सोमवार, 3 जून 2024

सत्यम के होंठ पर था ट्यूमर कई डाक्टरों ने दे दिया जवाब लेकिन पीजीआई ने की सर्जरी

 






पीजीआई में पहली बार हारमोनिक स्केलपल से हुई वेस्कुलर ट्यूमर की सर्जरी


 सामान्य सर्जरी में अधिक रक्तप्रावाह की आशंका 


सत्यम के होंठ पर था ट्यूमर कई डाक्टरों ने दे दिया जवाब 


 


संजय गांधी पीजीआई के प्लास्टिक सर्जरी विभाग ने पहली बार हारमोनिक स्केलपल से रक्त वाहिका के ट्यूमर( वैस्कुलर ट्यूमर) के सर्जरी में सफलता हासिल की है। जौनपुर जिले के एक वर्षीय सत्यम के ऊपरी होंठ पर रक्त वाहिका में 2.5 गुणा 1.5 सेमी का ट्यूमर था। परिजनों को डॉक्टर ने पीजीआई रिफर कर दिया क्योंकि यह जटिल सर्जरी होती है। संस्थान के प्लास्टिक सर्जन एवं विभाग के प्रमुख प्रो. राजीव अग्रवाल के पास यह केस आया। परीक्षण के बाद पाया कि ट्यूमर रक्त वाहिका में हैं। साधारण स्केलपल से सर्जरी करने पर रक्त वाहिका में रक्त का अधिक प्रवाह होने के कारण रक्त का फव्वारा निकलेगा। अधिक रक्तस्राव होने के कारण बच्चे के जीवन पर खतरा। रक्त मुंह के अंदर जाने पर फेफड़ों , ट्रेकिया पर कुप्रभाव की आशंका थी। इस तरह के ट्यूमर के सर्जरी के लिए विशेष प्लानिंग की जरूरत थी। प्रो. राजीव ने तय किया कि लिवर की सर्जरी में काम आने वाले हारमोनिक स्केलपल का इस्तेमाल किया जाए। यह स्केलपल में अल्ट्रासोनिक एनर्जी निकलती है जो ट्यूमर को हटाने के साथ ही कोशिकाओं के जमा देती है जिससे रक्त प्रवाह नहीं होता है। आज हुई सर्जरी के बारे में प्रो. राजीव ने बताया कि ट्यूमर एक सिटिंग में धीरे-धीरे कट किया । थोड़ा -थोड़ा ट्यूमर कट करते हैं। तुरंत कोशिकाएं जम जाती है इससे रक्त प्रवाह नहीं होता है। इसी क्रम तब तक ट्यूमर कट करते है जब तक कि पूरा ट्यूमर नहीं निकल जाता है। सत्यम में सर्जरी सफल रही है। अब बिल्कुल फिट है। सर्जरी में एनेस्थीसिया प्रो. पुनीत गोयल और प्रो. आरती अग्रवाल की अहम भूमिका रही। प्रो. राजीव ने बताया कि बाहर इस तरह की सर्जरी नहीं करते है क्योंकि सर्जरी के दौरान रक्तस्राव की आशंका रहती है। हारमोनिक स्केलपल से प्रदेश की यह पहली सर्जरी वैस्कुलर ट्यूमर की है

बुधवार, 29 मई 2024

सही समय पर सही इलाज से ल्युपस के 50 फीसदी की किडनी को बचाना संभव- प्रो. अमिता

 




पीजीआई में ल्यूपस मीट

 

ल्यूपस से साथ 21 साल से फिट है जिंदगी

 

बीमारी के साथ पढ़ाई किया, करियर में आगे

 

 

केस वन-   43 वर्षीय बबीता 21 साल से ल्यूपस के साथ जिंदगी अच्छी गुजार रहीं है। 2003 में जब उन्हें पता चला जब वह नर्सिंग का डिप्लोमा कर नेपाल की सेना में सेवा दे रही थी ।  आज मास्टर डिग्री हासिल कर सेना में मेजर  है।

 

केस-टू- 44 वर्षीय निशा कुलश्रेष्ठा  21 साल से ल्यूपस के साथ अच्छी जिंदगी जी रही है। वह काठमांडू में खुद का व्यवसाय कर रही है।

 

यह  दो नजीर है तमाम ल्यूपस( एसएलई) मरीजों के लिए। बीमारी के साथ वह लंबी जिंदगी जीने के साथ कैरियर में आगे बढ़ सकती है। संजय गांधी पीजीआई के क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी एंड रूहमैटोलाजी विभाग द्वारा एसएलई मरीजों के लिए आयोजित बैठक में कई मरीजों ने अपना अनुभव रखा। कहा कि हिम्मत न हारिए और बीमारी को स्वीकार करिए। जैसे उच्च रक्चाप, डायबटीज जिंदगी के साथ रहती है उसी तरह यह भी रहती है। बबीता ने बताया कि शुरुआती दौर में जोड़ों में दर्द, सूजन, बुखार की परेशानी हुई। सही डॉक्टर तक पहुंचने में दो साल लग गए ऐसा तब जब मैं खुद मेडिकल प्रोफेशन से थी। लखनऊ की दिव्या वर्मा   कहती है कि 2005 में बीमारी का पता चला । उस 5वीं कक्षा में थी इसके बाद बीएड किया आज टीचर हूं। परिवार का सपोर्ट बहुत जरूरी है। 

 

ल्यूपस के मरीजों में किडनी को बचाना संभव

इस मौके पर विभाग की प्रमुख प्रो. अमिता अग्रवाल और डा. रूद्रापन चटर्जी ने बताया कि ल्यूपस के 60 से 70 फीसदी मरीजों में किडनी प्रभावित होने की आशंका रहती है। सही समय पर सही इलाज से 50 फीसदी से अधिक की किडनी को खराब होने से नई दवाओं से बचाया जा सकता है।  फालोअप में रहने की जरूरत है। दवा कभी बंद न करें। एमएसडब्लू मुबीन ने बताया कि गरीब मरीजों के मदद के लिए कई योजना है जिसका लाभ उठा सकते हैं।

 

धैर्य रखें तुरंत इलाज का नहीं होता है असर

 

दवा का असर आने में एक से 1.5 महीना लगता है । कई बार तुरंत लाभ न मिलने में मरीज दवा खाना बंद कर देते है । धैर्य रखने की जरूरत है। हम लोग इलाज शुरू होने के 6 माह बाद देखते है कितना प्रभाव पड़ा । दवा बदलने के बारे में सोचते हैं।  

 

 

ल्यूपस नहीं है आनुवांशिक बीमारी

डा. अनुष्का बताया कि यह संक्रामक बीमारी नहीं है। परिवार में यदि बीमारी रही है तो बच्चों में आशंका हो सकती है लेकिन यह प्रमुख कारण नहीं है। इसके दूसरे भी कारण हो सकते हैं। सामान्य 10 से 15 फीसदी बच्चों में एएनए पाजिटिव होता है लेकिन कई बार बीमारी नही होती है। यह आटो इम्यून डिजीज है जिसमें शरीर की प्रतिरक्षण प्रणाली शरीर के अंगों के खिलाफ काम करने लगती है। किडनी, ब्रेन , त्वचा, फेफड़ा सहित अन्य अंग प्रभावित हो सकते हैं।  

मंगलवार, 28 मई 2024

नर्व स्टिमुलेटर से टूटी नर्व खोज कर जोड़ना संभव

 

पीजीआई प्लास्टिक सर्जरी विभाग का स्थापना दिवस


 


नर्व स्टिमुलेटर से टूटी नर्व खोज कर जोड़ना संभव


 


 पीजीआई में स्थापित होगा बर्न यूनिट


 


रोड एक्सीडेंट में चेहरे पर चोट लगना आम है। इसमें कई बार चेहरे की फेशियल नर्व डैमेज हो जाती है। यह नर्व चेहरे के काम पानी पीना, कुल्ला करना, पलक का झपकना सहित चेहरे के भाव प्रकट करने में अहम भूमिका निभाता है। नर्व 0.1 मिमी का होता है। इसे रिपेयर करने के लिए टूटी नर्व को नर्व स्टिमुलेटर से खोज कर नर्व को रिपेयर किया जाता है। कई बार नर्व रिपेयर लायक नहीं रहती है शरीर के दूसरे अंग से नर्व को लेकर रोपित करते हैं।  संजय गांधी पीजीआई के प्लास्टिक सर्जरी विभाग के स्थापना दिवस पर


आयोजित इंडो गल्फ हाइब्रिड सीएमई ऑन एडवांस ट्रामा  में विभाग के प्रमुख प्रो. राजीव अग्रवाल और इंडियन एसोसिएशन ऑफ प्लास्टिक सर्जन के अध्यक्ष प्रो. हरी वेंकटरमानी ने बताया कि इस तरह की जटिल और संवेदनशील से चेहरे की परेशानी दूर हो जाती है।  हम लोग लगातार यह केस कर रहे हैं। कई बार नाक की हड्डी चूर-चूर हो जाती है ऐसे में शरीर के दूसरे अंग से हड्डी लेकर बोन ग्राफ्ट करते हैं। निदेशक प्रो.आरके धीमान ने कहा कि प्लास्टिक सर्जरी के साथ बर्न यूनिट स्थापित करना हमारी प्राथमिकता है। हर स्तर पर विभाग को सहयोग करेंगे। इस मौके पर विभाग प्रो. अंकुर भटनागर, प्रो. अनुपमा, डा,राजीव भारती, डा. निखलेश ने प्लास्टिक सर्जरी के भूमिका के बारे में जानकारी दी।


 


यह हुए सम्मानित


नर्सिंग वार्ड- निशा पांडेय, श्रीकांत


नर्सिग ओटी- दिलीप कुमार, प्रतिभा सिंह


नर्सिंग ओपीडी ड्रेसिंग- साधना मिश्रा


आफिशयल स्टाफ- मनोज कुमार


 


विभाग एक नजर


बेड -30


ओटी-2


संकाय सदस्य- 5


रेजिडेंट-3


ओपीडी –सात हजार प्रति वर्ष


सर्जरी- 1200 प्रति वर्ष

शनिवार, 18 मई 2024

पीजीआई नर्सिंग यूनियन ने किया मतदाताओं को जागरूक

 


नर्सिंग यूनियन पीजीआई द्वारा संस्थान के कर्मचारी को देश के 18वीं लोकसभा के चुनाव में मतदान करने के लिए जागरूकता अभियान आज दिनांक 18.05.2024 से शुरू किया गया तथा इस अभियान में सभी संस्थान कर्मचारियों टीचिंग व नॉन टीचिंग को दिनांक 20 मई 2024 दिन सोमवार को संस्थान के सामुदायिक केंद्र में स्थित मतदान केंद्र पर पहुंच कर अपना मतदान देकर देश की लोकसभा में कर्मठ इमानदार लोकसभा सदस्यता को अपना मतदान  करें और देश के तरक्की में अपना योगदान दे एवं लोकतंत्र द्वारा प्रदत्त मतदान के अधिकार का प्रयोग  कर देश के लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करें । यह मतदाता जागरूकता  अभियान में यूनियन उपसंरक्षक श्री रविन्द्र सिंह अध्यक्ष श्रीमती लता सचान महामंत्री विवेक उपाध्यक्ष श्री सुजान सिंह उपाध्यक्ष  राजकुमार संगठन मंत्री श्री यूसुफ खान,कोषाध्यक्ष श्री बीरेंद्र,  सहायक कोषाध्यक्ष श्रीमती सुक्लेश संयुक्त श्री मनोज,श्रीमती मंजू कुशवाह, प्रचार मंत्री भानु प्रताप कार्यकारिणी सदस्य श्री अश्वनी श्रीमती मंजु कमल,श्रीमती अनुलीना,श्री संकर गोंडा यूनियन सलाहकार श्रीमती माजू राव श्री राकेश यादव ने भाग लिया । जागरूकता अभियान शुरुआत संस्थान निदेशक आवास से की गई अभियान संस्थान के टाइप 5 से होकर टाइप 4 टाइप 3  कम्युनिटी सेन्टर में स्थित SBI , HDFC बैंक  पर आज का विराम दिया गया। मरीजों के तीमारदारों व संस्थान की बसों पर जाकर मतदान के लिए प्रेरित किया गया।

 संस्थान के निर्देशक प्रो.राधा कृष्ण धीमान को भारत सरकार द्वारा पदम श्री अवार्ड से सम्मानित किया गया था जिसकी बधाई यूनियन ने बुके एवं साल पहनाकर किया व  असिस्टेंट नर्सिंग अधीक्षक श्रीमती मंजू सिंह द्वारा निर्देशक जी का हस्त रचित छायाचित्र भेंट किया गया ।

यूनियन द्वारा मतदाता जागरूकता अभियान दिनांक 19 मई तक किया जाएगा।

शुक्रवार, 17 मई 2024

50 फीसदी को पता नहीं कि वह हाई बीपी से हैं ग्रस्त

 

50 फीसदी को पता नहीं कि वह हाई बीपी से हैं ग्रस्त


जिनको है पता उनमें से 50 फीसदी लोगों में अनियंत्रित है बीपी


 


अनियमित और कम मात्रा में दवा सेवन के कारण अनियंत्रित बीपी  


 


शहरी क्षेत्र के 25 से 35 फीसदी और ग्रामीण क्षेत्र के 15 से 20 फीसदी युवा हाई बीपी के ग्रस्त


 




50 फीसदी लोगों को पता ही नहीं है कि वह उच्च रक्तचाप ( हाई बीपी) के शिकार है जिन्हें पता है उनमें से 50 फीसदी में रक्तचाप नियंत्रित नहीं है। यह आंकड़ा संजय गांधी पीजीआई के कार्डियोलॉजी विभाग के हृदय रोग विशेषज्ञ प्रो. सत्येंद्र तिवारी की ओपीडी में आने वाले एक हजार से अधिक मरीजों में सर्वे के बाद सामने आया है। बीपी अनियंत्रित होने पीछे दवा नियमित न लेना और  कम मात्रा में लेना कारण है। बीपी का पता लगाने के लिए  र बीपी जांच हर व्यक्ति को कराना चाहिए। विश्व उच्च रक्तचाप दिवस( 17 मई) के मौके पर  प्रो. तिवारी ने कहा कि पिछले दस सालों में  शहरी और ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं में हाई बीपी के  शिकार होने वालों की संख्या बढ़ी है।  एक शोध का हवाले देते हुए बताते है कि शहरी क्षेत्र के 25 से 35 फीसदी और ग्रामीण क्षेत्र के 15 से 20 फीसदी युवा हाई बीपी के ग्रस्त है। आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर तीन से चार फीसदी में मृत्यु कारण उच्च रक्तचाप साबित हो रहा है।


 


बीपी कई अंगों को कर रहा है खराब


जागरूकता की कमी के कारण देर से हाई बीपी का पता लगता है। लंबे समय तक बीपी बढ़े होने के कारण दिल , किडनी, ब्रेन और आंख की परेशानी बढ़ जाती है। ब्रेन स्ट्रोक( लकवा) का सबसे बड़ा कारण हाई बीपी है। देखा है कि ब्रेन स्ट्रोक के शिकार 30 से 40 फीसदी लोग दवा या बीच में बंद कर देते है या कम मात्रा में ले रहे होते हैं।


 


गर्भवती महिला में बढ़ सकता है बीपी 


 


गर्भावस्था के दौरान शरीर में कई तरह के बदलाव होते है जिसके कारण गर्भावस्था के दौरान और प्रसव के बाद भी बीपी की परेशानी हो सकती है। महिला और शिशु दोनो में बीपी का परीक्षण होना जरूरी है।


 


मल्टी ड्रग थेरेपी से नियंत्रित रहती है बीपी




प्रो. तिवारी ने बताया कि कुछ लोगों में केवल एक दवा से ही बीपी नियंत्रित रहता है लेकिन कुछ लोगों में मल्टी ड्रग थिरेपी की जरूरत पड़ती है। जिनमें केवल बीपी की परेशानी है इसमें एंजियोटेंसिन रिसेप्टर ब्लॉकर्स दवाओं से बीपी नियंत्रित रहती है लेकिन जिनमे दिल की परेशानी है उनमें कैल्शियम चैनल ब्लॉकर के साथ एंजियोटेंशिन कन्वर्टिंग एंजाइम ( एसीई) इनहिबिटर साथ में देनी पड़ती है। मल्टी ड्रग थेरेपी लेने वाले मरीजों के यूरिया, सीरम क्रिएटिनिन पर हर तीन माह पर नजर रखने की जरूरत है ।  दवा में बदलाव कर साइड इफेक्ट से बचाया जा सके।


 


 


 


क्यों होता है बीपी


 


रक्तचाप दो चीजों से निर्धारित होता है।  हृदय द्वारा पंप किए जाने वाले रक्त की मात्रा और धमनियों के माध्यम से रक्त का प्रवाह कितना कठिन है। हृदय जितना अधिक रक्त पंप करेगा और धमनियां जितनी संकीर्ण होंगी, रक्तचाप उतना ही अधिक होगा।


 


 


 


10 फीसदी में यह हो सकता है कारण


 


-गुर्दा रोग


-मधुमेह


-   अधिक वजन


-    अधिक नमक खाना


-   तनाव


- लंबे समय तक गुर्दे में संक्रमण


- स्लीप एपनिया( सोते समय खर्राटा)


-ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिस-गुर्दे के अंदर छोटे फिल्टर को नुकसान


-गुर्दे को आपूर्ति करने वाली धमनियों का सिकुड़ना


- हार्मोन संबंधी समस्याएं -  कम सक्रिय थायरॉयड , अतिसक्रिय थायराइड , कुशिंग सिंड्रोम , एक्रोमेगाली , हार्मोन एल्डोस्टेरोन का बढ़ा हुआ स्तर (हाइपरल्डोस्टेरोनिज्म), और फियोक्रोमोसाइटोमा


-ल्यूपस  -  प्रतिरक्षा प्रणाली  त्वचा, जोड़ों और अंगों पर हमला करती है


-स्क्लेरोडर्मा  - इसमें मोटी त्वचा का कारण बनती है, और कभी-कभी अंगों और रक्त वाहिकाओं में समस्याएं पैदा करती है





कैसे करें बचाव






-स्वस्थ भोजन


- नियमित व्यायाम 


- शराब और धूम्रपान से दूरी

सोमवार, 13 मई 2024

तीन चक्रव्यूह तोड़ तक निकाला जटिल पेट का ट्यूमर


तीन चक्रव्यूह तोड़ तक निकाला जटिल पेट का ट्यूमर


भारत में पहली बार दोबारा होने वाले ट्यूमर का हुआ लेप्रोस्कोपी से हुई सर्जरी


 तीन दिन में मिल गई छुट्टी 



 कुमार संजय। लखनऊ


संजय गांधी पीजीआई के गैस्ट्रो सर्जरी विभाग ने देश मे पहली बार दोबारा होने वाले ट्यूमर को लेप्रोस्कोप से निकालने में सफलता हासिल  है। रेट्रो पेरिटोनियल ट्यूमर ऐसा जटिल ट्यूमर था जो आंत, मूत्र नलिका और मुख्य रक्त वाहिका को जकड़ रखा था। इस ट्यूमर तक पहुंचने के लिए विशेष प्लानिंग के साथ सर्जरी शुरू किया। पहले आंत को हटाया गया, मूत्र नलिका( यूरेटेर) फिर मुख्य रक्त वाहिका को हटाया । इन रुकावट को दूर करना आसान नहीं था। इन रूकावट को दूर करने के साथ ट्यूमर तक पहुंच कर ट्यूमर को निकालने में सफल रहे।  तकनीक को हमने लेप्रोस्कोपिक एक्सीजन आफ रिकरेंट रेट्रो पेरिटोनियल ट्यूमर नाम दिया है। इसी शीर्षक से इस केस को दुनिया सामने के मेडिकल जर्नल जरिए सामने ऱखने की तैयारी कर रहें हैं। 


 मुख्य सर्जन प्रो. अशोक कुमार ( सेकेंड ) के मुताबिक बस्ती जिले के कप्तानगंज की रहने वाली 32 वर्षीय नीलम वर्मा को 2021 में पेट में दर्द और गांठ महसूस हुआ तो गांठ का ऑपरेशन कराया। तीन साल तक ठीक रहा है, लेकिन एक महीने पहले फिर पेट में दर्द और भारीपन होने लगा। अल्ट्रासाउंड जांच में पता चला कि उसी जगह पर दोबारा ट्यूमर हो गया है। बाहर के डाक्टर ने संस्थान में भेज दिया ओपीडी में नीलम की रिपोर्ट देखने के बाद सीटी स्कैन से पुष्टि कराया। 




150 वर्ग सेमी का जटिल ट्यूमर




ट्यूमर 15 गुणा 10 सेमी यानि 150 वर्ग सेमी का  बहुत ही जटिल जगह पर था। अमूमन इस ट्यूमर की सर्जरी ओपेन होती है लेकिन ओपन में रिस्क था मैने लेप्रोस्कोप से करने का फैसला लिया। सर्जरी में मुख्य रक्त वाहिका के कटने पर रक्तस्राव की आशंका के साथ दूसरे अंगों को क्षति ग्रस्त होने की आशंका थी लेकिन हमने यह चैलेंज स्वीकार किया। एक घंटा 40 मिनट लगा और सर्जरी सफल रही। तीन दिन 6 मई छुट्टी दे गयी है। आज नीलम फालोअप पर आयी थी बिल्कुल फिट है।




इस टीम ने दिया अंजाम




प्रो. अशोक कुमार (सेकेंड), डा. अनिरूद्ध, डा. शाहरूख,डा. जुविन, निश्चेतना प्रो.सुजीत, प्रो. संजय क्युबा, डा. श्रेया खत्री, नर्सिंग से दीप माला

हाथ की सफाई से 40 फीसदी तक कम हो सकता है सेप्सिस

 

पीजीआई माइक्रोबायोलॉजी विभाग का स्थापना दिवस

हाथ की सफाई से 40 फीसदी तक कम हो सकता है सेप्सिस

 

 तीमारदार भी रखें साफ हाथ

  

केवल हाथ की सफाई से अस्पताल में होने वाले संक्रमण को 40 से 50 फीसदी तक कम किया जा सकता है। संक्रमण के विस्तार को रोकने से संक्रमण से निपटने के लिए होने वाले एंटीबायोटिक के खर्च को कम करने के साथ अस्पताल में रूकने का समय कम किया जा सकता है। संजय गांधी पीजीआई के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के 36वें स्थापना दिवस के मौके पर पर हैंड हाइजीन पर विशेष रूप से सेमिनार का आयोजन किया गया। विभाग की प्रमुख प्रो. रूमी एस मारक , प्रो. चिन्मय साहू, प्रो. अतुल गर्ग डा. निधि तेजन, डा. रिचा सिन्हा ने बताया कि स्टेफिलोकोकस, ई कोलाई, एंटिरोकोकस सहित कई बैक्टीरिया और वायरस है जो हाथ के जरिए एक मरीज से दूसरे मरीज में पहुंचते है। खास तौर आईसीयू और ओटी में एक मरीज का इलाज या सर्जरी करने के बाद दूसरे मरीज को छूने से पहले दस्ताने निकाले के बाद हाथ को अच्छी तरह से धुलना चाहिए। इसके साथ ही एथेनॉल से हैंड रब करने के बाद ही दोबारा दस्ताना पहनना चाहिए। आईसीयू में मरीज के तीमारदारों को भी हैंड हाइजीन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। इसके जरिए मरीज मे सेप्सिस की आशंका को 40 से 45 फीसदी कम किया जा सकता है। ओपीडी में डॉक्टर को एक मरीज को एक्जामिन करने के बाद दूसरे मरीज को एक्जामिन करने से पहले हाथ को साफ करना चाहिए। पीजीआई जैसे संस्थान में डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, इम्यूनो कंप्रोमाइज ( इम्यून सिस्टम कमजोरी) के मरीज अधिक आते है जिसके कारण इनमें संक्रमण की आशंका अधिक होती है ऐसे में हैंड हाइजीन अधिक जरूरी है। इस मौके पर एल्युमिनाई मीट के साथ सांस्कृतिक संध्या आयोजन किया गया। कवि डा. पंकज प्रसून का कविता पाठ हुआ।

रविवार, 12 मई 2024

Device will reduce carbon dioxide in kidney failure patients


Foundation Day Celebration of PGI Nephrology Department

Device will reduce carbon dioxide in kidney failure patients

 


 60 to 70 percent of patients admitted in ICU are at risk of acute kidney injury (AKI). Due to reduced kidney function, the amount of carbon dioxide in the body increases. Sanjay Gandhi PGI has started extracorporeal therapy to increase the amount of oxygen and reduce the amount of carbon dioxide. Under this therapy, a special device is installed which absorbs carbon dioxide from the blood. Earlier, ventilators were the only support to normalize the amount of carbon dioxide. To provide information about new technology, the Department of Nephrology organized a workshop on the occasion of Foundation Day celebration. Head of the department Prof. Narayan Prasad and Prof. Ravi Shankar Kushwaha said that due to increase in carbon dioxide, many types of problems increase along with carbon dioxide nacrosis.


 


 


Special cartridge will extract toxic elements during dialysis


 


 


 In case of AKI Due to sepsis, diarrhea, irregular blood pressure, dialysis has to be done very slowly. If these patients have received such a cartridge for dialysis, it absorbs the toxic elements collected in the blood. Due to this, dialysis is proving to be very effective. Pro. Ravi Shankar Kushwaha told that 10 to 15 percent of patients in our institute come to emergency with AKI.


 




 


Pro. Narayan Prasad said that the Indian Society of Nephrology has decided to curb deaths due to AKI by 2025. At present, 60 to 70 percent of people admitted to ICU and 10 to 12 percent of people in the community are dying due to AKI. To create awareness about this, this year's theme has been kept on this. If treated quickly and correctly, AKI can be completely cured. If left untreated, AKI turns into CKD.


 


what is aki


 


Serum creatinine increased by 0.3 mg / dl from normal and If you are urinating less than 0.5 ml / kg / hour for 6 hour, it could be a symptom of AKI. These require immediate treatment. Acute kidney injury is a rapid loss of the kidneys' ability to remove waste and help balance fluids and electrolytes in the body. kidney function reduce within 2 days.  

 


 


what is the reason


 


 


- Tubular necrosis, damage to the tubule cells of the kidney)


-Autoimmune disease


- blood clot (cholesterol emboli)


- Decreased blood flow due to very low blood pressure that may result from burns, dehydration, bleeding, injury, septic shock, serious illness, or surgery.


- Clot formation within the blood vessels of the kidney


 -Infections such as acute pyelonephritis or septicemia


- Placental rupture or placenta previa during pregnancy


-Urinary tract obstruction


-Cocaine and heroin consumption


- Medicines including non-steroidal anti-inflammatory drugs (NSAIDs), some antibiotics and blood pressure medicines, contrast (dyes), some cancer and HIV medicines

किडनी खराबी के मरीजों में डिवाइस कम करेगा कार्बन डाइऑक्साइड

 

पीजीआई नेफ्रोलाजी विभाग का स्थापना दिवस समारोह


  


किडनी खराबी के मरीजों में डिवाइस कम करेगा कार्बन डाइऑक्साइड


 


 

 आईसीयू में भर्ती रहने वाले 60 से 70 फीसदी मरीजों एक्यूट किडनी इंजरी(एकेआई) की आशंका रहती है। किडनी की कार्य क्षमता कम होने के कारण शरीर कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है। ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाने और कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा कम करने के लिए संजय गांधी पीजीआई ने एक्स्ट्राकोर्पोरियल थेरेपी शुरू किया है। इस थेरेपी के तहत एक खास डिवाइस लगायी जाती है जो शऱीर रक्त से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर लेता है। पहले कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा सामान्य करने के लिए केवल वेंटिलेटर ही सहारा था। नए तकनीक की जानकारी देने के लिए नेफ्रोलॉजी विभाग ने स्थापना दिवस समारोह के मौके पर वर्कशॉप का भी आयोजन किया। विभाग के प्रमुख प्रो. नारायण प्रसाद और आयोजन सचिव  प्रो. रवि शंकर कुशवाहा ने बताया कि कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ने पर दिमागी असतुंलन के साथ कई तरह की परेशानी बढ़ जाती है। 



टेली मेडिसिन से दूर -दराज के लोगों को मिलेगा लाभ  


स्थापना दिवस के उद्घाटन समारोह में  निदेशक प्रो. आरके धीमन ने कहा कि डिजिटल हेल्थ का विस्तार कर दूर -दराज के लोगों को काफी लाभ पहुंचाया जा सकता है। इसी दिशा में हम टेली आईसीयू शुरू किए  है इसका विस्तार करने जा रहे हैं। मेदांता के नेफ्रोलाजिस्ट प्रो. आरके शर्मा, अपोलो के नेफ्रोलाजिस्ट प्रो. अमित गुप्ता, एसपीजीआई की प्रो. अनुपमा कौल और डीन प्रो. शालिन कुमार ने अपनी बात रखी। विभाग के प्रमुख प्रो. नारायण प्रसाद ने    विभाग के कार्यों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।   


 

डाक्टर बढ़ाए दायरा


समारोह के मुख्य अतिथि दैनिक जागरण के राज्य संपादक आशुतोष शुक्ला ने कहा कि डॉक्टरों को दायरा बढ़ाना चाहिए। आप लोग पूरी जिंदगी पढ़ते है आप के  ज्ञान  की रोशनी आम लोगों तक पहुंचाने के लिए  हम आप प्लेटफार्म देने के लिए तैयार है।  आप की बात लोग अधिक मानेंगे। हमारी जिम्मेदारी समाज के प्रति है कि उन्हें सही जानकारी मिले। मेडिकल कंफ्यूजन बहुत है । उच्च रक्तचाप किडनी की खराबी का एक बड़ा कराण है तमाम लोगों के नहीं पता है।   

 


डायलिसिस के दौरान विशेष कार्टेज खींच लेगा विषाक्त तत्व


 


 


 सेप्सिस, डायरिया, अनियमित रक्तचाप के कारण होने वाले एकेआई में धीरे डायलिसिस करना होता है। इन मरीजों में डायलिसिस के लिए ऐसे कार्टेज आ गई है तो रक्त में एकत्रित विषैले तत्व को अवशोषित कर लेता है। इससे डायलिस काफी प्रभावशाली साबित हो रहा है। इसके बारे में भी जानकारी दी गयी है। प्रो. रवि शंकर कुशवाहा ने बताया कि हमारे संस्थान में 10 से 15 फीसदी मरीज इमरजेंसी में एकेआई के साथ आते हैं।


 


10 फीसदी में मौत का कारण एकेआई


 


प्रो. नारायण प्रसाद ने बताया कि इंडियन सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी ने तय किया है कि 2025 तक एकेआई के कारण होने वाली मौत पर लगाम लगाना है। इस समय आईसीयू में भर्ती होने वाली 60 से 70 फीसदी और कम्युनिटी में 10 से 12 फीसदी लोगों की मौत एकेआई के कारण हो रही है। इस बारे में जागरूक करने के लिए इस साल का थीम इसी पर रखा है। जल्दी और सही इलाज हो तो एकेआई पूरी तरह ठीक हो जाता है। इलाज न होने पर एकेआई 7 से 8 फीसदी में यह  सीकेडी( क्रानिक किडनी डिजीज) में बदल जाता है।


 


क्या है एकेआई


 


सीरम क्रिएटिनिन सामान्य से 0.3 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर बढ़ जाए और 0.5 मिली प्रति किलो प्रति घंटे से कम पेशाब हो रहा है तो यह एकेआई का लक्षण हो सकता है। इनमें तुरंत इलाज की जरूरत होती है। एक्यूट किडनी इंजरी गुर्दे की अपशिष्ट को हटाने और शरीर में तरल पदार्थ और इलेक्ट्रोलाइट्स को संतुलित करने में मदद करने की क्षमता का तेजी से कमी होने लगती है। किडनी 48 घंटे में ही कम करने लगती है।


 


 


क्या है कारण


 


 


- ट्यूबलर नेक्रोसिस , गुर्दे की ट्यूब्यूल कोशिकाओं को नुकसान)


-ऑटोइम्यून डिजीज


- रक्त का थक्का (कोलेस्ट्रॉल एम्बोली)


- बहुत कम रक्तचाप के कारण रक्त प्रवाह में कमी जो जलने,पानी की कमी , रक्तस्राव, चोट, सेप्टिक शॉक, गंभीर बीमारी या सर्जरी के परिणामस्वरूप हो सकता है


- गुर्दे की रक्त वाहिकाओं के भीतर थक्के जमना


 संक्रमण जैसे तीव्र पायलोनेफ्राइटिस या सेप्टीसीमिया


-गर्भावस्था में प्लेसेंटा का टूटना या प्लेसेंटा प्रीविया


-मूत्र मार्ग में रुकावट


-कोकीन और हेरोइन सेवन


- गैर-स्टेरायडल सूजन रोधी दवाएं (एनएसएआईडी), कुछ एंटीबायोटिक और रक्तचाप की दवाएं, कंट्रास्ट (डाई), कुछ कैंसर और एचआईवी दवाएं सहित दवाएं




विभाग पर एक नजर


बेड- 107 

डायलिसिस सेंटर- 125

किडनी ट्रांसप्लांट यूनिट बेड-39

ओपीडी प्रति वर्ष- 74 हजार

किडनी ट्रांसप्लांट प्रति वर्ष- 150

वैस्कुलर प्रोसीजर रोज -25

संक्रमण से बचा कर इलाज का खर्च घटा सकती है नर्सेज





 पीजीआई में अंतर्राष्ट्रीय नर्सिंग डे


 


संक्रमण से बचा कर इलाज का खर्च घटा सकती है नर्सेज


भर्ती होने के दौरान बेड शोर और चेस्ट इंफेक्शन की रहती है आशंका


 




संक्रमण से बचा कर इलाज का खर्च कम करने में नर्सेज खास भूमिका निभा सकती है। भर्ती होने के दौरान बेड शोऱ, निमोनिया ( चेस्ट इन्फेक्शन), सहित अन्य की आशंका रहती है। नर्सेज सही समय समय सही तरीका अपना कर संक्रमण से बचा कर एंटीबायोटिक का खर्च और अस्पताल में भर्ती रहने के समय में कमी ला सकती है।  हर 24 घंटे पर मरीज से फीड बैक लें उन्हें कोई नई परेशानी है तो तुरंत उस परेशानी पर भी काम करें। यह बात रविवार को संजय गांधी पीजीआई में इंटरनेशनल नर्सेज डे पर आयोजित समारोह में मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रो. संजय धीराज ने कही।


 प्रो धीराज ने कहा कि सबसे अधिक समय मरीज के पास नर्सेज रहती है जो मरीज को मानसिक रूप से बल दे सकती है। इससे रिकवरी फास्ट होती है। मुख्य नर्सिंग अधिकारी उषा टकरी ने इस वर्ष की थीम अवर नर्सेज अवर फ्यूचर द इकनॉमिक पॉवर ऑफ केयर पर व्याखान देते हुए बताया कि अस्पताल खर्च को कम करने के लिए रेगुलर हैंड हाइजीन, प्रॉपर असेसमेंट बिफोर पेशेंट केयर, काउंसलिंग जरूरी है। हम इस पर विशेष ध्यान देंगे। डीन शालीन कुमार ने यह कहा कि नर्सिंग ऑफिसर को 24 घंटे की डिटेल मरीज की रखनी चाहिए जिससे मरीज को आईसीयू में जाने से पहले रोका जा सके। इस मौके पर


साप्ताहिक समारोह चला जिसमें  मैराथन दौड़,साइंटिफिक सेशन, पोस्टर प्रदर्शनी, क्विज प्रतियोगिता एवं 126 रक्तदान किया।  मुख्य अतिथि पूर्व सीएनओ  लीला मसीह और कार्डियोलॉजिस्ट  प्रो.  सुदीप कुमार सहित अन्य एएनएस नीमा पंत, एसएनओ महेश गुप्ता, एस एन ओ रचना मिश्रा एनएसए अध्यक्ष श्रीमती लता सचान, महामंत्री विवेक सागर और एनएसए की पूर्व अध्यक्ष सीमा शुक्ला ने नर्सेज को सेवा भाव रखने की सीख देते हुए कहा कि यह नौकरी नहीं सेवा है।  रितजा सिंह (डी.एन.एस),  उशेंद्र छत्री (एन.एस), ,  भावना (एस.एन.ओ), रोजिता सुमन(एस.एन.ओ) कार्यक्रम के संचालन में विशेष सहयोग दिय। 


शुक्रवार, 10 मई 2024

थैलेसीमिया से लड़ते हुए पीएचडी कर रही है स्निग्धा



 



नेट पास करने  वाली पहली  थैलेसीमिया पीड़ित बनी स्निग्धा  

1380 यूनिट खून चढ़ाया गया यह जीवन


 थैलेसीमिया पीड़ित 300 बच्चों की देखभाल हो रही है 

 

जीवन रक्षा के लिए अब तक 1380 यूनिट खून चढ़ाना पड़ा और आगे भी खून चढ़ेगा तब तक जीवन रहेगा। गोरखपुर में रहने वाली स्निग्धा चटर्जी को तीन महीने की उम्र में थैलेसीमिया का पता चला। इसी महीने से संजय गांधी परिवार का खून लेकर दो बार चढ़ रहा है। एक बार दो यूनिट खून चढ़ता है। बीमारी से प्रकाशित स्निग्धा ने पढ़ाई रिलीज की इस समय मंजिल में फिल्म कर रही हैं। नेट नेटवर्क लिया गया है। लेक्चर की योग्यता हासिल की गई है। इतनी योग्यता हासिल करने वाली थैलेसीमिया पीड़ित प्रथम प्रदेश की लड़की है।


 


पढ़ाई और सहायता से मिल मंजिल हो सकती है


 


   यह उन लोगों को संदेश देता है जो बीमारी से पीड़ित हैं, बीमारी है तो क्या हुआ है, याद है और परिवार का सहयोग है तो यह लोग जीवन भर कुछ न कुछ हासिल कर सकते हैं जो सामान्य बच्चे हासिल कर सकते हैं। स्निग्धा का कहना है कि मेरे पिता सनत कुमार चटर्जी और मां ने कभी हमें कोई मतलब नहीं बताया जो करना चाहा। हर कदम साथ दिया जिससे यहां हासिल किया जा सके।


 


थैलेसीमिया पीड़ित 300 बच्चों की देखभाल


 


 स्निग्धा अध्ययन के साथ ही गोरखपुर में फाइट अगेंस्ट थैलेसीमिया संस्था भी चल रही है जिसमें 300 से अधिक बच्चों के लिए रक्त की व्यवस्था, लाइफ स्टाइल की प्रति जानकारी के अलावा अध्ययन करना शामिल है।


 


मुख्यमंत्री ने पदस्थापित किया


 


विश्व थैलेसीमिया दिवस के अवसर पर संजय गांधी महोत्सव में आयोजित जागरूकता कार्यक्रम में भाग लेने आई स्निग्धा ने बताया कि 2013 में आईएससी बोर्ड से हाई स्कूल 81 प्रतिशत अंक के साथ पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को सम्मानित किया गया था। 2015 में इंटरनेशनल बिजनेस बोर्ड से 76 फीसदी के करीब हो गए। गोरखपुर विश्वविद्यालय से बीएस, एमए करने के लिए मुख्यमंत्री आदित्य नाथ ने मिशन शक्ति के तहत डिग्री प्राप्त की। 2019 में नेट पर भी इंटरव्यू लिया गया। लेक्चरर बनने की योग्यता मिल गई है। ईश्वर ने चाहा तो कहीं न कहीं शिक्षण कार्य भी मिलेगा।




जागरूकता की है कमी


स्निग्धा का कहना है कि थैलेसीमिया को लेकर लोगों में जागरूकता की कमी है। 50 से अधिक ऐसे परिवार हैं जिनमें पहले बच्चे का जन्म थैलेसीमिया से होता है और उसके बाद दूसरा और तीसरा बच्चा भी थैलेसीमिया से पीड़ित होता है। इस अनुवांशिक बीमारी के माता-पिता दोनों का कैरियर होता है जिससे बच्चे में यह बीमारी होती है। शोध के बाद इस बीमारी का परीक्षण, गर्भस्थ शिशु, शिशु शिशु कक्ष में करा कर ऐसे बच्चों का जन्म लिया जा सकता है।   


 


कई और डिग्रीयाँ


 


इस मशीन पर थैलेसीमिया के मरीज़ मुकेश प्रजापति ने बांसुरी वादन और कविता पाठ किया। विभाग के प्रमुख प्रो. शुभा फेडके ने कई थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों और आलोचकों को सम्मानित करते हुए आगे बढ़ने की शुभ कामना दी।

गुरुवार, 9 मई 2024

अंतर्राष्ट्रीय नर्सेज डे केमौके पर अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैच का आयोजन


 अंतर्राष्ट्रीय नर्सेज डे के मौके पर अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैच का आयोजन

 एस.जी.पी.जी.आई. अंतर्राष्ट्रीय नर्सेज सप्ताह 2024 के दौरान सात दिवसीय क्रिकेट प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। जिसमें 6 टीमों ने भाग लिया और टीम राइजिंग स्टार ने टीम को 40 आक्रमण से हराकर बड़ी जीत हासिल की।

टीम एक्स्ट्रा लार्ज ने पहले बॉलिंग स्टार का फैसला लिया और टीम राइजिंग ने सबसे पहले बल्लेबाजी करते हुए टीम को 111 बॉलिंग स्टार का अजेय लक्ष्य दिया।

टीम राइजिंग स्टार के अनुभवी कैप्टन एस. एन.ओ. क्रांतिकारी नगर एवम निडर उप कप्तान विक्रांत के साथ सरफराज, पवन, सौरभ, फिलिप, केशव, विहान, जीशान, दिखिल, लखन, चंद्र शेखर, अनुराग, कौशल और संजय कुमार ने प्यार और बॉल से अपनी-अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।

फाइनल मैच में केशव शर्मा के साथ साझेदारी करते हुए सरफराज ने 40 रन के साथ 4 विकेट लेकर मैन ऑफ द मैच का खिताब हासिल किया।

विशेषज्ञता है एस.जी.पी.जी.आई. 12 मई को अंतर्राष्ट्रीय नर्सेज दिवस मनाया जा रहा है।

शनिवार, 4 मई 2024

किडनी ट्यूमर की सर्जरी किडनी सुरक्षित रखने के साथ संभव


 किडनी ट्यूमर की सर्जरी किडनी सुरक्षित रखने के साथ संभव




पीजीआई में पूरे हुए 400 से अधिक पार्शियल किडनी ट्यूमर सर्जरी के मामले 



 किडनी में ट्यूमर है तो परेशान मत हो किडनी को बचाते हुए ट्यूमर की सर्जरी संभव है। ट्यूमर यदि किडनी के  संवेदनशील स्थान पर है तो भी किडनी को बचाते हुए ट्यूमर से निजात दिलाना संभव हो गया है। संजय गांधी पीजीआई के यूरोलॉजी विभाग विभाग द्वारा 400 से अधिक पार्शियल किडनी ट्यूमर सर्जरी के मामले पूरे होने पर आयोजित जागरूकता कार्यक्रम किया गया। प्रो. उदय प्रताप सिंह ने देते हुए बताया कि किडनी ट्यूमर मामलों में दस साल में चार गुना बढ़ोत्तरी हुई है। इसके पीछे कारण मोटापा, धूम्रपान, आनुवंशिक कारण हो सकता है। अच्छी बात यह है कि पहले एडवांस ट्यूमर के मामले 70 से 80 फीसदी आते थे लेकिन अब इतने मामले शुरुआती कैंसर के मामले आ रहे हैं। इसके पीछे जरा सी परेशानी होने  अल्ट्रासाउंड कराना है। देखा गया है कि तीन से चार फीसदी लोग ही किसी परेशानी के कारण अल्ट्रासाउंड कराएं और किडनी कैंसर का पता लगा बाकी लोगों एक्सीडेंट कैंसर का पता लगा। विभाग के प्रमुख प्रो. एम एस अंसारी ने बताया कि पार्शियल नेफ्रेक्टोमी के एक फीसदी से कम मामलों में दोबारा कैंसर की आशंका हमारे संस्थान में है जबकि विदेशों में यह चार फीसदी से अधिक देखा गया है।  नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. नारायण प्रसाद, रेडियोथेरेपी विभाग के  प्रो. नीरज रस्तोगी ने फालोअप पर रहने की सलाह दिया। 




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बुधवार, 1 मई 2024

लिवर का प्रोटीन ही बन रहा है लिवर का दुश्मन

 

लिवर का प्रोटीन ही बन रहा है लिवर का दुश्मन




ऑटोइम्यून हैपेटाइटिस से ग्रस्त 157 मरीजों में खोजा कारण और दी लंबी जिंदगी



 लिवर की परेशानी में कारण जानने के लिए आटो इम्यून मार्कर भी रखना होगा नजर




कुमार संजय। लखनऊ


लिवर की खराबी का कारण शराब, मोटापा और हेपेटाइटिस वायरस माना जाता रहा है। संजय गांधी पीजीआई के विशेषज्ञों ने साबित किया है कि लिवर के प्रोटीन खुद लिवर के दुश्मन बन कर लिवर की कोशिकाओं को नष्ट कर देता है जिससे लिवर फेल्योर होता है। संस्थान के विशेषज्ञों ने ऐसे मरीजों को इलाज के लिए नया तरीका भी खोजा है खास तौर पर उन मरीजों में जिनमें स्टेरायड काम नहीं करता है। इसके साथ ही कौन सी एंटीबॉडी लिवर को खराब करता है। लिवर की खराबी के 157 मरीजों पर शोध किया जिसे इंटरनेशनल लेवल पर स्वीकार किया गया है। लिवर की खराबी के यह मरीज 32 से 55 आयु वर्ग के थे। इनमें लिवर के खराबी के आम कारण नहीं थे । इन मरीजों में एंटीन्यूक्लियर एंटीबॉडी, एंटी स्मूथ मसल एंटीबॉडी, एंटी न्यूट्रोफिल साइटोप्लाज्मिक एंटीबॉडी और एंटी माइटोकॉन्ड्रियल एंटीबॉडी का परीक्षण कराया तो देखा कि 88 फीसदी में एंटी न्यूक्लियर एंटीबॉडी, 60 से 68 फीसदी में एंटी स्मूथ मसल एंटीबाडी, 8 से 7 फीसदी में एंटी न्यूट्रोफिल साइटोप्लाज्मिक एंटीबॉडी और 11.7 फीसदी महिलाओं में एंटी माइटोकॉन्ड्रियल एंटीबॉडी लिवर की खराबी के लिए जिम्मेदार है। गैस्ट्रो एन्ट्रोलॉजी विभाग के प्रो. गौरव पाण्डेय के मुताबिक लिवर की खराबी के 35 फीसदी से अधिक लोगों में दूसरे आटोइम्यून डिजीज त्वचा पर चकत्ते, जोड़ों में दर्द, किडनी की परेशानी देखने को मिली।


 


इन्होंने किया शोध


 


 इंपलीकेशन ऑफ जेंडर ऑन द आउटकम इन पेशेंट विथ ऑटोइम्यून हैपेटाइटिस विषय पर शोध क्लीनिकल इम्यूनोलॉजी एंडी रूमेटोलॉजी विभाग के प्रो. विकास अग्रवाल, गैस्ट्रो एन्ट्रोलॉजी विभाग पूर्व विभाग के प्रमुख रहे प्रो. यूसी घोषाल, प्रो. समीर मोहिंद्रा सहित अन्य के साथ किया जिसे नेचर ग्रुप के मेडिकल जर्नल क्यूरेस ने स्वीकार किया।  


 


 


 


यह इलाज रहा कारगर


 


क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी विभाग के प्रो. विकास अग्रवाल के मुताबिक कई ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस के मरीजों में इम्यूनोसप्रेसिव स्टेरायड का प्रतिरोध होता है देखा कि टैक्रोलिमस के साथ स्टेरॉयड देने पर काफी अच्छा परिणाम मिलता है। दोनो रसायन साथ देने से लिम्फोसाइट स्टेरॉयड को रिजेक्ट नहीं कर पाता है। इनमें सीरम आईजी बढा हुआ होता है। हमारे विभाग में ऑटोइम्यून हिपेटाइटस से जुडी जांच उपलब्ध है।

बुधवार, 10 अप्रैल 2024

जिंदगी से जंग जीतने बाद अब मां बनने का इंतजार

 






जिंदगी से जंग जीतने बाद अब मां बनने का इंतजार


 


दस दिन वेंटिलेटर पर किया जीवन के संघर्ष




 


 वेंटीलेटर पर जाने के बाद  जिंदगी की उम्मीद की लौ काफी धीमी हो जाती है । वेंटिलेटर पर जाने के वेंटिलेटर एसोसिएटेड इंफेक्शन सहित कई परेशानी की आशंका रहती है लेकिन किंग जार्ज मेडिकल विवि के विशेषज्ञों के काफी मेहनत से 10 दिन वेंटिलेटर पर जीवन से संघर्ष कर जिंदगी से खुद की लडाई जीतने के साथ गर्भ में पल रहे शिशु को भी जिंदगी मिल गई। अब यह मां बनने के इंतजार कर रही है। आईसीयू से इन्हें छुट्टी दे दी गयी है। लखनऊ की ही रहने वाले 23 वर्षीय राधा देवी  26 महीने से  गर्भवती  है। 13 मार्च से खांसी बुखार और सांस लेने में तकलीफ शुरू हुआ ।


पहले वो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र गई जहां 2 दिन के उपचार के बाद आराम नहीं मिलने से उसे तुरंत क्वीन मेरी हॉस्पिटल केजीएमयू में रेफर कर दिया गया । क्वीन मेरी हॉस्पिटल से उन्हें 16 मार्च को  एनेस्थीसिया विभाग का आईसीयू सीसीयू -2 में शिफ्ट किया गया। सीसीयू के प्रो. विपिन सिंह के मुताबिक  ऑक्सीजन की कम से नाज़ुक स्थिति बनी हुई थी । ऑक्सीजन लेवल बहुत कम होने से माँ और भ्रूण दोनों को जान का खतरा था । इसलिए राधा को तुरंत वेंटिलेटर पर ले गए ।  छाती का एक्सरे कराने पे पाया गया कि दोनों फेफड़े बिलकुल छतिग्रस्त हो गये हैं कारण वायरल निमोनिया था।  ए आर डी एस ( एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम ) कहते हैं। अगर वेंटीलेटर समय से नहीं लगाया गया तो मृत्यु की आशंका थी ।  3 दिन के बाद  18 मार्च को मरीज की ट्रेकियोस्टोमी ( गले में छेद कर के वेंटिलेटर लगाना ) की गई ताकि उसका निमोनिया ठीक होने  में सहायता मिल सके  ।


शुरू के 3 दिन तक 100 प्रतिशत ऑक्सीजन देना पड़ा फिर चौथे दिन से ऑक्सीजन की ज़रूरत कम होने लगी । क़रीब 10   दिन वेंटिलेटर पर रखने के बाद  को 30 मार्च  को वेंटिलेटर हटाया गया और 2 अप्रैल को ट्रेकियोस्टोमी ट्यूब भी निकाल दिया गया । अब मरीज का खाना पीना और सहारे से चलना नियमित रूप से शुरू हो गया है । एनेस्थीसिया विभाग की प्रमुख प्रो.  मोनिका कोहली ने भी पूरे इलाज के दौरान मरीज के स्वास्थ्य की जानकारी लेती रहीं और टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह जटिल इलाज था।   


 


 


 


गर्भावस्था में इलाज होता है जटिल


प्रो. विपिन सिंह ने बताया कि गर्भवती महिला को ठीक करना इसलिए आसान नहीं होता क्योंकि इसमें ब्लड प्रेशर और  ऑक्सीजन लेवल कम होने से माँ के साथ साथ बच्चे के जान का खतरा रहता है।  उपचार के दौरान दवाइयों का चुनाव  बहुत सावधानी से करना होता है क्योंकि  दवाइयाँ बच्चे के विकास में नुकसान कर सकती हैं ।


 


 


ऱाधा के साथ गर्भस्थ शिशु सुरक्षित   


रे इलाज के दौरान गर्भ में पल रहे बच्चे के स्वास्थ्य पे भी ध्यान दिया गया । क़रीब 29 हफ़्ते का बच्चा मां की कोख में अब भी जीवित और सुरक्षित है ।


 


 


इस टीम ने किया इलाज


 


आईसीयू फैकल्टी प्रो. विपिन सिंह ,डा. बी बी कुशवाहा के रेज़िडेंट डॉ स्वाति , डॉ अंकुर, डॉ दानिश डॉ सृष्टि तथा नर्सिंग इंचार्ज निशा और ममता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

गुरुवार, 14 मार्च 2024

पेशाब रोकने से मूत्राशय होता है कमजोर, किडनी पर कुप्रभाव






मोटापा कम करें कम हो जाएगी किडनी परेशानी की आशंका


 


पेशाब रोकने से मूत्राशय होता है कमजोर, किडनी पर कुप्रभाव


 


पीजीआई में विश्व किडनी जागरूकता दिवस पर वाकथान एवं जागरूकता कार्यक्रम


 


मोटापा कम करने के साथ 60 से 70 फीसदी तक किडनी के परेशानी की आशंका कम हो जाती है। मोटापा उच्च रक्तचाप, डायबिटीज की आशंका को बढाता है यही किडनी की परेशानी की आशंका को बढ़ाता है। यह बात संजय गांधी पीजीआई के किडनी रोग विशेषज्ञ प्रो. धर्मेंद्र भदौरिया ने विश्व किडनी दिवस के मौके पर जागरूकता एवं वाकथान मे दिया। यूरोलॉजी एवं किडनी ट्रांसप्लांट विभाग के प्रमुख प्रो. एमएस अंसारी ने कहा कि पेशाब को नहीं रोकना चाहिए। महिलाएं और स्कूल जाने वाले बच्चे साफ वाशरूम न होने के कारण चार से पांच घंटे कई बार पेशाब रोके रखती है। मूत्राशय कमजोर होता है और किडनी पर दुष्प्रभाव पड़ता है। नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. नारायण प्रसाद ने बताया कि किडनी खराब होने पर डायलिसिस और प्रत्यारोपण ही उपाय है । इस इलाज के दौरान संक्रमण और बार –बार भर्ती होना पड़ता है। इलाज काफी महंगा है इसलिए बचाव ही उपाय है। ब्लड प्रेशर 130-80 से अधिक और एचबीए1सी सात फीसदी से अधिक नहीं रहना चाहिए। गुर्दा रोग विशेषज्ञ प्रो. अनुपमा कौल ने कहा कि गर्भावस्था को दौरान किडनी  साथ रक्त दाब पर खास ध्यान रखना चाहिए। यूरोलॉजिस्ट एवं किडनी ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ प्रो. संजय सुरेखा ने कहा कि ट्रांसप्लांट के बाद फालोअप पर रहना चाहिए। नेफ्रोलाजिस्ट के सलाह से दवाएं नियमित लेने से प्रत्यारोपित किडनी लंबे समय तक काम करती है। इस मौके पर डाय मानस रंजन पटेल,डा. रवि शंकर कुशवाहा ने बचाव के तरीके बताएं। इस मौके पर पांच सौ से अधिक किडनी की खराबी प्रभावित मरीजों को इलाज के तमाम पहलुओं पर जानकारी दी गयी। मेडिकल सोशल वर्कर राघवेंद्र सिंह, वैयक्तिक सहायक संतोष कुमार वर्मा, सफाई निरीक्षक रघुनाथ सिंह सहित अन्य लोगों ने मरीजों को हर स्तर पर सहयोग का संकल्प लिए।





 *विश्व किडनी दिवस* 

विश्व किडनी दिवस 14 मार्च को संपूर्ण विश्व में पर्व की तरह मनाया जाता है। इस वर्ष की थीम है "सभी के लिए किडनी स्वास्थ्य: देखभाल और इष्टतम दवा अभ्यास तक समान पहुंच को आगे बढ़ाना"। 

भारत में मधुमेह व उच्च रक्तचाप की बढ़ती घटनाओं के कारण  क्रोनिक किडनी रोग की घटनाओं में 35% की वृद्धि हुई है। एक नए अनुमान से पता चलता है कि क्रानिक किडनी रोग से संबंधित मृत्यु दर 2040 तक मृत्यु का 5वां प्रमुख कारण होगी। सीकेडी की जटिलताओं को रोकने का सबसे अच्छा तरीका सीकेडी की प्रगति को रोकना है। उन्नत अनुसंधान ने हमें उन दवाओं की पहचान करने में मदद की है जो सीकेडी की प्रगति को रोकने में प्रभावी हैं, लेकिन ये दवाएं सीकेडी के शुरुआती चरणों में प्रभावी हैं।

नेफ्रोलॉजी विभाग ने दक्षिण एशिया क्षेत्र में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर जागरूकता अभियान को बढ़ावा देने के लिए इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ नेफ्रोलॉजी और इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ किडनी फाउंडेशन के साथ संयुक्त रूप से इस पहल का आह्वान किया है। हम सभी सीकेडी के उच्च जोखिम वाले लोगों, 50 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग, मधुमेह रोगी, उच्च रक्तचाप, मोटापे से ग्रस्त रोगी, सीकेडी के पारिवारिक इतिहास वाले लोग, लंबे समय से धूम्रपान करने वाले और पथरी रोग से पीड़ित लोगो

को सुझाव देते हैं कि वे हर साल मूत्र की जांच और सीरम क्रिएटिनिन और ग्लोमेरुलर निस्पंदन दर का आकलन करके सीकेडी के लिए खुद को जांचते रहें ।


नेफ्रोलॉजी, यूरोलॉजी और रीनल प्रत्यारोपण विभाग की गतिविधियाँ:


 *किडनी के स्वास्थ्य के लिए वॉकथॉन* 

नेफ्रोलॉजी विभाग ने किडनी के स्वास्थ्य के लिए सुबह 6.30 बजे हॉबी सेंटर से एसजीपीजीआई गेट तक और उसके बाद ईएमआरटीसी के नेफ्रोलॉजी और यूरोलॉजी विभाग तक वॉकथॉन आयोजित की । नेफ्रोलॉजी और यूरोलॉजी संकाय ने हॉबी सेंटर, मुख्य द्वार और ईएमआरटीसी सेंटर में सभा को संबोधित किया। डॉ. अंसारी, एचओडी यूरोलॉजी ने पानी के सेवन के महत्व से अवगत कराया, डॉ. संजय सुरेखा ने कम नमक का सेवन, बहुत सारा पानी, खट्टे फल और हर दिन थोड़ा दूध के साथ गुर्दे की पथरी को रोकने के सुझाव दिए।

 डॉ. अनुपमा कौल ने किडनी के स्वास्थ्य के लिए  वजन कम करने के महत्व के बारे में सुझाव दिए। 

डॉ. भदौरिया ने उपस्थित लोगों को सुरक्षित दवाओं के बारे में बताया। नेफ्रोलॉजी के प्रमुख और इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ नेफ्रोलॉजी के परिषद सदस्य प्रोफेसर नारायण प्रसाद ने बेहतर स्वास्थ्य के लिए आम लोगों को कुछ लक्ष्य दिए हैं

 1. मधुमेह रोगियों  के लिए 7% से कम HBA1c, 

2.हर एक व्यक्ति के लिए 130/80 से कम रक्तचाप,

3.25 से कम बीएमआई, 

4.धूम्रपान व  तंबाकू निषेध  और कम नमक। 

संस्थान के निदेशक प्रोफेसर धीमन ने अपने संदेश में कहा कि संस्थान में किडनी की देखभाल के लिए किसी को भी मना नहीं किया जाएगा।


मरीज के रिश्तेदारों और देखभाल करने वालों का संदेश:

सीकेडी एक दीर्घकालिक समस्या है और रोगी आजीवन इस बीमारी के साथ रहते हैं। कई रोगियों और परिचारकों ने भी अपनी भावनाओं को साझा किया और 50 वर्ष से अधिक आयु वाले उच्च जोखिम वाले लोगों, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, पथरी रोग और गुर्दे की बीमारियों के पारिवारिक इतिहास वाले व्यक्तियों के लिए गुर्दे की बीमारियों की समय पर जांच के लिए अपना सीधा संदेश दिया।


स्वयं मरीज़ों का संबोधन:

किडनी की बीमारियों के साथ कैसे जीना है, इस विषय पर रोगियों ने संदेश दिया और सभी का एक समान विचार था कि बीमारी के इलाज से रोकथाम बेहतर है। किडनी की बीमारियों से 3 से 4 दशकों से अधिक समय तक जीवित रहने वाले मरीजों ने वकालत की कि दीर्घकालिक सफलता के लिए दवा का पालन सबसे महत्वपूर्ण है।


डॉ. प्रसाद ने WKD के इस जागरूकता कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए के प्राथमिक देखभाल चिकित्सकों, वैज्ञानिकों, नर्सों, कॉर्पोरेट स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं, रोगियों, प्रशासकों, स्वास्थ्य-नीति विशेषज्ञों, सरकारी अधिकारियों, नेफ्रोलॉजी से संबंधित संगठनों से हाथ मिलाने और इसमें महत्वपूर्ण योगदान देने की वकालत की।  किडनी स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने के लिए सरकारी नीतियों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है जिससे रोगियों और स्वास्थ्य देखभाल बजट दोनों को बड़ा लाभ हो सकता है।


सीकेडी के लिए एक निरंतर ज्ञान का अभाव है, जो प्राथमिक देखभाल चिकित्सकों, नर्सों, तकनीशियनों और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति निर्माताओं के बीच स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों के सभी स्तरों पर प्रदर्शित होता है। फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्मों के बेलगाम प्रसार से यह और बढ़ गया है। इन प्लेटफार्मों पर अक्सर गैर-वैज्ञानिक सामग्री का व्यापक प्रसार हुआ, विशेष रूप से कई हानिकारक जड़ी-बूटियों, शरीर निर्माण के लिए कई एलर्जेन प्रोटीन जो वास्तव में वैज्ञानिक नहीं है अपितु महंगे व हानिकारक है। अल्पज्ञ जनता और मरीज़ों को वैज्ञानिक रूप से प्रामाणिक और मान्य जानकारी नहीं मिल पाती। यह भारत जैसे निम्न-मध्यम आय वाले देशों के लिए विशेष रूप से सच है जहां संसाधनों की मांग की तुलना में संसाधन सीमित हैं और लोगों ने गैर-प्रमाणित उपचारों को चुना जो उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं, कभी-कभी मृत्यु का कारण बनते हैं।

इस अवसर पर दो महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता है:

सीकेडी का शीघ्र निदान

इष्टतम दवा अभ्यास यह सुनिश्चित करेगा कि ये दवाएं जो प्रगति को धीमा कर देती हैं, व्यापक आबादी तक पहुंचें।


सभी के लिए किडनी स्वास्थ्य: 

अपनी किडनी को हानिकारक दवाओं, दर्द निवारक दवाओं और एंटीबायोटिक दवाओं के अनावश्यक उपयोग से बचाएं, और प्रगति को धीमा करने के लिए उपयोगी दवाओं का उपयोग करें।


 



सोमवार, 11 मार्च 2024

इसनोफिल की जांच से चलेगा एलर्जी की आशंका का पता

 


पीजीआई में इम्यूनो एलर्जी कॉन्क्लेव

 

इसनोफिल की जांच से चलेगा एलर्जी की आशंका का पता

 

बदलता मौसम और प्रदूषण एलर्जी का बड़ा कारण

 

 

बीस रुपए में होने वाली जांच इसनोफिल से एलर्जी के आशंका का पता लगता है लेकिन दूसरे कारणों से भी यह बढ़ा हो सकता है। 50 फीसदी मामलों में इसनोफिल बढ़े होने का मतलब है कि एलर्जी है जिसका मैनेजमेंट संभव है। एलर्जी के लक्षण नहीं है तो दूसरे कारणों से परजीवी का संक्रमण , रक्त विकार के कारण पर भी ध्यान देने की जरूरत है। इसनोफिल के साथ सीरम आईजीई का बढ़ा स्तर भी एलर्जी की पुष्टि करता है। यह जानकारी संजय गांधी पीजीआई में आयोजित इम्यूनो एलर्जी कॉन्क्लेव में संस्थान के  प्रो. विकास अग्रवाल और अपोलो मेडिक्स के डा. अनुपम वाखूल ने दी विशेषज्ञों ने दी। बताया कि दवा, धूल, बदलते मौसम, किसी को छूने सहित अन्य कारणों से फेफड़े, त्वचा, नाक सहित अन्य अंगों में एलर्जी हो सकती है। देखा गया है कि बदलता मौसम और प्रदूषण ( वायु कण, गैस) से लोग अधिक एलर्जी के शिकार होते हैं।  किसी वस्तु से भी एलर्जी हो सकती है। ऑस्ट्रेलिया से आए डा. प्रवीण हिसारिया ने बताया  एलर्जी इम्यूनोथेरेपी आज कल प्रचलित हो रहा है । इसमें जिस वस्तु से एलर्जी होती है इस वस्तु को थोड़ी मात्रा समय अंतराल पर नाक, मुंह या इंजेक्शन के दावारा थोडी मात्रा में दिया जाता है जिससे व्यक्ति में वस्तु के प्रति टॉलरेंस पैदा हो जाता है। आयोजन सचिव डा. कुनाल ने बताया कि दवा के कारण होने वाली एल्रजी कई बार घातक होती है जिसके इलाज में इम्यूनोसप्रेसिव भी देने की जरूरत पड़ती है ।   

 

 

कारण

हजारों एलर्जेन हैं जो एलर्जी का कारण बन सकते हैंलेकिन सबसे आम में शामिल हैं:

 

-वायुजनित एलर्जी: धूल और पराग।

-पशु रोष: पशुओं की त्वचा से त्वचा कोशिकाओं जैसी सामग्री निकलती है। मानव रूसी के समान।

-खाद्य एलर्जन: शैल-मछलीडेयरी उत्पादनट और/या --बीज अंडे और मछली।

-एस्पिरिन और पेनिसिलिन।

-कीड़े के डंक: बरैया और मधुमक्खियों।

पौधे: घास और चुभने वाले बिच्छू।

पदार्थ: लेटेक्स।

 

यह है लक्षण

-त्वचा के चकत्ते

-लाल खुजली वाली आंखें

-खांसी

- सांस लेने में घरघराहट

-छींक आना

-दमे का अटैक

-पेट में दर्द और उल्टी

एक इंजेक्शन ने डेढ़ महीने रहेगी एलर्जी से मुक्ति

 


एक इंजेक्शन ने डेढ़ महीने रहेगी एलर्जी से मुक्ति

 

पीजीआई में इम्यूनो एलर्जी कॉन्क्लेव 2024  आज

 

एलर्जी से ग्रस्त लोगों को रोज दवा खानी होती है। इन दवाओं से नींद आने के साथ ही सुस्ती की परेशानी होती है लेकिन अब रोज गोली खाने के झंझट से छुटकारा मिल सकता है। मोनोक्लोनल एंटीबॉडी( बायोलॉजिक्स) दवाएं आ गयी है जो इंजेक्शन के रूप में है इनका एक डोज देने से एक से 1.5 महीने तक एलर्जी की परेशानी से मुक्ति मिल सकती है। संजय गांधी पीजीआई के क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी विभाग की के मुताबिक 15 फीसदी से अधिक लोग एलर्जी से ग्रस्त रहते हैं। यह फेफड़े, त्वचा, नाक सहित अन्य हो सकती है। इसका इलाज भी अलग –अलग विशेषज्ञ करते हैं। एलर्जी की विशेषज्ञता की शाखा विकसित नहीं है। इसमें इम्यूनोलॉजिस्ट की अहम भूमिका हो सकती है। इसी को लेकर विभाग दो दिवसीय इम्यूनो एलर्जी कॉन्क्लेव 2024 का आयोजन इंडियन कॉलेज आफ एलर्जी, अस्थमा एंड एप्लाइड इम्यूनोलॉजी के सहयोग से   कर रहा है। इसमें देश से हर विधा के विशेषज्ञ शामिल हो रहे है । क्लीनिकल इम्यूनोलॉजिस्ट  प्रो. विकास अग्रवाल और  प्रो. अनुपम वाखलू के मुताबिक कोशिश की जा रही है कि एक विशेषज्ञता के अंदर सभी प्रकार की एलर्जी का मैनेजमेंट संभव हो सके। एलर्जी मैनेजमेंट के लिए एलर्जिक इम्यूनो थेरेपी और मोनोक्लोनल एंटीबॉडी काफी कारगर साबित हो रही है। आयोजन सचिव डा. कुनाल चंदवार ने बताया कि  कॉन्क्लेव में ऑस्ट्रेलिया से डा. प्रवीण हिसारिया, अहमदाबाद से डा. पूजा श्रीवास्तव, पल्मोनरी विशेषज्ञ प्रो. राजेंद्र प्रसाद, ओपी चौधरी से डा. सुनील दवड़घाव,  सहित अन्य विशेषज्ञ एलर्जी के कई पहलू पर जानकारी देंगे।

मंगलवार, 5 मार्च 2024

बरसात और ओला को लेकर दुखी नरेंद्र जी ने माता से की प्रार्थना

 





नरेंद्र सिंह यादव माता काली के ग्रहस्त भक्त हैं।उनका कहना है कि माँ काली की उन पर विशेष कृपा है,श्री नीमकरोरी जी महाराज,स्वामी रामकृष्ण परमहंस उनके आदर्श हैं।वे किसी चमत्कार का दावा तो नहीं करते हैं लेकिन वे जिन लोगों के लिये प्रार्थना करते हैं ,माँ काली उन्हें स्वीकार करती है,इसी कड़ी में बीते कल दिनांक 3/03/2024 समय सायं 4.30 बजे अपने रायबरेली रोड लखनऊ स्थित आवास पर उन्होने माँ काली से ओलबृश्टि और बेमौसम  बरसात रोकने के लिये प्रार्थना का अनुष्ठान किया,जिसको फेसबुक लाइव करके लोगों से प्रार्थना की अपील भी की, जिससे किसानों की फसल और जन और अन्य जीवजन्तुओं की हानि को रोका जा सके। इसको चमत्कार समझें या संयोग कल से ओलाब्रश्टि और बारिश थमचुकी है,और मौसम ठीक है।

शुक्रवार, 1 मार्च 2024

मुंबई से काठमांडू तक लोगों को अंगदान के लिए जागरूक कर रहे विनोद का पीजीआई में स्वागत

 



अंगदान व रक्तदान कर जरूरत मंद लोगों का जीवन बचाएं 


-मुंबई से काठमांडू तक लोगों को अंगदान के लिए जागरूक कर रहे विनोद का पीजीआई में स्वागत 


जरूरतमंदों का जीवन बचाने के लिए रक्तदान और अंगदान जैसे समाजिक कार्यों से लोगों को जुड़ना चाहिए। स्वस्थ्य युवाओं एवं बड़ों को देहदान, अंगदान व रक्तदान के लिए प्रेरित एवं प्रोत्साहित करने की जरूरत है। एक व्यक्ति चार से पांच लोगों को जीवन दे सकता है। यह बातें शुक्रवार को पीजीआई के नेफ्रोलोजी विभाग के प्रमुख डॉ. नारायण प्रसाद और यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. एमएस अंसारी ने संस्थान के मुख्य गेट पर आयोजित अंगदान जागरूकता कार्यक्रम में कहीं। मुंबई से काठमांडू तक बाइक से अंगदान को लेकर लोगों को जागरूक करने जा रहे नर्मदा किडनी फाउंडेशन के सदस्य मुंबई निवासी विनोद के पीजीआई पहुंचने पर स्वागत किया गया। शुक्रवार को पीजीआई के मुख्य गेट से डॉ. नारायण प्रसाद ने विनोद को हरी झंडी दिखाकर रावाना किया। हालांकि गुर्दा प्रत्यारोपण करा चुके विनोद लोगों को अंगदान के लिए जागरूक कर रहे हैं। 

 डॉ. नारायण प्रसाद ने कहा कि दिल, गुर्दा, लिवर पैंक्रियाज आंत और फेफड़ों के अलावा त्वचा,  अस्थि, अस्थि मज्जा, कार्निया, कारटिलेज , माँसपेशिया आदि का प्रत्यारोपण सम्भव है। इस मौके पर रेजिडेंट, मरीज, तीमारदार और स्टाफ के लोग मौजूद रहे।