शनिवार, 26 सितंबर 2026

: हठ योग से गर्भधारण न कर पाने की परेशानी में 41% तक राहत, तनाव और अवसाद घटा

 

शोध: हठ योग से गर्भधारण न कर पाने की परेशानी में 41% तक राहत, तनाव और अवसाद घटा


। लखनऊ


 गर्भधारण न कर पाने की परेशानी का इलाज करा रही महिलाओं के लिए अच्छी खबर है। हठ योग के नियमित अभ्यास से तनाव, चिंता और अवसाद में 41 प्रतिशत तक कमी आई है, जिससे गर्भधारण की संभावना बढ़ जाती है। यह शोध  संजय गांधी पीजीआइ में किया गया है। शोध को हाल में दिल्ली में आयोजित टीएनआई द्वारा आयोजित 7वीं कॉमनवेल्थ नर्सेज एंड मिडवाइव्स फेडरेशन कॉन्फ्रेंस में प्रस्तुत किया गया है

 शोध इनफर्टिलिटी ओपीडी, संजय गांधी पीजीआइ  में इलाज करा रही  महिलाओं पर किया गया। शोध में विशेष स्केल से महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य का स्तर मापा गया और फिर 2 सप्ताह तक रोज 60 मिनट तक हठ योग के आसन, प्राणायाम और ध्यान कराया गया।


 क्या असर दिखा - 


 योग के बाद चिंता में 41.3 फीसदी  अवसाद में 35.3 फीसदी और  तनाव में 30.3 फीसदी की कमी आई।


 मैटरनल एंड रिप्रोडक्टिव हेल्थ डिपार्टमेंट की   - प्रो. डॉ. इंदुलता साहू ने कहा, "गर्भधारण न कर पाने की परेशानी के इलाज में तनाव और डिप्रेशन सबसे बड़ी रुकावट खड़ी करता है। तनाव बढ़ने पर कोर्टिसोल हार्मोन बढ़ता है, जिससे अंडा बनने की प्रक्रिया बिगड़ती है और भ्रूण के गर्भाशय में टिकने में दिक्कत आती है। कई महिलाएं डिप्रेशन के कारण इलाज बीच में ही छोड़ देती हैं। जब तनाव और अवसाद दूर होता है तो हार्मोन संतुलित होते हैं और गर्भधारण की संभावना बढ़ जाती है।"



शोधकर्ता टीम 


ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजिकल नर्सिंग, कॉलेज ऑफ नर्सिंग की 

 टीचिंग फैकल्टी / मुख्य  भूमिका सिंह , कॉलेज ऑफ नर्सिंग, प्रिंसिपल

डॉ. राधा के, 

 ट्यूटर / सह-शोधकर्ता

 एलिस जोसेफ, मैटरनल एंड रिप्रोडक्टिव हेल्थ डिपार्टमेंट, 

 कंसल्टेंट प्रो. अमृत गुप्ता,

 कंसल्टेंट प्रो. डॉ. इंदुलता साहू

,कॉलेज ऑफ नर्सिंग,

बी.एससी. नर्सिंग छात्र

 आकाश भारती, मुसाफिर अली, युक्ता यादव




हठ योग प्रक्रिया - 60 मिनट:

1. तैयारी (5 मि.): खाली पेट, शांत जगह। 2. आसन (30 मि.): तितली आसन, भुजंगासन, सेतुबंधासन, विपरीत करणी। 3. प्राणायाम (15 मि.): अनुलोम-विलोम, भ्रामरी। 4. ध्यान (10 मि.): आँख बंद, सांस पर ध्यान।

कल्याण सिंह कैंसर संस्थान में स्त्री रोग ऑन्कोलॉजी विभाग का स्थापना दिवस




महिलाओं में कैंसर बढ़ा, इलाज भी एडवांस


कल्याण सिंह कैंसर संस्थान में स्त्री रोग ऑन्कोलॉजी विभाग का स्थापना दिवस


लखनऊ। कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान में स्त्री रोग ऑन्कोलॉजी विभाग का पहला स्थापना दिवस मना। "ब्रिजिंग एडवांसेज विद प्रैक्टिस" विषय पर सी एम ई हुई। विशेषज्ञों ने कहा - यूपी में सर्वाइकल, ओवेरियन और यूटेराइन कैंसर बढ़ रहे हैं, पर समय पर जांच से 70 प्रतिशत मरीजों को बचाया जा सकता है।


विभागाध्यक्ष प्रो. सबुही कुरैशी ने प्रगति रिपोर्ट रखी। निदेशक प्रो. एम.एल.बी. भट्ट ने कहा - नई तकनीक और टीम वर्क से बेहतर इलाज संभव है। मुख्य अतिथि प्रो. उमा सिंह और एस्टर बेंगलुरु के डॉ. विजय के. आहूजा ने कहा - रोबोटिक सर्जरी और इम्यूनोथेरेपी से इलाज आसान हुआ है।


विशेषज्ञों के मुताबिक  सर्वाइकल कैंसर एचपीवी वायरस से होता है,  दूसरा सबसे आम है। ओवेरियन को साइलेंट किलर कहते हैं, इसके लक्षण पेट फूलना, भूख कम लगना, बार-बार पेशाब आना हैं, जिन्हें महिलाएं गैस समझ कर टाल देती हैं। 70 प्रतिशत केस तीसरी-चौथी स्टेज में आते हैं। एंडोमेट्रियल कैंसर मोटापा और हार्मोन गड़बड़ी से होता है, मेनोपॉज के बाद ब्लीडिंग इसका बड़ा संकेत है।


अब इलाज में क्रांति 


 रोबोटिक और लैप्रोस्कोपिक सर्जरी में बड़ा चीरा नहीं लगता, मरीज दो दिन में घर जाता है। हाइपेक थेरेपी में सर्जरी के बाद पेट में गर्म कीमो दी जाती है, इससे दोबारा खतरा 40 प्रतिशत कम होता है। अब बीआरसीए जैसे जीन टेस्ट के बाद टारगेटेड और इम्यूनोथेरेपी से सटीक दवा दी जाती है। चौथी स्टेज में भी पेलिएटिव केयर से दर्द-मुक्त जीवन संभव है।



ऐसे करे बचाव 



बचाव के लिए 9 से 26 साल की लड़कियों को एचपीवी वैक्सीन जरूरी है। 30 के बाद हर तीन साल पैप स्मीयर जांच कराएं। लगातार सफेद पानी, पीरियड्स के बीच ब्लीडिंग और पेट की सूजन को नजरअंदाज न करें।


 क्या करें, क्या न करें


लक्षण: पेट फूलना, भूख कम, बार-बार पेशाब, असामान्य ब्लीडिंग।

नया इलाज: रोबोटिक सर्जरी, हाइपेक, टारगेटेड दवा।

बचाव: 9-26 साल में एचपीवी टीका, 30 के बाद पैप स्मीयर, धूम्रपान से बचें।

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

एमडीआर रोकने में फार्मासिस्ट की अहम भूमिका : डॉ. देवेन्द्र गुप्ता

 

एमडीआर रोकने में फार्मासिस्ट की अहम भूमिका : डॉ. देवेन्द्र गुप्ता


  पीजीआइ में पहली बार मनाया गया विश्व फार्मासिस्ट दिवस


लखनऊ। संजय गांधी पीजीआई में विश्व फार्मासिस्ट दिवस पहली बार मनाया गया। इस अवसर पर मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. देवेन्द्र गुप्ता ने कहा कि मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस (एमडीआर) को रोकने में फार्मासिस्ट की भूमिका सबसे अहम है।


कार्यक्रम में सीनियर परचेज अफसर अभय मल्होत्रा, सीनियर परचेज अफसर एस.के. श्रीवास्तव, कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष धर्मेश कुमार और महामंत्री सीमा शुक्ला मौजूद रहे।


डॉ. गुप्ता ने कहा कि संस्थान के निदेशक प्रो. महेन्द्र भंडारी ने वर्ष 1996 में फार्मेसी सिस्टम की स्थापना की थी, जो भारत का पहला सिस्टम था। आज इसका स्वरूप काफी बड़ा हो गया है।


उन्होंने कहा कि फार्मासिस्ट का काम सिर्फ दवा का डिस्पेंसिंग और वितरण करना ही नहीं है। दवाओं का दुरुपयोग न हो, यह उनकी बड़ी जिम्मेदारी है। दवा को किस तापमान पर रखना है, उसका ऑडिट भी जरूरी है। एंटीबायोटिक के अंधाधुंध इस्तेमाल से एमडीआर तेजी से बढ़ रहा है, जिसे रोकने में फार्मासिस्ट ही सही डोज और सही इस्तेमाल सुनिश्चित कर सकता है।


डॉ. गुप्ता ने कहा कि विदेशों में वार्ड राउंड में डॉक्टर के साथ फार्मासिस्ट भी रहता है। डॉक्टर दवा लिखता है, लेकिन मरीज के बॉडी वेट के अनुसार डोज फार्मासिस्ट तय करता है। यही सिस्टम यहां भी लागू होना चाहिए। इस मौके पर चीफ फार्मासिस्ट राजेश त्रिपाठी सहित कई लोग उपस्थित हुए। 

गुरुवार, 24 सितंबर 2026

दिल की धड़कन सुनिए, खतरा बढ़ने से पहले

 

दिल की धड़कन सुनिए, खतरा बढ़ने से पहले



विश्व हृदय दिवस पर पीजीआई में वॉकाथॉन


 डोंट मिस अ बीट का संदेश


 लखनऊ


 हृदय रोग दुनिया में मौत का सबसे बड़ा कारण है। संजय गांधी पीजीआइ के हृदय रोग विभाग ने विश्व हृदय दिवस सप्ताह पर डोंट मिस अ बीट अभियान के तहत वॉकाथॉन आयोजित किया।


वॉकाथॉन में सौ से अधिक लोग शामिल हुए, जिनमें विभागाध्यक्ष प्रो. आदित्य कपूर, प्रो. सत्येंद्र तिवारी, प्रो. नवीन गर्ग, प्रो. रूपाली खन्ना, डा. अंकित साहू, डा. हर्षित खरे, डा. अरशद नजीर और डा. शाहनवाज अंसारी मौजूद रहे।


हर धड़कन है सेहत का पैगाम

निदेशक  प्रो. आर के धीमान ने कहा कि हृदय स्वास्थ्य सामूहिक जिम्मेदारी है। स्वस्थ दिल की नींव रोजमर्रा की आदतों में है, नियमित व्यायाम, संतुलित भोजन, तंबाकू से दूरी और तनाव पर नियंत्रण।


छुपे लक्षणों को न करें नजरअंदाज


प्रो. आदित्य कपूर ने कहा कि सांस फूलना, थकान, सीने में असहजता, धड़कन बढ़ना, चक्कर जैसे संकेतों को उम्र समझकर टालना खतरनाक है। प्रो. सत्येंद्र तिवारी ने कहा कि छोटे बदलाव भी दिल को बड़ा फायदा देते हैं। प्रो नवीन गर्ग ने कहा कि समय पर पहचान आपात स्थिति से बचाती है।


महिला और युवा दिलों का ख्याल

प्रो. रूपाली खन्ना ने कहा कि महिलाओं में लक्षण अलग होते हैं, उन्हें अनदेखा न करें। डा. अंकित साहू ने कहा कि मोटापा, निष्क्रियता, गलत खानपान, हाई बीपी, शुगर और कोलेस्ट्रॉल युवाओं में भी बढ़ रहा है, इसलिए बचपन से ही अच्छी आदतें जरूरी हैं। विभाग ने रोज बीस मिनट चलने का आह्वान किया।

चेहरे के बरसों पुराने दर्द से तड़प रही दो महिलाओं को पीजीआइ में राहत


 चेहरे के बरसों पुराने दर्द से तड़प रही दो महिलाओं को पीजीआइ  में राहत


 बिना बड़ी सर्जरी के हुआ इलाज


 दर्द का कारण ट्राइजेमिनल न्यूराल्जिया नहीं, बल्कि गर्दन में दबी नस निकला



लखनऊ


केस-1 : रायबरेली की कमला देवी, 45 साल

कमला देवी पिछले कई सालों से चेहरे के एक तरफ बिजली जैसा तेज दर्द झेल रही थीं। दर्द इतना तेज कि खाना-पीना, बोलना और रोजमर्रा के काम तक मुश्किल हो गए थे। कई बड़े अस्पतालों में दिखा चुकी थीं, हर जगह ट्राइजेमिनल न्यूराल्जिया बताकर दवाइयां दी गईं, एक बार सर्जरी भी करवाई, पर कुछ महीनों बाद दर्द फिर लौट आया। जब वे संजय गांधी पीजीआई के  पेन क्लिनिक पहुंचीं तो जांच में सामने आया कि उनका दर्द ट्राइजेमिनल नहीं है। असल में उनकी गर्दन में एक नस दबी हुई थी, जो चेहरे की नसों को लगातार सिग्नल भेज रही थी। यहां नाक के पीछे स्थित स्फीनोपैलेटाइन गैंग्लियन पर पल्स्ड रेडियोफ्रीक्वेंसी दी गई, जिससे उन्हें लंबे समय तक राहत मिली।


केस-2 : अयोध्या की गीता पांडे, 51 साल

दूसरा मामला अयोध्या की गीता पांडे का है। उन्हें कान, जबड़े और कनपटी के आसपास एक तरफ लगातार दर्द रहता था, जो ठंडी हवा लगने, हल्का सा छूने या कुछ चबाने से बढ़ जाता था। उन्हें भी ट्राइजेमिनल न्यूराल्जिया का इलाज दिया गया था, पर स्थायी फायदा नहीं हुआ। जांच पर पता चला कि उन्हें ऑरिकुलोटेम्पोरल न्यूराल्जिया है, यानी कान के पास वाली नस में दर्द का कारण है और इसकी जड़ गर्दन में दबी उसी नस से जुड़ी है। यहां कान के सामने वाली ऑरिकुलोटेम्पोरल नस पर रेडियोफ्रीक्वेंसी प्रक्रिया की गई, जिसके बाद वे सामान्य जीवन में लौट चुकी हैं।


कैसे हुआ इलाज

दोनों मरीजों का इलाज एक ही सिद्धांत पर दो चरणों में किया गया।

चरण-1 : अल्ट्रासाउंड गाइडेड हाइड्रो-डिसेक्शन - अल्ट्रासाउंड पर देखते हुए गर्दन में दबी नस के चारों तरफ पतली सुई से दवा का घोल डालकर नस को मांसपेशी की चिपकन से मुक्त किया गया। इसमें कोई चीरा-टांका नहीं लगता।

चरण-2 : रेडियोफ्रीक्वेंसी थेरेपी - गर्दन की नस मुक्त होने के बाद चेहरे में दर्द पहुंचा रही मुख्य नस को पल्स्ड रेडियोफ्रीक्वेंसी से शांत किया गया। यह तकनीक नस को काटती-जलाती नहीं, बल्कि नियंत्रित तरंगों से उसकी अति-सक्रियता को कम करती है। यह 15-20 मिनट की प्रक्रिया है और मरीज उसी दिन घर जा सकता है।


पेन क्लीनिक के प्रो सुजीत गौतम ने कहा कि अगर चेहरे का दर्द इलाज के बावजूद ठीक नहीं हो रहा है तो निराश न हों, एक बार विशेषज्ञ पेन क्लिनिक में दोबारा जांच जरूर कराएं।


कब और कहां संपर्क करें -

स्थान: पेन क्लिनिक, डी ब्लॉक, नवीन ओपीडी, कमरा नंबर 31 और 32।  सोमवार से शुक्रवार सुबह 9 से शाम 5 बजे तक, शनिवार सुबह 9 से दोपहर 1 बजे तक

82 फीसदी ऑक्सीजन सैचुरेशन वाली महिला के जांघ की हड्डी का फ्रैक्चर जोड़ा

 



पीजीआइ हाई-रिस्क सर्जरी का सफल ऑपरेशन, कई अस्पतालों ने किया था मना


82 फीसदी ऑक्सीजन सैचुरेशन वाली महिला के जांघ की हड्डी का फ्रैक्चर जोड़ा 


 20 फीसदी थी मौत की आशंका


अल्ट्रासाउंड-गाइडेड कंटीन्यूअस स्पाइनल एनेस्थीसिया तकनीक से बचाई जान


  लखनऊ

 संजय गांधी पीजीआइ के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में ऑर्थोपेडिक्स विभाग ने हाई-रिस्क केस में बड़ी सफलता हासिल की। टीम ने 42 वर्षीय महिला के दाहिने पैर की जांघ की हड्डी के फ्रैक्चर का सफल ऑपरेशन किया।


मरीज सिस्टिक ब्रोंकिएक्टेसिस और गंभीर पल्मोनरी हाइपरटेंशन से पीड़ित है। 20 दिन पहले हादसे में हड्डी टूटी थी। फेफड़े और हृदय की स्थिति के कारण कई अस्पतालों ने सर्जरी से मना कर संजय गांधी पीजीआइ रेफर किया था। एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में भर्ती पर ऑक्सीजन सैचुरेशन 82 फीसदी, जबकि सामान्य 98-100 फीसदी होता है।


ऑर्थोपेडिक्स, एनेस्थीसिया, कार्डियोलॉजी और पल्मोनोलॉजी की टीम ने मल्टीडिसिप्लिनरी अप्रोच से मरीज को ऑप्टिमाइज किया। इसे हाई-रिस्क माना गया, जिसमें 20 फीसदी पेरी-ऑपरेटिव मृत्यु का जोखिम था।


ऐसे केस में जनरल और पारंपरिक स्पाइनल एनेस्थीसिया जोखिम भरे होते हैं। एनेस्थीसिया टीम ने अल्ट्रासाऊंड गाइडेड- कंटीन्यूअस स्पाइनल एनेस्थीसिया तकनीक अपनाई, जिसमें माइक्रो-कैथेटर से दवा छोटी-छोटी डोज में बार-बार दी गई, जिससे हार्ट रेट और ब्लड प्रेशर में उतार-चढ़ाव नहीं हुआ।


फ्रैक्चर मिनिमली इनवेसिव तकनीक से जोड़ा गया, जिसमें कम रक्तस्राव और छोटे चीरे लगे। ओटी और पोस्ट-ऑपरेटिव आईसीयू में एडवांस मॉनिटरिंग की गई, जहां मरीज एक दिन रही। दूसरे दिन से चलने और फिजियोथेरेपी शुरू की गई। 6 दिन बाद मरीज स्वस्थ है और डिस्चार्ज हो रही है।


टीम: ऑर्थोपेडिक्स- प्रो. पुलक शर्मा, डॉ. फुरकान उल हक, डा. अवनीश मिश्रा, डा. विकास जायसवाल। एनेस्थीसिया- डा. वंश प्रिया, डा. दीक्षा रानी, डा. मणि दुबे। कार्डियोलॉजी- प्रो. आदित्य कपूर। पल्मोनरी- प्रो. आलोक नाथ। नर्सिंग ऑफिसर - अनीता सिंह, दीपिका, पूनम, रीता।


बुधवार, 23 सितंबर 2026

एसजीपीजीआई में एससी-एसटी वेलफेयर एसोसिएशन का शपथ ग्रहण समारोह*

 

एसजीपीजीआई में एससी-एसटी वेलफेयर एसोसिएशन का शपथ ग्रहण समारोह


लखनऊ। संजय गांधी पीजीआई में एससी-एसटी वेलफेयर एसोसिएशन के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों का शपथ ग्रहण समारोह आयोजित हुआ। समारोह में संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ दिलाई गई।


अध्यक्ष पद पर राजकुमार और महामंत्री पद पर सविता वर्मा सहित कार्यकारिणी के सभी सदस्यों ने पद और गोपनीयता की शपथ ली। शपथ लेने वाले में  उपाध्यक्ष - पवन कुमार , कोषाध्यक्ष - वंदना भारती  , संयुक्त मंत्री  - अरविंद कुमार और कुमारी शिवानी रावत, संगठन मंत्री - सीमा,कार्यालय मंत्री - एस. कन्या कुमारी , प्रचार मंत्री - वीर बली, कार्यकारिणी सदस्य  - जूली, कृष्णपाल, सुभाष कुमार, कुमारी ट्विंकल वर्मा शामिल रहे। 


इस मौके पर मुख्य अतिथि चिकित्सा अधीक्षक प्रो. राजेश हर्षवर्धन ने कहा कि संविधान ही देश की व्यवस्था  को चला रहा है। संविधान की देन है कि देश के सभी नागरिकों को उनके अधिकार मिल रहे हैं। देश की एकता और अखंडता के लिए सभी को संविधान के रास्ते पर चलना होगा।प्राथमिकता के आधार पर जो भी समस्याएं हैं उसको हल किया जाएगा। 

कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष धर्मेश कुमार ने कहा कि देश, समाज और संस्थान के विकास के लिए सबको मिलकर काम करना चाहिए। एक-दूसरे के प्रति सौहार्द होना चाहिए।


समारोह में कार्यालय मंत्री बृज भूषण यादव, , कर्मचारी महासंघ की महामंत्री सीमा शुक्ला, मेडिटेक एसोसिएशन के महामंत्री राकेश कुमार निगम और अध्यक्ष मनोज कुमार सिंह,नर्सिंग स्टाफ एसोसिएशन के अध्यक्ष लता सचान और महामंत्री विवेक शर्मा, मेडिटेक एसोसिएशन  के पूर्व महामंत्री सरोज वर्मा सहित बड़ी संख्या में कर्मचारी उपस्थित रहे।

सोमवार, 21 सितंबर 2026

अल्फा थेरेपी से कैंसर के जटिल मामलों में नई उम्मीद, टारगेटेड इलाज से सामान्य कोशिकाओं को नहीं होगा नुकसान

 



अल्फा थेरेपी से कैंसर के जटिल मामलों में नई उम्मीद, टारगेटेड इलाज से सामान्य कोशिकाओं को नहीं होगा नुकसान


न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग का 37वां स्थापना दिवस समारोह


जागरण संवाददाता, लखनऊ। कैंसर के जटिल और दोबारा लौटने वाले मामलों में अब न्यूक्लियर मेडिसिन की अल्फा थेरेपी नई उम्मीद बनकर उभरी है। अल्फा थेरेपी के जरिए कैंसर कोशिकाओं को चुन-चुन कर नष्ट किया जा सकता है, जबकि आसपास की सामान्य कोशिकाओं पर इसका असर न के बराबर होता है।


यह जानकारी संजय गांधी पीजीआई के न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग के सैंतीसवें स्थापना दिवस समारोह के अवसर पर आयोजित फाउंडेशन डे ऑरेशन में दी गई। मुख्य अतिथि स्विट्जरलैंड के यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल ज्यूरिख के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. मेड. अजु पझेनकोट्टिल और न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष प्रो. पी. के. प्रधान ने बताया कि थेरानोस्टिक्स के युग में अल्फा थेरेपी सबसे बड़ा ब्रेकथ्रू है।


विशेषज्ञों ने बताया कि जहां बीटा उत्सर्जक रेडियोआयोडीन या ल्यूटेटियम थेरेपी के बाद कुछ मरीजों में कैंसर रिफ्रैक्टरी हो जाता है, वहीं अल्फा उत्सर्जक आइसोटोप सीधे कैंसर कोशिका के डीएनए को डबल स्ट्रैंड ब्रेक करके नष्ट कर देते हैं। डिफरेंशिएटेड थायरॉयड कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर में पीएसएमए अल्फा थेरेपी और न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर में इसका सफल प्रयोग हो रहा है। डोजिमेट्री-गाइडेड प्लानिंग से इसे पूरी तरह प्रिसीजन हेल्थकेयर के रूप में दिया जा रहा है।


विभागाध्यक्ष प्रो. पी. के. प्रधान ने कहा कि इस वर्ष की थीम प्रिसीजन हेल्थकेयर थ्रू न्यूक्लियर मेडिसिन: इमेजिंग बायोलॉजी, ट्रीटिंग डिजीज अल्फा थेरेपी जैसे नए उपचारों के बढ़ते महत्व को दर्शाती है।


समारोह में दीप प्रज्वलन, पौधारोपण, पूर्व विभागाध्यक्षों का सम्मान तथा विभाग के पूर्व संकाय सदस्यों स्वर्गीय प्रो. बी. के. दास एवं डॉ. ए. बी. सेवाटकर का स्मरण भी किया गया।


इस अवसर पर प्रो. सुकांता बराई, प्रो. अमिताभ आर्या, प्रो. मनीष दीक्षित, न्यूक्लियर मेडिकल टेक्नोलॉजिस्ट गौरव द्विवेदी, अंकुश वैद्य सहित सभी संकाय सदस्य, रेजिडेंट, छात्र और कर्मचारी मौजूद रहे। टेक्नोलॉजिस्टों ने अल्फा थेरेपी की नई तकनीक और रेडिएशन सेफ्टी प्रोटोकॉल पर विस्तार से चर्चा की।

पीजीआई 8 बार स्क्लेरोथेरेपी फेल, फिर सिरोलिमस टारगेट थेरेपी से मिली राहत

 







आंख की रेयर डिजीज से ग्रस्त बच्चे को मिली रोशनी


8 बार स्क्लेरोथेरेपी फेल, फिर सिरोलिमस टारगेट थेरेपी से मिली राहत


 लखनऊ


संजय गांधी पीजीआइ के नेत्र रोग विभाग के डॉक्टरों ने आंख की दुर्लभ बीमारी में 8 बार इंजेक्शन वाली स्क्लेरोथेरेपी  तकनीक  फेल होने के बाद टारगेटेड थिरेपी से  बच्चे की रोशनी लौटा दी। 19 महीने के फॉलोअप में एमआरआई में घाव लगभग खत्म मिला। इस को ब्रिटिश मेडिकल जर्नल केस रिपोर्ट्स ने स्वीकार किया गया है। लखनऊ का रहने वाला 6 वर्षीय बच्चा जन्मजात रेयर डिजीज राइट ऑर्बिटल वेनोलिम्फेटिक मालफॉर्मेशन से ग्रस्त था। इसमें आंख के पीछे खून और लसीका की नलियों का गुच्छा बन जाता है। बच्चेकी  दाहिनी आंख 26 मिमी बाहर निकल आई थी, लाल-सूजन थी और होंठ-तालू व मैक्सिलरी साइनस तक फैलाव था। बच्चे की रोशनी काफी कम हो  गई थी ।  चेहरा बिगड़ने से उसने स्कूल जाना छोड़ दिया था।


पुराना इलाज फेल


तीन साल तक दूसरे सेंटर पर 5 बार ब्लेओमाइसिन और 3 बार एसटीएस स्क्लेरोथेरेपी  की गई। इसमें सुई से गांठ में दवा डालकर सुखाया जाता है, पर इस बच्चे को कोई फायदा नहीं हुआ ।  बीमारी बढ़ती गई। सर्जरी में भारी ब्लीडिंग और स्थायी अंधेपन का खतरा था।


नया इलाज और कितने दिन में फायदा


 प्रो. रचना अग्रवाल और  डा अंकिता ऐश्वर्या ने तमाम  मूल्यांकन के बाद माता-पिता की सहमति से ओरल सिरोलिमस   शुरू की। यह टारगेटेड थेरेपी है।4 से 6 हफ्ते में ही सूजन घटने लगी। 3 महीने में साफ दिखने लगा, 6 महीने पर रोशनी 6/12 और 19 महीने पर 6/9-2 हो गई जो सामान्य के करीब है। प्रोप्टोसिस 26 से घटकर 15 मिमी रह गया, तालू का घाव ठीक। कोई बड़ा साइड इफेक्ट नहीं। बच्चा फिर स्कूल लौट आया। विभागाध्यक्ष प्रो. विकास कनौजिया ने कहा, हम रूटीन इलाज के साथ रेयर बीमारियों पर रिसर्च भी कर रहे हैं। यह उसी का नतीजा है कि बिना सर्जरी बच्चे की आंख बच गई।


क्या है यह बीमारी


ऑर्बिटल ट्यूमर कुल आबादी में करीब 1 फीसदी में मिलता है।   बच्चों में पहले दशक के उम्र में दिखते हैं।  आंख बाहर निकलना, लाल सूजन, रोशनी कम होना। सर्दी या चोट के बाद अचानक सूजन बढ़े तो तुरंत नेत्र रोग विशेषज्ञ को दिखाएं।


फोटो परिचय 

1 बाएं से प्रोफेसर रचना अग्रवाल और डॉक्टर अंकित 2 बीमारी के दौरान की आंख की फोटो और बीमारी ठीक होने के बाद आंख की फोटो

रविवार, 20 सितंबर 2026

एसजीपीजीआइ में अब 'देखो और वहीं मारो' वाला कैंसर इलाज

 

 


 एसजीपीजीआइ में अब 'देखो और वहीं मारो' वाला कैंसर इलाज


कीमो के मुकाबले बहुत कम साइड इफेक्ट 


न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग का स्थापना दिवस समारोह



एंडोक्राइन ग्लैंड के कैंसर के इलाज में अब अत्याधुनिक तकनीक थेरानोस्टिक्स से इलाज होगा। इस तकनीक में पहले कैंसर को सटीक रूप से खोजा जाता है और फिर उसी जगह पर निशाना लगाकर खत्म किया जाता है, जिससे शरीर के बाकी हिस्सों को नुकसान नहीं पहुंचता।


न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग के स्थापना दिवस पर विभाग प्रमुख प्रोफेसर पीके प्रधान ने बताया कि थेरानोस्टिक्स दो शब्दों थेरेपी और डायग्नोस्टिक्स से मिलकर बना है। इस तकनीक के पहले चरण में बहुत हल्की रेडिएशन वाली दवा डायग्नोस्टिक रेडियोट्रेसर जैसे गैलियम-68 डॉटाटेट  और गैलियम-68 पीएसएमए-11  / फ्लोरीन-18 पीएसएमए-1007  नस में दी जाती है और पेट-सीटी स्कैन किया जाता है। यह दवा सिर्फ कैंसर कोशिका पर चिपकती है और स्कैन में लाइट की तरह जलने लगती है। यह दवा एक-दो घंटे में पेशाब के रास्ते बाहर निकल जाती है। अगर पहले स्कैन में लाइट आती है, मतलब कैंसर उस दवा को पकड़ रहा है, तो दूसरे चरण में उसी दवा को ताकतवर रेडिएशन वाली दवा थेरेप्यूटिक रेडियोलिगेंड जैसे ल्यूटेटियम-177 डॉटाटेट और ल्यूटेटियम-177 पीएसएमए-617  जिसका  नाम प्लूविक्टो है, बनाकर दिया जाता है, जो उसी कैंसर वाली जगह पर चिपककर बीटा रेडिएशन से कोशिका को अंदर से ही जला देती है।


कीमो से कैसे अलग है



विशेषज्ञों के अनुसार कीमोथेरेपी में दवा पूरे खून में घूमती है, जिससे बाल झड़ना, लगातार उल्टी, खून की कमी, प्लेटलेट गिरना और बहुत कमजोरी आती है। थेरानोस्टिक्स में दवा सिर्फ कैंसर को टारगेट करती है, इसलिए साइड इफेक्ट न के बराबर होते हैं।


न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर क्या होता है

हमारे शरीर में न्यूरोएंडोक्राइन कोशिकाएं होती हैं जो नर्वस सिस्टम और हॉर्मोन सिस्टम दोनों का काम करती हैं। जब इन्हीं कोशिकाओं में गांठ बनने लगती है तो उसे न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर कहते हैं। यह सबसे ज्यादा आंत, पैंक्रियाज, फेफड़ों और पेट में होता।  भारत में यह दर लगभग 1 लाख में 3.7 लोगों में है। जांच बेहतर होने से अब इसके मामले ज्यादा पकड़ में आ रहे हैं।

यूएसआईकॉन 2027 के लिए सीएम से मांगा सहयोग, मिला आश्वासन

 

यूएसआईकॉन 2027 के लिए सीएम से मांगा सहयोग, मिला आश्वासन


लखनऊ


 जनवरी 2027 में होने वाले यूरोलॉजी के राष्ट्रीय सम्मेलन यूएसआईकॉन 2027 के सचिव संजय गांधी पीजीआई के किडनी ट्रांसप्लांट एवं यूरोलॉजिस्ट प्रोफेसर संजय सुरेका सह-सचिव डॉ. प्रतिपाल सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सहयोग और समर्थन मांगा गया। 21 से 24 जनवरी तक इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में प्रस्तावित 60वें वार्षिक सम्मेलन की जानकारी दी। उन्होंने प्रशासनिक सहयोग का अनुरोध किया। मुख्यमंत्री ने सम्मेलन को उत्तर प्रदेश की चिकित्सा क्षमता दिखाने का अवसर बताते हुए हर संभव मदद का आश्वासन दिया।सम्मेलन के अध्यक्ष और संस्थान के यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. एमएस अंसारी और केजीएमयू के यूरोलॉजिस्ट प्रो. अपुल गोयलb ने कहा कि 35 साल बाद लखनऊ में हो रहा यह सम्मेलन प्रदेश के लिए गौरव की बात है। फोटो बाई तरफ प्रोफेसर संजय सुरेका बीच में मुख्यमंत्री और दाहिने तरफ डॉक्टर प्रति पाल

रिटायरमेंट उम्र 63 साल करने समेत 20 मांगों को लेकर पीजीआई कर्मचारी 5 अक्टूबर से धरने पर*

 

*रिटायरमेंट उम्र 63 साल करने समेत 20 मांगों को लेकर पीजीआई कर्मचारी 5 अक्टूबर से धरने पर*


लखनऊ। संजय गांधी पीजीआई कर्मचारी महासंघ ने अपनी 20 सूत्रीय लंबित मांगों को लेकर आंदोलन का ऐलान किया है। महासंघ ने प्रशासन को 15 कार्य दिवस का समय देते हुए मांगों के निस्तारण की मांग की है। निर्धारित अवधि में मांगों का समाधान नहीं होने पर कर्मचारी 5 अक्टूबर से प्रशासनिक भवन के सामने अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन शुरू करेंगे।

कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष धर्मेश कुमार और महामंत्री सीमा शुक्ला ने निदेशक को पत्र भेजकर 15 कार्य दिवस का अल्टीमेटम दिया है। बताया कि कार्यकारिणी के बैठक में सर्वसम्मत से यह निर्णय लिया गया है।  समय में मांगों का निस्तारण नहीं होने पर प्रतिदिन सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक धरना-प्रदर्शन किया जाएगा। महासंघ ने आंदोलन की स्थिति के लिए संस्थान प्रशासन को जिम्मेदार बताया है।

सेवानिवृत्ति की उम्र 63 वर्ष हो: नियमित गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों को तीन वर्ष का सेवा विस्तार देते हुए सेवानिवृत्ति की उम्र 60 से बढ़ाकर 63 वर्ष की जाए।

 मानकीकरण लागू होने के बाद विभिन्न संवर्गों में पदों एवं पदोन्नति को लेकर उत्पन्न विसंगतियों का निराकरण किया जाए। एम्स की तर्ज पर निर्धारित अहर्ता पूरी करने और पद रिक्त होने पर विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की बैठक कराकर पदोन्नति दी जाए। नर्सिंग सहित सभी संवर्गों के ऐसे कर्मचारियों, जिन्होंने 30 वर्ष की सेवा पूरी कर ली है, उन्हें तृतीय एमएसीपी का लाभ दिया जाए।

इसके अलावा लेवल-9 और उससे ऊपर के कर्मचारियों को एम्स दिल्ली की तर्ज पर 5300 रुपये प्रतिमाह एचपीसीए, नर्सिंग संवर्ग में वरिष्ठ कर्मचारियों का वेतन कनिष्ठ के समान होने पर वेतन संरक्षण, एम्स की दरों पर ब्रीफकेस अलाउंस, कर्मचारियों एवं आश्रितों के लिए ओपीडी का समय दोपहर 1 से 2 बजे के स्थान पर सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक करने की मांग शामिल है।

साथ ही हिंदी आशुलिपि एवं टंकण कार्य के लिए प्रोत्साहन भत्ता, ओटी, एमएसएसओ एवं फार्मासिस्ट संवर्ग के पदनाम एम्स के समान करने तथा संस्थान के कार्मिकों के लिए इमरजेंसी विभाग में बेड की संख्या बढ़ाने की मांग भी महासंघ ने प्रमुखता से उठाई है।

शनिवार, 19 सितंबर 2026

पीजीआइ एपेक्स ट्रामा सेंटर के वन-स्टॉप शोल्डर क्लिनिक

 



पीजीआइ एपेक्स ट्रामा सेंटर के वन-स्टॉप शोल्डर क्लिनिक


 हर मंगलवार लगती है ओपीडी 


एमआरआई  और स्टेरॉयड की जरूरत कम


लखनऊ। फ्रोजन शोल्डर से जूझ रहे मरीजों के लिए संजय गांधी पीजीआइ के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में संचालित वन-स्टॉप शोल्डर क्लिनिक राहत बन रहा है। फिजिकल मेडिसिन एवं रिहैबिलिटेशन विभाग द्वारा हर मंगलवार चलने वाले इस क्लिनिक ने पिछले 12 महीनों में 175 मरीजों का सफल उपचार किया है।


यहां पॉइंट-ऑफ-केयर अल्ट्रासाउंड से जांच, अल्ट्रासाउंड-गाइडेड मिनिमली इनवेसिव प्रक्रिया और स्ट्रक्चर्ड रिहैबिलिटेशन एक ही छत के नीचे उपलब्ध है। इससे अधिकांश मरीजों में एमआई की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिससे लागत और देरी दोनों कम होती है। स्टेरॉयड का उपयोग सीमित और जरूरी होने पर ही किया जाता है, जो डायबिटीज मरीजों के लिए सुरक्षित है।


एडिशनल प्रोफेसर डॉ. सिद्धार्थ राय ने बताया कि सटीक जांच और लक्षित उपचार से कुछ ही हफ्तों में दर्द और मूवमेंट में सुधार मिल रहा है। एपेक्स ट्रॉमा सेंटर प्रमुख प्रो. अरुण के. श्रीवास्तव और निदेशक प्रो. आर.के. धीमान ने कहा कि यह एकीकृत मॉडल मरीजों की सुविधा और सिस्टम की दक्षता दोनों बढ़ाता है।

मस्तिष्क को स्वस्थ रखने के लिए नियमित पठन, अच्छी दिनचर्या और सकारात्मक सोच जरूरी :

 



मस्तिष्क को स्वस्थ रखने के लिए नियमित पठन, अच्छी दिनचर्या और सकारात्मक सोच जरूरी : 


लखनऊ। मस्तिष्क को स्वस्थ रखने के लिए नियमित रूप से अच्छी पुस्तकें पढ़ना, पर्याप्त नींद लेना, संतुलित आहार, व्यायाम और तनाव से दूरी बनाकर सकारात्मक सोच रखना बेहद जरूरी है। यह बात आज केंद्रीय विद्यालय एसजीपीजीआई में ब्रेन हेल्थ विषय पर आयोजित सिंपोजियम में मुख्य अतिथि ने कही।


केंद्रीय विद्यालय एसजीपीजीआई में आज  न्यूरोलॉजी विभाग, एसजीपीजीआईएमएस के तत्वावधान में ब्रेन हेल्थ विषय पर एक दिवसीय सिंपोजियम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों में प्रारंभिक अवस्था से ही मस्तिष्क स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता पैदा करना था।


सिंपोजियम के दौरान तीन समूहों में प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं। प्रथम समूह में कक्षा 1 से 5 तक के विद्यार्थियों के लिए "मानसिक स्वास्थ्य" विषय पर भाषण प्रतियोगिता, द्वितीय समूह में कक्षा 6 से 8 के लिए "स्किल एजुकेशन इज बेटर देन बुकिश नॉलेज" विषय पर वाद-विवाद और तृतीय समूह में कक्षा 9 से 11 तक के विद्यार्थियों के लिए "रीडिंग इज ए गुड हैबिट" विषय पर वाद-विवाद प्रतियोगिता हुई। इसमें लगभग 30 विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।


कार्यक्रम की मुख्य अतिथि न्यूरोलॉजी विभाग की विभागाध्यक्ष प्रोफेसर जयंती कलिता रहीं। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि पढ़ना एक बहुत अच्छी आदत है। निरंतर पढ़ने से हमें महान व्यक्तियों के जीवन और विचारों के बारे में सीखने को मिलता है, इसलिए सभी को एक अच्छी पुस्तक चुनकर प्रतिदिन पढ़ने की आदत डालनी चाहिए। इससे मस्तिष्क सक्रिय और स्वस्थ रहता है।


इस अवसर पर प्रोफेसर रुचिका टंडन, डॉ. प्रकाश पांडेय, डॉ. फिरोज और डॉ. रुपाली भी उपस्थित रहीं। विद्यालय के प्राचार्य डॉ. अशोक कुमार पाठक ने सभी अतिथियों का हरित स्वागत किया। न्यूरोलॉजी विभाग की ओर से सभी प्रतिभागी विद्यार्थियों को पुरस्कृत किया गया।


कार्यक्रम का संयोजन शोएब इस्लाम ने किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में विद्यालय के सभी शिक्षकों एवं कर्मचारियों का सराहनीय योगदान रहा।

रेयर डिजीज से ग्रस्त युवती में आंत से बनाई नई पेशाब की थैली





 रेयर डिजीज से ग्रस्त युवती में आंत से बनाई नई पेशाब की थैली


 



टीबी के कारण वेजाइना और मूत्राशय आपस में जुड़ गए थे, ठहर गई थी जिंदगी


 


 


कुमार संजय । लखनऊ


 संजय गांधी पीजीआइ के यूरोलॉजी विभाग के प्रो संजय सुरेका ने रेयर डिजीज से ग्रस्त युवती को रोबोटिक सर्जरी के जरिए बीमारी से मुक्ति दिलाने के लिए बडी आंत से नया मूत्राशय बनाने के साथ दूसरी परेशानी को भी दूर किया। बिहार के बेगूसराय की रहने वाली 20 वर्षीय अर्पिता पिछले छह साल से ऐसी बीमारी से जूझ रही थी, जिसमें पेशाब लगातार लीक होता रहता था। शरीर से बदबू, हर वक्त कपड़े गीले और समाज से दूरी। जांच में वजह निकली- ट्यूबरक्यूलर वेसिकोवेजाइनल फिस्टुला विद थिम्बल ब्लैडर।


 


 क्या है यह बीमारी और कितनी खतरनाक है


 


वीवीएफ में पेशाब की थैली और वेजाइना का रास्ता आपस में जुड़ जाता है। आमतौर पर यह समस्या 30 से 40 साल से अधिक उम्र की महिलाओं में बच्चेदानी निकालने या सिजेरियन ऑपरेशन के दौरान चूक से होती है।


 


लेकिन अर्पिता को हुई बीमारी दुनिया में सबसे रेयर है। उसे टीबी के कारण वीवीएफ के साथ थिम्बल ब्लैडर हो गया, यानी थैली सिकुड़ कर छोटी हो गई। मेडिकल साहित्य में इसके गिने-चुने केस ही दर्ज हैं। प्रो. संजय सुरेका के अनुसार पीजीआइ में मेरे 15 साल में यह पहला केस है।


 


इसका सबसे बड़ा खतरा यह है कि समय पर इलाज न हो तो पेशाब किडनी में वापस जाने लगता है और किडनी फेल होने का खतरा रहता है।


 


6 साल, 4 अस्पताल और फिर पीजीआई ने दिया जीवनदान


 


पिता किशोर सिन्हा ने बताया कि 2020 में बेटी को यूटीआई हुआ। उसके बाद पेशाब का फ्लो कम हो गया और बार -बार पेशाब करने जाना पड़ता था । बिहार में दो जगह दिखाया, फिर दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल गए, जहां कैथेटर डालकर निकाल दिया गया कहा गया कि ठीक हो जाएगा लेकिन आराम नहीं मिला। फिर पटना में आईजीआईएमएस में दिखाया, पर कोई फायदा नहीं हुआ।


 


रिश्तेदारों की सलाह पर 2024 में वे एसजीपीजीआई की यूरोलॉजी ओपीडी में आए। प्रो. संजय सुरेखा ने टीबी की जांच कराई तो राज खुला। किडनी की टीबी धीरे-धीरे ब्लैडर तक पहुंच गई थी।


 


रोबोटिक सर्जरी से बनाई नई थैली


 


पहले छह महीने टीबी की दवा देकर इंफेक्शन खत्म किया गया। अप्रैल में रोबोटिक सर्जरी कर जुड़े हुए हिस्से को अलग किया गया और सिकुड़ी हुई थैली को आंत से टुकड़ा लेकर नया मूत्राशय बनाया गया।विभागाध्यक्ष प्रो. एमएस अंसारी ने कहा कि यदि लगातार लीकेज की समस्या है और कोई कारण नहीं मिल रहा तो टीबी की जांच जरूर करानी चाहिए। फॉलो अप के लिए ओपीडी में आई अर्पिता के चेहरे पर मुस्कान थी। बोली, अब मैं अपनी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर पाऊंगी।

गुरुवार, 17 सितंबर 2026

एसजीपीजीआईएमएस और केंद्रीय विद्यालय पीजीआई में पोस्टर प्रतियोगिता, 24 छात्र पुरस्कृत - 50 टीबी मरीजों को लिया गोद

 

एसजीपीजीआईएमएस और केंद्रीय विद्यालय पीजीआई में पोस्टर प्रतियोगिता, 24 छात्र पुरस्कृत - 50 टीबी मरीजों को लिया गोद


  लखनऊ 


प्रधानमंत्री के 76वें जन्मदिन पर एसजीपीजीआईएमएस में पोस्टर प्रतियोगिता आयोजित हुई। पुरस्कार निदेशक  प्रो. आर.के. धीमान ने दिए। केंद्रीय विद्यालय के प्राचार्य  डॉ अशोक पाठक मौजूद रहे।  प्रथम-10 हजार, द्वितीय-7 हजार, तृतीय-5 हजार, सांत्वना-3 हजार।


कार्यक्रम में एसजीपीजीआई परिवार ने 50 टीबी मरीजों को गोद लेकर पोषण पोटली वितरित की। 76 लड़कियों को एचपीवी वैक्सीन लगाई गई।


कैटेगरी-1 : केंद्रीय विद्यालय एसजीपीजीआई (12 छात्र)

टीबी/एचपीवी - प्रथम-सृष्टि कक्षा 6, द्वितीय-अग्रिमा चंद्रा कक्षा 8, तृतीय-उपधृति साह कक्षा 10, सांत्वना-शिवांगी वर्मा कक्षा 9, प्रिधि कक्षा 10, रिद्धि पी. हुबली कक्षा 2

पर्यावरण - प्रथम-सिद्धि कुमारी कक्षा 9, द्वितीय-जिया यादव कक्षा 5, तृतीय-आकृति कक्षा 7, सांत्वना-कृष्णा सिंह कक्षा 7, यश कुमार कक्षा 5, संस्कृति गोस्वामी कक्षा 1ए


कैटेगरी-2 : कॉलेज ऑफ नर्सिंग व मेडिकल टेक्नोलॉजी (12 छात्र)

टीबी/एचपीवी - प्रथम-नैना बीएससी परफ्यूजन टेक्नोलॉजी द्वितीय सेमेस्टर, द्वितीय-श्रेया केसरवानी बीएससी रेडियोथेरेपी टेक्नोलॉजी चतुर्थ सेमेस्टर, तृतीय-वंशिका चौधरी बीएमएलटी चतुर्थ सेमेस्टर, सांत्वना-आंचल सिंह एमएससी नर्सिंग प्रथम वर्ष, अनाम फातिमा बीएससी परफ्यूजन टेक्नोलॉजी चतुर्थ सेमेस्टर, शमन खातून बीएससी नर्सिंग द्वितीय वर्ष

पर्यावरण - प्रथम-शिवांशू बीएससी ऑपरेशन थियेटर टेक्नोलॉजी इंटर्न, द्वितीय-आशिमा यादव बीपीटी तृतीय सेमेस्टर, तृतीय-दृष्टि बीएससी रेडियोडायग्नोसिस एंड इमेजिंग टेक्नोलॉजी षष्ठम सेमेस्टर, सांत्वना-साक्षी बीएससी नर्सिंग तृतीय वर्ष, प्रवीण बीएससी नर्सिंग प्रथम वर्ष, ज्योत्सना सिंह बीएससी नर्सिंग द्वितीय वर्ष

बुधवार, 16 सितंबर 2026

कैंसर संस्थान के डॉक्टर प्रमोद गुप्ता को बड़ा राष्ट्रीय सम्मान

 

कैंसर संस्थान के डॉक्टर प्रमोद गुप्ता को बड़ा राष्ट्रीय सम्मान

देश भर से सिर्फ 7 डॉक्टर चुने गए, लखनऊ के कैंसर संस्थान का नाम रोशन


लखनऊ। कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर इंस्टीट्यूट, लखनऊ के रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग के एडिशनल प्रोफेसर और डीन डॉक्टर प्रमोद कुमार गुप्ता को इस साल का सबसे बड़ा सम्मान मिला है। उन्हें रेडिएशन ऑन्कोलॉजी में बेहतरीन काम के लिए फेलोशिप ऑफ द इंडियन कॉलेज ऑफ रेडिएशन ऑन्कोलॉजी यानी फिक्रो अवार्ड 2026 के लिए चुना गया है।


ये सम्मान कोई छोटा-मोटा नहीं है। ये कैंसर के इलाज, रिसर्च, पढ़ाई और रेडिएशन ऑन्कोलॉजी में उनके सालों की मेहनत को राष्ट्रीय स्तर पर सलाम है। खास बात ये है कि इस बार पूरे देश से सिर्फ सात रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट को ये अवार्ड मिला है और उसमें  लखनऊ के डॉक्टर गुप्ता का नाम भी है।


इस मौके पर संस्थान के डायरेक्टर प्रो. एम.एल.बी. भट्ट ने डॉक्टर गुप्ता को  बधाई दी और कहा कि ये पूरे संस्थान के लिए बहुत गर्व की बात है।


बता दें कि ये अवार्ड उन्हें 4 दिसंबर 2026 को हैदराबाद में होने वाले एआरओआई के सालाना सम्मेलन एरोइकॉन 2026 में दिया जाएगा।


पूरे संस्थान परिवार की तरफ से डॉक्टर प्रमोद कुमार गुप्ता जी को दिल से बधाई और शुभकामनाएं।

सोमवार, 14 सितंबर 2026

1.2 लीटर मवाद से भरा सीना और पूरी तरह बैठा फेफड़ा पीजीआइ में जटिल सर्जरी कर बचा ली जान

 



1.2 लीटर मवाद से भरा सीना और पूरी तरह बैठा फेफड़ा पीजीआइ में जटिल सर्जरी कर बचा ली जान

 सड़क हादसे के बाद सीने में जमा हुआ था 1.2 लीटर गाढ़ा मवाद, सिंगल-लंग वेंटिलेशन पर रखकर हुई हाई-रिस्क सर्जरी


 लखनऊ 


सीने में 1.2 लीटर गाढ़ा मवाद, फेफड़ा पूरी तरह पिचक कर ध्वस्त और ऊपर से दिल, शुगर और बीपी का पुराना मरीज... ऐसी हालत में ज्यादातर जगहों पर उम्मीद ही छोड़ दी जाती है लेकिन  संजय गांधी पीजीआइ के  एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के डॉक्टरों ने  दूरबीन विधि वैट्स सर्जरी से 50 वर्षीय मरीज को बचा लिया ।


सोनभद्र के रहने वाले मेवालाल (50 वर्ष) किसान हैं और मेडिकल स्टोर चलाते हैं। 8 अप्रैल 2026 की रात बाइक-कार की टक्कर में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। जिला अस्पताल में शुरूआती इलाज तो हुआ, लेकिन सांस की दिक्कत बढ़ती गई। हालत बिगड़ने पर उन्हें  एपेक्स ट्रॉमा सेंटर लाया गया।


जांच में पता चला कि छाती के अंदर करीब 1.2 लीटर गाढ़ा मवाद भर चुका था, जिसे पायोथोरेक्स कहते हैं। फेफड़े के ऊपर मोटी झिल्ली की परत जम गई थी और फेफड़ा पूरी तरह दब कर काम करना बंद कर चुका था। चुनौती और बड़ी थी, क्योंकि मेवालाल पहले से हाई-बीपी, डायबिटीज के मरीज हैं और 2023 में दिल की नस में स्टेंट भी पड़ चुका है।


ऐसी नाजुक हालत में ऑपरेशन करना बेहद जोखिम भरा था। सर्जरी के दौरान मरीज को सिंगल-लंग वेंटिलेशन पर रखना पड़ा, यानी एक फेफड़े से ही सांस चलानी पड़ी। इसके बावजूद ट्रॉमा सर्जरी टीम ने वैट्स तकनीक से बिना बड़ा चीरा लगाए, कैमरे की मदद से छाती से सारा मवाद निकाला और फेफड़े को जकड़े हुए मोटी पील को हटाकर डी-कॉर्टिकेशन किया। इससे दबा हुआ फेफड़ा फिर से फूल सका।


ऑपरेशन के बाद दो दिन तक मरीज को आईसीयू में रखा गया। सुधार होने पर वार्ड में शिफ्ट किया गया।  14 सितंबर को पूरी तरह स्वस्थ हालत में उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया। निदेशक प्रोफेसर आरके धीमान ने टीम को बधाई दी। 


क्या है वैट्स तकनीक


वैट्स का पूरा नाम है वीडियो-असिस्टेड थोरैकोस्कोपिक सर्जरी।

इसमें छाती को बड़ा चीरने की जरूरत नहीं पड़ती। 2-3 छोटे छेद करके कैमरा और खास उपकरण अंदर डाले जाते हैं। मॉनिटर पर देखकर अंदर की सफाई और ऑपरेशन करते हैं।  दर्द कम होता है, इंफेक्शन का खतरा कम रहता है और मरीज जल्दी ठीक होता  है।


सर्जरी टीम


ट्रॉमा सर्जरी विभाग

• एपेक्स ट्रॉमा सेंटर, एडिशनल चीफ ट्रॉमा सर्जरी- डा. अमित कुमार सिंह ,  सीनियर रेजिडेंट ट्रॉमा सर्जरी,- डा. आदित्य सिंह , सीनियर रेजिडेंट

ट्रॉमा सर्जरी,- डा. वरुण गुप्ता

 

एनेस्थीसिया एवं क्रिटिकल केयर विभाग

• एनेस्थीसिया विभाग, एडिशनल प्रोफेसर - डा. गणपत • एनेस्थीसिया विभाग, एडिशनल प्रोफेसर - डा. रफात शमीम

जूनियर डा. एनेस्थीसिया — डा. आकांक्षा

सीनियर रेजिडेंट, एनेस्थीसिया — डा. सारिया

ओटी स्टाफ — राहुल

 नर्सिंग ऑफिसर ओटी —  इरिन

ओटी तकनीशियन — अमित यादव

ओटी तकनीशियन — गौरव

आईसीयू स्टाफ — देवांशी

रविवार, 13 सितंबर 2026

लैब में उगाईं हार्ट वाल्व की कोशिकाएं, परखीं दवाएं; देखा - वाल्व की बीमारी को रोकने में कारगर होगी कौन सी दवा

 





लैब में उगाईं हार्ट वाल्व की कोशिकाएं, परखीं दवाएं; देखा - वाल्व की बीमारी को रोकने में कारगर होगी कौन सी दवा


 - रूमेटिक हार्ट डिजीज पर अहम शोध में सूजन और फाइब्रोसिस की वजह का चला पता, सर्जरी टालने की जगी उम्मीद


 लखनऊ


रूमेटिक हार्ट डिजीज (आरएचडी) से जूझ रहे मरीजों के लिए राहत की खबर है। संजय गांधी पीजीआइ के वैज्ञानिकों ने लैब में हार्ट वाल्व की जीवित कोशिकाएं उगाकर यह देखा केि  वाल्व धीरे-धीरे मोटा और सख्त होकर खराब हो जाता है जिसे दवा के जरिए रोका जा सकता है। उन दवाओं का भी पता लगाया जो वाल्व को सुरक्षित रख सकती हैं। 

शोध में सामने आया है कि शरीर में लंबे समय तक रहने वाली सूजन और कुछ खास प्रोटीन वाल्व को नुकसान पहुंचाकर फाइब्रोसिस (सख्त होने की प्रक्रिया) को बढ़ाते हैं। यदि इस प्रक्रिया को शुरुआती दौर में ही नियंत्रित किया जा सके तो भविष्य में कई मरीजों को हार्ट वाल्व बदलने की सर्जरी से बचाया जा सकता है।


यह महत्वपूर्ण शोध अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका जर्नल ऑफ फिजियोलॉजी एंड बायोकैमिस्ट्री ने स्वीकार किया है। 


शोध में पाया गया कि रूमेटिक हार्ट डिजीज केवल वाल्व तक सीमित बीमारी नहीं है, बल्कि इसमें पूरे शरीर में सूजन की प्रक्रिया सक्रिय रहती है। मरीजों के खून में ऐसे कई प्रोटीन मिले जो सूजन बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं। यही सूजन धीरे-धीरे हार्ट वाल्व की कोशिकाओं में बदलाव लाकर उसे मोटा और कठोर बना देती है।


वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में हार्ट वाल्व की जीवित कोशिकाओं को उगाकर उन पर अध्ययन किया। इसमें पाया गया कि टीजीएफ-बीटा नामक प्रोटीन वाल्व की कोशिकाओं को तेजी से सख्त बनाने की प्रक्रिया को बढ़ाता है। वहीं एसबी204741 और टाडालाफिल जैसी दवाओं ने इस नुकसान पहुंचाने वाली प्रक्रिया को काफी हद तक रोकने में सफलता दिखाई।


ऐसे हुआ शोध

वैज्ञानिकों ने आरएचडी के उन मरीजों के माइट्रल हार्ट वाल्व के ऊतकों का अध्ययन किया, जिन्हें बीमारी के कारण वाल्व बदलने की सर्जरी करानी पड़ी थी। ऑपरेशन के दौरान निकाले गए खराब वाल्व के ऊतकों की आधुनिक एलसी-एमएस/एमएस प्रोटिओमिक्स तकनीक से जांच की गई। तुलना के लिए इस्कीमिक हार्ट डिजीज से पीड़ित मरीजों के माइट्रल वाल्व ऊतकों की भी इसी तकनीक से जांच की गई।


शोधकर्ताओं की भूमिका

यह शोध क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी विभाग के यंग साइंटिस्ट डॉक्टर मोहित के राय और विभाग के प्रोफेसर विकास अग्रवाल के नेतृत्व में किया गया। शोध टीम में डा. आलोक कुमार, डा. दियाब रामिरेड्डी, डा. अंजलि सिंह, कार्डियो सर्जरी विभाग के प्रमुख प्रो. सुरेंद्र के. अग्रवाल और प्रो. शांतनु पांडे शामिल रहे।

राष्ट्र प्रेरणा स्थल पर उमड़ा जनसैलाब, आत्म सम्मान रैली में भारी भीड़ ने दिखाया दम

 






राष्ट्र प्रेरणा स्थल पर उमड़ा जनसैलाब, आत्म सम्मान रैली में भारी भीड़ 

पारख महासंघ की रैली में हजारों की संख्या में पहुंचे लोग, पूर्व मंत्री कौशल किशोर बोले - भीड़ बता रही है लोग आत्मसम्मान के लिए जाग चुके हैं
आउट सोर्सिंग व्यवस्था को किया समाप्त किए जाने और एक समाज शिक्षा की उठाई मांग


दुबग्गा स्थित राष्ट्र प्रेरणा स्थल पर रविवार को आयोजित आत्म सम्मान रैली में भारी भीड़ उमड़ पड़ी। पारख महासंघ के बैनर तले आयोजित इस रैली में मैदान खचाखच भरा रहा। पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री कौशल किशोर के पहुंचने से पहले ही राष्ट्र प्रेरणा स्थल पर हजारों की संख्या में लोगों की भीड़ जुट गई थी। भीड़ में युवा, बुजुर्ग, महिलाएं और बड़ी संख्या में कार्यकर्ता शामिल रहे।

भीड़ को देखकर गदगद हुए मुख्य अतिथि पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री कौशल किशोर ने कहा कि आज उमड़ी यह भारी भीड़ इस बात का सबूत है कि समाज अपने आत्मसम्मान के लिए जाग चुका है। उन्होंने मंच से लोगों का आभार जताते हुए कहा कि यह सिर्फ भीड़ नहीं, बल्कि बदलाव की ताकत है।

मंच से रखीं 5 बड़ी मांगें

रैली को संबोधित करते हुए कौशल किशोर ने कहा कि नशा मुक्त समाज, एक समान शिक्षा और रोजगारपरक शिक्षा से ही देश विकसित होगा। उन्होंने सरकार से मांग की कि जो सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए हैं, उन्हें तुरंत खोला जाए। साथ ही युवाओं के शोषण वाली आउटसोर्सिंग व्यवस्था को खत्म किया जाए।

उन्होंने कहा कि राष्ट्र प्रेरणा स्थल पर सिर्फ एक-दो नहीं, बल्कि वीरांगना ऊदा देवी पासी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह समेत देश के सभी स्वतंत्रता सेनानियों के लिए स्मारक बनना चाहिए, ताकि यहां आने वाला हर व्यक्ति प्रेरणा लेकर जाए।

राजनीतिक अटकलों पर लगाया विराम

अपने संबोधन में उन्होंने भाजपा छोड़कर अन्य दल में जाने की चल रही चर्चाओं का भी खंडन किया। उन्होंने कहा कि मैं कहीं नहीं जा रहा हूं, ऐसी अफवाहों पर ध्यान न दें।

इस विशाल रैली में मलिहाबाद विधायक जय देवी, विधायक अमरेश रावत समेत कई ब्लॉक प्रमुख, ग्राम प्रधान, बीडीसी सदस्य और हजारों की संख्या में आम लोग मौजूद रहे। दूसरे राज्यों से भी तमाम लोग आप सम्मान रैली में भाग लेने पहुंचे। 
भारी भीड़ के कारण दुबग्गा-काकोरी मार्ग पर कुछ देर के लिए जाम की स्थिति भी बनी रही।