मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

खर्राटे से कमजोर हो रहे फेफड़े और दिल





खर्राटे से कमजोर हो रहे फेफड़े और दिल

नींद के दौरान खर्राटे के चलते ऑक्सीजन की कमी और बार-बार सांस रुकने से फेफड़ों पर दबाव पड़ता है, जो लंबे समय तक रहने से गंभीर हृदय रोग का कारण बन सकता है। क्या हैं इसके कारण और बचाव के उपाय, आइए जानें…

खर्राटे के चलते कुछ लोगों की रात में बार-बार नींद टूटती है। दरअसल, सोते समय नाक या मुंह के जरिए हवा का प्रवाह बाधित होने से यह समस्या होती है। खर्राटे की समस्या कभी-कभार हो या सोते समय हल्के खर्राटे आते हैं, तो यह चिंताजनक नहीं है, लेकिन यह समस्या लगातार बनी रहती है, तो चिंताजनक है। इससे नींद की गुणवत्ता खराब होती है, साथ ही अनेक बीमारियों का जोखिम भी बढ़ता है।

किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के रेस्पिरेटरी मेडिसिन, कार्डियोलॉजी एवं मानसिक रोग विभाग के एक साझा शोध में तथ्य सामने आए हैं कि खर्राटों की अनदेखी करने से स्ट्रोक, दिल का दौरा और हार्ट फेल्योर का खतरा बढ़ता है। साथ ही फेफड़ों की गंभीर बीमारी—क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) और फाइब्रोसिस का जोखिम भी तीन गुना तक बढ़ जाता है।

दरअसल, नींद में सांस रुकने से ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिरता है, जिससे रक्तचाप और दिल पर दबाव बढ़ता है। इससे फेफड़ों की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। केजीएमयू का यह शोध 26 जनवरी को वर्ल्ड जर्नल ऑफ कार्डियोलॉजी में प्रकाशित किया गया।

स्लीप एपनिया के लक्षण

जोर से खर्राटे लेना

सोते समय सांस फूलना

हल्की गतिविधि में सांस फूलना

रात में हांफकर जागना

सुबह उठने पर सिर दुखना

तेज सिर दर्द होना

सही ढंग से नींद न आना

दिन में अधिक नींद आना एवं थकान

केजीएमयू के रेस्पिरेटरी मेडिसिन, कार्डियोलॉजी एवं मानसिक रोग विभाग के साझा शोध में तथ्य आए सामने।

खर्राटे से पीड़ित 72 प्रतिशत मरीजों में पल्मोनरी हाइपरटेंशन की पुष्टि हुई, जो सीओपीडी और हार्ट फेल्योर का जोखिम कई गुना बढ़ाता है।

कितनी गंभीर है यह समस्या

भारत में लगभग 11 करोड़ से अधिक लोग निद्रा विकार—ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया (ओएसए) से पीड़ित हैं। यह गंभीर समस्या है, जिसमें मरीजों में 60 प्रतिशत पुरुष एवं 40 प्रतिशत महिलाएं हैं। खर्राटे के साथ एपनिया है, तो इससे फेफड़े और दिल कमजोर होते हैं। इससे पल्मोनरी हाइपरटेंशन (फेफड़ों की धमनियों में उच्च रक्तचाप) का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

कैसे होता है पल्मोनरी हाइपरटेंशन

शोध में शामिल लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष प्रो. अजय वर्मा के अनुसार, स्लीप एपनिया के दौरान व्यक्ति की सांस कुछ सेकंड से लेकर एक मिनट तक रुक सकती है। अध्ययन में 150 से अधिक ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया के मरीजों को शामिल किया गया, जिनमें 71.68 प्रतिशत में पल्मोनरी हाइपरटेंशन की पुष्टि हुई। यह दुर्लभ और गंभीर रोग है, जिसमें फेफड़ों की धमनियों में दबाव बहुत अधिक बढ़ जाता है। इससे हृदय को खून फेफड़ों तक पहुंचाने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है। ऐसी स्थिति में हार्ट फेल्योर का खतरा तीन गुना तक बढ़ता है।

समय पर पहचान और उपचार न होने पर ओएसए हृदय और फेफड़ों पर गंभीर दुष्प्रभाव डालता है। स्लीप एपनिया से पीड़ित व्यक्ति को डॉक्टर की सलाह पर पल्मोनरी हाइपरटेंशन की जांच जरूर करानी चाहिए।

स्लीप एपनिया को लेकर गंभीरता जरूरी

स्लीप एपनिया को लेकर लोगों में जागरूकता की कमी है। यही कारण है कि ज्यादातर मरीज लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं। यदि रोगी सही समय पर इलाज करा लें, तो समस्या गंभीर होने से रोकी जा सकती है। सबसे जरूरी है कि लक्षणों की पहचान करें। स्लीप एपनिया मुख्य रूप से नींद के दौरान गले की मांसपेशियों के अत्यधिक शिथिल होने के कारण होता है, जिससे वायुमार्ग संकुचित या बंद हो जाता है और सांस बार-बार रुकती है।

स्लीप एपनिया के मुख्य कारण

मोटापा (गर्दन की चर्बी)

शारीरिक बनावट

खराब दिनचर्या

उम्र और आनुवंशिक कारण

स्लीप एपनिया व पल्मोनरी हाइपरटेंशन से बचाव

स्लीप एपनिया से बचने के लिए स्वस्थ वजन, नियमित व्यायाम करने के साथ धूम्रपान और शराब से दूरी महत्वपूर्ण है। पीठ के बजाय करवट लेकर सोना, गले की मांसपेशियों को आराम देने वाली दवाओं से परहेज करना और सांस की नली को साफ रखने के लिए सीपीएपी मशीन का उपयोग कारगर है। सीपीएपी मशीन का प्रयोग स्लीप एपनिया के इलाज और इसके दुष्प्रभाव से होने वाले पल्मोनरी हाइपरटेंशन को कम करने में सबसे प्रभावी माना जाता है। हाइपोथायरॉइड या दंत उपचार भी मदद कर सकता है।

डॉ. प्रो. सुशीलांत

रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग, केजीएमयू

प्रो. अजय वर्मा

रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग, लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान

दैनिक जागरण के मुख्य मेडिकल संवाददाता की रिपोर्ट : विकास मिश्रा, लखनऊ


नया संकट: 0% टैरिफ और FTA (2025–26) अब सरकार अमेरिका सहित कई देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट और कृषि आयात पर शून्य या न्यूनतम टैरिफ की दिशा में बढ़ रही है। इसका सीधा असर: सस्ते विदेशी सेब, बादाम, मक्का, सोयाबीन भारतीय बाजार में घरेलू फसलों के दाम गिरेंगे लागत भी न निकलने पर किसान खेती छोड़ने को मजबूर होगा निष्कर्ष: संयोग नहीं, नीति का पैटर्न पिछले बारह वर्षों में नीतियों का एक स्पष्ट पैटर्न उभरता है— जमीन अधिग्रहण में कॉरपोरेट प्राथमिकता खेती की लागत बढ़ाने वाले फैसले मंडी और एमएसपी को कमजोर करना वास्तविक निवेश की जगह प्रतीकात्मक नकद सहायता और अब विदेशी कृषि उत्पादों के लिए बाजार खोलना

 





आय दोगुनी’ या  ‘कर्ज तिगुना’ 

: नीतियों के एक दशक में किसान कैसे बर्बादी की ओर धकेला गया


“जय किसान” के नारों, विज्ञापनों में मुस्कुराते चेहरों और मंचों से किए गए वादों के बीच पिछले बारह वर्षों में भारतीय किसान की वास्तविक स्थिति क्या बदली—यह सवाल आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है।

2014 से 2026 के बीच केंद्र सरकार द्वारा लिए गए नीतिगत फैसलों की कड़ी को जोड़कर देखें, तो एक ऐसी तस्वीर उभरती है जिसमें किसान की आय दोगुनी होने के बजाय कर्ज, लागत और अनिश्चितता तीन गुना बढ़ती दिखाई देती है। अब  एफ टी ए से किसान और परेशान होगा। 

भूमि से शुरुआत: 2015 का भूमि अधिग्रहण संशोधन प्रयास

2013 के भूमि अधिग्रहण कानून में किसान की सहमति और सामाजिक प्रभाव आकलन (Social Impact Assessment) जैसी सुरक्षा शर्तें शामिल थीं।

2015 में केंद्र सरकार ने अध्यादेश के ज़रिये इन प्रावधानों को शिथिल करने की कोशिश की, ताकि औद्योगिक और कॉरपोरेट परियोजनाओं के लिए ज़मीन अधिग्रहण आसान हो सके।

देशभर में किसान आंदोलनों के बाद सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े, लेकिन इस प्रकरण ने यह स्पष्ट कर दिया कि नीति-निर्माण में किसान नहीं, निवेश की सुविधा प्राथमिकता में है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रहार: नोटबंदी और जीएसटी

नोटबंदी (2016)

खेती एक नकद आधारित अर्थव्यवस्था है। बुवाई, बीज, खाद, कीटनाशक और मजदूरी—सब कुछ नकद पर निर्भर।

नोटबंदी के दौरान किसान फसल छोड़कर बैंकों की कतारों में खड़ा मिला। कई अध्ययनों (आरबीआई, ग्रामीण विकास मंत्रालय से जुड़े शोध) में स्वीकार किया गया कि ग्रामीण क्षेत्रों में नकदी संकट सबसे गहरा रहा।

जीएसटी (2017)

खेती से जुड़े ट्रैक्टर पार्ट्स, पाइप, पंप, स्प्रे मशीन, कीटनाशक और पैकेजिंग सामग्री जीएसटी के दायरे में आ गई।

वहीं, एमएसपी में बढ़ोतरी औसतन 3–5% सालाना रही, जबकि डीजल, खाद और कीटनाशकों की लागत 30–80% तक बढ़ी।

आपदा में सुधार या अवसर?: 2020 के तीन कृषि कानून

कोरोना लॉकडाउन के दौरान संसद में सीमित बहस के बीच तीन कृषि कानून लागू किए गए।

सरकार ने इन्हें “सुधार” बताया, लेकिन किसान संगठनों का कहना था कि इन कानूनों से:

मंडी व्यवस्था कमजोर होगी

एमएसपी की कानूनी गारंटी समाप्त हो जाएगी

खेती कॉरपोरेट नियंत्रण में चली जाएगी

दिल्ली की सीमाओं पर एक साल से अधिक चला किसान आंदोलन, जिसमें 700 से अधिक किसानों की मृत्यु हुई (संयुक्त किसान मोर्चा के आंकड़े)।

नवंबर 2021 में कानून वापस लेने पड़े, लेकिन किसान और सरकार के बीच भरोसे की दरार स्थायी हो गई।

: ₹6000 की ‘राहत’ या छलावा

2019 में शुरू की गई प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत सालाना ₹6000 की सहायता दी जाती है।

विशेषज्ञों के अनुसार:

यह राशि मासिक ₹500 से भी कम बैठती है

कृषि बजट में इस योजना को जोड़कर कुल खर्च बढ़ा हुआ दिखाया जाता है

यदि इस कैश ट्रांसफर को अलग कर दें, तो:

सिंचाई, कृषि अनुसंधान, भंडारण और मंडी ढांचे पर वास्तविक खर्च में गिरावट देखी गई है

खाद सब्सिडी घटने और डीजल महंगा होने से किसान की जेब से ₹15–20 हजार सालाना अतिरिक्त निकल रहा है

फसल बीमा या बीमा कंपनियों का सुरक्षा कवच?

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टों में भी सवाल उठे हैं।

मुख्य समस्याएं:

प्रीमियम समय पर कटता है

क्लेम में महीनों की देरी

तकनीकी आधार पर भुगतान रोका जाता है

कई राज्यों में बीमा कंपनियों का मुनाफा हजारों करोड़, जबकि किसानों को वास्तविक नुकसान का छोटा हिस्सा ही मिला।

नया संकट: 0% टैरिफ और FTA (2025–26)

अब सरकार अमेरिका सहित कई देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट और कृषि आयात पर शून्य या न्यूनतम टैरिफ की दिशा में बढ़ रही है।

इसका सीधा असर:

सस्ते विदेशी सेब, बादाम, मक्का, सोयाबीन भारतीय बाजार में

घरेलू फसलों के दाम गिरेंगे

लागत भी न निकलने पर किसान खेती छोड़ने को मजबूर होगा

निष्कर्ष: संयोग नहीं, नीति का पैटर्न

पिछले बारह वर्षों में नीतियों का एक स्पष्ट पैटर्न उभरता है—

जमीन अधिग्रहण में कॉरपोरेट प्राथमिकता

खेती की लागत बढ़ाने वाले फैसले

मंडी और एमएसपी को कमजोर करना

वास्तविक निवेश की जगह प्रतीकात्मक नकद सहायता

और अब विदेशी कृषि उत्पादों के लिए बाजार खोलना

परिणाम यह है कि आज़ादी के बाद किसान सबसे अधिक कर्जदार स्थिति में है (NSSO व NABARD सर्वे संकेत)।


सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

मैरिड के मुकाबले अनमैरिड लड़कियां दस गुना ज़्यादा

 




मैरिड के मुकाबले अनमैरिड लड़कियां दस गुना ज़्यादा



वेलेंटाइन डे के बाद इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव पिल यानी इमरजेंसी गर्भनिरोधक गोली को लेकर सोशल मीडिया पर अक्सर यह दावा किया जाता है कि बड़ी संख्या में अनमैरिड लड़कियां इसका इस्तेमाल कर रही हैं। लेकिन जब इस दावे को वैज्ञानिक रिसर्च और मेडिकल जर्नल्स के डेटा से परखा जाता है, तो तस्वीर काफी अलग सामने आती है।

रिसर्च क्या बताती है?

भारत में इमरजेंसी पिल के इस्तेमाल को लेकर इंडियन जर्नल ऑफ पब्लिक हेल्थ और जर्नल ऑफ फैमिली मेडिसिन एंड प्राइमरी केयर में प्रकाशित शोधों के अनुसार—

करीब 5 से 6 फ़ीसदी अनमैरिड लड़कियों ने ही कभी इमरजेंसी पिल का इस्तेमाल किया है

जबकि मैरिड महिलाओं में यह आंकड़ा 0.4 से 1 फ़ीसदी के बीच पाया गया

यानी प्रतिशत के लिहाज से देखें तो अनमैरिड लड़कियों में इस्तेमाल मैरिड महिलाओं की तुलना में लगभग दस गुना अधिक है, लेकिन इसके बावजूद यह संख्या कुल मिलाकर बेहद सीमित है।

डेटा कहां से आया?

यह निष्कर्ष देश के अलग-अलग हिस्सों में किए गए—

अस्पताल आधारित सर्वे

शहरी क्षेत्रों में किए गए कम्युनिटी स्टडी

और 2001 से 2017 के बीच प्रकाशित 33 रिसर्च स्टडी के मेटा एनालिसिस

पर आधारित है।

इन अध्ययनों में गायनेकोलॉजी ओपीडी में आने वाली महिलाओं, शहरी कामकाजी युवतियों और कॉलेज उम्र की लड़कियों को शामिल किया गया।

तो ज्यादा क्यों दिखता है अनमैरिड में?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, इसका कारण दवा नहीं बल्कि परिस्थिति है।

मैरिड महिलाएं आमतौर पर रेगुलर गर्भनिरोधक तरीकों का इस्तेमाल करती हैं

जबकि अनमैरिड युवतियों में डर, गोपनीयता और सामाजिक दबाव के कारण इमरजेंसी पिल का सहारा लिया जाता है

डॉक्टरों का कहना है कि यह उपयोग भी नियमित नहीं बल्कि आपात स्थिति में ही होता है।

कैंसर और बांझपन के दावे कितने सही?

मेडिकल रिसर्च साफ कहती है—

इमरजेंसी पिल से कैंसर या स्थायी बांझपन होने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है

लेकिन बार-बार और बिना डॉक्टर की सलाह इसके सेवन से हार्मोनल असंतुलन, पीरियड्स की गड़बड़ी और अत्यधिक ब्लीडिंग जैसी समस्याएं हो सकती हैं

यही वजह है कि इसे नियमित गर्भनिरोधक विकल्प नहीं माना जाता।

असल चिंता की वजह क्या है?

विशेषज्ञ मानते हैं कि असली समस्या है—

सेक्स एजुकेशन की कमी

माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद का अभाव

और सोशल मीडिया पर फैल रही अधूरी व डर पैदा करने वाली जानकारी

डर के माहौल में कई युवा बिना डॉक्टर से पूछे मेडिकल स्टोर से सीधे दवा ले लेते हैं।

सरकारी प्रयास और सामाजिक जिम्मेदारी

जननी सुरक्षा योजना, मातृत्व स्वास्थ्य कार्यक्रम और बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाओं का उद्देश्य महिलाओं और किशोरियों को सुरक्षित व जागरूक बनाना है।

लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक समाज में यौन स्वास्थ्य पर खुली और तथ्यपरक बातचीत नहीं होगी, तब तक अफवाहें हावी रहेंगी।

डॉक्टरों की साफ सलाह

इमरजेंसी पिल को आदत न बनाएं

बिना डॉक्टर की सलाह हार्मोनल दवा न लें

सुरक्षित संबंध और सही गर्भनिरोधक तरीकों की जानकारी लें

सोशल मीडिया की अफवाहों के बजाय मेडिकल रिसर्च और डॉक्टरों की सलाह पर भरोसा करें



रिसर्च यह साफ दिखाती है कि—

✔ अनमैरिड लड़कियों में इमरजेंसी पिल का उपयोग मैरिड महिलाओं से अधिक है

✔ लेकिन कुल मिलाकर यह 10 फ़ीसदी से भी कम है

✔ “हर लड़की ले रही है” जैसा दावा वैज्ञानिक रूप से गलत है

समस्या दवा की नहीं, बल्कि जानकारी की कमी और डर के माहौल की है—और इसका समाधान शिक्षा, संवाद और सही मेडिकल सलाह में ही छिपा है।

रविवार, 8 फ़रवरी 2026

UGC के विरोध में जुटे सामान्य वर्ग के लोग**

 

यू जी सी के विरोध में जुटे सामान्य वर्ग के लोग** 



 आशियाना सेक्टर, एच, स्थित पानी की टंकी पार्क में सामान्य  वर्ग के साथियों द्वारा यूजीसी काले कानून के वापसी के लिए बहुत ही रोष व्यक्त  किया गया और मीटिंग के   दौरान अनेक  साथियों ने यूजीसी काले कानून के लिए अपने विचारों  को रखा, और कहा कि जब तक सरकार यूजीसी काला कानून वापस नहीं लेती या खत्म नहीं करती, तब तक ऐसे ही आयोजन/मीटिंग होती रहेंगी, यदि सरकार पुनः सत्ता में आना चाहती है तो इस यूजीसी कानून को वापस ले,वरना सवर्ण समाज  बीजेपी की सरकार को उखाड़ फेंकने का भी काम करेगी,यह सवाल मेरा नहीं है यह सवाल है हमारी आगे आने वाली पीढियों का,हम अपने ऊपर हुए जुल्मों को तो एक बार सह लेंगे पर अपने बच्चों पर यह थोपा हुआ यूजीसी काला कानून हम कभी भी बर्दाश्त नहीं करेंगे।

कार्यक्रम में उपस्थित हम सबके वरिष्ठ अभिभावक आदरणीय शैलेन्द्र दुबे जी

ने सरकार  द्वारा लाया गया काला कानून यूजीसी बिल की घोर निंदा की और इसे अन्याय पूर्ण बतलाया ,यह बिल जो समाज को बिखंडित करने का कार्य करेगा/कर रहा है।

   परन्तु इस बिल के खिलाफ सत्ता में बैठे लोग चुप है,आने वाले समय में हम सब सवर्ण साथी उनको इस चुप्पी की याद दिलाएंगे और इनका अपने समाज से बहिष्कार करेंगे।


सभी वक्ताओ ने कहा कि  सवर्ण समाज ने ही आज बीजेपी को सत्ता दिलाने का कार्य किया और बीजेपी ने सवर्ण समाज की पीठ में छुरा घोपने का कार्य किया है।

     इसे हमारा  सवर्ण समाज कभी भी  स्वीकार नहीं करेगा। 

  सी पी अवस्थी जी ने लम्बी लड़ाई की चेतावनी दी... और कहा की अपने बच्चों को यूजीसी के जाल से बचाना हैं तो सवर्ण समाज को एकजुट होकर आगे आना होगा... 

   शिखर त्रिवेदी जी यूजीसी बिल वापस कराने के लिए घर से लेकर सड़क और संसद तक कंधे से कंधा मिलाकर साथ देने की बात कही।

   हमारे दुर्गेश पाण्डेय जी ने कहा कि हम किसी भी कीमत पर यह काला कानून बर्दाश्त नही करेंगे ,हम इसके खिलाफ लड़ेंगे और जीतेंगे भी आप सभी का साथ चाहिए,सवर्ण समाज ने बहुत बड़ी बड़ी लड़ाई लड़ी और जीती।

  अजय त्रिपाठी (मुन्ना) जी जो समाज में हमेशा काम से जाने जाते है ,उन्होंने भी यूजीसी काले कानून का विरोध किया और संपूर्ण समर्थन देने की बात कही।

   अनूप शुक्ला जी, राज कुमार शुक्ला जी, सुरेश बाजपेई जी, प्रखर त्रिवेदी जी,विजय जी, शैल पाण्डेय जी, अनिल दुबे जी,विजय अवस्थी जी, गिरिजा शंकर त्रिपाठी जी, प्रतिभा मिश्रा जी,ललित मिश्रा जी, मधुर झा जी,अजय लक्ष्मी पाण्डेय जी,आदि वक्ताओं ने यूजीसी काले कानून पर अपने विचार रखे।

         

   कार्यक्रम के आयोजक  एस एन पाण्डेय जी और अखिल भारतीय ब्रह्म समाज  देवेन्द्र कुमार शुक्ला जी.. ने कहा कि 

    सभी सम्मानित सवर्ण साथियों  आप लोग इस यूजीसी काले कानून का  विरोध करो जैसे भी कर पाओ, चाहे वह सोशल मीडिया हो,या समाज में बैठ कर मीटिंग करके , जहां भी अपने समाज की चर्चा चल रही हो वहां पर अपने विचारों को रखे। 

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

हर 10 में 7 मरीज मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस से ग्रस्त, एंटीबायोटिक बेअसर होती जा रहीं

 





हर 10 में 7 मरीज मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस से ग्रस्त, एंटीबायोटिक बेअसर होती जा रहीं


एक वर्ष में एक व्यक्ति लगभग 12  एंटीबायोटिक गोलियों का करता है  सेवन 


कुमार संजय


एंटीबायोटिक के अंधाधुंध और गैर-ज़रूरी इस्तेमाल ने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। संजय गांधी पीजीआई सहित प्रमुख सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों में आने वाले हर 10 में से 7 मरीजों में सामान्य एंटीबायोटिक दवाएं असर नहीं कर रही हैं। इन मरीजों में मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस (एमडीआई) की स्थिति स्पष्ट रूप से देखी जा रही है।


 संस्थान के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के प्रो. चिन्मय साहू के अनुसार, विभाग में कल्चर एवं सेंसिटिविटी जांच के लिए प्राप्त एक हजार से अधिक मरीजों के नमूनों के विश्लेषण में यह सामने आया कि करीब 70 प्रतिशत मरीज पहले से ही मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस से ग्रस्त हैं। इन मरीजों में आमतौर पर इस्तेमाल की जाने वाली एंटीबायोटिक दवाएं जैसे एजिथ्रोमाइसिन, सिपलॉक्स.  क्लैवुलनेट और एमोक्सिलिन प्रभावी नहीं रह गई हैं।


 


प्रो. साहू ने वर्ल्ड एंटीबायोटिक कंजम्पशन रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि भारत में एक व्यक्ति औसतन एक वर्ष में लगभग विभिन्न तरह के 12 एंटीबायोटिक गोलियों का सेवन कर लेता है, जबकि इनमें से 75 से 80 प्रतिशत मामलों में इन दवाओं की कोई चिकित्सकीय आवश्यकता नहीं होती। उन्होंने कहा कि सबसे अधिक एंटीबायोटिक का उपयोग श्वसन तंत्र संक्रमण—जैसे सर्दी, खांसी और गले की खराश—में किया जा रहा है, जो अधिकतर वायरल होते हैं। इसके बाद बुखार के मामलों में एंटीबायोटिक का बेवजह सेवन आम बात बन चुका है।


 


उन्होंने बताया कि स्थिति इसलिए और गंभीर हो रही है क्योंकि केवल 30 प्रतिशत मरीजों में ही लैब जांच या माइक्रोबायोलॉजिकल पुष्टि के बाद निश्चित (डिफिनिटिव) एंटीबायोटिक थेरेपी दी जाती है। शेष 70 प्रतिशत मामलों में अनुमान के आधार पर एंटीबायोटिक शुरू कर दी जाती है, जिससे बैक्टीरिया तेजी से दवाओं के प्रति प्रतिरोधी बन रहे हैं।


 कल्चर  जांच को हो विस्तार


प्रो. चिन्मय साहू के अनुसार, यदि एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस की इस चुनौती से निपटना है, तो माइक्रोबायोलॉजिकल जांच, विशेषकर कल्चर सेंसिटिविटी जांच की सुविधाओं का बड़े पैमाने पर विस्तार अनिवार्य है। जिस तरह पैथोलॉजिकल जांच आज इलाज का अनिवार्य हिस्सा बन चुकी है, उसी तरह माइक्रोबायोलॉजिकल पुष्टि के बाद ही एंटीबायोटिक शुरू करने की नीति को सख्ती से लागू करना होगा।



















पीजीआई के प्लास्टिक सर्जन ने प्रोफेशनल लॉन टेनिस में रचा इतिहास

 




सर्जरी के बाद रैकेट उठा पीजीआई के प्लास्टिक सर्जन ने प्रोफेशनल लॉन टेनिस में रचा इतिहास



दिन में ऑपरेशन थिएटर में जटिल सर्जरी, और शाम को टेनिस कोर्ट पर तेज





 संजय गांधी पीजीआई  के प्लास्टिक सर्जरी विभाग के हेड प्रो. राजीव अग्रवाल ने यह साबित कर दिया कि अगर संकल्प और समय-प्रबंधन हो, तो इंसान एक नहीं, कई ऊंचाइयों को छू सकता है।

रायबरेली की ए. गोल्डस्मिथ टेनिस अकादमी में 31 जनवरी से 4 फरवरी 2026 तक आयोजित इंटरनेशनल टेनिस फेडरेशन  टूर्नामेंट में प्रो अग्रवाल ने मेन्स डबल्स 50 प्लस कैटेगरी में शानदार प्रदर्शन करते हुए ट्रॉफी अपने नाम की। यह जीत सिर्फ एक खेल उपलब्धि नहीं, बल्कि उन हजारों मरीजों के लिए प्रेरणा है जिनकी जिंदगी वे हर दिन अपने हाथों से संवारते हैं।

 सर्जरी के बाद उनकी दुनिया यहीं खत्म नहीं होती। पिछले 30 वर्षों से लॉन टेनिस उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा है। वेजिमखाना क्लब के सक्रिय सदस्य हैं और दशकों से राज्य व राष्ट्रीय स्तर के टूर्नामेंट में भाग लेते आ रहे हैं। प्रो अग्रवाल एक आई टी एफ -रजिस्टर्ड प्रोफेशनल टेनिस खिलाड़ी  हैं और नियमित रूप से अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत होने वाले मैचों में हिस्सा लेते हैं।

इस टूर्नामेंट में देशभर से 100 से अधिक खिलाड़ियों ने भाग लिया, जिनमें कनाडा और बेल्जियम के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी भी शामिल थे। मेन्स डबल्स कैटेगरी में प्रो. राजीव अग्रवाल ने हिमाचल प्रदेश के प्रोफेशनल खिलाड़ी  हरिंदर पंवार के साथ जोड़ी बनाई। दोनों ने कई शीर्ष खिलाड़ियों को हराते हुए फाइनल तक का सफर तय किया और कड़े मुकाबले में उपविजेता रहे।

 प्रो राजीव अग्रवाल की यह उपलब्धि बताती है कि डॉक्टर सिर्फ ऑपरेशन थिएटर के ही नहीं, मैदान के भी हीरो हो सकते हैं—बस जुनून जिंदा होना चाहिए।

दो घंटे में लगेगा सेप्सिस का सटीक पता, सही एंटीबायोटिक तय होगी

 





पीजीआई यूपी-यूके माइक्रोकॉन

दो घंटे में लगेगा सेप्सिस का सटीक पता, सही एंटीबायोटिक तय होगी

 



सेप्सिस जैसी जानलेवा स्थिति में समय पर सही इलाज तय करना सबसे बड़ी चुनौती होती है। इसी दिशा में संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एसजीपीजीआई) ने बड़ी पहल की है। पीजीआई के माइक्रोबायोलॉजी विभाग द्वारा उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के माइक्रोबायोलॉजिस्ट को आधुनिक तकनीकों से लैस करने के उद्देश्य से यूपी-यूके माइक्रोकॉन कार्यशाला का आयोजन किया गया है। इस कार्यशाला में दोनों राज्यों से 120 से अधिक माइक्रोबायोलॉजिस्ट भाग ले रहे हैं।

कार्यशाला के आयोजक प्रोफेसर चिन्मय साहू और माइक्रोबायोलॉजी विभाग की प्रमुख प्रोफेसर रूंगमई एसके मारक ने बताया कि सेप्सिस के मरीजों में शुरुआती कुछ घंटे “गोल्डन आवर” माने जाते हैं। यदि इसी दौरान सही एंटीबायोटिक शुरू हो जाए तो मरीज की जान बचने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।

उन्होंने बताया कि अब तक माल्टी- टॉफ़ तकनीक के माध्यम से 6 से 7 घंटे में यह पता लगाया जा सकता था कि किस मरीज में कौन-सी एंटीबायोटिक प्रभावी होगी। इस तकनीक से पहले ही सेप्सिस के कई मरीजों को लाभ मिल रहा था। लेकिन पीजीआई ने इससे भी एक कदम आगे बढ़ते हुए एक नई और उन्नत तकनीक स्थापित की है।

नई तकनीक के तहत मरीज के रक्त में एक विशेष रसायन मिलाया जाता है, जिससे रक्त से प्रोटीन को अलग किया जाता है। इसके बाद मात्र दो घंटे के भीतर यह स्पष्ट हो जाता है कि सेप्सिस पैदा करने वाले जीवाणु पर कौन-सी एंटीबायोटिक सबसे प्रभावी रहेगी। इससे डॉक्टर बहुत तेजी से सही इलाज की दिशा तय कर सकेंगे।

विशेषज्ञों के अनुसार, सेप्सिस में देरी से दी गई गलत या कम प्रभावी एंटीबायोटिक मरीज की हालत को और बिगाड़ सकती है। ऐसे में दो घंटे में सटीक जानकारी मिलना उपचार की दिशा में क्रांतिकारी बदलाव माना जा रहा है।

कार्यशाला में प्रतिभागियों को इस नई तकनीक का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है, ताकि वे अपने-अपने संस्थानों में इसे लागू कर सकें। प्रो. मारक ने कहा कि पीजीआई का उद्देश्य केवल अपने संस्थान तक सीमित रहना नहीं है, बल्कि प्रदेश और पड़ोसी राज्यों में भी सेप्सिस प्रबंधन को मजबूत करना है।

चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक के व्यापक उपयोग से सेप्सिस से होने वाली मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है और एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस जैसी गंभीर समस्या पर भी प्रभावी नियंत्रण संभव होगा।

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

केन्द्रीय विद्यालय एस.जी.पी.जी.आई. लखनऊ में परीक्षा पे चर्चा का सीधा प्रसारण



केन्द्रीय विद्यालय एस.जी.पी.जी.आई. लखनऊ में परीक्षा पे चर्चा का सीधा प्रसारण

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संदेशों से विद्यार्थियों में दिखा उत्साह और आत्मविश्वास

लखनऊ। केन्द्रीय विद्यालय, एस.जी.पी.जी.आई. प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी द्वारा आयोजित “परीक्षा पे चर्चा” के नवें सत्र का सीधा प्रसारण अत्यंत सुव्यवस्थित एवं सफलतापूर्वक किया गया। कार्यक्रम का आयोजन आज दिनांक 06 फरवरी 2026 को विद्यालय परिसर में किया गया।

इस अवसर पर विद्यालय में बड़ी एल.ई.डी. स्क्रीन की व्यवस्था की गई, ताकि विद्यालय के सभी विद्यार्थी, अभिभावक एवं शिक्षक एक साथ कार्यक्रम का लाभ प्राप्त कर सकें। कार्यक्रम का सीधा प्रसारण प्रातः ठीक 10:00 बजे आरंभ हुआ।

नई दिल्ली स्थित अपने आधिकारिक आवास से प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी ने देश के विभिन्न राज्यों से आए विद्यार्थियों से अत्यंत रोचक, सहज एवं प्रेरक अंदाज़ में संवाद किया। उन्होंने परीक्षा के तनाव से मुक्ति, परीक्षा को उत्सव की तरह लेने, जीवन में अनुशासन, सकारात्मक सोच, आत्मविश्वास, समय प्रबंधन तथा उच्च नैतिक मूल्यों के महत्व पर विस्तार से चर्चा की। प्रधानमंत्री  के संवाद को विद्यार्थियों ने पूरे मनोयोग और एकाग्रता के साथ सुना।

कार्यक्रम के दौरान विद्यालय के 529 विद्यार्थियों, 16 अभिभावकों तथा 28 स्टाफ सदस्यों ने सक्रिय सहभागिता की। कार्यक्रम ने विद्यार्थियों में न केवल परीक्षा को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित किया, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन और सर्वांगीण विकास का संदेश भी दिया।

विद्यालय के प्रभारी प्राचार्य डॉ. कौशलेन्द्र सिंह ने कार्यक्रम के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि,

“आज के समय में बच्चों के शैक्षिक विकास के साथ-साथ उनके संस्कारों एवं नैतिक मूल्यों का विकास अत्यंत आवश्यक है। मूल्यों का विकास तभी संभव है जब हम बच्चों को व्यवहारिक रूप से सिखाएँ। किसी भी कार्य को बिना तनाव के करने से उसकी गुणवत्ता स्वतः बढ़ जाती है। हमारी आने वाली पीढ़ी तभी उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर सकेगी, जब वे सशक्त एवं संस्कारवान नागरिक बनेंगे। इस दिशा में माननीय प्रधानमंत्री आदरणीय श्री नरेन्द्र मोदी जी का यह प्रयास अत्यंत सार्थक, सकारात्मक, सराहनीय एवं अनुकरणीय है।”

कार्यक्रम के सुगम एवं सफल आयोजन में कार्यक्रम संयोजक एवं विद्यालय के सी.सी.ए. प्रभारी  शोएब इस्लाम की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसके अतिरिक्त  वरुण कुमार,  फराजुल हसन, डॉ. नलिनी श्रीवास्तव,  उषा यादव, नंदनी गौतम, प्रतिमा शर्मा, ज्योति मिश्रा, संगीता सहित अन्य शिक्षकों का भी विशेष योगदान रहा।

विद्यालय परिवार ने प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी के इस प्रेरणादायी कार्यक्रम के लिए आभार व्यक्त करते हुए इसे विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

बजट’ — स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए





 ‘बजट’ — स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए निराशाजनक

एक बहुत वरिष्ठ नागरिक के विचार

— प्रो सीता नायक देश कीजानी मनी इम्यूनोलॉजिस्ट है संजय गांधी पीजीआई के स्थापना में और विकसित करने में अहम भूमिका निभा चुकी हैं

‘बजट डे’ आज के भारत में ‘मध्यम वर्ग’ के परिवारों के लिए एक बड़ा दिन होता है। टीवी पर इसका लाइव प्रसारण ठीक वैसे ही चलता है जैसे भारत का कोई टी-20 मैच। शायद यह मान लेना गलत नहीं होगा कि बहुत-बहुत कम दर्शक देश के वित्तीय प्रबंधन की बारीकियों या यहाँ तक कि उसके व्यापक ढांचे को भी समझते हैं। कान पूरी तरह सतर्क रहते हैं तो केवल एक हिस्से के लिए— व्यक्तिगत आयकर।

हमेशा ऐसा नहीं था। अपने किशोरावस्था के दिनों को याद करती हूँ, जब मेरे चाचा वित्त सचिव थे और श्री टी.टी. कृष्णमाचारी वित्त मंत्री थे तथा हमारे पारिवारिक मित्र भी। तब ‘बजट’ शब्द तक हम शायद ही सुनते थे। ‘बजट डे’ पर भी पूरे दिन की खबरें हमें रात 9 बजे ‘ऑल इंडिया रेडियो’ से केवल 15 मिनट में मिल जाती थीं। बाद के वर्षों में शेयर बाजार में रुचि रखने वाले लोग बजट प्रस्तुति के अगले दिन अखबारों को देखते थे, यह जानने के लिए कि उनकी वित्तीय स्थिति पर इसका क्या असर पड़ेगा। उदारीकरण से पहले के भारत में वेतन कम थे और बचत या निवेश को लेकर हम ज्यादा नहीं सोचते थे। हमारे लिए ‘बाजार’ बस स्थानीय बाजार हुआ करता था।

बदलते समय में बजट और स्वास्थ्य पर अपेक्षाएँ

दूरदर्शन के शुरुआती वर्षों में बजट को कितनी कवरेज मिलती थी, यह मुझे ठीक-ठीक याद नहीं है, क्योंकि हमारे घर में टीवी 1980 के दशक के उत्तरार्ध में आया। 1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण और टीवी देखने की बढ़ती आदत के साथ बजट प्रस्तुतियाँ ज्यादा लोकप्रिय हो गईं। मुझे नहीं पता कि ‘लाइव प्रसारण’ कब एक चलन बना। समय के साथ आय बढ़ी और हर तरह की चीजों तक पहुँच आसान होती गई। ‘खर्च करने की संस्कृति’ के बीज पड़ गए और हर कोई यह देखने लगा कि वित्त मंत्री उसके लिए क्या खास लेकर आए हैं। हाँ, यह लगभग एक निजी रिश्ता बन गया है… और जब से हमारे पास एक ‘महिला’ वित्त मंत्री हैं, मुझे लगता है कि उनकी साड़ी का रंग भी खबर बन जाता है।

मुझे अर्थशास्त्र की गहरी समझ नहीं है और वेतन, आयकर, बचत आदि में भी मेरा निवेश सीमित ही रहा है। जब व्यक्तिगत आयकर की दरें बढ़ती थीं तो सहकर्मियों में कानाफूसी सुनाई देती थी, और हाल के वर्षों में कटौती की उम्मीदें। लेकिन बजट का एक ही हिस्सा है, जिस पर मेरी नजर हमेशा रहती है— स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए आवंटन।

सरकार की मंशा हमेशा अच्छी रही है और राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (2017) का उद्देश्य 2025 तक सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को GDP के 2.5% तक ले जाना था। 2004-14 की अवधि में यह लगभग 1% था, जो हाल के वर्षों में बढ़कर करीब 2% तक पहुँचा है। मौजूदा बजट भी इससे अलग नहीं है।

हमने कई क्षेत्रों में, विशेषकर स्वास्थ्य में, लंबा सफर तय किया है। आज सर्वोत्तम और नवीनतम उपचार उपलब्ध हैं। हमारे पास ऐसे अत्यंत कुशल पेशेवर हैं, जो दुनिया में कहीं भी किसी से कम नहीं। 1980 के दशक के मध्य में जब मेरे पिता को ओपन हार्ट सर्जरी की आवश्यकता पड़ी थी, तब इस तरह की सर्जरी की संख्या दो अंकों में ही होती थी। आज यह सुविधा टियर-2 और टियर-3 शहरों में भी उपलब्ध है। बजट में इसे दर्शाया भी गया है और मेडिकल टूरिज्म को राजस्व के स्रोत के रूप में बढ़ावा देने की बात कही गई है।

लेकिन सच्चाई यह है कि सभी भारतीयों के लिए स्वास्थ्य की बुनियादी आवश्यकता को बिना कहीं अधिक गंभीर प्रतिबद्धता के पूरा नहीं किया जा सकता। और जब ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य हासिल होगा, तब भी यह जरूरी नहीं कि वह एक स्वस्थ भारत होगा। इसलिए, मेरे लिए यह बजट एक बार फिर निराशाजनक ही रहा है।

एक अलग बात— चीन अपने GDP का लगभग 6–7 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च करता है।

“चीनी छोड़ने से नहीं भागेगा कैंसर

 


चीनी छोड़ दो, कैंसर भाग जाएगा?”

सोशल मीडिया और क्रिकेटर  के दावे पर लखनऊ के डॉक्टरों की चेतावनी — इलाज का नहीं, सिर्फ सहायक उपाय हो सकता है उपवास

 दावा भ्रामक, इलाज सिर्फ डॉक्टरों की निगरानी में संभव

 

 

 

 

लखनऊ

हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर तेजी से एक दावा वायरल हो रहा है — "चीनी बंद कर दो, कैंसर खुद खत्म हो जाएगा।" इस संदेश को और बल मिला जब पूर्व क्रिकेटर  ने एक सार्वजनिक मंच पर कहा कि उनकी पत्नी ने कैंसर से लड़ाई के दौरान चीनी, कार्बोहाइड्रेट छोड़कर, नीम, हल्दी और उपवास को अपनाया और इससे उन्हें लाभ मिला।

इन बयानों और वायरल संदेशों ने कई कैंसर रोगियों और उनके परिवारों के बीच भ्रम पैदा कर दिया है। ऐसे में लखनऊ स्थित एरा मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने एक वैज्ञानिक शोध पत्र रिव्यू आर्टिकल जरिए इस दावे की सच्चाई सामने रखी है।

लखनऊ के डॉक्टरों का साफ कहना है कि उपवास या डाइट में बदलाव कुछ हद तक सहायक हो सकता है, लेकिन कैंसर के इलाज का विकल्प नहीं हो सकता।

कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का इलाज सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी और इम्यूनोथेरेपी जैसे वैज्ञानिक पद्धतियों से ही संभव है।

मरीजों और उनके परिजनों को सलाह दी गई है कि सोशल मीडिया या सेलिब्रिटी के अनुभवों के आधार पर चिकित्सा निर्णय न लें और किसी भी बदलाव से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें।

 

 

 

 

वैज्ञानिक शोध क्या कहता है?

 

एरा मेडिकल कॉलेज, लखनऊ और रूस, स्लोवाकिया व इराक के विशेषज्ञों द्वारा किया गया यह शोध अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल “क्योरस” (Cureus) में मार्च 2025 में प्रकाशित हुआ। इसमें बताया गया कि:

 

उपवास करने से शरीर में मेटाबॉलिज्म में बदलाव आता है, जिससे कुछ प्रकार की कैंसर कोशिकाओं की संवेदनशीलता बढ़ सकती है।

 

यह कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी जैसे पारंपरिक इलाज को थोड़ा अधिक प्रभावी बना सकता है।

 

लेकिन उपवास या चीनी छोड़ देना अकेले कैंसर का इलाज नहीं हो सकता।

 

बिना डॉक्टर की सलाह के भोजन में कटौती करना खतरनाक हो सकता है और इससे कुपोषण, कमजोरी और संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।

 

 

 

 

 

 विशेषज्ञों की राय

 

 कैंसर विशेषज्ञों ने हाल ही में कहा कि सोशल मीडिया पर फैल रहे इस प्रकार के दावे झूठे और भ्रामक हैं।

"चीनी या दूध छोड़ देने से कैंसर की कोशिकाएं मर जाएंगी — यह धारणा पूरी तरह से गलत और वैज्ञानिक आधार से रहित है। यह मरीजों को गुमराह करने वाला दावा है।"

 

 

 

 

शोध में शामिल विशेषज्ञ

 

 

 

डॉ. ग़िज़ल फातिमा, डॉ. अब्बास महदी, डॉ. अमर महदी — एरा मेडिकल कॉलेज, लखनऊ

 

डॉ. जान फेडाको — स्लोवाकिया

 

डॉ. नजाह हादी — इराक

 

डॉ. अमिनात मागोमेदोवा — मास्को स्टेट यूनिवर्सिटी, रूस

 

 

 

चिप्स, पैक्ड आटा सहित कई उत्पादन बढ़ा रहे हैं कैंसर का खतरा







 पैक्ड फूड बढ़ा रहे हैं कैंसर का खतरा


 

चिप्स, पैक्ड आटा सहित कई उत्पादों में मिल रहे रसायन

 

इंडोक्राइन सर्जरी विभाग के प्रो. ज्ञान चंद ने बताया कि पैक्ड फूड में इथाइलीन ऑक्साइड जैसे रसायन संरक्षक (प्रिज़रवेटिव) के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं। चिप्स के पैकेट, पैक्ड आटा और अन्य खाद्य पदार्थों में मौजूद ये तत्व कैंसर की आशंका बढ़ा सकते हैं। जीवन प्रत्याशा बढ़ने और बदलती जीवनशैली के कारण भी कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं।

 

उन्होंने बताया कि पिछले पांच वर्षों में इंडोक्राइन सर्जरी विभाग में कैंसर के मरीजों की संख्या पांच गुना बढ़ी है। ब्रेस्ट, थायरॉयड, सर्विक्स और मुंह के कैंसर का समय पर इलाज होने पर पूरी तरह ठीक होना संभव है। आंकड़ों के अनुसार हर 28 में से एक महिला को ब्रेस्ट कैंसर का खतरा है, इसलिए किसी भी प्रकार की गांठ दिखने पर तुरंत जांच कराना आवश्यक है।

 

जागरूकता कार्यक्रम में संस्थान के निदेशक प्रो. आर.के. धीमन और इंडोक्राइन सर्जरी विभाग की प्रो. अंजलि मिश्रा ने कहा कि कैंसर के लक्षण शरीर पहले ही संकेत देने लगता है, ऐसे में देर किए बिना चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। वर्तमान में लगभग 30 से 40 प्रतिशत मरीज प्रारंभिक अवस्था में इलाज के लिए पहुंच रहे हैं, जो एक सकारात्मक संकेत है।


हिम्मत ना हारे कैंसर पर मिलेगी विजय

 





पीजीआई में कैंसर जागरूकता कार्यक्रम ‘कैंसर विजयी’ का संदेश

हिम्मत न हारें, कैंसर पर विजय संभव

 

लक्षण दिखते ही तुरंत लें चिकित्सकीय सलाह, फॉलो-अप ज़रूरी

 



 

साल 2002 में गले में हल्की गांठ महसूस हुई, लेकिन इसे नज़रअंदाज़ कर दिया गया। धीरे-धीरे परेशानी बढ़ती गई। वर्ष 2014 में सांस लेने में दिक्कत होने लगी और गले में सूजन स्पष्ट दिखने लगी। इसके बाद संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के इंडोक्राइन सर्जन प्रो. ज्ञान चंद से परामर्श लिया गया। जांच के बाद पता चला कि यह थायरॉयड कैंसर का एक दुर्लभ प्रकार है।

 

कैंसर का नाम सुनते ही गहरा आघात लगा, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। प्रो. ज्ञान चंद ने सर्जरी कर लगभग 300 ग्राम की गांठ को निकाला। यह गांठ अंदर की ओर दबाव बना रही थी, जिससे सांस लेने में कठिनाई हो रही थी। सर्जरी के बाद रेडियो आयोडीन थेरेपी और कीमोथेरेपी दी गई, जिससे जीवन फिर से सामान्य हो गया।

 

थायरॉयड कैंसर को मात देने वाली रूमा रेखा वाल्टर बुधवार को एसजीपीजीआई में कैंसर जागरूकता दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में अपने अनुभव साझा करने पहुंचीं। उन्होंने कहा कि कैंसर से डरने की नहीं, बल्कि हिम्मत से लड़ने की ज़रूरत है। गले या स्तन में किसी भी प्रकार की गांठ दिखे तो लापरवाही न करें और तुरंत जांच कराएं।

 

इसी कार्यक्रम में स्तन कैंसर से उबर चुकीं ललिता सिंह ने बताया कि जब स्तन में गांठ महसूस हुई तो जांच में कैंसर की पुष्टि हुई। प्रो. ज्ञान चंद द्वारा सर्जरी और दवा से उपचार के बाद अब वह पूरी तरह स्वस्थ हैं और सामान्य जीवन जी रही हैं।

 

वहीं, 61 वर्षीय हेमंत कुमार ने बताया कि वर्ष 1997 में गले में गांठ हुई थी। बाहर सर्जरी कराई और कुछ समय दवा ली, लेकिन उपचार अधूरा छोड़ देने से दोबारा गांठ हो गई। इसके बाद पीजीआई में पुनः सर्जरी हुई और अब वह पूरी तरह स्वस्थ हैं। उन्होंने सलाह दी कि नियमित जांच कराते रहें और दवा बीच में न छोड़ें।

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मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

हर चौथा सवर्ण गरीब









सवर्ण समुदाय के भी बड़े हिस्से की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है: 


📊 1) सवर्ण समुदाय में गरीबी का प्रतिशत


 *लगभग *25 % सामान्य/सवर्ण श्रेणी (General Category) के परिवार गरीब हैं — यानी हर चौथा परिवार गरीबी रेखा के नीचे आता है। �



सवर्णों में भूमिहार जैसे समूह में ~27–28 % परिवार गरीबी में हैं। �


ब्राह्मण समुदाय में लगभग ~25 % परिवार गरीब हैं। 


राजपूतों में भी लगभग ~25 % गरीबी दर है। 


ध्यान दें: यहाँ “गरीब” की परिभाषा आम तौर पर मासिक आय या अर्थव्यवस्था के आधार पर तय गरीबी रेखा 

 सवर्ण वर्ग (25 %) की गरीबी दर कम है, लेकिन यह भी सिरे से कम नहीं — यह दिखाती है कि सवर्ण समुदाय का भी बड़ा हिस्सा आर्थिक रूप से कमजोर है। 

📊 3) क्या इस आंकड़े से “खराब आर्थिक स्थिति” सिद्ध होती है?


25 % गरीबी दर का मतलब है कि लगभग हर चौथे सवर्ण परिवार के पास बुनियादी सुविधाओं और आमदनी की कमी है, जिससे जीवन की गुणवत्ता कमजोर होती है (भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि में कठिनाइयाँ)। 


यह बात और भी स्पष्ट होती है क्योंकि:

सवर्ण समुदाय के भीतर बड़े अंतर भी हैं — कुछ उप-समूह (जैसे भूमिहार, ब्राह्मण) में गरीबी दर 25–28 % तक पाई गई है। 

 मतलब: यह एक अलग-थलग घटना नहीं है; ग्रामीण और कम-शिक्षित सवर्ण परिवारों की आर्थिक स्थिति कई इलाकों में कमजोर दिखती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि सभी सवर्ण सामान्यतः समृद्ध नहीं हैं।

📊 4) कारण (संक्षेप में)

🔹 आर्थिक अवसरों का वितरण

गरीबी का एक कारण यह है कि आर्थिक अवसर (नौकरी, कौशल प्रशिक्षण, शिक्षा) सभी तक समान रूप से नहीं पहुंच पाते हैं — ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों में यह समस्या और बढ़ जाती है।

🔹 शिक्षा और कौशल में अंतर

बहुत से गरीब सवर्ण परिवारों में शिक्षा और कौशल का स्तर भी कम होने के कारण स्थिर आय के अवसर कम मिलते हैं।

🔹 आर्थिक असमानता

भारत जैसे बड़े देश में धन और संसाधनों का वितरण असमान है और इसका प्रभाव हर सामाजिक वर्ग पर अलग-अलग रूप से पड़ता है — केवल एक जाति/समुदाय में समृद्धि की स्थिति नहीं देखी जा सकती।

निष्कर्ष

उत्तरदायित्वपूर्ण आंकड़ों के हिसाब से:

✔️ सामान्य/सवर्ण वर्ग के लगभग 25 % परिवार गरीबी रेखा के नीचे हैं। �

✔️ इसका मतलब है कि सवर्ण समुदाय की आर्थिक स्थिति भी कई परिवारों के लिए अस्थिर और कमजोर है — यह सिर्फ उच्च-आय वाले लोगों का समूह नहीं है

 सवर्ण जाति

गरीब परिवार (%)

भूमिहार

~25.32–27.58 %

ब्राह्मण

~25.30 %

राजपूत

~24.89 %

कायस्थ

~13.83 %

शेख

~25.84 %

पठान (खान)

~22.20 %

सैयद

~17.61 %



 

संत कबीर नगर में यूजीसी बिल पर विरोध

 

संतकबीरनगर में सड़क जाम कर यूजीसी समानता कानून के विरोध में सवर्ण समाज का प्रदर्शन


सरकार के खिलाफ नारेबाजी


#संतकबीरनगर। रविवार को सवर्ण समाज ने यूजीसी कानून के विरोध में खलीलाबाद शहर में प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने दुकानें बंद करवाईं और खलीलाबाद बाईपास पर चक्का जाम किया, जिससे शहर में यातायात बाधित हुआ। इस दौरान केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी भी की गई।

    विरोध प्रदर्शन में शामिल सैकड़ों लोगों ने इस कानून को 'काला कानून' बताते हुए इसे तत्काल रद्द करने की मांग की। सवर्ण समाज के सदस्य खलीलाबाद शहर के जूनियर हाई स्कूल में एकत्र हुए और वहां से विरोध मार्च निकाला। यह मार्च बैंक चौराहा, समय माता मंदिर से होते हुए मेंहदावल बाईपास तक पहुंचा।मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों ने 'यूजीसी एक्ट वापस लो', 'सवर्ण एकता जिंदाबाद' और 'केंद्र सरकार होश में आओ' जैसे नारे लगाए। सड़क जाम के कारण लगभग एक घंटे तक यातायात पूरी तरह बाधित रहा, जिससे सड़क के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं और आम लोगों को असुविधा का सामना करना पड़ा।प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि यदि सरकार इस कानून को वापस नहीं लेती है, तो आंदोलन को चरणबद्ध तरीके से और तेज किया जाएगा। इस मौके पर अखिलेश्वर राय, अरविंद पांडेय, शुभम राय, सूर्यभान सिंह, गोलू पाठक, संदीप पाठक, सक्षम श्रीवास्तव, आशुतोष पांडेय, शत्रुजीत राय, रतन सिंह, रजत सिंह, गौरव प्रताप सिंह, कृष्ण कुमार राय, अंशुमान सिंह, कृष्ण कुमार राय, किशन पाल, प्रीतम राय, संदीप पाठक, अखिलेश पाठक, प्रिंस राय, मारुति नंदन मिश्रा, अनुराग पांडेय, विजय मिश्रा सहित तमाम लोग मौजूद रहे।

देवाशीष शुक्ला बने अटल मेडिकल यूनिवर्सिटी के परीक्षा नियंत्रक







 बलरामपुर अस्पताल के एमएस डॉ. देवाशीष शुक्ला बने अटल मेडिकल यूनिवर्सिटी के परीक्षा नियंत्रक

तीन वर्ष के लिए प्रतिनियुक्ति पर मिली अहम जिम्मेदारी


उत्तर प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा विभाग ने एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक फेरबदल करते हुए बलरामपुर अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक (एमएस) डॉ. देवाशीष शुक्ला को अटल बिहारी वाजपेई मेडिकल यूनिवर्सिटी (एबीवीएमयू), लखनऊ का परीक्षा नियंत्रक (कंट्रोलर ऑफ एग्जामिनेशन) नियुक्त किया है। यह नियुक्ति आगामी तीन वर्षों के लिए प्रतिनियुक्ति के आधार पर की गई है।

इस संबंध में मंगलवार को चिकित्सा शिक्षा विभाग के विशेष सचिव धीरेंद्र सिंह सचान द्वारा औपचारिक आदेश जारी कर दिया गया। शासन ने डॉ. देवाशीष शुक्ला के प्रशासनिक अनुभव, शैक्षणिक दक्षता और पूर्व संस्थानों में उत्कृष्ट कार्यों को देखते हुए उन्हें यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है।

वरिष्ठ मानसिक रोग विशेषज्ञ हैं डॉ. देवाशीष शुक्ला

डॉ. देवाशीष शुक्ला प्रांतीय चिकित्सा सेवा (पीएमएस) के वरिष्ठ मानसिक रोग विशेषज्ञ हैं। वर्तमान में वे बलरामपुर अस्पताल में चिकित्सा अधीक्षक के पद पर कार्यरत थे तथा मानसिक स्वास्थ्य विभाग के अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल रहे थे। स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ शैक्षणिक एवं प्रशासनिक क्षेत्र में उनकी सुदृढ़ पकड़ को देखते हुए उन्हें यूनिवर्सिटी की परीक्षा व्यवस्था को सशक्त बनाने का दायित्व सौंपा गया है।

कैंसर संस्थान और लोहिया संस्थान में रहा प्रभावी कार्यकाल

डॉ. देवाशीष शुक्ला का कार्यकाल विभिन्न संस्थानों में उल्लेखनीय उपलब्धियों से भरा रहा है।

कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान में जुलाई 2023 में चिकित्सा अधीक्षक का पद संभालने के बाद उन्होंने संस्थान की कार्यप्रणाली को नई दिशा दी।  पांच विभागों में पीडीसीसी (पोस्ट डॉक्टोरल सर्टिफिकेट कोर्स) शुरू किए गए। मरीज के इलाज के लिए तमाम सुविधाएं स्थापित किया । 

उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि मरीजों को आयुष्मान भारत, पंडित दीन दयाल उपाध्याय स्वास्थ्य योजना तथा मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री राहत कोष का लाभ बिना किसी बाधा के मिल सके।

इससे पहले डॉ. राम मनोहर लोहिया संस्थान में तैनाती के दौरान कोविड-19 महामारी के समय डॉ. देवाशीष ने प्रभावी प्रबंधन किया। आइसोलेशन वार्ड, ट्राएज एरिया और संक्रमण नियंत्रण की रणनीति तैयार कर उन्होंने मरीजों और स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित की।

परीक्षा व्यवस्था को समयबद्ध और पारदर्शी बनाना प्राथमिक लक्ष्य

नियुक्ति के बाद डॉ. देवाशीष शुक्ला ने कहा कि अटल मेडिकल यूनिवर्सिटी से संबद्ध कॉलेजों में समय पर परीक्षा कराना और समयबद्ध परिणाम घोषित करना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। उन्होंने कहा कि कुलपति मेजर जनरल डॉ. अमित देवगन के मार्गदर्शन में विश्वविद्यालय को शैक्षणिक रूप से और अधिक सुदृढ़ बनाया जाएगा।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जो मेडिकल कॉलेज अभी यूनिवर्सिटी से संबद्ध नहीं हैं, उन्हें निर्धारित मानकों के अनुरूप जांच कर संबद्धता दी जाएगी। इसके साथ ही नर्सिंग और पैरामेडिकल पाठ्यक्रमों में दाखिले की प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाएगा। डॉ. देवाशीष का लक्ष्य अटल मेडिकल यूनिवर्सिटी को प्रदेश ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान के रूप में स्थापित करना है।