बुधवार, 21 मई 2025

"Why would anyone join a government medical college with a salary that is ₹30,000 less?"

 


"Why would anyone join a government medical college with a salary that is ₹30,000 less?"


Filling faculty positions in Uttar Pradesh’s government medical colleges has become a major challenge for the Department of Medical Education. Despite offering preferred postings to selected Assistant Professors, most are reluctant to join.


Key Highlights:


Low Turnout for Counseling:

Out of 43 selected Assistant Professors called for counseling on Tuesday, only 8 turned up.


Major Absenteeism Identified:

An April review found that 87 selected candidates had not yet joined. Fresh counseling was held on May 20–21 to encourage them with location choices.


Counseling Results (May 20):


5 chose BRD Medical College, Gorakhpur


1 each opted for Prayagraj, Jhansi, and Kanpur



Main Reasons for Reluctance:


Lack of resources and lower salary in state medical colleges


Institutions like KGMU, SGPGI, and RMLIMS offer up to ₹30,000 higher salary, better research opportunities, and modern infrastructure


Complaints about political interference and inadequate facilities in many government colleges



Government's Appeal:

Deputy CM Brajesh Pathak urged doctors to see this not just as a job but as a service opportunity to contribute to state healthcare development


Next Steps:

Another 44 Assistant Professors are called for counseling on Wednesday. If they also refuse to join, a final list will be prepared for further action.



> Conclusion:

Mere selection is not enough. Providing competitive facilities and a conducive work environment is essential to attract and retain qualified professionals in public service.




30000 कम वेतन तो क्यों ज्वाइन करेंगे सरकारी मेडिकल कॉलेज में नौकरी





 मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी की भर्ती बनी चुनौती, मनचाही तैनाती के बावजूद नहीं मिल रही सहमति

वेतन-भत्तों और संसाधनों की कमी से चिकित्सक उदासीन, पहले दिन 43 में से सिर्फ 8 विशेषज्ञ पहुंचे काउंसिलिंग में


प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी पदों को भरना चिकित्सा शिक्षा विभाग के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। लोक सेवा आयोग से चयनित असिस्टेंट प्रोफेसरों को मनचाही तैनाती की पेशकश के बावजूद वे कार्यभार ग्रहण करने से कतरा रहे हैं। मंगलवार को काउंसिलिंग के लिए बुलाए गए 43 में से सिर्फ आठ विशेषज्ञ ही पहुंचे।


चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण महानिदेशालय ने अप्रैल में जांच कराई थी, जिसमें पता चला कि चयनित 87 असिस्टेंट प्रोफेसरों ने अब तक कार्यभार नहीं ग्रहण किया है। इसके बाद 20 और 21 मई को दोबारा काउंसिलिंग आयोजित की गई है ताकि उन्हें उनकी पसंद के कॉलेजों में नियुक्ति दी जा सके। मंगलवार को हुई काउंसिलिंग में सिर्फ आठ विशेषज्ञ ही आए, जिनमें से पांच ने बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर, जबकि प्रयागराज, झांसी और कानपुर के लिए एक-एक ने सहमति दी।


मुख्य वजह: संसाधनों की कमी और वेतन में अंतर

कार्यभार ग्रहण न करने वाले असिस्टेंट प्रोफेसरों का कहना है कि केजीएमयू, एसजीपीजीआई और लोहिया संस्थान जैसे प्रतिष्ठानों की तुलना में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में वेतन-भत्ते व संसाधनों की भारी कमी है। इन संस्थानों में करीब 30 हजार रुपये अधिक वेतन, बेहतर शोध सुविधाएं और तकनीकी उन्नयन के अधिक अवसर मिलते हैं। वहीं, राजकीय और स्वशासी मेडिकल कॉलेजों में सुविधाओं का अभाव और राजनीतिक हस्तक्षेप ज्यादा होने की बात कही जा रही है।


सरकार की अपील: इसे सिर्फ नौकरी नहीं, सेवा समझें

राज्य सरकार का कहना है कि वह फैकल्टी सदस्यों के हितों को लेकर गंभीर है और संसाधनों में सुधार किए जा रहे हैं। उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने अपील की कि असिस्टेंट प्रोफेसर इसे सिर्फ नौकरी के रूप में न देखें, बल्कि प्रदेश के स्वास्थ्य क्षेत्र के विकास में योगदान के अवसर के रूप में स्वीकार करें।


अंतिम सूची बनेगी

बुधवार को 44 अन्य असिस्टेंट प्रोफेसरों को काउंसिलिंग के लिए बुलाया गया है। चिकित्सा शिक्षा विभाग के अनुसार, यदि वे भी कार्यभार ग्रहण नहीं करते हैं तो अंतिम सूची तैयार की जाएगी और उसके अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।


यह स्थिति दर्शाती है कि केवल चयन पर्याप्त नहीं है, बल्कि बेहतर सुविधाएं और अनुकूल कार्य वातावरण देना भी उतना ही जरूरी है, जिससे योग्य विशेषज्ञ राज्य की सेवा में आ सकें।


रविवार, 18 मई 2025

PGI Experts from Five Departments Bring Relief to Narendra's Family

 

PGI Experts from Five Departments Bring Relief to Narendra's Family

Modern diagnostic tools and clinical experience offer timely relief to patients


Voice gradually faded, fear replaced worry

By Kumar Sanjay, Lucknow


Life came to a standstill for 74-year-old Narendra Kumar, a resident of Kohugada village in Sant Kabir Nagar district, about a month ago. His voice had started to weaken gradually. Initially, the family thought it was a minor infection. However, after consulting several doctors without any improvement, worry gave way to fear.


An endoscopy of the throat revealed a lump beneath the voice box. Based on its appearance and symptoms, doctors feared it could be cancer—a diagnosis that struck the rural family like a bolt of lightning.


A team of specialists from five departments at Sanjay Gandhi Postgraduate Institute of Medical Sciences (SGPGI) came together to assess the case using advanced technology and extensive clinical experience. The team included Prof. Amit Keshari (Neuro-Otology), Prof. Vikas Agarwal (Clinical Immunology), Prof. Zafar Niyaz (Radiology), Prof. Manish Ora (Nuclear Medicine), and Prof. Manoj Jain (Histopathology).


According to the specialists, treatment could not proceed without first identifying the nature of the lump. The initial biopsy revealed hyperplasia—an abnormal increase in cell growth. While cancer was not confirmed, the suspicion remained. This led to a plan for a CT-guided biopsy and a PET (Positron Emission Tomography) scan.


Given the sensitive location of the lump, Prof. Zafar Niyaz conducted the biopsy with special care, and the PET scan was performed under the supervision of Prof. Manish Ora.


The reports brought unexpected relief—it was not cancer but an autoimmune condition. This news brought a wave of joy and hope to Narendra’s family. Not only did the experts identify the correct diagnosis, but they also initiated treatment to restore his voice and overall health.


According to the doctors, even if it had been cancer, it was at an early stage and could have been effectively treated with radiotherapy. Conditions like this are often linked to autoimmune diseases such as sarcoidosis, which is why a thorough investigation of every symptom is critical.


Narendra’s son, Anurag, said, “The past month felt like a mountain we had to climb, but the PGI team gave us strength and hope.”


Experts emphasize that timely diagnosis and awareness are crucial to saving lives. Whether it's cancer or another complex condition, the earlier the treatment begins, the greater the chances of success.


पीजीआई के पांच विभागों के विशेषज्ञों ने लौटाई नरेंद्र के परिवार में मुस्कान

 



पीजीआई के पांच विभागों के विशेषज्ञों ने लौटाई नरेंद्र के परिवार में मुस्कान

आधुनिक जांच तकनीक और अनुभव से मरीजों को मिल रही राहत
धीरे-धीरे दबने लगी आवाज, चिंता ने डर का रूप लिया

कुमार संजय, लखनऊ

संत कबीर नगर जिले के ग्राम कोहूगाड़ा निवासी 74 वर्षीय नरेंद्र कुमार की जिंदगी एक महीने पहले थम-सी गई थी। उनकी आवाज़ धीरे-धीरे दबने लगी थी। परिवार ने सोचा, यह सामान्य संक्रमण है, लेकिन कई डॉक्टरों को दिखाने के बावजूद राहत नहीं मिली, तो चिंता डर में बदल गई।

गले की एंडोस्कोपी में वॉइस बॉक्स के नीचे गांठ का पता चला। गांठ की स्थिति और लक्षणों को देखकर डॉक्टरों ने कैंसर की आशंका जताई। यह खबर नरेंद्र के ग्रामीण परिवार पर बिजली बनकर गिरी।

संजय गांधी पीजीआई के पांच विभागों के विशेषज्ञों ने आधुनिक तकनीक और अनुभव से इस केस की गंभीरता को समझा। इसमें प्रो. अमित केशरी (न्यूरो ओंटोलॉजी), प्रो. विकास अग्रवाल (क्लीनिक इम्यूनोलॉजी), प्रो. जफर नियाज़ (रेडियोलॉजी), प्रो. मनीष ओरा (न्यूक्लियर मेडिसिन) और प्रो. मनोज जैन (हिस्टोपैथोलॉजी) शामिल रहे।

विशेषज्ञों के मुताबिक गांठ की प्रकृति स्पष्ट किए बिना इलाज संभव नहीं था। शुरुआती बायोप्सी में हाइपरप्लासिया मिला — यानी कोशिकाओं की असामान्य वृद्धि। हालांकि कैंसर की पुष्टि नहीं हुई, लेकिन आशंका बनी रही, जिसके चलते सीटी-गाइडेड बायोप्सी और पॉज़िट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी (पेट) स्कैन की योजना बनाई गई।

गांठ की संवेदनशील स्थिति को देखते हुए प्रो. जफर नियाज़ ने विशेष सतर्कता के साथ बायोप्सी की और प्रो. मनीष ओरा के निर्देशन में पेट स्कैन कराया गया।

रिपोर्ट में सामने आया कि यह कैंसर नहीं, बल्कि एक प्रकार की ऑटोइम्यून बीमारी है। यह खबर पूरे परिवार के लिए राहत लेकर आई। विशेषज्ञों ने न सिर्फ बीमारी की पहचान की, बल्कि नरेंद्र की आवाज और सेहत बहाल करने का इलाज भी शुरू कर दिया।

विशेषज्ञों के अनुसार अगर यह कैंसर होता, तो भी यह प्रारंभिक अवस्था में था और केवल रेडियोथेरेपी से ठीक किया जा सकता था। ऐसी बीमारियां सारकॉइडोसिस जैसे ऑटोइम्यून रोगों से जुड़ी हो सकती हैं, इसलिए हर पहलू की जांच जरूरी है।

नरेंद्र के बेटे अनुराग ने कहा, “पिछला एक महीना हमारे लिए पहाड़ जैसा था, लेकिन पीजीआई टीम ने हमें हौसला दिया।”

विशेषज्ञ मानते हैं कि समय पर इलाज और जागरूकता से ही जिंदगियां बच रही हैं। चाहे कैंसर हो या कोई और जटिलता — जितनी जल्दी इलाज शुरू हो, सफलता की संभावना उतनी अधिक होती है

शनिवार, 17 मई 2025

50 फ़ीसदी को नहीं पता कि वह है हाई बीपी के शिकार










 एसजीपीजीआई लखनऊ में विश्व उच्च रक्तचाप दिवस पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित



संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई), लखनऊ में विश्व उच्च रक्तचाप दिवस के अवसर पर एक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम की थीम थी—"उच्च रक्तचाप आपके दरवाजे पर दस्तक दे सकता है, लेकिन यह आपकी पसंद है कि आप इसे अंदर आने दें या नहीं।"


यह आयोजन अस्पताल प्रशासन, कार्डियोलॉजी और सामान्य अस्पताल विभागों के संयुक्त प्रयास से हुआ। मुख्य अतिथियों में प्रो. देवेंद्र गुप्ता (सीएमएस), डॉ. आदित्य कपूर (कार्डियोलॉजी विभागाध्यक्ष), डॉ. पियाली भट्टाचार्य, डॉ. अंकित साहू और डॉ. सौरभ सिंह अस्पताल प्रशासन विभाग के प्रमुख प्रोफेसर राजेश हर्षवर्धन रहे।


कार्डियोलॉजी की सहायक प्रोफेसर डॉ. अर्पिता कठेरिया ने "उच्च रक्तचाप को समझना: साइलेंट किलर" विषय पर व्याख्यान दिया, जिसमें इसकी गंभीरता, लक्षणहीनता और नियंत्रण के उपायों पर जानकारी दी गई।

बताया कि लगातार बीपी बढ़े होने पर किडनी खराब हो सकती है ब्रेन स्ट्रोक हो सकता है और हार्ट अटैक भी पड़ सकता है

कार्यक्रम के अंत में एक प्रश्नोत्तरी भी आयोजित की गई जिसमें डॉ. अक्षिता, वैष्णवी, कृतिका और अनमोल ने भाग लिया। इसे मोबाइल क्यूआर कोड के माध्यम से इंटरैक्टिव रूप में प्रस्तुत किया गया।


विश्व स्तर पर 12800लाख  से अधिक वयस्क उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं, जिनमें से 50 फीसदी को इसकी जानकारी नहीं होती। भारत में हर तीसरा वयस्क इसका शिकार है। डॉ. प्रेरणा कपूर ने नियमित जांच और समय पर इलाज की आवश्यकता पर बल दिया।


कार्यक्रम में युवाओं में बढ़ते तनाव, खराब जीवनशैली और उनके स्वास्थ्य पर प्रभाव पर भी चिंता व्यक्त की गई।

गुरुवार, 15 मई 2025

प्रो हर्षवर्धन बने पीजीआई के एम एस

 


प्रो हर्षवर्धन बने पीजीआई के एम एस 


अस्पताल प्रशासन विभाग के प्रमुख प्रोफेसर राजेश हर्षवर्धन को संस्थान का चिकित्सा अधीक्षक बनाया गया है निदेशक प्रोफेसर आरके धीमान ने इस आशय का आदेश आज जारी किया। प्रोफेसर हर्षवर्धन ने आज ही शाम को कार्यभार ग्रहण कर लिया। प्रोफेसर हर्षवर्धन अंगदान को बढ़वा देने, हॉस्पिटल वेस्ट मैनेजमेंट सहित कई संस्थान के कार्यों को लगन से पूरा कर रहे हैं। 

 चिकित्सा अधीक्षक (Medical Superintendent) का कार्य एक सामान्य अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक की तुलना में कहीं अधिक जटिल और व्यापक होता है।


1. अस्पताल प्रशासन का नेतृत्व:


ओपीडी, आईपीडी, आपातकालीन, ऑपरेशन थिएटर, आईसीयू आदि विभागों के समन्वय और संचालन की निगरानी।


अस्पताल में प्रतिदिन आने वाले हजारों मरीजों के लिए सुव्यवस्थित चिकित्सा सेवाएं सुनिश्चित करना।


डॉक्टरों, नर्सों, पैरामेडिकल स्टाफ, टेक्नीशियन, सफाईकर्मी आदि की कार्यप्रणाली का पर्यवेक्षण।



2. उच्च स्तरीय चिकित्सा सेवाओं की देखरेख:


सुपर-स्पेशलिटी और मल्टी-स्पेशलिटी सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करना।


मरीजों को समय पर उचित उपचार और रेफरल सेवाएं उपलब्ध कराना।



3. आपातकालीन और आपदा प्रबंधन:


किसी भी राष्ट्रीय आपदा, महामारी (जैसे कोविड-19), या विशेष स्थिति में अस्पताल की त्वरित प्रतिक्रिया का संचालन।


आपातकालीन दवाओं और सुविधाओं की उपलब्धता बनाए रखना।



4. प्रशासनिक और वित्तीय प्रबंधन:


अस्पताल के बजट, संसाधन आवंटन और उपयोग की निगरानी।


सरकारी नीतियों के अनुसार अस्पताल संचालन सुनिश्चित करना।



5. कानूनी और नैतिक दायित्व:


मरीजों के अधिकारों, गोपनीयता और मेडिकल एथिक्स का पालन कराना।


RTI, जनहित याचिका (PIL), मानवाधिकार आयोग, या अदालतों से संबंधित मामलों का उत्तरदायित्व निभाना।



6. स्वास्थ्य सेवाओं का नवाचार और डिजिटलाइजेशन:


ई-हॉस्पिटल प्रणाली, डिजिटल रिकॉर्ड, टेलीमेडिसिन आदि के संचालन में योगदान।


गुणवत्ता सुधार (Quality Improvement) और NABH/NABL जैसे मानकों की निगरानी।



7. शिक्षा और प्रशिक्षण में सहयोग:




मंगलवार, 13 मई 2025

पीजीआई में उन्नत नई तकनीक से 70 वर्षीय बुजुर्ग को नई ज़िंदगी मिली

 




दिल की डोर फिर बंधी” – पीजीआई में उन्नत नई तकनीक से 70 वर्षीय बुजुर्ग को नई ज़िंदगी मिली


  सांसें साथ छोड़ रही थीं और हर कदम पर थकान घेर लेती थी… लेकिन डॉक्टरों ने मुझे एक और मौका दिया, जीने का।” – यह शब्द हैं उस 70 वर्षीय बुजुर्ग मरीज के, जिनकी ज़िंदगी संजय गांधी पीजीआई के डॉक्टरों की मेहनत और नई चिकित्सा तकनीक मिट्रा क्लिप  की बदौलत फिर मुस्कुरा उठी।


इस बुजुर्ग मरीज को दिल की गंभीर बीमारी थी – माइट्रल रिगर्जिटेशन, जिसमें हृदय का माइट्रल वाल्व ठीक से बंद नहीं होता, जिससे खून का बहाव उल्टा होने लगता है। इसके साथ ही उन्हें किडनी की बीमारी और पहले स्ट्रोक की भी शिकायत थी। ऐसे में खुली सर्जरी करना बहुत जोखिम भरा था। हर पल उनके जीवन पर संकट मंडरा रहा था।


 कार्डियोलॉजी टीम — प्रो. रूपाली खन्ना, प्रो. सत्येन्द्र तिवारी, प्रो. आदित्य कपूर, प्रो अंकित साहू और डॉ. हर्षित खरे — ने हार नहीं मानी। उन्होंने मिट्रा क्लिप नामक एक अत्याधुनिक और न्यूनतम चीरा-युक्त तकनीक के जरिए मरीज की माइट्रल वाल्व की मरम्मत की।


प्रो. रूपाली खन्ना ने बताया कि इस मरीज की स्थिति बेहद नाजुक थी, परंतु इस तकनीक ने बिना छाती खोले, बस एक छोटी सी प्रक्रिया के ज़रिए, दिल की मरम्मत कर दी।



इस प्रक्रिया के दौरान एनेस्थीसिया विभाग — प्रो. प्रभात तिवारी, प्रो. आशीष कनौजिया और डॉ. लारीब — की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण रही।


22 अप्रैल 2025 को की गई यह प्रक्रिया सफल रही। मरीज कुछ ही दिनों में अपने पैरों पर चलने लगे और अस्पताल से मुस्कराते हुए घर लौटे। दो हफ्तों की फॉलो-अप में उनकी हालत में अभूतपूर्व सुधार देखा गया — न सांस फूल रही थी, न दिल बैठता था।


मरीज ने भावुक होकर कहा, “मैं संस्थान का तहेदिल से शुक्रगुज़ार हूं। उन्होंने न केवल मेरी जान बचाई, बल्कि मुझे फिर से ज़िंदगी जीने की उम्मीद दी। अब हर सुबह नई लगती है संस्थान के निदेशक प्रो. आर.के. धीमान ने बधाई दी है।

सोमवार, 12 मई 2025

युद्ध कोई बॉलीवुड फिल्म नहीं, यह एक गंभीर

 



इससे पहले मैंने भी कहा था युद्ध कोई मनोरंजन का विषय नहीं है और आज यही बात सेवा के प्रमुख ने भी गई कुछ लोग तो ऐसे बतियाते हैं की आर पार कर देना चाहिए था सुबह पाकिस्तान का नाम नहीं रहेगा यह सब अनर्गल प्रलाप वही लोग करते हैं आगे आप समझ जाइए,,,,,,


युद्ध कोई बॉलीवुड फिल्म नहीं, यह एक गंभीर मामला है: जनरल नरवणे


पुणे। भारत और पाकिस्तान के बीच "ऑपरेशन सिंदूर" के दौरान संघर्षविराम और युद्ध की संभावनाओं पर पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने रविवार को एक कार्यक्रम में महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि युद्ध कोई रोमांटिक बॉलीवुड फिल्म नहीं है, बल्कि यह एक अत्यंत गंभीर और दुखद अनुभव होता है, जिसे अंतिम विकल्प के रूप में ही अपनाना चाहिए।


इंस्टीट्यूट ऑफ कॉस्ट अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए जनरल नरवणे ने कहा, “युद्ध रोमांच नहीं, त्रासदी है। यह कोई फिल्मी दृश्य नहीं होता, जहां अंत में सब ठीक हो जाता है। वास्तविक जीवन में युद्ध की कीमत आम नागरिकों को चुकानी पड़ती है, खासकर सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वालों को।”


उन्होंने आगे कहा कि सीमावर्ती गांवों में रहने वाले नागरिक, विशेषकर बच्चे, गोलाबारी के खौफनाक दृश्य देखते हैं। “उन्हें रातों में आश्रय स्थलों में भागना पड़ता है। कई लोगों ने अपने प्रियजनों को खोया है, और यह दुख पीढ़ियों तक उनके जीवन पर असर डालता है। कुछ लोग पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) जैसी मानसिक बीमारियों से भी पीड़ित हो जाते हैं।”


जनरल नरवणे ने यह भी कहा कि यदि युद्ध हम पर थोपा जाता है, तो सेना को अपना कर्तव्य निभाना होगा, लेकिन यह कभी भी हमारी पहली पसंद नहीं होनी चाहिए। “एक सैनिक के रूप में यदि मुझे आदेश दिया जाता है, तो मैं युद्ध में जाऊँगा, लेकिन मेरी पहली प्राथमिकता हमेशा कूटनीति होगी।”


 डीआरडीओ के पूर्व अध्यक्ष डॉ. जी. सतीश रेड्डी ने भी ऑपरेशन सिंदूर और देश की बढ़ती रक्षा आत्मनिर्भरता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “इस युद्ध में भारत ने कई स्वदेशी तकनीकों का सफलतापूर्वक उपयोग किया। एंटी-ड्रोन सिस्टम जैसे उपकरणों ने पाकिस्तान की ओर से आने वाले कई ड्रोनों को नष्ट करने में अहम भूमिका निभाई।”


डॉ. रेड्डी ने बताया कि ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों ने भी इस संघर्ष में अपनी सटीकता और विश्वसनीयता को साबित किया है। उन्होंने कहा, “स्वदेशी विकास और उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करने से भारत की विदेशी रक्षा तकनीक पर निर्भरता कम हो रही है, और यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ा कदम है।”


कार्यक्रम में दोनों पूर्व अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि युद्ध कोई उत्सव नहीं है, और इसका इस्तेमाल केवल तब होना चाहिए जब हर शांतिपूर्ण प्रयास विफल हो जाए।

ल्यूपस पर विजय, जीवन का जश्न"

 

"ल्यूपस पर विजय, जीवन का जश्न"


सही समय पर सही इलाज से लुपस के साथ मिल सकती है अच्छी जिंदगी


विश्व ल्यूपस दिवस पर जागरूकता आयोजन



 विश्व ल्यूपस दिवस के उपलक्ष्य में क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी और रूमेटोलॉजी फाउंडेशन द्वारा क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी और रूमेटोलॉजी विभाग के सहयोग से "इनस्पायर ल्यूपस इंडिया" शीर्षक से एक विशेष जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य ल्यूपस रोग के प्रति जनसामान्य में जागरूकता फैलाना, मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करना और इस रोग से जूझ रहे रोगियों की संघर्ष यात्रा का सम्मान करना था।


कार्यक्रम में  विभाग की प्रमुख विशेषज्ञ प्रोफेसर अमिता अग्रवाल और प्रोफेसर रुद्रा ने ल्यूपस के वैज्ञानिक पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि ल्यूपस  एक गंभीर ऑटोइम्यून रोग है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली स्वयं के ऊतकों और अंगों पर आक्रमण करने लगती है। यह रोग त्वचा, जोड़ों, गुर्दे, हृदय, फेफड़े और मस्तिष्क को प्रभावित कर सकता है।


उन्होंने बताया कि ल्यूपस के सामान्य लक्षणों में जोड़ों में दर्द व सूजन, अत्यधिक थकान, बुखार, बाल झड़ना तथा चेहरे पर तितली के आकार का चकत्ता शामिल हैं। इसका समय पर निदान एवं उपचार अत्यंत आवश्यक है, जिससे रोग की तीव्रता को नियंत्रित किया जा सके और रोगी की जीवन गुणवत्ता में सुधार लाया जा सके।


वर्तमान में ल्यूपस का कोई पूर्ण इलाज नहीं है, लेकिन एंटी-इंफ्लेमेटरी दवाएं, इम्यूनोसप्रेसेंट्स, हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन और आधुनिक बायोलॉजिक्स जैसी दवाओं के माध्यम से लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है। विशेषज्ञों ने जोर देकर कहा कि नियमित चिकित्सकीय निगरानी और अनुशासित जीवनशैली अपनाकर ल्यूपस रोगी एक सामान्य, सक्रिय और उत्पादक जीवन जी सकते हैं।


कार्यक्रम की शुरुआत मानसिक शांति हेतु आयोजित ध्वनि स्नान ध्यान सत्र से हुई, जिसका संचालन मुदिता श्रीवास्तव ने किया। एम एम एस एस ओ  मुनीब ने बताया कि मरीजों और उनके परिजनों के लिए रोचक प्रश्नोत्तरी, संवाद सत्र और एक प्रेरणादायक फैशन वॉक का आयोजन किया गया। "ओपन हाउस" सत्र में रोगियों ने अपने सवाल सीधे विशेषज्ञों से पूछे और व्यावहारिक समाधान प्राप्त किए।


फैशन वॉक में ल्यूपस वॉरियर्स ने रैम्प पर आत्मविश्वास से चलकर यह संदेश दिया कि बीमारी से लड़ाई सिर्फ शरीर की नहीं, आत्मा की भी होती है — और यह लड़ाई जीती जा सकती है।

पीजीआई बेस्ट नर्स" सम्मान से नर्सिंग अधिकारी हुए सम्मानित

 

अंतर्राष्ट्रीय नर्सेज डे पर पीजीआई में विविध आयोजनों 


 "बेस्ट नर्स" सम्मान से  नर्सिंग अधिकारी हुए सम्मानित


लखनऊ।



 संजय गांधी पीजीआई  में अंतर्राष्ट्रीय नर्सेज डे (12 मई) के अवसर पर नर्सिंग प्रशासन व नर्सिंग यूनियन के संयुक्त तत्वावधान में सप्ताह भर विविध कार्यक्रम आयोजित किए गए। इस आयोजन में नर्सिंग कैडर के सभी वर्गों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।


आयोजन के तहत खेलकूद, वैज्ञानिक प्रस्तुतियाँ, ड्राइंग व फोटोग्राफी प्रदर्शनी, पोस्टर प्रतियोगिता आदि हुए।


इसके अतिरिक्त संस्थान की प्रत्येक यूनिट से एक वरिष्ठ नर्सिंग अधिकारी और एक नर्सिंग अधिकारी को “बेस्ट नर्स” का सम्मान दिया गया। इस सम्मान से पूजा त्रिपाठी, शिवानी सिंह, संदीप सचान, सुनीता फेड्रिक, कुसुम, अर्चना सचान, ओ. पी. जाट आदि को नवाज़ा गया।


समारोह में निदेशक डॉ. आर. के. धीमान, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. देवेंद्र गुप्ता, चिकित्सा अधीक्षक डॉ. प्रशांत अग्रवाल, सब डीन डॉ. अंकुर भटनागर और एच  आर एफ प्रमुख डॉ. आदित्य कपूर ने विजेताओं को प्रशस्ति पत्र प्रदान किए और नर्सिंग कैडर की भूमिका को संस्थान की रीढ़ बताया।


मुख्य नर्सिंग अधिकारी मनोरमा चरण एवं अन्य नर्सिंग सुपरिंटेंडेंट्स द्वारा नर्सिंग स्टाफ एसोसिएशन को कैडरहित कार्यों के लिए सम्मानित  किया गया।


समारोह में लता सचान, विवेक सागर, सुजान सिंह, राजकुमार, मंजू कमल, अश्वनी, वीरेंद्र, सुखलेश, मंजू राव, कुशवाहा, सुरेंद्र सहित कई अन्य नर्सिंग कर्मी भी मौजूद रहे।

शुक्रवार, 9 मई 2025

एआई से लैस नई तकनीक से पीजीआई में और बेहतर होगी एंजियोप्लास्टी,

 




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एआई से लैस नई तकनीक से पीजीआई में और बेहतर होगी एंजियोप्लास्टी, ऑप्टिकल कोहेरेंस टोमोग्राफी प्रणाली शुरू


 – संजय गांधी  पीजीआई में दिल के मरीजों के इलाज के लिए एक नई और उन्नत तकनीक की शुरुआत की गई है। कार्डियोलॉजी विभाग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस  से लैस इंट्रावैस्कुलर ऑप्टिकल कोहेरेंस टोमोग्राफी (ओ सी टी ) मशीन लगाई गई है। इससे हृदय की ब्लॉकेज यानी रुकावट को दूर करने के लिए की जाने वाली एंजियोप्लास्टी की प्रक्रिया अब और सटीक और सफल होगी।


यह तकनीक फ्रैक्शनल फ्लो रिजर्व , रिलेटिव फ्लो रिजर्व और थ्री डी एंजियो को-रजिस्ट्रेशन जैसी आधुनिक विधियों को एक साथ जोड़ती है। इससे डॉक्टर दिल की रक्त वाहिकाओं की अंदरूनी स्थिति को बेहद साफ और गहराई से देख सकते हैं।


इस तकनीक से प्लाक (ब्लॉकेज), कैल्सीफिकेशन (चिकनाई जमना), रक्त वाहिका का आकार, और स्टेंट की स्थिति की जांच पहले से कहीं बेहतर हो सकेगी। साथ ही, यह एंजियोग्राफी के आंकड़ों को भी जोड़कर डॉक्टरों को पूरा दृश्य दिखा सकती है। अब तक इस नई प्रणाली से 10 मरीजों की एंजियोप्लास्टी सफलतापूर्वक की जा चुकी है।


विशेषज्ञों ने जताई संतुष्टि

कार्डियोलॉजी विभाग की टीम – प्रो. आदित्य कपूर, प्रो. सत्येन्द्र तिवारी, प्रो. रूपाली खन्ना, प्रो. नवीन गर्ग और डॉ. अंकित साहू – ने इस नई तकनीक की सफलता पर खुशी जताई है। उनका कहना है कि इससे एंजियोप्लास्टी में स्टेंट का चुनाव भी पहले से ज्यादा सटीक होगा और इलाज की सफलता दर बढ़ेगी।


कार्डियोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. आदित्य कपूर ने  बताया कि यह मशीन हाई-रिज़ॉल्यूशन इमेजिंग, थ्री-डी तस्वीरें, और एक साथ एंजियोग्राफी और ओसीटी डिस्प्ले जैसे फीचर्स देती है। इससे इलाज की गुणवत्ता और मरीजों के नतीजों में सुधार होगा।


संस्थान के निदेशक प्रो. आर. के. धीमन ने भी कार्डियोलॉजी विभाग की सराहना करते हुए कहा कि यह तकनीक मरीजों की बेहतर देखभाल की दिशा में एक अहम कदम है।

पीजीआई में नर्सिंग दिवस पर स्वैच्छिक रक्तदान सप्ताह

 




-पीजीआई में नर्सिंग दिवस पर स्वैच्छिक रक्तदान सप्ताह


  नर्सों ऑफिसरों ने किया 80 यूनिट रक्तदान



संजय गांधी पीजीआई में अन्तरराष्ट्रीय नर्सिंग दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित स्वैच्छिक रक्तदान सप्ताह में 80 नर्सिंग आफीसर ने रक्तदान कर सेना के अधिकारियों और जवनों का हौसला बढ़ाया है। नर्सेज ने कहा कि जरूरत पड़ने पर देश के सैनिकों के लिये रक्तदान को तैयार हैं। रक्तदान के बाद नर्सिंग अधिकारियों ने सेना के जवानों की सलामती की दुआ और सेवा का संकल्प लिया। 

पीजीआई के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. प्रशांत अग्रवाल, ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन की विभागाध्यक्ष डॉ. प्रीति एल्हेंस और मुख्य नर्सिंग अधीक्षिका मनोरमा चरन ने स्वैच्छिक रक्तदान शिविर का उदघाटन किया। डॉ. प्रशांत अग्रवाल ने बताया कि शिविर में 200 से अधिक नर्सिंग अधिकारियों द्वारा रक्तदान का लक्ष्य है। नर्सिंग स्टाफ एसोसिएशन (एनएसए) की अध्यक्ष लता सचन का कहना है कि भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे तनाव को लेकर संस्थान के सभी कर्मचारी देश के साथ हैं। उन्होंने संस्थान की नर्सिंग अधिकारियों से अपील की है कि शिविर में आकर ज्यादा से ज्यादा रक्त्दान करें। ताकि जरूरतमंद को खून मुहैया कराया जा सके। इस मौके पर नीना इमानुएल, विनीता कटियार, ज्योति भारती और संजय मित्तल समेत अन्य मौजूद रहे। ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग की ओर से रक्तदाताओं को प्रमाण पत्र दिये गए।

बुधवार, 7 मई 2025

सेकंड सौ वें भाग की भी चूक से मरीज के अंग हो सकते है फेल

 

एक सेकंड सौ वें भाग की भी चूक  से मरीज के अंग हो सकते है फेल 


परफ्यूशनिस्ट के बिना हृदय सर्जरी की कल्पना असंभव


एसजीपीजीआई में परफ्यूशनिस्ट दिवस का आयोजन  






दिल की सर्जरी के दौरान अक्सर दिल को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ता है। इस समय हृदय और फेफड़ों का कार्य एक विशेष मशीन — हार्ट-लंग मशीन — से लिया जाता है। दिल को बंद करने और मशीन से रक्त प्रवाह शुरू करने के बीच एक सेकंड की भी चूक मरीज की जान के लिए खतरा बन सकती है। यदि दिल से रक्त प्रवाह एक सेकेंड के लिए भी रुक जाए, तो शरीर के कई अंग प्रभावित हो सकते हैं।इस नाजुक प्रक्रिया में दिल और मशीन के बीच समन्वय स्थापित करने वाले विशेषज्ञ को परफ्यूशनिस्ट कहा जाता है।


 संजय गांधी पीजीआई में आज उत्तर प्रदेश परफ्यूशनिस्ट सोसायटी के तत्वावधान में परफ्यूशनिस्ट दिवस मनाया गया।इस अवसर पर आयोजित अकादमिक सत्र में सोसाइटी के संरक्षक एस.बी. सिंह ने बताया कि ओपन हार्ट सर्जरी के दौरान परफ्यूशनिस्ट का कार्य अत्यंत जटिल और संवेदनशील होता है। जब सर्जरी के दौरान हृदय और फेफड़े बंद होते हैं, तब शरीर के प्रत्येक अंग में रक्त और ऑक्सीजन पहुंचाने का जिम्मा परफ्यूशनिस्ट का होता है।मैक्स अस्पताल के  के.एन. सिंह ने बताया कि परफ्यूशनिस्ट भले ही पर्दे के पीछे काम करता है, लेकिन ओपन हार्ट सर्जरी में उसकी भूमिका अनिवार्य होती है। 


केजीएमयू के  मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि परफ्यूशनिस्ट के बिना ओपन हार्ट सर्जरी की कल्पना भी नहीं की जा सकती।एसजीपीजीआई के  विनय प्रताप सिंह ने बताया कि परफ्यूशनिस्ट की एक सेकंड के सौवें हिस्से की भी गलती मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। इससे ब्रेन डेड, किडनी फेल्योर जैसे गंभीर परिणाम हो सकते हैं।आरएमएल के  शैलेंद्र और सैफई के  निर्मल मिड्डे ने परफ्यूशनिस्ट की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह विशेषज्ञ फिजियोलॉजी, फार्माकोलॉजी, होमोडायने मिक्स और बायोइंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में दक्ष होता है। सकते हैं:

सोमवार, 5 मई 2025

आईटी-सेल का नया झूठ

 

आईटी-सेल का ताजा नाटक सामने आया है। 

 इस फोटो में संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और डॉ. भीमराव आंबेडकर के मोटरसाइकिल पर एकसाथ सफर करते दिख रहे हैं।  डॉ. हेडगेवार का निधन 1940 में हुआ, जबकि तस्वीर में दिखाई गई मोटरसाइकिल रॉयल एनफील्ड है जिसका प्रचलित नाम है बुलेट, यह बाइक 1955 में बाजार में आई। 

 डॉ. हेडगेवार और डॉ. आंबेडकर के मोटरसाइकिल पर एकसाथ होने का कोई ऐतिहासिक सबूत नहीं है।


रॉयल एनफील्ड बुलेट पहली बार भारतीय बाजार में 1955 में आई थी। उस समय यह मोटरसाइकिल मद्रास (अब चेन्नई) में भारत सरकार और रॉयल एनफील्ड (UK) के बीच समझौते के तहत भारत लाई गई थी, ताकि भारतीय सेना और पुलिस बलों को एक मजबूत और भरोसेमंद मोटरसाइकिल मिल सके।


शुरुआत में 350cc की बुलेट ब्रिटेन से आयात की जाती थी, लेकिन 1956 से इसका स्थानीय निर्माण भारत में शुरू हो गया था। बाद में यह पूरी तरह से भारतीय बन गई और रॉयल एनफील्ड इंडिया के नाम से चेन्नई में इसका उत्पादन होने लगा।


डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के संस्थापक थे, का निधन 21 जून 1940 को नागपुर में हुआ था। उनकी समाधि नागपुर के रेशम बाग़ में स्थित है, जहाँ उनका अंतिम संस्कार भी किया गया था।  और सबसे बड़ी दुखद बात यह है कि इस फोटो को वायरल करने वाला व्यक्ति अपने को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सदस्य बताया है।

महिलाओं में अस्थमा की व्यापकता पुरुषों से अधिक है।



“इनहेलेशन उपचार तक पहुँच सभी अस्थमा रोगियों की आवश्यकता है।”

”आइये हम सभी मिलकर प्रत्येक अस्थमा रोगी को खुलकर साँस लेने में मदद करें।”

दमा को अगर हराना है, साँसों को बचाना है, तो इन्हेलर अपनाना है।”

सांस हैं अनमोल, रखे दूर अस्थमा रोग,

अपनाये इन्हेलर, रहें स्वस्थ्य और निरोग।

-प्रो. (डॉ.) वेद प्रकाश


अस्थमा की समस्या:-

अस्थमा विश्व और भारत दोनों के लिए एक सतत् स्वास्थ्य समस्या है।

विश्व में अनुमानतः 26.2 करोड़ लोग अस्थमा से प्रभावित हैं (WHO 2024)।

वैष्विक स्तर पर अस्थमा से प्रतिवर्ष लगभग 4.55 लाख लोगों की मृत्यु होती हैै (WHO 2024)।

अस्थमा रोग बच्चों एवं किशोरों में सबसे सामान्य दीर्घकालिक रोग है, जिससे बार‑बार अस्पताल में भर्ती होना और विद्यालय में अनुपस्थितियाँ होना सम्मिलित हैं।

भारत में अनुमानतः 2–5 % जनसंख्या अस्थमा से ग्रस्त है।

महिलाओं में अस्थमा की व्यापकता पुरुषों से अधिक है।

वैश्विक अस्थमा मामलों के लगभग 13 % भारत में पाये जाते हैं जिससे स्वास्थ्य‑व्यवस्था पर भारी बोझ पड़ता है।

2021 में अस्थमा प्रबंधन पर वैश्विक स्तर पर लगभग ₹ 68,300 करोड़ का खर्च आया था।

अनुमानतः भारत में 3.4 करोड़ से अधिक लोग अस्थमा ग्रसित हैं।

अस्थमा‑सम्बंधित वैश्विक मौतों का 46 % हिस्सा भारत में होता है, जो समुचित निदान एवं उपचार तक मरीजों की पहुंच ना होना दर्शाता है।

खराब वायु गुणवत्ता भारत में अस्थमा की समस्या का एक प्रमुख कारक है।

जागरूकता की कमी और अल्प‑निदान एक बड़ी चुनौती है एक अध्ययन के अनुसार केवल 5 ः भारतीय अस्थमा रोगियों का सही निदान व उपचार हो पाता है।

एलर्जी एक वैश्विक स्वास्थ्य समस्या है और इसकी व्यापकता लगातार बढ़ रही है।

विश्व एलर्जी संगठन के अनुसार, विश्व की 30 से 40 ः जनसंख्या किसी न किसी एलर्जी से प्रभावित है।

एलर्जिक राइनाइटिस वयस्कों में 10 से 30 % तथा बच्चों में 40 % तक को प्रभावित करता है।

खाद्य एलर्जी विश्व स्तर पर 68 % बच्चों और 24 % वयस्कों में पाई जाती है।

संयुक्त राज्य अमेरिका में एलर्जी‑रोधी दवाओं पर वार्षिक खर्च 5 अमेरिकी अरब डॉलर (लगभग ₹ 4,000 करोड़) से अधिक है।

अस्थमा के प्रमुख लक्षणः

घरघराहट (छाती से सीटीध्घर्र की ध्वनि)।

साँस फूलना या साँस लेने में कठिनाई।

विशेषकर रात में या सुबह होने वाली खांसी।

छाती में जकड़न, दर्द या घुटन‑सा महसूस होना।

ट्रिगरः एलर्जेन, संक्रमण, वायु‑प्रदूषण, ठंडी हवा, शारीरिक व्यायाम, मानसिक तनाव आदि अस्थमा के ट्रिगर (बढाने वाले तत्व) का कार्य करते है 

अस्थमा लाइलाज बीमारी नही है, उचित उपचार व जीवन‑शैली में बदलाव से इसे पूरी तरह नियंत्रित कर सामान्य जीवन जिया जा सकता है।

इस वर्ष की थीमः MAKE INHALED TREATMENTS ACCESSIBLE FOR ALL 

ग्लोबल इनिशिएटिव फॉर अस्थमा (GINA) ने विश्व अस्थमा दिवस 2025 की थीम “इनहेलेशन उपचार सभी के लिए सुलभ बनाएं” निर्धारित की है। यह थीम विशेष रूप से इनहेलेड कॉर्टिको‑स्टेरॉयड्स (ICS) जैसी प्रभावी औषधियों को सुनिश्चित करने के महत्व को रेखांकित करती है।

भारत में, यद्यपि ICS को आवश्यक औषधि सूची में शामिल किया गया है, फिर भी जागरूकता की कमी, अधिक व्यय एवं आपूर्ति‑श्रृंखला समस्याओं के कारण इनका उपयोग अपेक्षाकृत कम है। इन चुनौतियों का समाधान अस्थमा‑संबंधित समस्याओं एवं मृत्यु दर को घटाने के लिए अत्यावश्यक है।


अस्थमा प्रबंधनः ;बेहतर परिणामों के लिए रणनीतियाँ 

कंट्रोलर दवाएँः एयरवे सूजन कम करने हेतु नियमित रूप से इनहेलेड कॉर्टिको‑स्टेरॉयड्स का उपयोग किया जाता है। 

रिलीवर दवाएँः तुरंत लक्षण से राहत पाने के लिए ब्रोंकोडाएलेटर्स का उपयोग किया जाता है।

ट्रिगर से बचावः व्यक्तिगत ट्रिगर पहचान कर न्यूनतम संपर्क करके अस्थमा को बढाने से रोका जा सकता है। 

फेनोटाइप की पहचानः प्रत्येक रोगी भिन्न होता हैय वैयक्तिकृत उपचार योजना आवश्यक होती है। 

नियमित फॉलो‑अपः चिकित्सकीय निगरानी व योजना में समय‑समय पर संशोधन से अस्थमा का समुचित इलाज किया जाता है।

रोगी शिक्षाः अस्थमा एवं प्रबंधन संबंधी जानकारी देकर रोगी को सशक्त बनाना।

उचित प्रबंधन से अस्थमा रोगी पूर्णतः सक्रिय एवं स्वस्थ जीवन जी सकते हैं।



आगे की राहः अनुसंधान एवं रोकथाम:-

किफायती इनहेलेशन दवाओं तक पहुँच सुलभ कराना।

कम‑लागत, उच्च‑दक्षता वाले इनहेलर विकसित करना।

विशेषकर वंचित क्षेत्रों में जन‑जागरूकता अभियान चलाना।

डिजिटल स्वास्थ्य साधनों का उपयोग कर निगरानी एवं सहायता।

वायु‑प्रदूषण में कमी हेतु पर्यावरणीय नीतियों का अनुपालन।

गंभीर अस्थमा के लिए बायोलॉजिक चिकित्सा, आनुवंशिक जोखिम चिन्ह एवं वैयक्तिकृत उपचार के क्षेत्र में चल रहे अनुसंधान उत्साहजनक परिणाम दे रहे हैं।


पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन द्वारा अस्थमा के उपचार सम्बन्धित प्रतिबद्धता:-

किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी का पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग एलर्जी एवं अस्थमा की समग्र देख‑रेख हेतु समर्पित है। अत्याधुनिक सुविधाओं एवं विशेषज्ञ टीम के साथ, विभाग सटीक निदान के लिए परिष्कृत पल्मोनरी फंक्शन जांच तथा स्किन प्रिक टेस्ट सहित विभिन्न एलर्जी परीक्षण उपलब्ध कराता है। गंभीर अथवा व्यापक अस्थमा में बायोलॉजिक थेरेपी एवं इम्यूनोथेरेपी का विशेषज्ञ मार्गदर्शन भी प्रदान किया जाता है, जिससे प्रत्येक रोगी के लिए वैयक्तिकृत एवं प्रभावी उपचार सुनिश्चित हो। प्रो. (डॉ.) वेद प्रकाश, विभागाध्यक्ष, पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग प्रो0 राजेन्द्र प्रसाद, प्रोफेसर रेस्पिरेट्री मेडिसिन विभाग, एराज लखनऊ मेडिकल यूनिवर्सिटी, प्रो0 आर0ए0एस0 कुषवाहा, प्रोफेसर, रेस्पिरेट्री मेडिसिन विभाग, के0जी0एम0यू0 लखनऊ प्रो0 राजेष कुमार प्रोफेसर, पीडियाट्रिक्स विभाग, के0जी0एम0यू0 लखनऊ डा0 सचिन कुमार, डा0 मो0 आरिफ, डा0 मृत्युंजय, आदि लोग उपस्थित रहे। 





प्रत्यारोपित किडनी की खराबी का पता अब बिना दर्द के संभव



प्रत्यारोपित किडनी की खराबी का पता अब बिना दर्द के संभव


किडनी ट्रांसप्लांट के बाद होने वाली जटिलताओं की जांच अब इलास्टोग्राफी से संभव


पीजीआई के विशेषज्ञों ने शोध में बताया — यह तकनीक होगी ट्रांसप्लांट की निगरानी में कारगर



संजय गांधी पीजीआई के विशेषज्ञों ने अपने शोध में पाया है कि इलास्टोग्राफी नामक तकनीक से किडनी ट्रांसप्लांट के बाद होने वाली इंटरस्टिशियल फाइब्रोसिस एंड ट्यूबूलर एंट्रॉफी (आईएफटीए) का पता आसानी से और बिना किसी सर्जरी या बायोप्सी के लगाया जा सकता है। किडनी की इस खराबी का पता लगाने के लिए बायोप्सी किया जाता रहा है जिसमें मरीज को दर्द होता है। किडनी बायोप्सी से डरते भी है । कंपलिकेशन की भी आशंका रहती है। विशेषज्ञों ने शोध में 61 किडनी ट्रांसप्लांट मरीजों को शामिल किया गया, जो क्रोनिक किडनी इंजरी से पीड़ित थे। मरीजों का चयन उनकी क्लीनिक स्थिति, क्रिएटिनिन स्तर और GFR रिपोर्ट के आधार पर किया गया। सभी मरीजों की बायोप्सी और इलास्टोग्राफी टेस्ट किए गए और उनके परिणामों की तुलना की गई।बायोप्सी में देखा गया कि


10 मरीजों में कोई फाइब्रोसिस नहीं। 33 मरीजों में हल्का फाइब्रोसिस। 16 में मध्यम। 2 में गंभीर फाइब्रोसिस पाया गया। इलास्टोग्राफी से जब किडनी के ऊतक (टिशू) की कठोरता मापी गई, तो पाया गया कि जैसे-जैसे फाइब्रोसिस बढ़ता गया, कठोरता भी बढ़ती गई।जिनमें फाइब्रोसिस नहीं था, उनमें कठोरता: 39.86 केपीए। जबकि गंभीर फाइब्रोसिस में: 53.83 केपीए मिला। इलास्टोग्राफी और बायोप्सी के नतीजे लगभग समान पाए गए।


 


इलास्टोग्राफी क्यों है भरोसेमंद?


विशेषज्ञों का कहना है कि इलास्टोग्राफी इतनी सटीक है कि इससे हल्का, मध्यम और गंभीर फाइब्रोसिस के बीच भी स्पष्ट अंतर किया जा सकता है। यह तकनीक सस्ती,सुरक्षित,और बिना दर्द के है। इसे किडनी ट्रांसप्लांट मरीजों की नियमित निगरानी के लिए सामान्य फॉलोअप स्कैनिंग में शामिल किया जाए, तो यह मरीजों के लिए बड़ी राहत बन सकती है।


 


इलास्टोग्राफी से फायदे:


यह एक पेन-फ्री और गैर-सर्जिकल तकनीक है। मरीजों को बार-बार बायोप्सी जैसी इनवेसिव प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ेगा। बीमारी का जल्दी और सटीक पता चलता है। 


 


क्या है इंटरस्टिशियल फाइब्रोसिस एंड ट्यूबूलर एंट्रॉफी


इंटरस्टिशियल फाइब्रोसिस: जब किडनी के ऊतकों में सामान्य कोशिकाओं की जगह कठोर रेशेदार टिशू बनने लगते हैं।


 ट्यूब्यूलर एट्रॉफी: किडनी की सूक्ष्म नलिकाएं (ट्यूब्स) सिकुड़ने या खराब होने लगती हैं जिससे वो खून छानने का काम ठीक से नहीं कर पातीं। इसे पूरी तरह ठीक नहीं की जा सकती, लेकिन इसका फैलाव रोका जा सकता है।


 


इलास्टोग्राफी कैसे काम करती है?


यह एक खास अल्ट्रासाउंड तकनीक है। इसमें शरीर पर एक प्रोब रखा जाता है। प्रोब से हल्की तरंगें भेजी जाती हैं जो ऊतक से टकराकर लौटती हैं। इन तरंगों की गति से टिशू की नरमी या कठोरता का आकलन किया जाता है। 


 


शोधकर्ताओं की टीम:


शीयर वेव इलास्टोग्राफी की भूमिका: किडनी ट्रांसप्लांट में फाइब्रोसिस की जांच और बायोप्सी से तुलना विषय पर शोध किया जिसमें रेडियोलॉजी विभाग के डा.  सुरोजित रुइदास, प्रो,  हीरा लाल, डा. रघुनंदन प्रसाद,डा.  सृष्टि शर्मा डा.  सुरभी अग्रवाल,  डा.  रणविजय सिंह, नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रो,  नारायण प्रसाद, प्रो,  मानस रंजन पटेल, प्रो. रवि शंकर कुशवाहा, पैथोलॉजी विभाग के प्रो.. मनोज जैन शामिल हुए। शोध जर्नल ऑफ अल्ट्रासाउंड मेडिसिन ने हाल में ही स्वीकार किया है।

शनिवार, 3 मई 2025

विटामिन D की कमी से पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन का स्तर घटता है: डेनमार्क में हुए अध्ययन से खुलासा




 विटामिन D की कमी से पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन का स्तर घटता है: डेनमार्क में हुए अध्ययन से खुलासा


डेनमार्क के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक विस्तृत अध्ययन से यह पता चला है कि विटामिन D की कमी पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन उत्पादन को प्रभावित कर सकती है, जिससे प्रजनन क्षमता, हड्डियों की मजबूती और मांसपेशियों के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। 


🔬 अध्ययन का विवरण


यह अध्ययन कोपेनहेगन बोन-गोनाडल स्टडी (Copenhagen Bone-Gonadal Study) के तहत 2011 से 2014 के बीच किया गया, जिसमें कुल 1,427 पुरुषों को शामिल किया गया।  इनमें से 1,248 पुरुषों के डेटा का विश्लेषण किया गया, जबकि 179 पुरुषों को गंभीर बीमारियों या एनाबोलिक स्टेरॉयड के उपयोग के कारण बाहर रखा गया। 


📊 प्रमुख निष्कर्ष


विटामिन D और शुक्राणु गतिशीलता: जिन पुरुषों के शरीर में विटामिन D का स्तर 75 nmol/L से अधिक था, उनमें शुक्राणुओं की गतिशीलता और कुल संख्या उन पुरुषों की तुलना में 66% और 111% अधिक पाई गई, जिनका विटामिन D स्तर 25 nmol/L से कम था। 


हार्मोनल असंतुलन: विटामिन D की कमी वाले पुरुषों में सेक्स-हार्मोन-बाइंडिंग ग्लोब्युलिन (SHBG) और टेस्टोस्टेरोन/एस्ट्राडियोल अनुपात क्रमशः 15% और 14% कम पाया गया, जबकि फ्री टेस्टोस्टेरोन और एस्ट्राडियोल अनुपात क्रमशः 6% और 13% अधिक था। 


कैल्शियम का प्रभाव: कम आयनित कैल्शियम स्तर वाले पुरुषों में प्रगतिशील शुक्राणु गतिशीलता और इनहिबिन B/FSH अनुपात अधिक था, लेकिन टेस्टोस्टेरोन/एस्ट्राडियोल अनुपात कम पाया गया। 



🧪 प्रयोगशाला परीक्षण


शोधकर्ताओं ने उन पुरुषों के अंडकोषीय ऊतकों का भी अध्ययन किया, जिनका एक अंडकोष शल्य चिकित्सा द्वारा हटाया गया था।  इन ऊतकों को सक्रिय विटामिन D के संपर्क में लाने पर, उन्होंने अधिक मात्रा में टेस्टोस्टेरोन का उत्पादन किया, जिससे यह संकेत मिलता है कि विटामिन D सीधे अंडकोषीय ऊतकों में टेस्टोस्टेरोन उत्पादन को प्रभावित कर सकता है। 


💡 निष्कर्ष


यह अध्ययन दर्शाता है कि विटामिन D की पर्याप्त मात्रा पुरुषों के हार्मोनल स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता के लिए महत्वपूर्ण है।  विटामिन D की कमी न केवल टेस्टोस्टेरोन के स्तर को घटा सकती है, बल्कि यह हड्डियों की कमजोरी और मांसपेशियों की हानि का कारण भी बन सकती है। 


✅ सिफारिशें


विटामिन D की जांच: पुरुषों को अपने विटामिन D स्तर की नियमित जांच करानी चाहिए, विशेषकर यदि वे थकान, मांसपेशियों की कमजोरी या यौन क्षमता में कमी महसूस कर रहे हों। 


सूर्य प्रकाश: प्राकृतिक सूर्य प्रकाश विटामिन D का प्रमुख स्रोत है; इसलिए, प्रतिदिन कम से कम 15-20 मिनट सूर्य के संपर्क में रहना लाभकारी हो सकता है। 


आहार और सप्लीमेंट्स: विटामिन D युक्त आहार (जैसे मछली, अंडे, दूध) का सेवन बढ़ाएं और आवश्यक होने पर चिकित्सक की सलाह से विटामिन D सप्लीमेंट्स लें। 



यह अध्ययन पुरुषों के स्वास्थ्य में विटामिन D की भूमिका को समझने में एक महत्वपूर्ण कदम है और इसके निष्कर्ष भविष्य में प्रजनन स्वास्थ्य से संबंधित उपचारों में सहायक हो सकते हैं। 


हाथों की स्वच्छता : संक्रमण से बचाव की पहली और अंतिम रक्षा पंक्ति

 

हाथों की स्वच्छता : संक्रमण से बचाव की पहली और अंतिम रक्षा पंक्ति


पीजीआई में विश्व हैंड हाइजीन दिवस पर जागरूकता कार्यक्रम


विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रतिवर्ष 5 मई को मनाए जाने वाले ‘विश्व हाथ स्वच्छता दिवस’ के उपलक्ष्य में संजय गांधी पीजीआई में इस वर्ष की थीम “चाहे दस्ताने हों, स्वच्छता फिर भी ज़रूरी है!” पर आधारित   जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया । 

कार्यक्रम का आयोजन अस्पताल संक्रमण नियंत्रण समित एवं अस्पताल संक्रमण नियंत्रण प्रकोष्ठ, अस्पताल संक्रमण सोसायटी ऑफ इंडिया – लखनऊ शाखा एवं अकादमी ऑफ हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन – उत्तर प्रदेश क्षेत्रीय शाखा के सहयोग से किया गया।

अस्पताल प्रशासन विभाग के प्रमुख एवं ट्रामा सेंटर  चिकित्सा अधीक्षक प्रो, राजेश हर्षवर्धन ने बताया कि

हाथों की स्वच्छता न केवल सबसे कम खर्चीला उपाय है, बल्कि यह हमारे पास सबसे प्रभावशाली साधन भी है जिससे हम रोगियों और स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं।

ट्रामा सेंटर के प्रभारी

 एवं न्यूरो सर्जरी के प्रोफेसर प्रोफेसर अरुण कुमार श्रीवास्तव ने  बताया कि ऑपरेशन की शुरुआत यानी स्क्रबिंग से लेकर टांका लगाने और देखभाल तक हाथों की सफाई अत्यंत आवश्यक है। 

मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रो. देवेंद्र गुप्ता ने बताया 

 कि हर 10 में से 7 अस्पताल संक्रमण केवल हाथ धोने से रोके जा सकते हैं। उन्होंने कहा

हाथों की स्वच्छता केवल प्रतीक नहीं है यह चिकित्सकीय आवश्यकता है।

माइक्रोबायोलॉजी विभाग की प्रोफेसर रिचा मिश्रा ने बताया कि अस्पतालों में ऑपरेशन के दौरान होने वाले संक्रमण अब भी बड़ी चुनौती हैं।

न्यूरो सर्जरी के डॉक्टर

डॉ. श्रेयश राय ने बताया कि  “दस्ताना काफी नहीं  दस्ताने पहन लेने से संक्रमण से पूरी तरह सुरक्षा नहीं होती, हाथों की सफाई भी उतनी ही जरूरी है।

ज्ञान सहयोगी – 3एम कंपनी के तनवीर सिंह ने “सर्जिकल संक्रमण की रोकथाम के लिए  डब्ल्यूएचओ प्रोटोकॉल, सर्जरी से पहले की चेकलिस्ट और संक्रमण नियंत्रण के उपाय बताए। 

 स्टेरिलाइज़ेशन तकनीक, उपकरणों की जांच और सीएसएसडी (केंद्रीय स्टेरिलाइज़ेशन सेवा विभाग) की प्रक्रियाओं की जानकारी दी।

माइक्रोबायोलॉजी विभाग 

डॉ. संग्राम सिंह  पटेल स्वच्छ हाथ, सुरक्षित मरीज” विषय पर बताया कि जहां अस्पतालों में हाथ धोने की आदत को संस्थागत संस्कृति बनाया गया है, वहां संक्रमण की घटनाएं कम हुई हैं।

संक्रमण नियंत्रण सेल के नर्सिंग ऑफिसर

 धिखिल सी.डी ने विश्व स्वास्थ्य संगठन की 7-चरणीय पद्धति के अनुसार हाथ धोने की जीवंत प्रदर्शनी दी। यह सत्र विशेष रूप से नर्सिंग स्टाफ के लिए उपयोगी रहा।

इस आयोजन में 100 से अधिक प्रतिनिधियों की उपस्थिति रही, जिनमें नव-नियुक्त नर्सिंग अधिकारी, वरिष्ठ नर्सिंग स्टाफ और नर्सिंग अधीक्षक भी शामिल थीं।

गुरुवार, 1 मई 2025

हिंदू लड़कियों से दुष्कर्म पर फरहान बोला- मैंने 'सवाब' का काम किया है

 हिंदू लड़कियों से दुष्कर्म पर फरहान बोला- मैंने 'सवाब' का काम किया है 



 भोपाल में 1992 के अजमेर जैसे कांड को अंजाम देने वाले मुस्लिम युवक जिहादी मानसिकता से हिंदू लड़कियों से दुष्कर्म कर रहे थे। वे इसे इस्लामिक कट्टरता के नजरिए से सवाब यानी पुण्य का काम मानते थे। चौंकाने वाला यह रहस्योघाटन खुद मुस्लिम युवकों के इस संगठित गिरोह के सरगना माने जा रहे फरहान खान ने पुलिस की पूछताछ में किया है। फरहान ने कहा है कि मैंने हिंदू लड़‌कियों से दुष्कर्म करके सवाब का काम किया है। उसके और उसके गिरोह के साथियों का लक्ष्य अधिक से अधिक हिंदू लड़‌कियों से दुष्कर्म कर उनका जीवन बर्बाद करना था। इसे वे इस्लाम के नजरिए से सवाब का काम मानकर अंजाम दे रहे थे, इसलिए उन्हें इसका कोई पछतावा नहीं है, बल्कि गर्व है। भोपाल पुलिस ने फरहान को रिमांड पर लिया था। पुलिस के अनुसार, फरहान ने बताया कि वह कई वर्षों से हिंदू लड़कियों से दुष्कर्म  किया। भोपाल में हिंदू लड़कियों से दुष्कर्म के आरोपित साद, अवरार, अली और नवील है।  इसके लिए उसने हमउम्र कई मुस्लिम युवकों का नेटवर्क तैयार किया। इस गिरोह में शामिल सभी युवक जहां मौका लगता, वहां हिंदू लड़कियों को प्रेम के झांसे में फंसाते। इसके लिए हिंदू नाम का इस्तेमाल करते और हाथ में कलावा भी बांध लिया करते थे। हिंदू लड़कियों से दोस्ती के बहाने  विश्वास जमाते, फिर अकेले में मिलने के दौरान दुष्कर्म करते और वीडियो बना लेते थे, फिर इन वीडियो के जरिये उन्हें धमकाकर दूसरे मुस्लिम लड़कों से शारीरिक संबंध बनाने के लिए विवश करते थे। जबरन मांस खिलाने और इस्लाम स्वीकारने के लिए मजबूर करते थे।

ब्रेन डेड से लिगामेंट लेकर किया गया रोपित

 



पीजीआई में हुई उत्तर भारत की पहली सर्जरी


 


  ब्रेन डेड से लिगामेंट लेकर किया गया  रोपित 


 


 टिशु बैंक से लिया गया ब्रेन डेड  व्यक्ति का लिगामेंट


 




 


संजय गांधी पीजीआई के एपेक्स ट्रामा सेंटर में  पहली बार ब्रेन डेड डोनर से लिए गए लिगामेंट (एलोग्राफ्ट) को प्रत्यारोपण कर मल्टी लिगामेंट इंजरी का इलाज किया गया। यह उत्तर भारत की पहली सर्जरी है जिसमें ब्रेन डेड व्यक्ति का लिगामेंट लिया गया । मुंबई स्थित


नोवो  टिशु बैंक एंड रिसर्च सेन्टर से ब्रेन डेड व्यक्ति का लिगामेंट मंगाया गया।  टिशू बैंक में लिगामेंट प्रिजर्व करके रखा जाता है जो एक से डेढ़ साल तक उपयोग में लाया जा सकता है। इस जटिल सर्जरी को अपेक्स ट्रामा सेंटर के प्रोफेसर पलक शर्मा ने सफलतापूर्वक किया। 


प्रो शर्मा ने बताया कि डोनर से ली गई लिगामेंट ( एलोग्राफ्ट) का उपयोग करने से मरीज की खुद की लिगामेंट निकालने की जरूरत नहीं पड़ती।  ऑपरेशन का समय कम हो जाता है और दर्द भी कम होता है। घुटने की मल्टी लिगामेंट की  चोट  जटिल होती हैं। बताया कि मोहनलालगंज के निवासी  आशीष कुमार को   गंभीर एक्सीडेंट के बाद   भर्ती किया गया था। उसके पैर की हड्डियां (फीमर और टिबिया) टूट गई थी और घुटने की हड्डी बाहर आ गई थी। 


 पहले फीमर और टिबिया की सर्जरी की गई थी। चोट  के कारण, घुटने को स्थिर रखने  वाले   सभी प्रमुख लिगामेंट  फट गए थे। जटिल आर्थ्रोस्कोपिक लिगामेंट सर्जरी  करके सारे लिगमेंट को  बनाया गया । आमतौर पर, फटे हुए लिगामेंट को बनाने के लिए लिगामेंट को मरीज के  शरीर से निकाला जाता है। हालांकि, इस मामले   घुटने के चार लिगमेंट डैमेज हो गए थे , इसलिए चार लिगमेंट को शरीर से निकलने के बजाय ब्रेन डेड डोनर से लिया गया। सर्जरी सफल रही और मरीज अब तेजी से ठीक हो रहा है।


 


यह रही टीम


 


निदेशक टिशू बैंक मुंबई केडॉ. प्रसाद भगुंदे, डॉ. लियाकत,डॉ. अभिषेक,नर्सिंग अधिकारी सचिन,नर्सिंग ऑफिसर लता सचान