बुधवार, 11 मार्च 2026

प्रदूषण और प्लास्टिक के उपयोग से खराब हो रही किडनी

 




प्रदूषण और प्लास्टिक के उपयोग से खराब हो रही किडनी

विश्व गुर्दा दिवस आज

2.40 लाख सीकेडी के मरीज हैं उत्तर प्रदेश में जो कुल जनसंख्या का दस प्रतिशत है

2.5 पीएम के जरिए रक्त में प्रवेश कर सकते हैं प्लास्टिक जो किडनी को प्रभावित करता है

सीकेडी के प्रमुख लक्षण

• पेशाब में बदलाव

• हाथ, पैर, टखने या आंखों के नीचे सूजन

• सामान्य काम करने में जल्दी थक जाना

• खुजली और रूखी त्वचा

• भूख न लगना और मुंह में अजीब स्वाद या धातु जैसा स्वाद

• सांस लेने में कठिनाई

• बिना कारण लगातार ब्लड प्रेशर बढ़ना

• पेट या पीठ दर्द

लखनऊ

प्रदूषण, प्लास्टिक का अत्यधिक उपयोग और बढ़ती गर्मी (ग्लोबल वार्मिंग) का गंभीर असर सिर्फ पर्यावरण पर ही नहीं, बल्कि हमारे स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है।

एसजीपीजीआई में नेफ्रोलॉजी विभाग के अध्यक्ष प्रो. डॉ. नारायण प्रसाद के अनुसार, हवा में मौजूद सूक्ष्म कण, प्लास्टिक के माइक्रोपार्टिकल्स और बढ़ती गर्मी किडनी की कार्यक्षमता को धीरे-धीरे कमजोर कर सकते हैं।

दरअसल, हवा में मौजूद सूक्ष्म कण जैसे पीएम 2.5 फेफड़ों के जरिए रक्त में प्रवेश कर सकते हैं और किडनी तक पहुंच जाते हैं, जिससे किडनी की फिल्टर करने की क्षमता कम हो सकती है और क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) का खतरा बढ़ जाता है।

उत्तर प्रदेश में करीब दो करोड़ 40 लाख सीकेडी के मरीज हैं, जो कुल जनसंख्या का लगभग 10 प्रतिशत है।

प्रो. प्रसाद का कहना है कि वर्तमान में दुनिया भर में प्लास्टिक का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है। जब प्लास्टिक टूटता है तो माइक्रोप्लास्टिक व नैनोप्लास्टिक बनते हैं, जो भोजन, पानी और हवा के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। यह बात कई शोध में साबित हो चुकी है कि अधिक मात्रा में नैनोप्लास्टिक किडनी कोशिकाओं के आकार, कार्य और जीवित रहने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।

लंबे समय तक माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क से किडनी की संरचना और फिल्टरिंग क्षमता में असामान्य बदलाव हो सकते हैं। इसके अलावा अत्यधिक गर्मी में काम करने वाले लोगों में डिहाइड्रेशन और हीट-स्ट्रेस बढ़ जाता है। पानी की कमी से किडनी पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और लंबे समय में किडनी रोग का जोखिम बढ़ सकता है।

पिछले पांच वर्षों में किसानों एवं मजदूरों में क्रॉनिक किडनी डिजीज के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है।

एक अध्ययन में कैडमियम, आर्सेनिक और मरकरी जैसे विषैले धातुओं को किडनी रोग से जुड़ा पाया गया। ये तत्व अक्सर दूषित पानी, औद्योगिक कचरे और कृषि रसायनों के माध्यम से शरीर में पहुंचते हैं।

बताया कि विश्व गुर्दा दिवस का इस वर्ष का विषय जलवायु परिवर्तन के गुर्दों की बीमारियों पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में जागरूकता फैलाना है।

डायबिटीज व हाई ब्लड प्रेशर भी सीकेडी के लिए जिम्मेदार

प्रो. नारायण प्रसाद ने बताया कि मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा व डिसलिपिडेमिया भी सीकेडी के खतरे को बढ़ाते हैं। इसकी वजह से पेशाब में एल्ब्यूमिन के रिसाव होता है और धीरे-धीरे ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट में गिरावट आती है, जिससे गुर्दे की विफलता बढ़ जाती है।

हालांकि समय पर बीमारी की पहचान और सही इलाज से मरीज पूरी तरह ठीक भी हो सकता है।

उन्होंने कहा, क्रोनिक किडनी रोग को धीमा करने और रोकने के लिए प्रतिदिन 500 से 700 कैलोरी तक प्रतिबंध के साथ वजन कम करना, 150 मिनट का एरोबिक व्यायाम, रोजाना 0.8 ग्राम प्रति किलोग्राम प्रोटीन का सेवन, और हर दिन पांच ग्राम से कम नमक का सेवन जरूरी है।

 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें