मंगलवार, 31 दिसंबर 2024

33 फीसदी में डिमेंशिया के दूसरी बीमारियां बढ़ा रही है जोखिम

 

24.9 फीसदी बुजुर्ग डिमेंशिया के शिकार


 


33 फीसदी में डिमेंशिया के दूसरी बीमारियां बढ़ा रही है जोखिम


 


 कुमार संजय


राजधानी के ग्रामीण इलाकों के 24.9 फीसद बुजुर्ग मनोभ्रंश(डिमेंशिया) के शिकार है। डिमेंशिया के शिकार बुजुर्गों में से 33 फीसदी में दूसरी परेशानियां भी देखने को मिली है। यह जानकारी राजधानी के ग्रामीण इलाकों से  350 बुजुर्गों पर शोध के बाद किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञों ने गहन शोध के बाद दी है। इस तथ्य को राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किया गया है। शोध रिपोर्ट के मुताबिक उम्र बढ़ने और मनोभ्रंश के बीच संबंध है। इसे संज्ञानात्मक हानि (सीआई) के रूप में जाना जाता है। न्यूरोडीजेनेरेटिव विकारों की भयावहता बढ़ रही है। सीआई( कॉग्निटिव इंपेयरमेंट)  शीघ्र पहचान से उचित उपचारात्मक उपाय शुरू करने में मदद मिलती है। रिपोर्ट के मुताबिक 60 से 75 आयु वर्ग के 350 बुजुर्गों पर शोध के बाद देखा कि 24.9 फीसदी सीआई के शिकार है। सीआई से वृद्ध वयस्क आबादी के एक-चौथाई प्रभावित है।  दूसरी परेशानियां की उपस्थिति से जोखिम बढ़ जाता है। इनमें शीघ्र स्क्रीनिंग और शीघ्र उपचार की जरूरत है।


 


रिपोर्ट के मुताबिक 60 से 75 आयु वर्ग के लोगों में मनोभ्रंश की परेशानी कम देखने को मिली जबकि 75 से अधिक आयु वर्ग के लोगों में परेशानी अधिक देखने को मिली। महिलाओं में पुरूषों के मुकाबले अधिक परेशानी देखने को मिली। देखा गया कि मनोभ्रंश के शिकार में से 33 फीसदी में उच्च रक्तचाप डायबिटीज, देखने और सुनने में परेशानी के साथ अन्य परेशानी थी जो डिमेंशिया के खतरे को बढ़ा सकता है।


 


 


 


इन्होंने किया शोध


 


किंग जार्ज मेडिकल विवि के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग की डा. प्रत्यक्षा पंडित मनोचिकित्सा विभाग से डा.  रीमा कुमारी, डा.  आदर्श त्रिपाठी और एसजीपीजीआई से बॉयोस्टैटिसटिक्स  प्रभाकर मिश्रा ने


कॉग्निटिव फंक्शनिंग एमंग कम्युनिटी डेवलिंग ओल्डर एडल्ट इन रूरल पापुलेशन आफ लखनऊ एंड इट्स एसोसिएशन विथ को मोरबिडिटी(लखनऊ की ग्रामीण आबादी में समुदाय में रहने वाले वृद्ध वयस्कों के बीच संज्ञानात्मक कार्यप्रणाली और सह-रुग्णता के साथ इसका संबंध)  विषय को लेकर शोध किया जिसे इंडियन जर्नल ऑफ साइकोलॉजिकल मेडिसिन ने स्वीकार किया है।   


 


 क्या है डिमेंशिया


 


डिमेंशिया में मस्तिष्क में तंत्रिका कोशिकाओं को नुकसान होता है, जो मस्तिष्क के कई क्षेत्रों में हो सकता है। डिमेंशिया लोगों को अलग तरह से प्रभावित करता है, जो मस्तिष्क के प्रभावित क्षेत्र पर निर्भर करता है।


 


यह स्मृति, सोच और सामाजिक क्षमताओं को प्रभावित करता है  जो किसी व्यक्ति में दिन-प्रतिदिन के कामकाज में बाधा उत्पन्न कर सकता है। वृद्ध वयस्कों में अल्जाइमर रोग होने पर डिमेंशिया हो सकता है


 


 


डिमेंशिया के शिकार- 24.9 फीसदी


60 से 75- 17.6 फीसदी


75 से अधिक- 50.6 फीसदी


पुरुष- 13.9 फीसदी


महिला- 33.9 फीसदी


साथ में दूसरी परेशानी- 33 फीसदी


उच्च रक्तचाप- 24.1 फीसदी


डायबिटीज- 28.6 फीसदी


देखने में परेशानी- 63.6 फीसदी


सुनने में परेशानी- 63.2 फीसदी


हड्डी और जोड़ों में परेशानी- 46.8 फीसदी


श्वसन तंत्र में परेशानी- 40 फीसदी

पीजीआई के डॉक्टरों ने पहली बार नवजात के दिल के छेद का किया ऑपरेशन

 

पीजीआई के डॉक्टरों ने पहली बार नवजात के दिल के छेद का किया ऑपरेशन 

- नई तकनीक पीडीए पर आधारित डिवाइस डालकर बंद किया छेद 



पीजीआई में पहली बार महज 45 दिन के नवजात के दिल का ऑपरेशन किया गया है। कॉर्डियोलॉजी विभाग के डॉक्टरों ने पहली बार नई पीडीए तकनीक का इस्तेमाल कर बच्चे के दिल के छेद को छोटी सी डिवाइस से बंद करने में सफलता पायी है। दावा है कि सरकारी संस्थानों में पूरे प्रदेश में इस तरह से किसी नवजात का पहली बार ऑपरेशन किया गया है। 

गोरखपुर निवासी दंपति के जुड़वा बच्चे हुए। पीजीआई के कॉर्डियोलॉजी विभाग के डॉ. अंकित साहू ने बताया कि दोनों बच्चे सात माह में पैदा हुए। प्रीमेच्योर प्रेग्नेंसी में बच्चे का वजन आठ सौ ग्राम था। उसे सांस लेने में तकलीफ के चलते वेंटिलेटर पर भर्ती रखा गया। दवाओं के इस्तेमाल से बच्चे के दिल के छेद को बंद करने की पूरी कोशिश होती रही, लेकिन दवाओं से छेद बंद करने में सफलता नहीं मिली। 

ऐसे में डॉक्टरों की टीम ने सारी जांचें करवाकर नवजात के दिल का ऑपरेशन करने की ठानी। दो दिन पहले डॉक्टरों की टीम ने अमेरिका से मंगाई गई नई तकनीक पीडीए पर आधारित पिकोलो डिवाइस (चार गुणे दो एमएम की डिवाइस) को बच्चे के दिल के छेद में डाल दिया, जिससे छेद हमेशा के लिए पूरी तरह से बंद हो गया। यह डिवाइस मटर के दाने के चौथाई हिस्से के बराबर की होती है। दावा है कि अब बच्चा पूरी तरह से सुरक्षित और स्वस्थ है। उसका वजन भी बढ़ने लगा है। वेंटिलेटर से जल्द ही हटाकर अगले सप्ताह तक नवजात की छुट्टी कर दी जाएगी। डॉ. अंकित ने बताया कि वैसे बच्चों की थोड़ी उम्र बढ़ने पर ही इस तरह का ऑपरेशन किया जाता है, लेकिन इस बार पीडीए तकनीक से डिवाइस का इस्तेमाल कर महज 45 दिन के नवजात के दिल के छेद को बंद करने में सफलता मिली है। यूपी के सरकारी चिकित्सा संस्थानों में ऐसा पहला ऑपरेशन हुआ है। 

ऑपरेशन करने वाली टीम 

ऑपरेशन करने वाली टीम में पीजीआई के कॉर्डियोलॉजी के डॉ. अंकित साहू, न्यूनिटोलॉजी से डॉ. सुशील व डॉ. कीर्ति, पीजीआई एल्युमिनाई व जबलपुर के डॉ. केएल उमा माहेश्वर शामिल रहे। 

क्या होता है पीडीए 

जन्म से पहले दिल में एक रक्तवाहिका होती है, जो महाधमनी को पल्मोनरी धमनी से जोड़ती है। इस रक्तवाहिका डक्टस आर्टीरियोसस से माता के प्रचुर ऑक्सीजन युक्त खून को बच्चे के शरीर में ले जाया जाता है। आमतौर पर जन्म के तुरंत बाद वाहिका बंद हो जाती है। जब डक्टस आर्टीरियोसस खुला होता है तो इसे पेटेंट डक्टस आर्टीरियोसस या पीडीए कहा जाता है।

रविवार, 15 दिसंबर 2024

एएनए जांच में शुरू किया खास पैटर्न की रिपोर्टिंग

 

एएनए जांच में शुरू किया खास पैटर्न की रिपोर्टिंग

 

बेस्ट टेक्नोलॉजिस्ट संजय प्रजापति क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी -आटो इम्यून डिजीज एसएलई का पता करने के लिए एंटी न्यूक्लियर एंटीबॉडी ( एएनए) की जांच इम्यूनो फोलरसेंस तकनीक से करना चाहिए। हमने विभाग की प्रमुख प्रो. अमिता अग्रवाल के सलाह से कई पैटर्न जिसको रिपोर्ट नहीं जाता रहा है करने की कोशिश किया।  टोपोआइसोमरेज  की रिपोर्ट शुरू किया जिससे स्क्लेरोसिस बीमारी का सटीक पता चलता है। छोटी और सस्ती जांच होती है।

डिजिटल एक्सरे से भी स्तन कैंसर की पहचान

 



डिजिटल एक्सरे से भी स्तन कैंसर की पहचान

 

बेस्ट रिसर्च पेपर एवार्ड डा. रिनेले इंडो सर्जरी - 20 मरीजों पर शोध किया है। मैमोग्राफी हर जगह नहीं होती है। डिजिटल एक्सरे करके भी स्तन कैंसर की आशंका का पता लगाया जा सकता है।  मैमोग्राफी 800 और डिजिटल एक्सरे 80-100 रुपए में होता है। इससे यह पता चलेगा कि स्तन कैंसर सर्जरी के बाद पूरा निकला या नहीं।

छोटे चीरे से स्पाइनल ट्यूमर का इलाज संभव

 

छोटे चीरे से स्पाइनल ट्यूमर का इलाज संभव

 

बेस्ट फैकल्टी सर्जिकल कैटेगरी अनंत मेहरोत्रा न्यूरो सर्जरी-

स्पाइन(रीढ़) के ट्यूमर का इलाज एंडोस्कोपी से संभव हो चुका है।  मरीज को डेढ़ सेमी का चीरा लगाया जाता है। इससे मरीज में छोटा निशान, दर्द कम होता है, खून कम बहता है। दो दिन में मरीज की छुट्टी कर देते हैं। पहले 10 सेमी का चीरा लगाते और छह सात दिन ठीक होने में लगता था। 50 से अधिक मरीजों का ऑपरेशन इस विधि से किया।

पैराथायरायड ग्लैंड के ट्यूमर की सर्जरी से किडनी बचाना संभव

 



पैराथायरायड ग्लैंड के ट्यूमर की सर्जरी से किडनी बचाना संभव

 

बेस्ट रिसर्च पेपर अवार्ड  डा. दिब्या बेहरा प्रियदर्शिनी इंडो सर्जरी- पैरा थायराइड ग्लैंड में ट्यूमर होने पर हड्डी से कैल्शियम निकलने   लगता है जो पेशाब के रास्ते निकलता है। इससे किडनी खराब हो जाता है। हमने देखा कि पैरा थायराइड ग्लैंड की सर्जरी के बाद देखा गया कि कैल्शियम का क्षरण बंद हो जाता है ।   किडनी को खराब होने से बचाया जा सकता है। इसका इलाज न होने पर प्रत्यारोपित किडनी भी खराब हो जाता है।

एनएलआऱ से ब्रेन स्ट्रोक की गंभीरता का लगेगा पता

 




एनएलआऱ से ब्रेन स्ट्रोक की गंभीरता का लगेगा पता

 

बेस्ट रिसर्च अवार्ड प्रो. रुचिका टंडन न्यूरोलॉजी-   

न्यूट्रोफिल और लिम्फोसाइट अनुपात के जरिए इस्केमिक  ब्रेन स्ट्रोक की गंभीरता का आकलन किया जा सकता है। यह अनुपात शरीर में इंफ्लामेशन मार्कर के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। जांच में केवल 50 रुपये खर्च आता है। न्यूट्रोफिल और लिम्फोसाइट अनुपात (एनएलआर) गणना न्यूट्रोफिल की संख्या को लिम्फोसाइटों की संख्या से विभाजित करके की जाती है।  

जवानी में होने वाली डायबिटीज अधिक खतरनाक

 



जवानी में होने वाली डायबिटीज अधिक खतरनाक


 


पीजीआई ने 800 लोगों पर शोध के बात निकाला तथ्य


जवान लोगों में इंसुलिन बनाने वाला सेल तेजी से होता है खराब


कुमार संजय। लखनऊ


जवानी में होने वाली डायबिटीज अधिक उम्र के लोगों के मुकाबले अधिक खतरनाक है। संजय गांधी पीजीआई के इंडोक्राइनोलॉजी विभाग के चिकित्सा विज्ञानियो ने टाइप टू डायबिटीज ग्रस्त 800 लोगों पर शोध के बाद यह जानकारी हासिल की है। 40 से कम उम्र के पहले डायबिटीज ग्रस्त 400 लोग शामिल है। प्रो. सुभाष यादव और डा. आयुषी सिंघल के मुताबिक जवानों में बीटा सेल जो इंसुलिन बनाता है वह अधिक उम्र के लोगों को मुकाबले पांच गुना अधिक तेजी से खराब होता है जिसके कारण इनमें डायबिटीज अधिक उग्र होता है। युवा वर्ग के ऊपर काम की जिम्मेदारी के साथ तमाम जिम्मेदारी होती है जिसके कारण यह शुगर को नियंत्रित करने पर कम ध्यान देते है। सुगर लंबे समय तक नियंत्रित न होने के कारण इनमें डायबिटीज के कारण सूक्ष्म नसों ( माइक्रो वैस्कुलर ) की कोई परेशानी 69 फीसदी में देखी गयी है। सूक्ष्म नसों में परेशानी के कारण नेफ्रोपैथी( किडनी की परेशानी), रेटिनोपैथी( आंख की परेशानी) , न्यूरोपैथी ( नर्व ) की परेशानी होती है।


40 से कम वाले लोगों में जल्दी इंसुलिन


 शोध में देखा गया कि 15 साल तक डायबिटीज के साथ जीवन गुजारने वाले 40 से कम में इंसुलिन 62 फीसदी में इंसुलिन शुरू करना पड़ा जबकि अधिक उम्र के केवल 41 फीसदी लोगों में इंसुलिन शुरू करना पड़ा। 40 से कम वालों में मेटाबोलिक सिंड्रोम 85 फीसदी लोगों में देखने को मिली जबकि अधिक उम्र के 88 फीसदी लोगों में  देखने को मिली । 40 से कम उम्र में मेटाबोलिक सिंड्रोम और डायबिटीज के बीच सीधा संबंध है। 40 से कम उम्र के 80.1 फीसदी में मोटापा ( बीएमआई 23 से अधिक) , तोंद 70.8 फीसदी में देखने को मिला।


 


दिल को बचाने वाले कोलेस्ट्रॉल युवा डायबिटीज में कम


 


इनमें ट्राइग्लिसराइड जो दिल की बीमारी का कारण साबित होता है 47 फीसदी में और अधिक उम्र 38 फीसदी में देखने को मिला। बैड कोलेस्ट्रॉल एलडीएल दोनों वर्ग को 43 फीसदी में देखने को मिला। इन तमाम शोध के आंकड़ों से साबित होता है युवा अवस्था में होने वाला डायबटीज अधिक खतरनाक है।


 


 कम कर सकते है खतरा


 


विशेषज्ञों का कहना है कि इसके प्रकोप से बचने के लिए रेगुलर फालोअप, समय से दवा लेना, भोजन पर नियंत्रण और लाइफ स्टाइल में बदवा जरूरी है। इस शोध को इंडोक्राइनोलॉजी बिरादरी के लोगों ने स्वीकार किया है। इस शोध को हाल में पीजाई में आयोजित रिसर्च शो केस में भी ऱखा गया था।

सेप्टीसीमिया के कारक बन सकता है हवा में रहने वाले बैक्टीरिया- प्रो. चिन्मय साहू

 



सेप्टीसीमिया के कारक बन सकता है हवा में रहने वाले बैक्टीरिया- प्रो. चिन्मय साहू

 

कैंसर , आईसीयू में भर्ती में होने वाले मरीजों में सेप्टीसीमिया कारण हवा और मिट्टी में रहने वाला बैक्टीरिया कारण हो सकता है। माइक्रोबायोलॉजी विभाग के प्रो. चिन्मय साहू  ने अपने शोध में बताया कि इन मरीजों में इम्यून सिस्टम कमजोर होता है, जिसके कारण सामान्य बैक्टीरिया गंभीर परेशानी खड़ी करते है। वरखोलडरिया  सामान्य बैक्टीरिया है। हमने माल्डी टांफ तकनीक से एक दिन अंदर रक्त में इस बैक्टीरिया के संक्रमण की पहचान करने के साथ बताया कि इसमें सामान्य एंटीबायोटिक डाक्सीसाइक्लीन ही कारगर है। देखा कि कैंसर के 10 फीसदी में यह बैक्टीरिया सेप्टीसीमिया का कारण था जो सही इलाज से ठीक हो गया। प्रो. साहू ने बताया कि लंबा बुखार सहित अन्य परेशानी होने पर संक्रमण गंभीर होने से पहले मरीज को बचाने के लिए इस सामान्य बैक्टीरिया के संक्रमण की आशंका पर ध्यान देना चाहिए।     

किडनी में रक्त प्रवाह बढ़ा कर लिवर को आराम देना संभव- प्रो. गौरव पाण्डेय




 किडनी में रक्त प्रवाह बढ़ा कर लिवर को आराम देना संभव- प्रो. गौरव पाण्डेय

 

किडनी में रक्त प्रवाह बढा कर लीवर सिरोसिस के मरीजों के पेट में

 बार-बार पानी भरने की परेशानी( एसाइटिस) को कम करना संभव है।

 गैस्ट्रो एंटरोलॉजिस्ट प्रो. गौरऴ पाण्डेय ने 128 लीवर सिरोसिस के

 मरीजों में शोध के बाद यह साबित किया। है। लिवर सिरोसिस के

 मरीजों के पेट में पानी भरने का कारण किडनी में रक्त प्रवाह कम

 होना है। रक्त प्रवाह बढ़ाने के लिए अल्फा वन एड्रजनिक रीसेप्टा

 एगोनिस्ट   दवाएं देने से किडनी में रक्त प्रवाह बढ़ जाता है । इन

 दवाओं का इस्तेमाल दूसरे परेशानियों के लिए किया जाता है। हमने

 इस दवा का शोध  लीवर सिरोसिस के मरीजों पर किया जिसके

 परिणाम बेहतर मिले है। एसाइटिस कम होने पर बार –बार मरीज को

 भर्ती नहीं होना पड़ेगा। संक्रमण की आशंका कम होगी।   

शिशु में शुगर का घटा स्तर तो पेनक्रियाज में ट्यूमर की आशंका- प्रो. बसंत कुमार





 शिशु में शुगर का घटा स्तर तो पेनक्रियाज में ट्यूमर की आशंका- प्रो. बसंत कुमार

 

 

11 माह की बच्ची जिसमें शुगर का स्तर कमी की परेशानी लेकर हमारे पास आयी। हम लोगों ने तमाम परीक्षण के बाद देखा कि प्रैक्रियाज में ट्यूमर था जिसके कारण अधिक इंसुलिन बन रहा था। अधिक इंसुलीन बनने के कारण शुगर का स्तर काफी कम था। इस परेशानी के कारण शरीर और दिमाग में ऑक्सीजन की कमी के कारण ब्रेन मेज हो सकता था। इस रेयर केस होते है ऐसे मामले 50 हजार में से एक किसी बच्चे में होते है। समय पर इलाज से बच्चे का जीवन बचाया जा सकता है। पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के प्रमुख प्रो. बसंत कुमार और  डा. पूजा प्रजापति ने इस केस को शोध के रूप में रखा । बताया कि दवा से शुगर नहीं बढ़ा तो हमने प्रैक्रियाज के आंदर जटिल  सर्जरी कर ट्यूमर ग्रस्त भाग को निकाला जिसके बाद सामान्य पैंक्रियाज के बीट सेल सामान्य मात्रा  इंसुलिन बनने लगा । बच्ची का शुगर लेवल ठीक हो गया। हमारे विभाग से 24 शोध पत्र प्रस्तुत किया गया।

 

वायरस के संक्रमण के बाद एड्रेनल ग्लैंड की कार्य में आ सकती है कमी- प्रो. सुभाष यादव

 




वायरस के संक्रमण के बाद एड्रेनल ग्लैंड की कार्य में आ सकती है कमी- प्रो. सुभाष यादव

 

कोविड संक्रमण के बाद देखा गया कि लोगों में लंबे समय तक सुस्ती कमजोरी के परेशानी रही है। इसका कारण जानने के लिए 302 कोविड से उबर चुके लोगों पर शोध किया तो देखा  गया कि एड्रिनल ग्लैंड की कार्य प्रणाली में कमी है। यह  प्राकृतिक स्टेरॉयड बनाता है । स्टेरॉयड की कमी के कारण सुस्ती और थकान की परेशानी होती है। स्टेरॉयड की कमी  12 फीसदी  लोगों में देखी गयी। देखा गया कि एक साल बाद ग्लैड की कार्य प्रणाली में सुधार होना शुरू हुई । स्टेरॉयड की मात्रा बढ़नी शुरू हुई ।  दो साल में मात्रा पूरी तरह सामान्य हो गयी । इंडोक्राइनोलॉजी विभाग के प्रो. सुभाष यादव ने इस शोध से साबित किया कि वायरस के संक्रमण के बाद कमजोरी –थाकान के परेशान होने की जरूरत नहीं है। यह एक सामान्य शारीरिक प्रक्रिया है। ऐसा दूसरे वायरस के संक्रमण के बाद भी हो सकता है।

 

समुद्री राज्य के लोगों को कम उम्र में हो सकती है किडनी की परेशानी- प्रो. नारायण प्रसाद

 



समुद्री राज्य के लोगों को कम उम्र में हो सकती है किडनी की परेशानी- प्रो. नारायण प्रसाद

समुद्री इलाकों के किनारे रहने वाले लोगों में किडनी की बीमारी की आशंका सामान्य से अधिक है। नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. नारायण प्रसाद एशिया के कई देशों के आंकड़ों पर शोध के बाद बताया है कि किडनी की खराबी के कारण उच्च रक्तचाप, डायबिटीज के साथ अन्य है लेकिन तमाम लोगों में कारण का पता नहीं होता है। ऐसे लोगों पर शोध किया तो देखा कि जो  समुद्री इलाके के राज्य के लोगों में किडनी के ऐसे मरीजों की संख्या अधिक है जिनमें कारण का पता नहीं है। देखा गया कि इन राज्यों के लोगों में कम उम्र में किडनी की परेशानी के लक्षण नहीं आते है लेकिन किडनी सिकुड़ी होती है जिससे किडनी काम नहीं करती है। कारण विषाक्त तत्व हो सकता है।

बुधवार, 11 दिसंबर 2024

मूत्र के रास्ते आ रहा था माल पीजीआई के डॉक्टरों ने किया कमाल बनाया सही रास्ता

 

पीजीआई




 तीन सर्जरी के बाद सामान्य हुई जिंदगी आगे होगी हार्मोनल थेरेपी 






-पहले हुई दो सर्जरी लेकिन बढ़ती गयी परेशानी


 


-सर्जरी के  बाद मूत्र द्वार से आने लगा था मल


- पहले लिया होता विशेषज्ञ से सलाह तो शायद बच जाती ओवरी


   


 


हरदोई की रहने वाली 15 वर्षीय बबीता के पेट में दर्द से निजात दिलाने के लिए बच्चेदानी के मुंह चौड़ा करने की सर्जरी हुई लेकिन परेशानी दूर तो हुई नहीं पेशाब के रास्ते मल भी आने लगा जिंदगी और दूभर हो गयी। संजय गांधी पीजीआई के गैस्ट्रो सर्जरी विभाग मुख्य सर्जन प्रो. अशोक कुमार की टीम ने तीन सर्जरी किया जिससे काफी हद तक जिंदगी सामान्य हो गयी है। पहले ओवरी निकाल दी गयी इसलिए आगे हार्मोनल थेरेपी देना पड़ेगा जो महिलाओं के शारीरिक और मानसिक गुण के लिए जरूरी है।


 


 पहले हुई दो सर्जरी


 


 इस सर्जरी से पहले बबीता दो सर्जरी झेल चुकी है। बबीता की मां ने बताया कि तीन साल पहले पेट में दर्द की परेशानी हुई जिसके लिए वह इलाज लिया लेकिन कोई फायदा न होने पर शाहजहांपुर ने एक सर्जन को दिखाया तो बताया बच्चेदानी का मुंह छोटा है जिसके कारण मासिक स्राव ने निकलने वाले रक्त बाहर नहीं पा रहा है । रक्त जमा होने के कारण दर्द होता है । सर्जन ने बच्चे दानी का मुंह चौड़ा करने के लिए सर्जरी किया जिसमें आंत कट गयी। इसके कारण रक्त तो बाहर आने लगा तो तीन महीने ठीक रहा । इसके बाद पेट में दर्द की परेशानी के साथ मूत्र के रास्ते मल आने लगा। परिजन  अलीगढ़ एक अस्पताल गए जहां पर जांच के बाद पता चला कि बच्चेदानी विकसित नहीं है। वजाइना छोटा है और रेक्टो वेजाइनल फिस्टुला बन गया जिसके कारण यह परेशानी है। सर्जरी करके बच्चेदानी हटा दिया। मल और मूत्र का रास्ता अलग कर दिया । मल के लिए अलग से बैग लगा दिया। इससे उसे मानसिक और सामाजिक परेशानी हो रही थी। परिजन संजय गांधी पीजीआई के गैस्ट्रो सर्जरी विभाग में संपर्क किया तो यहां पर मलद्वार बनाया ।  आंत का रास्ता मलद्वार से जोडा। वेजिनोप्लास्टी की वजाइना को ठीक किया। प्रो. अशोक ने सलाह दिया लंबे समय पेट में दर्द की परेशानी होने पर विशेषज्ञ से सलाह लेना चाहिए । 


 


 


 


इस टीम ने दिया सर्जरी को  अंजाम


 


प्रो. अशोक कुमार फर्स्ट, डा. सारंगी, डा. कुश , डा. शाहरूख . डा. रोहित निश्चेतना विशेषज्ञ डा.अरूणा भारती . नर्सिंग आफीसर सविता

सोमवार, 9 दिसंबर 2024

रक्त का थक्का बनने से रोक बचाया जाएगा दिल और दिमाग





 रक्त का थक्का बनने से रोक बचाया जाएगा दिल और दिमाग


थक्के बनने रोकना और रक्तस्राव का जोखिम रोकना है बड़ी चुनौती






संजय गांधी पीजीआई के हृदय रोग विशेषज्ञ प्रो. सत्येंद्र तिवारी ने बताया कि एक सत्र में रक्त के थक्के (थ्रोम्बोसिस) और इसके इलाज के नए तरीकों पर चर्चा हुई । थ्रोम्बोसिस रक्त वाहिकाओं में थक्के बनने की स्थिति को कहते हैं, जिससे रक्त प्रवाह बाधित हो जाता है और हार्ट अटैक या ब्रेन स्ट्रोक जैसी समस्याएं हो सकती हैं।


 बताया कि थक्के बनने को रोकने और रक्तस्राव के जोखिम को कम करने के बीच संतुलन बनाए रखना हृदय रोगों के इलाज में एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने यह भी बताया कि जिन मरीजों को थक्के की दवाएं दी जा रही हैं, उन्हें नियमित फॉलोअप पर रहना चाहिए, ताकि डॉक्टर दवाओं की मात्रा को समय पर बदल सकें और दोनों जोखिम को कम किया जा सके।


 बताया कि थ्रोम्बो एम्बोलिक घटनाओं के कारण दुनियाभर में होने वाली मौतों में एक तिहाई मामले होते हैं, जो नए उपचारों की आवश्यकता को और बढ़ा देते हैं। इस संदर्भ में, बिवालिरुडिन नामक दवा को हाल ही में प्रभावी पाया गया है। यह एंजियोप्लास्टी से गुजरने वाले मरीजों में थक्के को रोकने में हेपरिन से अधिक प्रभावी साबित हुआ है।


इसके अलावा, उच्च रक्तस्राव वाले मरीजों के लिए कम समय तक एंटीप्लेटलेट थेरेपी कारगर हो सकती है। एंजियोप्लास्टी के बाद क्लोपिडोग्रेल और एस्पिरिन के सुरक्षित विकल्प के रूप में उभरे हैं। एंटी थ्रोम्बोटिक थेरेपी में बदलाव की आवश्यकता है ताकि मरीजों को सबसे अच्छा इलाज मिल सके और रक्तस्राव का जोखिम कम किया जा सके।


 


प्रो. रूपाली खन्ना ने बताया कि  एंटीप्लेटलेट और एंटीकोगुलेंट दवाओं के बारे में बताया कि रक्त के थक्के और रक्तस्राव दोनों को रोकने के लिए इस्तेमाल होती हैं। इनमें एस्पिरिन, क्लोपिडोग्रेल, डिपिरिडामोल और एब्सिक्सिमैब जैसी शक्तिशाली दवाएं शामिल हैं। इसके अलावा, वाल्व रिप्लेसमेंट कराने वाले मरीजों को अकेले मौखिक एंटीकोगुलेंट दवाएं पर्याप्त हो सकती हैं।, नई दवाओं और उपचारों की खोज से थक्के बनने और रक्तस्राव की समस्या से जूझ रहे मरीजों के लिए बेहतर समाधान मिल सकता है

कार्डियोवर्टर-डिफाइब्रिलेटर हाई रिस्क के दिल को देगा जीवन

 

कार्डियोवर्टर-डिफाइब्रिलेटर हाई रिस्क के दिल को देगा जीवन


सार्वजनिक स्थानों पर स्वचालित बाहरी डिफिब्रिलेटर लगाने की सलाह




 बत्रा अस्पताल के वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. आर. डी. यादवे ने बताया कि अचानक हृदय का काम करना बंद करना ( सडेन कार्डियक डेथ-एसीडी)  मौत का एक प्रमुख कारण है। अचानक मृत्यु के मामलों मे  सडेन कार्डियक डेथ या  हृदय संबंधी 63 फीसदी होता है।


एससीडी अक्सर बिना किसी चेतावनी के होती है।  एससीडी के लक्षणों में अचानक गिरना, नाड़ी का न मिलना और सांस न आना शामिल हैं। इन स्थितियों में त्वरित चिकित्सा सहायता की आवश्यकता होती है जिसमें  डिफाइब्रिलेशन और सीपीआर की महत्वपूर्ण भूमिका है। सार्वजनिक स्थानों पर स्वचालित बाहरी डिफिब्रिलेटर (एईडी) की उपलब्धता होनी चाहिए। डॉ. यादवे ने उच्च जोखिम वाले मरीजों के लिए इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर-डिफाइब्रिलेटर (आईसीडी) लगना चाहिए। इससे हार्ट को बंद से बचाया जा सकता है।  यह उपकरण वेंट्रीकुलर टैकीकार्डिया या फाइब्रिलेशन के मामलों में मृत्यु दर को कम करने में कारगर साबित हुए हैं। वे आईसीडी तकनीक में हुए नए बदलावों के बारे में बताया कि  कम जटिलताओं के साथ अधिक प्रभावकारी हैं।  एससीडी की रोकथाम के लिए बचपन से ही स्वास्थ्य पर ध्यान देना चाहिए  । वे अस्पताल के बाहर कार्डियक अरेस्ट के मामलों में एईडी पहुंचाने के लिए ड्रोन के उपयोग जैसे नए समाधानों पर भी चर्चा किए। स्वास्थ्य देखभाल में लगे लोगो को  एससीडी से निपटने के लिए आवश्यक उपकरण और जानकारी देने से मृत्यु दर को कम किया जा सकता है।

आंख बताएगी दिल का हाल

आंखें बताएंगी दिल का हाल, रेटिना की जांच से पता चलेगा हृदय रोग का खतरा एसजीपीजीआइ में देश की पहली एआइ आधारित आक्टा मशीन से होगी रेटिना की जांच लखनऊ: एक साधारण सी आंखों की जांच दिल की बीमारी के खतरे को बताएगी। किसी व्यक्ति को हृदय रोग का खतरा कितना है, इस जांच से पता चल सकेगा। संजय गांधी पीजीआइ के विशेषज्ञ आर्टिफिशियल इंटलीजेंस (एआइ) आधारित आक्टा मशीन से रेटिना की स्कैनिंग कर दिल धमनियों में ब्लाकेज का पता लगाएंगे। इससे रोगियों के छोटे ब्लाकेज को दवाओं से खत्म करने में मदद मिलेगी। संस्थान में कार्डियोलाजी विभाग के प्रो. नवीन गर्ग और नेत्र रोग विभाग के प्रमुख प्रो. विकास कनौजिया ने इस पर शोध भी शुरू किया है, जिसके शुरुआती परिणाम अच्छे आ रहे हैं। शोध के बाद ब्लाकेज से बचाव और जागरूकता के लिए नई गाइडलाइन बनाने की तैयारी है। प्रो. नवीन गर्ग ने बताया कि संस्थान के नेत्र रोग विभाग में करीब डेढ़ करोड़ कीमत की आधुनिक एआइ आक्टा मशीन लगाई गई है। इसकी खास बात है कि सामान्य मशीन के मुकाबले रेटिना की सटीक जांच हो सकेगी। मशीन में रोगी की आंखें लगाने के कुछ सेकेंड में रेटिना के आकार और नसों के बदलाव की पूरी रिपोर्ट मिल जाएगी। रिपोर्ट के जरिए दिल की धमनियों के ब्लाकेज की सही जानकारी मिलेगी। दरअसल, शरीर में रक्त संचार घटने पर या पर्याप्त न होने पर इसका असर आंखों के रेटिना की कोशिकाओं पर भी होता है। इसकी जांच से भविष्य में हार्ट अटैक का खतरा कम किया जा सकेगा। आने वाले समय में इस मशीन की उपयोगिता तेजी से बढ़ेगी। इन रोगियों पर शोध प्रो. नवीन गर्ग के मुताबिक, संस्थान में एंजियोप्लास्टी करा चुके रोगियों को शोध में शामिल किया गया है। नेत्र रोग विभाग के प्रमुख डा. विकास कनौजिया की मदद से रोगियों की आंख एआई आधारित आप्टिकल कोहेरेंस टोमोग्राफी एंजियोग्राफी (आक्टा) मशीन से जांच कर रेटिना में बदलाव की जानकारी हासिल की जाएगी। रेटिना की जांच में जिन भी मरीजों में लक्षण दिखेगा, उन्हें हृदय रोग विशेषज्ञ देखेंगे।हालांकि, शोध में डायबिटीज और हाइपरटेंशन के रोगियों को शामिल नहीं किया जाएगा। प्रो. गर्ग का कहना है कि आमतौर पर जब तक कोई व्यक्ति हृदय रोग से नहीं जूझता, इससे जुड़ी जांचें नहीं कराना चाहता है। ऐसे में रेटिना की जांच मरीज की आंखों के साथ उसके दिल का हाल भी बता सकेगी। समय से हृदय रोगों का खतरा पता चलने पर दवा, खानपान और व्यायाम के जरिए इसे रोका जा सकेगा। ऐसे में कई मरीजों को एंजियोप्लास्टी की जरूरत नहीं पड़ेगी।

रविवार, 8 दिसंबर 2024

दिल की मांसपेशियों की मोटाइ से होने वाली परेशानी से राहत संभव



 दिल की मांसपेशियों मोटाइ  को परेशानी राहत   संभव


अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी के डॉ. बी. हेडली विल्सन और संजय गांधी पीजीआई के हृदय रोग विभाग के प्रमुख प्रो. आदित्य कपूर ने बताया कि  हाइपरट्रॉफिक कार्डियोमायोपैथी (एचसीएम) के बारे में बताया कि यह एक जटिल हृदय रोग है जो सार्कोमेरिक जीन उत्परिवर्तन के कारण होता है। इससे बाएं वेंट्रिकुलर हाइपरट्रॉफी (मांसपेशियों का मोटा होना) और हाइपरकॉन्ट्रैक्टिलिटी (अत्यधिक संकुचन) की समस्या उत्पन्न होती है।

बताया कि  रोग की गंभीरता और संभावित जोखिमों का आकलन करने में इकोकार्डियोग्राफी और कार्डियक मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (सीएमआर) की अहम भूमिका है। इसके अलावा, अचानक हृदय मृत्यु (एससीडी) के जोखिम को कम करने के उपायों की आवश्यकता पर भी ध्यान दिया गया है।

इलाज के बारे में बताया कि  मायोसिन इनहैबिटर दवाओं पर शोध चल रहा है। इसके अलावा, पर्क्यूटेनियस सेप्टल एब्लेशन, जीन थेरेपी, और आरएनए-आधारित उपचार जैसे भविष्य के उपचार विकल्पों की संभावनाओं पर भी चर्चा की गई है।

क्या है हाइपरट्रॉफिक कार्डियोमायोपैथी

हाइपरट्रॉफिक कार्डियोमायोपैथी एक ऐसी समस्या है, जिसमें दिल की मांसपेशी असामान्य रूप से मोटी हो जाती है। इसके कारण दिल के लिए रक्त पंप करना मुश्किल हो जाता है। इस बीमारी का अक्सर पता नहीं चल पाता है क्योंकि अधिकतर मामलों में कोई लक्षण नहीं होते और रोगी को कोई बड़ी समस्या महसूस नहीं होती। हालांकि, कुछ लोगों में सांस लेने में कठिनाई, छाती में दर्द, या दिल की असामान्य धड़कन (अरिद्मिया) जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

इसका इलाज सर्जरी से किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, दिल की धड़कन को सामान्य या धीमा करने के लिए दवाइयोंया शरीर के अंदर लगाए जाने वाले उपकरणों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।


दवाएं हार्ट फेल्योर मरीज की कम कर सकती है परेशानी


 नई दवाएं हार्ट फेल्योर मरीज की कम कर सकती है परेशानी

एनटी-प्रोबीएनपी   बायो मार्कर से जल्दी पकड़ में आता है  हार्ट फ्लोयर

गाइड लाइन डायरेक्टेड मेडिकल थिरेपी हार्ट फेल्योर मरीजो दे रही है राहत


संजय गांधी पीजीआई की हृदय रोग विशेषज्ञ प्रो. रूपाली खन्ना ने बताया कि हार्ट फेल्योर (एचएफ)  बढ़ती उम्र की आबादी और इसकी जटिल पैथॉफिजियोलॉजी के कारण चुनौती है। गाइडलाइन डायरेक्टेड मेडिकल थेरेपी से मरीजों को काफी आराम मिल रहा है। डायबिटीज के इलाज में काम आने वाला रसायन सोडियम-ग्लूकोज को ट्रांसपोर्टर -2 अवरोधक (एसजीएलटी2आई), शरीर में पानी मात्रा कम करने के साथ रक्त प्रवाह सामान्य करने वाला रसायन  एंजियोटेंसिन रिसेप्टर-नेप्रैलीसिन अवरोधक (एआरएनआई), और गैर-स्टेरायडल मिनरल कॉर्टिकॉइड रिसेप्टर विरोधी (एमआरए) शामिल हैं। हृदय विफलता के रोगियों में अस्पताल में भर्ती होने और मृत्यु दर में लगातार कमी देखी गई है। ये दवाएँ न केवल हृदय संबंधी परिणामों में सुधार करती हैं बल्कि मधुमेह और किडनी रोग जैसी बीमारियों के प्रबंधन में भी सहायक होती हैं। यह दवाएं अस्पताल में भर्ती होने की दर को कम कर सकते हैं।  हृदय विफलता(हार्ट फेल्योर)की घटनाओं और हृदय संबंधी मृत्यु की दर में कमी देखी गई।नवीन उपचार विधियाँ में इंट्रा वेनस आयरन थेरेपी कारगर साबित हो रही है। प्रो. रूपाली खन्ना ने बताया कि आयरन की कमी और रोगियों में कार्या क्षमता और जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद कर रही हैं। इसके साथ-साथ डिवाइस-आधारित उपचारों में भी महत्वपूर्ण प्रगति हो रही है। कार्डियक रीसिंक्रनाइज़ेशन थेरेपी (सीआरटी), इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर डिफाइब्रिलेटर (आईसीडी) और बाएं वेंट्रिकुलर सहायता उपकरण (एलवीएडी) जैसे उन्नत तकनीकी उपकरणों से रोगियों को बेहतर परिणाम मिल रहे हैं। ब्राकोरीसेप्टर एक्टिवेशन थिरेपी और पल्मोनरी प्रेशर मॉनिटरिंग से हृदय विफलता वाले रोगियों के इलाज में सुविधा मिल रही है ।  एनटी-प्रोबीएनपी   बायोमार्कर और कार्डियक एमआरआई जैसे इमेजिंग तकनीकों के माध्यम से हृदय विफलता की डायग्नोसिस  और अधिक सटीक हो रही है।  समय पर उपचार की शुरुआत हो सकती है और रोगियों की जीवन गुणवत्ता में सुधार हो सकता है।

एरोटिक वाल्व रिप्लेसमेंट में नई खोज: सही वाल्व का चयन बचाएगा मरीजों की जान

 

एरोटिक वाल्व रिप्लेसमेंट में नई खोज: सही वाल्व का चयन बचाएगा मरीजों की जान

वाल्व प्रत्योरण के बाद कम लोगों में होगी परेशानी

 

पीजीआई में खोजा सही वाल्व के चयन का तरीका

 

हर मरीज के लिए अलग अलग एरोटिक वाल्व की होती है जरूरत

 

36.4 फीसदी में गंभीर रूप खराब लगा मिला एरोटिक वाल्व

 

कुमार संजय। लखनऊ

 

संजय गांधी पीजीआई के कार्डियोलॉजी विभाग की प्रो. अंकित साहू ने एरोटिक वाल्व रिप्लेसमेंट (एवीआर) के मरीजों के लिए एक महत्वपूर्ण शोध प्रस्तुत किया, जिसमें वाल्व चयन के सही तरीके पर प्रकाश डाला गया। शोध से यह स्पष्ट हुआ है कि हर मरीज के लिए एक अलग एरोटिक वाल्व की जरूरत होती है और एक जैसा वाल्व सभी मरीजों में प्रभावी नहीं होता।

शोध में 55 रोगियों का 2डी-ईको के माध्यम से मूल्यांकन किया गया, जिसमें पाया गया कि 36.4 फीसदी मरीजों में गंभीर वाल्व मिसमैच (प्रोस्थेसिस पेशेंट मिसमैच - पीपीएम) पाया गया। इस समस्या का असर महिलाओं में अधिक था, जहां 25.5 फीसदी महिलाओं में यह गंभीर समस्या थी। शोध में यह भी पाया गया कि शरीर के आकार और वाल्व के आकार के बीच घनिष्ठ संबंध है, जो वाल्व चयन की सफलता को प्रभावित करता है।

प्रो. साहू ने बताया कि सही वाल्व का चयन करते समय मरीज की उम्र, लिंग और शरीर के आकार को ध्यान में रखना जरूरी है। इससे न केवल इलाज की सफलता बढ़ती है, बल्कि मरीज को वाल्व रिप्लेसमेंट के बाद होने वाली समस्याओं से बचाया जा सकता है।

वहीं, पीपीएम (वाल्व मिसमैच) के कारण मरीजों की मृत्यु दर 20-35 फीसदी तक हो सकती है। ऐसे में सही वाल्व के चयन से गंभीर समस्याओं को टाला जा सकता है। प्रोफेसर साहू ने इस शोध को कार्डियोलॉजी सोसाइटी ऑफ इंडिया के अधिवेशन में प्रस्तुत किया और इसे हृदय रोगियों के इलाज में एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया।

क्या है एरोटिक वाल्व की परेशानी?

एरोटिक वाल्व में खराबी होने पर रक्त का प्रवाह सही तरीके से नहीं हो पाता, जिससे दिल पर दबाव बढ़ता है और हार्ट फेल हो सकता है। इसके इलाज के लिए सर्जरी के दौरान पुराने खराब वाल्व को हटा कर कृत्रिम वाल्व लगाया जाता है, जिससे रक्त प्रवाह सामान्य हो सके।

वाल्व का महत्व

हृदय में चार प्रकार के वाल्व होते हैं - ट्राइकसपिड, पल्मोनरी, माइट्रल, और एरोटिक। ये वाल्व रक्त प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए खुलते और बंद होते हैं। अगर कोई वाल्व ठीक से नहीं खुलता या बंद नहीं होता, तो इससे रक्त प्रवाह पर असर पड़ता है, जिससे दिल पर अतिरिक्त दबाव बनता है।