बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

“चीनी छोड़ने से नहीं भागेगा कैंसर

 


चीनी छोड़ दो, कैंसर भाग जाएगा?”

सोशल मीडिया और क्रिकेटर  के दावे पर लखनऊ के डॉक्टरों की चेतावनी — इलाज का नहीं, सिर्फ सहायक उपाय हो सकता है उपवास

 दावा भ्रामक, इलाज सिर्फ डॉक्टरों की निगरानी में संभव

 

 

 

 

लखनऊ

हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर तेजी से एक दावा वायरल हो रहा है — "चीनी बंद कर दो, कैंसर खुद खत्म हो जाएगा।" इस संदेश को और बल मिला जब पूर्व क्रिकेटर  ने एक सार्वजनिक मंच पर कहा कि उनकी पत्नी ने कैंसर से लड़ाई के दौरान चीनी, कार्बोहाइड्रेट छोड़कर, नीम, हल्दी और उपवास को अपनाया और इससे उन्हें लाभ मिला।

इन बयानों और वायरल संदेशों ने कई कैंसर रोगियों और उनके परिवारों के बीच भ्रम पैदा कर दिया है। ऐसे में लखनऊ स्थित एरा मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने एक वैज्ञानिक शोध पत्र रिव्यू आर्टिकल जरिए इस दावे की सच्चाई सामने रखी है।

लखनऊ के डॉक्टरों का साफ कहना है कि उपवास या डाइट में बदलाव कुछ हद तक सहायक हो सकता है, लेकिन कैंसर के इलाज का विकल्प नहीं हो सकता।

कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का इलाज सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी और इम्यूनोथेरेपी जैसे वैज्ञानिक पद्धतियों से ही संभव है।

मरीजों और उनके परिजनों को सलाह दी गई है कि सोशल मीडिया या सेलिब्रिटी के अनुभवों के आधार पर चिकित्सा निर्णय न लें और किसी भी बदलाव से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें।

 

 

 

 

वैज्ञानिक शोध क्या कहता है?

 

एरा मेडिकल कॉलेज, लखनऊ और रूस, स्लोवाकिया व इराक के विशेषज्ञों द्वारा किया गया यह शोध अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल “क्योरस” (Cureus) में मार्च 2025 में प्रकाशित हुआ। इसमें बताया गया कि:

 

उपवास करने से शरीर में मेटाबॉलिज्म में बदलाव आता है, जिससे कुछ प्रकार की कैंसर कोशिकाओं की संवेदनशीलता बढ़ सकती है।

 

यह कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी जैसे पारंपरिक इलाज को थोड़ा अधिक प्रभावी बना सकता है।

 

लेकिन उपवास या चीनी छोड़ देना अकेले कैंसर का इलाज नहीं हो सकता।

 

बिना डॉक्टर की सलाह के भोजन में कटौती करना खतरनाक हो सकता है और इससे कुपोषण, कमजोरी और संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।

 

 

 

 

 

 विशेषज्ञों की राय

 

 कैंसर विशेषज्ञों ने हाल ही में कहा कि सोशल मीडिया पर फैल रहे इस प्रकार के दावे झूठे और भ्रामक हैं।

"चीनी या दूध छोड़ देने से कैंसर की कोशिकाएं मर जाएंगी — यह धारणा पूरी तरह से गलत और वैज्ञानिक आधार से रहित है। यह मरीजों को गुमराह करने वाला दावा है।"

 

 

 

 

शोध में शामिल विशेषज्ञ

 

 

 

डॉ. ग़िज़ल फातिमा, डॉ. अब्बास महदी, डॉ. अमर महदी — एरा मेडिकल कॉलेज, लखनऊ

 

डॉ. जान फेडाको — स्लोवाकिया

 

डॉ. नजाह हादी — इराक

 

डॉ. अमिनात मागोमेदोवा — मास्को स्टेट यूनिवर्सिटी, रूस

 

 

 

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