‘बजट’ — स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए निराशाजनक
एक बहुत वरिष्ठ नागरिक के विचार
— प्रो सीता नायक देश कीजानी मनी इम्यूनोलॉजिस्ट है संजय गांधी पीजीआई के स्थापना में और विकसित करने में अहम भूमिका निभा चुकी हैं
‘बजट डे’ आज के भारत में ‘मध्यम वर्ग’ के परिवारों के लिए एक बड़ा दिन होता है। टीवी पर इसका लाइव प्रसारण ठीक वैसे ही चलता है जैसे भारत का कोई टी-20 मैच। शायद यह मान लेना गलत नहीं होगा कि बहुत-बहुत कम दर्शक देश के वित्तीय प्रबंधन की बारीकियों या यहाँ तक कि उसके व्यापक ढांचे को भी समझते हैं। कान पूरी तरह सतर्क रहते हैं तो केवल एक हिस्से के लिए— व्यक्तिगत आयकर।
हमेशा ऐसा नहीं था। अपने किशोरावस्था के दिनों को याद करती हूँ, जब मेरे चाचा वित्त सचिव थे और श्री टी.टी. कृष्णमाचारी वित्त मंत्री थे तथा हमारे पारिवारिक मित्र भी। तब ‘बजट’ शब्द तक हम शायद ही सुनते थे। ‘बजट डे’ पर भी पूरे दिन की खबरें हमें रात 9 बजे ‘ऑल इंडिया रेडियो’ से केवल 15 मिनट में मिल जाती थीं। बाद के वर्षों में शेयर बाजार में रुचि रखने वाले लोग बजट प्रस्तुति के अगले दिन अखबारों को देखते थे, यह जानने के लिए कि उनकी वित्तीय स्थिति पर इसका क्या असर पड़ेगा। उदारीकरण से पहले के भारत में वेतन कम थे और बचत या निवेश को लेकर हम ज्यादा नहीं सोचते थे। हमारे लिए ‘बाजार’ बस स्थानीय बाजार हुआ करता था।
बदलते समय में बजट और स्वास्थ्य पर अपेक्षाएँ
दूरदर्शन के शुरुआती वर्षों में बजट को कितनी कवरेज मिलती थी, यह मुझे ठीक-ठीक याद नहीं है, क्योंकि हमारे घर में टीवी 1980 के दशक के उत्तरार्ध में आया। 1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण और टीवी देखने की बढ़ती आदत के साथ बजट प्रस्तुतियाँ ज्यादा लोकप्रिय हो गईं। मुझे नहीं पता कि ‘लाइव प्रसारण’ कब एक चलन बना। समय के साथ आय बढ़ी और हर तरह की चीजों तक पहुँच आसान होती गई। ‘खर्च करने की संस्कृति’ के बीज पड़ गए और हर कोई यह देखने लगा कि वित्त मंत्री उसके लिए क्या खास लेकर आए हैं। हाँ, यह लगभग एक निजी रिश्ता बन गया है… और जब से हमारे पास एक ‘महिला’ वित्त मंत्री हैं, मुझे लगता है कि उनकी साड़ी का रंग भी खबर बन जाता है।
मुझे अर्थशास्त्र की गहरी समझ नहीं है और वेतन, आयकर, बचत आदि में भी मेरा निवेश सीमित ही रहा है। जब व्यक्तिगत आयकर की दरें बढ़ती थीं तो सहकर्मियों में कानाफूसी सुनाई देती थी, और हाल के वर्षों में कटौती की उम्मीदें। लेकिन बजट का एक ही हिस्सा है, जिस पर मेरी नजर हमेशा रहती है— स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए आवंटन।
सरकार की मंशा हमेशा अच्छी रही है और राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (2017) का उद्देश्य 2025 तक सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को GDP के 2.5% तक ले जाना था। 2004-14 की अवधि में यह लगभग 1% था, जो हाल के वर्षों में बढ़कर करीब 2% तक पहुँचा है। मौजूदा बजट भी इससे अलग नहीं है।
हमने कई क्षेत्रों में, विशेषकर स्वास्थ्य में, लंबा सफर तय किया है। आज सर्वोत्तम और नवीनतम उपचार उपलब्ध हैं। हमारे पास ऐसे अत्यंत कुशल पेशेवर हैं, जो दुनिया में कहीं भी किसी से कम नहीं। 1980 के दशक के मध्य में जब मेरे पिता को ओपन हार्ट सर्जरी की आवश्यकता पड़ी थी, तब इस तरह की सर्जरी की संख्या दो अंकों में ही होती थी। आज यह सुविधा टियर-2 और टियर-3 शहरों में भी उपलब्ध है। बजट में इसे दर्शाया भी गया है और मेडिकल टूरिज्म को राजस्व के स्रोत के रूप में बढ़ावा देने की बात कही गई है।
लेकिन सच्चाई यह है कि सभी भारतीयों के लिए स्वास्थ्य की बुनियादी आवश्यकता को बिना कहीं अधिक गंभीर प्रतिबद्धता के पूरा नहीं किया जा सकता। और जब ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य हासिल होगा, तब भी यह जरूरी नहीं कि वह एक स्वस्थ भारत होगा। इसलिए, मेरे लिए यह बजट एक बार फिर निराशाजनक ही रहा है।
एक अलग बात— चीन अपने GDP का लगभग 6–7 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च करता है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें