आय दोगुनी’ या ‘कर्ज तिगुना’
: नीतियों के एक दशक में किसान कैसे बर्बादी की ओर धकेला गया
“जय किसान” के नारों, विज्ञापनों में मुस्कुराते चेहरों और मंचों से किए गए वादों के बीच पिछले बारह वर्षों में भारतीय किसान की वास्तविक स्थिति क्या बदली—यह सवाल आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है।
2014 से 2026 के बीच केंद्र सरकार द्वारा लिए गए नीतिगत फैसलों की कड़ी को जोड़कर देखें, तो एक ऐसी तस्वीर उभरती है जिसमें किसान की आय दोगुनी होने के बजाय कर्ज, लागत और अनिश्चितता तीन गुना बढ़ती दिखाई देती है। अब एफ टी ए से किसान और परेशान होगा।
भूमि से शुरुआत: 2015 का भूमि अधिग्रहण संशोधन प्रयास
2013 के भूमि अधिग्रहण कानून में किसान की सहमति और सामाजिक प्रभाव आकलन (Social Impact Assessment) जैसी सुरक्षा शर्तें शामिल थीं।
2015 में केंद्र सरकार ने अध्यादेश के ज़रिये इन प्रावधानों को शिथिल करने की कोशिश की, ताकि औद्योगिक और कॉरपोरेट परियोजनाओं के लिए ज़मीन अधिग्रहण आसान हो सके।
देशभर में किसान आंदोलनों के बाद सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े, लेकिन इस प्रकरण ने यह स्पष्ट कर दिया कि नीति-निर्माण में किसान नहीं, निवेश की सुविधा प्राथमिकता में है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रहार: नोटबंदी और जीएसटी
नोटबंदी (2016)
खेती एक नकद आधारित अर्थव्यवस्था है। बुवाई, बीज, खाद, कीटनाशक और मजदूरी—सब कुछ नकद पर निर्भर।
नोटबंदी के दौरान किसान फसल छोड़कर बैंकों की कतारों में खड़ा मिला। कई अध्ययनों (आरबीआई, ग्रामीण विकास मंत्रालय से जुड़े शोध) में स्वीकार किया गया कि ग्रामीण क्षेत्रों में नकदी संकट सबसे गहरा रहा।
जीएसटी (2017)
खेती से जुड़े ट्रैक्टर पार्ट्स, पाइप, पंप, स्प्रे मशीन, कीटनाशक और पैकेजिंग सामग्री जीएसटी के दायरे में आ गई।
वहीं, एमएसपी में बढ़ोतरी औसतन 3–5% सालाना रही, जबकि डीजल, खाद और कीटनाशकों की लागत 30–80% तक बढ़ी।
आपदा में सुधार या अवसर?: 2020 के तीन कृषि कानून
कोरोना लॉकडाउन के दौरान संसद में सीमित बहस के बीच तीन कृषि कानून लागू किए गए।
सरकार ने इन्हें “सुधार” बताया, लेकिन किसान संगठनों का कहना था कि इन कानूनों से:
मंडी व्यवस्था कमजोर होगी
एमएसपी की कानूनी गारंटी समाप्त हो जाएगी
खेती कॉरपोरेट नियंत्रण में चली जाएगी
दिल्ली की सीमाओं पर एक साल से अधिक चला किसान आंदोलन, जिसमें 700 से अधिक किसानों की मृत्यु हुई (संयुक्त किसान मोर्चा के आंकड़े)।
नवंबर 2021 में कानून वापस लेने पड़े, लेकिन किसान और सरकार के बीच भरोसे की दरार स्थायी हो गई।
: ₹6000 की ‘राहत’ या छलावा
2019 में शुरू की गई प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत सालाना ₹6000 की सहायता दी जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार:
यह राशि मासिक ₹500 से भी कम बैठती है
कृषि बजट में इस योजना को जोड़कर कुल खर्च बढ़ा हुआ दिखाया जाता है
यदि इस कैश ट्रांसफर को अलग कर दें, तो:
सिंचाई, कृषि अनुसंधान, भंडारण और मंडी ढांचे पर वास्तविक खर्च में गिरावट देखी गई है
खाद सब्सिडी घटने और डीजल महंगा होने से किसान की जेब से ₹15–20 हजार सालाना अतिरिक्त निकल रहा है
फसल बीमा या बीमा कंपनियों का सुरक्षा कवच?
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टों में भी सवाल उठे हैं।
मुख्य समस्याएं:
प्रीमियम समय पर कटता है
क्लेम में महीनों की देरी
तकनीकी आधार पर भुगतान रोका जाता है
कई राज्यों में बीमा कंपनियों का मुनाफा हजारों करोड़, जबकि किसानों को वास्तविक नुकसान का छोटा हिस्सा ही मिला।
नया संकट: 0% टैरिफ और FTA (2025–26)
अब सरकार अमेरिका सहित कई देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट और कृषि आयात पर शून्य या न्यूनतम टैरिफ की दिशा में बढ़ रही है।
इसका सीधा असर:
सस्ते विदेशी सेब, बादाम, मक्का, सोयाबीन भारतीय बाजार में
घरेलू फसलों के दाम गिरेंगे
लागत भी न निकलने पर किसान खेती छोड़ने को मजबूर होगा
निष्कर्ष: संयोग नहीं, नीति का पैटर्न
पिछले बारह वर्षों में नीतियों का एक स्पष्ट पैटर्न उभरता है—
जमीन अधिग्रहण में कॉरपोरेट प्राथमिकता
खेती की लागत बढ़ाने वाले फैसले
मंडी और एमएसपी को कमजोर करना
वास्तविक निवेश की जगह प्रतीकात्मक नकद सहायता
और अब विदेशी कृषि उत्पादों के लिए बाजार खोलना
परिणाम यह है कि आज़ादी के बाद किसान सबसे अधिक कर्जदार स्थिति में है (NSSO व NABARD सर्वे संकेत)।
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