहना है कि चाय में मौजूद तत्व रक्त वाहिकाओं को स्वस्थ रखते हैं, लेकिन चाय पीने का तरीका, उसकी गर्मी और आपकी पूरी लाइफस्टाइल मिलकर ही असली फायदा पहुंचाते हैं।



पीजीआइ में बुजुर्गों की जल्दी जुड़ेगी हड्डी, मिलेगा मुफ्त खास इंजेक्शन





विश्व ऑस्टियोपोरोसिस डे 


पीजीआइ में बुजुर्गों की जल्दी जुड़ेगी हड्डी, मिलेगा मुफ्त खास इंजेक्शन 


कुमार संजय । लखनऊ 



विश्व ऑस्टियोपोरोसिस दिवस पर बुजुर्गों के लिए अच्छी खबर है। एसजीपीजीआइ के ऑर्थोपेडिक्स विभाग में कूल्हे के पास की टूटी हड्डी (इंटरट्रोकैन्टेरिक फ्रैक्चर) को जल्दी जोड़ने के लिए शोध शुरू किया गया है। इसमें खास रसायन टेरिपैराटाइड इंजेक्शन मरीजों को निःशुल्क दिया जा रहा है। अपेक्स ट्रॉमा केंद्र के ऑर्थोपेडिक सर्जन प्रो. कुमार केशव ने बताया कि पहले 6 अध्ययनों (4 रैंडमाइज्ड ट्रायल और 2 अन्य) के 393 मरीजों के डेटा का विश्लेषण किया गया। इसमें टेरिपैराटाइड लेने वाले 175 मरीजों में हड्डी जुड़ने का समय सामान्य इलाज वाले 218 मरीजों से कम रहा। वेरस कोलैप्स जैसी जटिलताएं भी कम मिलीं। यह रिव्यू वर्ल्ड जर्नल ऑफ ऑर्थोपेडिक्स में प्रकाशित हुआ है। इसमें एनेस्थीसिया से डा. कुमार कौस्तुभ और सांख्यिकी से प्रो. प्रभाकर मिश्रा शामिल रहे हैं।


 अब पीजीआई में शुरू हुआ नया इलाज



 इसी परिणाम के आधार पर प्रो. केशव प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर के रूप में दवा का उपयोग कर रहे हैं। यह अध्ययन 9.95 लाख के इंट्राम्यूरल फंड से हो रहा है। इसमें 35 मरीजों को टेरिपैराटाइड इंजेक्शन मुफ्त दिया जाएगा। तीन माह के इलाज का खर्च करीब 12,000 रुपये है।


 कैसे काम करती है दवा


 ऑस्टियोपोरोसिस में हड्डी खोखली हो जाती है, इसलिए फ्रैक्चर देर से जुड़ता है। टेरिपैराटाइड नई हड्डी बनाने की प्रक्रिया तेज करती है। क्या है इंटरट्रोकैन्टेरिक फ्रैक्चर यह कूल्हे के जोड़ के नीचे जांघ की हड्डी के ऊपरी हिस्से का फ्रैक्चर है, जो बुजुर्गों में सबसे आम है। इसमें ऑपरेशन कर इम्प्लांट से हड्डी जोड़ी जाती है, पर कमजोर हड्डी से देर लगती है और इम्प्लांट झुकने (वेरस कोलैप्स) की दिक्कत हो सकती है।


 बॉक्स फ्रैक्चर का बड़ा कारण है 


50 साल से अधिक उम्र की हर तीसरी महिला और हर पांचवें पुरुष में फ्रैक्चर का कारण ऑस्टियोपोरोसिस है। 50 से अधिक उम्र की 20 फीसदी महिलाओं और 10 से 15 फीसदी पुरुषों में यह बीमारी है, आम आबादी में दर 18.3 फीसदी है।


 बॉक्स क्या होता है ऑस्टियोपोरोसिस


 इसमें हड्डियों का घनत्व कम होकर वे खोखली हो जाती हैं। मामूली चोट पर फ्रैक्चर का खतरा बढ़ता है। 50 से अधिक उम्र, मेनोपॉज के बाद महिलाओं और कैल्शियम-विटामिन डी की कमी वालों में खतरा ज्यादा है। शुरुआत में लक्षण नहीं दिखते, बाद में कमर-कूल्हे में दर्द और शरीर झुकना संकेत हैं। बचाव के लिए दूध-दही, धूप, व्यायाम और बीएमडी जांच जरूरी है।

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

मेनोपॉज धीमी प्रक्रिया नहीं, अचानक आने वाला बड़ा शारीरिक बदलाव :

 


रजोनिवृत्ति धीमी प्रक्रिया नहीं, अचानक आने वाला बड़ा शारीरिक बदलाव : 

 महिलाओं में रजोनिवृत्ति यानी मेनोपॉज को लेकर अब तक माना जाता था कि यह धीरे-धीरे होने वाला बदलाव है, लेकिन  वैज्ञानिकों के नए अध्ययन ने इस धारणा को बदल दिया है। शोध में सामने आया है कि शरीर में बदलाव ढलान की तरह नहीं, बल्कि खाई की तरह एक साथ आता है। यह शोध प्रतिष्ठित जर्नल नेचर मेडिसिन में प्रकाशित हुआ है।

 शोधकर्ताओं ने पाया कि 90 में से 52 स्वास्थ्य मानकों में अंतिम माहवारी के आसपास एक साथ बड़ा उछाल देखा गया। खास बात यह है कि समान उम्र के पुरुषों में ऐसा कोई बदलाव नहीं मिला।

कौन से टेस्ट बढ़े और कौन से घटे

अध्ययन के अनुसार शरीर के लगभग सभी तंत्रों में यह उछाल देखा गया।


जो टेस्ट बढ़े -

• कोलेस्ट्रॉल और रक्त वसा से जुड़े टेस्ट : एलडीएल कोलेस्ट्रॉल (खराब कोलेस्ट्रॉल) और एपोबी। ये दोनों हृदय रोग के प्रमुख कारक हैं। • लिवर से जुड़े टेस्ट : एएलपी, एएलटी, जीजीटी और बिलीरुबिन का स्तर बढ़ा। • किडनी से जुड़े टेस्ट : सिस्टेटिन सी और होमोसिस्टीन का स्तर बढ़ा। • हार्मोन से जुड़ा टेस्ट : एफएसएच (फॉलिकल स्टिम्युलेटिंग हार्मोन) में सबसे बड़ा उछाल। • हड्डी टूटने का मार्कर : बोन एएलपी और फेरिटिन। 

जो टेस्ट घटे -

• हड्डियों की मजबूती : रीढ़ की हड्डी का बोन मिनरल डेंसिटी (बीएमडी) और कैल्शियम, एल्बुमिन का स्तर घटा। शोध में बीएमडी में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। • महिला हार्मोन : एस्ट्राडियोल (ई2) और एएमएच हार्मोन का स्तर तेजी से घटा। यह गिरावट अंतिम माहवारी से करीब 12 से 15 साल पहले से ही शुरू हो जाती है। • सोडियम और ऑस्मोलैलिटी का स्तर भी घटा। 

जो टेस्ट सुधरे -

• आयरन, हीमोग्लोबिन और आरबीसी काउंट में सुधार देखा गया, क्योंकि माहवारी बंद होने से खून की कमी कम होती है।  हार्मोन थेरेपी से असर कम

शोध में यह भी पाया गया कि जो महिलाएं हार्मोन थेरेपी ले रही थीं, उनमें यह बदलाव काफी कम रहा। 80 में से 39 मानकों पर थेरेपी लेने वाली महिलाओं में अंतर साफ दिखा, खासकर हड्डी, लिवर और किडनी से जुड़े टेस्ट में।

विशेषज्ञों की सलाह

शोधकर्ताओं का कहना है कि 40 से 50 वर्ष की उम्र में जब माहवारी अनियमित होने लगे, उसी समय कोलेस्ट्रॉल और हड्डियों की जांच करा लेनी चाहिए। इससे हृदय रोग और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी बीमारियों को समय रहते रोका जा सकता है। हार्मोन थेरेपी पर कोई भी फैसला डॉक्टर की सलाह से ही लेना चाहिए।

मेनोपॉज से पहले रात में पसीना, घबराहट दिल के फेल होने का सिग्नल

 






वर्ल्ड मेनोपॉज डे




मेनोपॉज से पहले रात में पसीना, घबराहट दिल के फेल होने का सिग्नल


कुमार संजय | लखनऊ


40 से 50 साल की उम्र में रात में अचानक पसीना आना, नींद टूटना या दिन में शरीर में आग सी लगना सिर्फ गर्मी या थकान नहीं है। यह दिल की गड़बड़ी का पहला संकेत हो सकता है।

 शोधकर्ताओं ने 40 से 50 साल की 200 महिलाओं पर स्टडी की। ये सभी प्री-मेनोपॉज स्टेज में थीं, इन्हें कोई पुरानी बीमारी नहीं थी। सभी का 5 मिनट ईसीजी कर दिल की धड़कनों की लय और उसके उतार-चढ़ाव की जांच की गई।


स्टडी में सामने आया कि जिन महिलाओं को रात में पसीना आता था, उनके दिल का 'ब्रेक सिस्टम' कमजोर था। वहीं जिनको दिन में अचानक गर्मी लगने (हॉट फ्लैश) की शिकायत थी, उनका दिल हर समय तेज रफ्तार मोड पर था। डॉक्टरों के मुताबिक दोनों लक्षणों का सीधा कनेक्शन दिल के नर्वस सिस्टम से है।


एक्सपर्ट्स का कहना है कि दिल की धड़कनों के बीच जो गैप होता है, उसे एचआरवी कहते हैं। हार्ट अटैक से कई साल पहले ही यह गैप घटना शुरू हो जाता है। सामान्य तौर पर दिल का ब्रेक 300 से 1000 के बीच होना चाहिए, इससे नीचे होने पर थकान, तेज धड़कन और बीपी की समस्या बढ़ती है। एलएफ/एचएफ रेश्यो का 2.5 से ऊपर जाना खतरे की घंटी है, इससे लंबे समय में हार्ट अटैक का खतरा 2 से 3 गुना बढ़ जाता है।


18 अक्टूबर को वर्ल्ड मेनोपॉज डे पर यह शोध चेतावनी देता है कि इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें। 45 साल के बाद साल में एक बार ईसीजी जरूर कराएं।


बचाव क्या करें: रोज 15 मिनट अनुलोम-विलोम, भ्रामरी करें। नमक कम खाएं। दूध, दही, रागी, सोया और कैल्शियम वाली चीजें रोज लें। 30 मिनट टहलना जरूरी है।


बॉक्स: किसने किया शोध

यह शोध जर्नल ऑफ मिडलाइफ हेल्थ ने स्वीकार किया है। आरएमएल संस्थान के  फिजियोलॉजी विभाग से डा. विभा गंगवार, डा. मनीष वर्मा, डा. सुनीता तिवारी, गायनी से डा. नीतू सिंह, बायोकेमिस्ट्री से डा. मनीष राज कुलश्रेष्ठ और कम्युनिटी मेडिसिन से डा. अरविंद कुमार सिंह शामिल रहे।


बॉक्स: 5 साल पहले आ रहा मेनोपॉज

पोषण की कमी से अब मेनोपॉज 5 साल पहले आ रहा है। वर्ल्ड में औसत उम्र 51 साल है, जबकि भारत में यह घटकर 46.2 साल रह गई है। एसजीपीजीआई की प्रो. इंदु लता ने बताया कि 57% महिलाओं में खून की कमी, आयरन-कैल्शियम-विटामिन डी की कमी से ओवरीज जल्दी थक रही हैं।

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

विटामिन- डी और कैल्शियम की कमी बनी कमर दर्द की बड़ी

 








विटामिन- डी और कैल्शियम की कमी बनी कमर दर्द की बड़ी वजह


  60 फीसदी वर्टिब्रल कंप्रेशन फ्रैक्चर का कारण विटामिन डी और कैल्शियम की कमी


 



 कमर दर्द के पीछे सिर्फ गलत पोश्चर ही नहीं, विटामिन- डी और कैल्शियम की भारी कमी भी बड़ी वजह बन रही है।


वर्ल्ड स्पाइन अवेयरनेस डे (16 अक्टूबर) पर संजय गांधी पीजीआइ के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. अमित कुमार ने बताया कि हमारी ओपीडी में आने वाले क्रॉनिक लो बैक पेन के 69.3 फीसदी मरीजों में विटामिन-D की भारी कमी और बाकी में अपर्याप्त स्तर मिला। विटामिन- डी कैल्शियम को हड्डी तक पहुंचाता है। कमी से वर्टिब्रा की बोन मिनरल डेंसिटी घटती है, पैरास्पाइनल मसल्स कमजोर होती हैं, जिससे मामूली झटके में भी दर्द-फ्रैक्चर होता है।


ऑर्थोपेडिक सर्जन प्रो. पुलक शर्मा के अनुसार देखा कि सामान्य आबादी में 80 से 90 फीसदी में  कमी है । लखनऊ समेत उत्तर भारत में हर 10 में से 7-8 लोग शिकार हैं। धूप में निकलना बंद और डाइट में कैल्शियम कम होने से ऑस्टियोपोरोसिस बढ़ रहा है। 40 के बाद महिलाओं में 60 फीसदी वर्टिब्रल कंप्रेशन फ्रैक्चर इसी कारण होते हैं।





बॉक्स


95 फीसदी में नहीं पड़ती है ऑपरेशन की जरूरत


संजय गांधी पीजीआई के न्यूरो सर्जरी विभाग के  प्रो. आशुतोष कुमार के मुताबिक

रीढ़ का स्वास्थ्य सक्रिय, आत्मनिर्भर जीवन का आधार है। 95 फीसदी से अधिक कमर दर्द मरीजों को ऑपरेशन की जरूरत नहीं, दवा, व्यायाम और जीवनशैली सुधार से राहत मिल जाती है। दर्द के साथ पैरों में कमजोरी, सुन्नपन या चलने में दिक्कत हो तो तुरंत न्यूरो सर्जन  से मिलें। चुनिंदा मरीजों के लिए मिनिमली इनवेसिव-एंडोस्कोपिक सर्जरी वरदान है - छोटा चीरा, कम रक्तस्राव, कम दर्द और शीघ्र रिकवरी। संस्थान में इन तकनीकों से अधिक उम्र के मरीजों का भी उनकी समग्र स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार उपचार हो रहा है




बॉक्स


 बचाव के उपाय

हर 45 मिनट पर ब्रेक-स्ट्रेच, स्क्रीन आंखों के लेवल पर रखें, लंबर सपोर्ट लगाएं, रोज सुबह 8-10 बजे 20 मिनट धूप, दूध-दही-अंडा-मशरूम, 1000 मिली ग्राम कैल्शियम और 30 नैनो ग्राम प्रति एम एक  से ऊपर विटामिन- डी बनाए रखें, वजन घुटने मोड़कर उठाएं, झुककर नहीं।


बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

हाथ धोना बचा सकता है 50 फीसदी बीमारी

 



: हाथ धोना बचा सकता है 50 फीसदी बीमारी


 लापरवाही पड़ सकती है


 भारी ग्लोबल हैंडवाशिंग डे आज, थीम - बी ए हैंडवाशिंग हीरो




 हर साल 15 अक्टूबर को ग्लोबल हैंडवाशिंग डे मनाया जाता है। इस साल की थीम " - बनें हैंडवाशिंग हीरो" है। संजय गांधी पीजीआई के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के प्रो. चिन्मय साहू के मुताबिक एक ग्राम मल में 10 करोड़ वायरस और 10000 करोड़ बैक्टीरिया होते हैं और हाथों के जरिए ही ये मुंह तक पहुंचते हैं। "कोविड के बाद लोगों में हाथ धोने की आदत फिर कम हो गई है। हमारे पास डायरिया और टायफाइड के जो केस आ रहे हैं, उनमें 20 फीसदी मरीज ऐसे हैं जो शौच के बाद और 60 फीसदी खाने से पहले साबुन से हाथ नहीं धोते। सिर्फ सही तरीके से हाथ धोने से डायरिया और सांस की 50 फीसदी बीमारियों को रोका जा सकता है।" प्रो. साहू ने कहा कि बच्चों में डायरिया और निमोनिया से होने वाली 30 प्रतिशत मौतें सिर्फ हैंड हाइजीन से रोकी जा सकती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनियाभर में 40 प्रतिशत आबादी के पास घर में साबुन से हाथ धोने की सुविधा नहीं है, भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा 35 प्रतिशत से ज्यादा है। उन्होंने बताया कि केवल पानी से हाथ धोने से कीटाणु नहीं मरते। खाना बनाने और खाने से पहले, शौच के बाद, बच्चों का मल साफ करने के बाद, खांसने-छींकने और मरीज को छूने के बाद साबुन से कम से कम 20 सेकंड तक हाथ धोना जरूरी है।


 बॉक्स: हाथ धोने का सही तरीका 1. हाथों को पानी से गीला कर साबुन लगाएं। 2. हथेलियों, उंगलियों के बीच, नाखूनों और अंगूठे को कम से कम 20 सेकंड तक रगड़ें। 3. साफ पानी से धोकर तौलिये से सुखाएं। 4. हैंड सैनिटाइजर साबुन का विकल्प नहीं है।


 बॉक्स इन बीमारियों की आशंका होगी कम



 दस्त से बीमार होने वाले लोगों की संख्या में लगभग 23% से 40% तक । पेट की बीमारियों के कारण बच्चों के स्कूल से अनुपस्थित रहने वाले दिनों की संख्या में 29% से 57% तक। कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोगों में दस्त की बीमारी को लगभग 58% तक। सर्दी-जुकाम जैसी श्वसन संबंधी बीमारियों को लगभग 16% से 21% तक ।

किशोरियों में सर्वाइकल कैंसर से बचाव को लेकर जागरूकता पहल, क्रिएटिव कॉन्वेंट स्कूल में एचपीवी वैक्सीन पर कार्यक्रम

 

किशोरियों में सर्वाइकल कैंसर से बचाव को लेकर जागरूकता पहल, क्रिएटिव कॉन्वेंट स्कूल में एचपीवी वैक्सीन पर कार्यक्रम


लखनऊ। सरोजनी नगर के शांति नगर स्थित क्रिएटिव कॉन्वेंट स्कूल में किशोरियों को सर्वाइकल कैंसर से बचाव के लिए एचपीवी वैक्सीन के प्रति जागरूक किया गया।


सरदार पटेल कॉलेज ऑफ नर्सिंग, रायबरेली रोड, लखनऊ के बीएससी नर्सिंग चतुर्थ वर्ष के रिसर्च ग्रुप-4 द्वारा यह जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में कक्षा 7 और 8 के छात्र-छात्राओं को एचपीवी (ह्यूमन पैपिलोमा वायरस) संक्रमण, उसके दुष्प्रभाव और सर्वाइकल कैंसर से उसके संबंध के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।


नर्सिंग विद्यार्थियों ने सरल भाषा में समझाया कि एचपीवी संक्रमण की रोकथाम में टीकाकरण की महत्वपूर्ण भूमिका है। समय पर एचपीवी वैक्सीन लगवाने से भविष्य में सर्वाइकल कैंसर के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।


कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किशोरियों में वैक्सीन को लेकर सही जानकारी पहुंचाना, टीकाकरण से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करना और उन्हें अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाना था। इस दौरान छात्राओं ने खुलकर अपने सवाल भी पूछे।


यह कार्यक्रम रिसर्च गाइड सिमरन खोखर के मार्गदर्शन में आयोजित हुआ। रिसर्च ग्रुप-4 के सदस्यों सुभांशु राज, अंशिका पांडेय, आशुतोष मौर्य, साक्षी सिंह और विवेक यादव ने सक्रिय रूप से भागीदारी निभाई।


विद्यालय के प्रधानाचार्य योगेंद्र सचान ने नर्सिंग विद्यार्थियों को इस आयोजन के लिए विद्यालय का मंच प्रदान किया और कहा कि इस तरह के कार्यक्रम विद्यार्थियों में स्वास्थ्य के प्रति वैज्ञानिक सोच विकसित करते हैं।


रिसर्च ग्रुप ने विद्यालय प्रशासन का आभार जताते हुए कहा कि किशोरावस्था में दी गई सही स्वास्थ्य शिक्षा ही स्वस्थ भविष्य की नींव बनती है।

बधिर बच्चों को अक्षर सिखाएंगे 3डी एनिमेटेड वीडियो







 बधिर बच्चों को अक्षर सिखाएंगे 3डी एनिमेटेड वीडियो


मस्तिष्क शोध पर आधारित, हिंदी के 49 और अंग्रेजी के 26 अक्षरों की श्रृंखला तैयार


लखनऊ



बधिर बच्चों को अक्षर पहचानना और लिखना सिखाने के लिए सीबीएमआर की डा. उत्तम कुमार ने 3डी एनिमेटेड वीडियो श्रृंखला तैयार की है। यह 3 से 8 वर्ष के बच्चों के लिए है और लैब के 2018 से 2024 के सात मस्तिष्क अध्ययनों पर आधारित है। इसमें अंग्रेजी के 26 और हिंदी के 13 स्वर व 36 व्यंजन सहित 49 अक्षर हैं। शिक्षकों-अभिभावकों के लिए दो मिनट का निर्देश वीडियो भी हिंदी-अंग्रेजी में बनाया गया है।


देखकर सीखेंगे, लिखने का करेंगे अभ्यास


डा. उत्तम कुमार के अनुसार वीडियो में अक्षर को वस्तु और शब्द से जोड़कर सिखाया गया है। बच्चा वस्तु देखता है, फिर अक्षर बनने का क्रम देखकर हवा में या कागज पर अभ्यास करता है। पूरी प्रक्रिया दृश्य आधारित है, सुनने पर निर्भरता नहीं है। हर अक्षर तय क्रम में दिखता है, जिससे ध्यान बना रहता है।


कक्षा और घर दोनों जगह इस्तेमाल


शिक्षक बड़े पर्दे पर वीडियो रोक-रोककर अभ्यास करा सकते हैं। अभिभावक मोबाइल या टीवी से घर पर अभ्यास करा सकेंगे। इसके लिए विशेष प्रशिक्षण या महंगे उपकरण की जरूरत नहीं है।


विशेष विद्यालयों को मिलेगी सामग्री


यह श्रृंखला विशेष, समावेशी विद्यालयों, पुनर्वास केंद्रों और कॉक्लियर इम्प्लांट के बाद भाषा सीख रहे बच्चों के लिए उपयोगी होगी। इसमें डीएसएमएनआरयू के डा. मृत्युंजय मिश्रा और एसजीपीजीआईएमएस के हेड एंड नेक विभाग के प्रमुख प्रो. अमित केशरी का सहयोग रहा। श्रृंखला लैब की वेबसाइट पर निःशुल्क उपलब्ध होगी।

रविवार, 11 अक्टूबर 2026

दुर्गा पूजा पंडाल पहुंचे एसीपी और पीजीआई इंस्पेक्टर, समिति ने किया सम्मानित

 


दुर्गा पूजा पंडाल पहुंचे एसीपी और पीजीआई इंस्पेक्टर, समिति ने किया सम्मानित


20 अक्टूबर तक चलेगा महोत्सव, रोजाना आरती और भजन संध्या में जुट रहे श्रद्धालु


लखनऊ। रायबरेली रोड स्थित उतरेठिया की श्री कृष्ण विहार कॉलोनी में दुर्गा पूजा महोत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है। रविवार को पंडाल का निरीक्षण करने पहुंचे एसीपी गोसाईंगंज ऋषभ यादव और पीजीआई इंस्पेक्टर सुनील सिंह का कॉलोनीवासियों ने स्वागत किया। समिति के अध्यक्ष आलोक सिंह और वरिष्ठ नागरिकों ने दोनों अधिकारियों को माता रानी का पटका और गमछा पहनाकर सम्मानित किया। उन्हें स्मृति चिह्न के रूप में तस्वीर भेंट करने के साथ प्रसाद भी दिया गया।


समिति के अध्यक्ष आलोक सिंह ने बताया कि 11 से 20 अक्टूबर तक आयोजित महोत्सव में प्रतिदिन सुबह और शाम आरती होती है। रात में भजन संध्या का आयोजन किया जाता है, जिसमें श्रद्धालु भक्ति भाव से शामिल होते हैं। उन्होंने बताया कि आयोजन के जरिए कॉलोनी में धार्मिक आस्था और आपसी मेलजोल को बढ़ावा दिया जा रहा है। अधिकारियों के आगमन पर समिति के सदस्यों ने आभार जताया।

शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

पीजीआइ स्थापित होगा पेरिऑपरेटिव मेडिसिन मॉडल

 

पीजीआइ :एनेस्थिसियोलॉजी विभाग का 39वां स्थापना


-  स्थापित होगा पेरिऑपरेटिव मेडिसिन मॉडल 

- ऑपरेशन से पहले और बाद तक एक ही टीम करेगी मरीज की देखभाल 

- शुरू होगा पीडियाट्रिक, पेन और ट्रांसप्लांट एनेस्थीसिया डीएम पाठ्यक्रम

-  विभाग में बढ़ेंगे 18 फैकल्टी, 42 से होंगे 60 


संजय गांधी पीजीआइ में अब एनेस्थीसिया टीम सिर्फ ऑपरेशन थिएटर में बेहोश करने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि ऑपरेशन से पहले से लेकर बाद तक मरीज की पूरी देखभाल करेगी। पेरिऑपरेटिव मेडिसिन के इस नए मॉडल से इलाज की गुणवत्ता बढ़ेगी। जटिलताएं कम होंगी । मरीजों की तेजी से रिकवरी होगी। शनिवार को एनेस्थिसियोलॉजी विभाग के 39वें स्थापना दिवस समारोह के मौके पर विभाग के प्रमुख प्रो. संजय धीराज और प्रो. सुजीत गौतम ने बताया कि अक्सर एक ही मरीज में कई बीमारियां होती हैं, जिसके लिए उसे कई विभागों में भेजना पड़ता है, इसमें समय लगता है और मरीज की स्थिति खराब हो जाती है। नए माडल में मरीज की परेशानी कम कर उसे जल्द से जल्द सर्जरी लायक बनाया जाएगा। ऑपरेशन से पहले जोखिम का आकलन और मरीज को ऑप्टिमाइज करना, प्री-ऑपरेटिव मैनेजमेंट, ऑपरेशन के दौरान एनेस्थीसिया और बाद में दर्द प्रबंधन व आईसीयू केयर एक ही टीम करेगी। अस्पताल में रहने का समय घटेगा और रिकवरी तेज होगी। इसके लिए क्वाटरनेरी केयर में 120 बेड की व्यवस्था भी की जा रही है। प्रो. संदीप खुबा ने बताया कि विभाग में कार्डियक और न्यूरो एनेस्थीसिया में डीएम कोर्स पहले से चल रहे हैं और अब जल्द ही पीडियाट्रिक, पेन और ट्रांसप्लांट एनेस्थीसिया में तीन नए डीएम कोर्स शुरू किए जाएंगे। एमडी छात्रों के लिए सिमुलेटर आधारित ट्रेनिंग भी बढ़ाई जा रही है। इस मौके पर संस्थान के निदेशक प्रो. आर.के. धीमान ने विभाग की उपलब्धियों की सराहना की और शिक्षकों व छात्रों से जिम्मेदारी के साथ कर्तव्य निर्वहन का आह्वान किया। उन्होंने बताया कि एनेस्थीसिया विभाग में संकाय सदस्यों की संख्या जल्द ही 42 से बढ़ाकर 60 की जाएगी यानी 18 नए फैकल्टी जुड़ेंगे। इससे सर्जरी की संख्या बढ़ेगी, ऑपरेशन की वेटिंग कम होगी और आईसीयू केयर बेहतर होगा। समारोह में बोधिसत्व यूनिवर्सिटी के प्रो-वाइस चांसलर व एम्स पटना के पूर्व निदेशक प्रो. पी.के. सिंह मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक एनेस्थीसिया विभाग के प्रो देवेंद्र गुप्ता ने बताया कि स्ट्रेस मैनेजमेंट और एनहांस्ड रिकवरी आफ्टर सर्जरी पर सीएमई तथा कैंसर में दर्द प्रबंधन पर साइंटिफिक सेशन का आयोजन हुआ। टेक्नोलॉजिस्ट राजीव सक्सेना, धीरज सिंह एनेस्थीसिया में टेक्नोलॉजिस्ट की भूमिका पर जानकारी दी। विभाग की प्रथम एचओडी स्व. प्रो. सोमा कौशिक की स्मृति में ओरेशन का भी आयोजन किया गया।



यह हुए सम्मानित


बेस्ट फैकल्टी: डॉ. तापस कुमार सिंह; बेस्ट जूनियर रेजिडेंट III: डॉ. मीनाक्षी के, डॉ . प्रशंसा अत्री, डॉ. राहुल कुमार मिश्रा; बेस्ट ऑफिस स्टाफ: पवन कुमार दुबे; बेस्ट नर्सिंग ऑफिसर: सचिन पी जोसेफ; बेस्ट नर्सिंग ऑफिसर (आउटसोर्स): अमित तिवारी; बेस्ट टेक्निकल ऑफिसर: चंद्रेश कुमार कश्यप; बेस्ट टेक्निकल ऑफिसर (आउटसोर्स): रुचि सिंह; बेस्ट सीनियर रेजिडेंट्स: डॉ. जैस्मीन कौर, डॉ. अर्पिता यादव, डॉ. श्रद्धा गांगले, डॉ. आयुषी श्रीवास्तव और डॉ. दीक्षा रानी।



गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

पीजीआइ भारत में पहली बार इतने कम उम्र और कम वजन के बच्चों में रोबोटिक लिवर कैंसर सर्जरी




पीजीआइ भारत में पहली बार इतने कम उम्र और कम वजन के बच्चों में रोबोटिक लिवर कैंसर सर्जरी


  संजय गांधी पीजीआइ के पीडियाट्रिक सर्जिकल सुपर स्पेशलिटीज़ विभाग ने पीडियाट्रिक रोबोटिक सर्जरी में इतिहास रच दिया है। विभाग ने 6 किलो से कम वजन वाले दो शिशुओं में रोबोटिक लिवर रिसेक्शन सफलतापूर्वक किया है, जो भारत में शिशुओं पर की गई पहली रोबोटिक लिवर सर्जरी है। पहला बच्चा रायबरेली का रहने वाला 7 माह का बच्चा है, वजन लगभग 5 किलो। उसके लिवर के बाएं हिस्से में हेपेटोब्लास्टोमा था। 5 सितंबर 2026 को कीमोथेरेपी के बाद उसकी रोबोटिक लेफ्ट लेटरल सेक्शनेक्टॉमी की गई। दूसरा मामला मथुरा की 7 माह की बच्ची का है, वजन लगभग 6 किलो। उसे भी लेफ्ट लोब में ट्यूमर था, 3 अक्टूबर 2026 को उसकी रोबोटिक लेफ्ट हेपेटेक्टॉमी की गई। विभागाध्यक्ष प्रो. बसंत कुमार, प्रो. विजय उपाध्याय और प्रो. अंकुर मंडेलिया ने प्रेस वार्ता में बताया कि अधिक उम्र और वजन के बच्चों में ऐसी सर्जरी रिपोर्टेड है, लेकिन इतनी कम उम्र और वजन में यह पहला मामला है। विशेषज्ञों ने बताया कि शिशुओं में लिवर रिसेक्शन सबसे मुश्किल प्रक्रिया है। पेट में जगह कम, नाजुक बनावट, पतली रक्त वाहिकाएं और पित्त नलिकाएं बड़ी चुनौती हैं। इस उम्र में कुल रक्त लगभग 500 मिली होता है, ऐसे में रक्तस्राव जानलेवा हो सकता है। रोबोटिक तकनीक से रक्तस्राव की आशंका काफी कम रही और दोनों बच्चों में खून चढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ी। प्रो. विजय उपाध्याय ने बताया कि बच्चों में लिवर कैंसर 10 लाख में से एक में होता है। सही सर्जरी और इलाज से दोबारा होने की आशंका बहुत कम रहती है। दोनों बच्चों को पहले कीमोथेरेपी देकर ट्यूमर लोकलाइज्ड किया गया, फिर सर्जरी की गई। अब 6 साइकिल कीमोथेरेपी पूरी की जाएगी। दोनों की रिकवरी संतोषजनक है। सर्जरी टीम: पीडियाट्रिक सर्जरी से डा. अंजू, डा. तरुण, डा. रोहित, एनेस्थीसिया से डा. अरमानजीत सिंह, डा. कोमल पासवान, डा. अंशिता और नर्सिंग ऑफिसर रीता आर्य, प्रियंका शर्मा, मनु के, शबनम आरा, जितिन, श्रवण, मनोज कुमार और शामिल रहे। निदेशक प्रोफेसर आरके धीमान ने टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग की बड़ी सफलता है। 


बॉक्स 


बच्चों के पेट में महसूस हो गांठ तो तुरंत ले सलाह बच्चों में लिवर कैंसर में पेट के दाएं हिस्से में कड़ी गांठ, पेट फूलना, वजन न बढ़ना, भूख कम लगना, उल्टी, पीलिया और थकान दिखती है। पेट में कोई भी असामान्य सूजन या गांठ दिखे तो तुरंत बाल रोग विशेषज्ञ को दिखाएं।

शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

हर मरीज के बचेंगे तीन हजार रुपये - हेपेटाइटिस सी के इलाज में संजय गांधी पीजीआई की बड़ी खोज

 

हर मरीज के बचेंगे तीन हजार रुपये - हेपेटाइटिस सी के इलाज में संजय गांधी पीजीआई की बड़ी खोज


लखनऊ। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान ने चार अन्य बड़े संस्थानों के साथ मिलकर हेपेटाइटिस सी के इलाज पर एक ऐतिहासिक स्टडी की है, जिसके नतीजों ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। इस स्टडी के नतीजे दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल पत्रिका द लैंसेट में प्रकाशित हुए हैं।

द लैंसेट में प्रकाशित हुई भारत की स्टडी

द लैंसेट का प्रभावांक एक सौ नौ है और यह दुनिया की शीर्ष तीन विज्ञान पत्रिकाओं में गिनी जाती है। इसमें भारत की किसी सार्वजनिक अस्पताल से जुड़ी स्टडी का छपना अपने आप में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। इस शोध ने हेपेटाइटिस सी के इलाज के पुराने नियम को ही बदल दिया है।

क्या है रिज़ॉल्व ट्रायल

इस ट्रायल का नाम रिज़ॉल्व रखा गया है। इसका पूरा नाम है - उपचार-भोले, बिना सिरोसिस वाले, लंबे समय से हेपेटाइटिस सी से पीड़ित मरीजों में सोफोसबुवीर-वेलपटासवीर दवा के आठ हफ्ते बनाम बारह हफ्ते के इलाज की तुलना वाला बहु-केंद्रीय, ओपन-लेबल, गैर-हीनता वाला क्रमरहित नियंत्रित परीक्षण।


अभी तक दुनिया भर में इस बीमारी के इलाज के लिए सोफोसबुवीर-वेलपटासवीर दवा बारह हफ्ते तक दी जाती है। यह दवा काफी महंगी है, जिससे गरीब मरीजों पर आर्थिक बोझ बढ़ता है।

पाँच बड़े अस्पतालों में हुई जाँच

यह शोध देश के पाँच बड़े सरकारी अस्पतालों में किया गया। इसमें कुल आठ सौ अस्सी मरीजों को शामिल किया गया था। संजय गांधी पीजीआई लखनऊ के अलावा इसमें किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय लखनऊ, काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान नई दिल्ली और गोविंद बल्लभ पंत अस्पताल नई दिल्ली के हेपेटोलॉजी और गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग शामिल थे।


नतीजों में पाया गया कि आठ हफ्ते इलाज लेने वाले अट्ठानवे दशमलव आठ प्रतिशत मरीज पूरी तरह ठीक हो गए, जबकि बारह हफ्ते इलाज लेने वालों में यह आंकड़ा निन्यानवे प्रतिशत था। यानी दोनों का असर लगभग बराबर है। यह नतीजा पूरी दुनिया के लिए लागू हो सकता है।

देश को होगा अरबों रुपये का फायदा

दुनिया में पाँच करोड़ से ज्यादा और हमारे देश में करीब साठ लाख लोगों को हेपेटाइटिस सी के इलाज की जरूरत है। इलाज की अवधि चार हफ्ते कम होने से हर मरीज के करीब तीन हजार रुपये बचेंगे। इस हिसाब से देश के कई अरब रुपये की सीधी बचत होगी और ज्यादा से ज्यादा मरीजों का इलाज संभव हो सकेगा।

इन वैज्ञानिकों ने किया शोध

यह शोध भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के सहयोग से हुआ, जिसने एक करोड़ पैंसठ लाख रुपये की आर्थिक मदद दी थी। इसका नेतृत्व परिषद मुख्यालय में कार्यरत प्रोफेसर राकेश अग्रवाल और संजय गांधी पीजीआई के निदेशक डॉ आर के धीमान ने किया। काम का मुख्य समन्वय पीजीआई के डॉ अमित गोयल और किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के डॉ सुमित रुंगटा ने किया, जबकि आंकड़ों का गहन विश्लेषण केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान लखनऊ के डॉ आशीष अवस्थी ने किया।

एसजीपीजीआई में जटिल चेहरे की चोट का सफल उपचार





 एपेक्स ट्रॉमा सेंटर, एसजीपीजीआई में जटिल चेहरे की चोट का सफल उपचार


सड़क हादसे में घायल 24 वर्षीय युवक के चेहरे की हड्डी, फेशियल नर्व और पैरोटिड डक्ट क्षतिग्रस्त; तीन चरणों में किया गया पुनर्निर्माण


लखनऊ। एपेक्स ट्रॉमा सेंटर, एसजीपीजीआई में सड़क दुर्घटना में गंभीर चेहरे की चोट से घायल 24 वर्षीय मरीज का सफल उपचार किया गया है। यह एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण केस था, जिसमें ओरल एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जरी, प्लास्टिक सर्जरी, न्यूरोसर्जरी और एनेस्थीसिया विभाग की टीमों ने समन्वित प्रयास से सर्जरी को अंजाम दिया।


मरीज के चेहरे पर गहरा घाव था। जांच में फेशियल नर्व की टेम्पोरल, जाइगोमैटिक और बक्कल शाखाएं पूरी तरह कटी मिलीं। लार को मुंह तक पहुंचाने वाली स्टेनसन्स डक्ट (पैरोटिड डक्ट) भी कट गई थी। साथ ही जाइगोमैटिक बोन (गाल की हड्डी) और जाइगोमैटिक आर्च में कमिन्यूटेड फ्रैक्चर था।


तीन चरणों में जटिल पुनर्निर्माण


सर्जरी की चरणबद्ध योजना बनाई गई। पहले चरण में टूटी हुई जाइगोमैटिक बोन और आर्च का पुनर्निर्माण कर चेहरे की आकृति बहाल की गई। दूसरे चरण में क्षतिग्रस्त फेशियल नर्व की माइक्रोसर्जिकल रिपेयर की गई। नर्व का एक हिस्सा नष्ट होने के कारण सुरल नर्व ग्राफ्टिंग कर दोनों सिरों को जोड़ा गया। तीसरे चरण में कटे स्टेनसन्स डक्ट को जोड़कर उसकी निरंतरता के लिए इंट्राडक्टल स्टेंट लगाया गया।


टीमवर्क से मिली सफलता


इस सर्जरी में ओरल एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जरी टीम ने केंद्रीय भूमिका निभाई। टीम में डॉ. कुलदीप विश्वकर्मा, डॉ. भारत शुक्ला, डॉ. अपूर्वा और डॉ. दीक्षा शामिल रहीं। प्लास्टिक सर्जरी टीम से डॉ. अंकुर भटनागर, डॉ. निखिलेश और डॉ. सताक्षी ने सॉफ्ट-टिशू व नर्व रिकंस्ट्रक्शन किया। न्यूरोसर्जरी से डॉ. वेद, एनेस्थीसिया से डॉ. वंश, डॉ. विष्णु, डॉ. जगदीश और डॉ. आरती ने सहयोग दिया। नर्सिंग टीम में सुनीता फ्रेडरिक, सरिता, अंकिता और दीक्षा शामिल रहीं।

बुधवार, 30 सितंबर 2026

गुणवत्तापूर्ण इलाज के लिए नर्सों की अहम भूमिका - निदेशक ने नवनियुक्त नर्सिंग यूनियन की मुलाकात के दौरान कही यह बात

 

गुणवत्तापूर्ण इलाज के लिए नर्सों की अहम भूमिका - निदेशक ने नवनियुक्त नर्सिंग यूनियन की मुलाकात के दौरान कही यह बात


लखनऊ। गुणवत्तापूर्ण इलाज के लिए नर्सों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, विशेषकर कैंसर जैसे गंभीर रोगों से जूझ रहे मरीजों की देखभाल में नर्सिंग स्टाफ रीढ़ की हड्डी के समान है। यह बात कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान के निदेशक प्रोफेसर डॉक्टर एम एल भट्ट ने कही।


प्रोफेसर भट्ट ऑल इंडिया रजिस्टर्ड नर्सेज फेडरेशन, उत्तर प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष अनुराग वर्मा और एआईआरएनएफ - केएसएसएससीआई विंग की नवगठित कार्यकारिणी समिति के पदाधिकारियों से शिष्टाचार मुलाकात के दौरान बोल रहे थे। इस अवसर पर संस्थान के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉक्टर विजेंद्र कुमार एवं चिकित्सा अधीक्षक डॉक्टर वरुण विजय भी मौजूद रहे।


मुलाकात के दौरान नर्सिंग सेवाओं को और अधिक मजबूत एवं प्रभावी बनाने, मरीजों को बेहतर देखभाल उपलब्ध कराने तथा नर्सिंग कर्मचारियों से जुड़े कल्याणकारी विषयों पर सकारात्मक चर्चा हुई।


फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष अनुराग वर्मा ने कहा कि फेडरेशन नर्सिंग समुदाय के अधिकार, सम्मान, सुरक्षा और शिक्षा के साथ-साथ मरीज हित को भी प्राथमिकता देता है। संगठन का उद्देश्य नर्सिंग समुदाय एवं संस्थान प्रशासन के बीच संवाद, सहयोग और समन्वय को मजबूत करना है।    


इसी अवसर पर संगठन को गतिशील बनाने के लिए विंग की नवगठित कार्यकारिणी की घोषणा की गई।


नवगठित कार्यकारिणी इस प्रकार है -

अध्यक्ष - अर्चना रॉबिन्सन

महामंत्री - प्रशांत पटेल

उपाध्यक्ष - सुषमा, श्वेता, साधना रोहित

उप संयुक्त सचिव - छाया, अंकुर

सहायक सचिव - संजना, अशोक, अतुल वर्मा

कोषाध्यक्ष - अतुल पांडेय

उप कोषाध्यक्ष - अंशिका पांडेय

सदस्य - प्रियंका, मजमी


नवनियुक्त पदाधिकारियों ने निदेशक एवं प्रशासन का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि विंग नर्सिंग सेवाओं की गुणवत्ता, मरीजों की बेहतर देखभाल और संस्थान के साथ सकारात्मक समन्वय के लिए निरंतर कार्य करेगा।


अंत में निदेशक प्रोफेसर भट्ट एवं वरिष्ठ अधिकारियों ने नई कार्यकारिणी को बधाई देते हुए उज्ज्वल भविष्य की कामना की।

रविवार, 27 सितंबर 2026

पीजीआइ के बाल सर्जरी विभाग को आइएपीएस के सम्मेलन में 8 राष्ट्रीय सम्मान

 

पीजीआइ के बाल सर्जरी विभाग को आइएपीएस के सम्मेलन में  8 राष्ट्रीय सम्मान



(जासं)संजय गांधी पीजीआइ के पीडियाट्रिक सर्जिकल सुपर स्पेशियलिटीज विभाग को बेंगलुरु में आयोजित इंडियन एसोसिएशन ऑफ पीडियाट्रिक सर्जन्स के वार्षिक राष्ट्रीय सम्मेलन  में 8 पुरस्कार प्राप्त हुआ।प्रो. बसंत कुमार को बच्चों की सर्जरी में नेतृत्व, शिक्षण और शोध के लिए नेशनल लीडरशिप अवार्ड 2026 मिला। प्रो. अंकुर मंडेलिया को  लिवर की नस जाम के शंट ऑपरेशन के बाद किडनी पर असर पर शोध के लिए और दूसरा, ऑपरेशन के दौरान आंत के अंदर दूरबीन डालकर जांच करने की तकनीक पर शोध के लिए दो प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ। रेजिडेंट डॉक्टरों ले. कर्नल डॉ. राहुल गोयल  को बिना चीरा लगाए सिर्फ तिल्ली की जांच से लिवर के प्रेशर और नसों की सूजन का पता लगाने की तकनीक पर गोल्ड मेडल मिला। डा. शुचि वार्ष्णेय को बच्चों में अंडकोष के बाहर होने वाले ट्यूमर पर 14 साल के अनुभव पर शोध पत्र पर प्रथम पुरस्कार। डा. आनंद कुमार मौर्य को  जन्म से मलद्वार और आखिरी आंत दोहरी बनने की बीमारी के ऑपरेशन पर शोध पत्र पर प्रथम पुरस्कार। डा. पूजा प्रजापति को  पित्त नली बंद होने पर बिना ऑपरेशन लिवर खराबी जांचने के नए टेस्ट पर और दूसरा, पैंक्रियाज के दुर्लभ ट्यूमर के ऑपरेशन के रिजल्ट पर शोध पर द्वितीय पुरस्कार प्राप्त हुआ।

शनिवार, 26 सितंबर 2026

: हठ योग से गर्भधारण न कर पाने की परेशानी में 41% तक राहत, तनाव और अवसाद घटा

 

शोध: हठ योग से गर्भधारण न कर पाने की परेशानी में 41% तक राहत, तनाव और अवसाद घटा



। लखनऊ


 गर्भधारण न कर पाने की परेशानी का इलाज करा रही महिलाओं के लिए अच्छी खबर है। हठ योग के नियमित अभ्यास से तनाव, चिंता और अवसाद में 41 प्रतिशत तक कमी आई है, जिससे गर्भधारण की संभावना बढ़ जाती है। यह शोध  संजय गांधी पीजीआइ में किया गया है। शोध को हाल में दिल्ली में आयोजित टीएनआई द्वारा आयोजित 7वीं कॉमनवेल्थ नर्सेज एंड मिडवाइव्स फेडरेशन कॉन्फ्रेंस में प्रस्तुत किया गया है

 शोध इनफर्टिलिटी ओपीडी, संजय गांधी पीजीआइ  में इलाज करा रही  महिलाओं पर किया गया। शोध में विशेष स्केल से महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य का स्तर मापा गया और फिर 2 सप्ताह तक रोज 60 मिनट तक हठ योग के आसन, प्राणायाम और ध्यान कराया गया।


 क्या असर दिखा - 


 योग के बाद चिंता में 41.3 फीसदी  अवसाद में 35.3 फीसदी और  तनाव में 30.3 फीसदी की कमी आई।


 मैटरनल एंड रिप्रोडक्टिव हेल्थ डिपार्टमेंट की   - प्रो. डॉ. इंदुलता साहू ने कहा, "गर्भधारण न कर पाने की परेशानी के इलाज में तनाव और डिप्रेशन सबसे बड़ी रुकावट खड़ी करता है। तनाव बढ़ने पर कोर्टिसोल हार्मोन बढ़ता है, जिससे अंडा बनने की प्रक्रिया बिगड़ती है और भ्रूण के गर्भाशय में टिकने में दिक्कत आती है। कई महिलाएं डिप्रेशन के कारण इलाज बीच में ही छोड़ देती हैं। जब तनाव और अवसाद दूर होता है तो हार्मोन संतुलित होते हैं और गर्भधारण की संभावना बढ़ जाती है।"



शोधकर्ता टीम 


ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजिकल नर्सिंग, कॉलेज ऑफ नर्सिंग की 

 टीचिंग फैकल्टी / मुख्य  भूमिका सिंह , कॉलेज ऑफ नर्सिंग, प्रिंसिपल

डॉ. राधा के, 

 ट्यूटर / सह-शोधकर्ता

 एलिस जोसेफ, मैटरनल एंड रिप्रोडक्टिव हेल्थ डिपार्टमेंट, 

 कंसल्टेंट प्रो. अमृत गुप्ता,

 कंसल्टेंट प्रो. डॉ. इंदुलता साहू

,कॉलेज ऑफ नर्सिंग,

बी.एससी. नर्सिंग छात्र

 आकाश भारती, मुसाफिर अली, युक्ता यादव




हठ योग प्रक्रिया - 60 मिनट:

1. तैयारी (5 मि.): खाली पेट, शांत जगह। 2. आसन (30 मि.): तितली आसन, भुजंगासन, सेतुबंधासन, विपरीत करणी। 3. प्राणायाम (15 मि.): अनुलोम-विलोम, भ्रामरी। 4. ध्यान (10 मि.): आँख बंद, सांस पर ध्यान।

कल्याण सिंह कैंसर संस्थान में स्त्री रोग ऑन्कोलॉजी विभाग का स्थापना दिवस




महिलाओं में कैंसर बढ़ा, इलाज भी एडवांस


कल्याण सिंह कैंसर संस्थान में स्त्री रोग ऑन्कोलॉजी विभाग का स्थापना दिवस


लखनऊ। कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान में स्त्री रोग ऑन्कोलॉजी विभाग का पहला स्थापना दिवस मना। "ब्रिजिंग एडवांसेज विद प्रैक्टिस" विषय पर सी एम ई हुई। विशेषज्ञों ने कहा - यूपी में सर्वाइकल, ओवेरियन और यूटेराइन कैंसर बढ़ रहे हैं, पर समय पर जांच से 70 प्रतिशत मरीजों को बचाया जा सकता है।


विभागाध्यक्ष प्रो. सबुही कुरैशी ने प्रगति रिपोर्ट रखी। निदेशक प्रो. एम.एल.बी. भट्ट ने कहा - नई तकनीक और टीम वर्क से बेहतर इलाज संभव है। मुख्य अतिथि प्रो. उमा सिंह और एस्टर बेंगलुरु के डॉ. विजय के. आहूजा ने कहा - रोबोटिक सर्जरी और इम्यूनोथेरेपी से इलाज आसान हुआ है।


विशेषज्ञों के मुताबिक  सर्वाइकल कैंसर एचपीवी वायरस से होता है,  दूसरा सबसे आम है। ओवेरियन को साइलेंट किलर कहते हैं, इसके लक्षण पेट फूलना, भूख कम लगना, बार-बार पेशाब आना हैं, जिन्हें महिलाएं गैस समझ कर टाल देती हैं। 70 प्रतिशत केस तीसरी-चौथी स्टेज में आते हैं। एंडोमेट्रियल कैंसर मोटापा और हार्मोन गड़बड़ी से होता है, मेनोपॉज के बाद ब्लीडिंग इसका बड़ा संकेत है।


अब इलाज में क्रांति 


 रोबोटिक और लैप्रोस्कोपिक सर्जरी में बड़ा चीरा नहीं लगता, मरीज दो दिन में घर जाता है। हाइपेक थेरेपी में सर्जरी के बाद पेट में गर्म कीमो दी जाती है, इससे दोबारा खतरा 40 प्रतिशत कम होता है। अब बीआरसीए जैसे जीन टेस्ट के बाद टारगेटेड और इम्यूनोथेरेपी से सटीक दवा दी जाती है। चौथी स्टेज में भी पेलिएटिव केयर से दर्द-मुक्त जीवन संभव है।



ऐसे करे बचाव 



बचाव के लिए 9 से 26 साल की लड़कियों को एचपीवी वैक्सीन जरूरी है। 30 के बाद हर तीन साल पैप स्मीयर जांच कराएं। लगातार सफेद पानी, पीरियड्स के बीच ब्लीडिंग और पेट की सूजन को नजरअंदाज न करें।


 क्या करें, क्या न करें


लक्षण: पेट फूलना, भूख कम, बार-बार पेशाब, असामान्य ब्लीडिंग।

नया इलाज: रोबोटिक सर्जरी, हाइपेक, टारगेटेड दवा।

बचाव: 9-26 साल में एचपीवी टीका, 30 के बाद पैप स्मीयर, धूम्रपान से बचें।