गुरुवार, 5 मार्च 2026

43 कंपनियों का 3.53 लाख करोड़ माफ



43 कंपनियों का 3.53 लाख करोड़ ‘हेयरकट’: जनता पर पड़ता बोझ और अर्थव्यवस्था का बड़ा सवाल

भारत आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आधार पर देश वैश्विक स्तर पर शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और आर्थिक विकास की रफ्तार भी कई विकसित देशों से तेज बताई जाती है। लेकिन जब इस विकास को आम नागरिक की जिंदगी से जोड़कर देखा जाता है, तो तस्वीर उतनी चमकदार नहीं दिखती। प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत अब भी कई देशों से पीछे है और वैश्विक रैंकिंग में लगभग 140 के आसपास स्थान बताया जाता है।

इसी पृष्ठभूमि में कॉरपोरेट कर्ज और बैंकों द्वारा लिए गए “हेयरकट” का मुद्दा लगातार बहस का विषय बना हुआ है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 43 बड़ी कंपनियों पर करीब 5.44 लाख करोड़ रुपये का कर्ज बकाया था। दिवालिया प्रक्रिया के बाद बैंकों को इनमें से केवल लगभग 1.90 लाख करोड़ रुपये ही वापस मिल सके। यानी करीब 3.53 लाख करोड़ रुपये का हिस्सा बैंकों को छोड़ना पड़ा, जिसे वित्तीय भाषा में “हेयरकट” कहा जाता है।

भले ही इसे तकनीकी रूप से कर्ज माफी नहीं कहा जाता, लेकिन आम जनता के नजरिये से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इतनी बड़ी रकम का नुकसान कौन उठाता है। बैंकों का पैसा दरअसल जनता का ही पैसा होता है—क्योंकि वही पैसा लोगों की जमा पूंजी, सरकारी निवेश और टैक्स के रूप में बैंकिंग व्यवस्था में आता है। जब हजारों करोड़ रुपये की वसूली नहीं हो पाती, तो उसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

इसी कारण आलोचक यह सवाल उठाते हैं कि जब बड़ी कंपनियों के कर्ज में इस तरह भारी “हेयरकट” लिया जाता है, तो वही उदारता किसानों, छोटे व्यापारियों या आम नागरिकों के कर्ज के मामले में क्यों नहीं दिखाई देती। देश में लाखों किसान आज भी कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं। कई राज्यों में किसानों की आत्महत्या की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं।

यदि तुलना की जाए तो कहा जाता है कि 3.53 लाख करोड़ रुपये जैसी विशाल राशि से किसानों का कर्ज कई बार तक राहत देने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता था, या फिर स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के क्षेत्रों में बड़े स्तर पर निवेश किया जा सकता था।

यही कारण है कि आर्थिक नीतियों को लेकर यह बहस तेज होती जा रही है कि विकास का वास्तविक लाभ किसे मिल रहा है। एक ओर देश की जीडीपी तेजी से बढ़ने के दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर बड़ी आबादी अब भी महंगाई, बेरोजगारी और कम आय की समस्या से जूझ रही है।

भारत की अर्थव्यवस्था के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या विकास का लाभ केवल कुछ बड़े कॉरपोरेट समूहों तक सीमित रहेगा, या फिर उसकी पहुंच गांवों, किसानों और आम नागरिकों तक भी होगी।

आने वाले समय में नीति-निर्माताओं के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती होगी कि आर्थिक फैसलों में पारदर्शिता और संतुलन सुनिश्चित किया जाए, ताकि देश की संपत्ति का लाभ केवल कुछ हाथों में सिमटने के बजाय देश की पूरी जनता तक पहुंचे।



  

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