रविवार, 26 जुलाई 2026

एसजीपीजीआई में दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी का पहला सफल हैप्लो-आइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट, पिता बने जीवनदाता*






उत्तर भारत में पहली बार एक्स-एएलडी से पीड़ित बच्चे का हैप्लो-आइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट सफल


बस्ती के पांच वर्षीय बालक को एसजीपीजीआई में मिला नया जीवन, पिता बने स्टेम सेल डोनर


दक्षिण भारत के राज्यों की तरफ नहीं जाना पड़ेगा उत्तर भारत के मरीज को बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए 


 लखनऊ


 संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के चिकित्सकों ने दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी एक्स-लिंक्ड एड्रेनोलीकोडिस्ट्रोफी (एक्स-एएलडी) से पीड़ित बस्ती के पांच वर्षीय बालक का सफल हैप्लो-आइडेंटिकल बोन मैरो (स्टेम सेल) ट्रांसप्लांट कर उत्तर भारत में नई उपलब्धि हासिल की है। संस्थान का दावा है कि उत्तर भारत में इस बीमारी के लिए यह अपनी तरह का पहला सफल हैप्लो-आइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट है। इस जटिल उपचार में बच्चे के पिता स्टेम सेल डोनर बने और बेटे को नया जीवन देने में अहम भूमिका निभाई।

क्लीनिकल हिमैटोलॉजी विभाग के प्रो. सायन सिन्हा रॉय ने बताया कि बच्चा दुर्लभ आनुवंशिक न्यूरोलॉजिकल विकार एक्स-एएलडी से पीड़ित था। उसके पिता इलाज के लिए मेडिकल जेनेटिक्स विभाग की प्रो. दीप्ति सक्सेना के पास पहुंचे थे। जांच में बीमारी की पुष्टि होने के बाद मरीज को क्लीनिकल हिमैटोलॉजी विभाग भेजा गया। परिजनों को बीमारी और उपचार की पूरी जानकारी देने तथा सहमति मिलने के बाद 19 जनवरी 2026 को हैप्लो-आइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया गया। 6 महीने के फ़ॉलोअप के बाद सारी जांच रिपोर्ट सामान्य आ गई है। 

प्रो. सायन सिन्हा रॉय ने बताया कि एक्स-एएलडी जैसी बीमारी में हेमेटोपोएटिक स्टेम सेल ट्रांसप्लांट (एचएससीटी) ही वर्तमान में ऐसा उपचार है, जो बीमारी की प्रगति को रोक सकता है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि बीमारी का पता शुरुआती अवस्था में चल जाए और समय रहते ट्रांसप्लांट किया जाए। इस तरह के मरीजों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए अब उत्तर भारत के मरीजों को दक्षिणी राज्यों में नहीं जाना पड़ेगा।



 यह रही ट्रांसप्लांट टीम


विभागाध्यक्ष प्रो. राजेश कश्यप के नेतृत्व में यह ट्रांसप्लांट मुख्य कंसल्टेंट प्रो. सायन सिन्हा रॉय, रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. लुइस और डॉ. चंद्रचूड़ की टीम ने किया। मेडिकल जेनेटिक्स विभाग के  प्रो. दीप्ति सक्सेना की उपचार प्रक्रिया में अहम योगदान दिया। यह ट्रांसप्लांट राष्ट्रीय दुर्लभ रोग कार्यक्रम (नेशनल प्रोग्राम फॉर रेयर डिजीज़) के तहत किया गया।


 


टेक्नोलॉजिस्ट की भी होती है  अहम भूमिका


 सीनियर टेक्निकल ऑफिसर मनोज कुमार सिंह की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। उन्होंने पिता से स्टेम सेल संग्रह (हार्वेस्टिंग), स्टेम सेल की संख्या और गुणवत्ता की जांच तथा प्रत्यारोपण के लिए आवश्यक तकनीकी प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा किया। विशेषज्ञों के अनुसार, पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण स्टेम सेल उपलब्ध कराना बोन मैरो ट्रांसप्लांट की सफलता का अहम आधार होता है।


 


 क्या है एक्स-एएलडी


एक्स-लिंक्ड एड्रेनोलीकोडिस्ट्रोफी  एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी है। इसमें एबीसीडी1 जीन में गड़बड़ी के कारण मस्तिष्क और तंत्रिकाओं की सुरक्षा करने वाली माइलिन परत क्षतिग्रस्त होने लगती है।

यह बीमारी मुख्य रूप से लड़कों में होती है


 

 क्या है हैप्लो-आइडेंटिकल ट्रांसप्लांट


इसमें मरीज और डोनर का एचएलए (टिश्यू मैच) लगभग 50 प्रतिशत मिलता है।


जब पूरी तरह मैच करने वाला डोनर नहीं मिलता, तब माता-पिता, भाई या बहन डोनर बन सकते हैं।

इस मामले में बच्चे के पिता 50 प्रतिशत एचएलए मैच होने के कारण स्टेम सेल डोनर बने।

 

शनिवार, 25 जुलाई 2026

हेड एवं नेक कैंसर की जांच अब होगी और सटीक, एसजीपीजीआई में अत्याधुनिक एंडोस्कोपी लैब शुरू









 हेड एवं नेक कैंसर की जांच अब होगी और सटीक, एसजीपीजीआई में अत्याधुनिक एंडोस्कोपी लैब शुरू

विश्व हेड एवं नेक कैंसर दिवस पर उद्घाटन, हर माह 500 से 600 मरीजों को मिलेगा लाभ

 विश्व हेड एवं नेक कैंसर दिवस के अवसर पर शनिवार को संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के हेड एवं नेक सर्जरी विभाग में कैंसर मरीजों के लिए प्रदेश के किसी सरकारी चिकित्सा संस्थान की पहली अत्याधुनिक ओपीडी एंडोस्कोपी प्रयोगशाला का उद्घाटन किया गया। संस्थान के डीन प्रो. शालीन कुमार, सीएमएस प्रो. देवेंद्र गुप्ता तथा हेड एवं नेक सर्जरी विभागाध्यक्ष प्रो. अमित केशरी ने प्रयोगशाला का शुभारंभ किया।

प्रो. अमित केशरी ने बताया कि प्रयोगशाला में स्ट्रोबोस्कोप, नैरो बैंड इमेजिंग (एनबीआई) और फ्लेक्सिबल लैरिंगोफैरिंगोस्कोपी जैसी आधुनिक तकनीकें उपलब्ध हैं। इनकी मदद से गले, स्वरयंत्र और हेड एवं नेक कैंसर की शुरुआती अवस्था में ही सटीक पहचान हो सकेगी। ओपीडी में ही आधुनिक जांच, आवश्यक एंडोस्कोपिक प्रक्रियाएं और उपचार के बाद नियमित निगरानी की सुविधा मिलने से मरीजों को तेजी से बेहतर इलाज उपलब्ध होगा। उन्होंने बताया कि विभाग की ओपीडी में हर माह 500 से 600 मरीज आते हैं, जबकि प्रतिमाह 35 मेजर और 10 माइनर सर्जरी की जाती हैं।

संस्थान के निदेशक प्रो. आर.के. धीमन ने कहा कि हेड एवं नेक कैंसर में समय पर जांच और बहुविषयक उपचार से बेहतर परिणाम मिलते हैं। कार्यक्रम में प्रो. इंदु शुक्ला ने समय पर जांच और नियमित फॉलोअप के महत्व पर जोर दिया। वहीं प्लास्टिक सर्जरी विभाग के प्रो. अंकुर भटनागर ने कैंसर सर्जरी के बाद पुनर्निर्माण (रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी) की भूमिका पर जानकारी दी।

'स्पंदन : कैंसर, उपचार और उससे आगे' विषय पर आयोजित कार्यक्रम में कैंसर को मात दे चुके मरीजों को गुलाब का फूल देकर सम्मानित किया गया। 'वॉयसेज़ ऑफ होप' सत्र में कैंसर विजेताओं ने अपने अनुभव साझा किए। हेड एवं नेक सर्जरी, रेडियोथेरेपी, प्लास्टिक सर्जरी और मनोरोग विभाग के विशेषज्ञों ने समग्र उपचार एवं पुनर्वास पर जानकारी दी। डाइटिशियन ने उपचार के दौरान संतुलित आहार की आवश्यकता बताई और अंत में मरीजों के साथ प्रश्नोत्तर सत्र भी आयोजित किया गया।

छह साल की बच्ची की रोबोटिक थायरॉयड सर्जरी, एसजीपीजीआई ने रचा इतिहास





छह साल की बच्ची की रोबोटिक थायरॉयड सर्जरी, एसजीपीजीआई ने रचा इतिहास

देश में पहली बार इतनी कम उम्र की बच्ची का रोबोटिक ऑपरेशन, गर्दन पर नहीं रहेगा निशान, दोबारा बीमारी होने की संभावना भी बेहद कम


भारत में पहली बार छह वर्षीय बच्ची की सफल रोबोटिक थायरॉयड सर्जरी।

दा विंची Xi रोबोटिक सिस्टम से किया गया ऑपरेशन।

गर्दन पर नहीं रहेगा कोई निशान, रिकवरी भी होगी तेज।

ऑपरेशन वाली तरफ बीमारी दोबारा होने की संभावना लगभग नगण्य।

करीब ₹95 हजार में हुआ ऑपरेशन, वयस्कों में इसी सर्जरी पर सामान्यतः ₹3 से ₹4 लाख तक खर्च।

लखनऊ।

संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के एंडोक्राइन एवं ब्रेस्ट सर्जरी विभाग ने छह वर्ष की बच्ची की सफल रोबोटिक थायरॉयड सर्जरी कर चिकित्सा क्षेत्र में नया इतिहास रच दिया है। संस्थान के अनुसार भारत में पहली बार इतनी कम उम्र के बच्चे के थायरॉयड ट्यूमर का सफल ऑपरेशन दा विंची Xi रोबोटिक सिस्टम की मदद से किया गया है। विश्व स्तर पर इससे कम उम्र की केवल दक्षिण कोरिया की पांच वर्षीय बच्ची की रोबोटिक थायरॉयड सर्जरी का रिकॉर्ड दर्ज है।

बच्ची के थायरॉयड में गांठ थी। सामान्य सर्जरी में गर्दन पर चीरा लगाना पड़ता है, लेकिन इस बार बगल (ट्रांस-एक्सिलरी) के रास्ते रोबोटिक तकनीक से ट्यूमर निकाला गया। इससे गर्दन पर कोई निशान नहीं रहेगा। रोबोटिक तकनीक से सर्जन को शरीर के अंदर का हिस्सा अधिक स्पष्ट दिखाई देता है, जिससे ऑपरेशन अधिक सटीक और सुरक्षित ढंग से किया जा सका। बच्ची तेजी से स्वस्थ हो रही है।

एंडोक्राइन एवं ब्रेस्ट सर्जरी विभाग के अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) ज्ञान चंद ने बताया कि छह वर्ष की बच्ची में इस तरह की सर्जरी करना चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि छोटे बच्चों में विशेष योजना और तकनीकी बदलावों की आवश्यकता होती है। उन्होंने कहा कि रोबोटिक सर्जरी में स्वर को नियंत्रित करने वाली नसों और पैराथायरॉयड ग्रंथियों को सुरक्षित रखने की संभावना अधिक रहती है। साथ ही जिस तरफ ऑपरेशन किया गया है, उस तरफ भविष्य में बीमारी दोबारा होने की संभावना लगभग नगण्य रहती है।

उन्होंने बताया कि इस ऑपरेशन पर लगभग ₹95 हजार का खर्च आया, जबकि वयस्क मरीजों में इसी तरह की रोबोटिक थायरॉयड सर्जरी पर सामान्यतः ₹3 से ₹4 लाख तक खर्च आता है। दा विंची Xi रोबोटिक सिस्टम एसजीपीजीआई के अलावा डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (आरएमएल) और किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) में भी उपलब्ध है, लेकिन इतनी कम उम्र के बच्चे में इस तकनीक का सफल उपयोग पहली बार हुआ है।

इस सर्जरी का नेतृत्व प्रो. (डॉ.) ज्ञान चंद ने किया। टीम में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रिनेल मैस्करेनहास और डॉ. प्राची कृष्णात्रेय, सीनियर रेजिडेंट डॉ. मिथलेश वांचू एवं डॉ. अजरा तस्नीम शामिल रहे। एनेस्थीसिया टीम का नेतृत्व डॉ. सुजीत गौतम ने किया। नर्सिंग टीम के मनोज, वंदना, लिजी, नीलम तथा ऑपरेशन थिएटर की पूरी टीम ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

एसजीपीजीआई के निदेशक प्रो. (डॉ.) आर. के. धीमन तथा एंडोक्राइन एवं ब्रेस्ट सर्जरी विभाग के अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) गौरव अग्रवाल ने पूरी टीम को इस उपलब्धि पर बधाई देते हुए कहा कि यह सफलता देश में उन्नत रोबोटिक एवं बाल शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में बढ़ती विशेषज्ञता का प्रमाण है और भविष्य में कम उम्र के बच्चों के इलाज के नए रास्ते खोलेगी।


एसआरएस तकनीक से होगा मस्तिष्क ट्यूमर का सटीक इलाज

 



एसआरएस तकनीक से होगा मस्तिष्क ट्यूमर का  सटीक इलाज


 रेडियोसर्जरी प्रक्रिया, बिना चीरा लगाए हाई-प्रिसिजन रेडिएशन से उपचार

लखनऊ। मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, लखनऊ ने कैंसर उपचार के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। अस्पताल की रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग की विशेषज्ञ डॉ. गीता सिंह एवं उनकी टीम ने अत्याधुनिक स्टीरियोटैक्टिक रेडियोसर्जरी (एसआरएस) प्रक्रिया एक मरीज में सफलतापूर्वक संपन्न की। यह कैंसर उपचार की सबसे उन्नत और अत्यधिक सटीक रेडिएशन तकनीकों में शामिल है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से चयनित मस्तिष्क ट्यूमर और अन्य इंट्राक्रैनियल रोगों के इलाज में किया जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, एसआरएस में बिना किसी चीरे के अत्यधिक सटीकता के साथ ट्यूमर पर उच्च क्षमता की रेडिएशन किरणें केंद्रित की जाती हैं। इससे आसपास के स्वस्थ ऊतकों को न्यूनतम नुकसान पहुंचता है, उपचार अधिक प्रभावी होता है और मरीज को अपेक्षाकृत कम समय में सामान्य जीवन में लौटने में मदद मिलती है। यह तकनीक जटिल मामलों में भी सुरक्षित और प्रभावी उपचार का विकल्प मानी जाती है।

यह उपलब्धि अस्पताल के वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉ. साकेत पांडेय के कुशल मार्गदर्शन एवं नेतृत्व में संभव हुई। रेडिएशन ऑन्कोलॉजी टीम की विशेषज्ञता, सूक्ष्म उपचार योजना और उत्कृष्ट समन्वय ने इस जटिल प्रक्रिया को सफल बनाया।

डॉ. गीता सिंह ने कहा कि उनका उद्देश्य लखनऊ और आसपास के मरीजों को विश्वस्तरीय, आधुनिक और सटीक कैंसर उपचार अपने ही शहर में उपलब्ध कराना है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक मरीज के लिए सही उपचार, संवेदनशील देखभाल और वैज्ञानिक दृष्टिकोण उनकी टीम की प्राथमिकता है।

मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के प्रबंधक परमीत ने कहा कि अस्पताल आधुनिक तकनीक और अनुभवी विशेषज्ञों के माध्यम से मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए लगातार प्रयासरत है। उन्होंने कहा कि एसआरएस जैसी अत्याधुनिक तकनीक की उपलब्धता से अब प्रदेश के मरीजों को उन्नत कैंसर उपचार के लिए दूसरे महानगरों का रुख नहीं करना पड़ेगा।

शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

एशिया के प्रतिष्ठित कैंसर मंच पर डॉ. प्रमोद कुमार गुप्ता को बड़ी जिम्मेदारी

 






एशिया के प्रतिष्ठित कैंसर मंच पर डॉ. प्रमोद गुप्ता को बड़ी जिम्मेदारी


 एफएआरओ की पब्लिक रिलेशंस कमेटी के सदस्य बने, भारत से केवल दो विशेषज्ञों में शामिल


लखनऊ। कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान (केएसएसएससीआई) के रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग के एडिशनल प्रोफेसर एवं डीन डॉ. प्रमोद कुमार कुमार गुप्ता को फेडरेशन ऑफ एशियन ऑर्गेनाइजेशंस फॉर रेडिएशन ऑन्कोलॉजी (एफ ए आर ओ) की पब्लिक रिलेशंस कमेटी का सदस्य नामित किया गया है। एशिया के इस प्रतिष्ठित मंच पर उनका चयन संस्थान, उत्तर प्रदेश और देश के लिए गौरव की बात माना जा रहा है।

एफएआरओ एशिया में रेडिएशन ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र का प्रमुख संगठन है, जिसमें भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, चीन, सिंगापुर, मलेशिया सहित कई देशों के विशेषज्ञ शामिल हैं। इस बार पब्लिक रिलेशंस कमेटी में भारत से केवल दो विशेषज्ञों को सदस्य बनाया गया है। इनमें कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान के डॉ. प्रमोद कुमार गुप्ता और एम्स भोपाल के डॉ. सैकत दास शामिल हैं।

डॉ. प्रमोद कुमार गुप्ता रेडिएशन ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में लंबे समय से कैंसर उपचार, शोध और शिक्षण कार्य से जुड़े हैं। उनके राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए कार्यों को देखते हुए एफ ए आर ओ ने उन्हें यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। उनके चयन से संस्थान की अंतरराष्ट्रीय पहचान और मजबूत होगी तथा एशियाई देशों के विशेषज्ञों के साथ वैज्ञानिक सहयोग और अनुभवों के आदान-प्रदान को भी बढ़ावा मिलेगा।

संस्थान के निदेशक प्रो. एम एल भट्ट ने डॉ. प्रमोद कुमार गुप्ता को इस उपलब्धि पर बधाई देते हुए कहा कि यह संस्थान के लिए गर्व का क्षण है। उन्होंने विश्वास जताया कि डॉ. गुप्ता अपनी नई जिम्मेदारी का सफलतापूर्वक निर्वहन करते हुए भारतीय रेडिएशन ऑन्कोलॉजी की विशेषज्ञता को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाएंगे।

डॉ. प्रमोद कुमार गुप्ता ने कहा कि एफआरओ की पब्लिक रिलेशंस कमेटी का सदस्य बनाया जाना उनके लिए सम्मान की बात है। वह इस जिम्मेदारी का पूरी निष्ठा से निर्वहन करते हुए कैंसर उपचार और रेडिएशन ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को और मजबूत बनाने का प्रयास करेंगे।

इलाज में 70 प्रतिशत तक मेडिकल टेक्नोलॉजिस्ट की भूमिका



 इलाज में 70 प्रतिशत तक मेडिकल टेक्नोलॉजिस्ट की भूमिका


 मेडिकल लैब प्रोफेशनल वीक-2026 के समापन पर विजेताओं का सम्मान, गुणवत्ता और शोध को बढ़ावा देने पर जोर




संजय गांधी पीजीआइ में आयोजित मेडिकल लैब प्रोफेशनल वीक-2026 के समापन समारोह में मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रो. देवेंद्र गुप्ता ने कहा कि वर्तमान समय में मरीजों के इलाज में मेडिकल टेक्नोलॉजिस्ट की भूमिका लगभग 70 प्रतिशत तक है। अधिकांश चिकित्सीय निर्णय जांच रिपोर्ट के आधार पर लिए जाते हैं। ऐसे में टेक्नोलॉजिस्ट गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूत कड़ी हैं। संस्थान के चिकित्सा अधीक्षक प्रो. आर हर्षवर्धन ने कहा कि मेडिकल प्रोफेशनल्स को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पेशेवर पहचान मजबूत करने के लिए संगठित होकर आगे आना होगा। उन्होंने शोध, प्रशिक्षण, वैज्ञानिक गतिविधियों और पेशेवर संस्थाओं से जुड़ने पर जोर देते हुए कहा कि गुणवत्ता आधारित कार्यशैली ही इस क्षेत्र को नई पहचान दिला सकती है। डीन प्रो. शालीन कुमार ने कहा कि केवल जांच करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि गुणवत्ता सुनिश्चित करना सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। उन्होंने प्लान-डू-स्टडी-एक्ट मॉडल अपनाकर कार्यप्रणाली में निरंतर सुधार, शोध और वैज्ञानिक प्रकाशनों को बढ़ावा देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि अपनी उपलब्धियों को सामने लाना भी उतना ही जरूरी है, क्योंकि गुणवत्ता संवर्धन प्रत्येक प्रोफेशनल की कार्यशैली का हिस्सा होना चाहिए। इस अवसर पर एसजीपीजीआई कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष धर्मेश कुमार और महामंत्री सीमा शुक्ला सहित अन्य वक्ताओं ने मेडिकल टेक्नोलॉजिस्ट की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मरीजों के सही निदान, समय पर उपचार और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता बनाए रखने में लैब प्रोफेशनल्स का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। समारोह में सप्ताहभर आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेताओं को सम्मानित किया गया। टेक्नोलॉजिस्ट श्वेता चौरसिया, आयुष शुक्ला, मनु सिंह और मनीष, जबकि बैडमिंटन प्रतियोगिता में पिंकी, दिनेश प्रसाद तिवारी, प्रशांत, नंदिनी यादव, सुभाष, पियूष यादव, आशीष सिंह, विनीत और अंशिका को पुरस्कार प्रदान किए गए। समारोह में संस्थान के फैकल्टी सदस्य, मेडिकल टेक्नोलॉजिस्ट, छात्र और कर्मचारी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

गुरुवार, 23 जुलाई 2026

सौ रूपए में पता लगता है पैराथायरायड हारमोन असंतुलल का पता

 

पैराथायरॉयड जागरूकता माह: समय पर जांच से हड्डियों और किडनी को गंभीर नुकसान से बचाया जा सकता है


सौ रूपए में पता लगता है पैराथायरायड हारमोन असंतुलल का पता



पैराथायरॉयड शरीर की चार छोटी ग्रंथियां होती हैं, जो पैराथायरॉयड हार्मोन (पीटीएच) बनाकर शरीर में कैल्शियम और फॉस्फोरस का संतुलन बनाए रखती हैं। इन ग्रंथियों में गड़बड़ी होने पर हड्डियां कमजोर होने लगती हैं, बार-बार किडनी में पथरी बन सकती है, मांसपेशियों में दर्द, अत्यधिक थकान, याददाश्त में कमी और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं। यह बीमारी लगभग 1 से 7 प्रति 1,000 वयस्कों में पाई जाती है। स 90 फीसदी मरीजों की पहचान तब होती है, जब बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है। विश्व पैराथायरायड जागरूकता माह के मौके पर संजय गांधी पीजीआई के इंडो सर्जरी विभाग के  प्रो. ज्ञान चंद के मुताबिक किसी व्यक्ति को लंबे समय तक हड्डियों में दर्द, बार-बार फ्रैक्चर, बार-बार किडनी स्टोन, लगातार कमजोरी है तो   रक्त में कैल्शियम की जांच करानी चाहिए जो सौ रूपए में कही भी हो ताजी है।  स्तर बढ़ा या घटा है तो ले तो पैराथायरॉयड हरमोन की जांच अवश्य करानी चाहिए। समय पर पहचान होने पर अधिकांश मरीजों का सफल इलाज दवा या आवश्यकता पड़ने पर सर्जरी से किया जा सकता है।


 


एंडोक्राइन सर्जरी विभाग के अतिरिक्त प्रोफेसर प्रो. एम. सब्बारत्नम ने कहा कि समय पर उपचार से हड्डियों, किडनी और हृदय पर पड़ने वाले गंभीर दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है। आधुनिक मिनिमली इनवेसिव पैराथायरॉयड सर्जरी के माध्यम से अधिकांश मरीज तेजी से स्वस्थ होकर सामान्य जीवन में लौट सकते हैं।


 


विशेषज्ञों ने लोगों से संतुलित आहार, पर्याप्त विटामिन-डी, नियमित स्वास्थ्य जांच तथा चिकित्सकीय सलाह के अनुसार कैल्शियम की निगरानी कराने की अपील की। उनका कहना है कि पैराथायरॉयड जागरूकता माह का उद्देश्य लोगों को इस कम चर्चित लेकिन गंभीर बीमारी के लक्षणों, जांच और उपचार के बारे में जागरूक बनाना है, ताकि समय पर इलाज से जटिलताओं को रोका जा सके।




कितना होना चाहिए कैल्शियम





 


 रक्त में कुल कैल्शियम


 


8.5 से 10.5 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर होना चाहिए। यदि कुल कैल्शियम 10.5  से अधिक हो, तो इसे हाइपरकैल्सीमिया माना जाता है और ऐसे मामलों में पैराथायरॉयड हार्मोन  सहित अन्य जांच की सलाह दी जा सकती है। कम है तो हाइपो कैल्सीमिय  की परेशानी हो सकती है। 


 


आयनाइज्ड कैल्शियम :


 


4.5–5.3 एमजी प्रति डेली  के बीच होना चाहिए

यूपी में इलाज की गुणवत्ता सुधारने के लिए बनेगा हेल्थ ब्लूप्रिंट

 




यूपी में इलाज की गुणवत्ता सुधारने के लिए बनेगा हेल्थ ब्लूप्रिंट

डिजिटल हेल्थ, मरीजों की सुरक्षा और साक्ष्य आधारित नीति निर्माण पर रहेगा फोकस, पांच वर्षीय रणनीतिक रोडमैप होगा तैयार



उत्तर प्रदेश में मरीजों को बेहतर, सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण इलाज उपलब्ध कराने के लिए स्टेट हेल्थ सिस्टम्स रिसोर्स सेंटर-उत्तर प्रदेश (एसएचएसआरसी-यूपी) का पांच वर्षीय रणनीतिक रोडमैप तैयार किया जा रहा है। इसके तहत डिजिटल हेल्थ, मरीजों की सुरक्षा, गैर-संचारी रोगों की रोकथाम, अस्पतालों में गुणवत्ता सुधार और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर स्वास्थ्य नीति तैयार करने पर विशेष जोर रहेगा।

एसएचएसआरसी-यूपी के कार्यकारी निदेशक एवं एसजीपीजीआइ के चिकित्सा अधीक्षक प्रो.आर हर्षवर्धन ने बताया कि लखनऊ में आयोजित दो दिवसीय राउंडटेबल बैठक के पहले दिन स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और जनकेंद्रित बनाने पर व्यापक मंथन हुआ। विशेषज्ञों ने स्वास्थ्य सेवाओं की नियमित समीक्षा, डिजिटल तकनीक के बेहतर उपयोग, मरीजों की सुरक्षा, अस्पतालों में गुणवत्ता सुधार और विभिन्न विभागों के बेहतर समन्वय को भविष्य की प्राथमिकता बताया।

स्टेट ट्रांसफॉर्मेशन कमीशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं एसएचएसआरसी-यूपी के अध्यक्ष मनोज कुमार सिंह ने कहा कि एसएचएसआरसी-यूपी को प्रदेश का प्रमुख तकनीकी थिंक टैंक बनाया जाएगा, जो नीति निर्माण, शोध और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के बीच सेतु का कार्य करेगा। एसजीपीजीआई के निदेशक एवं एसएचएसआरसी-यूपी के सह-अध्यक्ष प्रो.  आरके धीमन ने कहा कि प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए सरकार, चिकित्सा संस्थानों और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच निरंतर सहयोग तथा साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण आवश्यक है।

बैठक में आईआईएम लखनऊ के निदेशक डॉ. एम.पी. गुप्ता, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, उत्तर प्रदेश की मिशन निदेशक डॉ. पिंकी जोवेल, चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा चिकित्सा शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव अमित कुमार घोष,  चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की सचिव ऋतु माहेश्वरी, चिकित्सा शिक्षा विभाग की सचिव डॉ. नेहा शर्मा, जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, अमेरिका के प्रो. डॉ. साइरस इंजीनियर तथा चिकित्सा शिक्षा विभाग की विशेष सचिव कृतिका शर्मा सहित देश-विदेश के विशेषज्ञों ने विचार रखे। एसजीपीजीआई के अस्पताल प्रशासन विभाग के आयोजन सचिव डॉ. गौरव के. झा ने बताया कि पहले दिन के सुझावों के आधार पर दूसरे दिन एसएचएसआरसी-यूपी के संस्थागत ढांचे और पांच वर्षीय रणनीतिक रोडमैप को अंतिम रूप दिया जाएगा।यूपी में इलाज की गुणवत्ता सुधारने के लिए बनेगा हेल्थ ब्लूप्रिंट

डिजिटल हेल्थ, मरीजों की सुरक्षा और साक्ष्य आधारित नीति निर्माण पर रहेगा फोकस, पांच वर्षीय रणनीतिक रोडमैप होगा तैयार



उत्तर प्रदेश में मरीजों को बेहतर, सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण इलाज उपलब्ध कराने के लिए स्टेट हेल्थ सिस्टम्स रिसोर्स सेंटर-उत्तर प्रदेश (एसएचएसआरसी-यूपी) का पांच वर्षीय रणनीतिक रोडमैप तैयार किया जा रहा है। इसके तहत डिजिटल हेल्थ, मरीजों की सुरक्षा, गैर-संचारी रोगों की रोकथाम, अस्पतालों में गुणवत्ता सुधार और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर स्वास्थ्य नीति तैयार करने पर विशेष जोर रहेगा।

एसएचएसआरसी-यूपी के कार्यकारी निदेशक एवं एसजीपीजीआइ के चिकित्सा अधीक्षक प्रो.आर हर्षवर्धन ने बताया कि लखनऊ में आयोजित दो दिवसीय राउंडटेबल बैठक के पहले दिन स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और जनकेंद्रित बनाने पर व्यापक मंथन हुआ। विशेषज्ञों ने स्वास्थ्य सेवाओं की नियमित समीक्षा, डिजिटल तकनीक के बेहतर उपयोग, मरीजों की सुरक्षा, अस्पतालों में गुणवत्ता सुधार और विभिन्न विभागों के बेहतर समन्वय को भविष्य की प्राथमिकता बताया।

स्टेट ट्रांसफॉर्मेशन कमीशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं एसएचएसआरसी-यूपी के अध्यक्ष मनोज कुमार सिंह ने कहा कि एसएचएसआरसी-यूपी को प्रदेश का प्रमुख तकनीकी थिंक टैंक बनाया जाएगा, जो नीति निर्माण, शोध और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के बीच सेतु का कार्य करेगा। एसजीपीजीआई के निदेशक एवं एसएचएसआरसी-यूपी के सह-अध्यक्ष प्रो.  आरके धीमन ने कहा कि प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए सरकार, चिकित्सा संस्थानों और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच निरंतर सहयोग तथा साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण आवश्यक है।

बैठक में आईआईएम लखनऊ के निदेशक डॉ. एम.पी. गुप्ता, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, उत्तर प्रदेश की मिशन निदेशक डॉ. पिंकी जोवेल, चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा चिकित्सा शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव अमित कुमार घोष,  चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की सचिव ऋतु माहेश्वरी, चिकित्सा शिक्षा विभाग की सचिव डॉ. नेहा शर्मा, जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, अमेरिका के प्रो. डॉ. साइरस इंजीनियर तथा चिकित्सा शिक्षा विभाग की विशेष सचिव कृतिका शर्मा सहित देश-विदेश के विशेषज्ञों ने विचार रखे। एसजीपीजीआई के अस्पताल प्रशासन विभाग के आयोजन सचिव डॉ. गौरव के. झा ने बताया कि पहले दिन के सुझावों के आधार पर दूसरे दिन एसएचएसआरसी-यूपी के संस्थागत ढांचे और पांच वर्षीय रणनीतिक रोडमैप को अंतिम रूप दिया जाएगा।

सोमवार, 20 जुलाई 2026

कार्डियक अरेस्ट में हर सेकंड कीमती, आप भी बचा सकते हैं किसी की जिंदगी पीजीआई



कार्डियक अरेस्ट में हर सेकंड कीमती, आप भी बचा सकते हैं किसी की जिंदगी

पीजीआई में नेशनल एनेस्थीसिया एंड ऑपरेशन थिएटर टेक्नोलॉजी डे पर एआई, नीडल-फ्री एनेस्थीसिया और मरीजों की सुरक्षा पर चर्चा

 लखनऊ। किसी व्यक्ति की अचानक सांस रुक जाए, वह बेहोश हो जाए और शरीर में कोई हरकत न हो तो घबराने के बजाय तुरंत सही कदम उठाना उसकी जान बचा सकता है। ऐसे समय में बेसिक लाइफ सपोर्ट (बीएलएस), समय पर सीपीआर और एईडी का इस्तेमाल जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर साबित हो सकता है। यही संदेश संजय गांधी पीजीआई में नेशनल एनेस्थीसिया एंड ऑपरेशन थिएटर टेक्नोलॉजी डे पर आयोजित कार्यक्रम में दिया गया।

कार्यक्रम में आयोजित पोस्टर प्रतियोगिता में बैचलर ऑफ ऑपरेशन थिएटर टेक्नोलॉजी के छात्र अभय कुमार उपाध्याय ने बेसिक लाइफ सपोर्ट (बीएलएस) विषय पर तैयार पोस्टर के लिए प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया। पोस्टर में बताया गया कि कार्डियक अरेस्ट की स्थिति में सबसे पहले स्थान की सुरक्षा सुनिश्चित करें, तुरंत 112 पर सूचना दें, मरीज की सांस जांचें और सांस नहीं होने पर 30 चेस्ट कंप्रेशन और 2 रेस्क्यू ब्रीथ के साथ सीपीआर शुरू करें। एईडी उपलब्ध होने पर उसके निर्देशों के अनुसार उपयोग करें और डॉक्टरों के पहुंचने तक सीपीआर जारी रखें। प्रतियोगिता में सुजन्य सिंह को द्वितीय तथा हर्षिता सिंह को तृतीय पुरस्कार मिला।

चीफ एनेस्थीसिया टेक्नोलॉजिस्ट धीरज सिंह और चंद्रेश सिंह ने बताया कि भविष्य में नीडल-फ्री एनेस्थीसिया मरीजों के लिए बड़ी राहत साबित होगा। जेट इंजेक्टर, ट्रांसडर्मल ड्रग डिलीवरी और माइक्रोनीडल पैच जैसी तकनीकों से बिना सुई के दवा देने पर काम चल रहा है। इससे इंजेक्शन का दर्द, संक्रमण का खतरा और सुई का डर कम होगा। उन्होंने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) अब एनेस्थीसिया का अहम हिस्सा बन रही है। ऑपरेशन के दौरान एआई मरीज की लगातार निगरानी, दवा की सही मात्रा तय करने और संभावित जटिलताओं की समय रहते पहचान करने में मदद करेगी।

एनेस्थीसिया विभागाध्यक्ष प्रो. सुजीत गौतम ने बताया कि संस्थान में नीडल-फ्री एनेस्थीसिया जैसी आधुनिक तकनीकों पर काम शुरू हो चुका है। प्रो. प्रतीक सिंह वैश्य ने अनुशासन, टीमवर्क और लगातार प्रशिक्षण को सफल टेक्नोलॉजिस्ट की पहचान बताया। प्रो. संदीप साहू ने कहा कि ऑपरेशन थिएटर टेक्नोलॉजिस्ट भले ही पर्दे के पीछे काम करते हों, लेकिन मरीज की सुरक्षा और हर सफल सर्जरी में उनकी भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। कार्यक्रम में कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष धर्मेश कुमार और एलाइड हेल्थकेयर सदस्य विनय प्रताप सिंह भी मौजूद रहे।

रविवार, 19 जुलाई 2026

कॉर्निया दान बढ़ाने को बनेगा रोडमैप, एसजीपीजीआई में टास्क फोर्स की बैठक

 



कॉर्निया दान बढ़ाने को बनेगा रोडमैप, एसजीपीजीआई में टास्क फोर्स की बैठक

आई बैंकों और अस्पतालों के बेहतर समन्वय, दाताओं की समय पर पहचान व जनजागरूकता बढ़ाने पर जोर



 कॉर्निया दान और प्रत्यारोपण सेवाओं को मजबूत बनाने के लिए संजय गांधी पीजीआइ में उच्च स्तरीय टास्क फोर्स की बैठक हुई। बैठक में कॉर्निया दान की दर बढ़ाने, उपलब्ध कॉर्निया का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करने और प्रदेशभर में बेहतर प्रत्यारोपण सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए समयबद्ध कार्ययोजना तैयार करने पर सहमति बनी।

स्टेट ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन सोटो, उत्तर प्रदेश के संयुक्त निदेशक प्रो.आर हर्षवर्धन की अध्यक्षता में हुई बैठक में डॉ. शालिनी मोहन, डा. शेफाली मजूमदार, डा. अलका और प्रो. विकास कनौजिया सहित टास्क फोर्स के सदस्य शामिल हुए।

बैठक में अस्पताल आधारित आई रिट्रीवल प्रोग्राम को मजबूत करने, संभावित कॉर्निया दाताओं की समय पर पहचान और रेफरल व्यवस्था बेहतर बनाने, डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के प्रशिक्षण, आई बैंकों व अस्पतालों के बीच समन्वय बढ़ाने तथा कॉर्निया के संग्रहण, संरक्षण और प्रत्यारोपण की मानकीकृत व्यवस्था लागू करने पर विस्तार से चर्चा हुई। साथ ही नेत्रदान के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने के लिए व्यापक अभियान चलाने पर भी जोर दिया गया।

प्रो.  आर हर्षवर्धन ने कहा कि सरकारी संस्थानों, स्वास्थ्य विभाग, आई बैंकों और सामाजिक संगठनों के संयुक्त प्रयास से प्रदेश में कॉर्निया दान कार्यक्रम को नई गति मिलेगी। उन्होंने विश्वास जताया कि टास्क फोर्स की सिफारिशों से कॉर्निया जनित अंधत्व की रोकथाम और जरूरतमंद मरीजों को समय पर प्रत्यारोपण की सुविधा उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी। बैठक के अंत में जिम्मेदारियां तय करते हुए समयबद्ध कार्ययोजना लागू करने पर सहमति बनी।

मां पीतांबरा सिद्धपीठ: जहां हल्दी के सरोवर से हुआ देवी का प्राकट्य, मां धूमावती का दुर्लभ मंदिर और अश्वत्थामा की पूजा की जनश्रुति आज भी है जीवंत






 मां पीतांबरा सिद्धपीठ: जहां हल्दी के सरोवर से हुआ देवी का प्राकट्य, मां धूमावती का दुर्लभ मंदिर और अश्वत्थामा की पूजा की जनश्रुति आज भी है जीवंत

 मध्य प्रदेश के दतिया में स्थित मां पीतांबरा सिद्धपीठ देश के सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि शक्ति साधना, तंत्र परंपरा और गहन आध्यात्मिक आस्था का केंद्र है। यहां मां पीतांबरा (बगलामुखी) के साथ मां धूमावती की भी पूजा होती है। नवरात्र के दौरान लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। देश के बड़े राजनेताओं, उद्योगपतियों, न्यायपालिका से जुड़े लोगों और साधकों की भी इस सिद्धपीठ में गहरी आस्था रही है।

क्यों पड़ा मां पीतांबरा नाम?

"पीतांबरा" शब्द दो संस्कृत शब्दों से बना है—पीत अर्थात पीला और अंबर अर्थात वस्त्र। यानी पीले वस्त्र धारण करने वाली देवी।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सतयुग में जब भयंकर तूफान और प्राकृतिक प्रलय से सृष्टि संकट में पड़ गई, तब भगवान विष्णु ने गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र स्थित हरिद्रा (हल्दी) सरोवर के तट पर कठोर तप किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति हल्दी के स्वर्णिम जल से मां बगलामुखी के रूप में प्रकट हुईं और संसार को विनाश से बचाया। चूंकि देवी का प्राकट्य हल्दी के पीले जल से हुआ था, इसलिए उन्हें पीतांबरा कहा गया। आज भी उनकी पूजा में पीले वस्त्र, हल्दी, पीले पुष्प, चने की दाल और बेसन के लड्डू का विशेष महत्व है।

मां बगलामुखी कौन हैं?

मां बगलामुखी सनातन धर्म की दशमहाविद्याओं की आठवीं महाविद्या हैं। उन्हें स्तंभन शक्ति की देवी कहा जाता है। स्तंभन का अर्थ है अन्याय, असत्य, हिंसा और नकारात्मक शक्तियों के प्रभाव को रोकना। धार्मिक मान्यता है कि मां अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और उन्हें साहस, विजय तथा न्याय प्राप्त करने का आशीर्वाद देती हैं।

दतिया में कैसे हुई सिद्धपीठ की स्थापना?

दतिया स्थित इस सिद्धपीठ की स्थापना वर्ष 1935 में पूज्य स्वामीजी महाराज ने की थी। उन्होंने यहां कठोर तप और साधना की, जिसके बाद यह स्थान सिद्धपीठ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। आज भी देशभर से साधक विशेष अनुष्ठान और शक्ति साधना के लिए यहां आते हैं।

छोटी-सी खिड़की से होते हैं मां के दर्शन

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि श्रद्धालु मां के सीधे दर्शन नहीं करते, बल्कि गर्भगृह की एक छोटी-सी खिड़की से दर्शन करते हैं। मान्यता है कि मां का तेज अत्यंत प्रखर है, इसलिए यह व्यवस्था बनाई गई है।

राजसत्ता की देवी क्यों कहलाती हैं?

दतिया की मां पीतांबरा को राजसत्ता की देवी भी कहा जाता है। वर्षों से यह मान्यता रही है कि यहां विशेष पूजा और अनुष्ठान करने से नेतृत्व क्षमता, प्रतिष्ठा और सफलता का आशीर्वाद मिलता है। इसी कारण देश के अनेक राजनेता, मंत्री, उद्योगपति और प्रशासनिक अधिकारी यहां गुप्त रूप से पूजा-अर्चना और यज्ञ कराते रहे हैं।

1962 के भारत-चीन युद्ध की प्रसिद्ध मान्यता

मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित मान्यताओं में वर्ष 1962 का भारत-चीन युद्ध शामिल है। स्थानीय परंपरा के अनुसार तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के अनुरोध पर यहां 51 कुंडीय महायज्ञ कराया गया था। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद चीन ने युद्धविराम की घोषणा की। मंदिर परिसर में उस यज्ञ की यज्ञशाला आज भी मौजूद है। हालांकि, इस घटना की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है और इसे धार्मिक आस्था एवं स्थानीय परंपरा के रूप में देखा जाता है।

किन-किन लोगों ने किए दर्शन?

इस सिद्धपीठ में पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी सहित अनेक राष्ट्रीय नेताओं ने दर्शन किए। सिंधिया राजघराने की विशेष आस्था यहां रही है। राजमाता विजयाराजे सिंधिया नवरात्र में यहां नौ दिनों तक साधना करती थीं। माधवराव सिंधिया, वसुंधरा राजे, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह, उमा भारती और शिवराज सिंह चौहान भी यहां दर्शन कर चुके हैं।

वनखंडेश्वर महादेव की अद्भुत महिमा

मंदिर परिसर में स्थित वनखंडेश्वर महादेव का शिवलिंग अत्यंत प्राचीन माना जाता है। स्थानीय मान्यता है कि इसकी स्थापना महाभारत काल में पांडवों ने की थी। श्रद्धालु मां पीतांबरा के दर्शन के बाद यहां भगवान शिव का जलाभिषेक और पूजा अवश्य करते हैं।

मां धूमावती का दुर्लभ मंदिर

पीतांबरा पीठ की सबसे बड़ी विशेषताओं में मां धूमावती का मंदिर भी शामिल है। मां धूमावती दशमहाविद्याओं की सातवीं महाविद्या हैं। उनका स्वरूप वैराग्य, तप, धैर्य और विपरीत परिस्थितियों में भी आत्मबल का प्रतीक माना जाता है।

यह मंदिर अत्यंत दुर्लभ माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इसके कपाट सामान्य समय में बंद रहते हैं और केवल आरती या निर्धारित समय पर ही दर्शन होते हैं। श्रद्धालु मानते हैं कि मां धूमावती की कृपा से भय, रोग, आर्थिक संकट और जीवन की कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति प्राप्त होती है।

अश्वत्थामा से जुड़ी रहस्यमयी जनश्रुति

पीतांबरा पीठ से जुड़ी सबसे रहस्यमयी मान्यताओं में महाभारत के अमर योद्धा अश्वत्थामा का नाम भी आता है। स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार अश्वत्थामा आज भी ब्रह्ममुहूर्त में अदृश्य रूप से मंदिर में आकर मां पीतांबरा और वनखंडेश्वर महादेव की पूजा करते हैं। कहा जाता है कि कई बार मंदिर खुलने से पहले पूजा के ताजे फूल और चढ़ावा दिखाई देते हैं। हालांकि, इसका कोई ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है और इसे स्थानीय आस्था का विषय माना जाता है।

यहां किस उद्देश्य से लोग आते हैं?

श्रद्धालु यहां मुख्य रूप से—

शत्रु बाधा से मुक्ति

न्यायालय के मामलों में सफलता

मानसिक शांति

परिवार की सुख-समृद्धि

करियर और व्यवसाय में उन्नति

चुनाव और नेतृत्व में सफलता

आध्यात्मिक साधना

भय और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा

की कामना लेकर आते हैं।

मां पीतांबरा को क्या चढ़ाया जाता है?

हल्दी

पीले पुष्प

चने की दाल

पीले वस्त्र

बेसन के लड्डू

नारियल

मौसमी फल

मां पीतांबरा का सरल मंत्र

ॐ ह्लीं बगलामुख्यै नमः॥

या

ॐ पीताम्बरायै नमः॥

इन मंत्रों का 11, 21 या 108 बार श्रद्धापूर्वक जाप किया जा सकता है।

मां धूमावती का सरल मंत्र

ॐ धूं धूमावत्यै नमः॥

इस मंत्र का भी श्रद्धापूर्वक जाप किया जा सकता है। तांत्रिक बीज मंत्रों और विशेष साधना के लिए गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक माना गया है।


नवरात्र में विशेष महत्व

चैत्र और शारदीय नवरात्र में यहां विशेष हवन, दुर्गा सप्तशती पाठ, शक्ति साधना और अखंड पूजा होती है। इन दिनों लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं और पूरा मंदिर पीले फूलों तथा आकर्षक विद्युत सज्जा से सुसज्जित रहता है।

आस्था और इतिहास का संगम

मां पीतांबरा सिद्धपीठ भारत की शक्ति उपासना परंपरा का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां मां बगलामुखी के पीतांबरा स्वरूप, मां धूमावती की दुर्लभ उपासना, वनखंडेश्वर महादेव की प्राचीन मान्यताएं और अश्वत्थामा से जुड़ी जनश्रुतियां इस स्थान को अत्यंत विशिष्ट बनाती हैं। यही कारण है कि हर वर्ष लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचकर मां के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं।


शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

कैंसर संस्थान ब्रेनस्टेम ट्यूमर की आठ घंटे चली जटिल सर्जरी सफल, 16 वर्षीय किशोर को मिला नया जीवन

 



ब्रेनस्टेम ट्यूमर की आठ घंटे चली जटिल सर्जरी सफल, 16 वर्षीय किशोर को मिला नया जीवन



 कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान (केएसएसएससीआई) के न्यूरोसर्जरी विभाग ने ब्रेनस्टेम जैसे अत्यंत संवेदनशील हिस्से में स्थित जटिल ट्यूमर की सफल सर्जरी कर 16 वर्षीय किशोर को नया जीवन दिया है। करीब आठ घंटे तक चली इस उच्च जोखिम वाली सर्जरी के बाद मरीज पूरी तरह स्वस्थ होकर अस्पताल से डिस्चार्ज हो चुका है।

ब्रेनस्टेम मस्तिष्क का वह महत्वपूर्ण भाग है, जो सांस लेना, हृदय की धड़कन, रक्तचाप और शरीर की कई आवश्यक गतिविधियों को नियंत्रित करता है। इस क्षेत्र में ट्यूमर की सर्जरी बेहद चुनौतीपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि थोड़ी सी भी चूक मरीज के लिए गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है।

सर्जरी का नेतृत्व संस्थान के चीफ मेडिकल सुपरिंटेंडेंट एवं न्यूरोसर्जरी विभागाध्यक्ष प्रो. विजेंद्र कुमार ने किया। ऑपरेशन के दौरान अत्याधुनिक न्यूरोनेविगेशन सिस्टम, नर्व मॉनिटरिंग सिस्टम और ऑपरेटिंग माइक्रोस्कोप की मदद से ट्यूमर को सावधानीपूर्वक हटाया गया, जिससे मस्तिष्क की महत्वपूर्ण नसों और संरचनाओं को सुरक्षित रखा जा सका।

इस जटिल ऑपरेशन में डॉ. अमित कुमार उपाध्याय, डॉ. रवि रंजन और डॉ. संजीव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एनेस्थीसिया टीम का नेतृत्व डॉ. रिचा राय ने किया, जिनकी सतत निगरानी से पूरी प्रक्रिया सुरक्षित ढंग से संपन्न हुई।

संस्थान के निदेशक प्रो. एम.एल.बी. भट्ट ने इस सफलता पर पूरी टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह उपलब्धि संस्थान में उपलब्ध आधुनिक तकनीक, विशेषज्ञ चिकित्सकों की दक्षता और गुणवत्तापूर्ण कैंसर उपचार के प्रति प्रतिबद्धता का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि संस्थान जटिल से जटिल न्यूरोसर्जरी और कैंसर उपचार के लिए मरीजों को विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए निरंतर प्रयासरत है।

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

पीजीआई में दीक्षा समारोह मेधा को मिला सम्मान 279 को मिली डिग्री

 










पीजीआई के 30वें दीक्षांत समारोह में 279 विद्यार्थियों को मिली उपाधि

प्रो. नारायण प्रसाद को मिला गवर्नर मेडल फॉर बेस्ट टीचर अवॉर्ड


संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीआई) के 30वें दीक्षांत समारोह में सोमवार को 279 विद्यार्थियों को उपाधियां प्रदान की गईं। राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने विद्यार्थियों को डिग्रियां प्रदान कीं। इनमें 43 एमडी/एमएस, 72 डीएम/एमसीएच, 48 पीडीसीसी, 50 बीएससी नर्सिंग, 30 बीएससी क्रिटिकल केयर एंड मेडिकल टेक्नोलॉजी, 15 एमएससी क्रिटिकल केयर एंड मेडिकल टेक्नोलॉजी, सात पीएचडी, छह पीडीएएफ और छह एमएचए शामिल रहे। समारोह में नेफ्रोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. नारायण प्रसाद को गवर्नर मेडल फॉर बेस्ट टीचर अवॉर्ड सहित 12 शिक्षकों, शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों को विभिन्न श्रेणियों में सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और राज्यमंत्री मयंकेश्वर शरण सिंह शामिल नहीं हो सके। समारोह में  में मुख्य रूप से कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष धर्मेश कुमार, महामंत्री सीमा शुक्ला सहित तमाम लोग शामिल हुए। इस मौके पर चिकित्सा अधीक्षक प्रो राजेश हर्षवर्धन की पुस्तक का विमोचन हुआ। 

दो सदस्यीय परिवारों को भी मिले आयुष्मान योजना का लाभ

दीक्षांत संबोधन में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने कहा कि आयुष्मान योजना में छह सदस्यीय परिवारों के कार्ड आसानी से बन जाते हैं, लेकिन दो सदस्यीय परिवारों को इसका लाभ नहीं मिल पाता। सरकार को इस दिशा में नीति बनानी चाहिए ताकि पात्र दो सदस्यीय परिवार भी योजना से वंचित न रहें। उन्होंने बताया कि कई जिलाधिकारियों से बात कर ऐसे परिवारों के आयुष्मान कार्ड बनवाए गए हैं।

उन्होंने कहा कि 300 बच्चों की हार्ट सर्जरी होने की जानकारी दी गई है, लेकिन यह भी आकलन होना चाहिए कि ऑपरेशन के बाद कितने बच्चे लंबे समय तक स्वस्थ जीवन जी रहे हैं। शोध और उपचार के परिणामों का नियमित मूल्यांकन होना चाहिए, तभी वास्तविक सुधार संभव होगा।

राज्यपाल ने कहा कि कैंसर की 70 दवाओं पर सीमा शुल्क (कस्टम ड्यूटी) समाप्त की गई है। अस्पतालों में यह भी प्रदर्शित किया जाना चाहिए कि इनमें से कितनी दवाएं मरीजों को उपलब्ध हैं। उन्होंने बताया कि संस्थान ने आईसीएमआर को 100 शोध परियोजनाएं भेजी हैं। सितंबर-अक्टूबर में उनकी समीक्षा की जाएगी कि कितना बजट मिला, कितना शोध हुआ और उसका समाज को क्या लाभ मिला।

उन्होंने जन भवन सर्वे का हवाला देते हुए कहा कि पीजीआई के कई छात्रावासों में मेस, वाई-फाई और वॉशिंग मशीन जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। पुस्तकालय में लगे 65 कंप्यूटरों की इंटरनेट गति भी धीमी है, जिससे विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होती है। परिसर के कुछ हिस्सों में गंदगी पर भी उन्होंने नाराजगी जताई। साथ ही गांव-गांव स्वास्थ्य शिविर लगाकर 30 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं और किशोरियों की नियमित स्वास्थ्य जांच कराने पर जोर दिया।

बॉक्स : बाहर से खाना न आए

राज्यपाल ने कहा कि कुछ छात्रावासों में बाहर से भोजन मंगाया जाता है। ऐसी शिकायतें मिली हैं कि इसके माध्यम से नशीले पदार्थ भी पहुंच सकते हैं। इसलिए छात्रावासों में भोजन की व्यवस्था परिसर के भीतर ही होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अक्षय पात्र जैसी संस्थाएं इस दिशा में अच्छा विकल्प हो सकती हैं।

बॉक्स : एक वर्ष में नंबर-1 बनने का लक्ष्य

राज्यपाल ने कहा कि एसजीपीआई देश के शीर्ष तीन चिकित्सा संस्थानों में शामिल है। अब अगले एक वर्ष में देश का नंबर-1 संस्थान बनने का लक्ष्य निर्धारित कर उस दिशा में कार्य करना चाहिए।

कोई भी मरीज बिना इलाज वापस न जाए

उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने कहा कि कोई भी मरीज बिना इलाज वापस नहीं जाना चाहिए। यदि तत्काल बेड उपलब्ध न हो तो मरीज को एंबुलेंस में भी आवश्यक उपचार उपलब्ध कराया जाए।

शोभायात्रा के दौरान रुकवाया राष्ट्रगीत

दीक्षांत समारोह की शोभायात्रा के दौरान राष्ट्रगीत शुरू हो गया। इस पर मंच पर मौजूद राज्यपाल ने संकेत देकर राष्ट्रगान रुकवाया और निर्देश दिया कि पहले शोभायात्रा पूरी होने दी जाए, उसके बाद राष्ट्रगान प्रस्तुत किया जाए।

अक्टूबर तक शुरू होगा एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर

संस्थान के निदेशक प्रो. आर.के. धीमन ने बताया कि अक्टूबर तक एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर का पहला चरण शुरू हो जाएगा। इसमें 12 विभागों की सेवाएं और 293 बेड उपलब्ध होंगे। इसके लिए संसाधन जुटाए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि क्वाटरनरी केयर परियोजना (पीजीआई 2.0) पर भी कार्य शुरू हो चुका है। लगभग पांच हजार करोड़ रुपये की इस परियोजना में 600 बेड और 11 विभाग होंगे। अगले पांच वर्षों में इसे पूरा करने का लक्ष्य है तथा इसमें पेपरलेस व्यवस्था लागू की जाएगी। समारोह में महानिदेशक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य डॉ. नेहा शर्मा, डीन प्रो. शालीन कुमार, रजिस्ट्रार कर्नल वरुण बाजपेयी सहित कई गणमान्य उपस्थित रहे।

सम्मानित शिक्षक, शोधकर्ता, चिकित्सक एवं विद्यार्थी

पुरस्कार

सम्मानित

गवर्नर मेडल फॉर बेस्ट टीचर

प्रो. नारायण प्रसाद (नेफ्रोलॉजी)

प्रो. एस.आर. नायक अवॉर्ड (आउटस्टैंडिंग रिसर्च इन्वेस्टिगेटर)

डॉ. चिन्मय साहू (माइक्रोबायोलॉजी)

प्रो. एस.आर. नायक अवॉर्ड (आउटस्टैंडिंग रिसर्च इन्वेस्टिगेटर)

डॉ. आलोक कुमार (मॉलिक्यूलर मेडिसिन एवं बायोटेक्नोलॉजी)

प्रो. एस.एस. अग्रवाल अवॉर्ड (रिसर्च एक्सीलेंस)

डॉ. अभिषेक शुक्ला (न्यूरोसर्जरी)

प्रो. एस.एस. अग्रवाल अवॉर्ड (रिसर्च एक्सीलेंस)

खुशी शुक्ला (पीएचडी शोधार्थी, मॉलिक्यूलर मेडिसिन एवं बायोटेक्नोलॉजी)

प्रो. आर.के. शर्मा अवॉर्ड (सर्वश्रेष्ठ डीएम)

डॉ. आदर्शा (मेडिकल जेनेटिक्स)

प्रो. आर.के. शर्मा अवॉर्ड (सर्वश्रेष्ठ एमसीएच)

डॉ. सम्प्रति दरिया (एंडोक्राइन सर्जरी)

पद्मश्री डॉ. एस.एस. सरकार गोल्ड मेडल (एमडी रेडियोडायग्नोसिस)

डॉ. महीम नाज़

सर्वाधिक इंट्राम्यूरल अनुदान

डॉ. एबल लॉरेंस (क्लीनिकल इम्यूनोलॉजी एवं रूमेटोलॉजी)

सर्वाधिक एक्स्ट्राम्यूरल ग्रांट

डॉ. सी.पी. चतुर्वेदी (हीमैटोलॉजी, एससीआरसी)

सर्वाधिक पेटेंट

डॉ. तन्मय घटक (इमरजेंसी मेडिसिन)

करुणाश्री गोल्ड मेडल (एमएससी नर्सिंग)

ललिता यादव

आयुष्य ज्योति गोल्ड मेडल (बीएससी नर्सिंग)

अमृता





एवार्ड पाने वाले पांच लोगों से उनके शोध पर बात चीत

  

देश को दिया  94 गुर्दा रोग विशेषज्ञ - प्रो. नारायण प्रसाद- गवर्नर  मेडल फार बेस्ट टीचर


नेफ्रोलाजी विभाग के प्रमुख  प्रो. नारायण प्रसाद को चिकित्सा शिक्षा, शोध और किडनी प्रत्यारोपण के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान दिया।  38 वर्षों के चिकित्सा अनुभव है। 370 शोध प्रकाशन प्रकाशित हो चुके हैं।  94 डीएम (गुर्दा रोग विशेषज्ञ) और 5 पीएचडी शोधार्थियों ने अपनी पढ़ाई पूरी की है।  उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों के 15 से अधिक संस्थानों में किडनी प्रत्यारोपण कार्यक्रम शुरू कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश के उन सरकारी संस्थानों में भी किडनी प्रत्यारोपण सेवाएं शुरू कराने की योजना पर काम कर रहे हैं, जहां अभी यह सुविधा उपलब्ध नहीं है।




तेज़ ब्लड टेस्ट से गंभीर इन्फेक्शन में जान बचाने की उम्मीद  प्रो. चिन्मय साहू- प्रो.एसआर नायक एवार्ड फार आउट स्टैंडिग रिसर्च


गंभीर रक्त संक्रमण (सेप्सिस) के मरीजों में सही एंटीबायोटिक शुरू करने में होने वाली देरी अब काफी कम हो सकती है। एसजीपीजीआई, लखनऊ के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के शोधकर्ताओं ने 30 मिनट में ब्लड सैंपल से बैक्टीरिया अलग करने की नई तकनीक विकसित की है। इसके बाद माल्डी टॉप मशीन से जर्म की पहचान कर डॉक्टरों को करीब 24 घंटे पहले रिपोर्ट मिल जाती है। 160 नमूनों पर परीक्षण में बैक्टीरिया की पहचान 96% और एंटीबायोटिक परिणामों में 99.8% सटीकता मिली। यह तकनीक प्रति सैंपल लगभग ₹46 की बचत भी करती है, जिससे मरीजों को समय पर सही इलाज मिलने और एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस कम करने में मदद मिल सकती है। 175 से अधिक शोध पत्र है। 



 ट्यूमर हटाने के बाद रक्त वाहिकाओं की सेहत में सुधार: डॉ. संप्रति डारिया- प्रो. आरके शर्मा  बेस्ट एमसीएच स्टूडेंट

 

हार्मोन बनाने वाले दुर्लभ ट्यूमर फिओक्रोमोसाइटोमा और पैरागैंग्लियोमा पर डॉ. संप्रति डारिया के शोध में पहली बार फ्लो-मीडिएटेड डाइलेशन (एफएमडी) जैसी आधुनिक, बिना ऑपरेशन वाली जांच तकनीक से रक्त वाहिकाओं की कार्यक्षमता का आकलन किया गया। ट्यूमर हटाने के बाद रक्त वाहिकाओं की कार्यक्षमता में उल्लेखनीय सुधार हुआ, जिससे भविष्य में हृदय संबंधी जटिलताओं का खतरा कम हो सकता है।यह शोध मई 2025 में अमेरिका के मिलवॉकी (विस्कॉन्सिन) में आयोजित अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ एंडोक्राइन सर्जन्स सम्मेलन में पोडियम प्रस्तुति के रूप में प्रस्तुत किया। ऐसा करने वाली वह पहली भारतीय छात्रा हैं। उन्हें इस प्रस्तुति के लिए भारत सरकार की एएनआरएफ और आईसीएमआर की ओर से ट्रैवल ग्रांट भी मिला


मरीजों की जान बचाने और इलाज को अधिक सुरक्षित बनाने में मदद करेंगे दो नए पेटेंट- प्रो. तन्मय घटक आधिकतम पेटेंट एवार्ड


दो नए चिकित्सा उपकरणों के डिजाइन पर पेटेंट मिला हैं। इन उपकरणों से इलाज के दौरान मरीजों की सुरक्षा बढ़ेगी और जानलेवा जटिलताओं का खतरा कम होगा। पहला उपकरण 'गाइडवायर ट्रैप' है, जो गाइडवायर के गलती से शरीर के अंदर पूरी तरह चले जाने जैसी दुर्लभ लेकिन गंभीर दुर्घटना को रोकता है। दूसरा 'मार्क्ड इंट्रोड्यूसर नीडल' है, जिस पर बने विशेष निशान डॉक्टरों को सुई सही गहराई तक डालने में मदद करते हैं। इससे आसपास की नसों और अन्य अंगों को नुकसान पहुंचने का जोखिम घटता है। 



हिम्मत नहीं हारी मिली सफलता- अमृता  'आयुषा ज्योति गोल्ड मेडल'


अंबेडकर नगर की अमृता ने नीट में प्रवेश के लिए  प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिलने पर  हार मानने के बजाय पीजीआई के कॉलेज ऑफ नर्सिंग में बीएससी नर्सिंग के प्रवेश परीक्षा दिया । सफलता मली  अपनी मेहनत और उत्कृष्ट शैक्षणिक प्रदर्शन के दम पर अब उन्हें शैक्षणिक सत्र 2022–2026 के लिए प्रतिष्ठित 'आयुषा ज्योति गोल्ड मेडल' से सम्मानित किया गया। अमृता ने उत्कृष्ट अंक हासिल किया है।




कैंसर मरीजों के तीमारदारों को मिलेगा रोज़ाना नि:शुल्क पौष्टिक नाश्ता

 


कैंसर मरीजों के तीमारदारों को मिलेगा रोज़ाना नि:शुल्क पौष्टिक नाश्ता

कल्याण सिंह कैंसर संस्थान और श्रीमद कमल कल्याण फाउंडेशन के बीच एमओयू


कैंसर मरीजों के तीमारदारों को बेहतर सामाजिक सहयोग उपलब्ध कराने की दिशा में कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान (केएसएसएससीआई), लखनऊ ने मंगलवार को श्रीमद कमल कल्याण फाउंडेशन, लखनऊ के साथ एक महत्वपूर्ण समझौता (एमओयू) किया। इसके तहत फाउंडेशन संस्थान में भर्ती कैंसर मरीजों के तीमारदारों को प्रतिदिन नि:शुल्क ताज़ा, घर जैसा पौष्टिक नाश्ता उपलब्ध कराएगा। साथ ही विशेष अवसरों पर शाम का भोजन भी नि:शुल्क वितरित किया जाएगा।

एमओयू पर संस्थान के निदेशक प्रो. एम.एल.बी. भट्ट और श्रीमद कमल कल्याण फाउंडेशन के अध्यक्ष एवं संस्थापक ट्रस्टी राजेश गुप्ता ने हस्ताक्षर किए और दस्तावेजों का आदान-प्रदान किया।

प्रो. एम.एल.बी. भट्ट ने कहा कि संवेदनशील स्वास्थ्य सेवा केवल मरीज के इलाज तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसके साथ रहने वाले तीमारदारों की देखभाल भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक अस्पताल में रहने वाले परिजनों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। उन्होंने इस मानवीय पहल के लिए श्रीमद कमल कल्याण फाउंडेशन की सराहना करते हुए इसे समाजसेवा का उत्कृष्ट उदाहरण बताया।

फाउंडेशन के प्रतिनिधियों ने कहा कि संस्था समाजसेवा के प्रति प्रतिबद्ध है और भविष्य में भी कैंसर मरीजों तथा उनके तीमारदारों के जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाने के लिए ऐसे जनकल्याणकारी कार्यक्रमों को निरंतर जारी रखेगी।

एमओयू समारोह में संस्थान के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रो. विजेंद्र कुमार, डीन डॉ. प्रमोद कुमार गुप्ता, चिकित्सा अधीक्षक डॉ. वरुण विजय, जनसंपर्क प्रभारी डॉ. आयुष लोहिया, बाल कैंसर विभागाध्यक्ष डॉ. गीतिका पंत तथा श्रीमद कमल कल्याण फाउंडेशन के सचिव आर.के. श्रीवास्तव सहित संस्थान और फाउंडेशन के अन्य पदाधिकारी एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

रविवार, 12 जुलाई 2026

एसजीपीजीआई के 30वें दीक्षांत में डॉ. नारायण प्रसाद को मिलेगा पहला 'गवर्नर मेडल





 एसजीपीजीआई के 30वें दीक्षांत में डॉ. नारायण प्रसाद को मिलेगा पहला 'गवर्नर मेडल'

279 विद्यार्थियों को मिलेंगी उपाधियां, 13 उत्कृष्ट शिक्षक, शोधकर्ता, चिकित्सक और विद्यार्थी होंगे सम्मानित




संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एसजीपीजीआई) के 30वें दीक्षांत समारोह में पहली बार नेफ्रोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. नारायण प्रसाद को बेस्ट फैकल्टी के लिए गवर्नर का गोल्ड मेडल (राज्यपाल स्वर्ण पदक) से सम्मानित किया जाएगा। 14 जुलाई को संस्थान के श्रुति प्रेक्षागृह में आयोजित समारोह में कुल 279 विद्यार्थियों को उपाधियां प्रदान की जाएंगी। जबकि 13 उत्कृष्ट शिक्षक, शोधकर्ता, चिकित्सक और विद्यार्थियों को विभिन्न प्रतिष्ठित पुरस्कारों और स्वर्ण पदकों से सम्मानित किया जाएगा। समारोह की अध्यक्षता राज्यपाल आनंदीबेन पटेल करेंगी। जबकि केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जेपी नड्डा मुख्य अतिथि के रूप में दीक्षांत संबोधन देंगे। उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक और राज्य मंत्री मयंकेश्वर शरण सिंह विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगे।

संस्थान के डीन डॉ. शालीन कुमार ने बताया कि समारोह में डीएम, एमसीएच, एमडी, पीडीसीसी तथा बीएससी नर्सिंग के प्रशिक्षु डॉक्टरों और नर्सिंग विद्यार्थियों को 279 उपाधियां प्रदान की जाएंगी। संस्थान के निदेशक डॉ. आर.के. धीमन वार्षिक प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे। राज्यपाल विद्यार्थियों की उपाधियों को डिजीलॉकर प्लेटफॉर्म पर वर्चुअली अपलोड भी करेंगी।

रजिस्ट्रार कर्नल वरुण बाजपेई के अनुसार समारोह में अनुसंधान, नवाचार, शिक्षण और शैक्षणिक उत्कृष्टता के लिए विशेष पुरस्कार दिए जाएंगे। इसके अलावा सर्वाधिक इंट्राम्यूरल अनुदान, सर्वाधिक एक्स्ट्राम्यूरल अनुसंधान वित्तपोषण तथा सर्वाधिक पेटेंट दाखिल करने वाले संकाय सदस्यों को भी सम्मानित किया जाएगा। सामाजिक सरोकारों के तहत  एचपीवी टीकाकरण प्रमाण-पत्र, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को किट तथा स्कूली बच्चों को पुस्तकें वितरित की जाएंगी। संस्थान द्वारा गोद लिए गए गांवों के बच्चों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी समारोह का आकर्षण होंगी। कार्यक्रम का समापन डीन डॉ. शालीन कुमार के धन्यवाद ज्ञापन के साथ होगा।


यह होगे सम्मानित

गवर्नर मेडल फॉर बेस्ट टीचर

प्रो. नारायण प्रसाद (नेफ्रोलॉजी)

प्रो. एस.आर. नायक अवॉर्ड (आउटस्टैंडिंग रिसर्च इन्वेस्टिगेटर)

प्रो. चिन्मय साहू (माइक्रोबायोलॉजी)

प्रो. एस.आर. नायक अवॉर्ड (आउटस्टैंडिंग रिसर्च इन्वेस्टिगेटर)

डा. आलोक कुमार (मॉलिक्यूलर मेडिसिन एवं बायोटेक्नोलॉजी)

प्रो. एस.एस. अग्रवाल अवॉर्ड (रिसर्च एक्सीलेंस)

डा. अभिषेक शुक्ला (न्यूरोसर्जरी)

प्रो. एस.एस. अग्रवाल अवॉर्ड (रिसर्च एक्सीलेंस)

खुशी शुक्ला (पीएचडी शोधार्थी, मॉलिक्यूलर मेडिसिन एवं बायोटेक्नोलॉजी)

प्रो. आर.के. शर्मा अवॉर्ड (सर्वश्रेष्ठ डीएम)

डा. आदर्शा (मेडिकल जेनेटिक्स)

प्रो. आर.के. शर्मा अवॉर्ड (सर्वश्रेष्ठ एमसीएच)

डा. सम्प्रति दरिया (एंडोक्राइन सर्जरी)

पद्मश्री डॉ. एस.एस. सरकार गोल्ड मेडल (एमडी रेडियोडायग्नोसिस)

डा. महीम नाज़ (रेडियोडायग्नोसिस)

सर्वाधिक इंट्राम्यूरल अनुदान (विभाग)

प्रो. एबल लॉरेंस (क्लीनिकल इम्यूनोलॉजी एवं रूमेटोलॉजी)

सर्वाधिक एक्स्ट्राम्यूरल ग्रांट

डा. सी.पी. चतुर्वेदी (हीमैटोलॉजी, एससीआरसी)

सर्वाधिक पेटेंट

डा. तन्मय घटक (इमरजेंसी मेडिसिन)

करुणाश्री गोल्ड मेडल (एमएससी नर्सिंग)

ललिता यादव

आयुष्य ज्योति गोल्ड मेडल (बीएससी नर्सिंग)

अमृता

मंगलवार, 7 जुलाई 2026

नाक से बहने वाले ‘दिमागी पानी’ की पहचान में नई तकनीक बनी वरदान रीढ़

 

नाक से बहने वाले ‘दिमागी पानी’ की पहचान में नई तकनीक बनी वरदान

रीढ़ के रास्ते रंग डालने की जरूरत खत्म, नाक में लगाया गया विशेष रंग बना सहारा; 40 मरीजों में मिली सफलता



कुमार संजय


लखनऊ। पिछले छह महीनों से 27 वर्षीय एक महिला की दाईं नाक से लगातार साफ पानी बह रहा था। इसके साथ पूरे सिर में दर्द भी बना रहता था। कई जांचों के बावजूद डॉक्टर यह पता नहीं लगा पा रहे थे कि यह पानी आखिर कहां से निकल रहा है। आधुनिक जांचों में भी रिसाव की सही जगह सामने नहीं आई। आखिरकार संजय गांधी पीजीआई के विशेषज्ञों ने एक नई तकनीक का सहारा लिया। नाक के भीतर विशेष रंग लगाने के कुछ ही मिनट बाद रिसाव वाली जगह स्पष्ट दिखाई देने लगी और सफल सर्जरी कर समस्या का स्थायी समाधान कर दिया गया। यह मामला अब ऐसी नई तकनीक की सफलता का उदाहरण बन गया है, जो भविष्य में हजारों मरीजों के इलाज को आसान बना सकती है।

नाक से लगातार पानी बहना अक्सर लोग सामान्य एलर्जी, जुकाम या साइनस की समस्या समझ लेते हैं, लेकिन कई बार यह मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी की सुरक्षा करने वाले द्रव के रिसाव का संकेत होता है। इस गंभीर समस्या की पहचान और उपचार में संजय गांधी पीजीआई के विशेषज्ञों द्वारा स्थापित नई तकनीक बेहद कारगर साबित हो रही है।

मुख्य शोधकर्ता एवं न्यूरो सर्जरी विभाग के  न्यूरोओटोलॉजिस्ट प्रो. रवि संकर मनोगरन के अनुसार महिला मरीज का कोई दुर्घटना या पूर्व सर्जरी का इतिहास नहीं था। जांचों से यह तो स्पष्ट हो गया था कि नाक से निकलने वाला तरल दिमागी पानी है, लेकिन रिसाव का स्रोत पता नहीं चल पा रहा था। दूरबीन आधारित सर्जरी के दौरान नाक के भीतर विशेष रंग लगाने पर रिसाव का स्थान स्पष्ट दिखाई देने लगा। इसके बाद चिकित्सकों ने उसी समय दोष को बंद कर दिया। सर्जरी के छह महीने बाद तक मरीज में दोबारा कोई रिसाव नहीं पाया गया।

प्रो. मनोगरन ने बताया कि इस सफलता के आधार पर किए गए अध्ययन में यह सामने आया है कि नाक के भीतर लगाए जाने वाले विशेष रंग की मदद से उन जटिल मामलों की भी पहचान की जा सकती है, जिन्हें आधुनिक रेडियोलॉजिकल जांचें भी नहीं पकड़ पातीं। यह शोध प्रतिष्ठित चिकित्सा पत्रिका न्यूरोलॉजी इंडिया ने स्वीकार किया है। 


क्या होता है दिमागी पानी का रिसाव?

मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी एक विशेष द्रव से घिरे रहते हैं, जिसे आम बोलचाल में दिमागी पानी कहा जाता है। यह द्रव मस्तिष्क को झटकों से बचाने, पोषण पहुंचाने और तंत्रिका तंत्र के सामान्य कार्यों को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब खोपड़ी के आधार, नाक की छत या आसपास की झिल्लियों में किसी कारण से छोटा सा छेद हो जाता है तो यह द्रव नाक के रास्ते बाहर आने लगता है।

यह समस्या सिर में गंभीर चोट लगने, सड़क दुर्घटना, पूर्व सर्जरी, जन्मजात विकृति या कुछ मामलों में बिना किसी स्पष्ट कारण के भी हो सकती है। ऐसे मरीजों में एक तरफ की नाक से लगातार साफ पानी बहना सबसे प्रमुख लक्षण माना जाता है। कई बार मरीज वर्षों तक इसे सामान्य जुकाम समझकर इलाज कराते रहते हैं और वास्तविक बीमारी का पता काफी देर से चल पाता है।

क्या है नई तकनीक?

प्रो. रवि संकर मनोगरन के अनुसार अब तक दिमागी पानी के रिसाव की सटीक जगह खोजने के लिए विशेष रंग को रीढ़ की हड्डी के रास्ते शरीर के भीतर डाला जाता था। इसके बाद दूरबीन आधारित सर्जरी के दौरान विशेष फिल्टर की सहायता से रिसाव की पहचान की जाती थी। यह तरीका प्रभावी तो था, लेकिन इससे तंत्रिका तंत्र पर दुष्प्रभाव का खतरा बना रहता था। साथ ही यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत जटिल भी थी।

नई तकनीक में रंग को शरीर के भीतर डालने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसे सीधे नाक के अंदर लगाया जाता है। जब यह रंग दिमागी पानी के संपर्क में आता है तो रिसाव वाली जगह स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगती है। इससे डॉक्टरों को दोष वाली जगह तुरंत पहचानने और उसका उपचार करने में मदद मिलती है। इस पद्धति से प्रक्रिया अधिक सुरक्षित, सरल और मरीज के लिए कम जोखिम वाली बन जाती है।

40 मरीजों में सफल रहा प्रयोग

प्रो. मनोगरन ने बताया कि अब तक इस तकनीक का उपयोग 40 मरीजों में किया जा चुका है। इन सभी मामलों में नाक से निकल रहे तरल की प्रकृति और उसके स्रोत का पता लगाने में यह तकनीक बेहद उपयोगी साबित हुई। कई मरीज ऐसे थे जिनमें सीटी स्कैन, एमआरआई और अन्य उन्नत जांचों के बाद भी रिसाव का सटीक स्थान स्पष्ट नहीं हो पा रहा था।

नई तकनीक की सहायता से डॉक्टरों ने न केवल यह पुष्टि की कि नाक से निकलने वाला तरल वास्तव में दिमागी पानी है, बल्कि यह भी पता लगाया कि वह किस स्थान से बाहर आ रहा है। इससे सर्जरी अधिक सटीक हुई और उपचार की सफलता दर में भी सुधार देखने को मिला। विशेषज्ञों का मानना है कि जटिल मामलों में यह तकनीक उपचार की योजना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

क्यों खतरनाक है दिमागी पानी का रिसाव?

दिमागी पानी मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी को सुरक्षा प्रदान करता है। खोपड़ी के आधार या नाक के आसपास की हड्डियों और झिल्लियों में छेद हो जाने पर यह तरल बाहर निकलने लगता है। इससे शरीर और मस्तिष्क के बीच मौजूद प्राकृतिक सुरक्षा बाधा कमजोर हो जाती है।

यदि समय पर इलाज न कराया जाए तो मरीज को मस्तिष्क की झिल्लियों में संक्रमण जैसी गंभीर और जानलेवा जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है। संक्रमण बार-बार होने लगे तो मरीज की स्थिति और गंभीर हो सकती है। कई मामलों में लंबे समय तक सिरदर्द, चक्कर, कमजोरी और जीवन की गुणवत्ता में गिरावट भी देखी जाती है।

विशेषज्ञों के अनुसार एक तरफ की नाक से लगातार साफ पानी बहना, नमकीन स्वाद महसूस होना, बार-बार सिरदर्द होना, झुकने पर पानी का बहाव बढ़ जाना और बार-बार संक्रमण होना इसके प्रमुख संकेत हैं। ऐसे लक्षण दिखाई देने पर तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

दूरबीन आधारित सर्जरी बनी सबसे सफल उपचार

प्रो. रवि संकर मनोगरन के अनुसार आज नाक के रास्ते की जाने वाली दूरबीन आधारित सर्जरी इस बीमारी के इलाज का सबसे प्रभावी और सुरक्षित तरीका बन चुकी है। इसमें बाहरी चीरा लगाने की जरूरत नहीं पड़ती और नाक के रास्ते ही रिसाव वाली जगह तक पहुंचकर उसे बंद कर दिया जाता है।

इस प्रक्रिया में आधुनिक जैविक पदार्थों और शरीर के ऊतकों का उपयोग कर दोष को बंद किया जाता है। सर्जरी के बाद मरीज को अपेक्षाकृत कम दर्द होता है, अस्पताल में कम समय रुकना पड़ता है और सामान्य जीवन में जल्दी वापसी संभव हो जाती है। यही कारण है कि दुनिया भर में यह तकनीक तेजी से लोकप्रिय हो रही है।

भविष्य के लिए उम्मीद

विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक दिमागी पानी के रिसाव की पहचान और उपचार को अधिक सुरक्षित, सटीक तथा किफायती बना सकती है। खासतौर पर उन मामलों में, जहां सीटी स्कैन या एमआरआई से रिसाव की जगह स्पष्ट नहीं हो पाती, यह तकनीक डॉक्टरों के लिए बड़ी मदद साबित हो सकती है।

प्रो. मनोगरन का कहना है कि शुरुआती परिणाम काफी उत्साहजनक हैं। यदि बड़े स्तर पर किए जाने वाले अध्ययनों में भी इसी प्रकार के परिणाम सामने आते हैं, तो आने वाले समय में यह तकनीक दिमागी पानी के रिसाव के इलाज की मानक प्रक्रिया का हिस्सा बन सकती है। इससे मरीजों को जल्दी और सटीक उपचार मिलने की संभावना बढ़ेगी तथा गंभीर जटिलताओं को भी रोका जा सकेगा।

बॉक्स : दिमागी पानी का रिसाव होने पर क्या हो सकते हैं दुष्प्रभाव?

प्रमुख लक्षण

एक नाक से लगातार साफ पानी बहना

बार-बार सिरदर्द

गले में नमकीन स्वाद महसूस होना

झुकने पर पानी का बहाव बढ़ जाना

बार-बार संक्रमण होना

गंभीर खतरे

मस्तिष्क की झिल्लियों में संक्रमण

तेज बुखार और गंभीर बीमारी

मस्तिष्क तक संक्रमण फैलने का खतरा

लंबे समय तक कमजोरी और सिरदर्द

गंभीर मामलों में जान का खतरा

थायरॉयड कैंसर का इलाज कितना सफलता होगा बता देगा स्कैन

 

थायरॉयड कैंसर का इलाज कितना  सफलता होगा बता देगा  स्कैन



 बढ़ता एचटीआर बता सकता है बीमारी के बने रहने का खतरा


कुमार संजय


 थायरॉयड कैंसर के मरीजों को रेडियोआयोडीन थेरेपी (आरआईटी) देने के बाद इलाज कितना सफल होगा, इसका अंदाजा अब एक खास स्कैन की मदद से पहले ही लगाया जा सकता है। संजय गांधी पीजीआइ  के न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग के  अध्ययन में पता चला है कि पूरे शरीर के रेडियोआयोडीन स्कैन में लीवर और जांघ के बीच रेडियोआयोडीन जमा होने का अनुपात (हिपेटिक-टू-थाई रेशियो या एचटीआर) मरीज के भविष्य के इलाज परिणामों का भरोसेमंद संकेतक बन सकता है। इससे  पहले ही पता चल सकेगा कि मरीज इलाज का कितना अच्छा परिणाम मिलेगा।


60 मरीजों पर अध्ययन


अध्ययन थायरॉयड कैंसर के 60 मरीजों को शामिल किया गया। इनमें 30 मरीज ऐसे थे जिनका कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों तक फैल चुका था, जबकि 30 मरीजों में बीमारी थायरॉयड तक सीमित थी। सभी मरीजों का रेडियोआयोडीन थेरेपी से पहले तथा छह और 12 महीने बाद स्कैन और अन्य जांचें की गईं।


क्या है एचटीआर


एचटीआर लीवर और जांघ में रेडियोआयोडीन के अवशोषण की तुलना से निकाला जाने वाला अनुपात है। देखा गया कि जिन मरीजों का 12 महीने बाद एचटीआर 2.135 से कम था, उनमें बीमारी के पूरी तरह नियंत्रित होने की संभावना अधिक थी। यह मानक इलाज की सफलता का अनुमान 90 प्रतिशत संवेदनशीलता और 82 प्रतिशत विशिष्टता के साथ लगा सका।



बढ़ता एचटीआर दे सकता है चेतावनी



शोध में यह भी सामने आया कि जिन मरीजों में फॉलो-अप के दौरान एचटीआर बढ़ता गया, उनमें रेडियोआयोडीन थेरेपी का असर अपेक्षाकृत कम रहा और बीमारी के बने रहने की आशंका अधिक थी।  एचटीआर में बदलाव मरीज की निगरानी और आगे की उपचार योजना तय करने में मदद कर सकता है।



पैपिलरी कैंसर में बेहतर परिणाम



60 मरीजों में से 46 को पैपिलरी और 14 को फॉलिकुलर थायरॉयड कैंसर था। कुल 31 मरीजों में इलाज के बाद पूर्ण प्रतिक्रिया मिली। यह सफलता विशेष रूप से पैपिलरी कैंसर वाले मरीजों में अधिक देखी गई।



शोधकर्ता

पीजीआइ के एंडोक्राइन सर्जरी विभाग के डा. प्रकाश सिंह और डा. विनीत मिश्रा, न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग के प्रो. प्रसांता के. प्रधान और डा मनीष ओरा तथा पैथोलॉजी विभाग की डा. योगिता खंडेलवाल और डा. बेला जैन शामिल रहे। शोध को अंतरराष्ट्रीय जर्नल न्यूक्लियर मेडिसिन कम्युनिकेशंस में प्रकाशित हुआ हैं।

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

एआईआरएनएफ ने भर्ती, पदोन्नति और सेवा विसंगतियां दूर करने का सौंपा ज्ञापन

 

समान वेतन-भत्ते और बेहतर कार्यस्थल सुविधाओं की मांग लेकर राज्यपाल से मिले नर्सिंग अधिकारी


 एआईआरएनएफ ने भर्ती, पदोन्नति और सेवा विसंगतियां दूर करने का सौंपा ज्ञापन


सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में कार्यरत नर्सिंग अधिकारियों ने समान कार्य के लिए समान वेतन और भत्तों के साथ सुरक्षित एवं बेहतर कार्यस्थल की मांग उठाई है। ऑल इंडिया रजिस्टर्ड नर्सेज फेडरेशन  के प्रदेश अध्यक्ष अनुराग वर्मा 'पटेल' के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने शुक्रवार को राज्यपाल आनंदीबेन पटेल से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा।

प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि नर्सिंग अधिकारी सीमित संसाधनों और बढ़ते कार्यभार के बीच लगातार स्वास्थ्य सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन वेतन, भत्तों, पदोन्नति और सेवा शर्तों से जुड़ी कई समस्याएं अब भी लंबित हैं। ज्ञापन में चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, चिकित्सा शिक्षा विभाग और स्वशासी मेडिकल कॉलेजों में कार्यरत नर्सिंग अधिकारियों की वेतन विसंगतियां दूर कर समान कार्य के लिए समान वेतन लागू करने की मांग की गई। साथ ही एसजीपीजीआई, केजीएमयू और लोहिया संस्थान की तर्ज पर नर्सिंग, ड्रेस, परिवहन और मकान किराया भत्ता देने की मांग भी रखी गई।

फेडरेशन ने  कार्यस्थल पर सुरक्षा, समयबद्ध पदोन्नति और सम्मानजनक कार्य वातावरण सुनिश्चित करने की मांग की। साथ ही आउटसोर्स और संविदा नर्सिंग कर्मियों के लिए समान कार्य के बदले समान वेतन की भी मांग उठाई। राज्यपाल ने मांगों पर सकारात्मक विचार का आश्वासन दिया।

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

गूंजे किलकारी-सलामत रहे महतारी पीजीआई के एमआरएच विभाग की सृजन कर्ता

 

गूंजे किलकारी-सलामत रहे महतारी पीजीआई के एमअारएच विभाग की सृजन कर्ता


प्रो. नीता सिंह प्रो.मंदाकिनी व प्रो. संगीता यादव


सैकड़ों माताओं की सूनी गोद भरने के लिए संजय गाधी पीजीआइ की एमआरएच विभाग ने ऐसी तमाम तकनीक स्थापित की, जिससे ऐसे शिशुओं को धरती पर कदम रखने का मौका मिला जो शायद ही दुनिया देख पाते। इस विभाग का एक प्रसव हजारों दूसरे प्रसवों के बराबर है। तकनीक भी ऐसी जो देश के बड़े संस्थान एम्स दिल्ली, पीजीआइ चंडीगढ़ के अलावा किसी भी सरकारी अस्पताल में नहीं है।1डॉक्टर्स डे के मौके पर विभाग की मुखिया प्रो.मंदाकिनी प्रधान कहती हैं कि साल भर में दस हजार से अधिक महिलाओं की हाई रिस्क प्रिगनेंसी से जुड़ी परेशानी को हैंडल किया। इसके अलावा सोशल मीडिया से जरिए देश के दूर कोने में बैठे स्त्री रोग विशेषज्ञों के सलाह दे कर उलझन को सुलझाने की कोशिश भी कर रहे हैं। इस काम में प्रो.नीता सिंह और प्रो.संगीता यादव ने खूब मदद की। पेश है कुमार संजय की एक रिपोर्ट...................


 :-1सोशल मीडिया सलाह का हथियार 1

भिलाई की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ.संगीता कामरा का वॉट्सएप पर संदेश आया कि एक महिला के तीन बच्चों में जन्मजात गड़बड़ी अल्ट्रासाउंड परीक्षण में मिला है। इसके कारण वह गर्भ को जारी नहीं रख सकी। भ्रूण का फोटो भी अपलोड किया। संदेश को तीनों विशेषज्ञों ने पढ़ने और फोटो का अध्ययन करने के बाद संदेश दिया कि कारण पता करना होगा। इसके लिए जांच कराने के बाद ही आगे की प्लानिंग की जाए। गर्भधारण के लिए तभी सलाह दें। इन विशेषज्ञों के सोशल मीडिया से केवल भिलाई की ही नहीं जयपुर से डॉ.सविता, डॉ.अंजू बहराइच से डॉ.राजुल सिंह व देहरादून से डॉ.रीता सहित देश के कई कोनों से विशेषज्ञा जुड़ी हुई हैं, जो कि सलाह के लिए आपस में संपर्क में रहती हैं। अब पांच सौ अधिक महिलाओं में सलाह दिया गया है। कई बार विशेष इलाज के लिए लोग पीजीआइ भेजती हैं।

1मेरे घर आई नन्ही परी1

सहारनपुर के डॉ. संजीव थापर के की प}ी में रुबेला का संक्रमण गर्भावस्था के दौरान मिला, जिसमें कहा गया कि शिशु में सुनने और बोलने की परेशानी हो सकती है इसलिए गर्भ को हटाना होगा। इन विशेषज्ञों ने परीक्षण किया, जिसमें संक्रमण नहीं मिला तो गर्भ को जारी रखने का सलाह दिया। बाद में स्वस्थ शिशु ने जन्म लिया। आज संदेश दिया मेरे घर आयी एक नन्ही परी..। इसी तरह पटना की अंजू चार बार गर्भवती हुई, लेकिन हर बार उनकी गोद खाली ही रह गयी। वह आठवीं बार गर्भवती होने के तुरंत बाद पीजीआइ आयी यहां पर पता चला कि शुगर के कारण शिशु का विकास सही नहीं हो पा रहा है। इंसुलिन की सही डोज पर रखा गया। अंजू ने स्वस्थ शिशु को जन्म दिया।

1गर्भ में ही बचाई शिशु की जान1

गर्भ में शिशु को खून चढ़ाकर अब तक चार सौ से अधिक शिशुओं को दुनिया देखने का मौका इस टीम ने दिया। एक अन्य केस में विशेषज्ञों ने बताया कि वार्ड में भर्ती अर्चना का बच्चा जब 22 सप्ताह का था, जिसके थैली में पानी सूख गया। इससे शिशु की जान को खतरा पैदा हो गया। हम लोगों ने इंट्रायूट्राइन इंफ्यूजन तीन बार करके पानी की मात्र थैली में बनाया रखा, जिससे शिशु का पूरा विकास हुआ। इसी हफ्ते आपरेशन कर स्वस्थ्य शिशु का जन्म कराया। बताया कि शिशु एक थैली में रहता है जिसमें पानी एक तय मात्र में रहता है। पानी कम या अधिक होने पर शिशु के जीवन और विकास पर खतरा रहता है। हम लोगों ने निडिन के जरिए रिंगर लेक्टेट और एंटीबायोटिक का कंबीनेशन सीधे इंजेक्ट किया फिलहाल यह तकनीक देश के गिने चुने संस्थान में उपलब्ध है।


1गर्भ में ही इलाज कर बनाती हैं स्वस्थ1


बक्सर पटना निवासी मुन्नी के तीन बच्चे दुनिया में नहीं आ पाए। चौथी बार मां बनी तो यहां आयी, पता चला कि गर्भस्थ शिशु का हीमोग्लोबीन दो से कम था। तीन बार गर्भ में खून चढ़ाने के बाद अब स्वस्थ्य शिशु के जन्म की उम्मीद है। आरएच फैक्टर भिन्नता के कारण शिशु में हीमोग्लोबीन कम होने लगता है। इससे शिशु के जीवन को खतरा रहता है। हमने अब तक चार सौ से अधिक गर्भस्थ शिशु में खून चढ़ाकर जन्म कराया है। इससे बचाव के लिए एंटी डी इंजेक्शन लगवाना चाहिए। यदि ब्लड ग्रुप के आरएच फैक्टर में भिन्नता है तो 2500 रुपये के इंजेक्शन से कई परेशानी से बच सकते हैं।