साइलेंट इमरजेंसी : रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक पर बढ़ा खतरा
एंटीबायोटिक का कोर्स पुराने करना सबसे बड़ा कारण
एसजीपीजीआइ की जांच में खुलासा, कई दवाओं के खिलाफ तेजी से बढ़ रही बैक्टीरिया की रेजिस्टेंस 10 से 40 फ़ीसदी लोगों में मिला रेजिस्टेंस
खांसी, जुकाम, बुखार, पेशाब के संक्रमण और फेफड़ों की बीमारियों में धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रही एंटीबायोटिक दवाएं अब धीरे-धीरे बेअसर होती जा रही हैं। संजय गांधी पीजीआई के माइक्रोबायोलॉजी विभाग में एक हजार से अधिक सैंपलों की जांच में यह सामने आया है कि कई सामान्य एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ बैक्टीरिया तेजी से रेजिस्टेंस विकसित कर रहे हैं। विशेषज्ञों ने इसे आने वाले समय के लिए गंभीर चेतावनी माना है। इसका सबसे बड़ा कारण एंटीबायोटिक का कोर्स पूरा न करना है देखा गया है कि 40 से 50 फ़ीसदी लोग जैसे ही आराम मिलता है एंटीबायोटिक लेना बंद कर देते हैं। पीजीआइ के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के अनुसार जांच में एजिथ्रोमाइसिन के खिलाफ करीब 10 प्रतिशत, जबकि सिप्रोफ्लॉक्सासिन और लीवोफ्लॉक्सासिन के खिलाफ करीब 40 प्रतिशत तक रेजिस्टेंस पाया गया। इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में मरीजों पर ये दवाएं पहले जैसा असर नहीं कर रहीं। डॉक्टरों का कहना है कि बिना सलाह एंटीबायोटिक लेना, अधूरा कोर्स छोड़ देना और वायरल बीमारियों में भी इन दवाओं का इस्तेमाल इसकी बड़ी वजह है। विशेषज्ञों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में हर साल करोड़ों रुपये की एंटीबायोटिक दवाएं इस्तेमाल होती हैं। इनमें सबसे ज्यादा उपयोग खांसी-जुकाम, यूरिन इंफेक्शन, टाइफाइड और फेफड़ों के संक्रमण में होता है। लेकिन दवाओं के अंधाधुंध उपयोग से बैक्टीरिया अब इन दवाओं के खिलाफ मजबूत होते जा रहे हैं।
यूपी में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक
एजिथ्रोमाइसिन रेजिस्टेंस : करीब 10% काम : गले, खांसी और फेफड़ों के बैक्टीरियल संक्रमण में क्या हो रहा : वायरल जुकाम और बुखार में भी लोग खुद से खा रहे
एमोक्सिसिलिन विथ क्लैवुलेनिक एसिड रेजिस्टेंस : 20-25% तक काम : फेफड़े और अन्य बैक्टीरियल संक्रमण में क्या हो रहा : जरूरत से ज्यादा उपयोग से असर घट रहा सिप्रोफ्लॉक्सासिन रेजिस्टेंस : करीब 40% काम : पेट, पेशाब और अन्य संक्रमणों में क्या हो रहा : बार-बार दवा लेने से बैक्टीरिया मजबूत हो रहे यूपी में अनुमानित सालाना खर्च : करीब 180 करोड़ रुपए
लीवोफ्लॉक्सासिन रेजिस्टेंस : करीब 40% काम : यूरिन इंफेक्शन, टाइफाइड और फेफड़ों के संक्रमण में क्या हो रहा : कई मरीजों में दवा का असर तेजी से कम
सेफिक्सिम रेजिस्टेंस : 20% तक काम : टाइफाइड और सामान्य बैक्टीरियल संक्रमणों में
क्यों हो रहा : बिना जांच लंबे समय तक इस्तेमाल “सामान्य संक्रमण भी भविष्य में गंभीर चुनौती बन सकते हैं”
एक्सपर्ट की बात
एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस अब केवल आईसीयू या बड़े अस्पतालों तक सीमित नहीं रह गया है। सामान्य मरीजों में भी तेजी से यह समस्या बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि वायरल बीमारी में एंटीबायोटिक का कोई फायदा नहीं होता, लेकिन लोग बिना जांच और बिना डॉक्टर सलाह दवा ले लेते हैं। इससे बैक्टीरिया दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं। उन्होंने कहा कि अब कई मामलों में डॉक्टरों को कल्चर और सेंसिटिविटी टेस्ट करवाने के बाद ही एंटीबायोटिक चुननी पड़ रही है क्योंकि पहले इस्तेमाल होने वाली सामान्य दवाएं असर नहीं कर रहीं। यदि एंटीबायोटिक का इस्तेमाल नियंत्रित नहीं हुआ तो आने वाले वर्षों में सामान्य संक्रमण का इलाज भी कठिन हो सकता है।
प्रो चिन्मय साहू माइक्रोबायोलॉजी पीजीआइ
पशुपालन और अधूरा इलाज भी बढ़ा रहा खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार पोल्ट्री और डेयरी सेक्टर में एंटीबायोटिक का अत्यधिक उपयोग भी रेजिस्टेंस बढ़ाने का बड़ा कारण है। चिकन, दूध और अन्य खाद्य पदार्थों के जरिए दवाओं के अवशेष इंसानों तक पहुंचते हैं। वहीं मरीजों द्वारा बीच में दवा बंद कर देना भी बैक्टीरिया को और ज्यादा मजबूत बना देता है। डॉक्टरों का कहना है कि एंटीबायोटिक केवल डॉक्टर की सलाह पर ही लेनी चाहिए और पूरा कोर्स पूरा करना जरूरी है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें