एसजीपीजीआइ में अब 'देखो और वहीं मारो' वाला कैंसर इलाज
कीमो के मुकाबले बहुत कम साइड इफेक्ट
न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग का स्थापना दिवस समारोह
एंडोक्राइन ग्लैंड के कैंसर के इलाज में अब अत्याधुनिक तकनीक थेरानोस्टिक्स से इलाज होगा। इस तकनीक में पहले कैंसर को सटीक रूप से खोजा जाता है और फिर उसी जगह पर निशाना लगाकर खत्म किया जाता है, जिससे शरीर के बाकी हिस्सों को नुकसान नहीं पहुंचता।
न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग के स्थापना दिवस पर विभाग प्रमुख प्रोफेसर पीके प्रधान ने बताया कि थेरानोस्टिक्स दो शब्दों थेरेपी और डायग्नोस्टिक्स से मिलकर बना है। इस तकनीक के पहले चरण में बहुत हल्की रेडिएशन वाली दवा डायग्नोस्टिक रेडियोट्रेसर जैसे गैलियम-68 डॉटाटेट और गैलियम-68 पीएसएमए-11 / फ्लोरीन-18 पीएसएमए-1007 नस में दी जाती है और पेट-सीटी स्कैन किया जाता है। यह दवा सिर्फ कैंसर कोशिका पर चिपकती है और स्कैन में लाइट की तरह जलने लगती है। यह दवा एक-दो घंटे में पेशाब के रास्ते बाहर निकल जाती है। अगर पहले स्कैन में लाइट आती है, मतलब कैंसर उस दवा को पकड़ रहा है, तो दूसरे चरण में उसी दवा को ताकतवर रेडिएशन वाली दवा थेरेप्यूटिक रेडियोलिगेंड जैसे ल्यूटेटियम-177 डॉटाटेट और ल्यूटेटियम-177 पीएसएमए-617 जिसका नाम प्लूविक्टो है, बनाकर दिया जाता है, जो उसी कैंसर वाली जगह पर चिपककर बीटा रेडिएशन से कोशिका को अंदर से ही जला देती है।
कीमो से कैसे अलग है
विशेषज्ञों के अनुसार कीमोथेरेपी में दवा पूरे खून में घूमती है, जिससे बाल झड़ना, लगातार उल्टी, खून की कमी, प्लेटलेट गिरना और बहुत कमजोरी आती है। थेरानोस्टिक्स में दवा सिर्फ कैंसर को टारगेट करती है, इसलिए साइड इफेक्ट न के बराबर होते हैं।
न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर क्या होता है
हमारे शरीर में न्यूरोएंडोक्राइन कोशिकाएं होती हैं जो नर्वस सिस्टम और हॉर्मोन सिस्टम दोनों का काम करती हैं। जब इन्हीं कोशिकाओं में गांठ बनने लगती है तो उसे न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर कहते हैं। यह सबसे ज्यादा आंत, पैंक्रियाज, फेफड़ों और पेट में होता। भारत में यह दर लगभग 1 लाख में 3.7 लोगों में है। जांच बेहतर होने से अब इसके मामले ज्यादा पकड़ में आ रहे हैं।




















