मंगलवार, 24 मार्च 2026

बारहवीं का रिजल्ट निकलते ही यूपी और बिहार के लाखों बच्चों का दाना-पानी

  




बारहवीं का रिजल्ट निकलते ही यूपी  और बिहार के लाखों बच्चों का दाना-पानी अपने गांव-समाज से उठ जायेगा



जनरली भारत के अन्य राज्यों में बेटियां पराइ धन कही जाती है, उन्हें ब्याह के बाद अपना घर जो छोड़ना पड़ता है। बिहार में बेटियों के साथ साथ बेटे भी पराया धन ही होते हैं, 18 वर्ष होते होते बारहवीं के बाद अधिकांशतया बेटों को भी यूपी बिहार त्यागना ही पड़ता है। जिसको इंजीनियरिंग, साइंस आदि पढ़ना होता है वो जाते हैं बैंगलोर, जयपुर, भोपाल, नोयडा, पंजाब, भुवनेश्वर। जिन्हें पढ़ना होता है कॉमर्स वो जाते हैं लक्ष्मीनगर, कोलकाता, मुंबई। जो कुछ बच जाते हैं वो बिहार के किसी विश्वविद्यालय में नाम लिखवा कर निकल जाते हैं दिल्ली के मुखर्जीनगर सहित अन्य इलाकों में। वहां पहले तैयारी करते हैं UPSC, BPSC, SSC का और फिर बाद में आरएस अग्रवाल-प्रतियोगिता दर्पण घाँस के बैंक-रेलवे क्लर्क बनने की कोशिश में जवानी बहा देने को मजबूर हो जाते हैं। जो कुछ गिनती के सफ़ल होते हैं, कोचिंग छपाती है उनका इंटरव्यू और लगाती है पोस्टर अपने प्रचार के लिए। लेकिन अधिकतम जो रह जाते हैं असफल उन्हें दिल्ली में ही या किसी अन्य शहर जाना पड़ता है मजदूरी या किसी बेकार नौकरी के लिए। 


बारहवीं के बाद जो युवा यूपी बिहार छोड़ते हैं, कोई नहीं लौट पाता, कोई नहीं आ पाता वापस बिहार। पहले दोस्त छूटते हैं, फिर संबंध, रिश्तेदारों से अनावश्यक दूरी हो ही जाती है, छूट जाता है अपना पर्व-त्यौहार और छूट जाता है धीरे धीरे गांव की शादी और मरनी-हरनी भी। शुरू में आते हैं आम के मौसम में या छठ-दुर्गापूजा पे। लेकिन फिर नौकरी के कुछ सालों के बाद जब नांगलोई, संगम विहार, बदरपुर, कांदीवली, विरार आदि में कुछ गज़ जमीन खरीद के माचिस सा घर बना लेते हैं तो फिर त्योहारों में भी आना छूट जाता है यूपी बिहार। अपनी संस्कृति छूट जाती है, छूट जाती है परंपराएं। अपने घर में भी मैथिली, भोजपुरी, मगही के जगह भाषा हिंदी ही हो जाती है। बच्चे बोलने लगते हैं "मेरे को, तेरे को..." वाली भाषा और बिहार को देखने लगते हैं बैकवर्ड की नजर से। धीरे धीरे लोग छुपाने लगते हैं अपनी पहचान और बताने लगते हैं खुद को दिल्ली का, मुंबई का। मां-बाप जो छूट गए थे गांव में, बुढ़ापे में जब उनसे अब काम नहीं हो पाता तो या तो वो छूट जाते हैं राम भरोसे या मन मार के आ जाते हैं वो भी अपना गांव छोड़के बुढ़ापे में बेटे-पुतोहू के पास। अब तो होने लगा है बुजुर्गों का श्राद्ध और कर्म भी दिल्ली, मुंबई में ही, क्योंकि गांव से अधिक तादात तो दिल्ली, मुंबई में ही हैं। 


बारहवीं के परीक्षा पास किए सभी छात्रों को बधाई, शुभकामनाएं। साथ ही गुड बाय, हैप्पी जर्नी। अपना प्रदेश छूटेगा तुम्हारा अभी, शुरू में थोड़ा दर्द होगा, बुरा फील होगा, याद आएगा गांव बार-बार, कुछ दिन तड़पोगे लौट आने को, भगवान से मनाओगे, लेकिन फिर धीरे-धीरे तुम्हारी भावनाएं मरने लगेंगी, धीरे-धीरे शायद फर्क पड़ना बंद हो जाएगा। तुम भी रम जाओगे दुनिया के थपेड़े में...ईश्वर तुम्हें सुखी रखें, कहीं भी रहो, सफल करें... कत्तऊ रहे नंदकेर बालक, गोपीन्हनाथ कहैहौं


साभार फेस बुक पुनीत जी

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