स्टेंट लगने के दो माह बाद टूटी कूल्हे की हड्डी, एसजीपीजीआई में सफल ऑपरेशन
खून पतला करने की दवा के कारण सर्जरी थी बेहद चुनौतीपूर्ण, तीन विभागों के तालमेल से बची मरीज की जान
लखनऊ। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के डॉक्टरों ने हाल ही में हृदय में स्टेंट लगवाने वाले एक बुजुर्ग मरीज की टूटी कूल्हे (हिप) की हड्डी का सफल ऑपरेशन किया है। मरीज को दो महीने पहले हार्ट अटैक आया था, जिसके बाद हृदय की बंद धमनियों को खोलने के लिए दो ड्रग-एल्यूटिंग स्टेंट लगाए गए थे। स्टेंट लगाने के बाद मरीज खून को पतला रखने वाली दवाएं (ड्यूल एंटीप्लेटलेट थेरेपी) ले रहे थे। ऐसे में ऑपरेशन के दौरान ज्यादा रक्तस्राव का खतरा था, जबकि दवाएं बंद करने पर स्टेंट में खून का थक्का बनने और दोबारा हार्ट अटैक आने का जोखिम था। इसी वजह से यह सर्जरी डॉक्टरों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण थी।
डॉक्टरों के मुताबिक, बुजुर्गों में हिप फ्रैक्चर होने पर जल्द ऑपरेशन करना जरूरी होता है। सर्जरी में देरी से निमोनिया, बेड सोर, नसों में खून का थक्का बनने और मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है।
मरीज की उम्र और अन्य बीमारियों को देखते हुए ऑर्थोपेडिक्स, कार्डियोलॉजी और एनेस्थीसिया विभाग के विशेषज्ञों ने संयुक्त रणनीति बनाई। ऑपरेशन के दौरान अल्ट्रासाउंड की मदद से विशेष प्रकार का कंटीन्यूअस स्पाइनल एनेस्थीसिया दिया गया, जिससे पूरी सर्जरी के दौरान रक्तचाप और हृदय की कार्यप्रणाली स्थिर रही। इसके बाद डॉक्टरों ने सफलतापूर्वक कूल्हे की हड्डी का ऑपरेशन कर दिया।
ऑपरेशन के तीन सप्ताह बाद मरीज सहारे से चलने लगे हैं और अपने अधिकांश दैनिक कार्य स्वयं करने लगे हैं। चिकित्सकों का कहना है कि समय पर सर्जरी, आधुनिक तकनीक और विभिन्न विभागों के बेहतर समन्वय से यह जटिल ऑपरेशन सफल हो सका। उन्होंने कहा कि इस तरह के हाई-रिस्क मरीजों का इलाज केवल अत्याधुनिक सुविधाओं वाले सुपर स्पेशियलिटी संस्थानों में ही कराया जाना चाहिए।
टीम
मुख्य सर्जन: डॉ. पुलक शर्मा, अतिरिक्त प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, अस्थिरोग विभाग
एनेस्थीसिया टीम प्रमुख: डॉ. वंशप्रिया
ऑर्थोपेडिक टीम: डॉ. फुरकान, डॉ. सुजीत, डॉ. अभिषेक और डॉ. विकास
स्टेंट क्यों लगाया गया था
मरीज को दो माह पहले गंभीर हार्ट अटैक आया था।
जांच में हृदय की धमनियों में रुकावट मिली।
धमनियों में रक्त प्रवाह बहाल करने के लिए दो ड्रग-एल्यूटिंग स्टेंट लगाए गए।
स्टेंट के बाद उन्हें खून पतला रखने वाली दवाएं लगातार दी जा रही थीं, जिससे हिप की सर्जरी और अधिक जोखिम भरी हो गई।

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