शुक्रवार, 6 मार्च 2026

एआइ से ल्यूपस की जांच में नई सटीकता,

 







एआइ से ल्यूपस की जांच में  सटीकता, इलाज की सफलता का भी लगेगा अनुमान


कुमार संजय


एआइ से ल्यूपस की जांच में नई सटीकता, इलाज की सफलता का भी लगेगा अनुमान कुमार संजय ल्यूपस जैसी जटिल ऑटो प्रतिरक्षी बीमारी की जांच अब और अधिक सटीक हो सकेगी।संजय गांधी पीजीआई ने एम्स नई दिल्ली, पीजीआई चंडीगढ़ और आईआईटी दिल्ली के सहयोग से एआइ( कृत्रिम बुद्धिमत्ता) आधारित न्यूरल नेटवर्क प्रणाली विकसित की है, जो जांच की सूक्ष्म तस्वीरों का विश्लेषण कर नए पैटर्न पहचानने के साथ इलाज की दिशा और उसकी सफलता का आकलन करने में मदद करेगी। क्लीनिकल इम्यूनोलॉजी विभाग के प्रो. रूद्रापन चटर्जी के अनुसार, ल्यूपस की पुष्टि के लिए एंटी न्यूक्लियर एंटीबॉडी (एएनए) जांच की जाती है। इस जांच में माइक्रोस्कोप के माध्यम से स्लाइड पर बनने वाले विशेष पैटर्न को देखकर बीमारी का निर्धारण किया जाता है। कई बार बहुत सूक्ष्म पैटर्न मानवीय आंख से छूट जाते हैं या उनकी पहचान में भ्रम हो जाता है। नई विकसित प्रणाली ऐसे मामलों में स्पष्ट और सटीक विश्लेषण उपलब्ध कराएगी। पीजीआई के क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी विभाग की पूर्व प्रमुख और एम्स बीबी नगर की निदेशक प्रोफेसर अमिता अग्रवाल के मुताबिक अब तक इस नेटवर्क में 5 हजार से अधिक एएनए पैटर्न की तस्वीरें अपलोड की जा चुकी हैं। सहयोगी संस्थानों में हुई जांच की डिजिटल तस्वीरों को सुरक्षित कर आईआईटी दिल्ली भेजा गया, जहां विशेषज्ञों ने उन्हें प्रणाली में सम्मिलित कर विश्लेषण के लिए प्रोग्रामिंग कर रहे है। विश्लेषण के दौरान कुछ नए पैटर्न सामने आए हैं और पहले अनदेखे रहे संकेतों की भी पहचान संभव हुई है। एम्स नई दिल्ली के प्रो. रंजन गुप्ता और पीजीआई चंडीगढ़ के डॉ. माली भावा भी इस शोध दल का हिस्सा हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पैटर्न की सटीक जानकारी मिलने से न केवल बीमारी की पुष्टि अधिक विश्वसनीय होगी, बल्कि मरीज के लिए उपयुक्त इलाज तय करने और उपचार की प्रगति पर नजर रखने में भी सहायता मिलेगी। 


क्या है ल्यूपस ल्यूपस 


 ऑटो प्रतिरक्षी बीमारी है, जिसमें शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता अपने ही स्वस्थ ऊतकों और अंगों पर हमला करने लगती है। इससे त्वचा, जोड़ों, किडनी, हृदय और अन्य अंग प्रभावित हो सकते हैं। इसके प्रमुख लक्षणों में अत्यधिक थकान, जोड़ों में दर्द, बुखार तथा चेहरे पर तितली के आकार का दाग शामिल हैं। समय पर जांच और नियमित उपचार से इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है। प्रति 1 लाख आबादी में लगभग 20 से 70 लोग ल्यूपस से प्रभावित हो सकते हैं। भारत की जनसंख्या को देखते हुए यह संख्या लगभग 3 लाख से 10 लाख लोगों के बीच हो सकती है। यह बीमारी महिलाओं में पुरुषों की तुलना में लगभग 8 से 9 गुना अधिक पाई जाती है, खासकर 15 से 45 वर्ष की आयु वर्ग में। चूंकि जागरूकता और जांच की सुविधाएं बढ़ रही हैं, इसलिए आने वाले वर्षों में पंजीकृत मामलों की संख्या और अधिक स्पष्ट हो सकती है।




गुरुवार, 5 मार्च 2026

43 कंपनियों का 3.53 लाख करोड़ माफ



43 कंपनियों का 3.53 लाख करोड़ ‘हेयरकट’: जनता पर पड़ता बोझ और अर्थव्यवस्था का बड़ा सवाल

भारत आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आधार पर देश वैश्विक स्तर पर शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और आर्थिक विकास की रफ्तार भी कई विकसित देशों से तेज बताई जाती है। लेकिन जब इस विकास को आम नागरिक की जिंदगी से जोड़कर देखा जाता है, तो तस्वीर उतनी चमकदार नहीं दिखती। प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत अब भी कई देशों से पीछे है और वैश्विक रैंकिंग में लगभग 140 के आसपास स्थान बताया जाता है।

इसी पृष्ठभूमि में कॉरपोरेट कर्ज और बैंकों द्वारा लिए गए “हेयरकट” का मुद्दा लगातार बहस का विषय बना हुआ है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 43 बड़ी कंपनियों पर करीब 5.44 लाख करोड़ रुपये का कर्ज बकाया था। दिवालिया प्रक्रिया के बाद बैंकों को इनमें से केवल लगभग 1.90 लाख करोड़ रुपये ही वापस मिल सके। यानी करीब 3.53 लाख करोड़ रुपये का हिस्सा बैंकों को छोड़ना पड़ा, जिसे वित्तीय भाषा में “हेयरकट” कहा जाता है।

भले ही इसे तकनीकी रूप से कर्ज माफी नहीं कहा जाता, लेकिन आम जनता के नजरिये से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इतनी बड़ी रकम का नुकसान कौन उठाता है। बैंकों का पैसा दरअसल जनता का ही पैसा होता है—क्योंकि वही पैसा लोगों की जमा पूंजी, सरकारी निवेश और टैक्स के रूप में बैंकिंग व्यवस्था में आता है। जब हजारों करोड़ रुपये की वसूली नहीं हो पाती, तो उसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

इसी कारण आलोचक यह सवाल उठाते हैं कि जब बड़ी कंपनियों के कर्ज में इस तरह भारी “हेयरकट” लिया जाता है, तो वही उदारता किसानों, छोटे व्यापारियों या आम नागरिकों के कर्ज के मामले में क्यों नहीं दिखाई देती। देश में लाखों किसान आज भी कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं। कई राज्यों में किसानों की आत्महत्या की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं।

यदि तुलना की जाए तो कहा जाता है कि 3.53 लाख करोड़ रुपये जैसी विशाल राशि से किसानों का कर्ज कई बार तक राहत देने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता था, या फिर स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के क्षेत्रों में बड़े स्तर पर निवेश किया जा सकता था।

यही कारण है कि आर्थिक नीतियों को लेकर यह बहस तेज होती जा रही है कि विकास का वास्तविक लाभ किसे मिल रहा है। एक ओर देश की जीडीपी तेजी से बढ़ने के दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर बड़ी आबादी अब भी महंगाई, बेरोजगारी और कम आय की समस्या से जूझ रही है।

भारत की अर्थव्यवस्था के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या विकास का लाभ केवल कुछ बड़े कॉरपोरेट समूहों तक सीमित रहेगा, या फिर उसकी पहुंच गांवों, किसानों और आम नागरिकों तक भी होगी।

आने वाले समय में नीति-निर्माताओं के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती होगी कि आर्थिक फैसलों में पारदर्शिता और संतुलन सुनिश्चित किया जाए, ताकि देश की संपत्ति का लाभ केवल कुछ हाथों में सिमटने के बजाय देश की पूरी जनता तक पहुंचे।



  

सामाजिक समरसता मंच और भारत रक्षा दल ने मिलकर किया यूजीसी का विरोध

 






सामाजिक समरसता मंच और भारत रक्षा दल ने मिलकर  किया यूजीसी का विरोध 


सामाजिक समरसता मंच एवं भारत रक्षा दल ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में आज श्री लक्ष्मी गणेश मंदिर एलडीए कॉलोनी में होली मिलन के कार्यक्रम के साथ-साथ यूजीसी के मुद्दे पर आगामी 8 मार्च को दिल्ली के रामलीला मैदान में होने वाली विशाल रैली में लोगों को चलने के लिये अपील के निम्मित हुई।मीटिंग की अध्यक्षता  कमल किशोर शर्मा ने एवं संचालन भारत रक्षा दल ट्रस्ट के श्रीनिवास राष्ट्रवादी ने किया।इस मौके पर सामाजिक समरसता मंच के संयोजक दुर्गेश पांडेय, क्षेत्र के प्रबुद्ध समाजसेवी श्याम कृष्ण राय ,पंडित शिव बिहारी द्विवेदी,संजय त्रिपाठी,दीपा त्रिवेदी,संध्या सिन्हा,डाक्टर शशि मिश्रा,सरोज बाला सोनी,रवि शंकर चौबे, आहुलवालिया, चंद्रा शुक्ला, कमलेश शुक्ला, वेद श्रीवास्तव संदीप शुक्ला, रवि शंकर चौबे, विशाल गुप्ता, नवीन श्रीवास्तव, संजय मिश्रा सहित सैकड़ो लोग मौजूद थे।मीटिंग में इस मुद्दे पर भविष्य पर होने वाले बड़े आंदोलन की संभावनाओं को देखते हुए क्षेत्रशह बैठकों और लोगो को इस मुद्दे पर जागरूक करने पर बोल देते हुए सभी को होली की बधाई ज्ञापित कर कार्यक्रम का समापन किया गया । सभी लोगों ने कहा कि यूजीसी का जो कानून है यह समाज को बांटने वाला है हम जाट विहीन समाज की तरफ जा रहे है। जाति के आधार पर भेदभाव सामाजिक स्तर पर खत्म हो रहा  लेकिन सरकार इसको बढ़ावा दे रही है। जाति के आधार पर बनने वाले कानून खत्म कर इंसानियत का कानून होना चाहिए तभी एक मजबूत देश बनेगा। 

पीजीआई में अत्याधुनिक न्यूरो-ओटोलॉजी लैब का उद्घाटन







 पीजीआई में अत्याधुनिक न्यूरो-ओटोलॉजी लैब का उद्घाटन, जटिल श्रवण रोगों की जांच व इलाज में मिलेगी मदद


बच्चों में सुनने की समस्या का समय से पहचान जरुरी

लखनऊ। संजय गांधी पीजीआई में वर्ल्ड हियरिंग डे 2026 के अवसर पर अत्याधुनिक न्यूरो-ओटोलॉजी लैब का उद्घाटन किया गया। संस्थान के निदेशक प्रो. आर. के. धीमान ने इस लैब का शुभारंभ किया। इस मौके पर मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रो. देवेंद्र गुप्ता और न्यूरोसर्जरी विभागाध्यक्ष प्रो. अवधेश जायसवाल भी मौजूद रहे।

नई न्यूरो-ओटोलॉजी लैब में श्रवण और संतुलन से जुड़ी बीमारियों की जांच के लिए अत्याधुनिक उपकरण लगाए गए हैं। इनकी मदद से सामान्य और जटिल कोक्लियर इम्प्लांट मामलों की बेहतर योजना बन सकेगी और मरीजों के इलाज को अधिक सटीक बनाया जा सकेगा। विशेषज्ञों के अनुसार यह लैब कान से जुड़े तंत्रिका तंत्र की समस्याओं, चक्कर आने की शिकायत और बच्चों में सुनने की क्षमता से जुड़ी दिक्कतों की पहचान में विशेष रूप से सहायक होगी।

इस अवसर पर न्यूरोसर्जरी विभाग की न्यूरो-ओटोलॉजी यूनिट के प्रमुख डॉ. रवि शंकर ने कहा कि बच्चों में सुनने की समस्या की समय पर पहचान बेहद जरूरी है। यदि शुरुआती अवस्था में इसका पता चल जाए तो बच्चे के भाषण, भाषा विकास, सीखने की क्षमता और सामाजिक विकास पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उन्होंने कहा कि समुदाय की भागीदारी से बच्चों में श्रवण समस्याओं की पहचान और उपचार को और बेहतर बनाया जा सकता है।

कार्यक्रम में एसजीपीजीआई परिसर स्थित केंद्रीय विद्यालय के विद्यार्थियों ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया और श्रवण स्वास्थ्य से संबंधित जानकारी प्राप्त की। इसके अलावा कोक्लियर इम्प्लांट सर्जरी करा चुके बच्चों के अभिभावकों तथा संभावित मरीजों के परिजनों ने भी कार्यक्रम में हिस्सा लिया और अपने अनुभव साझा किए।

 प्रो. धीमान ने कहा कि सुनने की कमी एक “मूक विकलांगता” है, जो धीरे-धीरे बढ़ती है, लेकिन समय पर जांच और उपचार से इसे काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार के सहयोग से पीजीआई बच्चों के श्रवण स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।

कार्यक्रम का आयोजन वर्ल्ड हियरिंग  डे  2026 की थीम “कम्युनिटीज टू क्लासरूम्स – हियरिंग केयर फॉर एवरी चाइल्ड” (कम्युनिटीज टू क्लासरूम्स – हियरिंग केयर फॉर एवरी चाइल्ड) के तहत किया गया।

सोमवार, 2 मार्च 2026

अंगदान करने वाले दो परिवारों को मिले 10-10 हजार रुपये

 



अंगदान करने वाले दो परिवारों को मिले 10-10 हजार रुपये



राज्य अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (सोटो) की ओर से हाल में दो ब्रेन डेड रोगियों के अंगदान करने वाले परिवारों को 10-10 हजार रुपये दिये गए हैं। सोटो के संयुक्त निदेशक व पीजीआई के एमएस डॉ. राजेश हर्षवर्धन ने बताया कि मृत अंगदाता के सम्मानजनक अंतिम संस्कार के लिए उनके परिवार को 10 हजार की आर्थिक सहायता दी जाती है। छह नवंबर 2025 को सेंट्रल कमाण्ड हॉस्पिटल में 56 वर्षीय भगवंती देवी के ब्रेन डेड घोषित किये जाने के बाद उनके विनोद कुमार यादव ने अंगदान की सहमति पर तीन मरीजों को नया जीवन मिला। वहीं 22 फरवरी को सड़क हादसे में घायल 43 वर्षीय संदीप कुमार के पीजीआई के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में ब्रेन स्टेम डेड घोषित जाने के बाद पत्नी लक्ष्मी देवी ने अंगदान की अनुमति दी थी। तीन रोगियों को नया जीवन मिला था। पीजीआई निदेशक डॉ. आरके धीमान के नेतृत्व में दोनों अंगदाताओं के परिजनों को 10-10 हजार की सहायता राशि डीबीटी के माध्यम से भेज गई है।


हेडफोन बच्चों के सुनने की क्षमता कर रहा है प्रभावित

 



पीजीआई में विश्व श्रवण दिवस पर जागरूकता कार्यक्रम

60 प्रतिशत मामलों में श्रवण हानि को रोकना संभव

 हेडफोन बच्चों के सुनने की क्षमता कर रहा है प्रभावित 


 उत्तर प्रदेश में करीब एक करोड़ सुनने की परेशानी से ग्रस्त

लखनऊ।

संजय गांधी गांधी पीजीआई के हेड एंड नेक सर्जरी विभाग द्वारा विश्व श्रवण दिवस पर जागरूकता   कार्यक्रम में विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अमित केशरी और डॉक्टर रूद्र प्रकाश ने बताया कि भारत में लगभग 6.3 करोड़ लोग किसी न किसी स्तर की सुनने की समस्या से प्रभावित हैं। जनसंख्या के अनुपात के आधार पर उत्तर प्रदेश में करीब 90 लाख से एक करोड़ लोग श्रवण हानि से जूझ रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या बच्चों की है। यदि बच्चों में सुनने की समस्या समय पर नहीं पहचानी जाती तो इसका सीधा असर बोलने, सीखने, पढ़ाई और सामाजिक विकास पर पड़ता है।

प्रो. केशरी के अनुसार, बच्चों में श्रवण हानि के प्रमुख कारणों में जन्मजात समस्याएं, समय से पहले जन्म, बार-बार कान में संक्रमण, तेज आवाज का संपर्क, मोबाइल व हेडफोन का अत्यधिक उपयोग और कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव शामिल हैं। उन्होंने कहा कि लगभग 60 प्रतिशत मामलों में श्रवण हानि को रोका या नियंत्रित किया जा सकता है, बशर्ते समय पर जांच और इलाज हो। उपचार में दवाइयां, सर्जरी, हियरिंग एड, कॉक्लियर इम्प्लांट और स्पीच व ऑडियोलॉजिकल थेरेपी कारगर साबित होती हैं।

प्रो केशरी ने बताया कि इस वर्ष की थीम रही— “समुदायों से कक्षाओं तक: सभी बच्चों के लिए श्रवण देखभाल”। निदेशक प्रो. आर. के. धीमान के संरक्षण में लखनऊ के दो प्रमुख विद्यालयों—द मिलेनियम स्कूल और केंद्रीय विद्यालय—में श्रवण जागरूकता व्याख्यान, स्क्रीनिंग शिविर और पोस्टर प्रतियोगिता आयोजित की गई। बच्चों की प्योर टोन ऑडियोमेट्री जांच की गई और जरूरतमंद विद्यार्थियों को एसजीपीजीआई में निःशुल्क परामर्श के लिए रेफर किया गया।

दोनों विद्यालयों के कक्षा 1 से 8 तक के 150 से अधिक बच्चों ने पोस्टर प्रतियोगिता में भाग लिया। 2 मार्च को आयोजित पुरस्कार वितरण समारोह में एसजीपीजीआई के डीन प्रो. शलीन कुमार ने बच्चों में ऐसे जागरूकता कार्यक्रमों को भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक बताया। विभाग के प्रोफेसर रुद्रा  ने कहा कि समय पर जांच, सही इलाज और जागरूकता से बच्चों को श्रवण हानि से बचाया जा सकता है।


एसजीआरटी तकनीक से कैंसर रेडियोथेरेपी में क्रांतिकारी बदलाव

 


एसजीआरटी तकनीक से कैंसर रेडियोथेरेपी में क्रांतिकारी बदलाव

लखनऊ में राष्ट्रीय सम्मेलन, विशेषज्ञों ने रखी तकनीकी दृष्टि


कैंसर उपचार के क्षेत्र में सटीकता, सुरक्षा और गुणवत्ता को नई ऊंचाई देने वाली सतह निर्देशित विकिरण चिकित्सा (एसजीआरटी) तकनीक अब भारत में तेजी से अपनाई जा रही है। कल्याण सिंह कैंसर संस्थान के प्रो प्रमोद कुमार गुप्ता ने बताया कि यह आधुनिक तकनीक मरीज की शरीर की सतह की वास्तविक समय में निगरानी कर रेडियोथेरेपी को अत्यंत सटीक बनाती है, जिससे विकिरण केवल कैंसरग्रस्त भाग तक सीमित रहता है और आसपास के स्वस्थ अंग सुरक्षित रहते हैं।

एसजीआरटी तकनीक में कैमरा आधारित त्रि-आयामी सतह इमेजिंग प्रणाली का उपयोग किया जाता है। इसके माध्यम से उपचार के दौरान मरीज की स्थिति पर लगातार नजर रखी जाती है। यदि मरीज की पोजिशन में हल्का सा भी बदलाव होता है, तो प्रणाली स्वतः संकेत देती है या उपचार रोक दिया जाता है। इससे

मरीज की पोजिशन में होने वाली त्रुटियों में कमी आती है,

अनावश्यक विकिरण जोखिम घटता है,

हृदय, फेफड़े जैसे महत्वपूर्ण अंगों की बेहतर सुरक्षा होती है,

और उपचार के परिणाम अधिक प्रभावी होते हैं।

विशेषज्ञों ने बताया कि स्तन कैंसर के उपचार में डीप इंस्पिरेशन ब्रीथ होल्ड (डीआईबीएच) तकनीक के साथ एसजीआरटी का प्रयोग हृदय को विकिरण से बचाने में अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो रहा है। वहीं स्टीरियोटैक्टिक बॉडी रेडियोथेरेपी (एसबीआरटी) तथा श्वसन आधारित नियंत्रित उपचारों में भी यह तकनीक उच्च स्तर की सटीकता सुनिश्चित करती है।

इन सभी तकनीकी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग, कल्याण सिंह कैंसर संस्थान  द्वारा आयोजित “एसजीआरटी भारत: भारत में विकिरण चिकित्सा को आगे बढ़ाना” विषयक राष्ट्रीय सम्मेलन में की गई। सम्मेलन में रेडिएशन ऑन्कोलॉजी, मेडिकल फिजिक्स और उन्नत रेडियोथेरेपी तकनीकों से जुड़े देश-विदेश के विशेषज्ञों ने भाग लिया।

सम्मेलन की प्रमुख बातें

एसजीआरटी को आधुनिक रेडियोथेरेपी की एक परिवर्तनकारी तकनीक के रूप में प्रस्तुत किया गया

सिर एवं गर्दन, स्तन तथा श्रोणि क्षेत्र के कैंसर उपचार में इसके क्लिनिकल लाभ साझा किए गए

डीआईबीएच, एसबीआरटी और श्वसन नियंत्रित उपचारों में हुई नवीन प्रगति पर तकनीकी सत्र

भारत में एसजीआरटी के भविष्य और विस्तार को लेकर विशेषज्ञ पैनल चर्चा

लाइव कार्यशाला, जिसमें एसजीआरटी तकनीक का व्यावहारिक प्रदर्शन किया गया

संस्थान के निदेशक प्रो एम एल बी भट्ट  ने कहा कि इस प्रकार की उन्नत तकनीकों से कैंसर उपचार को अधिक सुरक्षित, सटीक और मरीज-केंद्रित बनाया जा सकता है।

सम्मेलन की सफलता में तकनीकी सहयोग प्रदान करने के लिए रोहित मेहता का विशेष योगदान रहा।

आयोजकों ने कहा कि ऐसे शैक्षणिक और तकनीकी सम्मेलन भारत में कैंसर उपचार को वैश्विक मानकों के अनुरूप विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।


शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

नर्सिंग अधिकारी पर सामूहिक हमला, ए आई आर एफ ने राज्यपाल से की कड़ी कार्रवाई और सुरक्षा की मांग

 


बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर में नर्सिंग अधिकारी पर सामूहिक हमला,

 ए आई आर एफ ने राज्यपाल से की कड़ी कार्रवाई और सुरक्षा की मांग

 बी.आर.डी. मेडिकल कॉलेज, गोरखपुर में ड्यूटी पर तैनात एक नर्सिंग अधिकारी पर एमबीबीएस छात्रों द्वारा कथित रूप से सामूहिक हमला किए जाने का गंभीर मामला सामने आया है। इस घटना को लेकर ऑल इंडिया रजिस्टर्ड नर्स फडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष अनुराग वर्मा

 ने उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल को पत्र लिखकर तत्काल संज्ञान लेने, निष्पक्ष जांच कराने और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।

फेडरेशन के  उत्तर प्रदेश समिति की ओर से भेजे गए पत्र के अनुसार, 26 फरवरी 2026 की रात लगभग 1:30 बजे बीआरडी मेडिकल कॉलेज में यह घटना हुई। आरोप है कि ड्यूटी के दौरान 15–20 एमबीबीएस छात्रों ने नर्सिंग अधिकारी पर हमला किया, जिसमें उन्हें शारीरिक चोटें आईं। हमले के दौरान अभद्रता और अपमानजनक व्यवहार किए जाने का भी आरोप है। पीड़ित नर्सिंग अधिकारी ने इस संबंध में अस्पताल प्रशासन और संबंधित अधिकारियों को लिखित शिकायत सौंप दी है।

AIRNF ने पत्र में कहा है कि नर्सिंग अधिकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ होते हैं और 24×7 मरीजों की सेवा में तत्पर रहते हैं। ऐसे में उनके साथ हिंसा, अपमान और भय का माहौल न केवल नर्सिंग समुदाय का मनोबल तोड़ता है, बल्कि पूरे स्वास्थ्य सेवा तंत्र को कमजोर करता है। संगठन ने इसे निंदनीय और अस्वीकार्य बताते हुए कहा कि नर्सिंग पेशा केवल रोजगार नहीं, बल्कि सेवा, त्याग और मानवता का प्रतीक है, जिसकी गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य का संवैधानिक व नैतिक दायित्व है।

फेडरेशन ने मांग की है कि घटना की उच्चस्तरीय, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराई जाए तथा दोषी छात्रों के खिलाफ विधिसम्मत कड़ी कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साथ ही प्रदेश के सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में नर्सिंग अधिकारियों की सुरक्षा के लिए स्थायी सुरक्षा व्यवस्था—पुलिस सहायता केंद्र, पर्याप्त सुरक्षा गार्ड और सीसीटीवी निगरानी—लागू की जाए।

इसके अलावा, ए आईं आर एन एफ ने सभी स्वास्थ्य संस्थानों में “हेल्थकेयर वर्कर प्रोटेक्शन एक्ट” को अनिवार्य रूप से प्रभावी ढंग से लागू करने की भी मांग की है, ताकि नर्सिंग अधिकारियों सहित सभी स्वास्थ्यकर्मी सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण में कार्य कर सकें।

पत्र के अंत में संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते कठोर और उदाहरणात्मक कार्रवाई नहीं हुई, तो इससे व्यापक असंतोष की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। फेडरेशन ने राज्यपाल से इस गंभीर विषय में शीघ्र हस्तक्षेप कर न्याय और सुरक्षा सुनिश्चित करने का आग्रह किया है।

किडनी क्यों नहीं मिल पाती?—भारत में अंग प्रत्यारोपण की सच्चाई पर गंभीर सवाल

 




किडनी क्यों नहीं मिल पाती?—भारत में अंग प्रत्यारोपण की सच्चाई पर गंभीर सवाल

“मुझे किडनी क्यों नहीं मिल पा रही?”—यह सवाल हाल ही में 90 वर्ष से अधिक उम्र के एक बुज़ुर्ग ने अपने परिजन से किया। यही प्रश्न आज भारत में लाखों किडनी रोगियों की पीड़ा को दर्शाता है। वरिष्ठ नागरिक और चिकित्सक संजय गांधी पीजीआई के क्लिनिकल  इम्यूनोलॉजी विभाग की पूर्व प्रमुख प्रोफेसर सीता नाइक के एक लेख ने एक बार फिर देश में किडनी प्रत्यारोपण की जमीनी हकीकत और उससे जुड़े नैतिक, सामाजिक व कानूनी पहलुओं पर बहस छेड़ दी है।

लेख के अनुसार, ब्रिटेन में लगभग 7,000 लोग किडनी प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा में हैं और हर साल करीब आधे मरीजों को किडनी मिल जाती है। वहीं भारत में स्थिति बेहद गंभीर है। करीब 14 करोड़ की आबादी वाले देश में लगभग दो लाख मरीज किडनी के इंतज़ार में हैं, लेकिन सालाना केवल 6,000 के आसपास ही प्रत्यारोपण हो पाते हैं। यानी 100 में से सिर्फ 3 मरीजों को ही नई किडनी नसीब हो पाती है।

भारत में पहली किडनी प्रत्यारोपण सर्जरी 1971 में क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर में हुई थी। बाद में प्रत्यारोपण को कानूनी और नैतिक ढांचे में लाने के लिए 1994 में मानव अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम (THOTA) लागू किया गया। इस कानून के तहत केवल नज़दीकी रिश्तेदार या विशेष परिस्थितियों में अनुमति लेकर अन्य दाता अंगदान कर सकते हैं। अंगों की खरीद-फरोख्त को पूरी तरह अवैध और अनैतिक माना गया।

हालांकि, हकीकत यह है कि मांग और आपूर्ति के बड़े अंतर ने अवैध अंग व्यापार को जन्म दिया है। गरीब और हाशिए पर खड़े लोग इस नेटवर्क का आसान शिकार बनते हैं, जिसमें बिचौलिये से लेकर कुछ स्वास्थ्यकर्मी तक शामिल पाए गए हैं।

इस संदर्भ में लेख में ईरान का उदाहरण दिया गया है, जहां 1988 से किडनी की नियंत्रित बिक्री को कानूनी मान्यता है। वहां प्रतीक्षा सूची नहीं है और सरकारी निगरानी में मरीजों को अपेक्षाकृत कम लागत में किडनी मिल जाती है। दाता को सीधे भुगतान किया जाता है।

लेख में यह भी उल्लेख है कि हाल ही में द गार्डियन में प्रकाशित एक लेख में इस बात पर सवाल उठाया गया कि क्या केवल ‘परोपकार’ के भरोसे अंगदान की जरूरतें पूरी हो सकती हैं। लेखक का तर्क है कि यदि समाज गरीबों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए ठोस कदम नहीं उठाता, तो केवल शोषण के डर से भुगतान आधारित व्यवस्था को खारिज करना भी पाखंड हो सकता है।

संजय गांधी पीजीआई के नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो नारायण प्रसाद के मुताबिक भारत में उच्च रक्तचाप और मधुमेह के बढ़ते मामलों के चलते भविष्य में किडनी फेल्योर के मरीज और बढ़ने की आशंका है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या मौजूदा नीति पर्याप्त है, या फिर इस संवेदनशील मुद्दे पर नए सिरे से खुली और ईमानदार बहस की जरूरत है।

यह रिपोर्ट न तो अंगों की बिक्री की खुली वकालत करती है और न ही मौजूदा कानूनों को खारिज करती है, लेकिन यह जरूर कहती है कि “किडनी क्यों नहीं मिल पाती?”—इस सवाल से अब मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।

कॉर्निया प्रत्यारोपण को नई रफ्तार, 11 से बढ़कर 21 होंगे आई बैंक व ट्रांसप्लांट सेंटर

 










पीजीआई में नेत्र मंथन

प्रदेश में कॉर्निया प्रत्यारोपण को नई रफ्तार, 11 से बढ़कर 21 होंगे आई बैंक व ट्रांसप्लांट सेंटर

लखनऊ।

प्रदेश में कॉर्निया प्रत्यारोपण की बढ़ती आवश्यकता को देखते हुए स्टेट ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (सॉट्टो–उ.प्र.) ने बड़ा कदम उठाया है। वर्तमान में प्रदेश में संचालित 11 सरकारी कॉर्निया रिट्रीवल (आई बैंक) और प्रत्यारोपण सेंटरों की संख्या बढ़ाकर 21 करने की योजना पर काम शुरू कर दिया गया है। इस योजना को अगले 18 महीनों में चरणबद्ध रूप से लागू करने का लक्ष्य रखा गया है।

यह जानकारी संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान के चिकित्सा अधीक्षक एवं सॉट्टो–उ.प्र. के संयुक्त निदेशक प्रो. राजेश हर्षवर्धन तथा नेत्र विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. विकास कन्नौजिया ने ‘नेत्र मंथन’ कार्यक्रम के दौरान दी। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश में हर वर्ष लगभग 18 हजार मरीजों को कॉर्निया प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है, जबकि वर्तमान में केवल 1200 से 1500 प्रत्यारोपण ही हो पा रहे हैं। इस अंतर के कारण हजारों लोग दृष्टिहीनता का सामना कर रहे हैं।

राज्य-स्तरीय मंथन सत्र

उत्तर प्रदेश में कॉर्नियल दान एवं प्रत्यारोपण की वर्तमान स्थिति और भावी दिशा पर केंद्रित राज्य-स्तरीय विचार-मंथन सत्र का आयोजन 28 फरवरी 2026 को डी. के. छाबड़ा सभागार, एसजीपीजीआईएमएस, लखनऊ में किया गया। इस सत्र का संयुक्त आयोजन सॉट्टो–उ.प्र., अस्पताल प्रशासन विभाग और नेत्र विज्ञान विभाग द्वारा किया गया।

कार्यक्रम में चिकित्सा शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव श्री अमित कुमार घोष ने योजना को सहमति प्रदान करते हुए सरकार के पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं की सहभागिता से नेत्रदान के प्रति सकारात्मक वातावरण बनेगा और कॉर्नियल प्रत्यारोपण सेवाओं का तेजी से विस्तार संभव होगा।

कॉर्नियल अंधत्व: गंभीर जनस्वास्थ्य चुनौती

सत्र में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, देश में हर वर्ष प्राप्त किए गए कॉर्निया और वास्तविक प्रत्यारोपण में उपयोग हुए कॉर्निया के बीच बड़ा अंतर बना रहता है। गुणवत्ता, संक्रमण और समयबद्धता के कारण अनेक कॉर्निया प्रत्यारोपण के योग्य नहीं रह पाते।

नेशनल ऑर्गन और टिशु ट्रांसप्लांट (नॉटो) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में कॉर्नियल अंधत्व से पीड़ित लोगों की संख्या लगभग 10 से 12 लाख है और प्रतिवर्ष 20 से 25 हजार नए मामले जुड़ते हैं। यह समस्या बाल्यावस्था अंधत्व के प्रमुख कारणों में भी शामिल है।

कॉर्नियल अंधत्व के प्रमुख कारणों में

कॉर्निया संक्रमण (बैक्टीरियल, फंगल और वायरल),

आंखों में आघात एवं रासायनिक चोटें,

मोतियाबिंद सर्जरी के बाद उत्पन्न जटिलताएं,

विटामिन-ए की कमी,

जन्मजात कॉर्नियल विकार,

तथा पारंपरिक हानिकारक नेत्र उपचार प्रथाएं शामिल हैं।

विशेषज्ञों ने कहा कि समयबद्ध दान और सुदृढ़ प्रत्यारोपण व्यवस्था से इस अंधत्व को अधिकांश मामलों में रोका और उपचारित किया जा सकता है।

पीजीआई में जल्द शुरू होंगी सेवाएं

प्रो. विकास कन्नौजिया ने बताया कि संस्थान में एक वर्ष के भीतर कॉर्निया रिट्रीवल और प्रत्यारोपण सेवाएं शुरू कर दी जाएंगी। मृत्यु के छह घंटे के भीतर कॉर्निया प्राप्त करना गोल्डन आवर माना जाता है।

उन्होंने बताया कि 100 सफल प्रत्यारोपण के लिए औसतन 170 कॉर्निया की आवश्यकता होती है, क्योंकि तकनीकी कारणों से लगभग 70 कॉर्निया अनुपयोगी हो जाते हैं। कॉर्निया रिट्रीवल प्रशिक्षित ऑप्थैल्मिक टेक्नोलॉजिस्ट द्वारा किया जा सकता है, जबकि प्रत्यारोपण केवल विशेषज्ञ नेत्र सर्जन द्वारा ही किया जाता है।

संस्थान के निदेशक प्रो. आर. के. धीमन ने कहा कि आवश्यक मानव संसाधन, उपकरण और लॉजिस्टिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। उन्होंने प्रत्यारोपण समन्वयकों की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।

विशेषज्ञों के विचार

नॉटो के निदेशक डॉ. अनिल कुमार ने कहा कि अंग और ऊतक दान की सुदृढ़ संस्कृति विकसित करने के लिए केवल जन-जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं हैं। अस्पतालों में संभावित दाताओं की समयबद्ध पहचान, परिजनों से संवेदनशील संवाद और पारदर्शी आवंटन व्यवस्था आवश्यक है।

आगरा मेडिकल कॉलेज की नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. शेफाली मजूमदार ने कहा कि डेटा-आधारित दृष्टिकोण, डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम, अस्पताल-आधारित दाता पहचान और प्रत्यारोपण समन्वयकों का प्रशिक्षण इस तंत्र को मजबूत बना सकता है।

साझा संकल्प

विचार-मंथन सत्र में यह निष्कर्ष निकला कि आई बैंक नेटवर्क के विस्तार, तकनीक आधारित निगरानी, जन-जागरूकता और संस्थागत समन्वय से कॉर्निया दान और प्रत्यारोपण के बीच की खाई को पाटा जा सकता है।

कार्यक्रम का समापन इस संदेश के साथ हुआ—

“जीवन से परे सोचें, आज ही नेत्रदाता बनें।”

अगर आप चाहें तो मैं

आरोप सिद्ध नहीं हुए, पर राजनीति बदल गई

 




आरोप सिद्ध नहीं हुए, पर राजनीति बदल गई

भारतीय लोकतंत्र में “आरोप की राजनीति”, गिरफ्तारी और सत्ता परिवर्तन का यथार्थ

भारतीय राजनीति में अब यह लगभग स्थापित सच बन चुका है कि किसी नेता को दोषी साबित करना आवश्यक नहीं है—उस पर आरोप लगा देना, जांच शुरू करा देना और गिरफ्तारी की स्थिति बना देना ही पर्याप्त है।

न्यायालय बाद में क्या कहेगा, यह राजनीति के लिए अब गौण हो चुका है।

इस प्रवृत्ति ने न केवल विपक्षी दलों को, बल्कि सत्ता पक्ष को भी हथियार दिया है, ताकि वह अपने ही सहयोगियों या असहज नेताओं को रास्ते से हटा सके।

अरविंद केजरीवाल: आरोप, गिरफ्तारी और राजनीतिक क्षरण

दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे अरविंद केजरीवाल पर शराब नीति सहित कई आरोप लगे। अब तक कोई अंतिम न्यायिक निर्णय ऐसा नहीं है जिससे यह कहा जा सके कि वे दोषी सिद्ध हुए हैं।

फिर भी जांच एजेंसियों की कार्रवाई और गिरफ्तारी ने उनके राजनीतिक नैरेटिव को गहरी चोट पहुंचाई।

यहां यह स्पष्ट दिखता है कि गिरफ्तारी स्वयं सजा में बदल चुकी है, भले ही दोष सिद्ध न हुआ हो।

कांग्रेस: अदालत से बरी, राजनीति से बाहर

2004–2014 के दौरान सत्ता में रही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सरकार पर एक के बाद एक बड़े घोटालों के आरोप लगे—

2G स्पेक्ट्रम घोटाला

कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला

कोलगेट, आदर्श हाउसिंग जैसे मामले

अदालतों ने वर्षों बाद कहा—आरोप सिद्ध नहीं हुए।

लेकिन तब तक कांग्रेस सत्ता और भरोसे—दोनों से बाहर हो चुकी थी।

हेमंत सोरेन:

सत्ता पक्ष में रहकर भी आरोप, इस्तीफा और सत्ता परिवर्तन

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का मामला इस बहस को और गहरा करता है।

उन पर कथित रूप से जमीन आवंटन और पद के दुरुपयोग जैसे आरोप लगे। मामला न्यायिक प्रक्रिया में था, कोई अंतिम दोष सिद्ध नहीं हुआ था, फिर भी उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।

यहां महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि—

यह कार्रवाई सत्ता के भीतर की परिस्थितियों में हुई

आरोप सिद्ध होने से पहले ही राजनीतिक निर्णय ले लिया गया

न्यायिक प्रक्रिया से पहले ही राजनीतिक सजा दे दी गई

यह उदाहरण बताता है कि आरोप की राजनीति केवल विपक्ष बनाम सत्ता तक सीमित नहीं, बल्कि सत्ता के अंदर भी इसका प्रयोग होता है।

नया और खतरनाक ट्रेंड

आरोप + गिरफ्तारी + इस्तीफा = राजनीतिक अंत

आज भारतीय राजनीति में एक नया फार्मूला उभर आया है—

आरोप लगाओ

जांच बैठाओ

गिरफ्तारी या इस्तीफे की स्थिति बनाओ

नैतिकता का दबाव बनाओ

सत्ता परिवर्तन कर लो

बाद में अदालत कुछ भी कहे—

राजनीति अपना काम कर चुकी होती है।

कानून व्यवस्था में अनिवार्य सुधार

“जब तक आरोप सिद्ध न हों, गिरफ्तारी क्यों?”

अब यह केवल राजनीतिक प्रश्न नहीं, संवैधानिक प्रश्न बन चुका है।



आवश्यक कानूनी बदलाव

जब तक किसी व्यक्ति पर लगे आरोप प्रथम दृष्टया ठोस और निर्णायक रूप से सिद्ध न हों, तब तक गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए।

इसके पीछे तर्क:

गिरफ्तारी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नष्ट कर देती है

राजनीतिक जीवन समाप्त हो जाता है

जनता अदालत से पहले फैसला कर लेती है

विपक्ष या सत्ता—दोनों को अनुचित लाभ मिलता है

सुप्रीम कोर्ट और संविधान की मूल भावना

सर्वोच्च न्यायालय कई बार कह चुका है कि—

“गिरफ्तारी अंतिम विकल्प होनी चाहिए, पहला नहीं।”

फिर भी राजनीतिक मामलों में गिरफ्तारी पहला हथियार बन चुकी है।

लोकतंत्र के सामने गंभीर खतरा

आज खतरा यह नहीं है कि दोषी बच जाएंगे,

खतरा यह है कि—

निर्दोषों को दोषी की तरह दंडित किया जा रहा है—बिना सजा, बिना फैसले।

यदि आरोप सिद्ध होने से पहले गिरफ्तारी और इस्तीफे की राजनीति को नहीं रोका गया,

तो लोकतंत्र में न्याय नहीं,

बल्कि डर और धारणा शासन करेगी।

यह लड़ाई किसी एक नेता की नहीं,

हर नागरिक के अधिकार और स्वतंत्रता की है।

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

बेटे ने पिता को गोली मारकर हत्या की, ड्रम में छिपाए शव के टुकड़े

 








लखनऊ में दिल दहला देने वाला हत्याकांड

बेटे ने पिता की गोली मारकर हत्या की, शव के टुकड़े कर  ड्रम में छिपाया

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के आशियाना थाना क्षेत्र स्थित एलडीए कॉलोनी सेक्टर-एल से एक ऐसा हत्याकांड सामने आया है, जिसने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है। यहां एक बेटे ने अपने ही पिता की लाइसेंसी राइफल से गोली मारकर हत्या कर दी और वारदात को छिपाने के लिए शव के टुकड़े कर उन्हें घर में रखे एक नीले ड्रम में छिपा दिया। पुलिस ने आरोपी बेटे को गिरफ्तार कर लिया है और उससे लगातार पूछताछ की जा रही है।

पुलिस के अनुसार मृतक की पहचान मानवेंद्र प्रताप सिंह (49 वर्ष) के रूप में हुई है। वह पेशे से पैथोलॉजी लैब संचालक थे और काकोरी क्षेत्र में भी उनकी लैब संचालित होती थी। कई ब्रांच है।  मानवेंद्र सिंह 20 फरवरी से लापता थे। उनके बेटे अक्षत प्रताप सिंह, जो बीकॉम का छात्र है, ने आशियाना थाने में उनके गुमशुदा होने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी।

गुमशुदगी की कहानी के पीछे छिपा था अपराध

गुमशुदगी दर्ज कराते समय अक्षत ने पुलिस को बताया था कि 20 फरवरी की सुबह करीब 6 बजे उसके पिता ने उसे जगाकर कहा कि वह दिल्ली जा रहे हैं और 21 फरवरी की दोपहर तक वापस आ जाएंगे। जाते समय उन्होंने घर का दरवाजा बंद करने को कहा था। इसके बाद उनके तीनों मोबाइल फोन बंद आने लगे और वह घर वापस नहीं लौटे, जिससे परिवार चिंतित हो गया।

पुलिस ने जब जांच शुरू की तो मानवेंद्र सिंह के मोबाइल की अंतिम लोकेशन काकोरी स्थित उनकी लैब में मिली, लेकिन वहां मोबाइल फोन नहीं मिला। इस दौरान पुलिस को बेटे अक्षत की गतिविधियों पर संदेह हुआ और उससे पूछताछ की गई।

बयान बदलता रहा आरोपी

पूछताछ के दौरान अक्षत लगातार पुलिस को गुमराह करता रहा। पहले उसने दावा किया कि उसके पिता ने आत्महत्या कर ली है। बाद में उसने अपना बयान बदला और स्वीकार किया कि उसी ने पिता की हत्या की है। इसके बाद पुलिस ने उससे कड़ाई से पूछताछ की, जिसमें पूरी साजिश का खुलासा हुआ।

अक्षत ने पुलिस को बताया कि 20 फरवरी की सुबह करीब 4:30 बजे उसका अपने पिता से किसी बात को लेकर विवाद हो गया। विवाद इतना बढ़ गया कि वह गुस्से में अपनी लाइसेंसी राइफल लेकर आया और पिता पर गोली चला दी। गोली लगते ही मानवेंद्र सिंह की मौके पर ही मौत हो गई।

शव के टुकड़े कर सबूत मिटाने की कोशिश

हत्या के बाद आरोपी ने शव को ठिकाने लगाने की योजना बनाई। वह शव को तीसरे फ्लोर से ग्राउंड फ्लोर पर एक खाली कमरे में ले आया और वहां शव के टुकड़े कर दिए। हाथ-पैर और कुछ अन्य हिस्सों को कार में भरकर सदरौना इलाके में फेंक दिया, जबकि धड़ को घर के भीतर एक कमरे में रखे नीले रंग के प्लास्टिक ड्रम में भरकर छिपा दिया।

आरोपी धड़ को भी ठिकाने लगाने की फिराक में था, लेकिन इससे पहले ही पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया। सोमवार शाम पुलिस अक्षत को लेकर उसके घर पहुंची, जहां तलाशी के दौरान नीले ड्रम से मानवेंद्र सिंह का धड़ बरामद हुआ। पुलिस अब शव के सिर और अन्य हिस्सों की बरामदगी के लिए पूछताछ कर रही है।

बहन के सामने की गई हत्या

पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि अक्षत ने अपनी बहन कृति के सामने ही पिता को गोली मारी थी। इसके बाद उसने बहन को धमकी दी कि यदि उसने किसी को कुछ बताया तो उसे भी जान से मार देगा। डर के कारण कृति ने किसी को इस घटना की जानकारी नहीं दी।

हत्या के बाद आरोपी ने कार में लगे खून के निशान साफ किए। जब चाची ने कार की सफाई को लेकर सवाल किया तो उसने कहा कि कार गंदी हो गई थी और खुद ही साफ कर दी। बाद में पुलिस को कार में खून के निशान मिलने से संदेह और गहरा हो गया।

फोरेंसिक जांच और कानूनी कार्रवाई

घटना की सूचना मिलते ही वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंचे। फोरेंसिक टीम ने घर और आसपास के इलाके से अहम साक्ष्य जुटाए। हत्या में इस्तेमाल की गई लाइसेंसी राइफल भी बरामद कर ली गई है। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है।

मृतक की पत्नी का करीब नौ साल पहले निधन हो चुका है। परिवार में बेटा अक्षत और बेटी कृति हैं। कृति एपीएस में 11वीं कक्षा की छात्रा है। मानवेंद्र सिंह के छोटे भाई उत्तर प्रदेश पुलिस में कार्यरत हैं और वर्तमान में सचिवालय में तैनात हैं।

इलाके में दहशत का माहौल

एलडीए कॉलोनी सेक्टर-एल में इस जघन्य हत्याकांड के बाद पूरे इलाके में दहशत का माहौल है। घर के बाहर लोगों की भारी भीड़ जमा है। उत्तर प्रदेश पुलिस का कहना है कि आरोपी के खिलाफ साक्ष्यों के आधार पर हत्या और साक्ष्य मिटाने से जुड़ी गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

यह घटना राजधानी लखनऊ में हाल के वर्षों की सबसे सनसनीखेज और दिल दहला देने वाली वारदातों में से एक मानी जा रही है।



 मानवेंद्र प्रताप सिंह बेहद धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। 


 नियमित रूप से पूजा-पाठ करते थे और धार्मिक आयोजनों में सक्रिय भागीदारी निभाते थे। क्षेत्र में उनकी पहचान एक शांत, सरल और संस्कारवान व्यक्ति के रूप में थी। वह अक्सर कथा, भंडारा और धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल रहते थे तथा कई बार अपने स्तर से भंडारे का आयोजन भी कराते थे। पड़ोसियों और परिचितों के अनुसार मानवेंद्र सिंह का व्यवहार सौम्य था और वह कभी किसी से ऊंची आवाज में बात करते नहीं देखे गए।

एलडीए कॉलोनी सेक्टर-एल में रहने वाले लोगों का कहना है कि मानवेंद्र मंदिर जाना नहीं भूलते थे और धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन में भी उनकी गहरी रुचि थी। यही कारण है कि उनकी इस तरह नृशंस हत्या की खबर से पूरा इलाका स्तब्ध है। लोग यह मानने को तैयार नहीं हैं कि इतना धार्मिक और पारिवारिक व्यक्ति इतनी भयावह साजिश का शिकार हो सकता है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि मानवेंद्र सिंह अक्सर कहते थे कि “धर्म और संस्कार ही परिवार को जोड़कर रखते हैं।” ऐसे व्यक्ति की हत्या, वह भी अपने ही बेटे के हाथों, समाज के लिए एक गहरी चेतावनी और सोचने का विषय बन गई है।

पड़ोसियों और रिश्तेदारों का मानना है कि यदि समय रहते पारिवारिक तनाव को समझ लिया गया होता, तो शायद यह दर्दनाक घटना टाली जा सकती थी। फिलहाल इस जघन्य हत्याकांड ने लखनऊ में लोगों को झकझोर कर रख दिया है और हर कोई यही सवाल कर रहा है कि संस्कार, संवाद और परिवार के बीच बढ़ती दूरी आखिर किस दिशा में समाज को ले जा रही है।



रिश्ते का खून

बड़ा बनने के जुनून में ‘राजा’ बेटे ने किया कत्ल

राजधानी लखनऊ के आशियाना इलाके में रिश्तों को शर्मसार करने वाला एक दिल दहला देने वाला हत्याकांड सामने आया है। यहां एक बेटे ने अपने ही पिता की गोली मारकर हत्या कर दी और बाद में शव के टुकड़े कर उन्हें ठिकाने लगाने की तैयारी करने लगा। आरोपी बेटे की पहचान ‘राजा’ के रूप में हुई है। पुलिस जांच में सामने आया है कि आरोपी बड़ा आदमी बनने के जुनून में इस कदर अंधा हो गया कि उसने अपने ही जन्मदाता की जान ले ली।


एक दिन पहले घर लाया था आरी, डांट से था नाराज

जांच में यह भी सामने आया है कि वारदात से एक दिन पहले ही आरोपी घर में आरी लेकर आया था। उस दिन भी पिता ने उसे किसी बात पर डांटा था, जिससे वह अंदर ही अंदर नाराज चल रहा था। पुलिस का मानना है कि यह हत्या अचानक नहीं बल्कि पहले से सोची-समझी साजिश का हिस्सा थी।

गोली मारकर हत्या, शव छिपाने की साजिश

घटना वाले दिन आरोपी ने पिता को गोली मार दी। हत्या के बाद उसने शव के टुकड़े किए और उन्हें छिपाने के लिए घर में रखे एक नीले ड्रम का इस्तेमाल किया। पुलिस को घर से करीब 20 लीटर एसिड भी बरामद हुआ है। आशंका है कि आरोपी शव को गलाने की तैयारी कर रहा था ताकि सबूत पूरी तरह मिटाए जा सकें।

कानपुर रोड के कॉलेज में बीकॉम कर रहा था आरोपी

पुलिस जांच में सामने आया है कि राजा कानपुर रोड स्थित एक कॉलेज में बीकॉम लास्ट ईयर की पढ़ाई कर रहा था। पढ़ाई के साथ-साथ वह अपने पिता के कारोबार में भी दखल देने लगा था। इसी को लेकर घर में तनाव का माहौल बना रहता था।

सीसीटीवी में नहीं दिखा बाहर निकलना

पुलिस ने घटनास्थल और आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की जांच की। फुटेज में आरोपी के घर से बाहर निकलने के स्पष्ट दृश्य नहीं मिले, जिससे पुलिस को शक हुआ कि वारदात घर के अंदर ही अंजाम दी गई है।

इंस्पेक्टर भाई पहली मंजिल पर रहते थे

बताया गया है कि आरोपी का भाई, जो पेशे से इंस्पेक्टर है, उसी मकान की पहली मंजिल पर रहता है। हालांकि घटना के समय वह घर पर मौजूद नहीं था। पुलिस इस बिंदु पर भी गहन जांच कर रही है।

मोहल्ले में मातम, दहशत का माहौल

घटना के बाद पूरे मोहल्ले में सन्नाटा और दहशत का माहौल है। पड़ोसियों का कहना है कि इस घर से पहले बेटे की हंसी और चहल-पहल सुनाई देती थी, लेकिन अब वहां मातम पसरा है। किसी को विश्वास नहीं हो रहा कि एक बेटा इतना क्रूर हो सकता है।

पुलिस को मिले अहम सुराग

पुलिस ने आरोपी को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है। हत्या में इस्तेमाल हथियार, एसिड और अन्य सबूत जब्त कर लिए गए हैं। पुलिस का कहना है कि मामले की हर कड़ी को जोड़ा जा रहा है और जल्द ही पूरे घटनाक्रम का खुलासा किया जाएगा।




 


रविवार, 22 फ़रवरी 2026

शोक से संकल्प तक: पीजीआई में बहु-अंगदान, तीन लोगों को मिला नया जीवन

 







शोक से संकल्प तक: पीजीआई में  बहु-अंगदान, तीन लोगों को मिला नया जीवन


20 वर्षों बाद पीजीआई में ब्रेन स्टेम डेथ के बाद हुआ बहु-अंगदान


दो लोगों  में किडनी एक में हुआ लीवर का प्रत्यारोपण और आगे दो लोगों में होगा कार्निया पत्यारोपण




“आत्मा भले ही शरीर से विलग हो जाए, परंतु दान किए गए अंग किसी अन्य के जीवन में नई आशा और ऊर्जा का संचार कर सकते हैं।” इस विचार को साकार करते हुए लखनऊ निवासी 42 वर्षीय श्री संदीप कुमार के अंगदान ने तीन जरूरतमंदों को नया जीवन दिया और आगे दो लोगों को रोशनी मिलेगी। 

07 फरवरी 2026 को एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल  संदीप कुमार का विभिन्न अस्पतालों में इलाज चला, पर स्थिति में सुधार नहीं हुआ। 21 फरवरी 2026 की रात्रि उन्हें संजय गांधी पीजीआई के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया। 22 फरवरी 2026 को चार विशेषज्ञ चिकित्सकों के पैनल ने उन्हें ब्रेन स्टेम डेथ घोषित किया। परिजनों की काफी काउंसलिंग की गई और उन्हें बताया गया कि इनका अंग कई लोगों को जीवन दे सकता है। 

परिजनों की सहमति के बाद राज्य अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन–उत्तर प्रदेश (सोटो-यू.पी.) के संयुक्त निदेशक एवं  चिकित्सा अधीक्षक प्रो. राजेश हर्षवर्धन के मार्गदर्शन में पीजीआई और केजीएमयू के संयुक्त सहयोग से अंग-रिट्रीवल व प्रत्यारोपण की प्रक्रिया सफलतापूर्वक संपन्न हुई। केजीएमयू की प्रतीक्षा सूची में पंजीकृत रोगी को लीवर प्रत्यारोपित किया गया।

निदेशक डॉ. आर.के. धीमन ने कहा कि  लगभग 20 वर्षों के उपरांत एसजीपीजीआई में ब्रेन स्टेम डेथ के बाद यह पहला बहु-अंगदान है, जो संस्थान के इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।  सोटो-यू.पी. की पहल के अनुरूप, एपेक्स ट्रॉमा सेंटर की नीति के तहत ब्रेन स्टेम डेथ के मामलों में यदि परिजन अंगदान की सहमति देते हैं, तो सहमति के समय से संपूर्ण उपचार व्यय माफ किया जाता है।



केजीएमयू में लीवर  और पीजीआई में हुआ किडनी का प्रत्यारोपण 


सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी की प्रो. सुप्रिया शर्मा एवं डॉ. राहुल के नेतृत्व में लीवर हार्वेस्ट किया गया। सोटो-यू.पी. द्वारा स्थापित ग्रीन कॉरिडोर के माध्यम से लीवर को शीघ्र केजीएमयू पहुँचाया गया, जहाँ सफल प्रत्यारोपण हुआ।


 पीजीआइ के यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. एम.एस. अंसारी, प्रो. संजय सुरेका एवं डॉ. संचीत रुस्तगी की टीम ने किडनी रिट्रीवल किया, जबकि नेफ्रोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. नारायण प्रसाद की टीम ने दो मरीजों में किडनी प्रत्यारोपण की सभी तैयारियाँ सुनिश्चित कर सफल प्रत्यारोपण किया। 

 किडनी दो महिलाओं को लगी दोनों महिलाएं 10 साल से डायलिसिस पर थी इनकी उम्र 35 से 40 के बीच है। 

कॉर्निया हार्वेस्टिंग व प्रत्यारोपण की प्रक्रिया डॉ. अपिजीत कौर के समन्वित प्रयासों से पूरी हुई।


इस टीम ने सफल लिया डोनेशन



 एनेस्थीसिया विभाग के प्रो. देवेंद्र गुप्ता, डॉ. सुरुचि अंबास्ता एवं उनकी टीम ने डोनर मेंटेनेंस सहित पूरी प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाई।

सोटो-यू.पी. की टीम— भोलेश्वर पाठक, डॉ. क्रिस अग्रवाल, डॉ. अक्षिता बंसल, डॉ. एकता, नीलिमा दीक्षित, डॉ. अभिषेक एवं डॉ. जय प्रकाश शर्मा ,हरीश चोपड़ा—ने शनिवार रात्रि से रविवार सायं तक सभी विभागों के साथ निरंतर समन्वय स्थापित कर इस बहु-अंगदान को सफल बनाया। 



दिया गया गार्ड ऑफ आनर


अंगदान के उपरांत दिवंगत को सम्मानपूर्वक गार्ड ऑफ ऑनर प्रदान किया गया। इस अवसर पर निदेशक डॉ. आर.के. धीमन, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. देवेंद्र गुप्ता, सोटो-यू.पी. के संयुक्त निदेशक डॉ. राजेश हर्षवर्धन, नेफ्रोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. नारायण प्रसाद तथा एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के प्रमुख प्रो अरुण श्रीवास्तव एवं उनकी टीम उपस्थित रही।

दिवंगत श्री संदीप कुमार अपने पीछे पत्नी  लक्ष्मी और आठ वर्षीय पुत्र को छोड़ गए हैं। इस दुखद घड़ी में उनकी पत्नी द्वारा लिया गया साहसिक और करुणामय निर्णय पाँच लोगों को नया जीवन देने में सहायक बना।



अंगों को ले जा रही एम्बुलेंस एपेक्स ट्रॉमा सेंटर, संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआईएमएस) से शाम 6:14 बजे रवाना हुई और 6:32 बजे किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) पहुँची।

एम्बुलेंस ने तेलीबाग – कैंट – हजरतगंज – केजीएमयू मार्ग का अनुसरण किया।

इस पूरे सफर को तय करने में कुल 18 मिनट का समय लगा।


शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

: पेट-स्कैन से जांची गई दिल की मांसपेशियों की ‘वायबिलिटी’, एंजियोप्लास्टी के बाद लौटी मरीज की मुस्कान

 

: पेट-स्कैन से जांची गई दिल की मांसपेशियों की ‘वायबिलिटी’, एंजियोप्लास्टी के बाद लौटी मरीज की मुस्कान


कुमार संजय


लखनऊ। रायपुर के 51 वर्षीय दुष्यंत के लिए बीता सप्ताह जिंदगी का सबसे कठिन दौर साबित हुआ, लेकिन विशेषज्ञों की सतर्कता और आधुनिक जांच तकनीक ने उन्हें नई जिंदगी दे दी।


 


दुष्यंत को पिछले सप्ताह अचानक उल्टी और बाएं हाथ में दर्द की शिकायत हुई। उल्टी के बाद दर्द कुछ समय तक बना रहा, लेकिन रात में आराम मिलने पर उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया। अगले दिन शाम को बुखार आने पर वे स्थानीय चिकित्सक के पास पहुंचे। प्रारंभिक जांच में हृदयाघात (हार्ट अटैक) की आशंका जताई गई। आवश्यक परीक्षणों के बाद पुष्टि हुई कि उन्हें हार्ट अटैक पड़ा था।


 


परिजन तुरंत उन्हें संजय गांधी पीजीआई ले गए, जहां हृदय रोग विशेषज्ञ प्रो. नवीन गर्ग की देखरेख में भर्ती किया गया। एंजियोग्राफी में हृदय की रक्त वाहिकाओं में अवरोध की पुष्टि हुई, लेकिन साथ ही यह भी सामने आया कि हृदय की मांसपेशियां (मायोकार्डियम) पर्याप्त रूप से कार्य नहीं कर रहीं। ऐसी स्थिति में सीधे एंजियोप्लास्टी करने से लाभ संदिग्ध था।


 


वायबिलिटी टेस्ट से बदली दिशा


 


प्रो. गर्ग ने सलाह दी कि पहले यह जांचा जाए कि हृदय की मांसपेशियों में जीवन शक्ति (मायोक्रडियल वाइबिलिटी) शेष है या नहीं। यदि मांसपेशियां जीवित हैं और रक्त प्रवाह बहाल करने से लाभ संभव है, तभी एंजियोप्लास्टी की जाए।


 


इसके लिए मरीज को संस्थान के न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग में भेजा गया, जहां विभागाध्यक्ष प्रो. पी.के. प्रधान की निगरानी में पीईटी-स्कैन आधारित एफडीजी जांच की गई। दो दिनों तक अलग-अलग परीक्षणों के बाद तीसरे दिन रिपोर्ट में पाया गया कि हृदय की प्रभावित मांसपेशियों में पर्याप्त वायबिलिटी मौजूद है।


 


एंजियोप्लास्टी से सामान्य हुआ रक्त प्रवाह


 


रिपोर्ट के आधार पर प्रो. नवीन गर्ग ने एंजियोप्लास्टी कर अवरुद्ध धमनी को खोला और हृदय में रक्त प्रवाह सामान्य किया। उपचार सफल रहा और कुछ ही दिनों में मरीज की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ। मंगलवार को उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।


 


विशेषज्ञों की सलाह


 


प्रो. नवीन गर्ग ने बताया कि हार्ट अटैक अक्सर बिना पूर्व चेतावनी के होता है। कई मामलों में मरीज इसे गैस या सामान्य असुविधा समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। बाएं हाथ में दर्द, उल्टी, सीने में दबाव या बेचैनी जैसे लक्षणों को हल्के में नहीं लेना चाहिए। समय पर इलाज मिलने से जान बचाई जा सकती है।


 


तकनीक ने दिया जीवनदान


 


इस मामले में एफडीजी पीईटी-स्कैन द्वारा हृदय की मांसपेशियों की वायबिलिटी का आकलन निर्णायक साबित हुआ। यह तकनीक बताती है कि अवरुद्ध रक्त प्रवाह के बावजूद कौन-सी मांसपेशियां अभी जीवित हैं और उपचार से लाभान्वित हो सकती हैं।


 


आधुनिक चिकित्सा तकनीक और विभागों के समन्वित प्रयास ने दुष्यंत को नई जिंदगी और उनके परिवार को राहत की मुस्कान दी।

: हार्ट अटैक (हृदयाघात) के मामलों में एक बड़ा हिस्सा ऐसा होता है जिसमें व्यक्ति को समय पर पता ही नहीं चलता। इसे “साइलेंट हार्ट अटैक” कहा जाता है। चिकित्सकीय अध्ययनों के अनुसार लगभग 20% से 40% लोगों में हार्ट अटैक के समय स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते, खासकर बुज़ुर्गों, डायबिटीज़ (शुगर) के मरीजों और महिलाओं में। समय पर इलाज न होने से हृदय की मांसपेशियां खराब हो जाती हैं, जिससे हार्ट फेल्योर का खतरा बढ़ जाता है।

डेक एक्सपर्ट ए आइ को मिला ‘मोस्ट इनोवेटिव’ अवॉर्ड

 








इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में पीजीआई और –डेक्ट्रोसेल द्वारा विकसित

डेक एक्सपर्ट ए आइ को मिला

‘मोस्ट इनोवेटिव’ अवॉर्ड


देश में स्वास्थ्य तकनीक के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि के रूप में संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान और डेक्ट्रोसेल हेल्थकेयर की संयुक्त पहल को इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में ‘मोस्ट इनोवेटिव’ श्रेणी का पुरस्कार मिला। यह सम्मान एआई आधारित फेफड़ा जांच समाधान डेक एक्सपर्ट के लिए दिया गया, जो एक्स-रे के माध्यम से टीबी सहित श्वसन रोगों की त्वरित पहचान करता है और ग्रामीण व टियर-2 क्षेत्रों में रेडियोलॉजिस्ट की कमी की बड़ी समस्या का समाधान प्रस्तुत करता है।

पलमोनरी मेडिसिन भाग के प्रमुख प्रो. आलोक नाथ के नेतृत्व और रेडियोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. अर्चना गुप्ता के सहयोग से इस मजबूत एआई मॉडल का अध्ययन किया गया। पलमोनरी टीबी के रेडियोलॉजिकल निदान पर आधारित यह शोध प्रतिष्ठित जर्नल नेचर साइंटिफिक रिपोर्ट्स  में प्रकाशित हुआ, जिसमें थूक यह ए आई मॉडल जेन एक्सपर्ट (गोल्ड स्टैंडर्ड) की तुलना में 95 प्रतिशत सटीकता दर्शाई गई।

इस अध्ययन के सह-लेखकों में डॉ. आलोक नाथ, डॉ. जिया हाशिम (पल्मोनरी मेडिसिन), डॉ. जफर नेयाज़ (रेडियोडायग्नोसिस), डॉ. ऋचा मिश्रा (माइक्रोबायोलॉजी), डॉ. अंकित शुक्ला (यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड; ड्यूक मेडिकल स्कूल, एनयूएस सिंगापुर; संस्थापक—डेक्ट्रोसेल), डॉ. सौम्या शुक्ला (पीजीए सह-संस्थापक—डेक्ट्रोसेल) और निखिल मिश्रा (सी टी ओ—डेक्ट्रोसेल; भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर) शामिल रहे। पीजीआई ने आवश्यक क्लिनिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर और डेटा एथिक्स फ्रेमवर्क उपलब्ध कराया, जिससे कम-बैंडविड्थ पर काम करने वाला उच्च-सटीकता एआई टूल विकसित हो सका।

नीति और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रभाव

स्वास्थ्य प्रशासकों और नीति निर्माताओं के लिए यह मॉडल सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की दिशा में एक व्यावहारिक रास्ता दिखाता है।

25 राज्यों में हो इस मॉडल का हो रहा है प्रयोग


यह एआई फिलहाल छह राज्यों—महाराष्ट्र, तमिलनाडु, ओडिशा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश—के 25 केंद्रों पर सक्रिय है, जहां विशेषज्ञों की अनुपलब्धता के बावजूद तुरंत एक्स-रे स्क्रीनिंग संभव हो पाती है।

डिजिटल और नॉन-डिजिटल  दोनों प्रकार की इमेज प्रोसेस करने की क्षमता के कारण महंगे पैकर सिस्टम की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे संसाधन-सीमित जिलों में लागत घटती है। यह टूल फ्रंटलाइन हेल्थ वर्कर्स के लिए फोर्स मल्टीप्लायर की तरह काम करता है और तृतीयक संस्थानों पर निदान का बोझ कम करता है।

नेतृत्व की प्रतिक्रिया और आगे की योजना

संस्थान के निदेशक पद्मश्री प्रो. आर.के. धवन ने कहा, “यह पुरस्कार पी जी आई की उस प्रतिबद्धता की पुष्टि करता है, जिसके तहत प्रयोगशाला में विकसित नवाचारों को देश के अंतिम छोर तक पहुंचाया जाता है।”

डेक्ट्रोसेल अब इस एआई फ्रेमवर्क को सी टी और एम आर आई मॉड्यूल तक विस्तारित करने पर काम कर रहा है।


पीजीआई मैटरनल एंड रिप्रोडक्टिव हेल्थ विभाग का 17वां स्थापना दिवस



 





पीजीआई मैटरनल एंड रिप्रोडक्टिव हेल्थ विभाग का 17वां स्थापना दिवस

गर्भ में ही होगी गंभीर जन्मजात बीमारियों की सर्जरी, शिशुओं को मिलेगा नया जीवन

लखनऊ। मातृ एवं शिशु चिकित्सा के क्षेत्र में बड़ी पहल करते हुए संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान  के मैटरनल एंड रिप्रोडक्टिव हेल्थ (एमआरएच) विभाग ने गर्भ में ही गंभीर जन्मजात बीमारियों से ग्रस्त शिशुओं की सर्जरी शुरू करने की घोषणा की है। विभाग के 17वें स्थापना दिवस समारोह में बताया गया कि न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट जैसी बीमारियों से पीड़ित उन गर्भस्थ शिशुओं की फीटल सर्जरी की जाएगी, जिनके मस्तिष्क में अभी कोई संरचनात्मक विकृति नहीं आई है।

विभागाध्यक्ष प्रो. मंदाकिनी प्रधान, प्रोफेसर नीता सिंह प्रोफेसर इंदु लता साहू प्रोफेसर अमृता गुप्ता प्रोफेसर संगीता यादव सहित विभाग के वरिष्ठ चिकित्सकों ने बताया कि हर महीने दो से तीन गर्भवती महिलाएं इस गंभीर समस्या के साथ पीजीआई पहुंचती हैं। अब तक शिशु के जन्म के बाद सर्जरी करनी पड़ती थी, जिससे कई बार स्थायी विकलांगता और अन्य जटिलताएं हो जाती थीं। गर्भ में ही सर्जरी से इन जोखिमों को कम किया जा सकेगा। इसके साथ ही पोस्टिरियर यूरेथ्रल वाल्व से ग्रस्त गर्भस्थ शिशुओं का इलाज और जुड़वां गर्भावस्था की गंभीर समस्या ट्विन-टू-ट्विन ट्रांसफ्यूजन सिंड्रोम का उपचार भी लेजर तकनीक से किया जाएगा। एक वर्ष के भीतर ये सभी सुविधाएं पूरी तरह शुरू हो जाएंगी और पीजीआई उत्तर भारत का तीसरा बड़ा फीटल सर्जरी केंद्र बनेगा।


बॉक्स

इसी अवसर पर गर्भवती महिलाओं के लिए एस जी पी जी आइ मेटरनिटी केयर एप्लीकेशन लॉन्च किया गया। इस ऐप के जरिए महिलाओं को घर बैठे विशेषज्ञ परामर्श और नियमित डिजिटल फॉलो-अप मिलेगा। पीजीआई आने पर महिला के मोबाइल में ऐप डाउनलोड कर दिया जाता है, जिसमें वजन, ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, थायराइड जैसी जांच रिपोर्ट अपलोड की जा सकती हैं।   हाई-रिस्क प्रेगनेंसी में बार-बार अस्पताल आने की जरूरत कम होगी और मां व शिशु दोनों की बेहतर निगरानी संभव होगी।  डेनमार्क की मिनिस्ट्री से अन्या, एप बनाने वाली कंपनी के सीईओ खुशबू वर्मा निदेशक प्रोफेसर आरके धीमान, अपर मुख्य सचिव चिकित्सा शिक्षा अमित कुमार घोष ने ऐप को लांच किया।

यूजीसी एक्ट व एससी-एसटी एक्ट के विरोध में लखनऊ में विरोध मार्च, पुलिस ने परिवर्तन चौक पर रोका









 यूजीसी एक्ट व एससी-एसटी एक्ट के विरोध में लखनऊ में विरोध मार्च, पुलिस ने परिवर्तन चौक पर रोका

लखनऊ। सवर्ण मोर्चा और सामाजिक समरसता मंच के साथ अन्य यूजीसी-विरोधी संगठनों ने शुक्रवार को परिवर्तन चौक से गांधी प्रतिमा तक विरोध पदयात्रा निकाली। पुलिस द्वारा भारी सुरक्षा व्यवस्था और रोक के चलते प्रदर्शनकारी गांधी प्रतिमा तक नहीं पहुंच सके। मार्च को बीच में ही रोक दिए जाने के बाद सभी प्रदर्शनकारी वहीं धरने पर बैठ गए।

प्रदर्शनकारियों ने यूजीसी एक्ट को समाप्त करने, एससी-एसटी एक्ट को समाप्त करने और आरक्षण का आधार जाति के बजाय आर्थिक करने की मांग की। वक्ताओं ने कहा कि जाति के आधार पर किसी भी तरह की विशेष सुविधा नहीं दी जानी चाहिए और सामाजिक समरसता के लिए नीतियों में व्यापक सुधार जरूरी है।

धरने को संबोधित करने वालों में प्रमुख रूप से अलंकार अग्निहोत्री, पूर्व पीसीएस दुर्गेश पांडे, अधिवक्ता अभिषेक अग्निहोत्री, कृष्णा तिवारी, मनोज शुक्ला, बसंत सिंह बघेल, ध्रुव सिंह, संदीप सिंह, अशोक सिंह, करणी सेना के प्रतिनिधि विमलेश सिंह, अमरेश सिंह, अमित सिंह, प्रभात शर्मा, अवनीश अवस्थी, आशुतोष मिश्रा, जेपी बाजपेई, अभिराज त्रिपाठी, अभिनव नाथ त्रिपाठी, संजय मिश्रा और शाहिद शामिल रहे।

आयोजकों के अनुसार, विरोध पदयात्रा में हजारों  लोग शामिल हुए। प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा, लेकिन मांगों को लेकर वक्ताओं ने सरकार से शीघ्र निर्णय लेने की अपील की।

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

एसजीपीजीआई के सलोनी हार्ट सेंटर में बच्चों के दिल के इलाज को नई ताकत,

 

एसजीपीजीआई के सलोनी हार्ट सेंटर में बच्चों के दिल के इलाज को नई ताकत, एचसीएल फाउंडेशन ने दिए एक करोड़ के जीवनरक्षक उपकरण

लखनऊ। संजय गांधी पीजीआई के सलोनी हार्ट सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन चिल्ड्रेन हार्ट हेल्थकेयर में बच्चों के दिल के इलाज को नई मजबूती मिली है।  एचसीएल फाउंडेश द्वारा दान किए गए अत्याधुनिक जीवनरक्षक उपकरणों का उद्घाटन किया गया। करीब एक करोड़ रुपये की लागत से मिले इन संसाधनों से जन्मजात हृदय रोग, यानी दिल में छेद, से पीड़ित बच्चों के इलाज और सर्जरी के बाद देखभाल में उल्लेखनीय सुधार होगा।

फाउंडेशन ने केंद्र के फेज-एक में स्थापित छह बेड वाले आईसीयू के एक हिस्से को उन्नत तकनीक से सुसज्जित किया है। इसमें एस-एल-ई 6000 पीडियाट्रिक नियोनेटल वेंटिलेटर, पांडा रिससव्यू वार्मर विद रिससिटेशन ट्रॉली और जी-ई बिलीसॉफ्ट फाइबर ऑप्टिक फोटोथेरेपी सिस्टम शामिल हैं। ये उपकरण नवजात और छोटे बच्चों को श्वसन सहायता, तापमान संतुलन और पीलिया के उपचार में मदद करेंगे। 

कार्यक्रम के दौरान निर्माणाधीन परिसर का निरीक्षण, रिबन-कटिंग समारोह और डॉ. हरगोविंद खुराना ऑडिटोरियम में “ऑनरिंग हार्टबीट हीरोज़” सत्र आयोजित किया गया। इसमें मुख्यमंत्री के मुख्य सलाहकार, आई-ए-एस श्री अवनीश कुमार अवस्थी, अपर मुख्य सचिव चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण अमित कुमार घोष, निदेशक, एसजीपीजीआई प्रो. राधा के. धीमान, विभागाध्यक्ष, सीवीटीएस प्रो. एस.के. अग्रवाल, एग्जीक्यूटिव चेयरमैन, सलोनी हार्ट फाउंडेशन (यूएसए)  हिमांशु सेठ, अध्यक्ष, सलोनी हार्ट फाउंडेशन की मृणालिनी सेठ और सीनियर वाइस प्रेसिडेंट, एचसीएल श ऋषि कुमार सहित कई लोग उपस्थित रहे।

 सलोनी हार्ट सेंटर का उद्घाटन 22 अक्टूबर 2024 को मुख्यमंत्री ने किया था।  200 बेड वाले इस केंद्र के पूर्ण होने पर हर वर्ष 5,000 हृदय सर्जरी, 1,400 स्वास्थ्य कर्मियों का प्रशिक्षण और शोध कार्य किए जाएंगे। इसी अवसर पर अपर मुख्य सचिव अमित कुमार घोष ने 2026–27 के बजट में 100 करोड़ रुपये की सहायता से निर्माण कार्य तेज करने की घोषणा की।  मुख्य सलाहकार अवनीश कुमार अवस्थी ने बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति राज्य सरकार की प्रतिबद्धता

केएसएसएससीआई में प्रोटॉन बीम थेरेपी व क्वाटरनरी केयर सेंटर को मंजूरी

 

कैंसर इलाज को नई ऊंचाई: केएसएसएससीआई में प्रोटॉन बीम थेरेपी व क्वाटरनरी केयर सेंटर को मंजूरी

लखनऊ। प्रदेश में कैंसर उपचार को विश्वस्तरीय बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए कल्याण सिंह अति विशिष्ट कैंसर संस्थान  की 12वीं शासी निकाय बैठक में कई ऐतिहासिक निर्णय लिए गए। 18 फरवरी 2026 को लोक भवन में आयोजित बैठक में संस्थान में प्रोटॉन बीम थेरेपी, क्वाटरनरी कैंसर केयर सेंटर, टेली-रेडियोलॉजी सेवाओं, एडवांस्ड कैंसर रिसर्च सेंटर तथा पॉपुलेशन बेस्ड कैंसर रजिस्ट्री  को मंजूरी दी गई। इन फैसलों से उत्तर प्रदेश के कैंसर मरीजों को अत्याधुनिक, सटीक और सुरक्षित इलाज एक ही छत के नीचे उपलब्ध हो सकेगा।

बैठक की अध्यक्षता चेयरमैन, कल्याण सिंह कैंसर संस्थान सोसाइटी एवं मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश सरकार – शशि प्रकाश गोयल ने की। बैठक में उपाध्यक्ष, कल्याण सिंह कैंसर संस्था  सोसाइटी एवं अपर मुख्य सचिव, चिकित्सा शिक्षा विभाग – अमित कुमार घोष, विशेष सचिव, वित्त विभाग – समीर वर्मा, विशेष सचिव – रेनू तिवारी, महानिदेशक, चिकित्सा शिक्षा, उत्तर प्रदेश सरकार – डॉ. सारिका मोहन उपस्थित रहीं।

संस्थान स्तर पर निदेशक,  – प्रो. मदन लाल ब्रह्म भट्ट, कार्यपालक कुलसचिव – डॉ. आयुष लोहिया, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक – प्रो. विजेंद्र कुमार तथा चिकित्सा अधीक्षक – डॉ. वरुण विजय ने भी बैठक में भाग लिया।

बैठक में प्रोटॉन बीम थेरेपी को मंजूरी दी गई, जो कैंसर उपचार की अत्याधुनिक रेडियोथेरेपी तकनीक है। इसमें प्रोटॉन कणों की मदद से ट्यूमर को अत्यंत सटीकता से निशाना बनाया जाता है, जिससे आसपास के स्वस्थ ऊतकों को न्यूनतम नुकसान पहुंचता है। यह तकनीक विशेष रूप से बच्चों के कैंसर, मस्तिष्क, सिर-गर्दन, स्पाइनल और प्रोस्टेट जैसे संवेदनशील अंगों के ट्यूमर में अधिक लाभकारी मानी जाती है।

इसके साथ ही क्वाटरनरी कैंसर केयर सेंटर की स्थापना को स्वीकृति दी गई, जहां अत्यंत जटिल और उन्नत कैंसर उपचार के लिए अत्याधुनिक तकनीक, उच्चस्तरीय विशेषज्ञता और बहुविषयक टीम एक ही स्थान पर उपलब्ध रहेगी। रेडियोडायग्नोसिस विभाग में टेली-रेडियोलॉजी सेवाओं की अनुमति मिलने से एमआरआई, सीटी स्कैन, एक्स-रे और डिजिटल मैमोग्राफी जैसी सुविधाएं और अधिक सुलभ होंगी।

बैठक में एडवांस्ड कैंसर रिसर्च सेंटर, एडवांस्ड मॉलिक्यूलर लैब तथा सेंटर फॉर एडवांस मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक एंड रिसर्च फॉर कैंसर द्वारा की जाने वाली विभिन्न जांचों की दरों को भी मंजूरी दी गई। इससे कैंसर की शुरुआती और सटीक पहचान, पर्सनलाइज्ड उपचार, लक्षित थेरेपी, बेहतर उपचार परिणाम और कम दुष्प्रभाव सुनिश्चित होंगे।

प्रदेश में कैंसर के वास्तविक बोझ और कैंसर से होने वाली मृत्यु दर के सटीक आकलन के लिए पॉपुलेशन बेस्ड कैंसर रजिस्ट्री  को लागू करने के प्रस्ताव को भी स्वीकृति दी गई है। इससे लखनऊ सहित पूरे उत्तर प्रदेश में कैंसर नियंत्रण की रणनीतियों को वैज्ञानिक आधार मिलेगा।

मानव संसाधन और शिक्षा के क्षेत्र में भी अहम फैसले लिए गए। ऑन्को-पैथोलॉजी में पोस्ट-डॉक्टरल सर्टिफिकेट कोर्स , गायनेकोलॉजिकल ऑन्कोलॉजी और सर्जिकल ऑन्कोलॉजी में एम सी  एच पाठ्यक्रमों को मंजूरी दी गई। साथ ही विभिन्न विभागों में 31 अतिरिक्त फैकल्टी और 78 सीनियर व जूनियर रेजिडेंट पदों को स्वीकृति तथा संस्थान में पी एच डी. नियमों और रेगुलेशन को मंजूरी दी गई।

बैठक में कुल 36 एजेंडा बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा की गई। रोगी देखभाल सेवाओं के सुदृढ़ीकरण, अवसंरचना विकास, मानव संसाधन को सशक्त बनाने और समग्र कैंसर केयर सुविधाओं के विस्तार से जुड़े निर्णयों को मंजूरी दी गई, जिससे संस्थान को प्रदेश ही नहीं, देश के अग्रणी कैंसर संस्थानों में स्थापित करने की दिशा में मजबूत आधार तैयार हुआ है।

सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में चार अत्याधुनिक इमेजिंग सिस्टम का उद्घाटन

 



ट्रॉमा इमेजिंग में एसजीपीजीआई की बड़ी छलांग: एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में चार अत्याधुनिक इमेजिंग सिस्टम का उद्घाटन

मुख्य बात: अब गंभीर ट्रॉमा मरीजों का त्वरित, सटीक और निर्बाध निदान, इलाज में बचेगा कीमती समय

लखनऊ। आपातकालीन और ट्रॉमा देखभाल सेवाओं को नई गति देते हुए संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGIMS) के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में रेडियोडायग्नोसिस विभाग द्वारा चार अत्याधुनिक इमेजिंग प्रणालियों की शुरुआत की गई। इन उन्नत सुविधाओं से गंभीर रूप से घायल मरीजों के निदान, उपचार और फॉलो-अप प्रक्रिया को अधिक तेज़, सटीक और सुव्यवस्थित बनाया जा सकेगा।

नवीन प्रणालियों में पूर्णतः स्वचालित डिजिटल एक्स-रे यूनिट, उच्च-रिज़ॉल्यूशन मस्कुलोस्केलेटल इमेजिंग से युक्त आधुनिक अल्ट्रासाउंड सिस्टम, एक मोबाइल एक्स-रे यूनिट तथा कंप्यूटेड रेडियोग्राफी (सीआर) सिस्टम शामिल हैं। इन सभी का उद्घाटन संस्थान के निदेशक प्रो. आर.के. धीमन ने रेडियोडायग्नोसिस विभाग की प्रमुख प्रो. अर्चना गुप्ता और एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के प्रमुख प्रो. अरुण कुमार श्रीवास्तव चिकित्सा  अधीक्षक प्रो राजेश हर्षवर्धन की उपस्थिति में किया।

प्रो. अर्चना गुप्ता ने बताया कि नई डिजिटल एक्स-रे प्रणाली कम समय में अत्यंत स्पष्ट इमेज उपलब्ध कराती है, जिससे गंभीर ट्रॉमा मामलों में तुरंत चिकित्सकीय निर्णय लेना संभव हो सकेगा। वहीं, उन्नत अल्ट्रासाउंड मशीन नरम ऊतकों की चोट, लिगामेंट फटने, फ्रैक्चर और रिकवरी की निगरानी में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। मोबाइल एक्स-रे यूनिट उन गंभीर मरीजों के लिए विशेष लाभकारी है जिन्हें जांच के लिए स्थानांतरित करना जोखिमपूर्ण होता है।

कंप्यूटेड रेडियोग्राफी प्रणाली डिजिटल वर्कफ़्लो को मजबूत करते हुए इमेज स्टोरेज और प्रोसेसिंग को अधिक प्रभावी बनाएगी। प्रो. आर.के. धीमन ने कहा कि समय पर और सटीक इमेजिंग प्रभावी ट्रॉमा प्रबंधन की रीढ़ है। इन नई प्रणालियों से न केवल कार्यक्षमता बढ़ेगी, बल्कि मरीजों के इलाज में लगने वाला समय भी काफी कम होगा।

गौरतलब है कि एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में पहले से 128-स्लाइस सीटी स्कैनर कार्यरत है। भविष्य में एमआरआई और डिजिटल सबट्रैक्शन एंजियोग्राफी (डीएसए) जैसी उन्नत सुविधाएं जोड़ने की योजना है, जिससे एक ही छत के नीचे संपूर्ण ट्रॉमा इमेजिंग सेवाएं उपलब्ध हो