गुरुवार, 27 अगस्त 2026

एसजीपीजीआई में स्वदेशी एसएमए दवा की शुरुआत, 15 बच्चों को मुफ्त मिला इलाज

 



एसजीपीजीआई में स्वदेशी एसएमए दवा की शुरुआत, 15 बच्चों को मुफ्त मिली पहली खेप

विदेशी दवा के मुकाबले करीब 50 गुना कम लागत में इलाज

100 से अधिक बच्चे पंजीकृत, 50 से ज्यादा दवा के इंतजार में


स्पाइनल मस्कुलर एट्रॉफी (एसएमए) से पीड़ित बच्चों के लिए संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) में बड़ी पहल हुई है। राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति (एनपीआरडी) के तहत संस्थान में भारत में निर्मित आरएनए स्प्लाइसिंग मॉडिफायर रिसडिप्लाम (नैटस्मार्ट) उपलब्ध कराया गया। गुरुवार को चिकित्सा आनुवंशिकी विभाग में 15 बच्चों को दवा  निशुल्क वितरित की गई।

रिसडिप्लाम मुंह से दी जाने वाली दवा है, जो शरीर में एसएमएन प्रोटीन के उत्पादन को बढ़ाने में मदद करती है। यह प्रोटीन मोटर न्यूरॉन कोशिकाओं के लिए जरूरी होता है। इससे मांसपेशियों की ताकत और मोटर क्षमता को बनाए रखने में मदद मिलती है और बीमारी की प्रगति धीमी हो सकती है। एसएमए में मोटर न्यूरॉन कोशिकाएं प्रभावित होने से बच्चों में मांसपेशियों की कमजोरी, शरीर में ढीलापन, चलने-फिरने में देरी और बाद में सांस लेने में परेशानी हो सकती है, जबकि उनकी बुद्धि सामान्य रहती है।

विदेशी कंपनियों की दवाओं की कीमत बहुत अधिक होने के कारण एसएमए का इलाज परिवारों पर भारी पड़ता है। विशेषज्ञों के मुताबिक 20 किलो वजन वाले बच्चे के लिए विदेशी ओरल दवा की कीमत करीब एक से दो करोड़ रुपये सालाना तक थी, जबकि भारत में निर्मित दवा करीब 3.5 लाख रुपये सालाना में उपलब्ध है। यानी लागत लगभग 50 गुना कम हो गई है।

एसजीपीजीआई में 100 से अधिक बच्चे पंजीकृत हैं और 50 से ज्यादा दवा की प्रतीक्षा में हैं। कार्यक्रम में निदेशक पद्मश्री प्रो. आरके धीमान ने विभाग को बधाई दी और बच्चों को दवा वितरित की। बच्चों ने उन्हें राखी बांधी। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रो. देवेंद्र गुप्ता, संयुक्त निदेशक सामग्री प्रबंधन प्रकाश सिंह और खरीद अधिकारी गंगा विष्णु मौजूद रहे। दवा की खरीद में संयुक्त निदेशक सामग्री प्रबंधन कार्यालय का विशेष योगदान रहा।

विभागाध्यक्ष डॉ. कौशिक मंडल के नेतृत्व में टीम ने दवा उपलब्ध कराने के प्रयास किए। टीम में डॉ. दीप्ति सक्सेना, डॉ. अमिता एम., डॉ. हसीना ए. सैत, डॉ. अंशिका श्रीवास्तव, डॉ. प्रज्ञा काफ्ले, डॉ. पूजा मोटवानी और डॉ. आदर्श शामिल हैं। छह रेजिडेंट डॉक्टरों, वार्ड स्टाफ और अंजू लता गुप्ता का भी योगदान रहा। डॉ. प्रज्ञा काफ्ले, डॉ. पूजा मोटवानी, डॉ. हसीना और डॉ. आदर्श की विशेष भूमिका रही।


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