दिल के वाल्व की बीमारी के इलाज में पीजीआई की बड़ी सफलता
पहली बार मरीज के हृदय वाल्व की जीवित कोशिकाएं लैब में विकसित, नई दवाओं और कृत्रिम हार्ट वाल्व के विकास को मिलेगी नई दिशा
लखनऊ।
संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के वैज्ञानिकों ने दिल के वाल्व की बीमारी के इलाज की दिशा में एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की है। संस्थान के शोधकर्ताओं ने पहली बार मरीज के हृदय वाल्व से प्राप्त जीवित कोशिकाओं को प्रयोगशाला (लैब) में सफलतापूर्वक विकसित किया है। इस सफलता से भविष्य में ऐसी नई दवाएं विकसित करने का रास्ता खुलेगा, जो हृदय वाल्व को खराब होने से रोक सकें। साथ ही मरीज की अपनी कोशिकाओं से कृत्रिम (बायोइंजीनियर्ड) हार्ट वाल्व तैयार करने की दिशा में भी यह शोध मील का पत्थर साबित हो सकता है।
यह शोध एसजीपीजीआई के सीवीटीएस विभाग के हृदय शल्य चिकित्सक प्रो. शांतनु पांडे, विभागाध्यक्ष एवं हृदय शल्य चिकित्सक प्रो. सुरेंद्र कुमार अग्रवाल, क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी विभाग के प्रो. विकास अग्रवाल, डॉ. मोहित के. राय, मॉलिक्यूलर मेडिसिन एंड बायोटेक्नोलॉजी विभाग के डॉ. आलोक कुमार, चरण साई रामिरेड्डी, अंजलि सिंह तथा डॉ. विनीता अग्रवाल ने संयुक्त रूप से किया। शोध के दौरान हार्ट वाल्व रिप्लेसमेंट सर्जरी कराने वाले मरीजों के क्षतिग्रस्त वाल्व से जीवित कोशिकाएं अलग कर उन्हें विशेष तकनीक से प्रयोगशाला में सफलतापूर्वक विकसित किया गया।
अध्ययन में यह भी पता चला कि हृदय वाल्व में लगातार बनी रहने वाली सूजन (इन्फ्लेमेशन) और फाइब्रोसिस यानी ऊतकों का सख्त होना वाल्व के खराब होने का प्रमुख कारण है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि इस प्रक्रिया को शुरुआती चरण में प्रभावी दवाओं से नियंत्रित किया जा सके तो कई मरीजों में हार्ट वाल्व बदलने जैसी बड़ी सर्जरी की आवश्यकता टाली जा सकती है। यही नहीं, अब इन विकसित कोशिकाओं पर नई दवाओं का परीक्षण भी अधिक सटीक और सुरक्षित तरीके से किया जा सकेगा।
यह अध्ययन भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) के सहयोग से किया गया है। इसके निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका जर्नल ऑफ फिजियोलॉजी एंड बायोकैमिस्ट्री में प्रकाशन के लिए स्वीकार कर लिए गए हैं। संस्थान के निदेशक प्रो. आर. के. धीमन ने इस उपलब्धि पर शोध दल को बधाई देते हुए कहा कि यह शोध हृदय वाल्व रोगों के उपचार में नई संभावनाओं के द्वार खोलेगा। इससे भविष्य में मरीजों को अधिक प्रभावी, सुरक्षित और व्यक्तिगत उपचार उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी। साथ ही रीजेनेरेटिव मेडिसिन और टिश्यू इंजीनियरिंग के क्षेत्र में भी यह अध्ययन महत्वपूर्ण आधार प्रदान करेगा।
बॉक्स : मरीजों को होंगे ये बड़े फायदे
-हृदय वाल्व खराब होने की प्रक्रिया को शुरुआती स्तर पर समझा जा सकेगा।
-वाल्व को नुकसान से बचाने वाली नई दवाओं के विकास में तेजी आएगी।
-कई मरीजों में हार्ट वाल्व बदलने की सर्जरी की जरूरत टल सकती है।
-भविष्य में मरीज की अपनी कोशिकाओं से कृत्रिम हार्ट वाल्व विकसित करने की संभावना मजबूत होगी।
-नई दवाओं का परीक्षण अधिक सटीक और विश्वसनीय तरीके से किया जा सकेगा।
बॉक्स : शोध की प्रमुख उपलब्धियां
-पहली बार मानव हृदय वाल्व की जीवित कोशिकाओं का सफल लैब कल्चर तैयार।
-नई दवाओं के परीक्षण के लिए विश्वसनीय जैविक मॉडल विकसित।
-वाल्व में सूजन और फाइब्रोसिस की प्रक्रिया को समझने में मिली महत्वपूर्ण जानकारी।
-रीजेनेरेटिव हार्ट वाल्व थेरेपी और भविष्य के कृत्रिम हार्ट वाल्व निर्माण की दिशा में मजबूत आधार तैयार।

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