शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

हर 10 में 7 मरीज मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस से ग्रस्त, एंटीबायोटिक बेअसर होती जा रहीं

 





हर 10 में 7 मरीज मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस से ग्रस्त, एंटीबायोटिक बेअसर होती जा रहीं


एक वर्ष में एक व्यक्ति लगभग 12  एंटीबायोटिक गोलियों का करता है  सेवन 


कुमार संजय


एंटीबायोटिक के अंधाधुंध और गैर-ज़रूरी इस्तेमाल ने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। संजय गांधी पीजीआई सहित प्रमुख सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों में आने वाले हर 10 में से 7 मरीजों में सामान्य एंटीबायोटिक दवाएं असर नहीं कर रही हैं। इन मरीजों में मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस (एमडीआई) की स्थिति स्पष्ट रूप से देखी जा रही है।


 संस्थान के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के प्रो. चिन्मय साहू के अनुसार, विभाग में कल्चर एवं सेंसिटिविटी जांच के लिए प्राप्त एक हजार से अधिक मरीजों के नमूनों के विश्लेषण में यह सामने आया कि करीब 70 प्रतिशत मरीज पहले से ही मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस से ग्रस्त हैं। इन मरीजों में आमतौर पर इस्तेमाल की जाने वाली एंटीबायोटिक दवाएं जैसे एजिथ्रोमाइसिन, सिपलॉक्स.  क्लैवुलनेट और एमोक्सिलिन प्रभावी नहीं रह गई हैं।


 


प्रो. साहू ने वर्ल्ड एंटीबायोटिक कंजम्पशन रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि भारत में एक व्यक्ति औसतन एक वर्ष में लगभग विभिन्न तरह के 12 एंटीबायोटिक गोलियों का सेवन कर लेता है, जबकि इनमें से 75 से 80 प्रतिशत मामलों में इन दवाओं की कोई चिकित्सकीय आवश्यकता नहीं होती। उन्होंने कहा कि सबसे अधिक एंटीबायोटिक का उपयोग श्वसन तंत्र संक्रमण—जैसे सर्दी, खांसी और गले की खराश—में किया जा रहा है, जो अधिकतर वायरल होते हैं। इसके बाद बुखार के मामलों में एंटीबायोटिक का बेवजह सेवन आम बात बन चुका है।


 


उन्होंने बताया कि स्थिति इसलिए और गंभीर हो रही है क्योंकि केवल 30 प्रतिशत मरीजों में ही लैब जांच या माइक्रोबायोलॉजिकल पुष्टि के बाद निश्चित (डिफिनिटिव) एंटीबायोटिक थेरेपी दी जाती है। शेष 70 प्रतिशत मामलों में अनुमान के आधार पर एंटीबायोटिक शुरू कर दी जाती है, जिससे बैक्टीरिया तेजी से दवाओं के प्रति प्रतिरोधी बन रहे हैं।


 कल्चर  जांच को हो विस्तार


प्रो. चिन्मय साहू के अनुसार, यदि एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस की इस चुनौती से निपटना है, तो माइक्रोबायोलॉजिकल जांच, विशेषकर कल्चर सेंसिटिविटी जांच की सुविधाओं का बड़े पैमाने पर विस्तार अनिवार्य है। जिस तरह पैथोलॉजिकल जांच आज इलाज का अनिवार्य हिस्सा बन चुकी है, उसी तरह माइक्रोबायोलॉजिकल पुष्टि के बाद ही एंटीबायोटिक शुरू करने की नीति को सख्ती से लागू करना होगा।



















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