आरोप सिद्ध नहीं हुए, पर राजनीति बदल गई
भारतीय लोकतंत्र में “आरोप की राजनीति”, गिरफ्तारी और सत्ता परिवर्तन का यथार्थ
भारतीय राजनीति में अब यह लगभग स्थापित सच बन चुका है कि किसी नेता को दोषी साबित करना आवश्यक नहीं है—उस पर आरोप लगा देना, जांच शुरू करा देना और गिरफ्तारी की स्थिति बना देना ही पर्याप्त है।
न्यायालय बाद में क्या कहेगा, यह राजनीति के लिए अब गौण हो चुका है।
इस प्रवृत्ति ने न केवल विपक्षी दलों को, बल्कि सत्ता पक्ष को भी हथियार दिया है, ताकि वह अपने ही सहयोगियों या असहज नेताओं को रास्ते से हटा सके।
अरविंद केजरीवाल: आरोप, गिरफ्तारी और राजनीतिक क्षरण
दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे अरविंद केजरीवाल पर शराब नीति सहित कई आरोप लगे। अब तक कोई अंतिम न्यायिक निर्णय ऐसा नहीं है जिससे यह कहा जा सके कि वे दोषी सिद्ध हुए हैं।
फिर भी जांच एजेंसियों की कार्रवाई और गिरफ्तारी ने उनके राजनीतिक नैरेटिव को गहरी चोट पहुंचाई।
यहां यह स्पष्ट दिखता है कि गिरफ्तारी स्वयं सजा में बदल चुकी है, भले ही दोष सिद्ध न हुआ हो।
कांग्रेस: अदालत से बरी, राजनीति से बाहर
2004–2014 के दौरान सत्ता में रही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सरकार पर एक के बाद एक बड़े घोटालों के आरोप लगे—
2G स्पेक्ट्रम घोटाला
कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला
कोलगेट, आदर्श हाउसिंग जैसे मामले
अदालतों ने वर्षों बाद कहा—आरोप सिद्ध नहीं हुए।
लेकिन तब तक कांग्रेस सत्ता और भरोसे—दोनों से बाहर हो चुकी थी।
हेमंत सोरेन:
सत्ता पक्ष में रहकर भी आरोप, इस्तीफा और सत्ता परिवर्तन
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का मामला इस बहस को और गहरा करता है।
उन पर कथित रूप से जमीन आवंटन और पद के दुरुपयोग जैसे आरोप लगे। मामला न्यायिक प्रक्रिया में था, कोई अंतिम दोष सिद्ध नहीं हुआ था, फिर भी उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।
यहां महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि—
यह कार्रवाई सत्ता के भीतर की परिस्थितियों में हुई
आरोप सिद्ध होने से पहले ही राजनीतिक निर्णय ले लिया गया
न्यायिक प्रक्रिया से पहले ही राजनीतिक सजा दे दी गई
यह उदाहरण बताता है कि आरोप की राजनीति केवल विपक्ष बनाम सत्ता तक सीमित नहीं, बल्कि सत्ता के अंदर भी इसका प्रयोग होता है।
नया और खतरनाक ट्रेंड
आरोप + गिरफ्तारी + इस्तीफा = राजनीतिक अंत
आज भारतीय राजनीति में एक नया फार्मूला उभर आया है—
आरोप लगाओ
जांच बैठाओ
गिरफ्तारी या इस्तीफे की स्थिति बनाओ
नैतिकता का दबाव बनाओ
सत्ता परिवर्तन कर लो
बाद में अदालत कुछ भी कहे—
राजनीति अपना काम कर चुकी होती है।
कानून व्यवस्था में अनिवार्य सुधार
“जब तक आरोप सिद्ध न हों, गिरफ्तारी क्यों?”
अब यह केवल राजनीतिक प्रश्न नहीं, संवैधानिक प्रश्न बन चुका है।
आवश्यक कानूनी बदलाव
जब तक किसी व्यक्ति पर लगे आरोप प्रथम दृष्टया ठोस और निर्णायक रूप से सिद्ध न हों, तब तक गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए।
इसके पीछे तर्क:
गिरफ्तारी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नष्ट कर देती है
राजनीतिक जीवन समाप्त हो जाता है
जनता अदालत से पहले फैसला कर लेती है
विपक्ष या सत्ता—दोनों को अनुचित लाभ मिलता है
सुप्रीम कोर्ट और संविधान की मूल भावना
सर्वोच्च न्यायालय कई बार कह चुका है कि—
“गिरफ्तारी अंतिम विकल्प होनी चाहिए, पहला नहीं।”
फिर भी राजनीतिक मामलों में गिरफ्तारी पहला हथियार बन चुकी है।
लोकतंत्र के सामने गंभीर खतरा
आज खतरा यह नहीं है कि दोषी बच जाएंगे,
खतरा यह है कि—
निर्दोषों को दोषी की तरह दंडित किया जा रहा है—बिना सजा, बिना फैसले।
यदि आरोप सिद्ध होने से पहले गिरफ्तारी और इस्तीफे की राजनीति को नहीं रोका गया,
तो लोकतंत्र में न्याय नहीं,
बल्कि डर और धारणा शासन करेगी।
यह लड़ाई किसी एक नेता की नहीं,
हर नागरिक के अधिकार और स्वतंत्रता की है।

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