मैरिड के मुकाबले अनमैरिड लड़कियां दस गुना ज़्यादा
वेलेंटाइन डे के बाद इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव पिल यानी इमरजेंसी गर्भनिरोधक गोली को लेकर सोशल मीडिया पर अक्सर यह दावा किया जाता है कि बड़ी संख्या में अनमैरिड लड़कियां इसका इस्तेमाल कर रही हैं। लेकिन जब इस दावे को वैज्ञानिक रिसर्च और मेडिकल जर्नल्स के डेटा से परखा जाता है, तो तस्वीर काफी अलग सामने आती है।
रिसर्च क्या बताती है?
भारत में इमरजेंसी पिल के इस्तेमाल को लेकर इंडियन जर्नल ऑफ पब्लिक हेल्थ और जर्नल ऑफ फैमिली मेडिसिन एंड प्राइमरी केयर में प्रकाशित शोधों के अनुसार—
करीब 5 से 6 फ़ीसदी अनमैरिड लड़कियों ने ही कभी इमरजेंसी पिल का इस्तेमाल किया है
जबकि मैरिड महिलाओं में यह आंकड़ा 0.4 से 1 फ़ीसदी के बीच पाया गया
यानी प्रतिशत के लिहाज से देखें तो अनमैरिड लड़कियों में इस्तेमाल मैरिड महिलाओं की तुलना में लगभग दस गुना अधिक है, लेकिन इसके बावजूद यह संख्या कुल मिलाकर बेहद सीमित है।
डेटा कहां से आया?
यह निष्कर्ष देश के अलग-अलग हिस्सों में किए गए—
अस्पताल आधारित सर्वे
शहरी क्षेत्रों में किए गए कम्युनिटी स्टडी
और 2001 से 2017 के बीच प्रकाशित 33 रिसर्च स्टडी के मेटा एनालिसिस
पर आधारित है।
इन अध्ययनों में गायनेकोलॉजी ओपीडी में आने वाली महिलाओं, शहरी कामकाजी युवतियों और कॉलेज उम्र की लड़कियों को शामिल किया गया।
तो ज्यादा क्यों दिखता है अनमैरिड में?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, इसका कारण दवा नहीं बल्कि परिस्थिति है।
मैरिड महिलाएं आमतौर पर रेगुलर गर्भनिरोधक तरीकों का इस्तेमाल करती हैं
जबकि अनमैरिड युवतियों में डर, गोपनीयता और सामाजिक दबाव के कारण इमरजेंसी पिल का सहारा लिया जाता है
डॉक्टरों का कहना है कि यह उपयोग भी नियमित नहीं बल्कि आपात स्थिति में ही होता है।
कैंसर और बांझपन के दावे कितने सही?
मेडिकल रिसर्च साफ कहती है—
इमरजेंसी पिल से कैंसर या स्थायी बांझपन होने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है
लेकिन बार-बार और बिना डॉक्टर की सलाह इसके सेवन से हार्मोनल असंतुलन, पीरियड्स की गड़बड़ी और अत्यधिक ब्लीडिंग जैसी समस्याएं हो सकती हैं
यही वजह है कि इसे नियमित गर्भनिरोधक विकल्प नहीं माना जाता।
असल चिंता की वजह क्या है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि असली समस्या है—
सेक्स एजुकेशन की कमी
माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद का अभाव
और सोशल मीडिया पर फैल रही अधूरी व डर पैदा करने वाली जानकारी
डर के माहौल में कई युवा बिना डॉक्टर से पूछे मेडिकल स्टोर से सीधे दवा ले लेते हैं।
सरकारी प्रयास और सामाजिक जिम्मेदारी
जननी सुरक्षा योजना, मातृत्व स्वास्थ्य कार्यक्रम और बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाओं का उद्देश्य महिलाओं और किशोरियों को सुरक्षित व जागरूक बनाना है।
लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक समाज में यौन स्वास्थ्य पर खुली और तथ्यपरक बातचीत नहीं होगी, तब तक अफवाहें हावी रहेंगी।
डॉक्टरों की साफ सलाह
इमरजेंसी पिल को आदत न बनाएं
बिना डॉक्टर की सलाह हार्मोनल दवा न लें
सुरक्षित संबंध और सही गर्भनिरोधक तरीकों की जानकारी लें
सोशल मीडिया की अफवाहों के बजाय मेडिकल रिसर्च और डॉक्टरों की सलाह पर भरोसा करें
रिसर्च यह साफ दिखाती है कि—
✔ अनमैरिड लड़कियों में इमरजेंसी पिल का उपयोग मैरिड महिलाओं से अधिक है
✔ लेकिन कुल मिलाकर यह 10 फ़ीसदी से भी कम है
✔ “हर लड़की ले रही है” जैसा दावा वैज्ञानिक रूप से गलत है
समस्या दवा की नहीं, बल्कि जानकारी की कमी और डर के माहौल की है—और इसका समाधान शिक्षा, संवाद और सही मेडिकल सलाह में ही छिपा है।
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