अल्फा थेरेपी से कैंसर के जटिल मामलों में नई उम्मीद, टारगेटेड इलाज से सामान्य कोशिकाओं को नहीं होगा नुकसान
न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग का 37वां स्थापना दिवस समारोह
जागरण संवाददाता, लखनऊ। कैंसर के जटिल और दोबारा लौटने वाले मामलों में अब न्यूक्लियर मेडिसिन की अल्फा थेरेपी नई उम्मीद बनकर उभरी है। अल्फा थेरेपी के जरिए कैंसर कोशिकाओं को चुन-चुन कर नष्ट किया जा सकता है, जबकि आसपास की सामान्य कोशिकाओं पर इसका असर न के बराबर होता है।
यह जानकारी संजय गांधी पीजीआई के न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग के सैंतीसवें स्थापना दिवस समारोह के अवसर पर आयोजित फाउंडेशन डे ऑरेशन में दी गई। मुख्य अतिथि स्विट्जरलैंड के यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल ज्यूरिख के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. मेड. अजु पझेनकोट्टिल और न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष प्रो. पी. के. प्रधान ने बताया कि थेरानोस्टिक्स के युग में अल्फा थेरेपी सबसे बड़ा ब्रेकथ्रू है।
विशेषज्ञों ने बताया कि जहां बीटा उत्सर्जक रेडियोआयोडीन या ल्यूटेटियम थेरेपी के बाद कुछ मरीजों में कैंसर रिफ्रैक्टरी हो जाता है, वहीं अल्फा उत्सर्जक आइसोटोप सीधे कैंसर कोशिका के डीएनए को डबल स्ट्रैंड ब्रेक करके नष्ट कर देते हैं। डिफरेंशिएटेड थायरॉयड कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर में पीएसएमए अल्फा थेरेपी और न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर में इसका सफल प्रयोग हो रहा है। डोजिमेट्री-गाइडेड प्लानिंग से इसे पूरी तरह प्रिसीजन हेल्थकेयर के रूप में दिया जा रहा है।
विभागाध्यक्ष प्रो. पी. के. प्रधान ने कहा कि इस वर्ष की थीम प्रिसीजन हेल्थकेयर थ्रू न्यूक्लियर मेडिसिन: इमेजिंग बायोलॉजी, ट्रीटिंग डिजीज अल्फा थेरेपी जैसे नए उपचारों के बढ़ते महत्व को दर्शाती है।
समारोह में दीप प्रज्वलन, पौधारोपण, पूर्व विभागाध्यक्षों का सम्मान तथा विभाग के पूर्व संकाय सदस्यों स्वर्गीय प्रो. बी. के. दास एवं डॉ. ए. बी. सेवाटकर का स्मरण भी किया गया।
इस अवसर पर प्रो. सुकांता बराई, प्रो. अमिताभ आर्या, प्रो. मनीष दीक्षित, न्यूक्लियर मेडिकल टेक्नोलॉजिस्ट गौरव द्विवेदी, अंकुश वैद्य सहित सभी संकाय सदस्य, रेजिडेंट, छात्र और कर्मचारी मौजूद रहे। टेक्नोलॉजिस्टों ने अल्फा थेरेपी की नई तकनीक और रेडिएशन सेफ्टी प्रोटोकॉल पर विस्तार से चर्चा की।






















