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शनिवार, 30 मई 2026
रोबोटिक सर्जरी से 9 वर्षीय बच्ची को मिला नया जीवन
रोबोटिक सर्जरी से 9 वर्षीय बच्ची को मिला नया जीवन
केजीएमयू में पहली बार हुई कोलेडोकल सिस्ट की रोबोटिक सर्जरी
लखनऊ। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग ने पहली बार रोबोटिक तकनीक से 9 वर्षीय बच्ची का जटिल ऑपरेशन सफलतापूर्वक कर नई उपलब्धि हासिल की है।
कई अस्पतालों के बाद केजीएमयू में मिला समाधान
फर्रुखाबाद निवासी 9 वर्षीय माही लंबे समय से कोलेडोकल सिस्ट (Choledochal Cyst) नामक दुर्लभ जन्मजात बीमारी से पीड़ित थी। कई अस्पतालों में इलाज के बावजूद राहत नहीं मिलने पर परिजन उसे केजीएमयू लेकर पहुंचे। जांच के बाद विशेषज्ञों ने रोबोटिक सर्जरी की सलाह दी।
क्या है कोलेडोकल सिस्ट?
कोलेडोकल सिस्ट पित्त (बाइल) ले जाने वाली नलिकाओं में होने वाली असामान्य सूजन या फैलाव की जन्मजात बीमारी है। समय पर इलाज न होने पर यह लीवर संक्रमण, पीलिया, बार-बार पेट दर्द और अन्य गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकती है। इसके उपचार में प्रभावित पित्त नलिका को हटाकर पित्त के प्रवाह के लिए नया मार्ग बनाया जाता है।
सफल रहा पहला रोबोटिक ऑपरेशन
विभागाध्यक्ष प्रो. जे.डी. रावत के नेतृत्व में 20 मई 2026 को रोबोटिक तकनीक से ऑपरेशन किया गया। पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग में इस बीमारी का यह पहला रोबोटिक ऑपरेशन था, जो पूरी तरह सफल रहा।
कम दर्द, तेजी से रिकवरी
रोबोटिक सर्जरी में छोटे चीरे लगते हैं, रक्तस्राव कम होता है और ऑपरेशन अधिक सटीकता से किया जा सकता है। यही कारण रहा कि माही की रिकवरी तेजी से हुई और 29 मई को उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
टीमवर्क से मिली सफलता
सर्जरी टीम में डॉ. सुधीर सिंह, डॉ. गुरमीत सिंह, डॉ. कृति पटेल, डॉ. अमोल और डॉ. रौनक शामिल रहे। नर्सिंग स्टाफ रीता, संजय और राकेश तथा एनेस्थीसिया विभाग से डॉ. मनीष सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कुलपति ने दी बधाई
केजीएमयू की कुलपति प्रो. सोनिया नित्यानंद ने इस उपलब्धि पर पूरी टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह सफलता आधुनिक चिकित्सा तकनीक और विशेषज्ञ चिकित्सकीय टीमवर्क का उत्कृष्ट उदाहरण है।
शुक्रवार, 29 मई 2026
पीजीआई में पहली बार मोटापा और बार-बार होने वाले हर्निया का एक साथ सफल ऑपरेशन
पीजीआई में पहली बार मोटापा और बार-बार होने वाले हर्निया का एक साथ सफल ऑपरेशन
कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को मिली राहत
गोंडा जिले की 42 वर्षीय रानी जैन का वजन 135 किलोग्राम था। हर्निया, डायबिटीज और अस्थमा की परेशानी के कारण उनका जीवन बेहद कठिन हो गया था। चलने-फिरने में दिक्कत के साथ वह सामाजिक परेशानियों का भी सामना कर रही थीं। अब उनकी जिंदगी सामान्य होने लगी है। यह संभव हुआ बैरियाट्रिक और हर्निया की एक साथ की गई जटिल सर्जरी के जरिए।
संजय गांधी पीजीआइ में पहली बार अत्यधिक मोटापा और बार-बार होने वाले इंसिजनल हर्निया से पीड़ित तीन मरीजों की जटिल बैरियाट्रिक सर्जरी और हर्निया ऑपरेशन एक साथ सफलतापूर्वक किए गए। डॉक्टरों के मुताबिक ऐसे मरीजों की सर्जरी बेहद जोखिमपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि मोटापे के साथ डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, सांस संबंधी बीमारियां और कमजोर मांसपेशियां ऑपरेशन को चुनौतीपूर्ण बना देती हैं।
गैस्ट्रो सर्जरी विभाग के प्रो. अशोक कुमार के मुताबिक र सर्जरी के 21 दिनों में उनका लगभग 18 किलोग्राम वजन कम हुआ। इसी तरह
आजमगढ़ निवासी 34 वर्षीय किरन पांडेय के हर्निया के पहले ही दो ऑपरेशन हो चुके थे। उनका वजन 102 किलोग्राम था और कई अन्य परेशानियां भी थीं। सर्जरी के बाद उनका करीब 28 किलोग्राम वजन कम हुआ और हर्निया से राहत मिली।
इंदिरा नगर, लखनऊ की 40 वर्षीय रेखा पांडेय का वजन लगभग 100 किलोग्राम था। वह भी हर्निया और अन्य बीमारियों से परेशान थीं। ऑपरेशन के बाद उनका करीब 11 किलोग्राम वजन कम हुआ और स्वास्थ्य में सुधार आया।
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सर्जरी से पहले तैयारी
प्रो. अशोक कुमार ने बताया कि यह सामान्य बैरियाट्रिक सर्जरी नहीं थी, बल्कि ऐसे मरीजों का इलाज था जिनमें कई गंभीर बीमारियां और बार-बार हर्निया होने की समस्या मौजूद थी। सर्जरी से पहले मरीजों को खानपान में बदलाव, योग और नियमित व्यायाम के जरिए तैयार किया गया।
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दूसरी परेशानियों में भी कारगर है सर्जरी
डॉक्टरों के मुताबिक बैरियाट्रिक सर्जरी के जरिए केवल वजन ही कम नहीं होता, बल्कि डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, फैटी लिवर, कोलेस्ट्रॉल और स्लीप एपनिया जैसी बीमारियों को नियंत्रित करने में भी मदद मिलती है।
सर्जरी टीम
ऑपरेटिंग सर्जन : प्रो. अशोक कुमार
सहायक सर्जन : डॉ. पायल, डॉ. सौरेश, डॉ. यासिर, डॉ. सोहेल, डॉ. देवेश, डॉ. किशोर के., डॉ. अक्षत
एनेस्थीसिया टीम : डॉ. तपस, डॉ. संदीप कुबा, डॉ. सुजीत गौतम
नर्सिंग ऑफिसर : संतोष, दीपमाला, अनीता
सपोर्टिंग स्टाफ : प्रशांत, रेखा, ममता
बुधवार, 27 मई 2026
हार्ट सर्जरी में दिल को सुरक्षा देगा खास घोल
हार्ट सर्जरी में दिल को सुरक्षा देगा खास घोल
हार्ट सर्जरी में इस्तेमाल होने वाले दो सुरक्षा घोलों के प्रभाव का अध्ययन
ओपन हार्ट सर्जरी के दौरान डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती दिल की मांसपेशियों को सुरक्षित रखने की होती है। सर्जरी के समय कुछ देर के लिए दिल की धड़कन नियंत्रित तरीके से रोकी जाती है, ताकि ऑपरेशन आसानी और सुरक्षित ढंग से किया जा सके। इसी दौरान इस्तेमाल होने वाले विशेष सुरक्षा घोलों को लेकर संजय गांधी पीजीआई और सेंटर फॉर बायोमेडिकल रिसर्च ने अहम अध्ययन किया है। अध्ययन में यह समझने की कोशिश की गई कि हार्ट सर्जरी में इस्तेमाल होने वाले अलग-अलग कार्डियोप्लेजिया घोल शरीर में किस तरह के जैव-रासायनिक बदलाव पैदा करते हैं और उनका दिल की कोशिकाओं पर क्या असर पड़ सकता है। हार्ट सर्जन प्रोफेसर एसके अग्रवाल के मुताबिक हार्ट सर्जरी के दौरान मरीज को “कार्डियोप्लेजिया घोल” दिया जाता है। यह घोल हृदय की रक्त वाहिकाओं के जरिए सीधे दिल तक पहुंचाया जाता है। इसका उद्देश्य कुछ समय के लिए दिल की धड़कन को नियंत्रित तरीके से रोकना और दिल की मांसपेशियों को ऊर्जा व सुरक्षा देना होता है। एनेस्थीसिया विभाग के प्रोफेसर अमित रस्तोगी के मुताबिक अध्ययन में दो प्रमुख कार्डियोप्लेजिया घोलों के प्रभावों की तुलना की गई। एक घोल की खासियत यह है कि इसका असर अपेक्षाकृत लंबे समय तक बना रह सकता है, जबकि दूसरे को जरूरत के अनुसार दोबारा देना पड़ सकता है।
शोध में क्या पता चला
अध्ययन में 22 मरीजों के रक्त नमूनों की जांच की गई। सर्जरी के दौरान और बाद में दिल तथा नसों से लिए गए रक्त का विश्लेषण 800 मेगाहर्ट्ज एनएमआर स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीक से किया गया। जांच में पाया गया कि दोनों घोलों के इस्तेमाल के बाद शरीर में अलग-अलग तरह के मेटाबॉलिक बदलाव हुए। इनमें “सक्सिनेट” नामक जैव-रासायनिक पदार्थ का स्तर महत्वपूर्ण पाया गया। वैज्ञानिकों के मुताबिक सक्सिनेट शरीर में उस स्थिति का संकेत हो सकता है, जब दिल में रक्त प्रवाह रुकने और दोबारा शुरू होने के दौरान कोशिकाओं पर तनाव बढ़ता है। रक्त प्रवाह दोबारा शुरू होने पर यह प्रक्रिया हानिकारक ऑक्सीजन कणों के बनने से जुड़ सकती है, जो कोशिकाओं को प्रभावित कर सकते हैं। शोधकर्ताओं ने कहा कि अध्ययन में दोनों घोलों के प्रभाव में अंतर देखा गया है।
मरीजों को क्या होगा फायदा
प्रोफेसर अमित रस्तोगी का कहना कि यदि भविष्य में यह बेहतर तरीके से समझा जा सके कि किस स्थिति में कौन सा कार्डियोप्लेजिया घोल अधिक उपयुक्त हो सकता है, तो हार्ट सर्जरी के दौरान दिल की सुरक्षा को और बेहतर बनाया जा सकता है। इससे मरीजों के जल्दी स्वस्थ होने और जटिलताओं के खतरे को कम करने में मदद मिल सकती है।
इन्होंने किया शोध
इस अध्ययन में संस्थान के एनेस्थीसियोलॉजी विभाग के प्रो. अमित रस्तोगी और प्रो प्रभात तिवारी, सीवीटीएस विभाग के प्रो शांतनु पांडे और प्रो सुरेंद्र कुमार अग्रवाल तथा सीबीएमआर के डॉ. रिमझिम त्रिवेदी, डॉ. दुर्गेश दुबे और डॉ. दिनेश कुमार शामिल रहे। प्रो शांतनु पांडे के मुताबिक शोध “कम्पेरेटिव एनालिसिस ऑफ क्लिनिको-मेटाबॉलिक प्रोफाइल्स बिटवीन सेंट थॉमस एंड डेल नीडो कार्डियोप्लेजिया सॉल्यूशंस : ए पायलट स्टडी” विषय पर किया गया। यह शोध अंतरराष्ट्रीय मेडिकल पत्रिका “परफ्यूजन” ने स्वीकार किया है।
शनिवार, 23 मई 2026
साइलेंट इमरजेंसी : रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक पर बढ़ा खतरा
साइलेंट इमरजेंसी : रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक पर बढ़ा खतरा
एंटीबायोटिक का कोर्स पुराने करना सबसे बड़ा कारण
एसजीपीजीआइ की जांच में खुलासा, कई दवाओं के खिलाफ तेजी से बढ़ रही बैक्टीरिया की रेजिस्टेंस 10 से 40 फ़ीसदी लोगों में मिला रेजिस्टेंस
खांसी, जुकाम, बुखार, पेशाब के संक्रमण और फेफड़ों की बीमारियों में धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रही एंटीबायोटिक दवाएं अब धीरे-धीरे बेअसर होती जा रही हैं। संजय गांधी पीजीआई के माइक्रोबायोलॉजी विभाग में एक हजार से अधिक सैंपलों की जांच में यह सामने आया है कि कई सामान्य एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ बैक्टीरिया तेजी से रेजिस्टेंस विकसित कर रहे हैं। विशेषज्ञों ने इसे आने वाले समय के लिए गंभीर चेतावनी माना है। इसका सबसे बड़ा कारण एंटीबायोटिक का कोर्स पूरा न करना है देखा गया है कि 40 से 50 फ़ीसदी लोग जैसे ही आराम मिलता है एंटीबायोटिक लेना बंद कर देते हैं। पीजीआइ के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के अनुसार जांच में एजिथ्रोमाइसिन के खिलाफ करीब 10 प्रतिशत, जबकि सिप्रोफ्लॉक्सासिन और लीवोफ्लॉक्सासिन के खिलाफ करीब 40 प्रतिशत तक रेजिस्टेंस पाया गया। इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में मरीजों पर ये दवाएं पहले जैसा असर नहीं कर रहीं। डॉक्टरों का कहना है कि बिना सलाह एंटीबायोटिक लेना, अधूरा कोर्स छोड़ देना और वायरल बीमारियों में भी इन दवाओं का इस्तेमाल इसकी बड़ी वजह है। विशेषज्ञों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में हर साल करोड़ों रुपये की एंटीबायोटिक दवाएं इस्तेमाल होती हैं। इनमें सबसे ज्यादा उपयोग खांसी-जुकाम, यूरिन इंफेक्शन, टाइफाइड और फेफड़ों के संक्रमण में होता है। लेकिन दवाओं के अंधाधुंध उपयोग से बैक्टीरिया अब इन दवाओं के खिलाफ मजबूत होते जा रहे हैं।
यूपी में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक
एजिथ्रोमाइसिन रेजिस्टेंस : करीब 10% काम : गले, खांसी और फेफड़ों के बैक्टीरियल संक्रमण में क्या हो रहा : वायरल जुकाम और बुखार में भी लोग खुद से खा रहे
एमोक्सिसिलिन विथ क्लैवुलेनिक एसिड रेजिस्टेंस : 20-25% तक काम : फेफड़े और अन्य बैक्टीरियल संक्रमण में क्या हो रहा : जरूरत से ज्यादा उपयोग से असर घट रहा सिप्रोफ्लॉक्सासिन रेजिस्टेंस : करीब 40% काम : पेट, पेशाब और अन्य संक्रमणों में क्या हो रहा : बार-बार दवा लेने से बैक्टीरिया मजबूत हो रहे यूपी में अनुमानित सालाना खर्च : करीब 180 करोड़ रुपए
लीवोफ्लॉक्सासिन रेजिस्टेंस : करीब 40% काम : यूरिन इंफेक्शन, टाइफाइड और फेफड़ों के संक्रमण में क्या हो रहा : कई मरीजों में दवा का असर तेजी से कम
सेफिक्सिम रेजिस्टेंस : 20% तक काम : टाइफाइड और सामान्य बैक्टीरियल संक्रमणों में
क्यों हो रहा : बिना जांच लंबे समय तक इस्तेमाल “सामान्य संक्रमण भी भविष्य में गंभीर चुनौती बन सकते हैं”
एक्सपर्ट की बात
एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस अब केवल आईसीयू या बड़े अस्पतालों तक सीमित नहीं रह गया है। सामान्य मरीजों में भी तेजी से यह समस्या बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि वायरल बीमारी में एंटीबायोटिक का कोई फायदा नहीं होता, लेकिन लोग बिना जांच और बिना डॉक्टर सलाह दवा ले लेते हैं। इससे बैक्टीरिया दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं। उन्होंने कहा कि अब कई मामलों में डॉक्टरों को कल्चर और सेंसिटिविटी टेस्ट करवाने के बाद ही एंटीबायोटिक चुननी पड़ रही है क्योंकि पहले इस्तेमाल होने वाली सामान्य दवाएं असर नहीं कर रहीं। यदि एंटीबायोटिक का इस्तेमाल नियंत्रित नहीं हुआ तो आने वाले वर्षों में सामान्य संक्रमण का इलाज भी कठिन हो सकता है।
प्रो चिन्मय साहू माइक्रोबायोलॉजी पीजीआइ
पशुपालन और अधूरा इलाज भी बढ़ा रहा खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार पोल्ट्री और डेयरी सेक्टर में एंटीबायोटिक का अत्यधिक उपयोग भी रेजिस्टेंस बढ़ाने का बड़ा कारण है। चिकन, दूध और अन्य खाद्य पदार्थों के जरिए दवाओं के अवशेष इंसानों तक पहुंचते हैं। वहीं मरीजों द्वारा बीच में दवा बंद कर देना भी बैक्टीरिया को और ज्यादा मजबूत बना देता है। डॉक्टरों का कहना है कि एंटीबायोटिक केवल डॉक्टर की सलाह पर ही लेनी चाहिए और पूरा कोर्स पूरा करना जरूरी है।
सोमवार, 18 मई 2026
20 दिनों तक मौत से लड़ता रहा डेढ़ साल का मासूम, पीजीआई के डॉक्टरों ने सांस की नली से निकाली मूंगफली
कैंसर मरीज की मौत गर्दन पर गहरा घाव
गॉलब्लैडर कैंसर से पीड़ित मरीज की मौत, पीजीआई प्रशासन ने पुलिस को दी सूचना
लखनऊ। बस्ती निवासी 61 वर्षीय मरीज मुस्ताक अली को एडवांस्ड एडेनो कार्सिनोमा ऑफ गॉलब्लैडर के उपचार के लिए 21 अप्रैल 2026 को डॉ. आशीष सिंह की देखरेख में गैस्ट्रो सर्जरी वार्ड में भर्ती किया गया था।
संस्थान की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार 17 मई 2026 की रात मरीज की हालत स्थिर थी। वह सहज थे और कर्मचारियों से सामान्य रूप से बातचीत कर रहे थे।
18 मई 2026 की सुबह पास के बिस्तर पर भर्ती एक मरीज के तीमारदार ने मुस्ताक अली की हालत गंभीर होने की सूचना वार्ड के नर्सिंग स्टाफ को दी। नर्सिंग स्टाफ ने तुरंत उनकी जांच की, जिसमें मरीज की नब्ज और रक्तचाप नहीं मिला तथा वे कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे थे। उनकी दाहिनी गर्दन पर गहरा घाव था। मरीज के सिर के आसपास, बिस्तर पर और फर्श पर काफी मात्रा में खून फैला हुआ था।
वार्ड के नर्सिंग स्टाफ ने तत्काल सीपीआर शुरू किया और वार्ड के रेजिडेंट डॉक्टर को सूचना दी। स्थिति को देखते हुए रेजिडेंट डॉक्टर ने भी सीपीआर में सहयोग किया। प्रोटोकॉल के अनुसार करीब 15 मिनट तक सीपीआर करने के बावजूद मरीज को बचाया नहीं जा सका।
संस्थान प्रशासन ने मामले की जानकारी आगे की जांच के लिए तुरंत पुलिस को दे दी है।
क्या है
एडवांस्ड एडेनो कार्सिनोमा ऑफ गॉलब्लैडर तो इसका मतलब आमतौर पर कैंसर गॉलब्लैडर से बाहर फैल चुका है या ऑपरेशन से पूरी तरह निकालना संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में इलाज का लक्ष्य अक्सर बीमारी को नियंत्रित करना, दर्द कम करना और जीवन की गुणवत्ता बेहतर रखना होता है।
जीवन अवधि हर मरीज में अलग होती है, लेकिन मेडिकल आंकड़ों के अनुसार:
कई मरीज कुछ महीनों तक जीवित रहते हैं।
कुछ मरीज कीमोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी या इम्यूनोथेरेपी से 1 साल या उससे अधिक भी जी सकते हैं।
अगर शरीर कमजोर हो, लिवर बहुत प्रभावित हो, बार-बार संक्रमण या पीलिया हो, तो स्थिति ज्यादा गंभीर मानी जाती है।
इन लक्षणों से डॉक्टर गंभीरता का अंदाजा लगाते हैं:
तेजी से वजन घटना
बहुत कमजोरी
लगातार पीलिया
पेट में पानी भरना
तेज दर्द
खाना कम हो जाना
सांस फूलना या बार-बार संक्रमण
शनिवार, 16 मई 2026
30 से 300 के बीच पेशाब में एल्ब्यूमिन तो बचाई जा सकती है जिन किडनी पीजीआई के नेफ्रोलॉजी विभाग का स्थापना दिवस समारोह
एसजीपीजीआई ने किडनी प्रत्यारोपण में बनाया नया रिकॉर्ड, प्रदेशभर में बढ़ेगी सुविधा
उपमुख्यमंत्री बोले- वन विभाग का गेस्ट हाउस संस्थान को दिलाने का होगा प्रयास, अंगदान बढ़ाने पर दिया जोर
उत्कृष्ट कार्य करने वाले हुए सम्मानित
संजय गांधी पीजीआई के नेफ्रोलॉजी विभाग के 39वें स्थापना दिवस समारोह में किडनी प्रत्यारोपण, अंगदान और मरीजों की सुविधाओं को लेकर कई बड़े ऐलान हुए। संस्थान ने इस वर्ष 178 सफल किडनी प्रत्यारोपण कर अब तक का नया रिकॉर्ड बनाया है। वहीं प्रदेश के कई मेडिकल कॉलेजों में भी किडनी प्रत्यारोपण सेवाएं शुरू कराने की दिशा में तेजी से काम चल रहा है।
समारोह में पहुंचे उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने कहा कि वन विभाग का गेस्ट हाउस एसजीपीजीआई को देने के लिए वह वन मंत्री से बात करेंगे और जल्द निर्णय कराया जाएगा। उन्होंने कहा कि इससे बाहर से इलाज, पढ़ाई और प्रशिक्षण के लिए आने वाले मरीजों, तीमारदारों और छात्रों को राहत मिलेगी।
उन्होंने कहा कि परिसर में 10 से 20 कमरों के साथ लगभग 200 लोगों की क्षमता वाला एक बड़ा बैठक कक्ष विकसित किया जा सकता है। इससे मरीजों के परिजनों और शैक्षणिक गतिविधियों दोनों को सुविधा मिलेगी।
प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों तक पहुंच रही एसजीपीजीआई की विशेषज्ञता
संस्थान के नेफ्रोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर नारायण प्रसाद, प्रोफेसर अनुपमा कौल और प्रोफेसर रवि शंकर कुशवाहा ने बताया कि एसजीपीजीआई अब केवल लखनऊ तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में किडनी प्रत्यारोपण सेवाओं का नेटवर्क तैयार कर रहा है।
उन्होंने बताया कि संस्थान की टीम ने किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय, लखनऊ और मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज, प्रयागराज में किडनी प्रत्यारोपण सेवाएं शुरू करा दी हैं। वहीं राजकीय मेडिकल कॉलेज झांसी, सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज आगरा और गणेश शंकर विद्यार्थी मेडिकल कॉलेज कानपुर को भी प्रत्यारोपण की अनुमति मिल चुकी है। उपयुक्त दाता और मरीज मिलते ही इन संस्थानों में भी प्रत्यारोपण शुरू हो जाएगा।
प्रोफेसर कुशवाहा ने बताया कि केवल केजीएमयू में ही एसजीपीजीआई की टीम 19 किडनी प्रत्यारोपण कर चुकी है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में अलग-अलग केंद्रों पर यह सुविधा शुरू होने से मरीजों को इलाज के लिए लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
इस वर्ष 178 प्रत्यारोपण, लक्ष्य 250 तक पहुंचाने का
प्रोफेसर नारायण प्रसाद ने बताया कि पहले संस्थान में सालाना लगभग 135 किडनी प्रत्यारोपण होते थे, जबकि इस वर्ष यह संख्या बढ़कर 178 तक पहुंच गई है। विभाग का लक्ष्य इसे बढ़ाकर 250 तक ले जाने का है।
उन्होंने बताया कि संस्थान लगातार अंगदान को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता अभियान चला रहा है। इसी का परिणाम है कि इस वर्ष चार मृत देहदाता किडनी प्रत्यारोपण सफलतापूर्वक किए जा चुके हैं।
उन्होंने कहा कि विभिन्न विभागों के बेहतर समन्वय के कारण संस्थान में हृदय प्रत्यारोपण भी संभव हो पाया है। अंगदान की प्रक्रिया मजबूत होने से भविष्य में अन्य अंग प्रत्यारोपण सेवाओं को भी गति मिलेगी।
डायलिसिस सेवाओं का बड़ा विस्तार
संस्थान में डायलिसिस सेवाओं का भी तेजी से विस्तार किया गया है। पहले प्रतिदिन 120 से 125 मरीजों की डायलिसिस होती थी, जो अब बढ़कर लगभग 250 मरीज प्रतिदिन हो गई है। इसके लिए आपातकालीन एवं रिनल ट्रांसप्लांट सेंटर में चार समर्पित वार्ड बनाए गए हैं।
विशेषज्ञों ने बताया कि मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए सुविधाओं और मानव संसाधनों दोनों का विस्तार किया जा रहा है ताकि मरीजों को समय पर उपचार मिल सके।
किडनी के इमरजेंसी मरीजों के लिए विशेष व्यवस्था
प्रो अनुपमा ने बताया कि संस्थान में फॉलोअप पर चल रहे किडनी मरीजों के लिए विशेष आपातकालीन व्यवस्था बनाई गई है। यदि किसी मरीज की हालत गंभीर होती है तो पहले उसे इमरजेंसी में बेड देने की कोशिश की जाती है।
यदि इमरजेंसी में बेड उपलब्ध नहीं होता तो मरीज या उसके परिजनों को हर सुबह रिनल ट्रांसप्लांट सेंटर की तीसरी मंजिल पर बुलाया जाता है। यहां सभी यूनिट के विशेषज्ञ चिकित्सक राउंड के बाद खाली हुए बेड और मरीज की गंभीरता का आकलन करते हैं। ज्यादा गंभीर मरीजों को प्राथमिकता के आधार पर भर्ती किया जाता है, जबकि जिन मरीजों की स्थिति दवाओं और सलाह से नियंत्रित हो सकती है उन्हें उपचार देकर घर भेज दिया जाता है।
अंगदान बढ़ाने के लिए ट्रॉमा सेंटर को निर्देश
उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने कहा कि प्रदेश में अंगदान को बढ़ावा देने के लिए और गंभीर प्रयास करने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय ट्रॉमा सेंटर के अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि सड़क दुर्घटना या ब्रेन डेड की स्थिति वाले मामलों की सूचना तुरंत एसजीपीजीआई और मुख्य चिकित्सा अधिकारी को दी जाए।
उन्होंने कहा कि समय पर सूचना मिलने से परिजनों की काउंसलिंग की जा सकेगी और जरूरत पड़ने पर वह स्वयं भी परिवार से बात करेंगे।
उत्तर प्रदेश में जरूरत ज्यादा, प्रत्यारोपण कम
प्रोफेसर अनुपम कौल ने बताया कि उत्तर प्रदेश में हर वर्ष लगभग 50 हजार मरीजों को किडनी प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है, लेकिन पूरे प्रदेश में केवल 500 से 700 प्रत्यारोपण ही हो पा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि इस अंतर को कम करने के लिए अंगदान को जनआंदोलन बनाना होगा और प्रदेश में अधिक से अधिक प्रत्यारोपण केंद्र स्थापित करने होंगे।
उन्नत वृक्क रोग केंद्र बनाने का सुझाव
इस मौके पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के मेडिकल कॉलेज के निदेशक प्री एस एन शंखवार ने कहा कि गुजरात की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी उन्नत वृक्क रोग एवं अनुसंधान केंद्र स्थापित किया जाना चाहिए।
उन्होंने सुझाव दिया कि एसजीपीजीआई के आपातकालीन एवं रिनल ट्रांसप्लांट सेंटर को एक समर्पित उन्नत वृक्क केंद्र के रूप में विकसित किया जाए, जिससे प्रदेश के लाखों मरीजों को लाभ मिल सके।
शुरुआती जांच से बचाई जा सकती है किडनी
विशेषज्ञों ने बताया कि किडनी की कई बीमारियां ऐसी होती हैं जिन्हें शुरुआती अवस्था में पहचानकर नियंत्रित किया जा सकता है। यदि किसी मरीज में माइक्रो एल्ब्यूमिन यूरिया 30 से 300 मिलीग्राम तक पाया जाता है तो “फोर्थ पिलर थेरेपी” के जरिए किडनी को खराब होने से काफी हद तक बचाया जा सकता है।
समारोह में यह सम्मानित
मृत देहदाता परिवारों को विशेष सम्मान
स्वर्गीय संदीप सिंह की पत्नी
स्वर्गीय रानी देवी के पति
लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड
डॉ. विजय खेर
विशिष्ट पूर्व छात्र सम्मान
डॉ. श्याम बंसल
सचिव, इंडियन सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी
मृत देहदाता प्रत्यारोपण कार्यक्रम में योगदान के लिए सम्मान
डॉ. एन. गोपालकृष्णन, निदेशक ट्रांसटान
श्रीमती ललिता रघुरमन, निदेशक मोहन फाउंडेशन
डॉ. विवेक कुटे, सचिव इंडियन सोसायटी ऑफ ऑर्गन ट्रांसप्लांटेशन
डॉ. अरविंद गुप्ता, विभागाध्यक्ष नेफ्रोलॉजी, प्रयागराज मेडिकल कॉलेज
सर्वश्रेष्ठ सीनियर रेजिडेंट सम्मान
डॉ. यशेंदु सारदा
डॉ. सौर्य सौरभ मोहाकुड़ा
डॉ. आकाश राय
डॉ. कृतिका गुप्ता
ब्रिजिंग द बॉन्ड अवॉर्ड
संतोष वर्मा
कस्टोडियन अवॉर्ड
राजीव खान
नाइटिंगेल ऑफ द ईयर सम्मान
अनीता शेरॉन
रजनी गांधा
पुष्पा अखिलेश
डॉली एंटनी
मोहम्मद नसीम
प्रिंसी
लवेश
डिलिजेंट वर्कर अवॉर्ड
रोहित
राम प्रताप
सुधा
संतोष कुमार
संजय
मधु
प्रेमचंद
महेश कुमार
प्रशांत सिंह
मीरा
गुड्डी
अभिषेक
बॉक्स : इस वर्ष की बड़ी उपलब्धियां
178 सफल किडनी प्रत्यारोपण
लक्ष्य 250 प्रत्यारोपण तक पहुंचाने का
चार मृत देहदाता किडनी प्रत्यारोपण
प्रतिदिन 250 मरीजों की डायलिसिस
चार समर्पित डायलिसिस वार्ड
पीजीआई ने दिया प्राकृतिक ऊर्जा बचाने का मंत्र
एसजीपीजीआई में वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच साइकिलिंग को बढ़ावा देने हेतु साइक्लोथॉन का आयोजन*
वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच पेट्रोलियम उत्पादों की बचत में योगदान देने के लिए, एसजीपीजीआईएमएस ने परिसर के भीतर कम दूरी के आवागमन के लिए मोटर चालित वाहनों के उपयोग को कम करने की पहल की है।
शनिवार, 16 मई 2026 को सुबह 9:00 बजे निदेशक कार्यालय, प्रशासनिक ब्लॉक से एक "प्रतीकात्मक साइक्लोथॉन" का आयोजन किया गया। रैली पुरानी ओपीडी से होते हुए संस्थान के गेट नंबर 2, ईएमआरटीसी, एडवांस्ड डायबिटिक सेंटर, पीएमएसएसवाई से गुजरी और वापस प्रशासनिक ब्लॉक में समाप्त हुई। संस्थान के निदेशक पद्मश्री प्रोफेसर आर. के. धीमन, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. देवेंद्र गुप्ता, डीन डॉ. शालीन कुमार, नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. नारायण प्रसाद, एनेस्थिसियोलॉजी विभाग के एचओडी डॉ. संजय धीराज, एंडोक्राइन सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. गौरव अग्रवाल, वित्त अधिकारी श्री शशि भूषण सिंह तोमर, संयुक्त निदेशक प्रशासन श्री प्रकाश सिंह, अन्य संकाय सदस्य, अधिकारी और तकनीकी कर्मचारी इस साइकिल रैली में शामिल हुए।
यह पहल माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ द्वारा भारत के सभी नागरिकों से पेट्रोलियम उत्पादों का सावधानीपूर्वक और
जिम्मेदारीपूर्वक उपयोग करने की अपील के अनुरूप है, ताकि पश्चिम एशिया संघर्ष से उत्पन्न वैश्विक ऊर्जा संकट के मद्देनजर पेट्रोलियम उत्पादों के संरक्षण को बढ़ावा दिया जा सके और उनके उपयोग को यथासंभव कम किया जा सके। सभी को दैनिक यात्रा के लिए यथासंभव सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता देनी चाहिए।
यह कदम परिसर के वातावरण को बेहतर बनाने और शिक्षकों, कर्मचारियों और छात्रों के बेहतर स्वास्थ्य और कल्याण को बढ़ावा देने में भी सहायक होगा।
मंगलवार, 12 मई 2026
एसजीपीजीआई में अंतरराष्ट्रीय नर्सिंग दिवस पर नर्सिंग अधिकारियों का सम्मान
एसजीपीजीआई में अंतरराष्ट्रीय नर्सिंग दिवस पर नर्सिंग अधिकारियों का सम्मान
सीएनओ मंजू सिंह बोलीं- गुणवत्ता और वैज्ञानिक सोच के दम पर पीजीआई की नर्सिंग सेवा बना रही नई पहचान
सप्ताहभर चले कार्यक्रमों में रक्तदान, खेल प्रतियोगिताएं और सम्मान समारोह का आयोजन
संजय गांधी पीजीआई में अंतरराष्ट्रीय नर्सिंग दिवस मंगलवार को उत्साह और गरिमा के साथ मनाया गया। सप्ताहभर चले कार्यक्रमों का समापन सम्मान समारोह के साथ हुआ, जिसमें संस्थान की नर्सिंग अधिकारियों को उत्कृष्ट सेवाओं के लिए मोमेंटो और प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया गया।
मुख्य नर्सिंग अधिकारी मंजू सिंह ने कहा कि एसजीपीजीआई की नर्सें बेहतर गुणवत्ता वाली मरीज सेवा और वैज्ञानिक सोच के मामले में लगातार नई ऊंचाइयों को छू रही हैं। उन्होंने कहा कि मरीज की देखभाल केवल ड्यूटी नहीं बल्कि संवेदनशील जिम्मेदारी है। नर्सिंग टीम अपने समर्पण और अनुशासन से संस्थान को देश के अग्रणी चिकित्सा संस्थानों में अलग पहचान दिला रही है।
उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले समय में भी एसजीपीजीआई की नर्सिंग सेवा प्रगति के नए आयाम स्थापित करेगी और मरीजों की सेवा में संस्थान का नाम और ऊंचा करेगी।
समारोह में संस्थान के निदेशक, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक, चिकित्सा अधीक्षक, डीन, एटीसी चीफ, कॉलेज ऑफ नर्सिंग की प्रिंसिपल डॉ. प्रेरणा कपूर तथा मुख्य अतिथि श्रीमती उषा टकरी ने नर्सिंग अधिकारियों को बधाई दी और उन्हें पुरस्कृत किया।
एक सप्ताह तक चले नर्सिंग दिवस समारोह में रक्तदान शिविर, क्रिकेट, बैडमिंटन, वॉलीबॉल, फुटबॉल, मैराथन, मटका फोड़, शतरंज समेत विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं और सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन किया गया। इनमें नर्सिंग अधिकारियों ने उत्साह के साथ भाग लिया।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि एसजीपीजीआई केवल एक अस्पताल नहीं, बल्कि उत्तर भारत में जटिल बीमारियों के इलाज का प्रमुख केंद्र है। लीवर प्रत्यारोपण से लेकर न्यूरो सर्जरी तक हर चुनौतीपूर्ण उपचार में नर्सिंग अधिकारियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रहती है। मरीजों की चौबीसों घंटे सेवा और देखभाल ही संस्थान की सबसे बड़ी पहचान है।
फ्लोरेंस नाइटिंगेल को याद करते हुए वक्ताओं ने कहा कि नर्सिंग केवल पेशा नहीं, बल्कि मानवता की सबसे बड़ी सेवा है। यही समर्पण एसजीपीजीआई की नर्सिंग टीम को विशेष बनाता है।
एक फेफड़ा निकालने के बाद भी डॉक्टरों ने बचाई जान
70 दिन वेंटिलेटर पर रहने के बाद लौटी जिंदगी
सड़क हादसे में बुरी तरह घायल हुई 21 वर्षीय शगुन ने मौत से जीती जंग, एक फेफड़ा निकालने के बाद भी डॉक्टरों ने बचाई जान
अयोध्या की रहने वाली 21 वर्षीय शगुन के लिए 28 फरवरी 2026 का दिन जिंदगी बदल देने वाला साबित हुआ। सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल होने के बाद वह घरवालों को बेहोशी की हालत में मिली। छाती में गहरी चोट लगने के कारण उसे तुरंत लखनऊ ट्रॉमा सेंटर रेफर किया गया। हालत इतनी नाजुक थी कि कई बार डॉक्टरों को भी उसकी जिंदगी बचने की उम्मीद बेहद कम नजर आई, लेकिन करीब 70 दिन तक चले संघर्ष, इलाज और डॉक्टरों की लगातार कोशिशों के बाद आखिरकार शगुन ने मौत को मात दे दी।
3 मार्च 2026 को थोरेसिक विभाग के डॉ. शैलेंद्र ने उसका बड़ा ऑपरेशन किया। हादसे में उसका बायां फेफड़ा पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका था, इसलिए उसे निकालना पड़ा। ऑपरेशन के बाद शगुन को एनेस्थीसिया विभाग के सीसीयू-2 में भर्ती किया गया, जहां उसकी जिंदगी बचाने के लिए लगातार जद्दोजहद चलती रही।
इलाज के दौरान शगुन के दिल का दाहिना हिस्सा ठीक से काम नहीं कर पा रहा था। इसके कारण दिल के चारों तरफ पानी भर गया और ब्लड प्रेशर बेहद कम हो गया। इस गंभीर स्थिति को चिकित्सकीय भाषा में “पेरिकार्डियल टेंपोनाड” कहा जाता है। डॉक्टरों ने कैथेटर डालकर पानी बाहर निकाला, तब जाकर उसकी हालत कुछ संभली।
मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। शगुन के पास केवल दाहिना फेफड़ा बचा था, लेकिन लंबे समय तक वेंटिलेटर और गहरी सांसों के दबाव की वजह से उसमें भी हवा भर गई। इस स्थिति को “न्यूमोथोरेक्स” कहा जाता है। हवा भरने से वेंटिलेटर से सांस पहुंचना बंद होने लगा और उसकी जान पर फिर खतरा मंडराने लगा। डॉक्टरों ने तुरंत नली डालकर फेफड़े से हवा निकाली और स्थिति को नियंत्रित किया।
एक ही फेफड़े के सहारे मरीज को वेंटिलेटर से हटाना डॉक्टरों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया था। ट्रैकियोस्टॉमी और हाई फ्लो नेजल ऑक्सीजन की मदद से धीरे-धीरे उसकी सांस सामान्य कराई गई। करीब 70 दिन तक चले इस कठिन इलाज और निगरानी के बाद आखिरकार 12 मई 2026 को शगुन को सीसीयू-2 से थोरेसिक वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया।
अब शगुन खाना खा रही है, बातचीत कर रही है और सहारे से चलना भी शुरू कर चुकी है। परिवार के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं है।
इन डॉक्टरों और स्टाफ ने निभाई अहम भूमिका
सीसीयू-2 की इस पूरी टीम ने शगुन की जिंदगी बचाने में अहम भूमिका निभाई। टीम का नेतृत्व विभागाध्यक्ष डॉ. मोनिका कोहली ने किया। फैकल्टी टीम में डॉ. विपिन सिंह, डॉ. विनोद और डॉ. मयंक शामिल रहे। रेजीडेंट डॉक्टरों में डॉ. शिखा, डॉ. अख्तर, डॉ. ज्योति, डॉ. अपूर्वा और डॉ. प्रियांशी ने लगातार निगरानी और इलाज संभाला। नर्सिंग स्टाफ में डॉ. निशा, डॉ. ममता और अन्य कर्मचारियों ने दिन-रात मरीज की देखभाल की।
रविवार, 10 मई 2026
पिगटेल तकनीक से एंजियोग्राफी होगी और सुरक्षित
पिगटेल तकनीक से एंजियोग्राफी होगी और सुरक्षित
एंजियोग्राफी में पिगटेल कैथेटर सेहोगी नसों की सुरक्षा और जटिलताएं कम
दिल के इलाज में की जाती है एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी
कुमार संजय
दिल की बीमारियों में एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी आम प्रक्रियाएं हैं, लेकिन इन दौरान हाथ की नसों में चोट ( इंजरी) होना आम समस्या रही है। अक्सर गाइड कैथेटर की नुकीली टिप से नसों में रेज़र ब्लेड इफेक्ट बनता है, जिससे नस में ऐंठन, चोट, सूजन और ब्लॉकेज जैसी जटिलताएं हो सकती हैं। संजय गांधी पीजीआइ के कार्डियोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों ने शोध में पाया गया कि पिगटेल असिस्टेड ट्रैकिंग (पीएटी) तकनीक इन समस्याओं को आधे से भी ज्यादा कम कर देती है।विशेषज्ञों ने 260 मरीजों पर अध्ययन किया। मरीजों को दो समूहों में बांटा गया। एक समूह में पीएटी तकनीक का इस्तेमाल किया गया, जबकि दूसरे में पारंपरिक गाइड कैथेटर। परिणाम बताते हैं कि पीएटी तकनीक वाले समूह में हाथ की नसों में जटिलताएं केवल 11.5 प्रतिशत थीं, जबकि पारंपरिक कैथेटर में यह 25.4 प्रतिशत थी।
क्या होता है पिगटेल
मुख्य शोधकर्ता प्रो. नवीन गर्ग के मुताबिक पिगटेल कैथेटर एक पतली और लचीली नली होती है, जिसका सिरा गोल और घुमावदार (पिगटेल) होता है। इसे गाइड कैथेटर के अंदर डाला जाता है। इसका गोल सिरा नस के अंदर सुरक्षित रहता है, घर्षण और चोट का जोखिम कम करता है और ब्लॉकेज हटाने में मदद करता है। पारंपरिक कैथेटर की तुलना में यह मरीजों के लिए अधिक आरामदायक होता है। तकनीकी अंतर की बात करें तो पिगटेल कैथेटर की गोल टिप नसों को सुरक्षित रखती है, जबकि साधारण कैथेटर की नुकीली सीधी टिप नसों में चोट का खतरा बढ़ा देती है। लागत की दृष्टि से पिगटेल कैथेटर ₹1,500–₹3,000 अतिरिक्त खर्च बढ़ाता है, जबकि साधारण कैथेटर ₹2,000–₹5,000 के बीच उपलब्ध है।
शोध टीम
प्रो. नवीन गर्ग, डॉ. मुकेश कुमार यादव, प्रो. आदित्य कपूर , प्रो. सतेंद्र तिवारी प्रो. रूपाली खन्ना प्रो. अंकित साहू डॉ. हर्षित खरे डॉ. अर्पिता कथेरिया डॉ. अर्शद नजीर ने पीएटी तकनीक की सुरक्षा और प्रभावशीलता का मूल्यांकन और एंजियोग्राफी/एंजियोप्लास्टी के दौरान नसों में जटिलताओं में कमी विषय पर शोध किया जिसे इंडिन हार्ट जर्नल ने मान्यता दी है।
पीजीआइ में अंतरराष्ट्रीय नर्सिंग वेबिनार में विशेषज्ञों ने बताईं नई तकनीकें
ऑपरेशन थिएटर में संक्रमण रोकने पर जोर
पीजीआइ में अंतरराष्ट्रीय नर्सिंग वेबिनार में विशेषज्ञों ने बताईं नई तकनीकें
लखनऊ। संजय गांधी पीजीआइ में अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस सप्ताह के तहत आयोजित नर्सिंग वेबिनार में ऑपरेशन के बाद होने वाले संक्रमण को रोकने पर खास जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने कहा कि ऑपरेशन थिएटर में साफ-सफाई, उपकरणों की सही स्टरलाइजेशन और मरीज की बेहतर तैयारी से संक्रमण के खतरे को काफी कम किया जा सकता है।
एम्स दिल्ली की नर्सिंग विशेषज्ञ मीरा प्रजापति ने बताया कि सर्जिकल साइट इंफेक्शन यानी ऑपरेशन वाले हिस्से में होने वाला संक्रमण मरीज की परेशानी और इलाज का खर्च दोनों बढ़ा देता है। उन्होंने कहा कि हाथों की स्वच्छता, समय पर एंटीबायोटिक देना और ऑपरेशन थिएटर की वैज्ञानिक व्यवस्था संक्रमण रोकने में सबसे अहम हैं।
वेबिनार में बर्दवान मेडिकल कॉलेज, प्रोफेसर डॉ. उमा रानी अधिकारी; एलएलआरएम मेरठ, प्रोफेसर डॉ. बालमोनी बोस; एमकेसीजी मेडिकल कॉलेज बरहामपुर, प्रोफेसर डॉ. राजलक्ष्मी मिश्रा; नारायणा अस्पताल कोलकाता, प्रोफेसर डॉ. शम्पा गुप्ता; एससीबी मेडिकल कॉलेज कटक, डॉ. अंजना बाला बेहुरा; ईएसआई अस्पताल जोका कोलकाता, निबेदिता डे; यूएई, शेरोन शीबा थंबिथुराई तथा आलिया विश्वविद्यालय, डॉ. उषा मल्लिक ने अपने विचार रखे।
एसजीपीजीआई कॉलेज ऑफ नर्सिंग, नर्सिंग शिक्षक सबाना खातून ने शोध आधारित नर्सिंग देखभाल को मरीजों के उपचार में लागू करने पर जोर दिया। कार्यक्रम का संचालन एसजीपीजीआई, मुख्य नर्सिंग अधिकारी मंजू सिंह; डिप्टी नर्सिंग सुपरिटेंडेंट अलका मोहन; डिप्टी नर्सिंग सुपरिटेंडेंट अनीता वाल्टर और असिस्टेंट नर्सिंग सुपरिटेंडेंट ज्योतिबाला ने किया।
कार्यक्रम की शुरुआत एसजीपीजीआई, असिस्टेंट नर्सिंग सुपरिटेंडेंट नीलम श्रीवास्तव; डिप्टी नर्सिंग सुपरिटेंडेंट एंसी जयराज और असिस्टेंट नर्सिंग सुपरिटेंडेंट नीमा पंत के संबोधन से हुई। वेबिनार में भारत और विदेश से करीब 200 नर्सिंग पेशेवर जुड़े। विशेषज्ञों ने कहा कि शोध आधारित नर्सिंग पद्धतियां मरीजों की सुरक्षा और बेहतर इलाज के लिए बेहद जरूरी हैं।
शनिवार, 9 मई 2026
एक दिन में 5 हजार स्वास्थ्यकर्मियों को नवजात पुनर्जीवन का प्रशिक्षण देगा यूपी
एक दिन में 5 हजार स्वास्थ्यकर्मियों को नवजात पुनर्जीवन का प्रशिक्षण देगा यूपी
लखनऊ। उत्तर प्रदेश नेशनल नियोनेटोलॉजी फोरम की ओर से राष्ट्रीय पुनर्जीवन दिवस 10 मई 2026 के अवसर पर पूरे उत्तर प्रदेश में बेसिक नवजात पुनर्जीवन कार्यक्रम का राज्यव्यापी प्रशिक्षण अभियान चलाया जाएगा। यह कार्यक्रम राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, यूनिसेफ, टेक्निकल सपोर्ट यूनिट तथा अन्य स्वास्थ्य सहयोगी संस्थाओं के साथ मिलकर आयोजित किया जा रहा है।
इस अभियान के तहत प्रदेश के सभी जिलों में 180 से अधिक प्रशिक्षण केंद्रों पर एक साथ कार्यक्रम आयोजित होंगे। इनमें करीब 5 हजार डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और पैरामेडिकल कर्मियों को नवजात पुनर्जीवन का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा। आयोजकों का दावा है कि एक ही दिन में नवजात पुनर्जीवन का सबसे अधिक प्रशिक्षण देने वाला राज्य उत्तर प्रदेश बन जाएगा।
फोरम के मानद सचिव डॉ. आकाश पंडिता ने बताया कि यह अभियान प्रदेश में नवजात स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और नवजात मृत्यु दर कम करने की दिशा में बड़ा कदम साबित होगा। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षण के माध्यम से स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट, जिला अस्पतालों, डिलीवरी प्वाइंट्स और छोटे नर्सिंग होम्स में कार्यरत स्वास्थ्यकर्मियों को अधिक सक्षम और आत्मविश्वासी बनाया जाएगा, ताकि प्रदेश के हर नवजात को बेहतर और सुरक्षित शुरुआत मिल सके।
प्रशिक्षण कार्यक्रम में नवजात पुनर्जीवन की व्यावहारिक तकनीकों, जन्म के तुरंत बाद नवजात को स्थिर करने, डिलीवरी रूम में आपातकालीन स्थिति से निपटने और टीम आधारित उपचार पद्धति पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
फोरम के अध्यक्ष डॉ. आशीष प्रकाश ने इस जनस्वास्थ्य अभियान को सफल बनाने में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, यूनिसेफ, टेक्निकल सपोर्ट यूनिट, जिला स्वास्थ्य प्रशासन और सभी सहभागी संस्थाओं के सहयोग के लिए आभार जताया।
नई ओ-आर्म तकनीक से रीढ़ की सर्जरी हुई सुरक्षित
नई ओ-आर्म तकनीक से रीढ़ की सर्जरी हुई सुरक्षित
पीजीआई के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में पहली बार आधुनिक तकनीक से सफल ऑपरेशन
अब दिल्ली-मुंबई जाने की जरूरत नहीं
संजय गांधी पीजीआई के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में अब रीढ़ की गंभीर चोट का इलाज और ज्यादा सुरक्षित और आधुनिक हो गया है। यहां नई ओ-आर्म तकनीक की मदद से कानपुर निवासी 32 वर्षीय युवक की सफल रीढ़ सर्जरी की गई। युवक फैक्ट्री में काम करने के दौरान गिरकर घायल हो गया था, जिससे उसकी रीढ़ की हड्डी के डी-10 हिस्से में फ्रैक्चर हो गया था। डॉक्टरों का कहना है कि इस तकनीक से ऑपरेशन ज्यादा सटीक होता है, मरीज को कम दर्द होता है और वह जल्दी ठीक हो जाता है।
एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के प्रमुख एवं न्यूरो सर्जन प्रोफेसर अरुण कुमार श्रीवास्तव के निर्देशन में न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रोफेसर आशुतोष कुमार ने यह सर्जरी डॉ. पवन वर्मा, डॉ. वेद प्रकाश, डॉ. सौमेन कांजीलाल, डॉ. श्रेयश राय तथा एनेस्थीसिया विभाग से डॉ. वंश और डॉ. प्रतीक बैस सहित अन्य चिकित्सकों के सहयोग से किया।
छोटे चीरे से हुआ सफल ऑपरेशन
प्रो. आशुतोष कुमार ने बताया कि मरीज की रीढ़ की हड्डी को स्थिर करने के लिए छोटे चीरे लगाकर स्क्रू लगाए गए। इस तकनीक में शरीर को कम नुकसान पहुंचता है, खून कम बहता है और मरीज जल्दी चलने-फिरने लगता है। उन्होंने बताया कि ओ-आर्म मशीन ऑपरेशन के दौरान रीढ़ की हड्डी की साफ थ्री-डी तस्वीर तुरंत दिखाती है। इससे स्क्रू सही जगह लगाने में आसानी होती है और ऑपरेशन ज्यादा सुरक्षित हो जाता है। साथ ही मरीज और डॉक्टरों पर रेडिएशन का असर भी कम पड़ता है।
निजी अस्पतालों की तुलना में काफी कम खर्च
प्रो आशुतोष कुमार ने बताया कि संस्थान में इस पूरी सर्जरी का खर्च इम्प्लांट सहित करीब डेढ़ लाख रुपये आता है, जबकि निजी अस्पतालों में इसी तकनीक से इलाज का खर्च लगभग पांच लाख रुपये तक पहुंच सकता है। उन्होंने कहा कि इम्प्लांट की कीमत लगभग हर जगह समान होती है, लेकिन नर्सिंग केयर, दवाओं और अन्य सुविधाओं के कारण खर्च में अंतर आता है।
उन्होंने कहा कि अब उत्तर प्रदेश और आसपास के राज्यों के मरीजों को इस तरह के आधुनिक इलाज के लिए दिल्ली या मुंबई जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि यह सुविधा अब एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में उपलब्ध है।
संस्थान के निदेशक प्रोफेसर आर. के. धीमान ने इसे संस्थान के लिए बड़ी उपलब्धि बताया।
क्या है ओ-आर्म तकनीक
ओ-आर्म एक आधुनिक मशीन है, जो ऑपरेशन के दौरान शरीर के अंदर की थ्री-डी तस्वीर तुरंत दिखाती है। इससे डॉक्टर रीढ़ की हड्डी में स्क्रू और इम्प्लांट सही जगह लगा पाते हैं। इससे ऑपरेशन ज्यादा सुरक्षित होता है, मरीज को कम दर्द होता है और वह जल्दी स्वस्थ हो जाता है।
गुरुवार, 7 मई 2026
फैटी लिवर भी बन सकता है विटामिन डी की कमी की बड़ी वजह
फैटी लिवर भी बन सकता है विटामिन डी की कमी की बड़ी वजह: एसजीपीजीआई का शोध
शोध में खुलासा — खराब खानपान से लिवर कमजोर पड़ने पर शरीर विटामिन डी को सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाता, हड्डियों और शरीर पर पड़ सकता है असर
संजय गांधी पीजीआई (एसजीपीजीआई) के वैज्ञानिकों के एक नए शोध में सामने आया है कि फैटी लिवर की बीमारी केवल लिवर को ही नुकसान नहीं पहुंचाती, बल्कि यह शरीर में विटामिन डी की कमी की भी एक बड़ी वजह बन सकती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, जब लिवर ज्यादा फैट और शुगर वाले भोजन की वजह से खराब होने लगता है, तब वह विटामिन डी को शरीर के इस्तेमाल लायक सक्रिय रूप में बदलने की क्षमता खोने लगता है।
डॉक्टरों का कहना है कि विटामिन डी शरीर के लिए बेहद जरूरी होता है। इसकी कमी से हड्डियां कमजोर होना, शरीर में दर्द रहना, जल्दी थकान महसूस होना, मांसपेशियों में कमजोरी और रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
यह अध्ययन एंडोक्रिनोलॉजी विभाग के एडीशनल प्रोफेसर डॉ. रोहित एंथनी सिन्हा के नेतृत्व में पीएचडी शोधार्थी अभिषेक यादव और उनकी टीम ने किया। शोध में इंसानी लिवर के नमूनों और पशु मॉडल का अध्ययन किया गया। इसमें पाया गया कि ज्यादा फैट वाला भोजन “साइप टू आर वन” नामक एंजाइम को कमजोर कर देता है। यही एंजाइम विटामिन डी को सक्रिय करने में अहम भूमिका निभाता है।
शोधकर्ताओं ने बताया कि “मैश” और “नैश” फैटी लिवर की गंभीर स्थिति है, जिसमें लिवर में सूजन और घाव बनने लगते हैं। समय पर ध्यान न देने पर यह सिरोसिस जैसी गंभीर बीमारी का रूप ले सकती है।
डॉ. रोहित एंथनी सिन्हा ने कहा कि यह शोध फैटी लिवर के मरीजों में अक्सर दिखाई देने वाली विटामिन डी की कमी की वजह को समझने में मदद करता है। उन्होंने कहा कि भविष्य में इससे बीमारी को बढ़ने से रोकने के नए तरीके विकसित करने में मदद मिल सकती है। यह शोध आईसीएमआर के सहयोग से संभव होपया है।
विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि फैटी लिवर के मरीज नियमित रूप से विटामिन डी की जांच कराएं और डॉक्टर की सलाह के अनुसार खानपान और जीवनशैली में सुधार करें।
बुधवार, 6 मई 2026
संजय गांधी पीजीआइ कर्मचारी महासंघ का शपथ ग्रहण समारोह
कर्मचारियों की समस्याओं के समाधान, बेहतर इलाज सुविधा और पदोन्नति प्रक्रिया में तेजी का वादा
संजय गांधी पीजीआइ कर्मचारी महासंघ का शपथ ग्रहण समारोह
संजय गांधी पीजीआइ में कर्मचारी महासंघ के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों ने कर्मचारियों की प्रमुख समस्याओं के समाधान, आपातकालीन स्थिति में इलाज में प्राथमिकता, पदोन्नति प्रक्रिया को तेज करने और मूलभूत सुविधाओं को बेहतर बनाने का संकल्प लिया। इसी उद्देश्य के साथ बुधवार को श्रुति सभागार में शपथ ग्रहण समारोह एवं नव नियुक्त कर्मचारियों का अभिनंदन कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में मुख्य चुनाव अधिकारी टी.एस. नेगी ने सभी पदाधिकारियों को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। नई कार्यकारिणी में अध्यक्ष धर्मेश कुमार, महामंत्री सीमा शुक्ला, वरिष्ठ उपाध्यक्ष अजय कुमार, उपाध्यक्ष मंजुलता यादव, डॉ. नीलमणि तिवारी, संयुक्त मंत्री सुनील कुमार, कोषाध्यक्ष संदीप कुमार, संगठन मंत्री डॉ. अंकिता पांडेय, कार्यालय मंत्री बृजभूषण यादव और प्रचार मंत्री सुनील रूपेश सहित अन्य सदस्य शामिल हैं। शपथ ग्रहण के बाद अध्यक्ष धर्मेश कुमार और महामंत्री सीमा शुक्ला ने कहा कि कर्मचारियों से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता के आधार पर हल किया जाएगा। उन्होंने बताया कि मानकीकरण लागू होने से उत्पन्न समस्याओं को दूर करने, कर्मचारियों को आपात स्थिति में बेड और ओपीडी में प्राथमिकता दिलाने, समय पर इलाज और दवाइयों की व्यवस्था सुनिश्चित करने पर विशेष जोर रहेगा। इसके साथ ही पदोन्नति के लिए वर्ष में दो बार डीपीसी कराने, आवासीय सुरक्षा मजबूत करने, उचित पार्किंग की व्यवस्था और सभी भवनों में स्टाफ कैंटीन की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए भी प्रयास किए जाएंगे। कार्यक्रम में संस्थान के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. देवेंद्र गुप्ता, चिकित्सा अधीक्षक प्रो. राजेश हर्षवर्धन, मुख्य नर्सिंग अधिकारी मंजू सिंह , मेडिटेक के अध्यक्ष मनोज कुमार सिंह, नर्सिंग एसोसिएशन के महामंत्री विवेक शर्मा सहित विभिन्न संगठनों के पदाधिकारी और बड़ी संख्या में कर्मचारी उपस्थित रहे। संस्थान प्रशासन के अधिकारियों ने कहा कि कर्मचारी महासंघ और संस्थान प्रशासन आपस में मिल बैठकर सभी समस्याओं का समाधान करेगा। संस्थान के हित और प्रगति के लिए भाषण के पदाधिकारी का सहयोग जरूरी है।
सोमवार, 4 मई 2026
हाथों की स्वच्छता का रखें खास ख्याल : डॉ संजीव अवस्थी
: विश्व हाथ स्वच्छता दिवस (05 मई) पर विशेष
: हाथों की स्वच्छता का रखें खास ख्याल : डॉ संजीव अवस्थी
संक्रामक बीमारियों से बचाव का सबसे सरल और कारगर तरीका
लखनऊ। संक्रामक बीमारियों से बचाव का सबसे सरल और कारगर तरीका हाथों को साबुन-पानी से कम से कम 20 सेकंड तक सही तरीके से धोना है। स्वास्थ्य सेवाओं को भी संक्रमण से सुरक्षित बनाने के साथ ही मरीजों को गुणवत्तापूर्ण इलाज मुहैया कराने के लिए हाथों को केवल धोना ही नहीं बल्कि सही तरीके से धोना बहुत जरूरी होता है। इसी तरह अपने साथ ही अपनों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए भी हाथों को सही तरीके से धोना जरूरी है। आशियाना स्थित चेतना डेंटल सेंटर के विशेषज्ञ चिकित्सक संजीव अवस्थी का कहना है कि दिनभर में हम हाथों से कई तरह के जरूरी काम करते हैं और उस दौरान कई लोगों, सतहों व वस्तुओं के सीधे सम्पर्क में आते हैं। इससे गंदगी, रोगाणु, कीटाणु और बैक्टीरिया की गिरफ्त में आने की सम्भावना बनी रहती है। इसलिए हाथों को सही तरीके से धोना बहुत जरूरी होता है।
अस्पतालों में स्वास्थ्य कर्मी मरीजों की देखभाल से पहले और बाद में हाथों को सही तरीके से धोना कभी न भूलें, क्योंकि वह अस्पताल में मरीजों के देखभाल के दौरान संक्रमण के जोखिम से घिरे होते हैं। सही तरीके से हाथ धोने से सर्दी, फ्लू, दस्त व अन्य संक्रामक बीमारियों से सुरक्षित बना जा सकता है। समुदाय के साथ ही स्वास्थ्य कर्मियों को जागरूक बनाने के लिए ही हर साल पांच मई को विश्व हाथ स्वच्छता दिवस मनाया जाता है।
बॉक्स
ऐसे करें हाथों की सही धुलाई
हाथों को धोना ही पर्याप्त नहीं होता बल्कि सही तरीके से धोना जरूरी होता है। इसके लिए (सुमन के) बच्चों को सरल तरीके से समझाने की जरूरत है ताकि वह इन छह चरणों को अपनाकर हाथों की सही स्वच्छता के लिए सक्षम बन सकें। यह छह चरण हैं (एस) -साबुन-पानी से झाग बनाने के बाद पहले सीधी हथेलियों को बारी-बारी से घिसें, (यू)- उल्टी तरफ हाथों को बारी-बारी से घिसें, (एम)- मुट्ठी बंदकर हाथों को अच्छी तरह घिसें, (ए)- अंगूठों को अच्छी तरह से रगड़ें, (एन) - नाखूनों को अच्छी तरह से साफ़ करें, (के)- कलाइयों को भी ठीक से रगड़ें।
बॉक्स
हाथों को सही तरीके से कब-कब धोना जरूरी
बच्चों की देखभाल से पहले, मरीजों की सेवा से पहले और बाद में, खाना बनाने या खाने से पहले, शौचालय का उपयोग करने के बाद, खांसने, छींकने या नाक साफ़ करने के बाद, कचरा उठाने या किसी गन्दी सतह को छूने के बाद, जानवरों या पालतू जानवरों को छूने के बाद हाथों को साबुन-पानी से कम से कम 20 सेकेण्ड तक सही तरीके से अवश्य धोएं।
पीजीआइ में नर्सेस सप्ताह पर रक्तदान शिविर, स्टाफ ने दिखाई सामाजिक जिम्मेदारी
पीजीआइ में नर्सेस सप्ताह पर रक्तदान शिविर, स्टाफ ने दिखाई सामाजिक जिम्मेदारी
अंतर्राष्ट्रीय नर्सेस सप्ताह 2026 के अवसर पर संजय गांधी पीजीआइ में सोमवार को स्वैच्छिक रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया। शिविर में नर्सिंग स्टाफ के साथ अन्य कर्मचारियों ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया और बड़ी संख्या में रक्तदान किया।
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि चीफ नर्सिंग ऑफिसर मंजू सिंह ने नर्सिंग कर्मियों के समर्पण और सेवा भावना की सराहना करते हुए कहा कि रक्तदान महादान है, जिससे कई जिंदगियां बचाई जा सकती हैं। उन्होंने कहा कि नर्सिंग पेशा केवल सेवा नहीं बल्कि मानवता की मिसाल है और ऐसे आयोजन समाज में सकारात्मक संदेश देते हैं।
शिविर में सुरेन्द्र कटियार ने प्रथम तथा संजय मित्तल ने द्वितीय डोनर के रूप में रक्तदान किया। महेश गुप्ता सहित अन्य कर्मचारियों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। सभी रक्तदाताओं को प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया।
इस आयोजन में ब्लड बैंक टीम और नर्सिंग स्टाफ की महत्वपूर्ण भूमिका रही। नर्सिंग स्टाफ के अध्यक्ष लता सचान , महामंत्री विवेक शर्मा, कर्मचारी महासंघ के नवनिर्वाचित अध्यक्ष धर्मेश कुमार , महामंत्री सीमा शुक्ला सहित अन्य
कर्मचारी नेताओं ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे प्रयासों से समाज में जागरूकता बढ़ती है।
रविवार, 3 मई 2026
पीजीआइ में सर्जरी ट्रेनिंग की नई पहल, मरीजों को मिलेगा ज्यादा सुरक्षित इलाज
पीजीआइ में सर्जरी ट्रेनिंग की नई पहल, मरीजों को मिलेगा ज्यादा सुरक्षित इलाज
सिमुलेशन आधारित नी आर्थ्रोस्कोपी कोर्स से डॉक्टरों की स्किल बढ़ेगी, ऑपरेशन होगा ज्यादा सटीक
अब घुटने की सर्जरी कराने वाले मरीजों के लिए राहत की खबर है। संजय गांधी पीजीआइ में शुरू हुई नई सिमुलेशन आधारित ट्रेनिंग से डॉक्टरों की दक्षता बढ़ेगी, जिससे सर्जरी ज्यादा सुरक्षित, सटीक और कम जटिल होगी। इसका सीधा फायदा मरीजों को बेहतर इलाज और जल्दी रिकवरी के रूप में मिलेगा।
इसी दिशा में ऑर्थोपेडिक्स विभाग ने उत्तर भारत का पहला “हैंड्स-ऑन नी आर्थ्रोस्कोपी सिमुलेशन कोर्स” आयोजित किया। यह कार्यक्रम एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के एडवांस स्किल लैब में हुआ, जिसमें देशभर से आए डॉक्टरों और ट्रेनी सर्जनों ने भाग लिया।
कोर्स में वर्चुअल रियलिटी आधारित सिमुलेटर के जरिए डॉक्टरों को घुटने की सर्जरी की बारीकियां सिखाई गईं। प्रतिभागियों को असली उपकरणों के साथ प्रैक्टिकल ट्रेनिंग दी गई, जिसमें कैमरा हैंडलिंग, ट्रायएंगुलेशन, पोर्टल प्लेसमेंट और डायग्नोस्टिक आर्थ्रोस्कोपी जैसी तकनीकों पर फोकस किया गया।
कार्यक्रम का आयोजन संस्थान के निदेशक प्रो. आर.के. धीमन के संरक्षण में हुआ। एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के प्रमुख प्रो. अरुण श्रीवास्तव आयोजन अध्यक्ष रहे, जबकि प्रो. पुलक शर्मा आयोजन सचिव रहे।
प्रो. शर्मा ने बताया कि इस तरह की सिमुलेशन ट्रेनिंग से सर्जन बिना किसी जोखिम के पहले ही अभ्यास कर लेते हैं, जिससे ऑपरेशन के दौरान गलती की संभावना कम हो जाती है और मरीजों की सुरक्षा बढ़ती है। यह
आधुनिक सर्जिकल ट्रेनिंग के क्षेत्र में नई ऊंचाई देने के साथ ही मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।
























