शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

दो घंटे में लगेगा सेप्सिस का सटीक पता, सही एंटीबायोटिक तय होगी

 





पीजीआई यूपी-यूके माइक्रोकॉन

दो घंटे में लगेगा सेप्सिस का सटीक पता, सही एंटीबायोटिक तय होगी

 



सेप्सिस जैसी जानलेवा स्थिति में समय पर सही इलाज तय करना सबसे बड़ी चुनौती होती है। इसी दिशा में संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एसजीपीजीआई) ने बड़ी पहल की है। पीजीआई के माइक्रोबायोलॉजी विभाग द्वारा उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के माइक्रोबायोलॉजिस्ट को आधुनिक तकनीकों से लैस करने के उद्देश्य से यूपी-यूके माइक्रोकॉन कार्यशाला का आयोजन किया गया है। इस कार्यशाला में दोनों राज्यों से 120 से अधिक माइक्रोबायोलॉजिस्ट भाग ले रहे हैं।

कार्यशाला के आयोजक प्रोफेसर चिन्मय साहू और माइक्रोबायोलॉजी विभाग की प्रमुख प्रोफेसर रूंगमई एसके मारक ने बताया कि सेप्सिस के मरीजों में शुरुआती कुछ घंटे “गोल्डन आवर” माने जाते हैं। यदि इसी दौरान सही एंटीबायोटिक शुरू हो जाए तो मरीज की जान बचने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।

उन्होंने बताया कि अब तक माल्टी- टॉफ़ तकनीक के माध्यम से 6 से 7 घंटे में यह पता लगाया जा सकता था कि किस मरीज में कौन-सी एंटीबायोटिक प्रभावी होगी। इस तकनीक से पहले ही सेप्सिस के कई मरीजों को लाभ मिल रहा था। लेकिन पीजीआई ने इससे भी एक कदम आगे बढ़ते हुए एक नई और उन्नत तकनीक स्थापित की है।

नई तकनीक के तहत मरीज के रक्त में एक विशेष रसायन मिलाया जाता है, जिससे रक्त से प्रोटीन को अलग किया जाता है। इसके बाद मात्र दो घंटे के भीतर यह स्पष्ट हो जाता है कि सेप्सिस पैदा करने वाले जीवाणु पर कौन-सी एंटीबायोटिक सबसे प्रभावी रहेगी। इससे डॉक्टर बहुत तेजी से सही इलाज की दिशा तय कर सकेंगे।

विशेषज्ञों के अनुसार, सेप्सिस में देरी से दी गई गलत या कम प्रभावी एंटीबायोटिक मरीज की हालत को और बिगाड़ सकती है। ऐसे में दो घंटे में सटीक जानकारी मिलना उपचार की दिशा में क्रांतिकारी बदलाव माना जा रहा है।

कार्यशाला में प्रतिभागियों को इस नई तकनीक का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है, ताकि वे अपने-अपने संस्थानों में इसे लागू कर सकें। प्रो. मारक ने कहा कि पीजीआई का उद्देश्य केवल अपने संस्थान तक सीमित रहना नहीं है, बल्कि प्रदेश और पड़ोसी राज्यों में भी सेप्सिस प्रबंधन को मजबूत करना है।

चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक के व्यापक उपयोग से सेप्सिस से होने वाली मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है और एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस जैसी गंभीर समस्या पर भी प्रभावी नियंत्रण संभव होगा।

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