शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

हर मरीज के बचेंगे तीन हजार रुपये - हेपेटाइटिस सी के इलाज में संजय गांधी पीजीआई की बड़ी खोज

 

हर मरीज के बचेंगे तीन हजार रुपये - हेपेटाइटिस सी के इलाज में संजय गांधी पीजीआई की बड़ी खोज


लखनऊ। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान ने चार अन्य बड़े संस्थानों के साथ मिलकर हेपेटाइटिस सी के इलाज पर एक ऐतिहासिक स्टडी की है, जिसके नतीजों ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। इस स्टडी के नतीजे दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल पत्रिका द लैंसेट में प्रकाशित हुए हैं।

द लैंसेट में प्रकाशित हुई भारत की स्टडी

द लैंसेट का प्रभावांक एक सौ नौ है और यह दुनिया की शीर्ष तीन विज्ञान पत्रिकाओं में गिनी जाती है। इसमें भारत की किसी सार्वजनिक अस्पताल से जुड़ी स्टडी का छपना अपने आप में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। इस शोध ने हेपेटाइटिस सी के इलाज के पुराने नियम को ही बदल दिया है।

क्या है रिज़ॉल्व ट्रायल

इस ट्रायल का नाम रिज़ॉल्व रखा गया है। इसका पूरा नाम है - उपचार-भोले, बिना सिरोसिस वाले, लंबे समय से हेपेटाइटिस सी से पीड़ित मरीजों में सोफोसबुवीर-वेलपटासवीर दवा के आठ हफ्ते बनाम बारह हफ्ते के इलाज की तुलना वाला बहु-केंद्रीय, ओपन-लेबल, गैर-हीनता वाला क्रमरहित नियंत्रित परीक्षण।


अभी तक दुनिया भर में इस बीमारी के इलाज के लिए सोफोसबुवीर-वेलपटासवीर दवा बारह हफ्ते तक दी जाती है। यह दवा काफी महंगी है, जिससे गरीब मरीजों पर आर्थिक बोझ बढ़ता है।

पाँच बड़े अस्पतालों में हुई जाँच

यह शोध देश के पाँच बड़े सरकारी अस्पतालों में किया गया। इसमें कुल आठ सौ अस्सी मरीजों को शामिल किया गया था। संजय गांधी पीजीआई लखनऊ के अलावा इसमें किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय लखनऊ, काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान नई दिल्ली और गोविंद बल्लभ पंत अस्पताल नई दिल्ली के हेपेटोलॉजी और गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग शामिल थे।


नतीजों में पाया गया कि आठ हफ्ते इलाज लेने वाले अट्ठानवे दशमलव आठ प्रतिशत मरीज पूरी तरह ठीक हो गए, जबकि बारह हफ्ते इलाज लेने वालों में यह आंकड़ा निन्यानवे प्रतिशत था। यानी दोनों का असर लगभग बराबर है। यह नतीजा पूरी दुनिया के लिए लागू हो सकता है।

देश को होगा अरबों रुपये का फायदा

दुनिया में पाँच करोड़ से ज्यादा और हमारे देश में करीब साठ लाख लोगों को हेपेटाइटिस सी के इलाज की जरूरत है। इलाज की अवधि चार हफ्ते कम होने से हर मरीज के करीब तीन हजार रुपये बचेंगे। इस हिसाब से देश के कई अरब रुपये की सीधी बचत होगी और ज्यादा से ज्यादा मरीजों का इलाज संभव हो सकेगा।

इन वैज्ञानिकों ने किया शोध

यह शोध भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के सहयोग से हुआ, जिसने एक करोड़ पैंसठ लाख रुपये की आर्थिक मदद दी थी। इसका नेतृत्व परिषद मुख्यालय में कार्यरत प्रोफेसर राकेश अग्रवाल और संजय गांधी पीजीआई के निदेशक डॉ आर के धीमान ने किया। काम का मुख्य समन्वय पीजीआई के डॉ अमित गोयल और किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के डॉ सुमित रुंगटा ने किया, जबकि आंकड़ों का गहन विश्लेषण केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान लखनऊ के डॉ आशीष अवस्थी ने किया।

एसजीपीजीआई में जटिल चेहरे की चोट का सफल उपचार





 एपेक्स ट्रॉमा सेंटर, एसजीपीजीआई में जटिल चेहरे की चोट का सफल उपचार


सड़क हादसे में घायल 24 वर्षीय युवक के चेहरे की हड्डी, फेशियल नर्व और पैरोटिड डक्ट क्षतिग्रस्त; तीन चरणों में किया गया पुनर्निर्माण


लखनऊ। एपेक्स ट्रॉमा सेंटर, एसजीपीजीआई में सड़क दुर्घटना में गंभीर चेहरे की चोट से घायल 24 वर्षीय मरीज का सफल उपचार किया गया है। यह एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण केस था, जिसमें ओरल एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जरी, प्लास्टिक सर्जरी, न्यूरोसर्जरी और एनेस्थीसिया विभाग की टीमों ने समन्वित प्रयास से सर्जरी को अंजाम दिया।


मरीज के चेहरे पर गहरा घाव था। जांच में फेशियल नर्व की टेम्पोरल, जाइगोमैटिक और बक्कल शाखाएं पूरी तरह कटी मिलीं। लार को मुंह तक पहुंचाने वाली स्टेनसन्स डक्ट (पैरोटिड डक्ट) भी कट गई थी। साथ ही जाइगोमैटिक बोन (गाल की हड्डी) और जाइगोमैटिक आर्च में कमिन्यूटेड फ्रैक्चर था।


तीन चरणों में जटिल पुनर्निर्माण


सर्जरी की चरणबद्ध योजना बनाई गई। पहले चरण में टूटी हुई जाइगोमैटिक बोन और आर्च का पुनर्निर्माण कर चेहरे की आकृति बहाल की गई। दूसरे चरण में क्षतिग्रस्त फेशियल नर्व की माइक्रोसर्जिकल रिपेयर की गई। नर्व का एक हिस्सा नष्ट होने के कारण सुरल नर्व ग्राफ्टिंग कर दोनों सिरों को जोड़ा गया। तीसरे चरण में कटे स्टेनसन्स डक्ट को जोड़कर उसकी निरंतरता के लिए इंट्राडक्टल स्टेंट लगाया गया।


टीमवर्क से मिली सफलता


इस सर्जरी में ओरल एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जरी टीम ने केंद्रीय भूमिका निभाई। टीम में डॉ. कुलदीप विश्वकर्मा, डॉ. भारत शुक्ला, डॉ. अपूर्वा और डॉ. दीक्षा शामिल रहीं। प्लास्टिक सर्जरी टीम से डॉ. अंकुर भटनागर, डॉ. निखिलेश और डॉ. सताक्षी ने सॉफ्ट-टिशू व नर्व रिकंस्ट्रक्शन किया। न्यूरोसर्जरी से डॉ. वेद, एनेस्थीसिया से डॉ. वंश, डॉ. विष्णु, डॉ. जगदीश और डॉ. आरती ने सहयोग दिया। नर्सिंग टीम में सुनीता फ्रेडरिक, सरिता, अंकिता और दीक्षा शामिल रहीं।