किडनी क्यों नहीं मिल पाती?—भारत में अंग प्रत्यारोपण की सच्चाई पर गंभीर सवाल
“मुझे किडनी क्यों नहीं मिल पा रही?”—यह सवाल हाल ही में 90 वर्ष से अधिक उम्र के एक बुज़ुर्ग ने अपने परिजन से किया। यही प्रश्न आज भारत में लाखों किडनी रोगियों की पीड़ा को दर्शाता है। वरिष्ठ नागरिक और चिकित्सक संजय गांधी पीजीआई के क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी विभाग की पूर्व प्रमुख प्रोफेसर सीता नाइक के एक लेख ने एक बार फिर देश में किडनी प्रत्यारोपण की जमीनी हकीकत और उससे जुड़े नैतिक, सामाजिक व कानूनी पहलुओं पर बहस छेड़ दी है।
लेख के अनुसार, ब्रिटेन में लगभग 7,000 लोग किडनी प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा में हैं और हर साल करीब आधे मरीजों को किडनी मिल जाती है। वहीं भारत में स्थिति बेहद गंभीर है। करीब 14 करोड़ की आबादी वाले देश में लगभग दो लाख मरीज किडनी के इंतज़ार में हैं, लेकिन सालाना केवल 6,000 के आसपास ही प्रत्यारोपण हो पाते हैं। यानी 100 में से सिर्फ 3 मरीजों को ही नई किडनी नसीब हो पाती है।
भारत में पहली किडनी प्रत्यारोपण सर्जरी 1971 में क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर में हुई थी। बाद में प्रत्यारोपण को कानूनी और नैतिक ढांचे में लाने के लिए 1994 में मानव अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम (THOTA) लागू किया गया। इस कानून के तहत केवल नज़दीकी रिश्तेदार या विशेष परिस्थितियों में अनुमति लेकर अन्य दाता अंगदान कर सकते हैं। अंगों की खरीद-फरोख्त को पूरी तरह अवैध और अनैतिक माना गया।
हालांकि, हकीकत यह है कि मांग और आपूर्ति के बड़े अंतर ने अवैध अंग व्यापार को जन्म दिया है। गरीब और हाशिए पर खड़े लोग इस नेटवर्क का आसान शिकार बनते हैं, जिसमें बिचौलिये से लेकर कुछ स्वास्थ्यकर्मी तक शामिल पाए गए हैं।
इस संदर्भ में लेख में ईरान का उदाहरण दिया गया है, जहां 1988 से किडनी की नियंत्रित बिक्री को कानूनी मान्यता है। वहां प्रतीक्षा सूची नहीं है और सरकारी निगरानी में मरीजों को अपेक्षाकृत कम लागत में किडनी मिल जाती है। दाता को सीधे भुगतान किया जाता है।
लेख में यह भी उल्लेख है कि हाल ही में द गार्डियन में प्रकाशित एक लेख में इस बात पर सवाल उठाया गया कि क्या केवल ‘परोपकार’ के भरोसे अंगदान की जरूरतें पूरी हो सकती हैं। लेखक का तर्क है कि यदि समाज गरीबों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए ठोस कदम नहीं उठाता, तो केवल शोषण के डर से भुगतान आधारित व्यवस्था को खारिज करना भी पाखंड हो सकता है।
संजय गांधी पीजीआई के नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो नारायण प्रसाद के मुताबिक भारत में उच्च रक्तचाप और मधुमेह के बढ़ते मामलों के चलते भविष्य में किडनी फेल्योर के मरीज और बढ़ने की आशंका है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या मौजूदा नीति पर्याप्त है, या फिर इस संवेदनशील मुद्दे पर नए सिरे से खुली और ईमानदार बहस की जरूरत है।
यह रिपोर्ट न तो अंगों की बिक्री की खुली वकालत करती है और न ही मौजूदा कानूनों को खारिज करती है, लेकिन यह जरूर कहती है कि “किडनी क्यों नहीं मिल पाती?”—इस सवाल से अब मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।

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