शनिवार, 11 अप्रैल 2026

पीजीआई के फैकल्टी फोरम के प्रो. मोहन गुर्जर बने अध्यक्ष, प्रो. विवेक सिंह सचिव निर्वाचित

 









पीजीआई के फैकल्टी फोरम के प्रो. मोहन गुर्जर बने अध्यक्ष, प्रो. विवेक सिंह सचिव निर्वाचित

 लखनऊ

 संजय गांधी पीजीआइ फैकल्टी फोरम के चुनाव में  क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर  मोहन गुर्जर फैकल्टी फोरम के अध्यक्ष पद पर निर्वाचित हुए हैं। रेडियोडायग्नोसिस विभाग के प्रोफेसर  विवेक सिंह सचिव पद पर निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए गए। वहीं, बाल शल्य चिकित्सा विभाग के प्रो विजय दत्त उपाध्याय कोषाध्यक्ष पद पर निर्विरोध चुने गए।

सदस्य पदों पर बायोस्टैटिस्टिक्स एवं हेल्थ इन्फॉर्मेटिक्स विभाग के प्रो. प्रभाकर मिश्रा, एनेस्थीसियोलॉजी विभाग के प्रो. रुद्राशीष हलदर, रेडियोथेरेपी विभाग की प्रो. एवं विभागाध्यक्ष डॉ. पुनीता लाल, कार्डियोलॉजी विभाग के प्रो. नवीन गर्ग, नेत्र विज्ञान विभाग की अतिरिक्त प्रोफेसर डॉ. रचना अग्रवाल तथा न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रो. अनंत मेहरोत्रा निर्वाचित हुए हैं।  10 और 11 अप्रैल 2026 को आयोजित फैकल्टी फोरम चुनाव के परिणाम घोषित कर दिए गए हैं। चुनाव में संकाय सदस्यों ने उत्साहपूर्वक भागीदारी निभाई और कुल 141 मत डाले गए, जिनमें एक मत अमान्य घोषित किया गया।

चुनाव अधिकारी प्रोफेसर उत्तम सिंह ने परिणामों की घोषणा की। 

  निदेशक प्रोफेसर आर. के. धीमन ने नव निर्वाचित टीम को बधाई देते हुए आशा व्यक्त की कि नई टीम संकाय हितों की मजबूती, शैक्षणिक सहयोग के विस्तार और संस्थान के बहुआयामी विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। नवगठित फैकल्टी फोरम से संस्थान में शैक्षणिक और प्रशासनिक समन्वय को नई गति मिलने की उम्मीद है।


फोलिक एसिड देकर और हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी का समय से पता कर दिया जा सकता है मां और शिशु को स्वस्थ जीवन

 





फोलिक एसिड देकर और हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी का समय से पता कर दिया जा सकता है मां और शिशु को स्वस्थ जीवन


लखनऊ। सुरक्षित मातृत्व का अर्थ गर्भावस्था, प्रसव और प्रसव के बाद मां और शिशु को समुचित चिकित्सकीय देखभाल उपलब्ध कराना है, जिससे मातृ, भ्रूण और नवजात मृत्यु व बीमारियों को कम किया जा सके। संजय गांधी पीजीआई के मातृ एवं प्रजनन स्वास्थ्य विभाग की प्रोफेसर इंदु लता के अनुसार, समय पर चिकित्सा हस्तक्षेप और नियमित निगरानी से अधिकांश जटिलताओं को रोका जा सकता है।

उत्तर प्रदेश में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य अभी भी चुनौती बना हुआ है। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम  2018-20 के अनुसार राज्य में मातृ मृत्यु अनुपात  167 प्रति एक लाख जीवित जन्म था, जो घटकर करीब 150 के आसपास पहुंचा है, लेकिन यह राष्ट्रीय औसत से अधिक है। वहीं नवजात मृत्यु दर  उत्तर प्रदेश में लगभग 30 प्रति हजार जीवित जन्म के आसपास दर्ज की गई है, जो देश में ऊंचे स्तरों में गिनी जाती है।

प्रो. इंदु लता बताती हैं कि गर्भावस्था की पहली तिमाही में 400 माइक्रोग्राम फोलिक एसिड देना जरूरी है, जिससे भ्रूण में न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट जैसी जन्मजात विकृतियों की रोकथाम की जा सकती है। दूसरी और तीसरी तिमाही में नियमित एएनसी जांच, लेवल-2 अल्ट्रासाउंड, ब्लड टेस्ट, आयरन और कैल्शियम का सेवन तथा टेटनस टॉक्सॉइड के टीके सुरक्षित गर्भावस्था के लिए आवश्यक हैं।

उन्होंने कहा कि हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी जैसे गर्भावधि मधुमेह, उच्च रक्तचाप, एनीमिया, थायरॉयड, जुड़वां गर्भ या पूर्व जटिलताओं वाले मामलों की समय पर पहचान और इलाज बेहद जरूरी है। समय पर प्रबंधन से जटिलताओं और मृत्यु के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

सरकार द्वारा प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान और जननी सुरक्षा योजना जैसी योजनाएं चलाकर संस्थागत प्रसव और निःशुल्क जांच को बढ़ावा दिया जा रहा है।

प्रो. इंदु लता के अनुसार, यदि गर्भावस्था की शुरुआत से ही सही पोषण, नियमित जांच और हाई-रिस्क मामलों की पहचान सुनिश्चित हो, तो मां और शिशु दोनों को स्वस्थ जीवन दिया जा सकता है।

बॉक्स: उत्तर प्रदेश में शिशु मृत्यु और जन्मजात विकृतियां—स्थिति और कारण

जन्मजात विकृतियां 

विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, भारत में लगभग 2-3% शिशु किसी न किसी जन्मजात विकृति के साथ पैदा होते हैं। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में यह संख्या हर वर्ष लाखों जन्मों के अनुपात में महत्वपूर्ण बन जाती है।

नवजात मृत्यु 

उत्तर प्रदेश में लगभग 30 शिशु प्रति 1000 जीवित जन्म के पहले 28 दिनों के भीतर मृत्यु का शिकार हो जाते हैं।

गर्भावस्था के दौरान शिशु मृत्यु 

राज्य में अनुमानित रूप से 20-25 प्रति 1000 जन्म स्टिलबर्थ (मृत जन्म) के रूप में दर्ज किए जाते हैं।

प्रमुख कारण:

समय से पहले जन्म 

कम जन्म वजन 

जन्म के समय सांस न आना 

संक्रमण (सेप्सिस)

जन्मजात विकृतियां 

गर्भावस्था में मां की बीमारियां (डायबिटीज, हाई बीपी, एनीमिया)

रोकथाम कैसे संभव:

गर्भावस्था की शुरुआत से फोलिक एसिड का सेवन

नियमित एएनसी जांच और अल्ट्रासाउंड

हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी की समय पर पहचान

संस्थागत प्रसव और नवजात की विशेष देखभाल

यह आंकड़े बताते हैं कि समय पर पहचान, उचित पोषण और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के जरिए मातृ और शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

प्रो. यू.के. मिश्रा का निधन, पीजीआइ के न्यूरोलॉजी विभाग के “नींव के स्तंभ” नहीं रहे

 



प्रो. यू.के. मिश्रा का निधन, पीजीआइ के न्यूरोलॉजी विभाग के “नींव के स्तंभ” नहीं रहे


ईमानदारी, सरलता और अनुशासन के लिए जाने जाते थे, कई अहम प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी संभालीं 


 संजय गांधी पीजीआइ के न्यूरोलॉजिस्ट और पूर्व निदेशक रहे प्रोफेसर यूके मिश्रा का आज दिल्ली में निधन हो गया। वह इलाज के लिए दिल्ली गए थे, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से चिकित्सा जगत और संस्था में शोक की लहर है। प्रो. मिश्रा को संस्थान में न्यूरोलॉजी विभाग की नींव रखने वाले प्रमुख चिकित्सकों में गिना जाता था। उन्होंने न केवल इस विभाग की शुरुआत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि इसे देश के अग्रणी केंद्रों में स्थापित करने में भी योगदान दिया। उनके मार्गदर्शन में अनेक युवा डॉक्टरों ने न्यूरोलॉजी के क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल की। प्रो मिश्रा के सहयोगी रहे वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी राकेश कुमार निगम वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी एसपी सिंह ने कहा कि वह अपने सरल, ईमानदार और अनुशासित व्यक्तित्व के लिए जाने जाते थे। संस्थान में उन्हें समय-समय पर चिकित्सा अधीक्षक (एमएस) से लेकर कार्यवाहक निदेशक तक की जिम्मेदारियां सौंपी गईं, जिन्हें उन्होंने पूरी निष्ठा के साथ निभाया। प्रशासनिक कार्यों के साथ-साथ वह अधिकारियों और कर्मचारियों के समान व्यवहार करते थे । वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी सुधीर कुमार चौरसिया ने कहा कि कोई अपनी गलती स्वीकार कर लेता, तो वह दंड देने के बजाय उसे सुधारने का अवसर देते थे—यह उनके उदार स्वभाव की पहचान थी। प्रोफेसर यूके मिश्रा की छात्रा रही प्रो रुचिका टंडन ने कहा कि न्यूरोलॉजी के क्षेत्र में प्रो. मिश्रा का शोध कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने विशेष रूप से स्ट्रोक (ब्रेन अटैक), मिर्गी, न्यूरो-इन्फेक्शन (जैसे जापानी इंसेफलाइटिस) और नसों से संबंधित बीमारियों पर कई अहम अध्ययन किए। उनके शोध पत्र राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स में प्रकाशित हुए, जिससे भारत में न्यूरोलॉजी के उपचार और समझ को नई दिशा मिली। प्रो. मिश्रा हमेशा मरीजों की सेवा के लिए तत्पर रहते थे और संस्थान के विकास को अपना व्यक्तिगत दायित्व मानते थे। उनके जाने से चिकित्सा क्षेत्र को अपूरणीय क्षति हुई है। प्रोफेसर मिश्रा के छात्र रहे प्रो वीके पालीवाल ने कहा कि उनका योगदान और व्यक्तित्व हमेशा प्रेरणा देता रहेगा। कर्मचारी महासंघ के पूर्व महामंत्री धर्मेश कुमार नर्सिंग स्टाफ एसोसिएशन की पूर्व अध्यक्ष सीमा शुक्ला ने बताया कि प्रोफेसर मिश्रा उत्तर प्रदेश में न्यूरोलॉजी के क्षेत्र में स्थापक और विस्तारक माने जाते हैं।प्रो मिश्रा के

468 शोध पत्र राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल्स में प्रकाशित हो चुके हैं 
न्यूरोलॉजी के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान को दर्शाते हैं।” प्रोफेसर मिश्रा के साथ काम कर चुके लोगों ने बताया कि आज ही 10 अप्रैल को प्रोफेसर मिश्रा का जन्मदिन भी था।

गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

केएसएसएससीआई को मिला 20 व्हीलचेयर मरीजों की सुविधा हेतु सराहनीय पहल

 



केएसएसएससीआई को मिला 20 व्हीलचेयर  मरीजों की सुविधा हेतु सराहनीय पहल


इंडिया पेस्टीसाइड्स लिमिटेड व रोटरी क्लब के सहयोग से आयोजन, निदेशक प्रो. एम.एल.बी. भट्ट ने बताया जनसेवा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

लखनऊ। कल्याण सिंह सुपर स्पेशलिटी कैंसर इंस्टीट्यूट, लखनऊ में शुक्रवार को एक सराहनीय सामाजिक पहल के अंतर्गत 20 व्हीलचेयर का वितरण किया गया। यह व्हीलचेयर रोटरी क्लब के  के.के. श्रीवास्तव के सौजन्य से इंडिया पेस्टीसाइड्स लिमिटेड द्वारा प्रदान की गईं।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि संस्थान के निदेशक प्रो. एम.एल.बी. भट्ट रहे। इस अवसर पर संस्थान के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. वरुण विजय भी उपस्थित रहे। वहीं इंडिया पेस्टीसाइड्स लिमिटेड की ओर से  एस.पी. गुप्ता एवं  नरेन्द्र ओझा ने कार्यक्रम में सहभागिता की।

कार्यक्रम के दौरान प्रो. एम.एल.बी. भट्ट ने इस पहल को मरीजों की सुविधा और सेवा में एक महत्वपूर्ण योगदान बताते हुए कहा कि ऐसे प्रयास न केवल मरीजों को सहूलियत प्रदान करते हैं, बल्कि समाज में सेवा और सहयोग की भावना को भी मजबूत करते हैं। उन्होंने भविष्य में भी इस प्रकार के सहयोग की अपेक्षा व्यक्त की।

संस्थान प्रशासन ने दानदाताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए इसे जनसेवा की दिशा में एक प्रेरणादायक कदम बताया। कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों ने इस पहल की सराहना करते हुए इसे जरूरतमंद मरीजों के लिए बेहद उपयोगी बताया।

केएसएसएससीआई और मिमांसा एआई के बीच समझौता, कैंसर शोध में एआई का होगा इस्तेमाल

 



केएसएसएससीआई और मिमांसा एआई के बीच समझौता, कैंसर शोध में एआई का होगा इस्तेमाल


एआई आधारित क्लीनिकल रिसर्च, शुरुआती पहचान और डिजिटल हेल्थ इनोवेशन को मिलेगा बढ़ावा

लखनऊ:

कैंसर इलाज और शोध के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए कल्याण सिंह सुपर स्पेशलिटी कैंसर संस्थान  और मिमांसा एआई के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते का उद्देश्य ऑन्कोलॉजी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग को बढ़ावा देना है।

इस अवसर पर संस्थान के निदेशक प्रो. एम.एल.बी. भट्ट और मिमांसा एआई के डॉ. विभु अग्रवाल ने एम ओ यू पर हस्ताक्षर किए। इस दौरान डॉ. वरुण विजय, डॉ. अभिनव तिवारी और रिसर्च ऑफिसर डॉ  सुरेंद्र श्रीवास्तव भी मौजूद रहे।

इस साझेदारी के तहत एआई आधारित क्लीनिकल रिसर्च को बढ़ावा दिया जाएगा, जिससे कैंसर की शुरुआती पहचान  को और अधिक सटीक बनाया जा सकेगा। साथ ही डिजिटल हेल्थ इनोवेशन और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता के क्षेत्र में भी संयुक्त प्रयास किए जाएंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस पहल से कैंसर उपचार की गुणवत्ता में सुधार होगा और मरीजों को आधुनिक, सटीक और प्रभावी इलाज उपलब्ध हो सकेगा। यह कदम भविष्य में कैंसर देखभाल को नई दिशा देने वाला साबित होगा।

रोबोटिक टोटल थायरॉयडेक्टॉमी तकनीक से सफल ऑपरेशन, कम दर्द और तेज़ रिकवरी से युवक पूरी तरह स्वस्थ

 









पीजीआइ 

रोबोटिक टोटल थायरॉयडेक्टॉमी तकनीक से सफल ऑपरेशन, कम दर्द और तेज़ रिकवरी से युवक पूरी तरह स्वस्थ




जटिल थायराइड ग्रंथि की परेशानी से ग्रस्त हरदोई निवासी 25 वर्षीय युवक में जटिल रोबिटक सर्जरी कर परेशानी करने में सफलता संजय गांधी पीजीआइ के इंडोक्राइन सर्जन प्रो.ज्ञान चंद ने हासिल की है। सर्जरी के बाद  गर्दन और छाती में दबाव और सांस लेने और खाना निगलने की परेशानी छुटकारा मिल गया।

 इस जटिल सर्जरी के साथ 200 रोबोटिक एंडोक्राइन सर्जरी सफलतापूर्वक पूर्ण की हैं। प्रो. ज्ञान चंद के मुताबिक इस  25 वर्षीय युवक में पिछले 18 वर्षों से गर्दन के सामने सूजन की समस्या थी, जो धीरे-धीरे बढ़ रही थी। मरीज को हाइपोथायरायडिज्म था और वह नियमित रूप से दवा (थायरोनॉर्म 62.5 माइक्रोग्राम प्रतिदिन) ले रहा थे। इलाज के लिए आए तो  जांच के दौरान थायरॉयड ग्रंथि का व्यापक बढ़ाव पाया गया, जिसकी निचली सीमा स्पर्श से महसूस नहीं हो रही थी, जिससे रेट्रोस्टर्नल विस्तार की संभावना थी। अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन में बड़ा मल्टीनोड्यूलर गॉइटर, रेट्रोस्टर्नल विस्तार तथा लिम्फोसाइटिक थायरॉयडाइटिस की पुष्टि हुई। इस में  स्थिति आमतौर पर रोबोटिक या न्यूनतम इनवेसिव सर्जरी के लिए चुनौतीपूर्ण मानी जाती है।पूर्ण प्रीऑपरेटिव मूल्यांकन के बाद मरीज का रोबोटिक टोटल थायरॉयडेक्टॉमी  ऑपरेशन के दौरान दोनों लोब बड़े पाए गए, जिसमें दाहिना लोब मेडियास्टिनम तक फैला हुआ था और इस्तमस मोटा था। रिकरेंट लैरिंजियल नर्व और पैराथायरॉयड ग्रंथियों को सुरक्षित रखा गया।निकाले गए थायरॉयड का कुल वजन 149 ग्राम था। ऑपरेशन के बाद मरीज की स्थिति पूरी तरह स्थिर रही। उसकी आवाज सामान्य रही और कैल्शियम स्तर भी सामान्य पाया गया।इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के लिए संस्थान के निदेशक प्रो आर  के धीमन ने  टीम  को बधाई  दी है। प्रो. ज्ञान चंद ने बताया कि रोबोटिक एंडोक्राइन सर्जरी  सुरक्षित, सटीक और कॉस्मेटिक रूप से बेहतर विकल्प के रूप में साबित हो हो रहा है। सर्जरी के बाद गले पर कोई निशान नहीं पड़ता है।

रविवार, 5 अप्रैल 2026

जब दवा कारगर नहीं, तब राहत देता है डीबीएस

 




जब दवा कारगर नहीं, तब राहत देता है डीबीएस


लोहिया पार्क में पार्किंसंस जागरूकता वाकथान




लखनऊ। पार्किंसंस रोग से जूझ रहे ऐसे मरीज, जिन पर दवाएं असर नहीं कर रहीं, उनके लिए डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (डीबीएस) एक कारगर विकल्प बनकर उभरा है। संजय गांधी पीजीआई में इस तकनीक से अब तक दस मरीजों को राहत मिल चुकी है।यह जानकारी संस्थान के न्यूरोलॉजी विभाग की प्रो. रूचिका टंडन ने पार्किंसंस डिजीज एंड मूवमेंट डिसऑर्डर सोसाइटी की लखनऊ शाखा द्वारा आयोजित  वॉकथॉन के बाद मरीजों और उनके तीमारदारों को दी।

उन्होंने बताया कि पार्किंसंस में कुछ वर्षों बाद “ऑफ टाइम” या “फ्लक्चुएशन्स” की स्थिति आ जाती है, जब दवाओं का असर कम होने लगता है और लक्षण अचानक बढ़ जाते हैं। ऐसे मामलों में डीबीएस तकनीक काफी प्रभावी साबित हो सकती है। 

पीजीआई की न्यूरोलॉजिस्ट 

 डॉ. अमृता मोर ने

 पार्किंसन रोग के मोटर

 और नॉन-मोटर लक्षणो

 के बारे में जानकारी दी।

सोसाइटी के प्रमुख न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. प्रदीप गुप्ता ने बताया कि पार्किंसंस मरीजों और उनके परिजनों के लिए निशुल्क “आशा की पाठशाला” का आयोजन किया जाता है।   डा. गुप्ता के बताया कि पार्किंसंस के मरीज न केवल शारीरिक, बल्कि मानसिक तनाव का भी सामना करते हैं। ऐसे में इस तरह की पहल उन्हें नई उम्मीद और हौसला देती है। 


 


 


 क्या है डीप ब्रेन स्टिमुलेशन


 


डीप ब्रेन स्टिमुलेशन सर्जिकल तकनीक है, जो उन पार्किंसंस मरीजों के लिए उपयोगी है, जिन पर दवाएं प्रभावी नहीं रह जातीं। इसमें दिमाग के विशेष हिस्सों में छोटे इलेक्ट्रोड लगाए जाते हैं।ये इलेक्ट्रोड एक बैटरी (पेसमेकर जैसे उपकरण) से जुड़े होते हैं।यह उपकरण हल्के इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजता है।इससे दिमाग की असामान्य गतिविधि नियंत्रित होती है और लक्षणों में राहत मिलती है।


 


क्या है पार्किंसंस


 न्यूरोलॉजिस्ट प्रोफेसर ए के ठक्कर बताया कि धीरे-धीरे बढ़ने वाली न्यूरोलॉजिकल (तंत्रिका तंत्र से जुड़ी) बीमारी है, जो दिमाग के उस हिस्से को प्रभावित करती है जो शरीर की हरकतों (मूवमेंट) को नियंत्रित करता है।

इस बीमारी में दिमाग में डोपामिन नामक रसायन कम बनने लगता है, जिससे शरीर की गतिविधियां प्रभावित होने लगती हैं।हाथ, पैर या शरीर में कंपन (ट्रेमर), चलने-फिरने में धीमापन, मांसपेशियों में जकड़न, संतुलन बनाने में कठिनाई और बोलने और लिखने में बदलाव होता है। डिप्रेशन और चिंता, नींद की समस्या और कुछ मामलों में याददाश्त में कमी भी होता है।

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

रोबोटिक सर्जरी: सुरक्षित और सटीक







 




रोबोटिक सर्जरी: सुरक्षित और सटीक 

लखनऊ। गंभीर और जटिल ऑपरेशन में रोबोटिक सर्जरी तेजी से कारगर साबित हो रही है। यह तकनीक न केवल ऑपरेशन को अधिक सटीक बनाती है, बल्कि मरीजों के लिए सुरक्षित और कम कष्टदायक विकल्प भी है।   इस तकनीक का सबसे बड़ा लाभ छोटे चीरे हैं। पारंपरिक सर्जरी के मुकाबले इसमें बड़े कट नहीं लगते, जिससे मरीज को कम दर्द होता है और संक्रमण का खतरा भी काफी घट जाता है। यही वजह है कि मरीज जल्दी स्वस्थ होकर सामान्य जीवन में लौट पाते हैं।  पीजीआई में रोबोकॉप्स कार्यशाला में संस्थान के पीडियाट्रिक सर्जन प्रोफेसर विजय उपाध्याय ने बताया कि  रोबोटिक सर्जरी में सर्जन को थ्री-डी हाई-डेफिनिशन विजन मिलता है। यह शरीर के अंगों और नसों को कई गुना बड़ा और स्पष्ट दिखाता है, जिससे ऑपरेशन की सटीकता बढ़ती है और गलती की संभावना कम हो जाती है।

कार्यक्रम अध्यक्ष और विभाग के प्रमुख प्रो. बसंत कुमार ने कहा कि रोबोटिक सर्जरी में रक्तस्राव कम होता है और मरीज की स्थिति स्थिर रहती है। कम रक्तस्राव, कम थकान और बेहतर विज़न की वजह से लंबे समय तक चलने वाली जटिल सर्जरी भी सुरक्षित और प्रभावी हो जाती है। इससे ऑपरेशन की सफलता दर बढ़ती है और मरीज जल्दी ठीक होकर अस्पताल से घर लौटता है।


एआई तकनीक से स्तन कैंसर का इलाज होगा अधिक सटीक, जागरूकता बढ़ाना जरूरी

 




एआई तकनीक से स्तन कैंसर का इलाज होगा अधिक सटीक, जागरूकता बढ़ाना जरूरी 


 संजय गांधी पीजीआई द्वारा आयोजित ब्रेस्ट कोर्स 2026 में स्तन कैंसर के निदान और उपचार में कई तकनीकों पर चर्चा हुई, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की संभावित भूमिका प्रमुख रही। इस विषय पर नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर के डॉक्टर मिकाएल हार्टमैन ने व्याख्यान दिया , बताया कि एआई तकनीक मैमोग्राफी, अल्ट्रासाउंड और एमआरआई की इमेज का सूक्ष्म विश्लेषण कर शुरुआती स्तर पर कैंसर की पहचान करने में मदद करेगी। उन्होंने कहा कि एआई ट्यूमर के आकार, प्रकार और फैलाव का सटीक आकलन करने में सहायक होगा, साथ ही मरीज के अनुसार व्यक्तिगत उपचार योजना बनाने में मदद करेगा। सर्जरी के दौरान भी एआई आधारित तकनीकों से सटीकता बढ़ेगी और मरीजों की रिकवरी बेहतर होगी। विभागाध्यक्ष प्रो गौरव अग्रवाल ने कहा कि स्तन कैंसर के प्रति जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है। यदि स्तन में किसी भी प्रकार की गांठ महसूस हो, तो उसे नजरअंदाज न करें और तुरंत चिकित्सकीय सलाह लें। इंडो सर्जरी विभाग के प्रोफेसर ज्ञानचंद और प्रोफेसर एम. सबारेतनम ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस स्तन कैंसर के इलाज में अहम भूमिका निभाएगा। संस्थान के निदेशक प्रो आरके धीमान ने बताया कि संस्थान हर स्तर पर स्तन कैंसर के निदान और उपचार के लिए कार्य कर रहा है और आधुनिक तकनीकों को अपनाकर मरीजों को बेहतर सुविधा दी जा रही है। संस्थान में स्तन कैंसर की शुरुआती पहचान, सटीक जांच, उन्नत सर्जरी और मरीज के अनुसार व्यक्तिगत उपचार (पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट) पर काम जारी है, जिससे मरीजों को बेहतर और समय पर इलाज मिल सके। बॉक्स: स्तन कैंसर की स्थिति और लक्षण प्रदेश में हाल के स्क्रीनिंग अभियानों में लगभग 16,500 महिलाओं की जांच की गई, जिसमें करीब 3.9 फीसदी महिलाओं में कैंसर के संभावित लक्षण पाए गए और उन्हें आगे की जांच के लिए भेजा गया। विशेषज्ञों का कहना है कि स्तन में नई गांठ, स्तन के आकार या रूप में बदलाव, निप्पल का अंदर की ओर खिंचना या स्राव, त्वचा पर लालिमा या डिम्पल, बगल में गांठ जैसी शिकायतें शुरुआती संकेत हो सकते हैं। किसी भी असामान्य बदलाव को नजरअंदाज न करना चाहिए और तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेना चाहिए।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

पीजीआई में 200 पीडियाट्रिक रोबोटिक सर्जरी का अनुभव होगा साझा

 

पीजीआई में 200 पीडियाट्रिक रोबोटिक सर्जरी का अनुभव होगा साझा

लखनऊ। संजय गांधी पीजीआई में 3 से 5 अप्रैल तक तीन दिवसीय पीडियाट्रिक रोबोटिक सर्जरी कार्यशाला का आयोजन होगा, जो देश में पहली बार आयोजित की जा रही है। इस कार्यशाला में संस्थान में अब तक हुए 200 बच्चों की रोबोटिक सर्जरी का अनुभव विशेषज्ञों के बीच साझा किया जाएगा।

कार्यशाला के दौरान तीन बच्चों की रोबोटिक सर्जरी का लाइव डिमॉन्स्ट्रेशन किया जाएगा, जिसमें तीन सर्जरी का सीधा प्रसारण शुक्रवार को होगा। अब तक पीजीआई में 200 बच्चों की रोबोटिक सर्जरी सफलतापूर्वक की जा चुकी है, जिससे उपचार की सफलता दर में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है।

इस कार्यक्रम में देश-विदेश के करीब 200 चिकित्सक भाग लेंगे और आधुनिक तकनीकों पर अपने अनुभवों का आदान-प्रदान करेंगे। साथ ही रेजिडेंट डॉक्टरों को विभिन्न रोबोटिक तकनीकों का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि संस्थान के निदेशक प्रो. आर.के. धीमन होंगे। कार्यशाला के अध्यक्ष प्रो. बसंत कुमार, उप आयोजक प्रो. विजय उपाध्याय, आयोजक सचिव प्रो. ए.के. मंडेलिया, संयुक्त सचिव डॉ. अंजू वर्मा, डॉ. रोहित कपूर और डॉ. तरुण कुमार रहेंगे।

एनेस्थेसिया की नई तकनीक से हाई रिस्क के मरीजों में नहीं टलेगी सर्जरी




एनेस्थेसिया की नई तकनीक से हाई रिस्क के मरीजों में नहीं टलेगी सर्जरी



पीजीआई देश का चौथा संस्थान है जहां  स्थापित हुई नई तकनीक


 सौ से अधिक मरीजों में सेगमेंटल स्पाइनल एनेस्थेसिया तकनीक से सफल सर्जरी


 




 


 अब हाई रिस्क वाले ऐसे मरीज, जिनमें पहले से हृदय, फेफड़े की परेशानी है, उनमें भी सुरक्षित सर्जरी संभव हो सकेगी। इनमें एनेस्थीसिया के कारण होने वाले कुप्रभाव के कारण सर्जरी नहीं टलेगी। मरीजों को एनेस्थीसिया के सामान्य होने तक के लिए लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। ऐसे गंभीर मरीजों के लिए संजय गांधी पीजीआई ने सेगमेंटल स्पाइनल एनेस्थेसिया तकनीक स्थापित कर ली है। विभाग के एनेस्थीसिया विशेषज्ञ प्रो. संदीप खूबा, प्रो. चेतना शमशेरी, विभाग के प्रमुख प्रो. संजय धीराज, प्रो. सुजीत गौतम, प्रो. रूचि वर्मा और प्रो. तपस सेन ने इस तकनीक के बारे में बताया कि पहले भी पूर्ण बेहोशी न देकर स्पाइनल एनेस्थीसिया दिया जाता था, जिसमें कमर के नीचे का पूरा हिस्सा सुन्न हो जाता था। इसके कारण चलने में परेशानी के साथ ही ब्लड प्रेशर और हार्ट रेट पर कुप्रभाव की आशंका रहती थी।


विशेषज्ञों ने बताया कि स्पाइन हड्डी, पेट, चेस्ट, किडनी ट्रांसप्लांट सहित बड़ी सर्जरी में पूर्ण बेहोशी दी जाती है, जिसमें दवा अधिक लगती है और रिकवरी में समय लगता है। कई बार सर्जरी के बाद वेंटिलेटर पर रखना होता है। अब नई तकनीक से इनमें भी सर्जरी हो रही है। किडनी ट्रांसप्लांट में नई तकनीक से हाल में ही ट्रांसप्लांट किया गया है। विशेषज्ञों ने बताया कि अब तक लगभग सौ मरीजों में इस तकनीक से सर्जरी की जा चुकी है, जिसमें कोई जटिलता (कंप्लीकेशन) नहीं हुई।


 


क्या है नई तकनीक


सेगमेंटल स्पाइनल एनेस्थेसिया में जिस अंग में सर्जरी करनी होती है, केवल उसी अंग को सुन्न किया जाता है।  सर्जरी का समय बढ़ने के साथ बेहोशी का समय भी बढ़ाते रहते हैं। सर्जरी के दौरान मरीज बात करता रहता है, जिससे सर्जरी और सुरक्षित हो जाती है।


 


तकनीक का होगा विस्तार


तकनीक के विस्तार के लिए 4 और 5 अप्रैल को दो दिवसीय वर्कशॉप का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें नई तकनीक के बारे में पूरे देश से आ रहे विशेषज्ञों को प्रशिक्षित किया जाएगा।

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

कल्याण सिंह कैंसर संस्थान के डीन बनने पर स्टाफ ने दी बधाई

  





प्रो. प्रमोद गुप्ता बने कल्याण सिंह कैंसर संस्थान के डीन बनने  पर स्टाफ ने दी बधाई

लखनऊ। कल्याण सिंह कैंसर संस्थान में वरिष्ठ कैंसर रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर प्रमोद गुप्ता को डीन नियुक्त किया गया है। प्रो. गुप्ता लंबे समय से कैंसर उपचार, शोध और मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं तथा उन्हें इस क्षेत्र का व्यापक अनुभव है। उनकी नियुक्ति से संस्थान में उपचार सेवाओं की गुणवत्ता और शोध गतिविधियों को नई गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

प्रो. गुप्ता वर्तमान में कीमोथेरेपी डे केयर वार्ड के फैकल्टी इंचार्ज भी हैं, जहां प्रतिदिन करीब 40 से 50 मरीजों को कीमोथेरेपी की सुविधा दी जा रही है। इसके अलावा वे राज्य सरकार के चिकित्सकों को भी कीमोथेरेपी संबंधी प्रशिक्षण प्रदान कर रहे हैं, जिससे प्रदेश भर में कैंसर उपचार सेवाओं को सुदृढ़ किया जा सके।

उनकी नियुक्ति पर कीमोथेरेपी डे केयर वार्ड के नर्सिंग ऑफिसर व स्टाफ ने हर्ष व्यक्त करते हुए उन्हें बधाई दी। बधाई देने वालों में दिनेश सिंह, सुशील मौर्य, मोहिना, शिखा पांडेय, पूर्णिमा दीक्षित, विंध्यवासिनी त्रिपाठी , साधना मिश्रा  और सविता सिंघल शामिल रहीं।

संस्थान प्रशासन का मानना है कि उनके नेतृत्व में मरीजों को आधुनिक तकनीकों के साथ बेहतर व समयबद्ध इलाज मिल सकेगा। साथ ही चिकित्सा शिक्षा और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को भी मजबूती मिलेगी। यह नियुक्ति प्रदेश में कैंसर इलाज की सुविधाओं को और सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

मंगलवार, 31 मार्च 2026

पीजीआई का शोध: नई तकनीक से निगलने की दिक्कत में राहत, कुछ मरीजों में हल्की एसिडिटी

 





पीजीआई का शोध: नई तकनीक से निगलने की दिक्कत में राहत, कुछ मरीजों में हल्की एसिडिटी





पीजीआई का शोध: नई तकनीक से निगलने की दिक्कत में राहत, कुछ मरीजों में हल्की एसिडिटी _ 



 लखनऊ संजय गांधी पीजीआई के विशेषज्ञों के एक नए शोध में अच्छी खबर सामने आई है। एक्लेसिया जैसी बीमारी, जिसमें मरीज को खाना निगलने में दिक्कत होती है, उसके इलाज में इस्तेमाल हो रही पोयम (पेरी ओरल एंडोस्कोपिक मायोटॉमी) तकनीक काफी असरदार साबित हो रही है। यह शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल डाइजेस्टिव डिजीज साइंसेज में फरवरी 2026 में स्वीकार हुआ है । गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों ने पोयम तकनीक से कराने वाले 54 मरीजों पर अध्ययन किया। इनमें से 50 मरीजों का करीब दो साल तक फॉलोअप किया गया। नतीजों में पता चला कि ज्यादातर मरीजों को इलाज के बाद काफी राहत मिली और वे सामान्य तरीके से खाना खा पा रहे थे। हालांकि, कुछ मरीजों में बाद में जीईआरडी (गैस्ट्रो इसोफेजियल रिफ्लक्स डिजीज) की समस्या भी दिखी। आंकड़ों के अनुसार करीब 42 प्रतिशत मरीजों में पीएच इम्पीडेंस जांच से रिफ्लक्स मिला, लेकिन सिर्फ 18 प्रतिशत मरीजों को ही इसके लक्षण महसूस हुए। इसके अलावा 14 प्रतिशत मरीजों में एंडोस्कोपी में सूजन (रिफ्लक्स इसोफेजाइटिस) दिखी। कुल मिलाकर 16 प्रतिशत में एसिड रिफ्लक्स और 26 प्रतिशत में नॉन-एसिड रिफ्लक्स देखा गया। मुख्य शोधकर्ता एवं गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो प्रवीर राय के मुताबिक अच्छी बात यह है कि ज्यादातर मामलों में यह समस्या हल्की रही और दवा व खानपान में बदलाव से आसानी से ठीक हो सकती है। यह शोध प्रो. प्रवीर राय, डॉ. प्रभात कुमार वर्मा, डॉ. अंकित मिश्रा, डॉ. पंकज कुमार, प्रो. अंशुमन एलहेंस, डॉ. आशीष कांत दुबे और डॉ. प्रभाकर मिश्रा की टीम ने मिलकर किया है। 


बॉक्स: क्या है पोयम  (पेरी ओरल एंडोस्कोपिक मायोटॉमी) एक आधुनिक इलाज है। इसमें बिना बड़ा चीरा लगाए मुंह के रास्ते एंडोस्कोप डालकर अन्ननली की कसी हुई मांसपेशियों को ढीला किया जाता है। इससे मरीज को खाना निगलने में आसानी हो जाती है।



 बॉक्स: क्या है एक्लेसिया यह खाने की नली की बीमारी है, जिसमें खाना पेट तक आसानी से नहीं पहुंच पाता। इसमें नीचे का वाल्व ठीक से नहीं खुलता, जिससे मरीज को खाना निगलने में दिक्कत सीने में भारीपन खाना अटकने जैसा महसूस होना जैसी समस्याएं होती हैं। सही इलाज से मरीज सामान्य जीवन जी सकता है।

सोमवार, 30 मार्च 2026

कैंसर संस्थान के डीन बने प्रो प्रमोद






 लखनऊ। कल्याण सिंह कैंसर संस्थान में कैंसर रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर प्रमोद गुप्ता को नया डीन नियुक्त किया गया है। उनके पास कैंसर उपचार, शोध और मेडिकल शिक्षा का लंबा अनुभव है। संस्थान प्रशासन को उम्मीद है कि उनके नेतृत्व में मरीजों को बेहतर इलाज सुविधाएं मिलेंगी और आधुनिक तकनीकों का विस्तार होगा। प्रो. गुप्ता की नियुक्ति से संस्थान की शैक्षणिक व चिकित्सीय गतिविधियों को नई दिशा मिलने की संभावना है। यह निर्णय प्रदेश में कैंसर उपचार सेवाओं को और मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा 

रविवार, 29 मार्च 2026

प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को और बेहतर बनाने के लिए काम करेगा पीजीआई

 

प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को और बेहतर बनाने के लिए काम करेगा पीजीआई 


संस्थान के अस्पताल प्रशासन विभाग को राज्य परिवर्तन आयोग ने  दी बड़ी जिम्मेदारी


संजय गांधी पीजीआई  के चिकित्सा अधीक्षक एवं अस्पताल प्रशासन विभाग के प्रोफेसर राजेश हर्षवर्धन को प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को और बेहतर बनाने की बड़ी जिम्मेदारी मिली है। राज्य परिवर्तन आयोग ने राज्य स्वास्थ्य प्रणाली संसाधन केंद्र ( एस एच एस आर सी यू पी) का गठन किया है, जिसकी जिम्मेदारी संस्थान के अस्पताल प्रशासन विभाग को सौंपी गई है।

केंद्र के निदेशक प्रो. राजेश हर्षवर्धन ने बताया कि इस केंद्र के तहत 9 डिवीजन बनाए जाएंगे, जो अगले पांच वर्षों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं का रोडमैप तैयार करेंगे। इन डिवीजनों के जरिए संबंधित विभागों के साथ समन्वय और सहयोग के साथ यह सुनिश्चित किया जाएगा कि मरीजों को समय पर और गुणवत्तापूर्ण इलाज मिले, उपलब्ध संसाधनों का पूरा उपयोग हो और स्वास्थ्यकर्मियों की कमी व समस्याओं का समाधान किया जा सके।

उन्होंने कहा कि प्रदेश स्तर पर नियमित बैठकें होंगी, जिनमें नीतियां तय की जाएंगी और उनके प्रभावी क्रियान्वयन की रणनीति बनाई जाएगी। इसका उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार लाना और जमीनी स्तर तक बेहतर परिणाम सुनिश्चित करना है। अप्रैल के अंतिम सप्ताह में बैठक होगी जिसमें कार्य की रूप रेखा तय अन्य विशेषज्ञों के साथ में की जाएगी। अप्रैल के अंतिम सप्ताह में पहली बैठक की योजना है। 

अधिकारियों के अनुसार, अभी तक देश के केवल 10 राज्यों में ही राज्य स्वास्थ्य प्रणाली संसाधन केंद्र स्थापित हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश का इस दिशा में कदम उठाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जो ‘विकसित उत्तर प्रदेश 2047’ के लक्ष्य को हासिल करने में सहायक होगा।

शनिवार, 28 मार्च 2026

पीजीआई में ब्रेन डेड महिला के परिजनों का बड़ा फैसला, दो मरीजों को मिला नया जीवन समय पर निर्णय से बना मानवता का उदाहरण

 




पीजीआई में ब्रेन डेड महिला के परिजनों का बड़ा फैसला, दो मरीजों को मिला नया जीवन समय पर निर्णय से बना मानवता का उदाहरण






 संजय गांधी पीजीआई में एक बार फिर मानवता की मिसाल सामने आई है। मध्य प्रदेश निवासी रानी देवी के परिजनों ने गहरे दुःख के बीच अंगदान का साहसिक निर्णय लेकर दो लोगों को नया जीवन दे दिया। रानी देवी को 20 मार्च 2026 को मस्तिष्क में रक्तस्राव (ब्रेन हेमरेज) के बाद पीजीआई के न्यूरोसर्जरी विभाग में भर्ती किया गया था। उनका इलाज डॉ. वेद प्रकाश मौर्य और डॉ. अनंता की देखरेख में चल रहा था। 23 मार्च को उनका जटिल ऑपरेशन किया गया, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद उनकी स्थिति में सुधार नहीं हो सका। इसके बाद विभाग के प्रो अरुण श्रीवास्तव ने अंगदान की योजना पर विचार किया। 27 मार्च 2026 को चार वरिष्ठ चिकित्सकों के पैनल ने विस्तृत परीक्षण के बाद रानी देवी को ब्रेन स्टेम डेड घोषित कर दिया। इसके पश्चात ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर और स्टेट ऑर्गन एंड टिशु ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (सीटो) की टीम ने पति सुधीर सचान सहित परिजनों को अंगदान के लिए प्रेरित किया। दुःख की इस घड़ी में परिवार ने सहमति देते हुए मानवता का परिचय दिया। संस्थान के संयुक्त निदेशक के नेतृत्व में पूरी रात ट्रांसप्लांट और हार्वेस्ट टीमों के बीच समन्वय बनाए रखा गया। वेटिंग लिस्ट के आधार पर नेफ्रोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. नारायण प्रसाद के नेतृत्व में दो मरीजों का चयन किया गया। सभी जरूरी चिकित्सकीय जांच के बाद 42 और 52 वर्ष के दो पुरुषों को किडनी प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त पाया गया। हालांकि इस मामले में केवल दोनों किडनियों का ही सफल प्रत्यारोपण हो सका। लीवर ट्रांसप्लांट इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि समय रहते कोई उपयुक्त मरीज केजीएमयू, पीजीआई या अन्य केंद्रों पर उपलब्ध नहीं हो सका। विशेषज्ञों के अनुसार अधिक इंतजार करने पर किडनियां भी उपयोग में नहीं आ पातीं, ऐसे में समय पर लिया गया निर्णय दो जिंदगियों को बचाने में निर्णायक साबित हुआ। 28 मार्च 2026 की सुबह करीब 4 बजे सोटो-यूपी टीम ने दोनों किडनियां सुरक्षित रूप से ट्रांसप्लांट ओटी तक पहुंचाईं, जहां सफल प्रत्यारोपण किया गया। संस्थान के निदेशक प्रो. आर.के. धीमन ने बताया कि यह वर्ष 2026 का दूसरा कैडेवरिक डोनेशन है। उन्होंने कहा कि यह घटना समाज को यह संदेश देती है कि समय पर लिया गया एक निर्णय कई जिंदगियों को बचा सकता है। 



बॉक्स: इन डॉक्टरों ने निभाई अहम भूमिका ब्रेन स्टेम डेथ निर्धारण प्रक्रिया में प्रो. कुंतल कांति दास और डॉ. अंकित शामिल रहे। नेफ्रोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. नारायण प्रसाद के नेतृत्व में मरीजों का चयन किया गया, जिसमें डॉ. जेया मेयप्पन की महत्वपूर्ण भूमिका रही। किडनी ट्रांसप्लांट टीम में यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख और ट्रांसप्लांट सर्जन प्रो. एम.एस. अंसारी, डॉ. संचित रुस्तगी और प्रो. संजय सुरेखा ने सर्जरी को सफल बनाया। एनेस्थीसिया टीम में प्रो. संदीप साहू, डॉ. दिव्या और डॉ. तपस ने महत्वपूर्ण सहयोग दिया। इसके अलावा समन्वय की जिम्मेदारी संस्थान के चिकित्सा अधीक्षक एवं सोटो के संयुक्त निदेशक प्रो राजेश हर्षवर्धन ने संभाली, जबकि ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर संजय सिंह, नीलिमा दीक्षित और भोलेश्वर पाठक की भूमिका अहम रही।

मंगलवार, 24 मार्च 2026

पहली तिमाही में ही मिल सकता है गर्भकालीन मधुमेह का संकेत, एसजीपीजीआई के शोध में खुलासा

 




पहली तिमाही में ही मिल सकता है गर्भकालीन मधुमेह का संकेत, एसजीपीजीआई के शोध में खुलासा


गर्भावस्था के दौरान होने वाला मधुमेह (जेस्टेशनल डायबिटीज) मां और शिशु दोनों के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है, लेकिन अब इसकी पहचान पहले ही महीनों में संभव हो सकती है। संजय गांधी पीजीआई  के एम आर एच विभाग चिकित्सा विज्ञानियों  के एक ताजा शोध में सामने आया है कि गर्भावस्था की पहली तिमाही में खून की एक विशेष जांच के जरिए भविष्य में होने वाले इस रोग का अंदाजा लगाया जा सकता है। यह मेटरनल एंड रिप्रोडक्टिव हेल्थ विभाग की प्रो इंदु लता साहू, मॉलिक्युलर मेडिसिन विभाग के डॉ कृष्ण कांत और डॉ प्रभाकर मिश्रा 

 की टीम द्वारा किए गए इस अध्ययन में 120 गर्भवती महिलाओं को शामिल किया गया। शोध के दौरान 7 से 13 सप्ताह के बीच महिलाओं के खून में ‘ग्लाइकोसाइलेटेड फाइब्रोनेक्टिन’ नामक प्रोटीन का स्तर जांचा गया। बाद में 24 से 28 सप्ताह के बीच सामान्य ग्लूकोज टेस्ट (ओजीटीटी) से यह पता लगाया गया कि किन महिलाओं को मधुमेह हुआ।

अध्ययन में पाया गया कि जिन महिलाओं को आगे चलकर जेस्टेशनल डायबिटीज हुई, उनमें गर्भावस्था की शुरुआत में ही इस प्रोटीन का स्तर सामान्य महिलाओं की तुलना में कम था। शोध के अनुसार यह जांच करीब 72 प्रतिशत तक सटीक संकेत देती है, जो शुरुआती स्क्रीनिंग के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

डॉक्टरों के मुताबिक, जेस्टेशनल डायबिटीज के कारण बच्चे का वजन अधिक होना, प्रसव के दौरान जटिलताएं, समय से पहले डिलीवरी और मां में उच्च रक्तचाप जैसी समस्याएं हो सकती हैं। ऐसे में यदि पहली तिमाही में ही जोखिम का पता चल जाए तो खानपान, नियमित जांच और जीवनशैली में बदलाव कर इन खतरों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यह अध्ययन हाल में ही जर्नल ऑफ फैमिली मेडिसिन एंड प्राइमरी केयर में प्रकाशित हुआ है।



बॉक्स: कितनी महिलाओं में होती है यह समस्या

भारत में लगभग 10 से 20 फीसदी गर्भवती महिलाओं में जेस्टेशनल डायबिटीज पाई जाती है

शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा और अधिक हो सकता है

मोटापा, पारिवारिक इतिहास और उम्र बढ़ने से खतरा बढ़ता है। 


 बॉक्स: क्या हो सकते हैं नुकसान

मां के लिए:

उच्च रक्तचाप (प्रीक्लेम्पसिया)

ऑपरेशन (सी-सेक्शन) की संभावना बढ़ना

आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज का खतरा

बच्चे के लिए:

जन्म के समय अधिक वजन (मैक्रोसोनिया)

प्रसव के दौरान चोट या जटिलता

समय से पहले जन्म

जन्म के बाद शुगर कम होना (हाइपोग्लाइसीमिया)

समय रहते पहचान और नियंत्रण से इन जोखिमों को काफी हद तक टाला जा सकता है।


बारहवीं का रिजल्ट निकलते ही यूपी और बिहार के लाखों बच्चों का दाना-पानी

  




बारहवीं का रिजल्ट निकलते ही यूपी  और बिहार के लाखों बच्चों का दाना-पानी अपने गांव-समाज से उठ जायेगा



जनरली भारत के अन्य राज्यों में बेटियां पराइ धन कही जाती है, उन्हें ब्याह के बाद अपना घर जो छोड़ना पड़ता है। बिहार में बेटियों के साथ साथ बेटे भी पराया धन ही होते हैं, 18 वर्ष होते होते बारहवीं के बाद अधिकांशतया बेटों को भी यूपी बिहार त्यागना ही पड़ता है। जिसको इंजीनियरिंग, साइंस आदि पढ़ना होता है वो जाते हैं बैंगलोर, जयपुर, भोपाल, नोयडा, पंजाब, भुवनेश्वर। जिन्हें पढ़ना होता है कॉमर्स वो जाते हैं लक्ष्मीनगर, कोलकाता, मुंबई। जो कुछ बच जाते हैं वो बिहार के किसी विश्वविद्यालय में नाम लिखवा कर निकल जाते हैं दिल्ली के मुखर्जीनगर सहित अन्य इलाकों में। वहां पहले तैयारी करते हैं UPSC, BPSC, SSC का और फिर बाद में आरएस अग्रवाल-प्रतियोगिता दर्पण घाँस के बैंक-रेलवे क्लर्क बनने की कोशिश में जवानी बहा देने को मजबूर हो जाते हैं। जो कुछ गिनती के सफ़ल होते हैं, कोचिंग छपाती है उनका इंटरव्यू और लगाती है पोस्टर अपने प्रचार के लिए। लेकिन अधिकतम जो रह जाते हैं असफल उन्हें दिल्ली में ही या किसी अन्य शहर जाना पड़ता है मजदूरी या किसी बेकार नौकरी के लिए। 


बारहवीं के बाद जो युवा यूपी बिहार छोड़ते हैं, कोई नहीं लौट पाता, कोई नहीं आ पाता वापस बिहार। पहले दोस्त छूटते हैं, फिर संबंध, रिश्तेदारों से अनावश्यक दूरी हो ही जाती है, छूट जाता है अपना पर्व-त्यौहार और छूट जाता है धीरे धीरे गांव की शादी और मरनी-हरनी भी। शुरू में आते हैं आम के मौसम में या छठ-दुर्गापूजा पे। लेकिन फिर नौकरी के कुछ सालों के बाद जब नांगलोई, संगम विहार, बदरपुर, कांदीवली, विरार आदि में कुछ गज़ जमीन खरीद के माचिस सा घर बना लेते हैं तो फिर त्योहारों में भी आना छूट जाता है यूपी बिहार। अपनी संस्कृति छूट जाती है, छूट जाती है परंपराएं। अपने घर में भी मैथिली, भोजपुरी, मगही के जगह भाषा हिंदी ही हो जाती है। बच्चे बोलने लगते हैं "मेरे को, तेरे को..." वाली भाषा और बिहार को देखने लगते हैं बैकवर्ड की नजर से। धीरे धीरे लोग छुपाने लगते हैं अपनी पहचान और बताने लगते हैं खुद को दिल्ली का, मुंबई का। मां-बाप जो छूट गए थे गांव में, बुढ़ापे में जब उनसे अब काम नहीं हो पाता तो या तो वो छूट जाते हैं राम भरोसे या मन मार के आ जाते हैं वो भी अपना गांव छोड़के बुढ़ापे में बेटे-पुतोहू के पास। अब तो होने लगा है बुजुर्गों का श्राद्ध और कर्म भी दिल्ली, मुंबई में ही, क्योंकि गांव से अधिक तादात तो दिल्ली, मुंबई में ही हैं। 


बारहवीं के परीक्षा पास किए सभी छात्रों को बधाई, शुभकामनाएं। साथ ही गुड बाय, हैप्पी जर्नी। अपना प्रदेश छूटेगा तुम्हारा अभी, शुरू में थोड़ा दर्द होगा, बुरा फील होगा, याद आएगा गांव बार-बार, कुछ दिन तड़पोगे लौट आने को, भगवान से मनाओगे, लेकिन फिर धीरे-धीरे तुम्हारी भावनाएं मरने लगेंगी, धीरे-धीरे शायद फर्क पड़ना बंद हो जाएगा। तुम भी रम जाओगे दुनिया के थपेड़े में...ईश्वर तुम्हें सुखी रखें, कहीं भी रहो, सफल करें... कत्तऊ रहे नंदकेर बालक, गोपीन्हनाथ कहैहौं


साभार फेस बुक पुनीत जी

शनिवार, 21 मार्च 2026

नेत्रदान को बढ़ावा देने के लिए यूपी में टास्क फोर्स गठित






 नेत्रदान को बढ़ावा देने के लिए यूपी में टास्क फोर्स गठित


पीजीआई के चिकित्सा अधीक्षक एवं सोटो के संयुक्त निदेशक प्रोफेसर हर्षवर्धन होंगे अध्यक्ष



 प्रदेश में रोके जा सकने वाले अंधत्व को खत्म करने और कॉर्निया प्रत्यारोपण को बढ़ावा देने के लिए चिकित्सा शिक्षा विभाग ने एक उच्चस्तरीय टास्क फोर्स का गठन किया है। इसकी अध्यक्षता संजय गांधी पीजीआईएमएस के चिकित्सा अधीक्षक व सीटो यू पी के संयुक्त निदेशक प्रो. राजेश हर्षवर्धन करेंगे। अपर मुख्य सचिव अमित घोष, आईएएस ने इसकी औपचारिक घोषणा करते हुए इसे नेत्र चिकित्सा सेवाओं को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम बताया।

यह टास्क फोर्स प्रदेश के सभी मेडिकल कॉलेजों में कॉर्नियल दान, आई बैंकिंग और कॉर्निया प्रत्यारोपण की व्यवस्था को सुदृढ़ करेगी। साथ ही हर मेडिकल कॉलेज को प्रत्यारोपण केंद्र के रूप में विकसित करने और नए आई बैंक स्थापित करने की दिशा में काम किया जाएगा।

समिति में एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज, मेरठ की नेत्र रोग विभागाध्यक्ष डॉ. अल्का गुप्ता को सह-अध्यक्ष बनाया गया है। जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज, कानपुर की नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. शालिनी मोहन को सदस्य सचिव तथा एसएन मेडिकल कॉलेज, आगरा की नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. शेफाली मजूमदार को संयोजक नियुक्त किया गया है।


पीजीआई के नेतृत्व विभाग के प्रमुख प्रो विकास कनौजिया, निदेशक सीतापुर आई हॉस्पिटल डॉ मधु भदोरिया निदेशक नवोदय आई हॉस्पिटल वाराणसी डॉ अभिषेक चंद्रा

के अलावा राम मनोहर लोहिया केजीएमयू सहित संस्थाओं के नेत्र विभाग के चिकित्सक सदस्य बनाए गए हैं। 

 28 फरवरी 2026 को पीजीआई में  आयोजित ‘नेत्रमंथन’ कार्यक्रम—जो नेत्रदान एवं प्रत्यारोपण पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण विमर्श था—के दौरान हुई पैनल चर्चा में इस टास्क फोर्स के गठन का निर्णय लिया गया था।

गुरुवार, 19 मार्च 2026

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के खिलाड़ियों का पीजीआई बनेगा सहारा

 





इलाहाबाद विश्वविद्यालय के खिलाड़ियों का पीजीआई बनेगा सहारा 


चोट लगते ही मिलेगा सुपर स्पेशलिस्ट इलाज


 संजय गांधी पीजीआई के एपेक्स ट्रामा सेंटर और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के बीच हुए अहम समझौते से अब विश्वविद्यालय के खिलाड़ियों को चोट लगने पर सीधे देश के शीर्ष विशेषज्ञों से इलाज मिलेगा। आर्थोपेडिक्स विभाग और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के बीच सहयोग समझौता किया गया है। इस समझौते में पीजीआई के आर्थोपेडिक्स विभागाध्यक्ष प्रो पुलक शर्मा और विश्वविद्यालय के स्पोर्ट्स बोर्ड के निदेशक डॉ. सर्वसुरेष्ठ धम्मी की अहम भूमिका रही। समझौते के तहत अब इलाहाबाद विश्वविद्यालय के खिलाड़ी यदि किसी भी तरह की खेल चोट का शिकार होते हैं, तो उनका इलाज पीजीआई के आर्थोपेडिक्स विभाग में किया जाएगा। यहां खिलाड़ियों को अत्याधुनिक जांच और इलाज की सुविधाएं मिलेंगी, जिससे उन्हें सटीक और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सहायता मिल सकेगी। इसके साथ ही पीजीआई की टीम समय-समय पर विश्वविद्यालय में जाकर खिलाड़ियों के लिए विशेष जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित करेगी। इन कार्यक्रमों में खिलाड़ियों को चोट से बचाव के तरीके, सुरक्षित ट्रेनिंग की तकनीक और चोट के शुरुआती लक्षण पहचानने की जानकारी दी जाएगी।