मंगलवार, 7 जुलाई 2026

थायरॉयड कैंसर का इलाज कितना सफलता होगा बता देगा स्कैन

 

थायरॉयड कैंसर का इलाज कितना  सफलता होगा बता देगा  स्कैन



 बढ़ता एचटीआर बता सकता है बीमारी के बने रहने का खतरा


कुमार संजय


 थायरॉयड कैंसर के मरीजों को रेडियोआयोडीन थेरेपी (आरआईटी) देने के बाद इलाज कितना सफल होगा, इसका अंदाजा अब एक खास स्कैन की मदद से पहले ही लगाया जा सकता है। संजय गांधी पीजीआइ  के न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग के  अध्ययन में पता चला है कि पूरे शरीर के रेडियोआयोडीन स्कैन में लीवर और जांघ के बीच रेडियोआयोडीन जमा होने का अनुपात (हिपेटिक-टू-थाई रेशियो या एचटीआर) मरीज के भविष्य के इलाज परिणामों का भरोसेमंद संकेतक बन सकता है। इससे  पहले ही पता चल सकेगा कि मरीज इलाज का कितना अच्छा परिणाम मिलेगा।


60 मरीजों पर अध्ययन


अध्ययन थायरॉयड कैंसर के 60 मरीजों को शामिल किया गया। इनमें 30 मरीज ऐसे थे जिनका कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों तक फैल चुका था, जबकि 30 मरीजों में बीमारी थायरॉयड तक सीमित थी। सभी मरीजों का रेडियोआयोडीन थेरेपी से पहले तथा छह और 12 महीने बाद स्कैन और अन्य जांचें की गईं।


क्या है एचटीआर


एचटीआर लीवर और जांघ में रेडियोआयोडीन के अवशोषण की तुलना से निकाला जाने वाला अनुपात है। देखा गया कि जिन मरीजों का 12 महीने बाद एचटीआर 2.135 से कम था, उनमें बीमारी के पूरी तरह नियंत्रित होने की संभावना अधिक थी। यह मानक इलाज की सफलता का अनुमान 90 प्रतिशत संवेदनशीलता और 82 प्रतिशत विशिष्टता के साथ लगा सका।



बढ़ता एचटीआर दे सकता है चेतावनी



शोध में यह भी सामने आया कि जिन मरीजों में फॉलो-अप के दौरान एचटीआर बढ़ता गया, उनमें रेडियोआयोडीन थेरेपी का असर अपेक्षाकृत कम रहा और बीमारी के बने रहने की आशंका अधिक थी।  एचटीआर में बदलाव मरीज की निगरानी और आगे की उपचार योजना तय करने में मदद कर सकता है।



पैपिलरी कैंसर में बेहतर परिणाम



60 मरीजों में से 46 को पैपिलरी और 14 को फॉलिकुलर थायरॉयड कैंसर था। कुल 31 मरीजों में इलाज के बाद पूर्ण प्रतिक्रिया मिली। यह सफलता विशेष रूप से पैपिलरी कैंसर वाले मरीजों में अधिक देखी गई।



शोधकर्ता

पीजीआइ के एंडोक्राइन सर्जरी विभाग के डा. प्रकाश सिंह और डा. विनीत मिश्रा, न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग के प्रो. प्रसांता के. प्रधान और डा मनीष ओरा तथा पैथोलॉजी विभाग की डा. योगिता खंडेलवाल और डा. बेला जैन शामिल रहे। शोध को अंतरराष्ट्रीय जर्नल न्यूक्लियर मेडिसिन कम्युनिकेशंस में प्रकाशित हुआ हैं।

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