बात 1992-93 की है जब में केवल समाचार पढ़ता खास तौर पर रूमा सिन्हा अौर जफर इरशाद की लिखी खबरे क्यों कि मेरी रूचि शुरू से इस विषय पर रही । इन दोनों को पढ़ते -पढ़ते मैने लिखना सीखा अौर स्वंत्र चेतना से शुरूअात किया उस समय यहां संपादक नरेंद्र भदौरिया जी थे...इसके बाद जो सफर शुरू हुअा वह कुबेर टाइम्स, हिन्दुस्तान, अमर उजाला, जनसत्ता एक्सप्रेसे से अाज तक जारी है। रूमा सिन्हा अौर जफर इरशाद से पहले मेडिकल एंड साइंस पर कोई ध्यान नहीं देता था छपता भी तो केवल इतना कि सेमीनार शुरू अौर खत्म किसने क्या कहा ...कैसे बीमारी पहचानी जाए, किसने क्या शोध किया यह सब नहीं छपता था . इससे शोध करने वाले वैज्ञानिकों अौर काम करने वाले चिकित्सक भी केवल अपनी बिरादरी में चर्चिच होते थे लेकिन पत्रकारिता की नई शुरूअात करने वाले इन दोनों लोगों को कारण इन्हें भी चर्चा मिलने लगी। रूमा सिन्हा अौर जफर इरशाद मेरे मेंटर है...इनकी लेखऩी को एक बार फिर नमन करता हूं....
मंगलवार, 4 जुलाई 2017
पहले तो खूब करते थे पुरानी पेंशन व्यवस्था की सिफारिश अब गए भूल
भारतीय जनता पार्टी के नेता जब सत्ता में नहीं होते है तो देश और प्रदेश की जनता से कई सारे वादे करते है और उसके लिए दूसरी सरकारों को जमकर कोसते हैं। मगर जब ये सत्ता में आते हैं तो जनता को किये वाडे भूल जाते है और सत्ता की मलाई काटने लग जाते हैं और जब उनसे जनता किये गए वादों का हिसाब मांगती है तब यही नेता कहते है कि वो तो चुनाव जितने के लिए सिर्फ एक जुमला था। ऐसा ही एक मामला पुरानी पेंशन को लागू करने का है जिसके लिए कई भाजपा नेताओं ने प्रदर्शन कर रहे है लोगों को वादा किया कि उनकी सरकार आते ही वो इसे लागू करवाएंगे।
उत्तर प्रदेश के शिक्षक पुरानी पेंशन की बहाली की मांग कर रहे हैं जिसके लिए कई बार धरना प्रदर्शन कर चुके है और कई बार लाठियां भी खा चुके हैं। प्रदर्शनकारियों से भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और वर्तमान डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या ने वादा किया था कि वो सत्ता में आते ही पुरानी पेंशन को बहाल करवाएंगे तथा तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पत्र लिखकर इस मामले को संज्ञान में लेनी की मांग की थी।
केशव प्रसाद मौर्या के अतिरिक्त वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी पुरानी पेंशन की बहाली की मांग करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को 2013 में पत्र लिखा और पुरानी पेंशन स्कीम की बहाली की मांग की। जिसका पूरा विवरण नीचे दिए गए पत्र में दिया हुआ है।
अब जब केंद्र में भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और उत्तर प्रदेश में भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार है यही नहीं अब तो योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री है और पीएम मोदी के बेहद करीबी है तो ऐसे में पुरानी पेंशन स्कीम लागू हो जानी चाहिए थी मगर यहाँ पर भाजपा नेताओं ने पलटी मारते हुए कहा है कि पुरानी पेंशन स्कीम को लागू करने का कोई औचित्य ही नहीं बनता। डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा का पत्र नीचे दिया गया है जिसमें पुरानी पेंशन को लेकर उन्होंने क्या कहा है दिया है।
सोमवार, 3 जुलाई 2017
आई ड्रॉप का संभल कर करें इस्तेमाल --स्टेरायड युक्त अाई ड्राप से नुकसान
कंजंक्टिवाइटिस में आई ड्रॉप का ज्यादा इस्तेमाल हो सकता है
नुकसानदेह
बारिश
का मौसम शुरू हो चुका है और इस दौरान सबसे ज्यादा जो बीमारी लोगों को परेशान करती
है वह है आई इंफेक्शन कंजंक्टिवाइटिस। ऐसे में यह सवाल भी लोगों के जेहन में है कि
क्या ऐंटीबायॉटिक आई ड्रॉप्स कंजंक्टिवाइटिस के इलाज में कारगर है? इस बारे
में हुई रिसर्च की मानें तो आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल नुकसानदेह साबित हो सकता है।
इंटरनैशनल जर्नल ऑप्थैलमॉलजी में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक करीब 60 प्रतिशत कंजंक्टिवाइटिस इंफेक्शन वायरस की वजह से होता है और इसके इलाज में ऐंटीबायॉटिक का कोई रोल नहीं होता। कंजंक्टिवाइटिस एक ऐसी परिस्थिति है जिसमें कंजंक्टिवा- जो आंखों के आगे की सतह में पाई जाने वाली बेहद महीन झिल्ली होती है उसमें जलन और लालीपन आ जाता है और इस वजह से आंखें खुद को सेल्फ लिमिट कर लेती हैं। मॉनसून के सीजन में कंजंक्टिवाइटिस होना सामान्य बात है क्योंकि इस दौरान नमी बहुत ज्यादा रहती है जो बैक्टीरिया और वायरस के ग्रोथ में सहायता करती है।
, 'ऐंटीबायॉटिक्स पहले इसलिए प्रिस्क्राइब की जाती थीं ताकि कॉर्निया को किसी तरह का सेकंडरी इंफेक्शन न हो। भारत में बैक्टीरियल इंफेक्शन की वजह से अमेरिका की तुलना में ज्यादा कंजंक्टिवाइटिस के केस देखने को मिलते हैं। कई मौको पर ऐंटीबायॉटिक्स देना जरूरी होता है। लेकिन इनके बहुत अधिक इस्तेमाल से बचना चाहिए अन्यथा आंखों की सतह को नुकसान पहुंच सकता है।'
इंटरनैशनल जर्नल ऑप्थैलमॉलजी में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक करीब 60 प्रतिशत कंजंक्टिवाइटिस इंफेक्शन वायरस की वजह से होता है और इसके इलाज में ऐंटीबायॉटिक का कोई रोल नहीं होता। कंजंक्टिवाइटिस एक ऐसी परिस्थिति है जिसमें कंजंक्टिवा- जो आंखों के आगे की सतह में पाई जाने वाली बेहद महीन झिल्ली होती है उसमें जलन और लालीपन आ जाता है और इस वजह से आंखें खुद को सेल्फ लिमिट कर लेती हैं। मॉनसून के सीजन में कंजंक्टिवाइटिस होना सामान्य बात है क्योंकि इस दौरान नमी बहुत ज्यादा रहती है जो बैक्टीरिया और वायरस के ग्रोथ में सहायता करती है।
, 'ऐंटीबायॉटिक्स पहले इसलिए प्रिस्क्राइब की जाती थीं ताकि कॉर्निया को किसी तरह का सेकंडरी इंफेक्शन न हो। भारत में बैक्टीरियल इंफेक्शन की वजह से अमेरिका की तुलना में ज्यादा कंजंक्टिवाइटिस के केस देखने को मिलते हैं। कई मौको पर ऐंटीबायॉटिक्स देना जरूरी होता है। लेकिन इनके बहुत अधिक इस्तेमाल से बचना चाहिए अन्यथा आंखों की सतह को नुकसान पहुंच सकता है।'
विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार कंजंक्टिवाइटिस से बचाव के लिए भी ऐंटीबायॉटिक्स प्रिस्क्राइब की जाती हैं। बैक्टीरियल इंफेक्शन की वजह से कंजंक्टिवाइटिस होने का चांस बेहद कम होता है। ज्यादातर केस में इसके लिए वायरस ही जिम्मेदार होते हैं। लेकिन डॉक्टर्स किसी तरह का चांस नहीं लेना चाहते क्योंकि अगर किसी भी वजह से इंफेक्शन और बढ़ता है तो मरीज उन्हें लापरवाही बरतने के लिए जिम्मेदार ठहराएंगे।'
संजय गांधी पीजीआइ के नेत्र रोग विशेषज्ञ कहते है कि यह जांच करवाना संभव नहीं है कि कंजंक्टिवाइटिस का इंफेक्शन वायरस की वजह से है या बैक्टीरिया की वजह से। इसलिए प्रिकॉशन के तौर पर डॉक्टर्स माइल्ड ऐंटीबायॉटिक्स प्रिस्क्राइब कर देते हैं।' वायरस की वजह से होने वाला कंजंक्टिवाइटिस अपने आप ही एक सप्ताह के अंदर ठीक हो जाता है लेकिन डॉक्टर्स कहते हैं कि बैक्टीरियल इंफेक्शन की वजह से होने वाला कंजंक्टिवाइटिस कई केस में कॉर्निया तक फैल जाता है। कॉर्निया में इंफेक्शन और घाव आंखों को स्थायी तौर पर नुकसान पहुंचा सकता है।
स्मार्ट फोन बदल रहा है चाल
स्मार्टफोन अब सिर्फ फोन नहीं रहा बल्कि हमारी जिंदगी का ऐसा अभिन्न हिस्सा बन गया है जिस पर हमारी निर्भरता दिनों दिन बढ़ती जा रही है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि जितना यह उपयोगी है, उतना ही स्वास्थ्य के लिए घातक भी। इसका अति उपयोग युवाओं को वृद्धावस्था की ओर ले जा रहा है और युवावस्था में ही लोगों की चाल 80 साल के बुर्जुगों जैसी होने लगी है। इसके साथ ही शारीरिक बीमारियों जैसे गर्दन और कमर में दर्द रहने की शिकायत भी बढ़ती जा रही है।
वैज्ञानिकों ने 21 लोगों पर आई ट्रैकर से नजर रखी और उनके 252 तरह के मूवमेंट को कैमरे में कैद करके उन पर रिसर्च की। इस रिसर्च में पाया गया कि 46 प्रतिशत लोग चलते समय मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं। फिर चाहे फोन पर बात करने के लिए हो, मेसेज पढ़ने के लिए या मेसेज टाइप करने के लिए। लिहाजा स्मार्टफोन इस्तेमाल करते हुए चलने के दौरान उनकी गति में कमी आ जाती है और वे इस तरह से चलते हैं जैसे कोई बुजुर्ग चल रहा हो।
ऐसे लोगों पर रिसर्च करने का ध्यान उन्हें तब आया जब उन्होंने एक इंसान को चलते देखा और उसे पीछे से देखकर उन्हें लगा कि उसने कई बोतल दारू पी रखी है। लेकिन हकीकत यह थी कि वह एक स्मार्टफोन यूज कर रहा था।
भर में ऐसे स्मार्टफोन यूजर्स के लिए अलग-अलग सुविधाएं दी जा रही हैं। जैसे चीन में ऐसे लोगों के लिए अलग से फुटपाथ बनवाए गए हैं। वहां स्मार्टफोन यूजर आराम से चल सकते हैं। वहीं नीदरलैंड में तो ऐसे यूजर्स के लिए अलग से पेवमेंट बना दिए गए हैं। इतना ही नहीं प्लस वन नाम की पत्रिका की स्टडी में पता चला है कि स्मार्टफोन की वजह से लोगों की रिश्तेदारियां भी खत्म होती जा रही हैं क्योंकि लोग उनसे ज्यादा फोन के साथ वक्त गुजारने लगे हैं।
वैज्ञानिकों ने 21 लोगों पर आई ट्रैकर से नजर रखी और उनके 252 तरह के मूवमेंट को कैमरे में कैद करके उन पर रिसर्च की। इस रिसर्च में पाया गया कि 46 प्रतिशत लोग चलते समय मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं। फिर चाहे फोन पर बात करने के लिए हो, मेसेज पढ़ने के लिए या मेसेज टाइप करने के लिए। लिहाजा स्मार्टफोन इस्तेमाल करते हुए चलने के दौरान उनकी गति में कमी आ जाती है और वे इस तरह से चलते हैं जैसे कोई बुजुर्ग चल रहा हो।
ऐसे लोगों पर रिसर्च करने का ध्यान उन्हें तब आया जब उन्होंने एक इंसान को चलते देखा और उसे पीछे से देखकर उन्हें लगा कि उसने कई बोतल दारू पी रखी है। लेकिन हकीकत यह थी कि वह एक स्मार्टफोन यूज कर रहा था।
भर में ऐसे स्मार्टफोन यूजर्स के लिए अलग-अलग सुविधाएं दी जा रही हैं। जैसे चीन में ऐसे लोगों के लिए अलग से फुटपाथ बनवाए गए हैं। वहां स्मार्टफोन यूजर आराम से चल सकते हैं। वहीं नीदरलैंड में तो ऐसे यूजर्स के लिए अलग से पेवमेंट बना दिए गए हैं। इतना ही नहीं प्लस वन नाम की पत्रिका की स्टडी में पता चला है कि स्मार्टफोन की वजह से लोगों की रिश्तेदारियां भी खत्म होती जा रही हैं क्योंकि लोग उनसे ज्यादा फोन के साथ वक्त गुजारने लगे हैं।
पीजीआइ में पंजीकरण के समय दर्ज नाम में संसोधन के लिए बनेगी गाइड लाइन
पीजीआइ में पंजीकरण के समय दर्ज नाम में संसोधन के लिए बनेगी गाइड लाइन
सीएमएस मामले को सुलझाने के लिए निदेशक ने दिया निर्देश
सैकडों मरीजों को नाम में संसोधन हो पाने के कारण नहीं कर पा रहे क्लेम
यह सही है कि कई बार इमरजेंसी में नाम अौर पता गलत हो जाता है। कई बार मरीज के साथ वालों को अभिलेखों में दर्ज नाम नहीं पता होता है जिससे इश्योरेंस या विभाग के प्रति पूर्ति लेने में परेशानी होती है .इस लिए संसोधन का विकल्प रहेगा...निदेशक प्रो.राकेश कपूर
पीजीआई जीम एक दिन के अनुपस्थिति पर काट रहा है दो दिन का वेतन
पीजीआइ में संविदा कर्मचारियों के शोषण पर बवाल
जीम एक दिन के अनुपस्थिति पर काट रहा है दो दिन का वेतन
संजय गांधी पीजीअाइ में संविदा पर तैनात पैरा मेडिकल स्टाफ लैब टेक्नीशियन, नर्सेज का शोषण शुरू हो गया है। इंटक की महिला प्रकोष्ठ की जिला अध्यक्ष सावित्री सिंह , कर्मचारी संगठन के महामंत्री राजेश शर्मा सहित तमाम कर्मचारी नेताअों ने संविदा कर्मचारियों को शोषण पर संस्थान प्रशासन के अधिकारियों के सामने जबजस्त विरोध जताया। पैरामेडिकल अाउट सोर्सिग एजेंसी के खिलाफ अाक्रोश जताया। जीम के तहत संस्थान में पांच सौ से अधिक पैरा मेडिकल स्टाफ तैनात है। संविदा पर तैनात कर्मचारियों ने दबी जुबान से यह जानकारी कर्मचारी संगठनों को दी तो कर्मचारी नेता एक जुट होकर शोषण के खिलाफ अाक्रोश जताया। नर्सिंग स्टाफ एसोसिएशन की अध्यक्ष सीमा शुक्ला ने कहा कि यहां पर खुले अाम श्रम कानून का उलंघन हो रहा है। कई बार कर्मचारी बीमार पड जाता है या कोई अौर परेशानी खडी हो जाती है। जिसकी सूचना भी देते है कि अाज वह काम पर नही अा पा रहे है लेकिन ठेकादार कमाई के लिए उनके दो दिन के वेतन काट लेता है क्यों कि संविदा में रोज के अनुसार वेतन दिया जाता है। इसी तरह कर्मचारियों को उनका पीएल( पर्सनल लीव) भी एकत्र नहीं करने दिया जा रहा है ठेकेदार कह रहा है कि उस महीने का अवकाश उसी महीने लो जबकि अवकाश एकत्र कर जब जरूरत हो तब लेने का नियम है।
खत्म हो बिचौलिया सिस्टम
कर्मचारी नेताअों ने अारोप लगया कि अाउट सोर्सिग ही लगत है लेकिन यदि तुरंत परामनेंट तैनाती नहीं हो पा रही है तो सीधे संस्थान संविदा पर रखें बीच मे बिचौलिया रखने से संस्थान को अतिरिक्त भुगतान करना पड रहा है जिसमें हर महीने अाठ से दस लाख ठेकेदार के पास जा रहा है यह संस्थान की वित्तीय हानि है।
जीएफअार से संभव है किडनी खराबी के स्टेज का खुलासा
जीएफअार से संभव है किडनी खराबी के स्टेज का खुलासा
नेशनल किडनी फाउंडेशन ने जारी की नई गाइड लाइन
पहले, दूसरे अौर तीसरे स्टेज पर ही उपाय से संभव है खराबी को रोकना
कुमार संजय। लखनऊ
पहली स्टेज: पेशाब में कुछ गड़बड़ी पता चलती है लेकिन क्रिएटनिन और ईजीएफआर (ग्लोमेरुलर फिल्टरेशन रेट) सामान्य होता है। ईजीएफआर से पता चलता है कि किडनी कितना फिल्टर कर पा रही है।
दूसरी स्टेज: जीएफआर 90-60 के बीच में होता है लेकिन क्रिएटनिन सामान्य ही रहता है। इस स्टेज में भी पेशाब की जांच में प्रोटीन ज्यादा होने के संकेत मिलने लगते हैं। शुगर या हाई बीपी रहने लगता है।
तीसरी स्टेज: जीएफआर 60-30 के बीच में होने लगता है, वहीं क्रिएटनिन भी बढ़ने लगता है। इसी स्टेज में किडनी की बीमारी के लक्षण सामने आने लगते हैं। एनीमिया हो सकता है। ब्लड टेस्ट में यूरिया ज्यादा आ सकता है। शरीर में खुजली होती है। यहां मरीज को डॉक्टर से सलाह लेकर अपना लाइफस्टाइल सुधारना चाहिए।
चौथी स्टेज: जीएफआर 30-15 के बीच होता है और क्रिएटनिन भी 2-4 के बीच होने लगता है। यह वह स्टेज है, जब मरीज को अपनी डायट और लाइफस्टाइल में जबरदस्त सुधार लाना चाहिए नहीं तो डायलसिस या ट्रांसप्लांट की स्टेज जल्दी आ सकती है। इसमें मरीज जल्दी थकने लगता है। शरीर में कहीं सूजन आ सकती है।
पांचवीं स्टेज :ईजीएफआर 15 से कम हो जाता है और क्रिएटनिन 4-5 या उससे ज्यादा हो जाता है। फिर मरीज के लिए डायलसिस या ट्रांसप्लांट जरूरी हो जाता है।
दूसरी स्टेज: जीएफआर 90-60 के बीच में होता है लेकिन क्रिएटनिन सामान्य ही रहता है। इस स्टेज में भी पेशाब की जांच में प्रोटीन ज्यादा होने के संकेत मिलने लगते हैं। शुगर या हाई बीपी रहने लगता है।
तीसरी स्टेज: जीएफआर 60-30 के बीच में होने लगता है, वहीं क्रिएटनिन भी बढ़ने लगता है। इसी स्टेज में किडनी की बीमारी के लक्षण सामने आने लगते हैं। एनीमिया हो सकता है। ब्लड टेस्ट में यूरिया ज्यादा आ सकता है। शरीर में खुजली होती है। यहां मरीज को डॉक्टर से सलाह लेकर अपना लाइफस्टाइल सुधारना चाहिए।
चौथी स्टेज: जीएफआर 30-15 के बीच होता है और क्रिएटनिन भी 2-4 के बीच होने लगता है। यह वह स्टेज है, जब मरीज को अपनी डायट और लाइफस्टाइल में जबरदस्त सुधार लाना चाहिए नहीं तो डायलसिस या ट्रांसप्लांट की स्टेज जल्दी आ सकती है। इसमें मरीज जल्दी थकने लगता है। शरीर में कहीं सूजन आ सकती है।
पांचवीं स्टेज :ईजीएफआर 15 से कम हो जाता है और क्रिएटनिन 4-5 या उससे ज्यादा हो जाता है। फिर मरीज के लिए डायलसिस या ट्रांसप्लांट जरूरी हो जाता है।
एमएस के नुस्खे के प्रमाणिकता पर मुहर लगाएगा पीजीआई
एमएस के नुस्खे के प्रमाणिकता पर मुहर लगाएगा पीजीआई
मोनोक्लोनल एंटीबाडी सीडी 20 प्रोटीन से मिल सकती है राहत
क्लीनिकल ट्रायल में देश के साथ संस्थान होंगे शामिल
कुमार संजय। लखनऊ
तंत्रिका तंत्र की बीमारी मल्टिपल स्किलरोसिस(एमएस) के इलाज के लिए विश्व स्तर पर तैयार की गए नए नुस्खे की प्रमाणिकता पर संजय गांधी पीजीआइ भी मुहर लगाएगा। ड्रग कंट्रोलर आफ इंडिया ने इस बीमारी की नई दवा के क्लीनिकल ट्रायल के लिए देश के साथ संस्थानों को हरी झंडी दी है। नई दवा का क्लीनिकल ट्रायल 33 देशों में 900 लोगों पर किया जा रहा है। इनमें भारत के सात संस्थान शामिल है । यह कुल 120 मरीजों पर दवा के प्रभाव का अध्ययन करेंगे। नयी दवा कई चरणों के परीक्षण को पार कर चुका है देखा गया है कि यह दवा इस समय जी रही टेरीफ्लूनोमाइड से अधिक प्रभावी और कुप्रभाव विहीन है। ड्रग कंट्रोलर ने पीजीआइ चंडीगढ, एम्स दिल्ली, अमृता इंस्टीट्यूट केरल सहित अन्य देश के सात संस्थानों को अनुमति दी है जिसमें पीजीआई लखनऊ का न्यूरोलाजी विभाग भी शामिल है। संस्थान के न्यूरोलाजी विभाग के विशेषज्ञों का कहना है कि मल्टीपिल स्कैलोरोसिस तंत्रिका तंत्र की ऐसी परेशानी है जिसमें उपचार के समिति विकल्प है। ओफाट्युमैब कारगर और सुरक्षित साबित होती है तो इलाज के एक नया विकल्प मिलेगा जो मरीजों को हित में होगा। यह मोनोक्लोनल एंटीबाडी सीडी 20 प्रोटीन है बी लिम्फोसाइट के क्रियाशीलता को शुरूअती दौर में रोकती है।
आटो इम्यून डिजीज है मल्टीपिल स्कैलोरोसिस
मस्तिष्क तथा स्पाइनल कार्ड तंत्रिका नर्व को सुरक्षा प्रदान करने वाले वसायुक्त माइलिन के आवरण क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। आवरण नष्ट होने और घाव के निशान होने के साथ-साथ परेशानी होती है। आम तौर पर युवा वयस्कों में पायी जाती है। यह महिलाओं में ज्यादा आम होती है। इसकी व्यापकता प्रति 100,000 में से 2 से 150 के बीच होती है। संजय गांधी पीजीआइ के तंत्रिका रोग विभाग के प्रमुख प्रो.सुनील प्रधान के मुताबिक यह परेशानी मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी में तंत्रिका कोशिकाओं के एक दूसरे से संवाद करने की क्षमता को प्रभावित करता है। तंत्रिका कोशिकाएं लम्बे तंतुओं के नीचे विद्युत संकेत भेज कर संवाद स्थापित करते हैं। माइलिन नामक एक रोधक पदार्थ में लिपटे हुए रहते हैं। शरीर का अपना प्रतिरोधी तंत्र माइलिन पर हमला करता है और उसे नुकसान पहुंचाता है। जब माइलिन नष्ट हो जाता है तो प्रभावकारी ढंग से संकेतों को बिलकुल ही संचालित नहीं कर सकता है।
यह होती है परेशानी
एम्एस से प्रभावित व्यक्ति तंत्रिका संबंधी किसी भी रोग लक्षण या संकेतों से पीड़ित हो सकता है
-संवेदना में परिवर्तन
- मांसपेशी की कमजोरी
- मांसपेशी में ऐंठन
- चलने- फिरने में कठिनाई
- समन्वय और संतुलन में कठिनाई
-भाषा में कठिनाई
- निगलने में कठिनाई
- दृश्य संबंधी समस्याएं
-थकान
- मूत्राशय तथा आंत संबंधी
साफ्ट ड्रिक पीने वाले 75 फीसदी फैटी लिवर डिजीज के शिकार
साफ्ट ड्रिक पीने वाले 75 फीसदी फैटी लिवर डिजीज के शिकार
500 मिली लीटर से अधिक साफ्ट ड्रिक पीते है तो हो सकते है लिवर डिजीज, डायबटीज अौर उच्च रक्तचाप के शिकार
कुमार संजय। लखनऊ
एेसे हुअा शोध
जर्नल अाफ एसोसिएशन अाफ इंडिया के शोध रिपोर्ट के मुताबिक इरा मेडिकल कालेज के शोध वैज्ञानिक डा. जेबा सिद्दकी, डा. रितू करोली, डा.जलीस फातिमा,डा. सचिन खंडूरी, डा. शिशिर वाष्णेय . डा. शारा सरीन सिद्दकी ने 242 लोगों पर शोध किया यह भी एमबीबीएस के छात्र थे। चालिस लोग दो अधिक साफ्ट ड्रिक रोज पीते थे। 97 लोग रोज एक साफ्ट ड्रिक पीते थे अौर 105 लोग एक से कम साफ्ट ड्रिक पीते थे। इन सभी के लिवर प्रोफाइल, लिपिड प्रोफाइल, बीएमअाई, रक्त दाब, रक्त में शुगर, इंसुलीन रसिसटेंट के परीक्षण के साथ लिवर की स्थिति जानने के लिए अल्ट्रासाउंड जांच किया गया।
क्या है मेटाबोलिक सिंड्रेम
ट्राइ ग्लिसराइड- 150 से अधिक
एचडीएल -40 ( पुरूष) अौर 50( महिला) से कम
रक्तदाब- 130-85 से अधिक
फास्टिंग शुगर- 100 से अधिक होने पर व्यक्ति दिल, उच्च रक्तचाप अौर डायबटीज के मुबाने पर होता है इस स्थित में लाइप स्टाइल बदल कर इन परेशानियों से मुक्ति पा सकता है।
साफ्ट ड्रिंक में होता अधिक कैलोरी
संजय गांधी पीजीआइ की पोषण विशेषज्ञा अर्चना के मुताबिक खास किस्म के भूरे वाले में 10.6 ग्राम शुगर प्रति 100 मिली लीटर में होता है जबकि दूसरे खास किस्म में 6.6 ग्राम शुगर प्रति सौ मिलीलीटर में होता है इसमें कैलोरी अधिक होती है जिसके कारण मोटापा होता है। इसके फ्रूट जूस में 5 से 8 ग्राम शुगर प्रति 100 मिली लीचर होता है।
रविवार, 2 जुलाई 2017
पीजीआई स्टाफ कैंटीन मिटा रहा है भूख
सम्वाददाता
(न्यूज़ 30डेज़)
(न्यूज़ 30डेज़)
पीजीआई स्टाफ कैंटीन मिटा रहा है भूख
बैसे तो पीजीआइ स्टाफ कैंटीन केवल कर्मचारियों के लिए बनी है लेकिन तमाम एेसे मरीजों के तीमारदारों की भी भूख मिटाता है जो अपने मरीज को छोड़ कर गेट के बाहर नहीं जा सकते है। तीमारदारों को संचालक भोजन पैक कर देते है । रात में सात बजे के बाद एेसे लोगों को कम पैसे पूरा भोजन खिलाते भी . संचालक की इस भूमिका पर तमाम तीमरदारों का कहना है कि यहां अभी मानवता बची हुई है। तीमरदारो का कहना है कि स्टाफ कैंटीन में मिलने वाला भोजन बेहद ही स्वादिष्ट व शुद है। कैंटीन के संचालक श्री विष्णु जी से बातचीत के दौरान हमने वहाँ पर पकायें जाने वाली खाद्य सामग्री की गुडवत्ता के बारे में विशेष जानकारी प्राप्त की तो यह बोध हुआ की इस चिकित्सा संस्थान में हर तरफ़ सेवा की भावना कायम है।
विशेष : ॥ उचित मूल्य पर मिलता है स्वाद व शुदता का संगम ॥ ॥ पीजीआई स्टाफ कैंटीन ॥
सौजन्य : ॥ न्यूज़30डेज़ पोर्टल ॥
शनिवार, 1 जुलाई 2017
ट्रांसपोर्ट नगर अारटीअो अाफिस में अधिकारियों के कक्ष के सामने अाराम फरमा है कुत्ता
यह सीन है ट्रांसपोर्ट नगर अारटीअो अाफिस का जहां पर अाफिस को सुंदर बनाने के लिए छतों पर गूब्बारे टंगे है लेकिन मुख्य प्रवेश द्वार जहां से अारटीअो, एअारटीअो सहित तमाम अधिकारियों प्रवेश करते है ठीक सामने बायो मेट्रिक रूम के सामने फर्श पर एक कुत्ता अाराम फरमा रहा है। अाफिस में तमाम काम के लिए अाने वाले लोग बगल से बचा कर निकल रहे हैं। अधिकारियों अौर कर्मचारियों की लंबी फौज के बाद किसी ने कुत्ते को भगाने की हिमायत नहीं की। संवाददाता किसी काम से अाफिस गया था जहां पर वह दो घंटे तक रहा लेकिन किसी ने कुत्ते को नहीं भगाया । इसी बीच एक कर्मचारी से पूछा कि कुत्ते को लोग भगा क्यों नहीं रहे है तो बताया कि अाफिस के एक कर्मचारी का पालतू कुत्ता है किसी हिम्मत है भगाने की। अाफिस में काम के लिए अाने वाले लोगों का कहा है कि कुत्ता किसी को काट ले तो परेशानी खडी हो जाएगी।
बुधवार, 28 जून 2017
पीजीआइ के कर्मचारी के साथ पुलिस ने की बदसलूकी
संजय गांधी पीजीआइ के प्रशासनिक भवन के एक अधिकारी के साथ पीजीआइ थाने के पुलिस ने बदसलूकी की है। मंगलवार की शाम को यह अधिकारी ड्यूटी के बाद घर जा रहे थे कि पीजीआइ गेट के सामने उनकी बाइक के सामने एक टेम्पो चालक अा गया तुरंत उक्त अधिकारी ने गाडी में ब्रेक लगा कर कंट्रोल कर लिया इस चालक ने गाली देने लगा इस पर उक्त अधिकारी ने एतराज जताते हुए कहा कि कुछ हुअा तो नहीं मैने जान बूझ कर कुछ नहीं किया इस पर हाथापायी होने लगी इतने में थाने में तैनात एक पुलिस कर्मचारी वहां पहुंच कर पीजीआइ के कर्मचारी के साथ बदसलूकी करते हुए कहा कि होगे पीजीआइ के कर्मचारी या अधिकारी तेरी .......मां बहन को गाली देने लगा ..उक्त अधिकारी एसपी यादव , कर्मचारी नेता केके तिवारी, अोम प्रकाश सिंह , अमर सिंह सहित कई नेता सुबह निदेशक से मिल कर उक्त पुलिस के खिलाफ शिकायत दर्ज करायी निदेशक से मांग की उक्त पुलिस कर्मचारी के खिलाफ एक्शन के लिए संस्थान प्रशासन लिखे। निदेशक ने अाश्वासन दिया कि उक्त पुलिस कर्मचारी की शिकायत थाना अध्यक्ष, सीअो से की जाएगी देखा जाएगा कि कितनी किसकी गल्ती है।
सोमवार, 26 जून 2017
news30deys: थैक्स डाक्टर ...तीन महीने में घट गया 17 किलो वजन
news30deys: थैक्स डाक्टर ...तीन महीने में घट गया 17 किलो वजन: थैक्स डाक्टर ...तीन महीने में घट गया 17 किलो वजन मोटापे के साथ उच्च रक्त चाप और सांस लेने में परेशानी से मिला छुटकारा पीजीआई में बैरिएटिक...
थैक्स डाक्टर ...तीन महीने में घट गया 17 किलो वजन
थैक्स डाक्टर ...तीन महीने में घट गया 17 किलो वजन
मोटापे के साथ उच्च रक्त चाप और सांस लेने में परेशानी से मिला छुटकारा
पीजीआई में बैरिएटिक सर्जरी शुरू
सात विभाग के विशेषज्ञों ने तय किया इलाज का रास्ता
लखनऊ। कुमार संजय
देवरिया की रहने वाली 55 वर्षीय मीनाक्षी का वजन तीन महीने में 95 किलों से घट 78 किलो रह गया साथ ही सांस लेने की परेशानी, उच्च रक्त चाप के परेशानी से छुटकारा मिल गया। यह संभव हुआ है संजय गांधी पीजीआई में हुई पेट की सर्जरी( बैरिएटिक सर्जरी) के जरिए। सर्जरी के बाद पहली बार फालोअप पर आयी मीनाक्षी ने इस खुशी को जाहिर किया। मीनाक्षी हाइपोथायरडिज्म(हारमोन असंतुलन), उच्च रक्तचाप, एयर वे आब्सट्रेक्सन की परेशानी से ग्रस्त इसके साथ इनके शरीर का वजन 95 किलो के आस पास था। रात में शरीर में आक्सीजन का स्तर कम हो जाता है जिसे पूरा करने के लिए सोते समय उन्हें बाई पेप लगाना पड़ता था। कुल मिला तक मीनाक्षी की जिदंगी बड़ी कठिन हो गयी थी। मोटापे के साथ तीन बीमारी से लड़ रही मीनाक्षी पीजीआई आयी तो विशेषज्ञों ने तमाम परेशानी से मुक्ति के लिए गैस्ट्रोसर्जन प्रो.आनंद प्रकाश के पास भेजा। प्रो.प्रकाश ने इंडोमेडिसिन, कार्डियोलाजी, गैस्ट्रोमेडिसिन, पोषण विशेषज्ञ के साथ पल्मोनरी मेडिसिन के विशेषज्ञों को शामिल कर मीनाक्षी के केस पर गहन विचार विमर्श के बाद बैरिएटिक सर्जरी का फैसला लिया। यह सर्जरी पीजीआई में इससे पहले कभी नहीं हुई थी। पहली बार होना था इसके लिए प्रो.प्रकाश पूरी तैयारी की। प्रो.प्रकाश के मुताबिक मीनाक्षी के मामले में स्लीब गैस्ट्रेक्टमी किया जिसमें आमाशाय के आकार को 75 फीसदी तक काट कर छोटा किया गया। मीनाक्षी के मुताबिक अब पहले से कम खाती हूं। भूख कम लगती है। फिजिकली एक्टिव होने के नाते तीन महीने में 17 किलो वजन कम हो गया है।
सर्जरी से हारमोन पर किया गया नियंत्रण
आमाशय को ऐसे काटा गया जिसमें लेप्टिन और ग्रैलिन हारमोन बनाने वाला भाग भी कम हो जाए। इससे इन हारमोन का स्तर भी कम होता है। लेप्टिन हारमोन का बढ़ा है अधिक भूख लगती है। इसकी मात्रा कम करने से भूख कम लगती है। ग्रेलिन हारमोन पेट भरने का सिगलन देता है।
अब हर गुरूवार को पीजीआई में बैरिएटिक ओपीडी
किस मरीज में सर्जरी की जरूरत है। यह तय करने के लिए हर गुरूवार को दो बजे पांच बजे तक गैस्ट्रोसर्जरी ओपीडी में विशेषज्ञ विशेष ओपीडी चलाएंगे। इसमें मरीजों को सही जनाकारी दी जाएगी। संस्थान में अब बैरिएटिक सर्जरी स्थापित हो गयी है रेगुलर सर्जरी होगी। यहां पर इस सर्झरी का खर्च एक लाख के आस पास आएगा जबकि निजि क्षेत्र में चार से पाच लाख का खर्च आता है।
मोटापे के साथ उच्च रक्त चाप और सांस लेने में परेशानी से मिला छुटकारा
पीजीआई में बैरिएटिक सर्जरी शुरू
सात विभाग के विशेषज्ञों ने तय किया इलाज का रास्ता
लखनऊ। कुमार संजय
देवरिया की रहने वाली 55 वर्षीय मीनाक्षी का वजन तीन महीने में 95 किलों से घट 78 किलो रह गया साथ ही सांस लेने की परेशानी, उच्च रक्त चाप के परेशानी से छुटकारा मिल गया। यह संभव हुआ है संजय गांधी पीजीआई में हुई पेट की सर्जरी( बैरिएटिक सर्जरी) के जरिए। सर्जरी के बाद पहली बार फालोअप पर आयी मीनाक्षी ने इस खुशी को जाहिर किया। मीनाक्षी हाइपोथायरडिज्म(हारमोन असंतुलन), उच्च रक्तचाप, एयर वे आब्सट्रेक्सन की परेशानी से ग्रस्त इसके साथ इनके शरीर का वजन 95 किलो के आस पास था। रात में शरीर में आक्सीजन का स्तर कम हो जाता है जिसे पूरा करने के लिए सोते समय उन्हें बाई पेप लगाना पड़ता था। कुल मिला तक मीनाक्षी की जिदंगी बड़ी कठिन हो गयी थी। मोटापे के साथ तीन बीमारी से लड़ रही मीनाक्षी पीजीआई आयी तो विशेषज्ञों ने तमाम परेशानी से मुक्ति के लिए गैस्ट्रोसर्जन प्रो.आनंद प्रकाश के पास भेजा। प्रो.प्रकाश ने इंडोमेडिसिन, कार्डियोलाजी, गैस्ट्रोमेडिसिन, पोषण विशेषज्ञ के साथ पल्मोनरी मेडिसिन के विशेषज्ञों को शामिल कर मीनाक्षी के केस पर गहन विचार विमर्श के बाद बैरिएटिक सर्जरी का फैसला लिया। यह सर्जरी पीजीआई में इससे पहले कभी नहीं हुई थी। पहली बार होना था इसके लिए प्रो.प्रकाश पूरी तैयारी की। प्रो.प्रकाश के मुताबिक मीनाक्षी के मामले में स्लीब गैस्ट्रेक्टमी किया जिसमें आमाशाय के आकार को 75 फीसदी तक काट कर छोटा किया गया। मीनाक्षी के मुताबिक अब पहले से कम खाती हूं। भूख कम लगती है। फिजिकली एक्टिव होने के नाते तीन महीने में 17 किलो वजन कम हो गया है।
सर्जरी से हारमोन पर किया गया नियंत्रण
आमाशय को ऐसे काटा गया जिसमें लेप्टिन और ग्रैलिन हारमोन बनाने वाला भाग भी कम हो जाए। इससे इन हारमोन का स्तर भी कम होता है। लेप्टिन हारमोन का बढ़ा है अधिक भूख लगती है। इसकी मात्रा कम करने से भूख कम लगती है। ग्रेलिन हारमोन पेट भरने का सिगलन देता है।
अब हर गुरूवार को पीजीआई में बैरिएटिक ओपीडी
किस मरीज में सर्जरी की जरूरत है। यह तय करने के लिए हर गुरूवार को दो बजे पांच बजे तक गैस्ट्रोसर्जरी ओपीडी में विशेषज्ञ विशेष ओपीडी चलाएंगे। इसमें मरीजों को सही जनाकारी दी जाएगी। संस्थान में अब बैरिएटिक सर्जरी स्थापित हो गयी है रेगुलर सर्जरी होगी। यहां पर इस सर्झरी का खर्च एक लाख के आस पास आएगा जबकि निजि क्षेत्र में चार से पाच लाख का खर्च आता है।
शनिवार, 24 जून 2017
रेलवे पेशाब घर में ताला
रेलवें में पेशाब के लिए भी देना पड़ रहा है दो रूपया
लखनऊ रेलवे स्टेशन पर पेेशाब करने के लिए भी यात्रियों को दो रूपया देना पड़ रहा है क्योंकि पे एंड यूज शौचालय पिछले एक माह से बंद होने के कारण यात्रियों को य ह परेशानी हो रही है...रेलवे के अधिकारियों ने शौचालय पर ताला बंद कर दिया है कहा जा रहा है कि रिनोवेशन हो रहा है
लखनऊ रेलवे स्टेशन पर पेेशाब करने के लिए भी यात्रियों को दो रूपया देना पड़ रहा है क्योंकि पे एंड यूज शौचालय पिछले एक माह से बंद होने के कारण यात्रियों को य ह परेशानी हो रही है...रेलवे के अधिकारियों ने शौचालय पर ताला बंद कर दिया है कहा जा रहा है कि रिनोवेशन हो रहा है
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015
एंकलाइजिंग स्पांडिलाइटिस के मरीजों में अधिक है दिमाग और दिल का खतरा
एएस के मरीजों में अधिक
है दिमाग और दिल का खतरा
पीजीआई के एल्यूमिनाइ
ने विश्व स्तर पर दिखायी प्रतिभा
पहली बार एक लाख से अधिक
लोगों पर हआ शोध
कुमार संजय। लखनऊ
संजय गांधी पीजीआई से
शिक्षा हासिल करने वाले विशेषज्ञ ने विश्व स्तर पर क्लीनिकल शरीर
प्रतिरक्षा विज्ञान के क्षेत्र में बड़ी कामयाबी हासिल की है। डा.निजिल हारून
संस्थान के क्लीनिकल इम्यूनोलाजी विभाग से डाक्ट्रेट आफ मेडिसिन इन क्लीनिकल
इम्नोलाजी की डिग्री हासिल करने बाद यह टोरेंटो कनाडा में शोध करने चले गए।
डा.हारून ने एंकलाइजिंग स्पोंडलाइटिस(एएस) बीमारी पर लंबे समय तक शोध करने बाद
साबित किया है कि इस बीमारी के लोगों में ब्रेन स्ट्रोक की आशंका 60 फीसदी और
हार्ट एटैक की आशंका 35 फीसदी सामान्य लोगों को मुकाबले अधिक होती है। अब तक
सबसे अधिक मरीजों अर सामान्य लोगों पर सबसे बड़ा शोध है। डा.हारून ने बताया कि
21427 मरीज एवं 86606 सामान्य लोगों पर शोध किया इस तरह देखा जाए तो कुल एक लाख से
अधिक लोगों पर यह शोध हुआ है। इससे इस शोध की अहमियत विश्व स्तर पर अर अधिक बढ़ गयी
है। इस शोध को 17.8 इंपैक्ट वाले एनल्स आफ इंटरनल मेडिसिन ने स्वीकार किया है।
डा.हारून के गुरू संस्थान के क्लीनिकल इम्यूनोजाली विभाग के प्रमुख प्रो.अरएन
मिश्रा ने कहा कि इससे संस्थान का मान विश्व स्तर पर बढ़ा है। इस शोध से
एंकलाइजिंग स्पोनडलाइटिस बीमारी के मरीजों को सर्तक कर दोनों परेशानियों से बचाया
जा सकेगा।
क्या है एंकलाइजिंग स्पांडिलाइटिस
शरीर प्रतिरक्षा विज्ञानीयों के मुताबिक एंकलाइजिंग स्पांडिलाइटिस
रीढ़ की हड्डी की बीमारी है। इस बीमारी से प्रभावित मरीज के रीढ़ की हड्डी में
दर्द व खिचाव रहता है। कभी-कभी यह अन्य जोड़ो आंख व दिल को प्रभावित कर सकता है।
इस बीमारी का कारण नहींं पता है। ६६ प्रतिशत मरीजों में बीमारी का करण एचएलए-बी-२७
देखा गया है। यह एक जंम जात एंटीजन है जो कोशिकाओं पर पाया जाता है। यह बीमारी १५
से २५ वर्ष की आयु में शुरु होती है। लेकिन दर्द इतना हल्का होता है कि व्यक्ति को
इसका अधिक एहसास नहींं होता। इस बीमारी के चपेट में अधिकतर पुरुष ही आते हैं। २५
प्रतिशत मरीजों में उनके परिवार के सदस्य इस बीमारी से प्रभावित होते हैं। उन्हों
ने बताया कि पीढ़ का सभी दर्द एस्प नहीं होता। एस्प का दर्द महीनों व सालों तक बना
रहता है। इस बीमारी से प्रभावित लोगों में प्रात:काल उठने पर पीठ में अकडऩ रहती है
जो धीरे-धीरे कम हो जाती है। लंबे समय कत बैठे रहने पर दर्द बढ़ जाता है। व्यायाम
करने पर दर्द कम हो जाता है।
लंबे समय तक बीमारी के साथ रहने पर हिप व कूल्हे का जोड़ २५ से ३०
प्रतिशत लोगों में प्रभावित हो सकता है। ५० प्रतिशत लोगों की आंख प्रभावित हो सकती
है। आंख में लालपन,दर्द व धुंधला दिखाई पडऩे की परेशानी हो सकती है। पांच प्रतिशत मरीजों का
दिल प्रबावित हो सकता है। संजय गांधी पीजीआई के प्रो. आर.एन.मिश्रा ने बताया कि इस
बीमारी के इलाज व परीक्षण की विशेषज्ञता यहां पर उपलब्ध है। दवाओं के जरिए बीमारी
के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
दस साल में 66 फीसदी बढ़ा है एटीबाय़ोटिक का इस्तेमाल
11 एंटीबायोटिक गोली खाता है देश के एक व्यक्ति
दस साल में 66 फीसदी बढ़ा है एटीबाय़ोटिक का इस्तेमाल
वर्ल्ड एंटीबायोटिक रिपोर्ट 2015 का खुलासा
भारत सहित विश्व के 69 देशों के आकड़ों पर जारी हुई रिपोर्ट
कुमार संजय। लखनऊ
सर्दी , जुखाम में एंटीबायोटिक खाने की बढ़ती प्रकृति के कारण बीते दस साल में एंटीबायोटिक का इसतेमाल देश में 66 फीसदी तक बढ़ा है दूसरे देशों के मुकाबले काफी अधिक है। भारत में 11 एंटीबायोटिक पिल्स एक व्यक्ति इस्तेमाल करता है जो तमाम विकासशील देशों के अधिक है। इतना ही नहीं देश में लगभग 1300 करोड़ एंटीबायोटिक्स पिल्स प्रतिवर्ष प्रयोग में ली जाती हैं। चीन में 1000 करोड़, वहीं अमरीका में यह आंकड़ा 700 करोड़ सालाना है। इस तथ्य का खुलासा हाल में जारी सेंटर फाऱ डिजीज डायनमिक्स , इकोनामिक एंड पालसी ने वर्ल्ड एंटीबायोटिक्स रिपोर्ट 2015 में हुआ है । पिछले दस साल में एंटी बायोडिक के इस्तेमाल पर विश्व के 69 देंशों से डाटा कलेक्शन के अधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गयी है जिसमें भारत भी शामिल है। बताया गया है कि बीतेहै। संजय गांधी पीजीआई की माइक्रोबायलोजिस्ट प्रो.उज्वला घोषाल कहती है कि एंटीबायोटिक्स के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल से भारत में लोगों की रोगप्रतिरोधक क्षमता पर भी बुरा असर पड़ा है। देश के लोगों ने इतनी एंटीबायोटिक ले ली हैं कि उनके शरीर में रेजिस्टेंट पैदा होने से अब एंटीबायोटिक्स ने काम करना बंद कर दिया है। ऐसे में छोटी-छोटी परेशानियां बड़ी समस्याओं का रूप ले रही हैं। देश में 80 फीसदी संक्रामक रोग वायरस से होते हैं, ऐसे में एंटीबायोटिक्स की जरूरत नहीं होती।
80 फीसदी लोगों में नही होती एंटीबायोटिक की जरूरत
मेडिकल साइंस के अनुसार एंटीबायोटिक केवल उन्हीं रोगों में दी जानी चाहिए, जो बैक्टीरिया या अन्य परजीवी (वायरस के अलावा) के कारण होते हैं। देश में 80 फीसदी संक्रामक रोग वायरस से होते हैं। ऐसे में एंटीबायोटिक की जरूरत ही नहीं होती। वायरस से होने वाले रोगों में एंटीबायोटिक देना वाकई खतरनाक है। इसके अधिक प्रयोग से शरीर में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया भी खत्म हो जाते हैं और शरीर जल्दी-जल्दी संक्रमण की चपेट में आने लगता है। बिना जरूरत के एंटीबायोटिक की हैवी डोज देने से शरीर में रेजिस्टेंट बैक्टीरिया पनपने लगते हैं। इन पर किसी भी तरह की एंटीबायोटिक का असर नहीं होता।
डायबिटीज का खतरा
बुखार, खांसी या जुकाम होने पर एंटीबायोटिक्स से परहेज करना चाहिए। इनका बार-बार इस्तेमाल करने से डायबिटीज का खतरा53 फीसदी तक बढ़ जाता है। दुनियाभर में सबसे ज्यादा डायबिटीज के मरीज भारत में हैं। ऐसे में हमें एंटीबायोटिक्स पर काफी गंभीरता से विचार करना होगा।
मेटाबॉलिज्म असंतुलित
शोधकर्ताओं के मुताबिक एंटीबायोटिक्स से पेट में बैक्टीरिया की संख्या व उसका स्वरूप बदल जाता है। इसका लगातार प्रयोग करने से मेटाबॉलिज्म असंतुलित हो जाता है। एंटीबायोटिक्स की वजह से अच्छे बैक्टीरिया की संख्या कम हो जाती है व खराब बैक्टीरिया की संख्या बढऩे से पेनक्रियाज का संतुलन बिगड़ जाता है और डायबिटीज का खतरा बढऩे लगता है।
बैक्टीरिया और वायरस में अंतर
बैक्टीरिया सजीव होते हैं। ये अच्छे और बुरे दोनों तरह के पाए जाते हैं। बुरे बैक्टीरिया शरीर में रोग पैदा करते हैं। जरूरत से ज्यादा एंटीबायोटिक इस्तेमाल करने से अच्छे बैक्टीरिया भी खत्म हो सकते हैं। निमोनिया, साइनस इन्फेक्शन, ब्रॉन्काइटिस और स्किन इन्फेक्शन बैक्टीरिया की वजह से होते हैं। डॉक्टर की सलाह से एंटीबायोटिक लें। सामान्य सर्दी, एलर्जी, फ्लू जैसी परेशानियां वायरस के कारण होती हैं। वायरस पर एंटीबायोटिक का असर नहीं होता। इसलिए इनका सेवन नहीं करना चाहिए।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने किया आगाह
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आगाह किया है कि एंटीबायोटिक्स के ज्यादा इस्तेमाल से दवाओं के प्रति प्रतिरोध बढ़ रहा है जिससे इलाज विफल हो रहे हैं। यह प्रतिरोध जटिल सर्जरी और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के प्रबंधन को भविष्य में ज्यादा मुश्किल बना सकता है। ऐसे में भारत और साउथ-ईस्ट एशियाई देश के लोगों की सेहत के सामने मौजूद इस खतरे पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है।
इन बातों का रखें खयाल
घर में एंटीबायोटिक दवाएं रखने से परहेज करें। कोई भी दवा विशेषज्ञ की सलाह से ही लें। डॉक्टर से एंटीबायोटिक के बारे में सारी शंकाओं का समाधान करा लें। एक्सपायरी दवा का इस्तेमाल बिल्कुल न करें। अपने पास रखी पुरानी पर्ची पर लिखी गई दवाओं को अपनी मनमर्जी से न लें।
विशेषज्ञ की राय
एंटीबायोटिक के प्रयोग को कम करने के लिए प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाए रखना जरूरी है। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम व पर्याप्त पानी पीने जैसी आदतें अपनाकर इसके प्रयोग को कम कर सकते हैं। हर रोग में एंटीबायोटिक की जरूरत नहीं होती इसलिए कोई भी दवा डॉक्टरी परामर्श से ही लें।
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अवसाद है जीवन खत्म करने की जड़
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस आज
शुक्र है कि समय रितिका ने विशेषज्ञ से सलाह
38 फीसदी बीमारी के बाद भी नहीं लेते है दवाई
अवसाद है जीवन खत्म करने की जड़
कुमार संजय । लखनऊ
35 साल की रितिका (परिवर्तित नाम) के लिए सबकुछ बोझ बन गया था। अचानक अपने काम और आसपास के लोगों में कोई दिलचस्पी नहीं रह गई थी। वह अपने निजी जीवन पर भी ध्यान नहीं दे पा रही थीं। रितिका बताती हैं, "मैं सुबह उठना नहीं चाहती थी। मुझे दफ्तर जाने के लिए खुद को धकेलना होता था। मैं अक्सर देरी से दफ्तर पहुंचती थी। यदि मुझे थोडा भी अतिरिक्त काम दे दिया जाता था तो मैं उदास हो जाती थी। दोस्तों और परिवार के साथ बाहर जाने में भी मुझे दिलचस्पी नहीं रह गई थी।"
एक मित्र ने उन्हें मनोचिकित्सक के पास जाने की सलाह दी। इसके बाद ही रितिका को एससास हुआ कि वह अवसाद के लक्षणों से गुजर रही हैं। वह बताती हैं, "तब तक मुझे नहीं पता चल पाया था कि मैं अवसाद से ग्रस्त हूं। मुझे इस स्थिति की गंभीरता के बारे में तब तक पता नहीं था जब तक कि मेरी चिकित्सक से मुलाकात नहीं हुई। मुझे बताया गया कि अत्यधिक अवसाद के कारण लोग आत्महत्या तक कर सकते हैं। भगवान का धन्यवाद कि मैं समय रहते चिकित्सक के पास चली गई। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस(१० अक्टूर) के मौके पर र्वल्ड मेंटल हेल्थ फडरेशन ने कहा है कि लक्षणों पर परिवार वालों को गौर करने के बाद तुरंत डाक्टर के पास जाना चाहिए। मानसिक रोगों से ग्रस्त ७२ फीसदी लोग डाक्टर के पास इलाज के लिए नहीं जाते हैं क्योंकि वह मानते ही नहीं हैं कि वह बीमार हैं। अवसाद से ग्रस्त ९० फीसदी लोग आत्महत्या कर लेते हैं। अभी भी लोग मानसिक रोग को पागलपन मानते हैं ऐसा बिल्कुल नहीं है। अवसाद से ग्रस्त ७२ फीसदी लोग तब यह नहीं मनाते कि वह बीमारी के चपेट में हैं जब तक डाक्टर बीमारी की पुष्टि नहीं कर देते हैं। बीमरी की पुष्टि होने के बाद ३८ फीसदी लोग दवाएं नहीं लेते हैं।
दूसरी शारीरिक बीमारी की तरह है मानसिक
मानसिक बीमारी भी शारीरिक बीमारियों की तरह ही है। यह उपचार योग्य है। शुरूआत में ही इलाज से बेहतर परिणाम सामने आते हैं और बीमारी को गम्भीर होने से रोका जा सकता है।
यह कभी भी किसी एक कारण से नहीं होता है बल्कि कई कारणों से मिलकर होता है जैसे केमिकल, फिज़िकल, साइकोलाजिकल। लेकिन यहक बहुत ही खतरनाक होता है।
प्रति लाख लोगों में से आत्महत्या करने वालों की संख्या 10.9
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लयूएचओ) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में प्रति लाख व्यक्तियों के पीछे आत्महत्या करने वालों की संख्या 10.9 है और जो लोग आत्महत्या कर लेते हैं उनमें से ज्यादातर की उम्र 44 साल से कम होती है। मनोरोग का बेहतर इलाज से ही इसे रोका जा सकता है। आत्महत्या की कल्पना करना और उसे व्यवहार में उतारना मानसिक आपातकाल की बहुत ही गंभीर स्थिति है। जो मरीज आत्महत्या करने के बहुत नजदीक हैं, उन्हें तुरंत मनोचिकित्सक की सेवाओं की जरूरत होती है और उस पर लगातार तब तक निगरानी रखनी चाहिए, जब तक वह सुरक्षित हालत में न पहुंच जाएं। एक बार आत्महत्या की कोशिश करने के बाद ‘साइकोथेरेपी’ दोबारा की जाने वाली कोशिशों को रोक सकती है। देखा गया है कि तनाव,
पूरूषों के मुकाबले अधिक है मानसिक रोग से परेशान
फडरेशन के मुताबिक महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक इस बीमारी की चपेट में हैं। १० से २५ फीसदी महिलाएं अवसाद की चपेट में है जबकि पुरुष ५ से १२ फीसदी इस बीमारी के चपेट में हैं। हर चार मिनट में विश्व में एक व्यक्ति आत्महत्या कर रहा है। शारीरिक परेशानी से ११ फीसदी लोग आत्महत्या करते हैं जबकि ९० फीसदी लोग अवसाद के कारण आत्महत्या करते हैं। मनोविकार पागलपन नहीं बल्कि अक बीमारी है जिसका इलाज दवाओं के जरिए संभव है। नई दवाएं आ गई है जो दिमाग के न्यूरान पर क्रियाशील होकर रसायनिक असंतुलन को दूर करती है। दिमाग में सिरोटिन एवं नार-एपीनेफ्रिन रसायन का स्तर कम होने बीमारी की आशंका बढ़ जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इलाज में दवा के अलावा काउंसलिंग की अहम भूमिका है।
बाक्स---
इन परेशानियों को मत करें नजरअंदाज,बचा रहे जीवन
--लगातार दु:खी,तनाव ग्रस्त,खालीपन महसूस करना,निराशा
--अपराधबोध से ग्रसित होना स्वयं का नाकबिल सनझना
--सेक्स सहित दूसरे क्रियाकलापों के प्रति उदासीनता
--मौत या आत्महत्या का विचार आना,लगातार चिड़चिड़ापन
---स्फूर्ति की कमी थकान महसूस होना
--नींद ना आना या अधिक नींद आना
--भूख कम लगना या अधिक लगना
--एकाग्रता याददाश्त में कमी,निर्णय लेने में कठनाई,
--अकारण सिर दर्द,पाचन की गड़बड़ी एवं शरीर में दर्द
बाक्स-
दो हजार से अधिक लोगों पर सर्वे के बाद इंडियन जरनल आफ साइकेट्रिक में छपी शोध रिर्पोट के मुताबिक---
मानसिक रोगोंं का प्रतिशत
अवसाद-१५.९६
सिक्रिजोफ्रिनिया-०.४२
पैनिक डिसआर्डर-७.५६
फोबिया-५.८८
आवसेसिव कंपल्सिव डिसआर्डक-५.८८
एडजसटमेंट डिसआर्डर-२.५२
अनिद्र-१३.०२
हमेशा बीमार महसूस करना-१.२६
डिस्थीमिया-६.७२
तंबाकू लती-२८.५७
भांग लती-२.९४
बाक्स-
कौन है मानसिक रोगों की चपेट मे(प्रतिशत)
३० से कम उम्र के-- ५०.७
३१ से४० उम्र तक --५२.८
४० से अधिक उम्र तक-१८
हाई स्कूल तक शिक्षित-६१.६
कालेज या डिप्लोमा तक शिक्षित-४८.६
डिग्री तक शिक्षित -४०.६
रु.३५०० से कम आय -७५.०
रु. ३५०१ से ६००० तक आय-४७.४
रु. ६००१ से ८५०० तक आय-३७.४
रु. ८५०१ से अधिक आय -३७.०
विवाहति-४९.० फीसदी
अविवाहित-६०.० फीसदी
संयुक्त परिवार में रहने वाले-५५.३ फीसदी
न्यूक्लीयर फेमली--४७.४ फीसदी
अकेले रहने वाले-
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