मंगलवार, 18 जुलाई 2017

मनकामेश्वर मठ मंदिर सात अगस्त (सोमवार) को दोपहर 1:52 बजे से भक्तों के लिए बंद रहेगा

 सावन के महीनों में हर सोमवार को शिव मंदिरों में भक्त पूजा करने पहुंचते है। राजधानी का मनकामेश्वर मठ मंदिर में सावन के सोमवार को विशेष पूजा होती है। यहाँ सैकड़ों लोग पूजा के लिए पहुंचते हैं। भक्तों के लिए यहाँ विशेष तैयारी भी होती है। इस मंदिर में सुबह से शाम तक भक्त पूजा के लिए आते हैं। लेकिन इस बार सावन के अंतिम सोमवार के दिन ग्रहण होने से भक्त शाम को यहाँ पूजा पाएंगे। 

डालीगंज स्थित मनकामेश्वर मठ मंदिर सात अगस्त, 2017 दिन सोमवार को दोपहर 1:52 बजे से भक्तों के लिए बंद रहेगा। मनकामेश्वर मठ मंदिर की महंत देव्या गिरि महाराज ने बताया कि सात अगस्त को चंद्रग्रहण पड़ रहा है। इस वजह से सूतक दोपहर 1:52 बजे से शुरू होकर नौ घंटे तक चलेगा। चंद्रग्रहण रात 10:52 बजे से शुरू होगा। 

जबकि मोक्ष काल रात 12:48 बजे तक रहेगा। सूतक ग्रहण से नौ घंटे पहले ही लग जायेगा। इस वजह से दोपहर 1:52 बजे से सावन का सोमवार होने के बाद भी मंदिर परिसर के सभी कपाट भक्तों के लिए बंद रहेंगे। महंत देव्या गिरि ने बताया कि ग्रहण काल एवं सूतक काल में देवमूर्ति का स्पर्श नहीं करना चाहिए। इसलिए सभी भक्तों से अपील की जाती है कि वह दोपहर डेढ़ बजे तक सात अगस्त दिन सोमवार को भगवान शिव के दर्शन कर लें। उसके बाद मंदिर नहीं खुलेगा।

पीजीआई के मरीज एस्क्लेटर से पहुंचेंगे ओपीडी

पीजीआई के मरीज एस्क्लेटर से पहुंचेंगे ओपीडी
-पांच मंजिला ओपीडी में मरीजों को आने-जाने में होगी सहूलियत





पीजीआई के मरीज अब एस्क्लेटर से ओपीडी तक पहुंचेंगे। न्यू ओपीडी में मरीजों की सहूलियत के मद्देनजर एस्क्लेटर लगाए जा रहे है। हालांक अभी मरीज और तीमारदार लिफ्ट और जीने से ओपीडी में आते-जाते हैं। मरीजों का भारी दबाव होने की वजह से मरीजों को लिफ्ट में लम्बा इंतजार करना पड़ रहा है। पीजीआई निदेशक डॉ. राकेश कपूर बताते हैं कि ओपीडी पांच मंजिला होने की वजह से मरीजों को आने-जाने में दिक्कतें आ रही थी। जिसको देखते हुए एस्क्लेटर लगाने का निर्णय लिया गया है।
पीजीआई में संचालित न्यू ओपीडी में रोजाना चार से पांच हजार मरीज और तीमारदार आते हैं। अभी तक मरीज ओपीडी में आने-जाने के लिए लिफ्ट और जीने का सहारा ले रहे थे। मरीजों का भारी दबाव और लिफ्ट में सीमित लोगों के जाने की वजह से गंभीर बीमारियों के मरीजों को लम्बा इंतजार करना पड़ता था। ये लिफ्ट आए दिन खराब भी रहती है। जिसकी वजह से गंभीर मरीजों को पांच मंजिला ओपीडी तक पहुंचने में बहुत दिक्कतें आती हैं। पीजीआई के सीमएमएस डॉ. अमित अग्रवाल बताते हैं कि न्यू ओपीडी में मरीजों के दबाव को देखते हुए एस्क्लेटर लगाने का निर्णय लिया है।

शनिवार, 15 जुलाई 2017

मॉर्निंग वॉक करें , कैंसर से बचें ......



          प्रख्यात अमेरिकी कैंसर वैज्ञानिक डा. यांग ली जो की वर्तमान समय में ओहियो , अमेरिका में विश्व के दूसरे नंबर के अस्पताल क्लेवलैंड क्लीनिक में कैंसर बायोलोजी के प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। डा. यांग ली के अनुसार यदि कैंसर से बचना है तो सुबह या शाम टहले और व्यायाम ज़रूर करें । कैंसर सेल की प्रभावी रोकथाम पर रिसर्च कर रहे डा. यांग के मुताबिक विकसित देशों में एक तिहाई मौतें कैंसर से होती हैं।
                    कैंसर वैज्ञानिक डा. यांग ने बातचीत में कहा की शोध में अब तक यह सामने आया है कि टहलने और व्यायाम करने से कैंसर से लड़ने वाली सेल मजबूत होती है। शरीर में 'टी' और 'बी' सेल होती है। 'टी' सेल कैंसरेस हो चुकी कोशिकाओं कि पहचान कर उन्हे मारती है। कैंसर में तब्दील होने वाली कोशिकाएँ बहुरूपिये कि तरह होती हैं। ऐसे में अक्सर 'टी' सेल उन्हे पहचानने में धोखा खा जाती हैं। डा. यांग ली के मुताबिक जेनेरिक कैंसर का अब तक कोई भी इलाज सम्भव नही हो सका है। जेनेरिक कैंसर की सेल को जीन पी-53 कहते हैं। अगर यह शरीर में है तो कैंसर होने की समभावनाये बढ़ जाती हैं।

शान्तनु नर्सिंग होम में कैंसर के मरीजों का किया जाता है विशेष उपचार ।

   
   
   जनपद प्रतापगढ़ के नगर क्षेत्र में स्तिथ शान्तनु नर्सिंग होम में कैंसर के मरीजों का विशेष ख़याल रखा जाता है जहाँ पर मरीजों को कीमोथैरेपी व सर्जरी के माध्यम से कैंसर जैसी जघन्य बीमारी से निजात दिलाने की पूरी कोशिश की जाती है। नर्सिंग होम के संचालक डा. घनश्याम अग्रवाल (भूतपूर्व सीनियर रेसिडेंट्) के.जी.एम.यू. , सर्जन व कैंसर रोग विशेषज्ञ यहाँ के कैंसर के मरीजों के लिये किसी भगवान से कम नही हैं। कैंसर के मरीजों के लिये अपनी दिनचर्या का भी ध्यान नही रख पाते हैं डा. घनश्याम अग्रवाल , अपना पूर्ण समय मरीजों के देखभाल में ही व्यतीत कर देने के बावजूद भी किसी भी प्रकार का मलाल नही रखते डा. घनश्याम अग्रवाल । आप की अनुशासनात्मक व सेवामय कार्यप्रडाली तो देखते ही बनती है जो कि किसी उदाहरण से कम नही है।

शर्मिंदा......जरूर पढे खास तौर वह बहुएं जो ...

अक्सर सुनने को मिलता है कि मायके वाले अाएं तो सब ठीक कहीं ससुराल से कोई अाए जाए तो लगता है कि बहुअों का पहाड़ टूट पडा..इसी पर अाधारित एक कहानी  
फ़ोन की घंटी तो सुनी, मगर आलस की वजह से रजाई में ही लेटी रही। उसके पति राहुल को आखिर उठना ही पड़ा। दूसरे कमरे में पड़े फ़ोन की घंटी बजती ही जा रही थी।इतनी सुबह कौन हो सकता है जो सोने भी नहीं देता, इसी चिड़चिड़ाहट में उसने फ़ोन उठाया। “हेल्लो, कौन” तभी दूसरी तरफ से आवाज सुन सारी नींद खुल गयी।
राहुल ने कहा “नमस्ते पापा।” उधर से आवाज़ आई "बेटा, बहुत दिनों से तुम्हे मिले नहीं सो हम दोनों ११ बजे की गाड़ी से आ रहे है। दोपहर का खाना साथ में खा कर हम ४ बजे की गाड़ी वापिस लौट जायेंगे। ठीक है।” “हाँ पापा, मैं स्टेशन पर आपको लेने आ जाऊंगा।”
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फ़ोन रख कर वापिस कमरे में आ कर उसने रचना को बताया कि मम्मी पापा ११ बजे की गाड़ी से आरहे है और दोपहर का खाना हमारे साथ ही खायेंगे।
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रजाई में घुसी रचना का पारा एक दम सातवें आसमान पर चढ़ गया। “कोई इतवार को भी सोने नहीं देता, अब सबके के लिए खाना बनाओ। पूरी नौकरानी बना दिया है।” गुस्से से उठी और बाथरूम में घुस गयी। राहुल हक्का बक्का हो उसे देखता ही रह गया।
जब वो बाहर आयी तो राहुल ने पूछा “क्या बनाओगी।” गुस्से से भरी रचना ने तुनक के जवाब दिया “अपने को तल के खिला दूँगी।” राहुल चुप रहा और मुस्कराता हुआ तैयार होने में लग गया, स्टेशन जो जाना था।
थोड़ी देर बाद ग़ुस्सैल रचना को बोल कर वो मम्मी पापा को लेने स्टेशन जा रहा है वो घर से निकल गया।
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रचना गुस्से में बड़बड़ाते हुए खाना बना रही थी।
दाल सब्जी में नमक, मसाले ठीक है या नहीं की परवाह किए बिना बस करछी चलाये जा रही थी। कच्चा पक्का खाना बना बेमन से परांठे तलने लगी तो कोई कच्चा तो कोई जला हुआ। आखिर उसने सब कुछ ख़तम किया, नहाने चली गयी।
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नहा के निकली और तैयार हो सोफे पर बैठ मैगज़ीन के पन्ने पलटने लगी।उसके मन में तो बस यह चल रहा था कि सारा संडे खराब कर दिया। बस अब तो आएँ , खाएँ और वापिस जाएँ ।
थोड़ी देर में घर की घंटी बजी तो बड़े बेमन से उठी और दरवाजा खोला। दरवाजा खुलते ही उसकी आँखें हैरानी से फटी की फटी रह गयी और मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल सका।
सामने राहुल के नहीं उसके अपने मम्मी पापा खड़े थे जिन्हें राहुल स्टेशन से लाया था।
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मम्मी ने आगे बढ़ कर उसे झिंझोड़ा “अरे, क्या हुआ। इतनी हैरान परेशान क्यों लग रही है। क्या राहुल ने बताया नहीं कि हम आ रहे हैं।” जैसे मानो रचना के नींद टूटी हो “नहीं, मम्मी इन्होंने तो बताया था पर…. रर… रर। चलो आप अंदर तो आओ।” राहुल तो अपनी मुसकराहट रोक नहीं पा रहा था।
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कुछ देर इधर उधर की बातें करने में बीत गया। थोड़ी देर बाद पापा ने कहाँ “रचना, गप्पे ही मारती रहोगी या कुछ खिलाओगी भी।” यह सुन रचना को मानो साँप सूँघ गया हो। क्या करती, बेचारी को अपने हाथों ही से बनाए अध पक्के और जले हुए खाने को परोसना पड़ा। मम्मी पापा खाना तो खा रहे थे मगर उनकी आँखों में एक प्रश्न था जिसका वो जवाब ढूँढ रहे थे। आखिर इतना स्वादिष्ट खाना बनाने वाली उनकी बेटी आज उन्हें कैसा खाना खिला रही है।
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रचना बस मुँह नीचे किए बैठी खाना खा रही थी। मम्मी पापा से आँख मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं हो पा रही थी। खाना ख़तम कर सब ड्राइंग रूम में आ बैठे। राहुल कुछ काम है अभी आता हुँ कह कर थोड़ी देर के लिए बाहर निकल गया। राहुल के जाते ही मम्मी, जो बहुत देर से चुप बैठी थी बोल पड़ी “क्या राहुल ने बताया नहीं था की हम आ रहे हैं।”
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तो अचानक रचना के मुँह से निकल गया “उसने सिर्फ यह कहाँ था कि मम्मी पापा लंच पर आ रहे हैं, मैं समझी उसके मम्मी पापा आ रहे हैं।”
फिर क्या था रचना की मम्मी को समझते देर नहीं लगी कि ये मामला है। बहुत दुखी मन से उन्होंने रचना को समझाया “बेटी, हम हों या उसके मम्मी पापा तुम्हे तो बराबर का सम्मान करना चाहिए। मम्मी पापा क्या, कोई भी घर आए तो खुशी खुशी अपनी हैसियत के मुताबिक उसकी सेवा करो। बेटी, जितना किसी को सम्मान दोगी उतना तुम्हे ही प्यार और इज़्ज़त मिलेगी। जैसे राहुल हमारी इज़्ज़त करता है उसी तरह तुम्हे भी उसके माता पिता और सम्बन्धियों की इज़्ज़त करनी चाहिए। रिश्ता कोई भी हो, हमारा या उसका, कभी फर्क नहीं करना।”
रचना की आँखों में ऑंसू आ गए और अपने को शर्मिंदा महसूस कर उसने मम्मी को वचन दिया कि आज के बाद फिर ऐसा कभी नहीं होगा..!

पीजीआइ ट्रामा सेंटर को मिले अलग संस्थान का दर्जा

पीजीआइ ट्रामा सेंटर को मिले अलग संस्थान का दर्जा

ट्रामा  चलाने के लिए न्यूरोसर्जरी के प्रमुख प्रो.राजकुमार ने शासन को दिया प्रस्ताव

ट्रामा सेंटर की नींव से जुडे रहे प्रो.राजकुमार 

चिकित्सा शिक्षा मंत्री को सौंपी कार्य योजना


संजय गांधी पीजीआइ के न्यूरो सर्जरी विभाग के प्रमुख एवं एम्स ऋषिकेश के पूर्व निदेशक प्रो.राजकुमार ने ट्रामा सेंटर को संस्थान परिसर में स्थित  सीबीएमअार की तरह अलग संस्थान का दर्जा देने का प्रस्ताव सरकार को सौंपा है। वर्ष 2009 में जब ट्रामा सेंटर की नींव पडी थी तब से वह इसका काम देख रहे थे। प्रो.राजकुमार का कहना है कि एम्स दिल्ली की तरह इसे चलाने के लिए इसे अलग संस्थान का दर्जा देने की जरूरत है। इससे ट्रामा सेंटर के संचालन में निर्णय लिया जा सकेगा। निदेशक पीजीआइ की भूमिका सलाहकार के रूप में होगी ।चिकित्सा संकाय सदस्यों का रोटेशन ट्रामा सेंटर में निदेशक पीजीआइ के सलाह किया जाए। संस्थान में जो विभाग उस विभाग के लिए ट्रामा सेंटर में संकाय सदस्यों का चयन संस्थान के विभागों में ही किया जाए तभी ट्रामा सेंटर के लिए संकाय सदस्य अाएंगे केवल ट्रामा सेंटर के लिए संकाय सदस्य नहीं अाएंगे। ट्रामा अौर संस्थान के संकाय सदस्यों का रोटेशन किया जाए। जो विभाग पीजीआइ में नहीं उन विभागों के लिए ट्रामा सेंटर में ट्रामा सेंटर निदेशक द्वारा नियुक्ति की जाए। प्रो. राजकुमार का कहना है कि ट्रामा सेंटर को चलाने के लिए शुरूअाती दौर में सीटी स्कैन, एमअारअाई, लैब , सर्जरी के लिए उपकरण , अाईसीयू की जरूरत होगी इसके लिए मंहगे उपकरण प्राइवेट प्रार्टरनर शिप पर लगा कर सेवाएं शुरू की जा सकती हैं। 

ट्रामा सेंटर के लेवल वन है

पीजीआइ का ट्रामा सेंटर लेवल 1 स्तर का होगा इसकी योजना इस तरह बनायी गयी थी ट्रामा शिकार का सभी इलाज हो सके जिसमें ब्रेन की सर्जरी से लेकर रिहैबिलेटेशन की व्यस्था हो। यह ट्रामा सेंटर प्रदेश के अन्य ट्रामा सेंटर का सुपरविजन कर सके। इसमें विभिन्न स्तर के मैन पावर का प्रशिक्षण एवं शोध किया जा सके। प्रदेश के अन्य पांच ट्रामा सेंटर को विकसित करने में इसकी अहम भूमिका हो लेकिन वर्ष 2012 से दो सौ करोड की लगात से बना ट्रामा सेंटर काम नहीं कर पाया जिसका खामियाजा प्रदेश के ट्रामा ग्रस्त लोगों को भुगतना पड़ रहा है।   

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

मनकामेश्वर मठ - अमरनाथ के शहीदों की आत्मा की शान्ति के लिए हुआ शान्ति हवन, मौन


मनकामेश्वर मठ की ओर से फूंका गया आतंकवाद का पुतला
अमरनाथ के शहीदों की आत्मा की शान्ति के लिए हुआ शान्ति हवन, मौन



अमरनाथ यात्रियों पर हुए आतंकी हमले के विरोध में मनकामेश्वर मठ मंदिर की ओर से मंगलवार को डालीगंज मठ मंदिर परिसर में शान्ति हवन किया गया । इसके साथ ही आक्रोशित विभिन्न समुदाय के लोगों ने आतंकवाद का पुतला मंदिर परिसर के बाहर फूंका। इस विरोध प्रदर्शन में मुस्लिम समाज के लोगों ने भी आतंकवाद के खिलाफ आवाज उठायी। शौकत अली, आरिफ खान, नवाब गाजी, हाफिज सैय्यद मुहम्मद वसी, महबूब अंसारी ने इस विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया। प्रदर्शनकारियों ने आतंकवाद मुर्दाबाद और भारत माता की जय जैसे नारे लगाकर आक्रोश जताया। मनकामेश्वर मठ मंदिर जहां भारत माता की चौकी स्थापित है, वहां मंगलवार को श्रीमहंत देव्या गिरि जी महाराज ने बताया कि 10 जुलाई को सावन के पहले सोमवार के पवित्र अवसर पर जिस तरह आतंकवादियों ने कायरतापूर्वक अमरनाथ के श्रद्धालुओं पर हमला किया, वह उसकी घोर निंदा करती हैं। इस आतंकी घटना में बेगुनाह सात श्रद्धालू शहीद हुए। उन्होंने कहा कि यह सीधे-सीधे देश की अखंडता पर हमला है। इसका केंद्र सरकार की ओर से पुरजोर जवाब दिया जाना चाहिए। एक ओर तीन आतंकवादियों ने अर्द्धसैनिक बल की छावनी पर हमला किया। फिर रात 8:20 बजे खानाबल के पास यात्रियों से भरी बस पर अंधाधुंध गोलाबारी कर दी। गुजरात के बनासकांठा जिला की उस बस पर हुए इस घिनौने हमले में 32 श्रद्धालू गंभीर रूप से जख्मी हुए। उस बस में 56 श्रद्धालू थे जो गुजरात, दमन दीव और महाराष्ट्र के थे। यह और चिंतनीय है कि जिन सात श्रद्धालुओं की मृत्यु हुयी, उनमें 5 स्त्रियां थी। सात शहीदों में पांच गुजरात के और शेष दो महाराष्ट्र के थे। जम्मू और कश्मीर पुलिस के अनुसार हमले में पाकिस्तानी इस्लामी आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का हाथ हैं।
मनकामेश्वर मठ मंदिर में हुए शान्ति हवन में उपस्थित भक्तों ने शहीद श्रद्धालुओं की आत्मा की शान्ति के लिए आहूतियां दीं। हवन के बाद शहीद श्रद्धालुओं की आत्मा की शन्ति के लिए दो मिनट का मौन भी रखा गया। इसके बाद मंदिर परिसर के बाहर आतंकवाद के खात्मे के लिए आतंकवाद के पुतले का दहन किया गया। इस मौके पर सर्वेश त्रिवेदी, एडवोकेट सत्येन्द्र सिंह, जितेन्द्र राजपूत, संजय सोनकर, अमित गुप्ता, जगदीश गुप्ता, अमित विश्वकर्मा, उपमा पाण्डेय, पूजा, शिवानी, नम्रता मिश्रा समेत मंदिर के सेवादार मौजूद रहे।

उम्मीद--- अब शुरू होगा पीजीआइ का ट्रामा सेंटर


उम्मीद--- अब शुरू होगा पीजीआइ का ट्रामा सेंटर 

कुमार संजय ’ लखनऊ
अब पीजीआइ ट्रामा सेंटर के चलने की उम्मीद बंध गई है। राज्य सरकार ने ट्रामा 2 के लिए 25 करोड़ का बजट देकर यह साफ कर दिया है कि ट्रामा 2 के संचालन की जिम्मेदारी पीजीआइ की ही होगी। 1दरअसल, पांच साल से पीजीआइ ट्रामा सेंटर भवन बनकर तैयार है। स्टाफ, संकाय सदस्य और मशीन की उपलब्धता न हो पाने के कारण सेंटर काम नहीं कर पा रहा है। लगभग 200 करोड़ की लागत से बने इस ट्रामा सेंटर को चलाने के लिए संस्थान प्रशासन ने कई बार प्रस्ताव भेजा, लेकिन सरकारों ने बजट नहीं दिया। यही नहीं, पूर्व सरकार द्वारा इसे चलाने का जिम्मा केजीएमयू को दे दिया गया था। केजीएमयू ट्रामा चलाने के नाम पर खानापूर्ति करता रहा क्योंकि उनके पास बजट नहीं था। सरकार के साथ मेडिकल विवि की सत्ता बदली तो कुलपति प्रो. एमएलबी भट्ट ने इसे चलाने से मना कर दिया। अब पीजीआइ को इसे दोबारा हैंडओवर किया जाना है। पीजीआइ को बेसिक विभाग जनरल सर्जरी, आर्थोपैडिक, न्यूरोसर्जन ट्रामा सहित विशेषज्ञों की तैनाती करनी पड़ेगी। विशेषज्ञ कहते है कि 2013 में संस्थान ने पदों का निर्धारण एम्स दिल्ली ट्रामा सेंटर के प्रमुख के अलावा देश के कई विशेषज्ञों की समिति ने मिल कर तय किया था। ट्रामा टू में अभी केवल प्लास्टर या सर्जरी संभव है। कई न्यूरोसर्जन नहीं है, जिससे गंभीर केस मैनेज हो सकें। यहां से मरीजों को ट्रॉमा सेंटर मेडिकल विवि रिफर किया जाता है।’

सोमवार, 10 जुलाई 2017

बढती अबादी ने खडी कर दी है मुसीबत--हर जगह कतार ही कतार

बढती अबादी ने खडी कर दी है मुसीबत

हर जगह कतार

 वर्ष 2001 में सरकार ने जो जनगणना करायी थी, उसमें लखनऊ जिले की आबादी करीब 36 लाख थी, जो आगामी दस साल में बढ़कर 45 लाख को पार कर गयी। अगर मौजूदा समय की बात करें तो अनुमानित आबादी पचास लाख के आंकड़े को भी पार कर गयी है। यानी प्रत्येक वर्ष आबादी में करीब एक लाख की बढ़ोतरी। जिस तरह से हमारी आबादी बढ़ रही है उससे साफ है कि आने वो दिनों में इतनी बड़ी संख्या में लोगों के लिए जरूरी संसाधन मुहैया कराना आसान नहीं होगा। शहरीकरण तेजी के साथ हो रहा है जिसके कारण आसपास के खेत और खलिहान के साथ-साथ तालाब और झीलें भी खत्म होते जा रहे हैं। कृषि विभाग के आंकड़े भी चिंतित करने वाले हैं।1राजधानी में अब केवल एक लाख हेक्टेयर जमीन ही खेती लायक बची है। बाकी 1.15 लाख हेक्टेयर जमीन खेती के लायक नहीं है। ऐसे में जिस तरह लोगों को आवास उपलब्ध कराने के लिए सरकारी विभागों से लेकर प्राइवेट बिल्डर और रियल स्टेट कंपनियां अपने पैर पसार रही है आगे खेती लायक जमीन ही बचना मुश्किल है।बढ़ती जनसंख्या का बोझ सड़कों पर आये दिन महसूस किया जा सकता है। वाहनों की बढ़ती कतारों के बीच आम शहरी घंटों जाम में फंसा रहने पर मजबूर है। इसी तरह अस्पतालों में ओपीडी में लगने वाली लंबी लाइने भी लोगों को परेशान कर रही हैं। यही नहीं लोगो की जरूरतों को पूरा करने के लिए जिस तरह से बेहिसाब प्रकृति का दोहन हो रहा है उससे प्रदूषण का स्तर बेहद खतरनाक स्थिति पर पहुंच रहा है। जाहिर है संसाधनों को पूरा करने में तमाम बातों की अनदेखी हो रही है और तमाम मानक धूल में उड़ाए जा रहे हैं।


इलाज के लिए वेंटिंग
बीमारी का बढ़ता प्रकोप कहें या जनसंख्या का दबाव। राजधानी के अस्पतालों में बढ़ती कतारों से स्वास्थ्य सेवाएं कराह रही हैं। ओपीडी हो या ओटी हर जगह इलाज में इंतजार है। राजधानी के अस्पतालों में गत वर्ष की अपेक्षा इस साल 10 से 15 फीसद मरीज ओपीडी में बढ़े हैं। बलरामपुर अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. बीकेएस चौहान के मुताबिक वर्ष 2016 में ओपीडी में हर माह लगभग 80 हजार के करीब मरीज आते थे। वहीं इस बार हर माह का आंकड़ा 93 हजार के लगभग पहुंच चुका है। वहीं सिविल अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. आशुतोष दुबे के मुताबिक गत वर्ष हर माह अस्पताल में 55 से 60 हजार मरीज ओपीडी में आते थे। इस बार मरीजों की संख्या प्रतिमाह 75 हजार के करीब हो गई है। ऐसे ही लोहिया अस्पताल में भी पहले जहां 38 हजार हर माह ओपीडी थी, वहीं अब 45 से 50 हजार हर माह हो गई है। अस्पतालों में सामान्य मरीजों की संख्या ही नहीं बढ़ी है। बल्कि इंडोर व इमरजेंसी में गंभीर मरीजों की तादाद में भी इजाफा हुआ है, लिहाजा संस्थानों में सर्जरी के लिए महीनों की वेटिंग चल रही है।बीमारी का बढ़ता प्रकोप कहें या जनसंख्या का दबाव। राजधानी के अस्पतालों में बढ़ती कतारों से स्वास्थ्य सेवाएं कराह रही हैं। ओपीडी हो या ओटी हर जगह इलाज में इंतजार है। राजधानी के अस्पतालों में गत वर्ष की अपेक्षा इस साल 10 से 15 फीसद मरीज ओपीडी में बढ़े हैं। बलरामपुर अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. बीकेएस चौहान के मुताबिक वर्ष 2016 में ओपीडी में हर माह लगभग 80 हजार के करीब मरीज आते थे। वहीं इस बार हर माह का आंकड़ा 93 हजार के लगभग पहुंच चुका है। वहीं सिविल अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. आशुतोष दुबे के मुताबिक गत वर्ष हर माह अस्पताल में 55 से 60 हजार मरीज ओपीडी में आते थे। इस बार मरीजों की संख्या प्रतिमाह 75 हजार के करीब हो गई है। ऐसे ही लोहिया अस्पताल में भी पहले जहां 38 हजार हर माह ओपीडी थी, वहीं अब 45 से 50 हजार हर माह हो गई है। अस्पतालों में सामान्य मरीजों की संख्या ही नहीं बढ़ी है। बल्कि इंडोर व इमरजेंसी में गंभीर मरीजों की तादाद में भी इजाफा हुआ है, लिहाजा संस्थानों में सर्जरी के लिए महीनों की वेटिंग चल रही है

पर्यावरण को खतरा

दशकों में शहर की आबादी ही नहीं बढ़ी इससे जुड़ी समस्याएं भी बढ़ी हैं। लोगों के रहने के लिए अतिरिक्त जगह की तलाश में कृषि भूमि पर कंक्रीट के जंगल खड़े होते गए। खुली स्थानों पर मकान नजर आने लगे। वाहनों की संख्या बढ़ने से सड़के सिकुड़ती गईं। सड़क चौड़ीकरण के कारण हरियाली पर आरी चलानी पड़ी। हरियाली तो खत्म हुई साथ ही वाहनों की संख्या बेतहाशा बढ़ गई। नतीजा यह हुआ कि हवाएं जहरीली हो गईं। केवल हवाएं ही दूषित नहीं हो रही है वाहनजनित शोर ने लोगों को बहरा कर दिया है। सीवेज का उपचार न होने के कारण नदी प्रदूषित हो गई। व्जमीन की कोख खाली होती गई। आज पर्यावरण के समक्ष चौतरफा चुनौती खड़ी हो गई है। आबादी बढ़ने से प्राकृतिक संसाधन ही नहीं चुक रहे हैं आदमी की सेहत भी खराब हो रही है।दशकों में शहर की आबादी ही नहीं बढ़ी इससे जुड़ी समस्याएं भी बढ़ी हैं। लोगों के रहने के लिए अतिरिक्त जगह की तलाश में कृषि भूमि पर कंक्रीट के जंगल खड़े होते गए। खुली स्थानों पर मकान नजर आने लगे। वाहनों की संख्या बढ़ने से सड़के सिकुड़ती गईं। सड़क चौड़ीकरण के कारण हरियाली पर आरी चलानी पड़ी। हरियाली तो खत्म हुई साथ ही वाहनों की संख्या बेतहाशा बढ़ गई। नतीजा यह हुआ कि हवाएं जहरीली हो गईं। केवल हवाएं ही दूषित नहीं हो रही है वाहनजनित शोर ने लोगों को बहरा कर दिया है। सीवेज का उपचार न होने के कारण नदी प्रदूषित हो गई। व्जमीन की कोख खाली होती गई। आज पर्यावरण के समक्ष चौतरफा चुनौती खड़ी हो गई है। आबादी बढ़ने से प्राकृतिक संसाधन ही नहीं चुक रहे हैं आदमी की सेहत भी खराब हो रही है।


पानी का संकट

बढ़ती आबादी ने पेयजल संकट भी खड़ा कर दिया है, जिस तेजी से आबादी बढ़ी, उसने संसाधनों को भी पीछे छोड़ दिया है। सुबह से पानी को लेकर मचने वाली किल्लत के पीछे लखनऊ में बढ़ती भीड़ भी है। बढ़ती मांग के साथ ही पानी का संकट गहराता जा रहा है। कानून व्यवस्था पर पानी संकट चुनौती बन जाता है।शहर की पेयजल आपूर्ति 1’45 लाख की आबादी 
-मानक 150 लीटर प्रति व्यक्ति प्रति दिन
-पानी की मांग : ’887.6 एमएलडी (मिलीयन लीटर डेली) 
-पानी का उत्पादन 818.6 एमएलडी 
-वास्तविक जलापूर्ति 654 .88 एमएलडी 
-मानक के अनुसार पानी की कमी 20.12 एमएलडी
बढ़ती आबादी ने पेयजल संकट भी खड़ा कर दिया है


पेट्रोल अर डीजल की कमी

आबादी और वाहनों की संख्या बढ़ने के साथ ही राजधानी में पेट्रोल-डीजल की खपत में भी दस प्रतिशत के हिसाब से हर वर्ष इजाफा हो रहा है। पांच वर्ष में बढ़ते-बढ़ते यह मांग लाखों लीटर रोजाना के आंकड़े पर पहुंच गई है। 1पेट्रोल डीलर्स एसोसिएशन के महासचिव सुधीर बोरा के अनुसार राजधानी में शहर और ग्रामीण क्षेत्र मिला कर 202 पेट्रोल पंप हैं। जहां पर लाखों लीटर रोजाना पेट्रोल-डीजल की खपत होती है। वहीं टैंकर संचालकों के अनुसार इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिन्दुस्तान पेट्रोलियम की डिपो से पांच सौ के करीब टैंकरों से आपूर्ति की जाती है। इसमें से डेढ़ सौ के करीब टैंकर राजधानी में तेल की आपूर्ति करते हैं। इनकी संख्या वर्ष- 2012 में करीब 118 थी। तेल की खपत के साथ ही टैंकरों की संख्या में भी इजाफा हुआ है।





उत्तर प्रदेश में 57 जिले ऐसे हैं, जहां दर पांच से ज्यादा है

लक्ष्य पाने के लिए और प्रयास की है जरूरत

विश्व जनसंख्या दिवस

2025 तक प्रदेश की प्रजनन दर को 2.1 तक लाने का लक्ष्य


राजधानी में भी 0.6 फीसद सकल प्रजनन दर को कम करने का लक्ष्य
उत्तर प्रदेश में 57 जिले ऐसे हैं, जहां दर पांच से ज्यादा है  प्रजनन दर में कमी लाना है




प्रदेश की जनसंख्या नियंत्रित करने के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। इसके बावजूद 57 जिले ऐसे हैं, जहां सकल प्रजनन दर पांच से ज्यादा है। हालांकि राजधानी अभी सेफ जोन में हैं। इसके बाद भी इसे 2.1 के लक्ष्य तक आने के लिए प्रयास किए जाने बाकी हैं। आंकड़ों को देखा जाए तो महिला और पुरुष नसबंदी की संख्या में अपेक्षा के अनुरूप अच्छा परिणाम नहीं है।

अस्पतालों में नहीं मिलते हैं कंडोम

परिवार नियोजन के साधनों में स्थाई उपायों में महिला और पुरुष नसबंदी शामिल है। वहीं आयूडी, पीपीआयूसीडी (कॉपरटी), ओरल पिल्स और गर्भनिरोधक दवाएं शािमल हैं। महिला अस्पतालों में नसबंदी और आयूडी के मामले तो डील हो जाते हैं, लेकिन कंडोम हर जगह उपलब्ध नहीं हैं। अक्सर फैमिली प्लानिंग कॉर्नर पर महिलाओं को ओरल पिल्स और कंडोम नहीं मिलते। चाहे जिला महिला अस्पताल हो या नगरीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हो।

महिलाओं में कॉपरटी पॉपुलर

आइयूडी यानि इंटरा यूटेराइन डिवाइस के बाद परिवार नियोजन की योजना पीपीआइयूसीडी (पोस्ट पार्टम इंटरा यूटीराइन कंट्रासेप्टिव डिवाइस) पिछले तीन सालों में सबसे ज्यादा पॉपुलर हुई है। पीपीआइयूसीडी को ऑपरेशन और डिलीवरी के तुरंत बाद लगाया जाता है।  30 प्रतिशत महिलाएं पीपीआइयूसीडी करवा रही हैं।12025 तक लक्ष्य को पाना है1प्रदेश की सकल प्रजनन दर को प्रति दंपत्ति दो से तीन बच्चों तक लाना है। इसे औसत 2.1 तक लाने का लक्ष्य है।

श्रवस्ती प्रजनन दर में सबसे आगे

प्रदेश के 57 जिले ऐसे हैं जिनकी प्रजनन दर तीन से ज्यादा है। वहीं श्रवस्ती जिले में सबसे ज्यादा प्रजनन दर है। प्रति दंपत्ति पांच बच्चे तक है। इसके बाद बलरामपुर, बहराइच, सिद्धार्थनगर, बदायूं और सीतापुर शामिल है।

1दिया जा रहा है प्रशिक्षण1

 डॉक्टरों, आशा बहुओं और नर्सो को नसबंदी और परिवार नियोजन का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। एएनएम को डिंपा इंजेक्शन लगाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रचार-प्रसार और जागरूकता के साथ हमें उम्मीद है कि लक्ष्यों को पूरा कर लिया जाएगा।’परिवार कल्याण विभाग की ओर से नई योजना मिशन परिवार विकास शुरू किया गया है। इसमें सार्थी योजना, नई पहल किट, दो नई दवाओं छाया और डिंपा इंजेक्शन शामिल किया गया है। वर्ष 2025 तक हमें प्रदेश की सकल प्रजनन दर को 2.1 तक लाना है। अभी तक हम इसे 2.7 तक पहुंचा पाए हैं। मिशन परिवार विकास को प्रदेश के 57 जिलों में चलाया जाएगा। जिन जिलों में चार से ज्यादा प्रजनन दर है। उसमें 0.3 प्रतिवर्ष की कमी लानी है। 3.5 से ज्यादा प्रजनन दर के जिलों में 0.2 प्रतिवर्ष की कमी लानी है। तीन से 3.5 प्रजनन दर के जिलों में 0.2 प्रतिवर्ष की कमी लानी है।1















पीजीआइ ने लगाया सीलिएक डिजीज में नई परेशानी का पता

25 फीसदी सिलिएक डिजीज ग्रस्त बच्चों में उलझ जाती है आंत


शोध


पीजीआइ ने लगाया सीलिएक डिजीज में नई परेशानी का पता

ग्लूटेन फ्री डाइट से मिल जाता है बच्चों को आरामक्या है 


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कुमार संजय ’ लखनऊ

संजय गांधी पीजीआइ के पेट रोग विशेषज्ञ एवं रेडियोलॉजिस्ट ने मिलकर सीलिएक डिजीज ग्रस्ति बच्चों में आंत उलझने (इंट्यूसेप्सन) की नई परेशानी का पता लगाया है। इस परेशानी के होने पर बच्चों के पेट में दर्द, उल्टी, मल के साथ खून आने और बुखार की परेशानी होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी बच्चे में ऐसी परेशानी हो तो सीलिएक डिजीज की जांच करानी चाहिए। 1पीडियाटिक गैस्ट्रोइंट्रोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. एसके याचा और प्रो. मेनिक सेन शर्मा के मुताबिक सीलिएक डिजीज के बारे में पहले लोगों को पता नहीं था, लेकिन अब इस परेशानी का पता लगा कर डाइट में बदलाव लाकर बच्चों को स्वस्थ्य जिंदगी दी जा सकती है। कई बार यह परेशानी मिस डायग्नोस हो जाती है। ऐसे में इस परेशानी वाले बच्चों में दूसरी क्या परेशानी हो सकती है इस पर भी किया जा रहा है। देखने में आया है कि सीलिएक डिजीज में बच्चों की आंत आपस में उलझ जाती है। 1सीलिएक डिजीज से ग्रस्ति 150 उन बच्चों के पेट का अल्ट्रासाउंड परीक्षण रेडियोलॉजिस्ट प्रो. शिव कुमार ने किया जिन्हें डायरिया, पेट में तनाव, पेट में दर्द सहित अन्य परेशानी थी। देखा गया कि 25 फीसद बच्चों में छोटी आंत आपस में उलझी हुई थी। पेट रोग विशेषज्ञ प्रो. एसके याचा, प्रो.अंशु , प्रो. मेनिक सेन शर्मा और प्रो. यू.पोद्दार ने इन बच्चों को ग्लूटेन फ्री डाइट पर रखा तो देखा कि सात दिन में 65 फीसद, 14 दिन में 84 और 28 दिन में 92 फीसद बच्चों को आराम मिल गया।’

सामान्य लक्षण

पेट में दर्द, शरीर के भारीपन, वजन में कमी, शारीरिक विकास में कमी, डायरिया, कब्ज, गैस अधिक बनना यह सामान्य लक्षण हैं।

क्या है सीलिएक डिजीज

प्रो. एसके याचा ने बताया कि सीलिएक डिजीज की परेशानी तीन सौ में से एक व्यक्ति या बच्चे को हो सकती है। इससे परेशान लोग गेंहू, जौ और उससे बनने वाले पदार्थ का पाचन सही तरीके से नहीं होता है। इनमें पाये जाने वाला ग्लूटेन छोटी आंत को डैमेज कर देता है, जिसकी वजह से पोषकतत्वों का अवशोषण नहीं होता है। इस बीमारी का इलाज बिल्कुल आसान है केवल प्रभावित व्यक्ति को ग्लूटेन फ्री आहार (गेहूं से बने खाद्य पदार्थ) लेना होता है। इलाज के लिए कुछ दिनों के लिए इस बीमारी की वजह से हुई परेशानी को कम करने के लिए दवाएं देनी पड़ सकती हैं।



केवल सिर में नही अांत में भी होता है दिमाग


केवल सिर में नही अांत में भी होता है दिमाग
.तो अांत में भी होता है दिमाग

अाठ साल बाद लिया राहत की सांस
कब्ज से परेशानी से मुक्ति के लिए चालिस से अधिक डाक्टरों से लिया सलाह
अांत में स्थित ब्रेन के काम में कमी कब्ज का बडा कारण  
दस फीसदी लोग कब्ज से परेशान

   कुमार संजय। लखनऊ






कब्ज से परेशान बंगलौर के रहने वाले 34 वर्षीय मंगल कुमार अाठ साल से परेशान थे। चालिस से अधिक डाक्टरों के दिखाय सबकी दवायी चली लेकिन राहत नहीं मिली। बंगलौर के डाक्टर नरेश भट्ट ने मंगल को पांच महीने पहले  संजय गांधी पीजीआइ के पेट रोग विशेषज्ञ प्रो.यू सी घोषाल के पास भेजा। प्रो.कारण पता कर सटीक इलाज किया अाज वह  फालोअप अोपीडी में अाए तो प्रो.घोषाल के कमरे में पहुंचते ही पहला शब्द था ..सर अब लगा कि दवा भी काम करती है...डा.घोषाल ने हाल पूछा अौर कहा कि दवा अभी चलाएं अौर तीन महीने फिर दिखाए। मंगल ने कहने सर अाठ साल से परेशान था । पेट में जलन था सप्ताह में दो बार लैट्रिन होती थी तमाम डाक्टरों ने तमाम इलाज किया लेकिन राहत नहीं मिला। पीजीआइ में प्रो.घोषाल ने तमाम परीक्षण के बाद पता लगाया कि बडी अांत का दिमाग नहीं काम कर रहा था जिसके कारण लैट्रिन नहीं हो रही थी। कब्ज का शिकार था। 


अांत में होता है दिमाग

प्रो.घोषाल ने बताया कि कब्ज होने के तीन कारण होते है । बडी अांत की चाल कम होने पर लैट्रिन अागे नहीं बढ़ता जिससे मल द्वार कर लैट्रिन नहीं अाता है। मल द्वार के पास वाल्व होता है जो खुलता है वाल्व( स्फिंटर) में खराबी होने पर मल बाहर नहीं निकलता है। तीसरे वाल्व जब खुलता है अांत में दबाव बनाता है यदि जबाव नहीं बनेगा तो मल नहीं निकलता है। कमल कुमार में मैने तीनों कारणों का टेस्ट मैनोमेंट्री, डिसफेक्टोग्राफी अौर वूैलून एक्सपल्सन कोलोनो ट्राजिट किया । देखा कि कमल गट ब्रेन एक्सिस की परेशानी के शिकार थे जिसके कारण वह कब्ज के शिकार थे। प्रो.घोषाल के मुताबिक कब्ज की परेशानी उम्र बढने के साथ बढ़ती जाती है। देखा गया है कि 10 फीसदी से अधिक में कब्ज की परेशानी होती है जिसके लिए लोग लैक्सेटिव, इसोबगोल  सहित तमाम अन्य विधा की दवाएं लेते है लेकिन इससे कुछ समय तक ही राहत मिलती है। बताया कि 30 फीसदी में वाल्व की खराबी, बीस फीसदी में अांत की चाल में कमी अौर तीस से 40 फीसदी में गट ब्रेन एक्सिस के कारण कब्ज की परेशानी होती है।  

क्या है गट ब्रेन एक्सिस

सिर में दिमाग होता है वैसे अांत में छोटा दिमाग होता है। यदि सिर में स्थित दिमाग न भी होतो अांत का दिमाग काम करता रहता है। अांत का दिमाग अांत , मल के द्वार के वाल्व अौर अांत पर दबाव बनाने का काम करता है। देखा कि अांत के दिमाग का फंक्शन ठीक से काम नहीं कर रहा था जिसके कारण वह कब्ज से परेशान थे । हमने ब्रेन के फंक्शन को ठीक करने की दवाएं दी जिससे उन्हें राहत मिली।   

रविवार, 9 जुलाई 2017

गले अौर दिल का है रिश्ता .... थायरायड अौर दिल के परेशानी के बीच है सीधा रिश्ता

थायरायड अौर दिल के परेशानी के बीच है सीधा रिश्ता


टीएसएच हारमोन का स्तर बढने पर हो सकता है मेटाबोलिक सिंड्रेम




कुमार संजय। लखनऊ


थायरायड अौर दिल की बीमारी के बीच सीधा रिश्ता स्थापित करने में कामयाबी चिकित्सा वैज्ञानिकों ने हासिल की है। वैज्ञानिकों ने लंबे शोध के बात बताया है कि थायरायड फंक्शन में गडबडी होने पर दिल की बीमारी की आशंका बढ जाती है। वैज्ञानिकों ने इस बात को साबित करने के लिए मेटाबोलिक सिंड्रेम के शिकार यानि दिल की बीमारी की अाशंका वाले सौ अौर इतने ही सामान्य लोगों में थायरायड हारमोन प्रोफाइल अौर लिपिड प्रोफाइल की परीक्षण किया तो देखा कि थायरायड ग्रंथि से स्रावित होने वाले  टीएसएच (थायरायड स्टीमुलेटिंग हारमोन) का स्तर  3.33 के अास -पास था जबिक सामान्य लोगो में इस हारमोन का स्तर 2.30 के अास-पास मिला इससे साबित होता है मेटाबोलिक सिंड्रेम ग्रस्त लोगों में टीएचएच हारमोन का स्तर सामान्य लोगों के मुूकाबले बढ जाता है। इसी तरह देखा कि टी फोर हारमो का स्तर मेटाबोलिक सिंड्रेम के लोगों में कम हो जाता है जबकि टी थ्री का स्तर बढ जाता है। विशेषज्ञों ने देखा कि मेटाबोलिक सिंड्रेम के लोगों में गुड कोलेस्ट्राल (एचडीएल) का स्तर 41.28 के अास -पास था जबकि सामान्य लोगों में इसका स्तर 54 के अास पास था । यह कोलेस्ट्राल दिल को सुरक्षा प्रदान करता है। विशेषज्ञों ने देखा कि मेटाबोलिक सिंड्रोम ग्रस्त लोगों में एलडीएल कोलेस्ट्राल( बैड कोलेस्ट्राल) , ट्राइ ग्लिसराइड का स्तर सामान्य से अधिक था। विशेषज्ञों का कहना है कि थायरायड फंक्सन के गड़बडी वाले मरीजों में दिल की बीमारी की अाशंका का पता काफी पहले लगा कर उन्हें लाइफ स्टाइल में बदलाव करने की सलाह देकर  बचाया जा सकता है। 

किसने स्थापित किया रिश्ता
गले में स्थित थायरायड ग्रंथि की गडबडी अौर दिल की बीमारी की अाशंका के बीच रिश्ता किंग जार्ज मेडिकल विवि के डा. मनीष गुच, डा. एस रूंगचटा, डा. एस कुमार . डा.ए अग्रवाल अौर राम मनोहर लोहिया के डा. ए भट्टाचार्य , डा.एसएम रिजवी ने स्थापित किया। इनके शोध को बायोमेडिकल जर्नल ने स्वीकार किया है।  


क्या है मेटाबोलिक सिंड्रेम
ट्राइ ग्लिसराइड- 150 से अधिक
एचडीएल -40 ( पुरूष) अौर 50( महिला) से कम
रक्तदाब- 130-85 से अधिक
फास्टिंग शुगर- 100 से अधिक होने पर व्यक्ति दिल, उच्च रक्तचाप अौर डायबटीज के मुबाने पर होता है इस स्थित में लाइप स्टाइल बदल कर इन परेशानियों से मुक्ति पा सकता है। 

अजय सिंह की सजगता से बची ट्रामा शिकार की बची जान

अजय सिंह की  सजगता से बची ट्रामा शिकार की बची जान




काश अजय सिंह जैसे दूसरे राहगीर थोडा सा रहम दिल हो जाए तो ट्रामा शिकार की जान बच सकती है। सीतापुर बाई पास जार्गस पास मोटरसाइिकल सावर को किसी कार चालक ने ठोकर मार दी । चालक वही गिर पड़ा अौर उसके हात-पैर, सर में काफी चोट अा गयी । तमाम लोग रूकते देखते अौर अागे बढ़ जाते कुछ लोग रूक कई तरह की बातें करते लेकिन किसी ने अागे बढ कर उस घायल को अस्पताल पहुंचाने की कोशिश नहीं की इसी बीच इंद्रपुरी वेलफेयर सोसाइटी एवं सामाजिक सरोकार मंच के संयोजक अजय सिंह अपनी गाडी से निकल रहे थे भीड़ देखी तुंरत रूक गए अपनी गाडी पर घायल को लेकर वहां से नजदीक कैरियर मेडिकल कालेज की इमरजेंसी ले गए जहां पर त्वरित उपचार कर रक्त स्राव बंद किया गया । डाक्टरों का कहना है कि रक्त स्राव  अधिक होने पर खतरा था लेकिन खतरा टल गया । स्थित ठीक होने पर घायल ने बताया कि उसका नाम शिवा तिवारी उसेक पिता नहीं है वह घर का अकेला कमाने वाला है। 

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

पीजीआइ में नेत्र रोग विभाग की ओपीडी पांच दिन

पीजीआइ में नेत्र रोग विभाग की ओपीडी पांच दिन

जागरण संवाददाता, लखनऊ : संजय गांधी पीजीआइ के नेत्र रोग विभाग में अब ओपीडी सोमवार से शुक्रवार तक हर रोज होगी। अभी तक यह केवल सप्ताह में तीन दिन चलती थी। दैनिक जागरण ने 24 मई के अंक में यह मुद्दा उठाया था। इस मामले में विभाग की प्रमुख प्रो. कुमुदनी शर्मा ने फैसला लिया है कि ओपीडी अब पांच दिन चलेगी। साथ ही पहले की तरह ओटी भी चलेगी।
जानकारी के अनुसार सोमवार और गुरुवार को ग्लूकोमा, न्यूरो ऑप्थेलमी और रेटिना के मामले देखे जाएंगे। मंगलवार और शुक्रवार को कार्निया और ऑक्यूप्लास्टी, बुधवार को आक्यूप्लास्टी और रेटिना, शुक्रवार को कार्निया और रेटिना के केस देखे जाएंगे। इससे मरीजों को अब वापस नहीं जाना पड़ेगा। बताते चलें कि पहले कम दिन ओपीडी होने केकारण तमाम मरीजों को खासतौर पर दूसरे विभाग से सलाह के लिए भेजे गए मरीजों को अगली ओपीडी का इंतजार करना पड़ता था। 
इस दिन ओपीडी में रहेंगे यह विशेषज्ञ
सोमवार : प्रो. कुमुदनी शर्मा, डॉ. वैभव जैन, डॉ.आलोक प्रताप सिंह
मंगलवार : प्रो. विकास कनौजिया और डॉ.रचना अग्रवाल
बुधवार : डॉ.रचना अग्रवाल, डॉ. आलोक प्रताप सिंह
गुरुवार : प्रो. कुमुदनी शर्मा, डॉ. वैभव जैन, डॉ.प्रियदर्शनी मिश्र
शुक्रवार : प्रो.विकास कनौजिया, डॉ. प्रियदर्शनी मिश्र


आइसोटोप थेरेपी से कैंसर के मरीजों को मिलेगी दर्द से राहत

आइसोटोप थेरेपी से कैंसर के मरीजों को मिलेगी दर्द से राहत

पीजीआइ के न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग में 3600 में संभव है थेरेपी



कुमार संजय ’ लखनऊ
‘किन शब्दों से आभार प्रकट करूं कि मेरे पिता जी भी रात की नींद ले रहे हैं और हम लोग भी। अब वह दर्द से नहीं कराहते हैं।’ यह कहना है कैंसर के लगभग अंतिम स्टेज में पहुंच चुके रामकृष्ण के बेटे अनुज का। रामकृष्ण को प्रोस्टेट का कैंसर था तमाम इलाज के बाद कैंसर हड्डी तक पहुंच गया। कैंसर के इस स्टेज में जीवन के जो भी दिन बचे है वह दर्द से कराहते हुए कट रहे थे। दर्द से निजात पाने के लिए तमाम दवाएं ओपियाड, पेन किलर सब बेअसर साबित हो रही थी। 
ऐसे में वह संजय गांधी पीजीआइ के न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग में आए जहां पर विशेषज्ञों ने खास आइसोटोप इंजेक्ट किया और दर्द से काफी हद तक आराम मिल गया। आइसोटोप का असर तीन महीने बाद थोड़ा कम हो गया है तो दोबारा दवा लेने के लिए आए रामकृष्ण ने कहा कि डॉक्टर हमारे लिए देवदूत साबित हुए। अब कम से कम चैन से बची जिंदगी कट रही है।
न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग के प्रमुख प्रो. एसके गंभीर के मुताबिक कई तरह के कैंसर में कई बार कैंसर हड्डी तक पहुंच जाता है, ऐसे में काफी दर्द होता है। पेन क्लीनिक में ओपियाड, पैच और पैन किलर देते है, लेकिन कई बार इसका असर कम हो जाता है। दवा की मात्र बढ़ाने के बाद भी चैन नहीं मिलता है ऐसे में हम लोग समेरियम 153 आइसोटोप मरीज को देते है जिससे दर्द कम हो जाता है और दर्द के लिए दवाओं की मात्र भी काफी कम हो जाती है। इस दवा का असर तीन से छह महीने रहता है। यही इलाज कारपोरेट अस्पताल में स्ट्रानसियम देकर करते है जिसमें एक लाख रुपये का खर्च आता है। हम समेरियम से जिसमें मात्र 3600 रुपये खर्च आता है। 
ओपियाड से कई तरह की परेशानी : प्रो.गंभीर के मुताबिक ओपियाड देने से मरीज बेहोशी की हालत में सोता रहता है न तो वह खाता है न पीता है। ऐसे में कुपोषण का शिकार हो जाता है। इसके अलावा कब्ज की परेशानी हो जाती है सात -आठ दिन वह मल नहीं कर पाता है। घर वाले परेशान रहते है। आइसोटोप थेरेपी में इस तरह के साइड इफेक्ट नहीं होते है। मरीज की क्वालिटी ऑफ लाइफ काफी हद तक ठीक हो जाती है। 
 प्रो. एसके गंभीर
आइसोटोप थिरेपी में उसी दिन जा सकते हैं घर
समेरियम आइसोटोप 153 थेरेपी में मरीज को दवा इंजेक्ट की जाती है। दवा देने के बाद उसी दिन छुट्टी दे दी जाती है। दवा देने से पहले लिवर फंक्शन, किडनी फंक्शन टेस्ट के अलावा ब्लड सेल काउंट और हीमोग्लोबीन का परीक्षण कराया जाता है। दवा देने के बाद कुछ मरीजों में हीमोग्लोबीन कम हो जाता है ऐसे में दवा देने से पहले इंट्रावेनस आयरन इंजेक्ट कर हीमोग्लोबीन का स्तर बढ़ाते है।

कारपोरेट अस्पताल से सस्ता करना होगा इलाज
 संजय गांधी पीजीआइ को अपनी चमक बरकरार रखने के लिए कारपोरेट अस्पतालों के मुकाबले सस्ते इलाज का विकल्प स्थापित करना होगा। इसके अलावा इलाज की नई तकनीक खोजना होगा। आइसोटोप थेरेपी ही दिल्ली के कारपोरेट अस्पताल में होता है, लेकिन खास तरह का आइसोटोप विदेश से मंगाते है जिसके लिए एक लाख रुपये चार्ज करते है। लेकिन हम लोग उसी गुणवत्ता का काम 3600 रुपये में करते है। हमें और सस्ता करने की जरूरत है।

हड्डी में कैंसर से बढ़ जाता है पेन स्कोर

कैंसर जब हड्डी में फैल जाता है तो दर्द का स्कोर सात से आठ के बीच हो जाता है ऐसे में दवाएं काम नहीं करती हैं। मरीज पहले दो गोली खा रहा होता है तो उस समय चार गोली खाने लगता है। ऐसे में वह महीने में पांच से छह हजार की दवाएं खाता है फिर भी राहत नहीं मिलती। आइसोटोप थिरेपी से दर्द का स्कोर दो से तीन के बीच हो जाता है।





नेट बैंकिंग में धोखा तो नहीं जाएगे अाप के पैसे --तीन दिन के भीतर इसकी जानकारी बैंक को देने पर आपको नुकसान नहीं होगा

अगर आपकी जानकारी और अनुमति के बगैर नेट बैंकिंग के जरिये आपके बैंक खाते से पैसे कट जाते है तो तीन दिन के भीतर इसकी जानकारी बैंक को देने पर आपको नुकसान नहीं होगा। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार ऐसी स्थिति में आपके खाते में फ्रॉड के चलते निकाली गई धनराशि दस दिन के भीतर वापस जमा कर दी जाएगी।1रिजर्व बैंक का कहना है कि अगर ग्राहक अनधिकृत रूप से निकाली गई राशि की जानकारी चार से सात दिन के भीतर देता है तो उसकी खुद की जिम्मेदारी होगी बशर्ते यह राशि 25,000 रुपये तक हो। इससे ज्यादा नुकसान की भरपाई बैंक करेंगे, लेकिन ग्राहक की लापरवाही जैसे अपने खाते की जानकारी किसी दूसरे को बताने के कारण नुकसान होता है तो इसका नुकसान उसे खुद उठाना पड़ेगा। रिजर्व बैंक के अनुसार अनधिकृत ट्रांजेक्शन की जानकारी देने के बाद अगर कोई नुकसान होता है तो इसकी जिम्मेदारी बैंक की होगी। आरबीआइ ने ‘ग्राहक सुरक्षा- अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग ट्रांजेक्शन में ग्राहकों की सीमित जिम्मेदारी’ पर संशोधित दिशानिर्देश जारी किये हैं। बैंक खाते और कार्ड के अनधिकृत ट्रांजेक्शन से पैसा कटने की शिकायतें बढ़ने के बाद संशोधित दिशानिर्देश जारी किये गये हैं। अगर बैंक या ग्राहक की गलती से नहीं बल्कि सिस्टम में कहीं गड़बड़ी होने के कारण नुकसान होता है तो ग्राहकों की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी। ऐसी स्थिति में पूरी राशि उन्हें वापस मिल जाएगी।

नौकरी अौर सामाजिक सरोकार के बीच एेसे संतुलन बना रही अकेली महिला-- सावित्री सिंह ने कहा महिला किसी से कम नहीं

नौकरी अौर  सामाजिक सरोकार के बीच एेसे संतुलन बना रही अकेली महिला
इनसे लें सकते ही सीख
महिला किसी पुरूष से नहीं है कम



हम अाप केवल 9 से पांच बजे तक नौकरी करके थक जाते है लेकिन संजय गांधी पीजीआइ के नर्सिग सेवा से जुडी सावित्री सिंह नौ से पांच नौकरी के साथ तमाम लोगों के दर्द को अपनाने के लिए हर दम खडी रहती है। सावित्री जी तमाम मरीजों को दिखाने में मदद के साथ उन्हें कहां कैसे जाना राह दिखाती रहती है इसी बीच वह अपने मरीजों का भी काम करती रहती है। इसके साथ ही कर्मचारियों के हित के लिए भी लगातार संघर्ष करती है। सावित्री जी कहती है कि घर अौर सामाज के बीच सामाजस्य़ स्थापित करना थोडा कठिन होता है लेकिन इसके लिए थोडे से मैनजमेंट की जरूरत है। मेरे दिन की शुरूअात सुबह 5.30 से होती है सबसे पहले थोडा व्यायाम करती हूं फिर बच्चे को जगा कर उसे तैयार करती हूं । बच्चे अौर अपने लिए नाश्ता तैयार कर पहले बच्चे को स्कूल भेजती फिर अपने तैयार होकर 9.30 तक ड्यूटी पर अाती हूं। पति बाहर सेना में है एेसे में मरी जिम्मेदारी अौर बढ जाती है। संस्थान के अधिकारियों के सहयोग के कारण सभी जिम्मेदारी निभा पा रही हूं। बच्चा 3.30 पर घर अा जाता है । पांच बजे मै घर पहुंचती हूं फिर बच्चे को खिला कर अपने दूसरे सामाजिक काम के लिए प्लान तैयार कर निकलती हूं । यह सब करते -करते रात को दस बज जाता है तामम काम के बीच बच्चे पर नजर रखती हूं । बच्चा 8 में पढ़ता है इस लिए ध्यान कम देना होता है। कई बार तो कर्मचारियों या किसी मरीज के दिखाने , सेवा के लिए रात में भी पीजीआइ अाना पड़ता है। सावित्री जी का कहना है कि एक महिला किसी पुरूष से कम नहीं है। इस लिए लोगों को पुरूष वादी सोच से बाहर निकलने की जरूरत है।  

गुरुवार, 6 जुलाई 2017

जीन में बदलाव से शरीर हो जाता है दुश्मन-- क्लीनिकल इम्यूनोलाजी एंड जेनिटक्स के पितामह की याद

जागरण संवाददाता, लखनऊ : जीन में बदलाव और ऑटो इम्यून डिजीज के बीच गहरा रिश्ता है। ऑटो इम्यून डिजीज में कई जीन की भूमिका होती है, लेकिन ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन (एचएलए) जीन की काफी बड़ी भूमिका होती है। जीन में बदलाव होने पर उससे बनने वाले प्रोटीन के कारण शरीर का इम्यून सिस्टम शरीर के खिलाफ ही काम करने लगता है। 1यह जानकारी संजय गांधी पीजीआइ के पूर्व निदेशक एवं वैज्ञानिक स्वर्गीय प्रो.एसएस अग्रवाल की याद में आयोजित कार्यक्रम में जिपमर पांडिचेरी के क्लीनिकल इम्यूनोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो.वीर सिंह नेगी ने जेनेटिक्स ऑफ ऑटोइम्यून विषय पर दी। प्रो.नेगी ने बताया कि किसी व्यक्ति में ऑटो इम्यून डिजीज है तो उसके लड़केऔर लड़की में डिजीज की आशंका दो से चार फीसद सामान्य लोगों के मुकाबले अधिक होगी। प्रो.नेगी बताया कि महिलाओं में आटोइम्यून डिजीज 25 से 30 फीसद अधिक होती है क्योंकि गर्भावस्था के दौरान उनके शरीर में तमाम हारमोन बदलाव होता है इसके साथ महिलाओं में सेक्स हारमोन एस्ट्रोजन की भी ऑटो इम्यून में भूमिका है। उन्होंने बताया कि इंफेक्शन कम होने के साथ ऑटो इम्यून डिजीज की आशंका बढ़ जाती है। इसलिए बहुत सफाई पसंद होना भी ठीक नहीं है। जीन के म्यूटेशन में वातावरण का भी अहम रोल है। सौ तरह के ऑटो इम्यून डिजीज होती है जिसमें टाइप वन डायबिटीज, रिह्यमेटायड अर्थराइिटस, एंकलाइजिंग स्पोंडलाइिटस काफी कॉमन है। इस मौके पर क्लीनिकल इम्यूनोलॉजी विभाग की प्रो. अमिता अग्रवाल, प्रो. विकास अग्रवाल, प्रो.दुर्गा प्रसन्ना, क्लीनिकल जेनेटिक्स विभाग की प्रमुख प्रो. शुभा फड़के, मेडिकल विवि के प्रो. सिद्धार्थ दास, प्रो. विनीता दास, सीआरआइ के पूर्व निदेशक प्रो. नित्यानंद सहित अन्य लोगों ने कहा कि प्रो.एसएस अग्रवाल की देन है कि देश में क्लीनिकल इम्यूनोलॉजी और जेनेटिक्स विधा स्थापित हुई। अब इसका विस्तार हो रहा है।
1इस मौके पर निदेशक प्रो. राकेश कपूर ने कहा कि
प्रो. एसएस हमारे टीचर भी रहे। जब पीजीआइ ज्वाइन किया तो यहां भी वह हमारे मेंटर साबित हुए। उन्होंने कई सलाह दी जिस पर आज भी चल रहा हूं। जेनेटिक्स और इम्यूनोलॉजी का हर बीमारी के इलाज में अहम् रोल है।