गुरुवार, 27 अगस्त 2026

राखी के धागे से बंधा रिश्ता, जरूरत पड़ने पर जिंदगी की डोर भी थाम सकता है

 





राखी के धागे से बंधा रिश्ता, जरूरत पड़ने पर जिंदगी की डोर भी थाम सकता है


बहन ने छोटे भाई को किडनी देकर बचाई जिंदगी


 वाराणसी के कौशिक और गाजीपुर के अरविंद का संजय गांधी पीजीआई में हुआ किडनी ट्रांसप्लांट




किसी परिवार को जब पता चलता है कि उसके अपने की किडनी खराब हो गई है और जिंदगी बचाने के लिए किडनी ट्रांसप्लांट कराना पड़ेगा, तो वह पल परिवार के लिए बेहद कठिन होता है। बीमारी के सदमे के साथ सबसे बड़ा सवाल सामने आता है कि किडनी कौन देगा। ऐसे समय में परिवार का कोई अपना आगे बढ़कर किडनी दान करने का फैसला करता है तो निराशा के बीच उम्मीद की नई किरण दिखाई देती है। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान में ऐसे ही दो मामलों में बहनों ने अपने भाइयों को किडनी देकर नई जिंदगी दी।



भाई की जिंदगी के लिए बहन बनीं किडनी डोनर



वाराणसी के सिंधोरा थाना क्षेत्र के ग्राम बुंची, पोस्ट राजपुर (मंगारी), तहसील पिंडरा निवासी कौशिक कुमार मिश्रा पुत्र लालचंद्र मिश्रा की किडनी खराब हो गई थी। परिवार के सामने ट्रांसप्लांट ही जिंदगी बचाने का रास्ता था। ऐसे मुश्किल समय में उनकी बहन अनीता मिश्रा आगे आईं और उन्होंने अपनी किडनी भाई को दान करने का फैसला किया। कौशिक मिश्रा का किडनी ट्रांसप्लांट मार्च 2026 में संजय गांधी पीजीआई, लखनऊ में हुआ।

अनीता मिश्रा ने कहा, “भाई को बीमारी की हालत में देखकर मन बहुत परेशान था। मेरे मन में एक ही बात थी कि अगर मेरी किडनी से उसकी जिंदगी बच सकती है तो इससे बड़ा मेरे लिए कुछ नहीं है।  आज उसके लिए कुछ करने का मौका मिला तो मैंने अपना फर्ज निभाया। सबसे बड़ी खुशी इस बात की है कि आज मेरा भाई हमारे बीच स्वस्थ जिंदगी की ओर बढ़ रहा है।”



अरविंद के लिए ज्ञानती ने किया अंगदान



इसी तरह गाजीपुर की रहने वाली ज्ञानती ने अपने छोटे भाई अरविंद कुमार को किडनी देकर उसकी जिंदगी बचाने का फैसला किया। अरविंद की किडनी खराब होने की जानकारी मिलने के बाद परिवार गहरे तनाव में था। बीमारी के साथ यह चिंता भी थी कि ट्रांसप्लांट के लिए किडनी कौन देगा। ऐसे समय में बड़ी बहन ज्ञानती आगे आईं और अपनी किडनी देने का फैसला किया। अरविंद का किडनी ट्रांसप्लांट अक्तूबर 2025 में संजय गांधी पीजीआई, लखनऊ में हुआ।

परिवार के लिए यह पल बेहद भावुक था। एक तरफ भाई की बीमारी ने सभी को चिंता में डाल दिया था, वहीं बहन के इस फैसले ने परिवार में उम्मीद और खुशी लौटा दी। बहन के त्याग ने भाई को नई जिंदगी मिलने का रास्ता साफ किया।



राखी के धागे से कहीं मजबूत निकला रिश्ता



रक्षाबंधन पर बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है और बदले में अपनी रक्षा का वचन लेती है। लेकिन इन दोनों बहनों ने इस रिश्ते को एक अलग ही अर्थ दे दिया। जिस भाई से बहन अपनी रक्षा का वचन लेती है, उसकी जिंदगी की रक्षा के लिए खुद आगे आ गई। किडनी खराब होने की खबर से जिस परिवार में डर, बेचैनी और अनिश्चितता छा गई थी, बहन के अंगदान के फैसले ने वहां उम्मीद और खुशी लौटा दी।



 बहनों की संख्या कम



प्रो. नारायण प्रसाद और किडनी ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर विजय प्रताप सोनकर के अनुसार, किडनी दान करने वालों में मां और पत्नी की संख्या सबसे अधिक रहती है। पिछले पांच वर्षों में बहनों द्वारा किडनी दान करने के मामले करीब नौ से अधिक नहीं रहे हैं। इसके पीछे सामाजिक सोच, शादी के बाद ससुराल पक्ष की सहमति और अंगदान को लेकर बनी गलत धारणाएं बड़ी वजह हैं।

सोनकर ने कहा, “अंगदान को लेकर समाज में अभी भी कई भ्रांतियां हैं। सही चिकित्सकीय जांच में स्वस्थ पाए जाने के बाद किडनी दान करने वाला व्यक्ति सामान्य जीवन जी सकता है। किसी अपने को जीवन देने का फैसला समाज के लिए भी सकारात्मक संदेश है।”



किडनी दान सिर्फ चिकित्सा नहीं, रिश्ते की भी परीक्षा



ट्रांसप्लांट टीम के हिमांशु ने कहा, “किडनी ट्रांसप्लांट सिर्फ एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं, बल्कि भावनाओं और रिश्तों से जुड़ा फैसला भी है। जब कोई बहन अपने भाई की जिंदगी बचाने के लिए आगे आती है तो वह पूरे परिवार के लिए बेहद भावुक और खुशी का क्षण होता है।”



प्रो. नारायण प्रसाद के मुताबिक, उचित चिकित्सकीय जांच के बाद किडनी दान करने वाला व्यक्ति सामान्य और स्वस्थ जीवन जी सकता है। इसलिए अंगदान को लेकर डर और भ्रम के बजाय वैज्ञानिक जानकारी को महत्व देना जरूरी है।



बीमारी की खबर से छाई मायूसी, बहन के फैसले से लौटी मुस्कान



किडनी खराब होने की जानकारी मिलते ही परिवार के सामने सिर्फ बीमारी नहीं होती, बल्कि इलाज, ट्रांसप्लांट, खर्च और भविष्य की कई चिंताएं एक साथ खड़ी हो जाती हैं। ऐसे में जब बहन अपनी किडनी देने के लिए आगे आती है तो परिवार को लगता है कि मुश्किल वक्त में भी कोई उनके साथ मजबूती से खड़ा है।

अनीता और ज्ञानती ने सिर्फ अपनी किडनी दान नहीं की, बल्कि अपने भाइयों और पूरे परिवार को दोबारा मुस्कुराने की वजह दी। इन दोनों बहनों ने साबित किया कि भाई-बहन का रिश्ता सिर्फ राखी के धागे तक सीमित नहीं है। जरूरत पड़ने पर बहन अपने शरीर का एक हिस्सा देकर भी भाई की जिंदगी की रक्षा कर सकती है।


1 कौशिक और किडनी देने वाली बहन अनीता 

2 अरविंद को किडनी देने वाली बहन ज्ञानती

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