पीजीआई में नेत्र मंथन
प्रदेश में कॉर्निया प्रत्यारोपण को नई रफ्तार, 11 से बढ़कर 21 होंगे आई बैंक व ट्रांसप्लांट सेंटर
लखनऊ।
प्रदेश में कॉर्निया प्रत्यारोपण की बढ़ती आवश्यकता को देखते हुए स्टेट ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (सॉट्टो–उ.प्र.) ने बड़ा कदम उठाया है। वर्तमान में प्रदेश में संचालित 11 सरकारी कॉर्निया रिट्रीवल (आई बैंक) और प्रत्यारोपण सेंटरों की संख्या बढ़ाकर 21 करने की योजना पर काम शुरू कर दिया गया है। इस योजना को अगले 18 महीनों में चरणबद्ध रूप से लागू करने का लक्ष्य रखा गया है।
यह जानकारी संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान के चिकित्सा अधीक्षक एवं सॉट्टो–उ.प्र. के संयुक्त निदेशक प्रो. राजेश हर्षवर्धन तथा नेत्र विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. विकास कन्नौजिया ने ‘नेत्र मंथन’ कार्यक्रम के दौरान दी। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश में हर वर्ष लगभग 18 हजार मरीजों को कॉर्निया प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है, जबकि वर्तमान में केवल 1200 से 1500 प्रत्यारोपण ही हो पा रहे हैं। इस अंतर के कारण हजारों लोग दृष्टिहीनता का सामना कर रहे हैं।
राज्य-स्तरीय मंथन सत्र
उत्तर प्रदेश में कॉर्नियल दान एवं प्रत्यारोपण की वर्तमान स्थिति और भावी दिशा पर केंद्रित राज्य-स्तरीय विचार-मंथन सत्र का आयोजन 28 फरवरी 2026 को डी. के. छाबड़ा सभागार, एसजीपीजीआईएमएस, लखनऊ में किया गया। इस सत्र का संयुक्त आयोजन सॉट्टो–उ.प्र., अस्पताल प्रशासन विभाग और नेत्र विज्ञान विभाग द्वारा किया गया।
कार्यक्रम में चिकित्सा शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव श्री अमित कुमार घोष ने योजना को सहमति प्रदान करते हुए सरकार के पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं की सहभागिता से नेत्रदान के प्रति सकारात्मक वातावरण बनेगा और कॉर्नियल प्रत्यारोपण सेवाओं का तेजी से विस्तार संभव होगा।
कॉर्नियल अंधत्व: गंभीर जनस्वास्थ्य चुनौती
सत्र में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, देश में हर वर्ष प्राप्त किए गए कॉर्निया और वास्तविक प्रत्यारोपण में उपयोग हुए कॉर्निया के बीच बड़ा अंतर बना रहता है। गुणवत्ता, संक्रमण और समयबद्धता के कारण अनेक कॉर्निया प्रत्यारोपण के योग्य नहीं रह पाते।
नेशनल ऑर्गन और टिशु ट्रांसप्लांट (नॉटो) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में कॉर्नियल अंधत्व से पीड़ित लोगों की संख्या लगभग 10 से 12 लाख है और प्रतिवर्ष 20 से 25 हजार नए मामले जुड़ते हैं। यह समस्या बाल्यावस्था अंधत्व के प्रमुख कारणों में भी शामिल है।
कॉर्नियल अंधत्व के प्रमुख कारणों में
कॉर्निया संक्रमण (बैक्टीरियल, फंगल और वायरल),
आंखों में आघात एवं रासायनिक चोटें,
मोतियाबिंद सर्जरी के बाद उत्पन्न जटिलताएं,
विटामिन-ए की कमी,
जन्मजात कॉर्नियल विकार,
तथा पारंपरिक हानिकारक नेत्र उपचार प्रथाएं शामिल हैं।
विशेषज्ञों ने कहा कि समयबद्ध दान और सुदृढ़ प्रत्यारोपण व्यवस्था से इस अंधत्व को अधिकांश मामलों में रोका और उपचारित किया जा सकता है।
पीजीआई में जल्द शुरू होंगी सेवाएं
प्रो. विकास कन्नौजिया ने बताया कि संस्थान में एक वर्ष के भीतर कॉर्निया रिट्रीवल और प्रत्यारोपण सेवाएं शुरू कर दी जाएंगी। मृत्यु के छह घंटे के भीतर कॉर्निया प्राप्त करना गोल्डन आवर माना जाता है।
उन्होंने बताया कि 100 सफल प्रत्यारोपण के लिए औसतन 170 कॉर्निया की आवश्यकता होती है, क्योंकि तकनीकी कारणों से लगभग 70 कॉर्निया अनुपयोगी हो जाते हैं। कॉर्निया रिट्रीवल प्रशिक्षित ऑप्थैल्मिक टेक्नोलॉजिस्ट द्वारा किया जा सकता है, जबकि प्रत्यारोपण केवल विशेषज्ञ नेत्र सर्जन द्वारा ही किया जाता है।
संस्थान के निदेशक प्रो. आर. के. धीमन ने कहा कि आवश्यक मानव संसाधन, उपकरण और लॉजिस्टिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। उन्होंने प्रत्यारोपण समन्वयकों की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
विशेषज्ञों के विचार
नॉटो के निदेशक डॉ. अनिल कुमार ने कहा कि अंग और ऊतक दान की सुदृढ़ संस्कृति विकसित करने के लिए केवल जन-जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं हैं। अस्पतालों में संभावित दाताओं की समयबद्ध पहचान, परिजनों से संवेदनशील संवाद और पारदर्शी आवंटन व्यवस्था आवश्यक है।
आगरा मेडिकल कॉलेज की नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. शेफाली मजूमदार ने कहा कि डेटा-आधारित दृष्टिकोण, डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम, अस्पताल-आधारित दाता पहचान और प्रत्यारोपण समन्वयकों का प्रशिक्षण इस तंत्र को मजबूत बना सकता है।
साझा संकल्प
विचार-मंथन सत्र में यह निष्कर्ष निकला कि आई बैंक नेटवर्क के विस्तार, तकनीक आधारित निगरानी, जन-जागरूकता और संस्थागत समन्वय से कॉर्निया दान और प्रत्यारोपण के बीच की खाई को पाटा जा सकता है।
कार्यक्रम का समापन इस संदेश के साथ हुआ—
“जीवन से परे सोचें, आज ही नेत्रदाता बनें।”
अगर आप चाहें तो मैं


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