बुधवार, 10 अप्रैल 2024

जिंदगी से जंग जीतने बाद अब मां बनने का इंतजार

 






जिंदगी से जंग जीतने बाद अब मां बनने का इंतजार


 


दस दिन वेंटिलेटर पर किया जीवन के संघर्ष




 


 वेंटीलेटर पर जाने के बाद  जिंदगी की उम्मीद की लौ काफी धीमी हो जाती है । वेंटिलेटर पर जाने के वेंटिलेटर एसोसिएटेड इंफेक्शन सहित कई परेशानी की आशंका रहती है लेकिन किंग जार्ज मेडिकल विवि के विशेषज्ञों के काफी मेहनत से 10 दिन वेंटिलेटर पर जीवन से संघर्ष कर जिंदगी से खुद की लडाई जीतने के साथ गर्भ में पल रहे शिशु को भी जिंदगी मिल गई। अब यह मां बनने के इंतजार कर रही है। आईसीयू से इन्हें छुट्टी दे दी गयी है। लखनऊ की ही रहने वाले 23 वर्षीय राधा देवी  26 महीने से  गर्भवती  है। 13 मार्च से खांसी बुखार और सांस लेने में तकलीफ शुरू हुआ ।


पहले वो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र गई जहां 2 दिन के उपचार के बाद आराम नहीं मिलने से उसे तुरंत क्वीन मेरी हॉस्पिटल केजीएमयू में रेफर कर दिया गया । क्वीन मेरी हॉस्पिटल से उन्हें 16 मार्च को  एनेस्थीसिया विभाग का आईसीयू सीसीयू -2 में शिफ्ट किया गया। सीसीयू के प्रो. विपिन सिंह के मुताबिक  ऑक्सीजन की कम से नाज़ुक स्थिति बनी हुई थी । ऑक्सीजन लेवल बहुत कम होने से माँ और भ्रूण दोनों को जान का खतरा था । इसलिए राधा को तुरंत वेंटिलेटर पर ले गए ।  छाती का एक्सरे कराने पे पाया गया कि दोनों फेफड़े बिलकुल छतिग्रस्त हो गये हैं कारण वायरल निमोनिया था।  ए आर डी एस ( एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम ) कहते हैं। अगर वेंटीलेटर समय से नहीं लगाया गया तो मृत्यु की आशंका थी ।  3 दिन के बाद  18 मार्च को मरीज की ट्रेकियोस्टोमी ( गले में छेद कर के वेंटिलेटर लगाना ) की गई ताकि उसका निमोनिया ठीक होने  में सहायता मिल सके  ।


शुरू के 3 दिन तक 100 प्रतिशत ऑक्सीजन देना पड़ा फिर चौथे दिन से ऑक्सीजन की ज़रूरत कम होने लगी । क़रीब 10   दिन वेंटिलेटर पर रखने के बाद  को 30 मार्च  को वेंटिलेटर हटाया गया और 2 अप्रैल को ट्रेकियोस्टोमी ट्यूब भी निकाल दिया गया । अब मरीज का खाना पीना और सहारे से चलना नियमित रूप से शुरू हो गया है । एनेस्थीसिया विभाग की प्रमुख प्रो.  मोनिका कोहली ने भी पूरे इलाज के दौरान मरीज के स्वास्थ्य की जानकारी लेती रहीं और टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह जटिल इलाज था।   


 


 


 


गर्भावस्था में इलाज होता है जटिल


प्रो. विपिन सिंह ने बताया कि गर्भवती महिला को ठीक करना इसलिए आसान नहीं होता क्योंकि इसमें ब्लड प्रेशर और  ऑक्सीजन लेवल कम होने से माँ के साथ साथ बच्चे के जान का खतरा रहता है।  उपचार के दौरान दवाइयों का चुनाव  बहुत सावधानी से करना होता है क्योंकि  दवाइयाँ बच्चे के विकास में नुकसान कर सकती हैं ।


 


 


ऱाधा के साथ गर्भस्थ शिशु सुरक्षित   


रे इलाज के दौरान गर्भ में पल रहे बच्चे के स्वास्थ्य पे भी ध्यान दिया गया । क़रीब 29 हफ़्ते का बच्चा मां की कोख में अब भी जीवित और सुरक्षित है ।


 


 


इस टीम ने किया इलाज


 


आईसीयू फैकल्टी प्रो. विपिन सिंह ,डा. बी बी कुशवाहा के रेज़िडेंट डॉ स्वाति , डॉ अंकुर, डॉ दानिश डॉ सृष्टि तथा नर्सिंग इंचार्ज निशा और ममता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

गुरुवार, 14 मार्च 2024

पेशाब रोकने से मूत्राशय होता है कमजोर, किडनी पर कुप्रभाव






मोटापा कम करें कम हो जाएगी किडनी परेशानी की आशंका


 


पेशाब रोकने से मूत्राशय होता है कमजोर, किडनी पर कुप्रभाव


 


पीजीआई में विश्व किडनी जागरूकता दिवस पर वाकथान एवं जागरूकता कार्यक्रम


 


मोटापा कम करने के साथ 60 से 70 फीसदी तक किडनी के परेशानी की आशंका कम हो जाती है। मोटापा उच्च रक्तचाप, डायबिटीज की आशंका को बढाता है यही किडनी की परेशानी की आशंका को बढ़ाता है। यह बात संजय गांधी पीजीआई के किडनी रोग विशेषज्ञ प्रो. धर्मेंद्र भदौरिया ने विश्व किडनी दिवस के मौके पर जागरूकता एवं वाकथान मे दिया। यूरोलॉजी एवं किडनी ट्रांसप्लांट विभाग के प्रमुख प्रो. एमएस अंसारी ने कहा कि पेशाब को नहीं रोकना चाहिए। महिलाएं और स्कूल जाने वाले बच्चे साफ वाशरूम न होने के कारण चार से पांच घंटे कई बार पेशाब रोके रखती है। मूत्राशय कमजोर होता है और किडनी पर दुष्प्रभाव पड़ता है। नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. नारायण प्रसाद ने बताया कि किडनी खराब होने पर डायलिसिस और प्रत्यारोपण ही उपाय है । इस इलाज के दौरान संक्रमण और बार –बार भर्ती होना पड़ता है। इलाज काफी महंगा है इसलिए बचाव ही उपाय है। ब्लड प्रेशर 130-80 से अधिक और एचबीए1सी सात फीसदी से अधिक नहीं रहना चाहिए। गुर्दा रोग विशेषज्ञ प्रो. अनुपमा कौल ने कहा कि गर्भावस्था को दौरान किडनी  साथ रक्त दाब पर खास ध्यान रखना चाहिए। यूरोलॉजिस्ट एवं किडनी ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ प्रो. संजय सुरेखा ने कहा कि ट्रांसप्लांट के बाद फालोअप पर रहना चाहिए। नेफ्रोलाजिस्ट के सलाह से दवाएं नियमित लेने से प्रत्यारोपित किडनी लंबे समय तक काम करती है। इस मौके पर डाय मानस रंजन पटेल,डा. रवि शंकर कुशवाहा ने बचाव के तरीके बताएं। इस मौके पर पांच सौ से अधिक किडनी की खराबी प्रभावित मरीजों को इलाज के तमाम पहलुओं पर जानकारी दी गयी। मेडिकल सोशल वर्कर राघवेंद्र सिंह, वैयक्तिक सहायक संतोष कुमार वर्मा, सफाई निरीक्षक रघुनाथ सिंह सहित अन्य लोगों ने मरीजों को हर स्तर पर सहयोग का संकल्प लिए।





 *विश्व किडनी दिवस* 

विश्व किडनी दिवस 14 मार्च को संपूर्ण विश्व में पर्व की तरह मनाया जाता है। इस वर्ष की थीम है "सभी के लिए किडनी स्वास्थ्य: देखभाल और इष्टतम दवा अभ्यास तक समान पहुंच को आगे बढ़ाना"। 

भारत में मधुमेह व उच्च रक्तचाप की बढ़ती घटनाओं के कारण  क्रोनिक किडनी रोग की घटनाओं में 35% की वृद्धि हुई है। एक नए अनुमान से पता चलता है कि क्रानिक किडनी रोग से संबंधित मृत्यु दर 2040 तक मृत्यु का 5वां प्रमुख कारण होगी। सीकेडी की जटिलताओं को रोकने का सबसे अच्छा तरीका सीकेडी की प्रगति को रोकना है। उन्नत अनुसंधान ने हमें उन दवाओं की पहचान करने में मदद की है जो सीकेडी की प्रगति को रोकने में प्रभावी हैं, लेकिन ये दवाएं सीकेडी के शुरुआती चरणों में प्रभावी हैं।

नेफ्रोलॉजी विभाग ने दक्षिण एशिया क्षेत्र में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर जागरूकता अभियान को बढ़ावा देने के लिए इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ नेफ्रोलॉजी और इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ किडनी फाउंडेशन के साथ संयुक्त रूप से इस पहल का आह्वान किया है। हम सभी सीकेडी के उच्च जोखिम वाले लोगों, 50 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग, मधुमेह रोगी, उच्च रक्तचाप, मोटापे से ग्रस्त रोगी, सीकेडी के पारिवारिक इतिहास वाले लोग, लंबे समय से धूम्रपान करने वाले और पथरी रोग से पीड़ित लोगो

को सुझाव देते हैं कि वे हर साल मूत्र की जांच और सीरम क्रिएटिनिन और ग्लोमेरुलर निस्पंदन दर का आकलन करके सीकेडी के लिए खुद को जांचते रहें ।


नेफ्रोलॉजी, यूरोलॉजी और रीनल प्रत्यारोपण विभाग की गतिविधियाँ:


 *किडनी के स्वास्थ्य के लिए वॉकथॉन* 

नेफ्रोलॉजी विभाग ने किडनी के स्वास्थ्य के लिए सुबह 6.30 बजे हॉबी सेंटर से एसजीपीजीआई गेट तक और उसके बाद ईएमआरटीसी के नेफ्रोलॉजी और यूरोलॉजी विभाग तक वॉकथॉन आयोजित की । नेफ्रोलॉजी और यूरोलॉजी संकाय ने हॉबी सेंटर, मुख्य द्वार और ईएमआरटीसी सेंटर में सभा को संबोधित किया। डॉ. अंसारी, एचओडी यूरोलॉजी ने पानी के सेवन के महत्व से अवगत कराया, डॉ. संजय सुरेखा ने कम नमक का सेवन, बहुत सारा पानी, खट्टे फल और हर दिन थोड़ा दूध के साथ गुर्दे की पथरी को रोकने के सुझाव दिए।

 डॉ. अनुपमा कौल ने किडनी के स्वास्थ्य के लिए  वजन कम करने के महत्व के बारे में सुझाव दिए। 

डॉ. भदौरिया ने उपस्थित लोगों को सुरक्षित दवाओं के बारे में बताया। नेफ्रोलॉजी के प्रमुख और इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ नेफ्रोलॉजी के परिषद सदस्य प्रोफेसर नारायण प्रसाद ने बेहतर स्वास्थ्य के लिए आम लोगों को कुछ लक्ष्य दिए हैं

 1. मधुमेह रोगियों  के लिए 7% से कम HBA1c, 

2.हर एक व्यक्ति के लिए 130/80 से कम रक्तचाप,

3.25 से कम बीएमआई, 

4.धूम्रपान व  तंबाकू निषेध  और कम नमक। 

संस्थान के निदेशक प्रोफेसर धीमन ने अपने संदेश में कहा कि संस्थान में किडनी की देखभाल के लिए किसी को भी मना नहीं किया जाएगा।


मरीज के रिश्तेदारों और देखभाल करने वालों का संदेश:

सीकेडी एक दीर्घकालिक समस्या है और रोगी आजीवन इस बीमारी के साथ रहते हैं। कई रोगियों और परिचारकों ने भी अपनी भावनाओं को साझा किया और 50 वर्ष से अधिक आयु वाले उच्च जोखिम वाले लोगों, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, पथरी रोग और गुर्दे की बीमारियों के पारिवारिक इतिहास वाले व्यक्तियों के लिए गुर्दे की बीमारियों की समय पर जांच के लिए अपना सीधा संदेश दिया।


स्वयं मरीज़ों का संबोधन:

किडनी की बीमारियों के साथ कैसे जीना है, इस विषय पर रोगियों ने संदेश दिया और सभी का एक समान विचार था कि बीमारी के इलाज से रोकथाम बेहतर है। किडनी की बीमारियों से 3 से 4 दशकों से अधिक समय तक जीवित रहने वाले मरीजों ने वकालत की कि दीर्घकालिक सफलता के लिए दवा का पालन सबसे महत्वपूर्ण है।


डॉ. प्रसाद ने WKD के इस जागरूकता कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए के प्राथमिक देखभाल चिकित्सकों, वैज्ञानिकों, नर्सों, कॉर्पोरेट स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं, रोगियों, प्रशासकों, स्वास्थ्य-नीति विशेषज्ञों, सरकारी अधिकारियों, नेफ्रोलॉजी से संबंधित संगठनों से हाथ मिलाने और इसमें महत्वपूर्ण योगदान देने की वकालत की।  किडनी स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने के लिए सरकारी नीतियों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है जिससे रोगियों और स्वास्थ्य देखभाल बजट दोनों को बड़ा लाभ हो सकता है।


सीकेडी के लिए एक निरंतर ज्ञान का अभाव है, जो प्राथमिक देखभाल चिकित्सकों, नर्सों, तकनीशियनों और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति निर्माताओं के बीच स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों के सभी स्तरों पर प्रदर्शित होता है। फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्मों के बेलगाम प्रसार से यह और बढ़ गया है। इन प्लेटफार्मों पर अक्सर गैर-वैज्ञानिक सामग्री का व्यापक प्रसार हुआ, विशेष रूप से कई हानिकारक जड़ी-बूटियों, शरीर निर्माण के लिए कई एलर्जेन प्रोटीन जो वास्तव में वैज्ञानिक नहीं है अपितु महंगे व हानिकारक है। अल्पज्ञ जनता और मरीज़ों को वैज्ञानिक रूप से प्रामाणिक और मान्य जानकारी नहीं मिल पाती। यह भारत जैसे निम्न-मध्यम आय वाले देशों के लिए विशेष रूप से सच है जहां संसाधनों की मांग की तुलना में संसाधन सीमित हैं और लोगों ने गैर-प्रमाणित उपचारों को चुना जो उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं, कभी-कभी मृत्यु का कारण बनते हैं।

इस अवसर पर दो महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता है:

सीकेडी का शीघ्र निदान

इष्टतम दवा अभ्यास यह सुनिश्चित करेगा कि ये दवाएं जो प्रगति को धीमा कर देती हैं, व्यापक आबादी तक पहुंचें।


सभी के लिए किडनी स्वास्थ्य: 

अपनी किडनी को हानिकारक दवाओं, दर्द निवारक दवाओं और एंटीबायोटिक दवाओं के अनावश्यक उपयोग से बचाएं, और प्रगति को धीमा करने के लिए उपयोगी दवाओं का उपयोग करें।


 



सोमवार, 11 मार्च 2024

इसनोफिल की जांच से चलेगा एलर्जी की आशंका का पता

 


पीजीआई में इम्यूनो एलर्जी कॉन्क्लेव

 

इसनोफिल की जांच से चलेगा एलर्जी की आशंका का पता

 

बदलता मौसम और प्रदूषण एलर्जी का बड़ा कारण

 

 

बीस रुपए में होने वाली जांच इसनोफिल से एलर्जी के आशंका का पता लगता है लेकिन दूसरे कारणों से भी यह बढ़ा हो सकता है। 50 फीसदी मामलों में इसनोफिल बढ़े होने का मतलब है कि एलर्जी है जिसका मैनेजमेंट संभव है। एलर्जी के लक्षण नहीं है तो दूसरे कारणों से परजीवी का संक्रमण , रक्त विकार के कारण पर भी ध्यान देने की जरूरत है। इसनोफिल के साथ सीरम आईजीई का बढ़ा स्तर भी एलर्जी की पुष्टि करता है। यह जानकारी संजय गांधी पीजीआई में आयोजित इम्यूनो एलर्जी कॉन्क्लेव में संस्थान के  प्रो. विकास अग्रवाल और अपोलो मेडिक्स के डा. अनुपम वाखूल ने दी विशेषज्ञों ने दी। बताया कि दवा, धूल, बदलते मौसम, किसी को छूने सहित अन्य कारणों से फेफड़े, त्वचा, नाक सहित अन्य अंगों में एलर्जी हो सकती है। देखा गया है कि बदलता मौसम और प्रदूषण ( वायु कण, गैस) से लोग अधिक एलर्जी के शिकार होते हैं।  किसी वस्तु से भी एलर्जी हो सकती है। ऑस्ट्रेलिया से आए डा. प्रवीण हिसारिया ने बताया  एलर्जी इम्यूनोथेरेपी आज कल प्रचलित हो रहा है । इसमें जिस वस्तु से एलर्जी होती है इस वस्तु को थोड़ी मात्रा समय अंतराल पर नाक, मुंह या इंजेक्शन के दावारा थोडी मात्रा में दिया जाता है जिससे व्यक्ति में वस्तु के प्रति टॉलरेंस पैदा हो जाता है। आयोजन सचिव डा. कुनाल ने बताया कि दवा के कारण होने वाली एल्रजी कई बार घातक होती है जिसके इलाज में इम्यूनोसप्रेसिव भी देने की जरूरत पड़ती है ।   

 

 

कारण

हजारों एलर्जेन हैं जो एलर्जी का कारण बन सकते हैंलेकिन सबसे आम में शामिल हैं:

 

-वायुजनित एलर्जी: धूल और पराग।

-पशु रोष: पशुओं की त्वचा से त्वचा कोशिकाओं जैसी सामग्री निकलती है। मानव रूसी के समान।

-खाद्य एलर्जन: शैल-मछलीडेयरी उत्पादनट और/या --बीज अंडे और मछली।

-एस्पिरिन और पेनिसिलिन।

-कीड़े के डंक: बरैया और मधुमक्खियों।

पौधे: घास और चुभने वाले बिच्छू।

पदार्थ: लेटेक्स।

 

यह है लक्षण

-त्वचा के चकत्ते

-लाल खुजली वाली आंखें

-खांसी

- सांस लेने में घरघराहट

-छींक आना

-दमे का अटैक

-पेट में दर्द और उल्टी

एक इंजेक्शन ने डेढ़ महीने रहेगी एलर्जी से मुक्ति

 


एक इंजेक्शन ने डेढ़ महीने रहेगी एलर्जी से मुक्ति

 

पीजीआई में इम्यूनो एलर्जी कॉन्क्लेव 2024  आज

 

एलर्जी से ग्रस्त लोगों को रोज दवा खानी होती है। इन दवाओं से नींद आने के साथ ही सुस्ती की परेशानी होती है लेकिन अब रोज गोली खाने के झंझट से छुटकारा मिल सकता है। मोनोक्लोनल एंटीबॉडी( बायोलॉजिक्स) दवाएं आ गयी है जो इंजेक्शन के रूप में है इनका एक डोज देने से एक से 1.5 महीने तक एलर्जी की परेशानी से मुक्ति मिल सकती है। संजय गांधी पीजीआई के क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी विभाग की के मुताबिक 15 फीसदी से अधिक लोग एलर्जी से ग्रस्त रहते हैं। यह फेफड़े, त्वचा, नाक सहित अन्य हो सकती है। इसका इलाज भी अलग –अलग विशेषज्ञ करते हैं। एलर्जी की विशेषज्ञता की शाखा विकसित नहीं है। इसमें इम्यूनोलॉजिस्ट की अहम भूमिका हो सकती है। इसी को लेकर विभाग दो दिवसीय इम्यूनो एलर्जी कॉन्क्लेव 2024 का आयोजन इंडियन कॉलेज आफ एलर्जी, अस्थमा एंड एप्लाइड इम्यूनोलॉजी के सहयोग से   कर रहा है। इसमें देश से हर विधा के विशेषज्ञ शामिल हो रहे है । क्लीनिकल इम्यूनोलॉजिस्ट  प्रो. विकास अग्रवाल और  प्रो. अनुपम वाखलू के मुताबिक कोशिश की जा रही है कि एक विशेषज्ञता के अंदर सभी प्रकार की एलर्जी का मैनेजमेंट संभव हो सके। एलर्जी मैनेजमेंट के लिए एलर्जिक इम्यूनो थेरेपी और मोनोक्लोनल एंटीबॉडी काफी कारगर साबित हो रही है। आयोजन सचिव डा. कुनाल चंदवार ने बताया कि  कॉन्क्लेव में ऑस्ट्रेलिया से डा. प्रवीण हिसारिया, अहमदाबाद से डा. पूजा श्रीवास्तव, पल्मोनरी विशेषज्ञ प्रो. राजेंद्र प्रसाद, ओपी चौधरी से डा. सुनील दवड़घाव,  सहित अन्य विशेषज्ञ एलर्जी के कई पहलू पर जानकारी देंगे।

मंगलवार, 5 मार्च 2024

बरसात और ओला को लेकर दुखी नरेंद्र जी ने माता से की प्रार्थना

 





नरेंद्र सिंह यादव माता काली के ग्रहस्त भक्त हैं।उनका कहना है कि माँ काली की उन पर विशेष कृपा है,श्री नीमकरोरी जी महाराज,स्वामी रामकृष्ण परमहंस उनके आदर्श हैं।वे किसी चमत्कार का दावा तो नहीं करते हैं लेकिन वे जिन लोगों के लिये प्रार्थना करते हैं ,माँ काली उन्हें स्वीकार करती है,इसी कड़ी में बीते कल दिनांक 3/03/2024 समय सायं 4.30 बजे अपने रायबरेली रोड लखनऊ स्थित आवास पर उन्होने माँ काली से ओलबृश्टि और बेमौसम  बरसात रोकने के लिये प्रार्थना का अनुष्ठान किया,जिसको फेसबुक लाइव करके लोगों से प्रार्थना की अपील भी की, जिससे किसानों की फसल और जन और अन्य जीवजन्तुओं की हानि को रोका जा सके। इसको चमत्कार समझें या संयोग कल से ओलाब्रश्टि और बारिश थमचुकी है,और मौसम ठीक है।

शुक्रवार, 1 मार्च 2024

मुंबई से काठमांडू तक लोगों को अंगदान के लिए जागरूक कर रहे विनोद का पीजीआई में स्वागत

 



अंगदान व रक्तदान कर जरूरत मंद लोगों का जीवन बचाएं 


-मुंबई से काठमांडू तक लोगों को अंगदान के लिए जागरूक कर रहे विनोद का पीजीआई में स्वागत 


जरूरतमंदों का जीवन बचाने के लिए रक्तदान और अंगदान जैसे समाजिक कार्यों से लोगों को जुड़ना चाहिए। स्वस्थ्य युवाओं एवं बड़ों को देहदान, अंगदान व रक्तदान के लिए प्रेरित एवं प्रोत्साहित करने की जरूरत है। एक व्यक्ति चार से पांच लोगों को जीवन दे सकता है। यह बातें शुक्रवार को पीजीआई के नेफ्रोलोजी विभाग के प्रमुख डॉ. नारायण प्रसाद और यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. एमएस अंसारी ने संस्थान के मुख्य गेट पर आयोजित अंगदान जागरूकता कार्यक्रम में कहीं। मुंबई से काठमांडू तक बाइक से अंगदान को लेकर लोगों को जागरूक करने जा रहे नर्मदा किडनी फाउंडेशन के सदस्य मुंबई निवासी विनोद के पीजीआई पहुंचने पर स्वागत किया गया। शुक्रवार को पीजीआई के मुख्य गेट से डॉ. नारायण प्रसाद ने विनोद को हरी झंडी दिखाकर रावाना किया। हालांकि गुर्दा प्रत्यारोपण करा चुके विनोद लोगों को अंगदान के लिए जागरूक कर रहे हैं। 

 डॉ. नारायण प्रसाद ने कहा कि दिल, गुर्दा, लिवर पैंक्रियाज आंत और फेफड़ों के अलावा त्वचा,  अस्थि, अस्थि मज्जा, कार्निया, कारटिलेज , माँसपेशिया आदि का प्रत्यारोपण सम्भव है। इस मौके पर रेजिडेंट, मरीज, तीमारदार और स्टाफ के लोग मौजूद रहे।

समय से पहले जन्म और कम है वजन तो सुनने की क्षमता प्रभावित होने की आशंका

 



समय से पहले जन्म और कम है वजन तो सुनने की क्षमता प्रभावित होने की आशंका


कम सुनाई देने से दिमाग भी होगा कम विकसित

 

विश्व श्रवण दिवस पर पीजीआई में जागरूकता कार्यक्रम


 


समय से पहले और कम वजन के साथ जन्म लेने शिशुओं में सुनने की परेशानी की आशंका सामान्य शिशुओं के मुकाबले अधिक होती है। इन शिशुओं में तुरंत सुनने की क्षमता का आकलन करने की जरूरत है। आगे के इलाज के लिए विशेषज्ञ से सलाह लेने की जरूरत है। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान में विश्व श्रवण दिवस के मौके पर सुनो-सुनाओ जागरूकता के कार्यक्रम में न्यूरो ओंटोलॉजी विभाग के प्रो.अमित केशरी ने बताया कि हम लोग सुनने की परेशानी को दूर करने के लिए कॉक्लियर इंप्लांट कर रहे है। इससे काफी बच्चों का लाभ मिला है। विशेषज्ञों ने बताया कि सुनने की क्षमता कम है या नहीं है तो शिशु के  दिमाग का विकास  प्रभावित होता है। सुनने की कमी का इलाज जितना जल्दी संभव हो कराने की जरूरत है। सुनने की क्षमता का पता आडियो टेस्ट से होता है । 



 प्रो केशरी ने बताया कि जन्म लेने सभी शिशुओं के सुनने की क्षमता का परीक्षण करता है जिसमें पांच मिनट का समय लगता है।  आवाज जब शोर बन जाता है तो वह सुनने की क्षमता को प्रभावित करता है। रोज पर हार्न , तेज आवाज में संगीत सुनने की क्षमता को धीरे-धीरे कम करता है। हार्न न बजाने की शुरुआत हम सभी को करनी है। नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. नरायन प्रसाद ने कहा कि किडनी से प्रभावित बच्चों में सुनने की क्षमता में कमी  देखने के मिलती है।

प्रो केशरी ने बताया कि जिनकी उम्र 60 साल से अधिक हो गई है यदि उन्हें काम सुनाई  देने की समस्या है तो समय से इसका इलाज करना चाहिए।  इलाज न करने पर उनमें बोलने की समस्या के साथ भूलने की भी समस्या होने की परेशानी हो सकती  है।  इस मौके पर 20 बच्चों को सुनने की मशीन भी दी गई निदेशक प्रोफेसर आरके धीमान ने हर संभव मदद करने की बात कही

रविवार, 25 फ़रवरी 2024

बेकाबू डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर से गुर्दा खराब होने का खतरा

 




बेकाबू डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर से गुर्दा खराब होने का खतरा


-हेलो डाक्टर

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जागरण संवाददाता, लखनऊ: डायबिटीज यानी मधुमेह वैसे तो एक आम, लेकिन लापरवाही होने पर यह गंभीर हो सकती है, जिससे दुनियाभर में करोड़ों मरीज जूझ रहे हैं। अनियंत्रित शुगर समय के साथ हृदय, रक्त वाहिकाओं, आंखों, गुर्दे (किडनी) और तंत्रिकाओं को गंभीर नुकसान पहुंचाता है। इसके मरीजों में किडनी डिजीज (बीमारी) होने की संभावना अधिक होती है। दरअसल, डायबिटीज में लगातार उच्च शर्करा से किडनी की छोटी रक्त वाहिकाओं को काफी नुकसान होता है। ये नुकसान धीरे-धीरे किडनी डैमेज करने की दिशा में अग्रसर हो जाता है। शुगर और हाई ब्लड प्रेशर नियंत्रित न होने से करीब 60 प्रतिशत मरीज गंभीर किडनी रोग से ग्रसित हो जाते हैं। ऐसे मरीज प्रत्येक तीन माह में आरएफटी (रीनल फंक्शन टेस्ट) व पेशाब की जांच जरूर कराएं। चिकित्सीय परामर्श के मुताबिक दवा लें। दवाओं से किडनी को खराब होने से रोका जा सकता है। कई मामलों में डायलिसिस भी बंद हो सकती है और रोगी सामान्य जीवन व्यतीत कर सकता है। यह कहना है एसजीपीजीआइ में गुर्दा रोग विभाग के अध्यक्ष डा. नारायण प्रसाद का। उन्होंने गुरुवार को दैनिक जागरण के हेलो डाक्टर कार्यक्रम में पाठकों की समस्याएं सुनी और उचित परामर्श दिए।


सवालः किडनी संबंधी परेशानी नहीं हो, इसके लिए कुल कितना पानी पीना चाहिए? -अनिल तिवारी, लखनऊ, 45 वर्ष

-जितनी प्यास लगे, उतना ही पानी पीना चाहिए। यह जरूरी नहीं कि सुबह उठकर एक बार में तीन से चार गिलास पानी पिएं। हमारा मस्तिष्क प्यास लगने पर खुद ही आपको सूचना देता है। जब प्यास लगे तो उसे नजरअंदाज नहीं करें। धूप में रहने और काम करने वाले व्यक्ति को तीन लीटर और सामान्य तापमान में रहने वाले व्यक्तियों को दो से ढाई लीटर पानी पीना चाहिए।


सवाल- पिछले साल सितंबर में जांच कराया तो मुझे क्रोनिक किडनी डिजीज बीमारी सामने आई। बीपी के साथ गुर्दा में सिस्ट भी है। क्या एहतियात बरतें? -सत्येंद्र कुमार, लखनऊ, 58 वर्ष


-यह गुर्दे की एक बीमारी है। इसमें धीरे-धीरे रोग बढ़ता है। रोजाना बीपी चेक करें और नियंत्रित रखने का हरसंभव प्रयास करें। भोजन में पांच ग्राम से अधिक नमक का सेवन न करें। ध्यान रहे कि आपका बीपी 130/80 से अधिक नहीं होना चाहिए।


सवाल-मेरी एक किडनी करीब 60 प्रतिशत खराब हो गई है। इलाज चल रहा है, लेकिन राहत नहीं है।- ब्रज किशोर सिंह, लखनऊ, 52 वर्ष

-दरअसल, आपकी किडनी में 60 प्रतिशत की खराबी हुए तीन माह से ज्यादा का समय बीत चुका है। ऐसे में आप हाई रिस्क ग्रुप में पहुंच चुके हैं। लेकिन, बीपी नियंत्रित और खानपान का विशेष ध्यान रखकर बीमारी की रफ्तार को रोक सकते हैं।


सवाल-मैं ब्लड प्रेशर का मरीज हूं। किडनी को स्वस्थ रखने के लिए क्या उपाय करें?- बजरंगी लाल गुप्ता, लखनऊ, 60 वर्ष


-बीपी की नियमित दवा लें। अगर नियंत्रित है तो सप्ताह में तीन बार चेक करें। दवा कतई बंद न करें। दवा के बाद भी अगर ब्लड प्रेशर बढ़े तो कार्डियोलाजिस्ट से संपर्क करें। संतुलित खानपान और अनुशासित जीवनशैली बहुत जरूरी है। रोजाना 45 मिनट ब्रिस्क वाक करें। भोजन में नमक का सेवन कम करें।


सवाल-मेरे दोनों किडनी में पथरी थी। अभी कुछ दिन पहले सर्जरी कराई। रात में कई बार पेशाब जाना पड़ता है। -जेके सीखिया, बहराइच, 70 वर्ष

-यह प्रोस्टेट बढ़ने का लक्षण है। अधिक उम्र होने पर यह समस्या ज्यादातर लोगों में होती है। प्रोस्टेट की दवा नियमित लें। ध्यान रहे कि आपको दोबारा किडनी में पथरी हो सकती है। इसलिए छह माह में एक बार अल्ट्रासाउंड और खून की जांच जरूर कराएं। टमाटर, पालक और काफी का सेवन कम करें।


सवाल-मेरी बेटी की उम्र 10 वर्ष है। उसे कुछ साल पहले ही नेफ्रोटिक सिंड्रोम की शिकायत हो गई। इलाज चल रहा है। क्या यह बीमारी पूरी तरह से ठीक हो सकती है।- जेके शर्मा, लखनऊ, 40 वर्ष


-अगर इलाज सही हो तो यह बीमारी उम्र बढ़ने के साथ पूरी तरह ठीक हो जाती है। मेरा मानना है कि 14-15 वर्ष की उम्र में आपकी बेटी नेफ्रोटिक सिंड्रोम से मुक्त हो जाएगी, लेकिन इसके बाद भी आपको नेफ्रोलाजिस्ट के संपर्क में रहना चाहिए। कुछ मरीजों में यह बीमारी वापसी भी करती है। हालांकि, इसका प्रतिशत बहुत कम है।


सवाल: ढाई साल पहले मैंने अपनी किडनी बेटी को दी थी। मुझे कोई रिस्क तो नहीं है? बेटी को बीपी रहता है। क्या उससे किडनी पर असर पड़ेगा? -आरके शर्मा, बहराइच, 64 वर्ष

-बेटी से कहें कि वह घर पर मशीन से अपना रक्तचाप नापती रहें। आपको किसी तरह का रिस्क नहीं है। अपने रक्तचाप, क्रिएटिनिन और मूत्र की प्रत्येक तीन माह में नियमित जांच करवाते रहें।


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बाक्स..........


इन बातों का रखें ध्यान

प्रो. प्रसाद के मुताबिक, खून में नमक की मात्रा अधिक होने पर किडनी डैमेज होने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए पानी का सेवन अधिक करें। बिना चिकित्सीय परामर्श दर्द की दवा का सेवन करना भी किडनी के लिए घातक है। परिवार में पहले से किसी को बीमारी रही है तो 30 साल से अधिक उम्र वाले युवा जरूर नियमित चेकअप कराएं। यदि किडनी में सिस्ट मिलता है तो नियमित बीपी व आरएफटी जांच कराएं और चिकित्सीय परामर्श से दवा लेते रहें। 60 साल से अधिक उम्र के लोगों को छह माह में एक बार पीएसए की जांच जरूर कराना चाहिए। धूमपान से परहेज करें।


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किडनी की प्रमुख बीमारियां


1- एक्यूट किडनी इंजरी (एकेआइ)


कारण: संक्रमण या किडनी को नुकसान पहुंचाने वाली दवा का सेवन, हाई बीपी, शुगर, मलेरिया, डायरिया आदि।

लक्षण: पेशाब में अचानक कमी होना, बुखार आना या अधिक दस्त होने की दशा में दवा लेने के बाद पेशाब में कमी होना।


उपचार: यह दवा से पूरी तरह ठीक हो जाता है।


2- नेफ्रोटिक सिंड्रोम

कारण: शरीर की प्रतिरोधी क्षमता का असामान्य होना


लक्षण: पेशाब में प्रोटीन आने की वजह से शरीर में सूजन

उपचार: सटीक इलाज से बीमारी पूरी तरह ठीक हो सकती है


3- गुर्दे की पथरी :


कारण: यूरिक एसिड का बढ़ना, पानी कम पीना आदि।

लक्षण: पेट में दर्द, उल्टी या बुखार होना, पेशाब में जलन, रुक-रुक कर पेशाब होना।


उपचार: दवा अथवा सर्जरी द्वारा पूरी तरह ठीक हो सकता है। समय पर उपचार नहीं कराने पर किडनी को नुकसान भी पहुंचा सकता है।


4- आनुवांशिक बीमारी (पालिसिस्टिक किडनी डिजीज)

कारण: परिवार में यदि पहले किसी को यह बीमारी रही है तो संभावना रहती है।


लक्षण: बीपी बढ़ना, पेट में भारीपन, कभी-कभी लाल पेशाब होना।

उपचार: 30 वर्ष की उम्र के बाद बीपी और शुगर के साथ किडनी की जांच कराएं।


5- क्रोनिक किडनी डिजीज :


कारण: शुगर, बीपी या क्रोनिक नेफ्रोटिक सिंड्रोम का समय पर इलाज न कराने पर क्रोनिक किडनी डिजीज की संभावना रहती है।

लक्षण: भूख कम लगना, थकान होना, पैरों या चेहरे में सूजन, उल्टी आना, चलने-फिरने में परेशानी होना, सांस फूलना, रात के समय पेशाब ज्यादा आना।


उपचार: एक बार क्रोनिक होने पर दवा से बढ़ने की दर को धीमा किया जा सकता है। इससे डायलिसिस या किडनी प्रत्यारोपण की स्थिति को कुछ समय के लिए टाला जा सकता है।


6- एंड स्टेज रीनल डिजीज (ईएसआरडी)

कारण: शुगर, बीपी या क्रोनिक नेफ्रोटिक सिंड्रोम का समय पर इलाज न कराने पर एंड स्टेज रीनल डिजीज की संभावना रहती है।


लक्षण: बीपी का अनियंत्रित बढ़ना, शरीर में सूजन, कमजोरी, भूख न लगना, जल्दी थक जाना आदि।

उपचार: मधुमेह के रोगियों में अधिकतर यह समस्या आती है। डायलिसिस नियमित अंतराल पर जरूरी हो जाता है, जब तक कि गुर्दा प्रत्यारोपण न हो।

शनिवार, 24 फ़रवरी 2024

पीजीआई में दुर्लभ रोगों से पीड़ित 16 बच्चों का मुफ्त इलाज शुरू

 



पीजीआई में दुर्लभ रोगों से पीड़ित 16 बच्चों का मुफ्त इलाज शुरू


-80 फीसदी दुर्लभ रोग अनुवांशिक होते हैं

-पीजीआई के जनेटिक्स विभाग में हुआ कार्यक्रम

-रेयर डिजीज पॉलिसी के तहत पीजीआई को मिले 6.4 करोड़ रुपये 

 

संजय गांधी पीजीआई में दुर्लभ बीमारी गौचर और स्पाइनल मस्कुलर रोग से पीड़ित 16 बच्चों का इलाज नि:शुल्क शुरू हो गया है। केन्द्र सरकार ने रेयर डिजीज पॉलिसी के तहत पीजीआई को दुर्लभ रोगों के इलाज के लिए 6.4 करोड़ रुपये दिये हैं।  शनिवार को पीजीआई के मेडिकल जेनेटिक्स विभाग की प्रमुख प्रो. शुभा फड़के ने संस्थान में आयोजित रेयर डिजीज जागरूकता   कार्यक्रम में बताया कि  विल्सन रोग, टायरोसिनेमिया, ग्रोथ हार्मोन की कमी, इम्यूनोडेफिशिएंसी रोगियों को जल्द ही मुफ्त उपचार शुरू किया जाएगा। इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के यूपी चैप्टर और लखनऊ एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के सहयोग से आयोजित कार्यक्रम में दुर्लभ रोगों से पीड़ित करीब 100 बच्चों को सम्मानित किया गया। प्रदेश के कई जिलों से आए बाल रोग विशेषज्ञों को दुर्लभ बीमारियों की जानकारी दी गई।

80 फीसदी दुर्लभ बीमारी अनुवांशिक

मेडिकल जनेटिक्स विभाग की प्रमुख डॉ. शुभा फड़के ने बताया कि 80 फीसदी दुर्लभ रोग ( रेयर डिजीज) अनुवांशिक होते हैं। जबकि अन्य में बैक्टीरिया या वायरल संक्रमण समेत दूसरे कारण होते हैं। अनुवांशिक दुर्लभ बीमारियां जन्मजात होती हैं। इनके लक्षण तीन, छह व एक साल में दिखाई देने लगते हैं। डॉ. फड़के ने बताया कि पांच हजार तरह की दुर्लभ बीमारियां हैं। 10 हजार व 30 हजार में एक में दुर्लभ बीमारी होती है। संस्थान की ओपीडी में हर साल करीब तीन हजार बच्चे दुर्लभ बीमारियों के आते हैं। इनमें से 150 बच्चों का इलाज विभाग में चल रहा है। एनएचएम के जरिए नवजात स्क्रीनिंग कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसके तहत 6500 नवजात की स्क्रीनिंग जन्मजात हार्मोनल बीमारी का पता लगाने के लिए किया गया है। कार्यक्रम में   राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन निदेशक पिंकी जोवेल, संस्थान के डीन डॉ. शालीन कुमार व डॉ. दीप्ति सक्सेना समेत अन्य ने विचार रखे।

प्रदेश के पांच मेडिकल कॉलेजों में पीजीआई शुरू कराएगा किडनी ट्रांसप्लांट

 



प्रदेश के पांच मेडिकल कॉलेजों में पीजीआई शुरू कराएगा किडनी ट्रांसप्लांट


गोरखपुर, मेरठ, आगरा, झांसी, प्रयागराज मेडिकल कॉलेज के नेफ्रोलाजिस्ट के साथ बैठक के बाद बनी कार्य योजना


6 महीने में ट्रांसप्लांट शुरू करने की कार्य योजना पर काम शुरू 




 


विकास मिश्रा। लखनऊ


प्रदेश में किडनी ट्रांसप्लांट की रफ्तार बढ़ाने के लिए संजय गांधी पीजीआई का नेफ्रोलाजी विभाग अग्रदूत की भूमिका में आने के लिए तैयारी कर लिया है। 6 महीने में प्रदेश के पांच मेडिकल कॉलेज जहां पर नेफ्रोलाजिस्ट और यूरो सर्जन उपलब्ध उन्हें किडनी ट्रांसप्लांट के लिए प्रशिक्षण, तकनीक स्थापित करने में मदद करेगा। विभाग के प्रमुख प्रो. नरायन प्रसाद का कहना है कि प्रदेश में किडनी ट्रांसप्लांट सेंटर की कमी के कारण मरीजों को 1.5 से दो साल इंतजार करना पड़ रहा है। आर्थिक रूप से सक्षम दूसरे प्रदेश में किडनी ट्रांसप्लांट के लिए चले जाते है। प्रदेश के झांसी , आगरा, गोरखपुर , प्रयागराज और मेरठ मेडिकल कालेज में नेफ्रोलाजिस्ट और यूरो सर्जन उपलब्ध है। इन सेंटर को किडनी ट्रांसप्लांट की मान्यता देने की प्रक्रिया शुरू करने जा रहे है। मान्यता मिलने के बाद यह सेंटर ब्रेन डेड लोगों के परिजनों के सहमति के बाद अंगदान ले सकेंगे। आर्गन निकाल कर जरूरत के अनुसार खुद भी अपने मरीज में किडनी ट्रांसप्लांट कर सकेंगे। मान्यता मिलने से पहले इन मेडिकल कालेज के नेफ्रोलाजिस्ट एवं यूरोलॉजिस्ट को उनके जरूरत के अनुसार प्रशिक्षित संस्थान में बुला कर करेंगे। पहले किडनी ट्रांसप्लांट के लिए जरूरत होगी तो हमारे संकाय प्रो.धर्मेंद्र भदौरिया, प्रो. मानस रंजन पटेल, प्रो. रवि शंकर या मैं खुद जाकर तकनीक स्थापित कराएंगे। प्रो. नरायन ने बताया कि झांसी मेडिकल कालेज में प्रो नरेंद्र सेंगर, आगरा में प्रो. अपूर्व जैन, प्रो. मुदित खुराना, मेरठ में प्रो. इंद्रजीत मेमिन, प्रो. अर्पित श्रीवास्तव, प्रो. अरविंद त्रिवेदी, गोरखपुर में प्रो. विजय , इलाहाबाद में प्रो. अरविंद मुख्य रूप से संस्थान में आए थे जिनसे विचार विमर्श के बाद यह तय किया गया है कि इन मेडिकल कालेज में किडनी ट्रांसप्लांट शुरू किया जाएगा। हम लोगों  ने 6 महीने का लक्ष्य रखा है। इससे लाइव ट्रांसप्लांट को गति मिलने के साथ कैडेवर ट्रांसप्लांट को भी गति मिलेगी। इस योजना पर प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा  ने पूरी तरह सहयोग का आश्वासन दिया है। प्रदेश सरकार की मंशा है कि किडनी सहित अन्य ट्रांसप्लांट के लिए मरीजों को इतजार न करना पडे इस दिय़ा में काम शुरू कर दिया है।


   प्रदेश में घटेगी किडनी ट्रांसप्लांट की वेटिंग


प्रो. नरायन का कहना है कि संस्थान में हर साल में 120 से 130 किडनी ट्रांसप्लांट हो रहा है इसको बढ़ाने की कोशिश जारी है। लोहिया संस्थान और किंग जार्ज मेडिकल विवि में भी हम लोगों ने किडनी ट्रांसप्लांट शुरू कराया है अभी संख्या कम है आगे संख्या बढेगी।  अभी प्रदेश के सरकारी संस्थानों में  साल में 150 ट्रांसप्लांट हो रहे है इन मेडिकल कॉलेजों में ट्रांसप्लांट शुरू होने के बाद दो से 450 तक ट्रांसप्लांट साल में होना संभव होगा। एक बार ट्रांसप्लांट शुरू होने के बाद इन मेडिकल कॉलेजों में संख्या बढ़ेगी जिससे वेटिंग लिस्ट प्रदेश में कम हो जाएगी।

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2024

पीजीआई ट्रामा में बिना पास के तीमारदार को नहीं मिलेगा प्रवेश

 


पीजीआई ट्रामा में बिना पास के तीमारदार को नहीं मिलेगा प्रवेश


संजय गांधी पीजीआई के एपेक्स ट्रामा सेंटर में तीमारदारों द्वारा डॉक्टर के साथ मारपीट की घटना के बाद संस्थान प्रशासन ने सख्ती बढ़ा दी है। अब तीमारदारों को बिना पास के प्रवेश नहीं मिलेगा। वह भी निर्धारित समय पर ही मरीज से मिल सकेंगे। इसके अलावा अन्य समय में नहीं जा सकेंगे। मुख्य गेट और वार्ड के बाहर सुरक्षा गार्ड बढ़ा दिये हैं।

संस्थान के ट्रामा सेंटर में मंगलवार रात नशे में धुत आधा दर्जन तीमारदारों ने जबरन वार्ड में घुसकर डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मियों के साथ मारपीट और हंगामा किया था। संस्थान के रजिस्ट्रार ने आरोपियों के खिलाफ पीजीआई कोतवाली में एफआईआर दर्ज करायी है। एपेक्स ट्रामा सेंटर के चिकित्सा अधीक्षक प्रो. राजेश हर्षवर्धन ने बताया कि प्रत्येक मरीज के भर्ती होने पर उनके घर वालों को पास मुहैया कराया जाता है। इस पास के साथ ही तीमारदारों को प्रवेश दिया जाता। मरीज से मिलने का समय निर्धारित है। इसके बावजूद रात में जबरन घुसे तीमामादारों ने मारपीट की। इस घटना के बाद से सख्ती बढ़ायी गई है। ताकि दोबारा से ऐसी घटना न हो। प्रो. हर्षवर्धन ने बताया कि यदि बिना पास के कोई तीमारदार जबरन घुसने का प्रयास करता है। तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।


दोषियों के खिलाफ कार्रवाई पर अड़े कर्मचारी



 कर्मचारी महासंघ के पूर्व महामंत्री धर्मेश कुमार , मेडिटेक एसोसिएशन के प्रेसिडेंट डी  के सिंह, महामंत्री सरोज वर्मा ,  ने गुरुवार को संस्थान निदेशक डॉ. आरके धीमान से कर्मचारियों की सुरक्षा की मांग किया। एनएसए अध्यक्ष लता सचान,  महामंत्री विवेक शर्मा सहित अन्य ने  निदेशक से कहा कि कर्मचारियों के साथ तीमारदारों द्वारा अभद्र व्यवहार, धमकाने व मारपीट के मामले में कड़ी कार्रवाई की जाये। प्रवेश द्वार और वार्ड में सुरक्षाकर्मी बढ़ाये जाएं। मुख्य गेट पर कारपोरेट अस्पतालों की तर्ज पर मेटल डिटेक्टर से तलाशी की व्यवस्था लागू की जाये।  ट्रामा में डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मियों के साथ मारपीट करने वाले आरोपी तीमारदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग रखी।

बार-बार डायरिया का कारण हो सकता है पीआईडी





 जीन परीक्षण से खुला डायरिया राज

बार-बार डायरिया का कारण हो सकता है पीआईडी

पीआईडी के कारण चार साल की बच्ची बार –बार हो रही थी डायरिया और पेचिश का शिकार


 

बार –बार डायरिया, पेचिश से परेशान का इलाज 4 वर्षीय रतिका के माता-पिता काफी चिंतित थे। आम इलाज से कोई फायदा नहीं हो रहा था किसी तरह डायरिया रुका भी तो दस दिन भी नहीं बीतता दोबारा डायरिया की परेशानी शुरू हो जाती थी। घर वाले परेशान हो कर संजय गांधी पीजीआई के पीडियाट्रिक गैस्ट्रोएंट्रॉलजी में सलाह के लिए आए । विभाग के प्रो. मोइनक सेन शर्मा ने देखा तो समझ गए कि यह आम डायरिया या पेचिश नहीं है। रतिका की इतनी खराब थी कि मलद्वार के पास छननी(धाव) जैसा बन गया। आंत में अल्सर हो गया था। वजन नहीं बढ़ रहा था।   रतिका को केस के रूप में रविवार को संस्थान में इंडियन सोसाइटी आफ पीआईडी(पीडीकांन-2024) के अधिवेशन में प्रस्तुत करते हुए बताया कि बच्ची के आंत पर भार कम करने के लिए छोटी आंत और बड़ी आंत के बीच गैस्ट्रो सर्जरी विभाग ने डायवर्जन किया। इसी बीच तमाम परीक्षण जो अन्य कारण थे सब सामान्य थी। पीआईडी जानने के लिए अन्य जांच के साथ जीन की जांच कराया तो बच्ची में आईएल 10 जीन में खराबी मिली जिसके कारण बच्ची का इम्यून सिस्टम काफी कमजोर था बार संक्रमण के कारण डायरिया हो रहा था। इस परेशानी का इलाज बोन मैरो ट्रांसप्लांट ही प्राथमिक उपचार के बाद परिजन इसके लिए दूसरे संस्थान ले गए। प्रो. मोइनक ने बताया कि इम्यून सिस्टम में कमी के कारण कई तरह का डायरिया हो सकता है कुछ का इलाज केवल इंट्रावेनस इम्यूनोग्लोबुलिन इलाज से संभव होता है। 40 से अधिक बच्चे देखरेख में है। जागरूकता की कमी के कारण कई बच्चे की डायरिया से मृत्यु हो जाती है।

 

कई प्राथमिक इम्युनोडेफिशिएंसी विकार विरासत में मिले हैं - एक या दोनों माता-पिता से प्राप्त होते हैं। आनुवंशिक कोड में समस्याएं जो शरीर की कोशिकाओं (डीएनए) के उत्पादन के लिए ब्लूप्रिंट के रूप में कार्य करती हैंप्रतिरक्षा प्रणाली में इनमें से कई दोषों का कारण बनती हैं।

क्लीनिकल इम्यूनोलॉजी विभाग की प्रमुख  प्रो. अमिता अग्रवाल के मुताबिक प्राथमिक इम्युनोडेफिशिएंसी 500 से अधिक प्रकार हैं। प्रतिरक्षा प्रणाली के प्रभावित हिस्से के आधार पर उन्हें मोटे तौर पर छह समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है

-बी सेल (एंटीबॉडी) की कमी

-टी सेल की कमी

- बी और टी कोशिका की कमी

- दोषपूर्ण फैगोसाइट्स

- कंपलीमेंट की कमी

 

 

 

 यह परेशानी तो ले सलाह

 

प्राथमिक इम्युनोडेफिशिएंसी यह लक्षण है । यह परेशानी है तो वह विभाग में ओपीडी में संपर्क कर सकते हैं।

  

-बार-बार निमोनियाब्रोंकाइटिससाइनस संक्रमणकान में संक्रमणमेनिनजाइटिस या त्वचा संक्रमण

-आंतरिक अंगों की सूजन और संक्रमण

- कम प्लेटलेट काउंट या एनीमिया

पाचन संबंधी समस्याएं, ऐंठनभूख न लगनामतली और दस्त

-ऑटोइम्यून विकारजैसे ल्यूपसरुमेटीइड गठिया या टाइप 1 मधुमेह

डायबिटीज से ग्रस्त 60 फीसदी से अधिक है लापरवाह - अनियंत्रित ब्लड शुगर बना सकता है बीमारी का टोकरा

 




डायबिटीज से ग्रस्त 60 फीसदी से अधिक है लापरवाह


अनियंत्रित ब्लड शुगर बना सकता है बीमारी का टोकरा


66.4 फीसदी में मिला अनियंत्रित ब्लड शुगर

65 .7 फीसदी में एचबी ए वन सी मिला अनियंत्रित

 राजधानी के लोगों पर शोध से मिला तथ्य

 


डायबिटीज से ग्रस्त लोग  काफी लापरवाह है। लापरवाही इनको बीमारी का टोकरा बना सकती है। अनियंत्रित शुगर लेवल लंबे समय तक रहने से  किडनी, दिल, संवेदी तंत्रिका तंतु( नर्व) सहित अन्य अंगों को क्षति ग्रस्त होने की आशंका रहती है।   किंग जार्ज मेडिकल विवि के  विशेषज्ञों ने पहली बार  डायबिटीज क्लीनिक में आने वाले 41.1 से   58.9 आयु वर्ग के 300 डायबिटीज टाइप टू से ग्रस्त लोगों पर  पर शोध किया तो पता चला कि केवल 37 फीसदी लोग डायबटीज  सेल्फ केयर( खुद की देखभाल) अच्छी तरह से करते हैं। 67 फीसदी लोग काफी लापरवाह है ।   सेल्फ केयर बहुत ही खराब मिला। इनमें से 66.4 फीसदी में  ब्लड शुगर  का लेवल अनियंत्रित 217 से 352.4 मिलीग्राम/डीएल  मिला। इनमें 65.7 फीसदी में  ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन स्तर(एचबी ए वन सी) 6.4 से 10.6 तक मिला जो अनियंत्रित है। यह तीन महीने में शुगर के स्तर का औसत बताता है।

 

 

यहां से शोध में शामिल किए गए

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सरोजिनी नगर और चिनहट सिविल अस्पताल और किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के ओपीडी में आने वाले मरीजों को शोध में शामिल किया गया। 

 

 

 

 

इन्हों ने किया शोध

किंग जार्ज मेडिकल विवि के सामुदायिक चिकित्सा और सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग से  डा. माविया खान, मेडिसिन विभाग से   डा. उस्मान कौसर,  जरा चिकित्सा चिकित्सा विभाग डा. मोनिका अग्रवाल, बॉयोस्टैटिसटिक्स और स्वास्थ्य सूचना विज्ञान विभाग एसीजीपीजीआई ने सांख्यिकी विशेषज्ञ के तौर पर डा,  प्रभाकर मिश्रा ने प्रिवलेंस आफ सेल्फ केयर प्रैक्टिस एमंग टाइप टू डायबिटीज मेलिटस पेशेंट एंड इट्स इफेक्ट ऑफ ग्लायसेमिक कंट्रोल विशेष को लेकर शोध किया जिसे   इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एप्लाइड बेसिक मेडिकल रिसर्च ने हाल में स्वीकार किया है।

 

 

 

प्रदेश में 10 .5 फीसदी डायबिटीक

 

भारत - 8.3 फीसदी

भारत में - 7.7  करोड़ मधुमेह रोगी

भारत में 2045 तक - 13.4 करोड़ लोग मधुमेह से पीड़ित होंगे

उत्तर प्रदेश - 10.5 फीसदी

 

 

डायबिटीज के कारण यह परेशानी-फीसदी

 

रेटिनोपैथी( आंख) -34.1 फीसदी

 

 नेफ्रोपैथी( किडनी की परेशानी) -   26.6

 

न्यूरोपैथी( संवेदी तंत्रिका तंतु)-30.9

 

हृदय रोग-28.0

पेरिफेरल वैस्कुलर डिजीज( रक्त परिसंचरण तंत्र) -  8.3

 

 

 

किस मामले में कैसा सेल्फ केयर -फीसदी

 

केयर            अच्छा          खराब

डाइट             36.7          63.3

शारीरिक गतिविधि    36.7         63.3

ब्लड शुगर परीक्षण    17.7        82.2

पैर की देखभाल   24.3      75.7

चिकित्सा        6.3         93.7

कुल सेल्फ केयर    37.0         63.0

 

 

 

 

 

शहरी अच्छा करता है डायबिटीज केयर

 

शहरी क्षेत्र -  42.2 फीसदी

ग्रामीण क्षेत्र - 24.6 फीसदी

रविवार, 11 फ़रवरी 2024

Foundation Day of PGI Pulmonary Medicine Department - Vaccine will reduce the problem of COPD

 






Foundation Day of PGI Pulmonary Medicine Department


Vaccine will reduce the problem of COPD


TB patients are more likely to develop COPD


 



COPD (Chronic Obstructive Pulmonary Disease) patients can reduce their problems by getting influenza and pneumococcal vaccines. Head of Pulmonary Medicine Department of Sanjay Gandhi PGI, Prof. Alok nath and Prof. Mansi Gupta told in the session organized on Air Way Diseases on the occasion of foundation  day of the department and alumni meet that if there is cough, phlegm and difficulty in breathing for more than two months, then consult a pulmonary specialist and there is a possibility of COPD. can be reduced to a minimum. During this problem, the air passages of the lungs shrink, due to which there is difficulty in breathing. When this happens, carbon dioxide is not able to come out from inside the body. The risk of this disease in people suffering from TB is higher than that of ordinary people, hence TB treatment should also be taken completely. This problem has increased so much that it is being known as TB Associated COPD (TOPD). The main reason for this problem is pollution along with smoking. Anti-IgE, anti-IL-5 and anti-IL-RA biological medicines have also been used for the treatment of this disease, which are providing considerable relief. Bronchodilator inhalers are the most important medications in initial treatment. They relax the airways to keep them open. Some bronchodilators start working within a few seconds and can last for 4-6 hours. Used immediately when trouble occurs. Long-acting bronchodilators take longer to start working but last longer. These are taken daily. May be combined with steroids. The conference was inaugurated by Director Prof. RK Dhiman did it and expressed happiness over the progress of the department. Medical University Prof. Suryakant, Prof. Rajendra Prasad, Prof. Ved Prakash, Prof. KB Gupta and others gave information about COPD and asthma.

वैक्सीन से कम होगी सीओपीडी की परेशानी- टीबी के मरीजों में अधिक है सीओपीडी की आशंका


पीजीआई पल्मोनरी मेडिसिन विभाग का स्थापना  दिवस

वैक्सीन से कम होगी सीओपीडी की परेशानी

टीबी के मरीजों में अधिक है सीओपीडी की आशंका

 


सीओपीडी(क्रोनिक आब्सट्रेक्शन पल्मोनरी डिजीज) के मरीज इंफ्लुएंजा और न्यूमोकोकल वैक्सीन लगवा कर परेशानी कम कर सकते हैं।  संजय गांधी पीजीआई के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के प्रमुख प्रो. आलोक नाथ एवं  प्रो, मानसी गुप्ता ने विभाग के स्थापना एवं एल्युमिनाई मीट के मौके पर एयर वे डिजीज पर आयोजित अधिवेशन में  बताया कि दो महीने से अधिक खांसी, बलगम और सांस लेने में परेशानी हो तो किसी पल्मोनरी विशेषज्ञ से सलाह ले कर सीओपीडी की आशंका को कम कम किया जा सकता है। इस समस्या के दौरान फेफड़ों के वायु मार्ग सिकुड़ जाते हैंजिस वजह से सांस लेने में परेशानी आती है. ऐसा होने पर शरीर के अंदर से कार्बन डाई ऑक्साइड बाहर नहीं निकल पाता है।टीबी ग्रस्त लोगों में इस बीमारी की आशंका आम लोगों के मुकाबले अधिक है इसलिए टीबी का भी इलाज पूरी तरह से लेना चाहिए । यह परेशानी इतनी बढ़ गयी है कि इसे टीबी एसोसिएटेड सीओपीडी (टीओपीडी) के नाम से जाना जा रहा है। इस परेशानी का मुख्य कारण धूम्रपान के साथ प्रदूषण है। इस बीमारी के इलाज के लिए एंटी आईजीई , एंटी आईएल -5 और एंटी आईएल आरए बायोलॉजिकल दवाएं भी गयी है काफी राहत दे रही है। प्रारंभिक इलाज में  ब्रोंकोडाइलेटर इनहेलर सबसे महत्वपूर्ण दवाएं हैं। वे वायुमार्गों को खुला रखने के लिए उन्हें शिथिल करते हैं। कुछ  ब्रोन्कोडायलेटर कुछ ही सेकंड में काम करना शुरू कर देते हैं और 4-6 घंटे तक रह सकते हैं। परेशानी होने के दौरान तुरंत उपयोग किया जाता है।लंबे समय तक काम करने वाले ब्रोंकोडाईलेटर्स को काम शुरू करने में अधिक समय लगता है लेकिन लंबे समय तक टिकते हैं। इन्हें प्रतिदिन लिया जाता है। स्टेरॉयड के साथ जोड़ा जा सकता है। अधिवेशन का उद्घाटन निदेशक प्रो. आरके धीमान ने किया और विभाग के प्रगति पर हर्ष जताया। मेडिकल विवि के प्रो. सूर्यकांत, प्रो. राजेंद्र प्रसाद, प्रो. वेद प्रकाश, प्रो. केबी गुप्ता सहित अन्य लोगों ने सीओपीडी और अस्थमा के बारे में जानकारी दी।    


PID will be tested for free in PGI Even general doctors can detect PID with TLC test







 PID will be tested  free in PGI


 


Even general doctors can detect PID with TLC test 

 




Even a general practitioner can detect the possibility of primary immunodeficiency (PID) in the early stages. If a person of any age is getting repeated infections. There is no improvement with normal oral antibiotics. If you have to be admitted and the lymphocyte count is low, then you need to consult a specialist to confirm the suspicion of PID. Professor, Head of Clinical Immunology Department of Sanjay Gandhi PGI. Amita Aggarwal and Foundation for PID America Prof. Sudhir Gupta told in the convention of Indian Society of PDI that TLC test for any pathology can be done for twenty to thirty rupees. To confirm this disease, further immunoglobulin Ig, IgA and IgM tests are done along with lymphocyte sub-cell testing by flow cytometry and then genetic testing is done for specific confirmation. Foundation for PID has provided financial support for free testing of patients in the institute. Will examine poor patients for free. The Foundation has assured to help in the treatment also. This disease has also been included in the Rare Disease Policy of the Government of India, making its treatment possible. Dr. Troyan Torgerson, Dr. Siringo Rosenzwing from America attended the convention. Many experts including Dr. Dan Kastner gave information. Director Prof. RK Dhiman said in the inauguration of the convention that the institute will provide every resource.


 


25 to 30 new patients every year


Pro. Amita Aggarwal said that every year 25 to 30 new patients are diagnosed with PID. Due to lack of testing and awareness, 16 thousand patients are diagnosed in the country while the number is around 10 lakh. Intravenous IgG is given for treatment.






10 percent are miss diagnosed


Five to 10 percent of missed diagnoses occur because PID causes many problems including skin, lungs, auto immune disease, liver etc. Many times PID is not detected.






 Life increases with treatment



If PID is not treated, 50 percent of patients may die within 20 years. Treatment leads to longer life.