हर मरीज के बचेंगे तीन हजार रुपये - हेपेटाइटिस सी के इलाज में संजय गांधी पीजीआई की बड़ी खोज
लखनऊ। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान ने चार अन्य बड़े संस्थानों के साथ मिलकर हेपेटाइटिस सी के इलाज पर एक ऐतिहासिक स्टडी की है, जिसके नतीजों ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। इस स्टडी के नतीजे दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल पत्रिका द लैंसेट में प्रकाशित हुए हैं।
द लैंसेट में प्रकाशित हुई भारत की स्टडी
द लैंसेट का प्रभावांक एक सौ नौ है और यह दुनिया की शीर्ष तीन विज्ञान पत्रिकाओं में गिनी जाती है। इसमें भारत की किसी सार्वजनिक अस्पताल से जुड़ी स्टडी का छपना अपने आप में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। इस शोध ने हेपेटाइटिस सी के इलाज के पुराने नियम को ही बदल दिया है।
क्या है रिज़ॉल्व ट्रायल
इस ट्रायल का नाम रिज़ॉल्व रखा गया है। इसका पूरा नाम है - उपचार-भोले, बिना सिरोसिस वाले, लंबे समय से हेपेटाइटिस सी से पीड़ित मरीजों में सोफोसबुवीर-वेलपटासवीर दवा के आठ हफ्ते बनाम बारह हफ्ते के इलाज की तुलना वाला बहु-केंद्रीय, ओपन-लेबल, गैर-हीनता वाला क्रमरहित नियंत्रित परीक्षण।
अभी तक दुनिया भर में इस बीमारी के इलाज के लिए सोफोसबुवीर-वेलपटासवीर दवा बारह हफ्ते तक दी जाती है। यह दवा काफी महंगी है, जिससे गरीब मरीजों पर आर्थिक बोझ बढ़ता है।
पाँच बड़े अस्पतालों में हुई जाँच
यह शोध देश के पाँच बड़े सरकारी अस्पतालों में किया गया। इसमें कुल आठ सौ अस्सी मरीजों को शामिल किया गया था। संजय गांधी पीजीआई लखनऊ के अलावा इसमें किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय लखनऊ, काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान नई दिल्ली और गोविंद बल्लभ पंत अस्पताल नई दिल्ली के हेपेटोलॉजी और गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग शामिल थे।
नतीजों में पाया गया कि आठ हफ्ते इलाज लेने वाले अट्ठानवे दशमलव आठ प्रतिशत मरीज पूरी तरह ठीक हो गए, जबकि बारह हफ्ते इलाज लेने वालों में यह आंकड़ा निन्यानवे प्रतिशत था। यानी दोनों का असर लगभग बराबर है। यह नतीजा पूरी दुनिया के लिए लागू हो सकता है।
देश को होगा अरबों रुपये का फायदा
दुनिया में पाँच करोड़ से ज्यादा और हमारे देश में करीब साठ लाख लोगों को हेपेटाइटिस सी के इलाज की जरूरत है। इलाज की अवधि चार हफ्ते कम होने से हर मरीज के करीब तीन हजार रुपये बचेंगे। इस हिसाब से देश के कई अरब रुपये की सीधी बचत होगी और ज्यादा से ज्यादा मरीजों का इलाज संभव हो सकेगा।
इन वैज्ञानिकों ने किया शोध
यह शोध भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के सहयोग से हुआ, जिसने एक करोड़ पैंसठ लाख रुपये की आर्थिक मदद दी थी। इसका नेतृत्व परिषद मुख्यालय में कार्यरत प्रोफेसर राकेश अग्रवाल और संजय गांधी पीजीआई के निदेशक डॉ आर के धीमान ने किया। काम का मुख्य समन्वय पीजीआई के डॉ अमित गोयल और किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के डॉ सुमित रुंगटा ने किया, जबकि आंकड़ों का गहन विश्लेषण केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान लखनऊ के डॉ आशीष अवस्थी ने किया।

