एफएसएच हार्मोन को रोककर हड्डियां मजबूत करने की नई उम्मीद,
हड्डियों की कमजोरी (ऑस्टियोपोरोसिस) के इलाज के लिए वैज्ञानिकों ने एक नई संभावित रणनीति की ओर संकेत किया है। विशेषज्ञों के अनुसार शरीर में बनने वाले फॉलिकल स्टिम्युलेटिंग हार्मोन (एफएसएच) को नियंत्रित या अवरुद्ध करके हड्डियों की घनता बढ़ाई जा सकती है। शोध से यह भी संकेत मिले हैं कि इससे शरीर की अतिरिक्त चर्बी कम करने और अल्ज़ाइमर जैसे तंत्रिका अपक्षयी रोगों से सुरक्षा में भी मदद मिल सकती है।
यह जानकारी लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के मेडिसिन विभाग द्वारा आयोजित भाटिया–मिश्रा स्मृति व्याख्यान में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चिकित्सक-वैज्ञानिक डॉ. मोने ज़ैदी ने दी। उन्होंने बताया कि अब तक एफएसएच हार्मोन को मुख्य रूप से प्रजनन प्रणाली से जुड़ा माना जाता था, लेकिन हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि यह हड्डियों के निर्माण और क्षय की प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है।
डॉ. ज़ैदी के अनुसार एफएसएच ऑस्टियोक्लास्ट नामक कोशिकाओं को सक्रिय कर सकता है, जो हड्डियों को तोड़ने का कार्य करती हैं। यदि इस हार्मोन की क्रिया को रोका जाए तो हड्डियों के टूटने की प्रक्रिया कम हो सकती है और अस्थि द्रव्यमान बढ़ सकता है।
उन्होंने बताया कि प्रयोगात्मक अध्ययनों में एफएसएच को अवरुद्ध करने से हड्डियों की मजबूती बढ़ने, शरीर की वसा कम होने और मस्तिष्क की कोशिकाओं को सुरक्षा मिलने के संकेत मिले हैं। वैज्ञानिकों ने एफएसएच को रोकने वाली एंटीबॉडी पर भी शोध किया है, जो भविष्य में अस्थि क्षय, मोटापा और तंत्रिका संबंधी बीमारियों के इलाज के लिए नई दवाओं के विकास का आधार बन सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत में अनुमानित 5 से 6 करोड़ लोग ऑस्टियोपोरोसिस या कम अस्थि घनत्व की समस्या से प्रभावित हैं। खासकर महिलाओं में रजोनिवृत्ति के बाद हड्डियों की कमजोरी का खतरा काफी बढ़ जाता है।
डॉ. ज़ैदी ने अपनी प्रारंभिक चिकित्सा शिक्षा केजीएमयू (पूर्व में किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज) से प्राप्त की और बाद में लंदन के हैमरस्मिथ अस्पताल तथा लंदन विश्वविद्यालय से उच्च प्रशिक्षण और शोध किया।
कार्यक्रम की शुरुआत मेडिसिन विभागाध्यक्ष प्रो. वीरेन्द्र आतम के स्वागत संबोधन से हुई। वक्ता का परिचय प्रो. कौसर उस्मान ने कराया और सत्र का संचालन डॉ. मेधावी गौतम ने किया। इस अवसर पर प्रो. के. के. सावलानी ने भाटिया–मिश्रा स्मृति व्याख्यान की परंपरा और शैक्षणिक महत्व पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कई वरिष्ठ व सेवानिवृत्त संकाय सदस्य—डॉ. सी. जी. अग्रवाल, डॉ. एस. के. दास, डॉ. ए. के. त्रिपाठी और डॉ. अशोक चन्द्र—की उपस्थिति रही। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. ओझा, पैरामेडिकल विज्ञान के अधिष्ठाता डॉ. के. के. सिंह तथा अन्य संकाय सदस्य भी मौजूद रहे।
इस कार्यक्रम में लगभग 150 संकाय सदस्य, रेज़िडेंट चिकित्सक और एमबीबीएस विद्यार्थी शामिल हुए। अंत में डॉ. दीपक भगचंदानी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
बॉक्स 1 : क्या है एफएसएच हार्मोन
एफएसएच (फॉलिकल स्टिम्युलेटिंग हार्मोन) पिट्यूटरी ग्रंथि से निकलने वाला हार्मोन है।
इसे पहले केवल प्रजनन प्रक्रिया से जुड़ा माना जाता था।
नए शोध बताते हैं कि यह हड्डियों के टूटने-बनने की प्रक्रिया और शरीर की वसा पर भी असर डाल सकता है।
बॉक्स 2 : वैज्ञानिकों ने क्या शोध किया
वैज्ञानिकों ने पाया कि एफएसएच बढ़ने पर ऑस्टियोक्लास्ट कोशिकाएं सक्रिय हो जाती हैं, जो हड्डियों को तोड़ती हैं।
प्रयोगात्मक अध्ययनों में जब एफएसएच के प्रभाव को रोका गया तो
हड्डियों का क्षय कम हुआ
नई हड्डी बनने की प्रक्रिया बढ़ी
शरीर की चर्बी में कमी देखी गई।
इस आधार पर वैज्ञानिक मानते हैं कि एफएसएच को लक्ष्य बनाकर नई दवाएं विकसित की जा सकती हैं।
बॉक्स 3 : एफएसएच हार्मोन को कैसे रोका गया
शोध में एफएसएच को ब्लॉक करने वाली विशेष एंटीबॉडी विकसित की गई।
इस एंटीबॉडी ने शरीर में एफएसएच के रिसेप्टर से जुड़कर उसके प्रभाव को कम किया।
पशु प्रयोगों में इससे अस्थि घनत्व बढ़ने और हड्डियों की मजबूती में सुधार देखा गया।
वैज्ञानिक अब इसके मानव उपयोग के लिए सुरक्षित दवाओं के विकास पर काम कर रहे हैं।


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