रविवार, 26 जुलाई 2026

एसजीपीजीआई में दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी का पहला सफल हैप्लो-आइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट, पिता बने जीवनदाता*






उत्तर भारत में पहली बार एक्स-एएलडी से पीड़ित बच्चे का हैप्लो-आइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट सफल


बस्ती के पांच वर्षीय बालक को एसजीपीजीआई में मिला नया जीवन, पिता बने स्टेम सेल डोनर


दक्षिण भारत के राज्यों की तरफ नहीं जाना पड़ेगा उत्तर भारत के मरीज को बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए 


 लखनऊ


 संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के चिकित्सकों ने दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी एक्स-लिंक्ड एड्रेनोलीकोडिस्ट्रोफी (एक्स-एएलडी) से पीड़ित बस्ती के पांच वर्षीय बालक का सफल हैप्लो-आइडेंटिकल बोन मैरो (स्टेम सेल) ट्रांसप्लांट कर उत्तर भारत में नई उपलब्धि हासिल की है। संस्थान का दावा है कि उत्तर भारत में इस बीमारी के लिए यह अपनी तरह का पहला सफल हैप्लो-आइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट है। इस जटिल उपचार में बच्चे के पिता स्टेम सेल डोनर बने और बेटे को नया जीवन देने में अहम भूमिका निभाई।

क्लीनिकल हिमैटोलॉजी विभाग के प्रो. सायन सिन्हा रॉय ने बताया कि बच्चा दुर्लभ आनुवंशिक न्यूरोलॉजिकल विकार एक्स-एएलडी से पीड़ित था। उसके पिता इलाज के लिए मेडिकल जेनेटिक्स विभाग की प्रो. दीप्ति सक्सेना के पास पहुंचे थे। जांच में बीमारी की पुष्टि होने के बाद मरीज को क्लीनिकल हिमैटोलॉजी विभाग भेजा गया। परिजनों को बीमारी और उपचार की पूरी जानकारी देने तथा सहमति मिलने के बाद 19 जनवरी 2026 को हैप्लो-आइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया गया। 6 महीने के फ़ॉलोअप के बाद सारी जांच रिपोर्ट सामान्य आ गई है। 

प्रो. सायन सिन्हा रॉय ने बताया कि एक्स-एएलडी जैसी बीमारी में हेमेटोपोएटिक स्टेम सेल ट्रांसप्लांट (एचएससीटी) ही वर्तमान में ऐसा उपचार है, जो बीमारी की प्रगति को रोक सकता है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि बीमारी का पता शुरुआती अवस्था में चल जाए और समय रहते ट्रांसप्लांट किया जाए। इस तरह के मरीजों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए अब उत्तर भारत के मरीजों को दक्षिणी राज्यों में नहीं जाना पड़ेगा।



 यह रही ट्रांसप्लांट टीम


विभागाध्यक्ष प्रो. राजेश कश्यप के नेतृत्व में यह ट्रांसप्लांट मुख्य कंसल्टेंट प्रो. सायन सिन्हा रॉय, रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. लुइस और डॉ. चंद्रचूड़ की टीम ने किया। मेडिकल जेनेटिक्स विभाग के  प्रो. दीप्ति सक्सेना की उपचार प्रक्रिया में अहम योगदान दिया। यह ट्रांसप्लांट राष्ट्रीय दुर्लभ रोग कार्यक्रम (नेशनल प्रोग्राम फॉर रेयर डिजीज़) के तहत किया गया।


 


टेक्नोलॉजिस्ट की भी होती है  अहम भूमिका


 सीनियर टेक्निकल ऑफिसर मनोज कुमार सिंह की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। उन्होंने पिता से स्टेम सेल संग्रह (हार्वेस्टिंग), स्टेम सेल की संख्या और गुणवत्ता की जांच तथा प्रत्यारोपण के लिए आवश्यक तकनीकी प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा किया। विशेषज्ञों के अनुसार, पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण स्टेम सेल उपलब्ध कराना बोन मैरो ट्रांसप्लांट की सफलता का अहम आधार होता है।


 


 क्या है एक्स-एएलडी


एक्स-लिंक्ड एड्रेनोलीकोडिस्ट्रोफी  एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी है। इसमें एबीसीडी1 जीन में गड़बड़ी के कारण मस्तिष्क और तंत्रिकाओं की सुरक्षा करने वाली माइलिन परत क्षतिग्रस्त होने लगती है।

यह बीमारी मुख्य रूप से लड़कों में होती है


 

 क्या है हैप्लो-आइडेंटिकल ट्रांसप्लांट


इसमें मरीज और डोनर का एचएलए (टिश्यू मैच) लगभग 50 प्रतिशत मिलता है।


जब पूरी तरह मैच करने वाला डोनर नहीं मिलता, तब माता-पिता, भाई या बहन डोनर बन सकते हैं।

इस मामले में बच्चे के पिता 50 प्रतिशत एचएलए मैच होने के कारण स्टेम सेल डोनर बने।

 

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