गूंजे किलकारी-सलामत रहे महतारी पीजीआई के एमअारएच विभाग की सृजन कर्ता
प्रो. नीता सिंह प्रो.मंदाकिनी व प्रो. संगीता यादव
सैकड़ों माताओं की सूनी गोद भरने के लिए संजय गाधी पीजीआइ की एमआरएच विभाग ने ऐसी तमाम तकनीक स्थापित की, जिससे ऐसे शिशुओं को धरती पर कदम रखने का मौका मिला जो शायद ही दुनिया देख पाते। इस विभाग का एक प्रसव हजारों दूसरे प्रसवों के बराबर है। तकनीक भी ऐसी जो देश के बड़े संस्थान एम्स दिल्ली, पीजीआइ चंडीगढ़ के अलावा किसी भी सरकारी अस्पताल में नहीं है।1डॉक्टर्स डे के मौके पर विभाग की मुखिया प्रो.मंदाकिनी प्रधान कहती हैं कि साल भर में दस हजार से अधिक महिलाओं की हाई रिस्क प्रिगनेंसी से जुड़ी परेशानी को हैंडल किया। इसके अलावा सोशल मीडिया से जरिए देश के दूर कोने में बैठे स्त्री रोग विशेषज्ञों के सलाह दे कर उलझन को सुलझाने की कोशिश भी कर रहे हैं। इस काम में प्रो.नीता सिंह और प्रो.संगीता यादव ने खूब मदद की। पेश है कुमार संजय की एक रिपोर्ट...................
:-1सोशल मीडिया सलाह का हथियार 1
भिलाई की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ.संगीता कामरा का वॉट्सएप पर संदेश आया कि एक महिला के तीन बच्चों में जन्मजात गड़बड़ी अल्ट्रासाउंड परीक्षण में मिला है। इसके कारण वह गर्भ को जारी नहीं रख सकी। भ्रूण का फोटो भी अपलोड किया। संदेश को तीनों विशेषज्ञों ने पढ़ने और फोटो का अध्ययन करने के बाद संदेश दिया कि कारण पता करना होगा। इसके लिए जांच कराने के बाद ही आगे की प्लानिंग की जाए। गर्भधारण के लिए तभी सलाह दें। इन विशेषज्ञों के सोशल मीडिया से केवल भिलाई की ही नहीं जयपुर से डॉ.सविता, डॉ.अंजू बहराइच से डॉ.राजुल सिंह व देहरादून से डॉ.रीता सहित देश के कई कोनों से विशेषज्ञा जुड़ी हुई हैं, जो कि सलाह के लिए आपस में संपर्क में रहती हैं। अब पांच सौ अधिक महिलाओं में सलाह दिया गया है। कई बार विशेष इलाज के लिए लोग पीजीआइ भेजती हैं।
1मेरे घर आई नन्ही परी1
सहारनपुर के डॉ. संजीव थापर के की प}ी में रुबेला का संक्रमण गर्भावस्था के दौरान मिला, जिसमें कहा गया कि शिशु में सुनने और बोलने की परेशानी हो सकती है इसलिए गर्भ को हटाना होगा। इन विशेषज्ञों ने परीक्षण किया, जिसमें संक्रमण नहीं मिला तो गर्भ को जारी रखने का सलाह दिया। बाद में स्वस्थ शिशु ने जन्म लिया। आज संदेश दिया मेरे घर आयी एक नन्ही परी..। इसी तरह पटना की अंजू चार बार गर्भवती हुई, लेकिन हर बार उनकी गोद खाली ही रह गयी। वह आठवीं बार गर्भवती होने के तुरंत बाद पीजीआइ आयी यहां पर पता चला कि शुगर के कारण शिशु का विकास सही नहीं हो पा रहा है। इंसुलिन की सही डोज पर रखा गया। अंजू ने स्वस्थ शिशु को जन्म दिया।
1गर्भ में ही बचाई शिशु की जान1
गर्भ में शिशु को खून चढ़ाकर अब तक चार सौ से अधिक शिशुओं को दुनिया देखने का मौका इस टीम ने दिया। एक अन्य केस में विशेषज्ञों ने बताया कि वार्ड में भर्ती अर्चना का बच्चा जब 22 सप्ताह का था, जिसके थैली में पानी सूख गया। इससे शिशु की जान को खतरा पैदा हो गया। हम लोगों ने इंट्रायूट्राइन इंफ्यूजन तीन बार करके पानी की मात्र थैली में बनाया रखा, जिससे शिशु का पूरा विकास हुआ। इसी हफ्ते आपरेशन कर स्वस्थ्य शिशु का जन्म कराया। बताया कि शिशु एक थैली में रहता है जिसमें पानी एक तय मात्र में रहता है। पानी कम या अधिक होने पर शिशु के जीवन और विकास पर खतरा रहता है। हम लोगों ने निडिन के जरिए रिंगर लेक्टेट और एंटीबायोटिक का कंबीनेशन सीधे इंजेक्ट किया फिलहाल यह तकनीक देश के गिने चुने संस्थान में उपलब्ध है।
1गर्भ में ही इलाज कर बनाती हैं स्वस्थ1
बक्सर पटना निवासी मुन्नी के तीन बच्चे दुनिया में नहीं आ पाए। चौथी बार मां बनी तो यहां आयी, पता चला कि गर्भस्थ शिशु का हीमोग्लोबीन दो से कम था। तीन बार गर्भ में खून चढ़ाने के बाद अब स्वस्थ्य शिशु के जन्म की उम्मीद है। आरएच फैक्टर भिन्नता के कारण शिशु में हीमोग्लोबीन कम होने लगता है। इससे शिशु के जीवन को खतरा रहता है। हमने अब तक चार सौ से अधिक गर्भस्थ शिशु में खून चढ़ाकर जन्म कराया है। इससे बचाव के लिए एंटी डी इंजेक्शन लगवाना चाहिए। यदि ब्लड ग्रुप के आरएच फैक्टर में भिन्नता है तो 2500 रुपये के इंजेक्शन से कई परेशानी से बच सकते हैं।
