रविवार, 2 अगस्त 2026

एक साल बाद मिली सही नजर, नई तकनीक से बिगड़ा चेहरा भी हुआ ठीक

 




एक साल बाद मिली सही नजर, नई तकनीक से बिगड़ा चेहरा भी हुआ ठीक


पीजीआइ में प्रदेश की पहली नेविगेशन-गाइडेड ऑर्बिटल रिकंस्ट्रक्शन सर्जरी


लखनऊ


 गोरखपुर निवासी 30 वर्षीय युवक एक वर्ष पहले सड़क दुर्घटना का शिकार हो गया था। हादसे में उसके चेहरे और आंख के आसपास की हड्डी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई थी। इसके कारण उसे हर चीज दो-दो दिखाई देती थी, चेहरा असमान नजर आने लगा था और सामान्य कामकाज करना भी मुश्किल हो गया था। एक साल तक इन परेशानियों से जूझने के बाद संजय गांधी पीजीआइ के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के डॉक्टरों ने नई तकनीक की मदद से उसकी आंख की हड्डी का सफल पुनर्निर्माण कर न सिर्फ उसकी सही नजर लौटाई, बल्कि चेहरे की विकृति भी ठीक कर दी।

यह उत्तर प्रदेश की पहली इंट्राऑपरेटिव नेविगेशन-गाइडेड सेकेंडरी ऑर्बिटल वॉल रिकंस्ट्रक्शन सर्जरी है, जिसमें पेशेंट-स्पेसिफिक इम्प्लांट (पीएसआई) और ओ-आर्म इमेजिंग तकनीक का संयुक्त उपयोग किया गया। 

विशेषज्ञों ने बताया कि पुरानी चोट के कारण हड्डियां जुड़ चुकी थीं और चेहरे की सामान्य बनावट बदल गई थी, इसलिए यह ऑपरेशन डॉक्टरों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था।

एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के ओरल एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जरी विभाग के डा. भरत शुक्ला ने बताया कि मरीज एक वर्ष पहले गोरखपुर में हुए सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हुआ था। दुर्घटना के बाद आंख की हड्डी में आई विकृति के कारण उसे लगातार दोहरा दिखाई देता था और चेहरे की बनावट भी बिगड़ गई थी। चोट के कारण  ऊतकों में बदलाव आ जाता है और शरीर की सामान्य संरचना पहचानना कठिन हो जाता है। ऐसे में ऑपरेशन के दौरान थोड़ी-सी भी चूक मरीज की दृष्टि और चेहरे की बनावट पर स्थायी असर डाल सकती है।

उन्होंने बताया कि ऑपरेशन के दौरान कंप्यूटर आधारित इंट्राऑपरेटिव नेविगेशन तकनीक से मरीज की सीटी स्कैन रिपोर्ट का रियल-टाइम मिलान किया गया। इसके आधार पर मरीज की थ्री-डी इमेजिंग से तैयार पेशेंट-स्पेसिफिक इम्प्लांट को बिल्कुल सही स्थान पर लगाया गया। सर्जरी पूरी होने से पहले ओ-आर्म इमेजिंग के जरिए इम्प्लांट की स्थिति की तत्काल जांच की गई, जिससे पुनर्निर्माण की सफलता की पुष्टि हो गई और भविष्य में दोबारा सुधारात्मक सर्जरी की जरूरत की संभावना भी काफी कम हो गई। निदेशक  प्रो. आर. के. धीमन ने पूरी टीम को बधाई देते हुए कहा कि अत्याधुनिक तकनीकों के उपयोग से प्रदेश के मरीजों को अब जटिल चेहरे की चोटों का बेहतर इलाज अपने ही राज्य में मिल सकेगा।



बॉक्स :


 क्या है इंट्राऑपरेटिव नेविगेशन तकनीक


इंट्राऑपरेटिव नेविगेशन एक कंप्यूटर आधारित अत्याधुनिक सर्जिकल तकनीक है, जिसे ऑपरेशन के दौरान डॉक्टरों के लिए जीपीएस की तरह काम करने वाली प्रणाली माना जाता है। इसमें मरीज के सीटी स्कैन की त्रि-आयामी तस्वीरों का ऑपरेशन के दौरान वास्तविक शारीरिक संरचना से मिलान किया जाता है। इससे सर्जन को हड्डी और आसपास के महत्वपूर्ण हिस्सों की सटीक स्थिति रियल-टाइम में दिखाई देती है। यही वजह है कि इम्प्लांट बिल्कुल सही स्थान पर लगाया जा सकता है और ऑपरेशन अधिक सुरक्षित व सटीक होता है।


बॉक्स : ऑपरेशन करने वाली टीम


ओरल एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जरी विभाग के मुख्य सर्जन डा भरत शुक्ला, 

डा. कुलदीप विश्वकर्मा

रेजिडेंट सर्जिकल टीम

डा. दीक्षा

डा. शशांक

डा. अभिजीत

डा. अपूर्वा

एनेस्थीसिया विभाग से

डा. रफ़त शमीम

डा. वंश

डा. निखिल

डा. शारिया

नर्सिंग ऑफिसर

आइरीन

दीक्षा

मिटाएं अंधविश्वास, करें अंगदान;




 मिटाएं अंधविश्वास, करें अंगदान;


 भारतीय अंगदान दिवस पर हजरतगंज चौराहे से निकली वॉकाथॉन, 


 लखनऊ



 मिटाएं अंधविश्वास, करें अंगदान, जिंदगी के बाद भी, जीवन का विस्तार और अंगदान–जीवनदान, जीवनदान–महादान जैसे संदेशों के साथ भारतीय अंगदान दिवस के अवसर पर रविवार सुबह हजरतगंज चौराहे से अंगदान जागरूकता वॉकाथॉन निकाली गई। उत्तर प्रदेश राज्य अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (सोटो-यूपी) और संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के अस्पताल प्रशासन विभाग की ओर से आयोजित वॉकाथॉन हजरतगंज चौराहे से शुरू होकर एलन सॉली स्टोर तक गई और वापस हजरतगंज चौराहे पर संपन्न हुई। करीब 1.6 किलोमीटर लंबी इस वॉकाथॉन में 300 से अधिक लोगों ने भाग लेकर अंगदान के प्रति जागरूकता का संदेश दिया। वॉकाथॉन को पीजीआइ के कार्यवाहक निदेशक प्रो. शालीन कुमार, चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के विशिष्ट सचिव धीरेंद्र सिंह सचान, चिकित्सा शिक्षा विभाग की अपर निदेशक नीलम , नेफ्रोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. नारायण प्रसाद तथा सोटो-यूपी के संयुक्त निदेशक एवं अस्पताल प्रशासन विभागाध्यक्ष प्रो. आर. हर्षवर्धन ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस दौरान प्रतिभागियों ने अंगदान के प्रतीक हरे रिबन की मानव शृंखला बनाई। कार्यक्रम में अंगदान संदेश वाली टी-शर्ट और कैप वितरित की गईं तथा सेल्फी बूथ भी आकर्षण का केंद्र रहा। विशेषज्ञों ने बताया कि वर्ष 2024 में देश में 18,911 अंग प्रत्यारोपण सफलतापूर्वक किए गए, जिनमें 3,403 प्रत्यारोपण मृत अंगदाताओं से प्राप्त अंगों द्वारा हुए। इसके साथ ही भारत कुल अंग प्रत्यारोपण की संख्या के आधार पर विश्व में तीसरे स्थान पर पहुंच गया है। वहीं, नोट्टो पोर्टल पर 4.5 लाख से अधिक नागरिक अंगदान का संकल्प ले चुके हैं। वॉकाथॉन में आलम्बन ट्रस्ट एसोसिएट्स, स्पर्श, स्पष्ट सोच फाउंडेशन, लायंस क्लब, इनर व्हील, स्टेट हेल्थ सिस्टम्स रिसोर्स सेंटर (एसएचएसआरसी), चिकित्सा छात्रों, स्वास्थ्यकर्मियों और आम नागरिकों ने भाग लिया। आयोजन को सफल बनाने में डा. क्रिस अग्रवाल, डा. अभिषेक सिंह, डा. अक्षिता बंसल, डा. दीक्षा दुबे, डा. एकता यादव, डा. अर्पिता तिवारी, नीलिमा दीक्षित और भोलेश्वर पाठक की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसके अलावा कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष धर्मेश कुमार, महामंत्री सीमा शुक्ला , मुख्य सेनेटरी इंस्पेक्टर ओम प्रकाश सिंह सहित संस्थान के अनेक अधिकारी और कर्मचारी भी वॉकाथॉन में शामिल हुए। कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों ने अंगदान–जीवन संजीवनी अभियान को जन-जन तक पहुंचाने तथा मृत्यु के बाद अंगदान का संकल्प लेने का आह्वान किया।


 बॉक्स-1 


ब्रेन डेड मरीजों के सिर्फ 10 प्रतिशत अंगदान से 40 से 50 हजार लोगों की बच सकती है जान : प्रो. नारायण प्रसाद


 देश में करीब दो लाख मरीज अंग प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यदि ब्रेन स्टेम डेथ के मामलों में केवल 10 प्रतिशत परिजन भी अंगदान के लिए सहमत हो जाएं तो उत्तर प्रदेश के 40 से 50 हजार मरीजों को नया जीवन मिल सकता है। उन्होंने कहा कि ब्रेन स्टेम डेथ के बाद व्यक्ति दोबारा जीवित नहीं हो सकता, लेकिन उसके अंग कई लोगों की जिंदगी बचा सकते हैं।


 बॉक्स-2 


हर छह मिनट में एक मरीज गंवा रहा जान, अंगदान ही सबसे बड़ा समाधान : प्रो. आर. हर्षवर्धन


 भारत में हर वर्ष करीब पांच लाख लोगों की मौत अंग विफल होने से होती है। उत्तर प्रदेश में सड़क दुर्घटनाओं में ब्रेन स्टेम डेथ के हजारों मामलों में यदि समय पर अंगदान हो जाए तो करीब 32 हजार किडनी और 16 हजार लीवर प्रत्यारोपण के लिए उपलब्ध हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि अंगदान मानवता और सामाजिक उत्तरदायित्व का सबसे बड़ा प्रतीक है तथा लोगों को अपने परिवार के साथ अंगदान की इच्छा साझा करनी चाहिए। 


बॉक्स 3


 एक व्यक्ति के अंगदान से आठ लोगों को मिल सकता है जीवन एक व्यक्ति के अंगदान से आठ लोगों को नया जीवन मिल सकता है, जबकि ऊतक दान से 75 लोगों के जीवन में उल्लेखनीय सुधार संभव है। इसके बावजूद प्रत्यारोपण के लिए उपलब्ध अंगों की संख्या आवश्यकता की तुलना में काफी कम है। भारत में हर वर्ष लगभग दो लाख मरीज लीवर फेलियर या लीवर कैंसर के कारण जान गंवाते हैं, जबकि केवल करीब 1,500 लीवर प्रत्यारोपण हो पाते हैं। इसी प्रकार 25 से 30 हजार हृदय प्रत्यारोपण की आवश्यकता के मुकाबले हर वर्ष केवल 10 से 15 हृदय प्रत्यारोपण ही किए जा रहा है।

शनिवार, 1 अगस्त 2026

अपने ही वाल्व से बदला जा सकता है खराब एओर्टिक वाल्व

 




अपने ही वाल्व से बदला जा सकता है खराब एओर्टिक वाल्व



पीजीआइ के सीवीटीएस विभाग के 39वें स्थापना दिवस 


 जन्मजात या गंभीर एओर्टिक वाल्व रोग से पीड़ित बच्चों और युवाओं के लिए रॉस ऑपरेशन एक प्रभावी हृदय सर्जरी तकनीक है। इसमें मरीज के खराब एओर्टिक वाल्व को हटाकर उसकी जगह उसी का स्वस्थ पल्मोनरी वाल्व लगाया जाता है। इसके बाद पल्मोनरी वाल्व की जगह उपलब्धता के अनुसार मृत अंगदाता से प्राप्त जैविक वाल्व (होमोग्राफ्ट) या जैविक कृत्रिम (बायोप्रोस्थेटिक) वाल्व प्रत्यारोपित किया जाता है। यह तकनीक बच्चों में लंबे समय तक बेहतर परिणाम देती है।

इसी तकनीक समेत एओर्टिक रूट एनलार्जमेंट और एओर्टिक रूट रिप्लेसमेंट जैसी जटिल सर्जरी प्रक्रियाओं पर संजय गांधी पीजीआई के कार्डियोवैस्कुलर एवं थोरेसिक सर्जरी (सीवीटीएस) विभाग के 39वें स्थापना दिवस पर आयोजित  वैज्ञानिक संगोष्ठी एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने दी । विभागाध्यक्ष प्रो. एस.के. अग्रवाल और प्रो शांतनु पांडे

ने कहा कि इन जटिल सर्जरी के लिए हृदय की संरचना की गहरी समझ और उच्च स्तरीय सर्जिकल कौशल आवश्यक है।  प्रशिक्षण कार्यक्रम आधुनिक तकनीकों को मरीजों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण हैं।

डॉ. अतनु साहा (नारायणा हृदयालय, कोलकाता) और डॉ. मोहम्मद इदरीस (सिम्स हॉस्पिटल, चेन्नई) ने कार्यशाला में इन प्रक्रियाओं का प्रशिक्षण दिया। विशेषज्ञों ने मिनिमली इनवेसिव वाल्व सर्जरी, ट्रांसकैथेटर वाल्व तकनीकों तथा बच्चों में वाल्व रिपेयर पर भी चर्चा की। बताया गया कि छोटे चीरे वाली सर्जरी और कैथेटर आधारित तकनीकों से मरीज जल्दी स्वस्थ होते हैं, जबकि बच्चों में जहां संभव हो, वाल्व बदलने के बजाय उसकी मरम्मत को प्राथमिकता दी जाती है।

 प्रो. प्रसन्ना सिम्हा ने प्रो. पी.के. घोष स्मृति व्याख्यान दिया। डॉ. राकेश नायक ने मिनिमली इनवेसिव माइट्रल वाल्व सर्जरी, डॉ. बुद्धादित्य चक्रवर्ती ने असफल टीएवीआई के बाद वाल्व प्रत्यारोपण, डॉ. प्रदीप नारायण ने टीएवीआर के जोखिम तथा डॉ. रविंदर सिंह राव ने ट्रांसकैथेटर माइट्रल वाल्व उपचार पर व्याख्यान दिया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एम्स नई दिल्ली के सीवीटीएस विभागाध्यक्ष एवं आईएसीटीएस के अध्यक्ष प्रो. वी. देवगुरु रहे। समारोह में विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. पी.के. मित्तल को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड तथा विभाग के पूर्व छात्र डॉ. ललित कपूर को आउटस्टैंडिंग एलुमनाई अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।


थायरॉयड बचाने की नई तकनीक विकसित, अब जीवनभर दवा खाने की मजबूरी से मिल सकती है राहत

 




थायरॉयड बचाने की नई तकनीक विकसित, अब जीवनभर दवा खाने की मजबूरी से मिल सकती है राहत 


पीजीआइ में डामा तकनीक से सात मरीजों का सफल इलाज, एक ही ऑपरेशन में दोनों ओर की सौम्य गांठों का उपचार


 


थायरॉयड की सर्जरी के बाद जीवनभर हार्मोन और कई मरीजों में कैल्शियम की दवा लेने की मजबूरी अब कम हो सकती है। संजय गांधी पीजीआइ के एंडोक्राइन एवं ब्रेस्ट सर्जरी विभाग के प्रो. सबारेत्नम मयिलवगनन के नेतृत्व में डायरेक्ट एक्सेस माइक्रोवेव एब्लेशन (डामा) नामक नई हाइब्रिड तकनीक विकसित की गई है। इस तकनीक में थायरॉयड का स्वस्थ हिस्सा सुरक्षित रहेगा। मरीज की प्राकृतिक थायरॉयड कार्यक्षमता बनी रहेगी। जीवनभर हार्मोन रिप्लेसमेंट व कैल्शियम की दवा लेने की जरूरत से यथासंभव बचाया जा सकेगा। यह तकनीक उन मरीजों में कारगर है जिनके थायरॉयड के दोनों हिस्सों में सौम्य (बेनाइन) गांठें होती हैं। अब तक सात चयनित मरीजों पर इसका सफल उपयोग किया गया है। सभी ऑपरेशन तकनीकी और चिकित्सकीय रूप से सफल रहे तथा किसी भी मरीज में कोई बड़ी जटिलता सामने नहीं आई। ऑपरेशन के बाद सभी मरीजों की थायरॉयड कार्यक्षमता सामान्य रही और उपचारित गांठों के आकार में शुरुआती कमी भी दर्ज की गई। विशेषज्ञों के अनुसार, पहले ऐसे मरीजों में अक्सर पूरा थायरॉयड निकालना पड़ता था। इससे रोग तो ठीक हो जाता था, लेकिन मरीज को जीवनभर थायरॉयड हार्मोन की दवा लेनी पड़ती थी। कई मामलों में पैराथायरॉयड ग्रंथियां प्रभावित होने से कैल्शियम की कमी हो जाती थी और लंबे समय तक कैल्शियम की दवा भी लेनी पड़ती थी। इसके अलावा आवाज की नस को नुकसान पहुंचने और अन्य शल्य जटिलताओं का खतरा भी बना रहता था।


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क्या है तकनीक डामा तकनीक में जिस हिस्से में बड़ी या ऑपरेशन योग्य गांठ होती है, उसे सर्जरी से हटाया जाता है, जबकि दूसरी ओर की सौम्य गांठ को उसी ऑपरेशन के दौरान माइक्रोवेव एब्लेशन से नष्ट कर दिया जाता है। प्रो. सबारेत्नम ने बताया कि इस प्रक्रिया में थायरॉयड तक सीधी पहुंच मिलने से माइक्रोवेव प्रोब को अत्यंत सटीक स्थान पर लगाया जा सकता है। इससे आवाज की नस, श्वासनली, अन्ननली और प्रमुख रक्त वाहिकाओं जैसी महत्वपूर्ण संरचनाओं की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित होती है। उनका कहना है कि प्रारंभिक परिणाम उत्साहजनक हैं, हालांकि तकनीक की दीर्घकालिक प्रभावशीलता के लिए मरीजों का नियमित फॉलो-अप जारी है। 



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इनकी भी रही भूमिका डामा तकनीक के विकास में सहायक प्रोफेसर डा. रजनी के. साह, डा. जगन्नाथ स्पंदना तथा रेजिडेंट डा. नम्रता मस्कारा ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


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: डामा तकनीक के प्रमुख फायदे एक ही ऑपरेशन में दोनों ओर की सौम्य थायरॉयड गांठों का इलाज। थायरॉयड का स्वस्थ हिस्सा सुरक्षित रखने का प्रयास। हार्मोन और कैल्शियम की दवा पर निर्भरता कम होने की संभावना। दोबारा बड़ी सर्जरी की जरूरत घट सकती है। महत्वपूर्ण नसों और आसपास के अंगों की बेहतर सुरक्षा।



मेडिटेक संगठन के पूर्व महामंत्री सरोज वर्मा को सेवानिवृत्ति पर भावभीनी विदाई





 मेडिटेक संगठन के पूर्व महामंत्री सरोज वर्मा को सेवानिवृत्ति पर भावभीनी विदाई

23 वर्षों तक महामंत्री रहते हुए संगठन को दिए उल्लेखनीय योगदान के लिए किया गया सम्मानित

लखनऊ। संजय गांधी पीजीआई के रेडियोलॉजी विभाग में शनिवार को मेडिटेक संगठन के पूर्व महामंत्री सरोज वर्मा के सेवानिवृत्ति अवसर पर भावभीना विदाई एवं सम्मान समारोह आयोजित किया गया। समारोह में उनके 23 वर्षों तक महामंत्री के रूप में संगठन के प्रति दिए गए उल्लेखनीय योगदान को याद करते हुए उन्हें सम्मानित किया गया।

मेडिटेक एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने कहा कि सरोज वर्मा ने अपने लंबे कार्यकाल में कर्मचारियों के हितों की रक्षा, संगठन को मजबूत बनाने और विभिन्न मुद्दों के समाधान के लिए सदैव सक्रिय एवं सकारात्मक भूमिका निभाई। उनके नेतृत्व, समर्पण और संगठन के प्रति प्रतिबद्धता ने मेडिटेक एसोसिएशन को नई पहचान दिलाई। वक्ताओं ने कहा कि उनका योगदान संगठन के लिए हमेशा प्रेरणास्रोत रहेगा।

इस अवसर पर मेडिटेक एसोसिएशन की ओर से उन्हें स्मृति चिह्न एवं पुष्पगुच्छ भेंट कर सम्मानित किया गया। साथ ही उनके स्वस्थ, सुखद एवं सक्रिय सेवानिवृत्त जीवन की कामना करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं दी गईं।

कार्यक्रम में मेडिटेक एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज कुमार सिंह, महामंत्री राकेश कुमार निगम, संयुक्त मंत्री कौशल कुमार, कोषाध्यक्ष धीरज सिंह सहित संगठन के सभी पदाधिकारी एवं सदस्य मौजूद रहे। सभी ने सरोज वर्मा के साथ बिताए वर्षों को याद करते हुए उनके सरल, मिलनसार और कर्मठ व्यक्तित्व की सराहना की तथा कहा कि संगठन के प्रति उनकी सेवाओं को हमेशा सम्मान के साथ याद रखा जाएगा। समारोह का समापन सभी सदस्यों द्वारा उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने और सामूहिक रूप से उनके सुखद भविष्य की कामना के साथ हुआ।