गुरुवार, 6 जुलाई 2017

एम्स खोजे नहीं मिल रहे है विशेषज्ञ डाक्टर-- केवल भवन से नहीं चलेगा अस्पताल


एम्स खोजे नहीं मिल रहे है विशेषज्ञ डाक्टर

दनादन एम्स खुल रहे है लेकिन यह चलेंगे कैसे जब विशेषज्ञ डाक्टर यहां ज्वाइन ही नहीं करेंगे। राम मनोहर लोहिया लखनऊ, सैफई में एम्स के बराबर खोला गया इसके  अलावा रायबरेली , गोरखपर में एम्स की तैयारी है
हकीकत यह है जितने एम्स खुले है वहां हर साल पद के अावेदन मांगे जाते है लेकिन ज्वाइन नहीं करते हैं। कोई अाए क्यों यहां मिलेगा 1 से 1.5 लाख अौर कारपोरेट सात से अाठ लाख महीना । सरकारी में अफसरो की अफसर गिरी ऊपर से .....केवल भवन बन रहा है इससे केवल कमाई हो रही है..शायद इसीमें सबका इंटरेस्ट है


THE SIX new AIIMS are struggling to fill vacancies, with the Union Health Ministry not too hopeful about getting the right candidates for the 1,285 posts this year. One proposal being considered now is to hire retired professors up to the age of 70 years on contract as faculty. Last year, a total of 1,300 posts were advertised for the AIIMS at Bhopal, Bhubaneswar, Jodhpur, Patna, Raipur and Rishikesh. Only 300 were selected and just 200 finally joined. At his annual press conference last month, Health Minister J P Nadda admitted, “We are not getting good people. Hum chalis-chalis logon ko reject kar rahen hain (We are rejecting up to 40 people at a time).”
Each AIIMS received 600-800 applications on an average last year, which means only one in 14 applicants was found to be deserving and only two of three who were selected joined. The number of vacancies this year is only a little lesser. Bhopal has advertised 251 posts, Bhubaneswar 178, Jodhpur 204, Patna 253, Raipur 204 and Rishikesh 205. A total of 305 posts are sanctioned in each AIIMS, and the number of posts filled ranges from 55 in Patna, to 135 in Bhubaneswar.
Officials associated with the recruitment process at the Union Health Ministry and at the new AIIMS say the problems in getting qualified faculty are manifold. While the substantially higher salary structures in the private sector for specialities such as nuclear medicine and neurosurgery is one factor, making recruitment for senior posts like professor and additional professor extremely difficult, the other is the lack of facilities in the smaller centres where the new AIIMS have come up.
Elaborating on the proposal to hire retired professors on contract as faculty, a Health Ministry official said, “That way we may get good, competent people who have retired from institutes like AIIMS-New Delhi, and PGI-Chandigarh.”
While a professor at an AIIMS would get around Rs 2.12 lakh monthly salary including HRA, an additional professor is entitled to around Rs 1.91 lakh. In the private sector, depending on a doctor’s discipline and the demand for it, he or she can earn up to Rs 7-8 lakh, said the director of one of the six AIIMS.
Last year, AIIMS-Jodhpur advertised 200 posts, got 700-800 applications, and found only 70-odd good enough to hire, said Director Dr Sanjeev Misra. This year, for 220 posts, the institute has received a thousand applications and some 80-odd may finally be recruited.
“The response is very good, but we are clear we do not want to compromise on quality. That is why the selection process is stringent. We are looking for excellence in teaching and research because if we do not set standards high, it will become like any other medical college. Institution-building takes time, even AIIMS-Delhi took 60 years to reach its present standards,” Dr Misra said.
AIIMS-Bhubaneswar, with 135 of 305 faculty posts filled, is the best placed among the new institutes. Director Dr Gitanjali Batmanabane believes it is because people from Odisha want to go back there to serve it.
“It is more difficult to get faculty in disciplines that are in demand in the private sector, but our position is relatively better because people are keen to work for the state. I am hopeful of reaching 960 beds by the end of the year,” she said.

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

असमय मौत का बड़ा कारण है ट्रॉमा -66.40 फीसद लोगों में मिला रोड ट्रैफिक एक्सीडेंट




असमय मौत का बड़ा कारण है ट्रॉमा
ट्रामा में न्यूरो और ऑर्थोपैडिक सर्जन की भूमिका अहम
66.40 फीसद लोगों में मिला रोड ट्रैफिक एक्सीडेंट

कुमार संजय ’ लखनऊ
सड़क दुर्घटना असमय मौत की सबसे बड़ी वजह है। पुरुष इसके सबसे अधिक शिकार हो रहे हैं।1यह तथ्य का किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) में एक साल में ट्रामा के शिकार आए कुल मरीजों पर से सामने आए हैं। चिविवि के ट्रामा सेंटर में एक साल के दौरान आए कुल 2288 मरीजों पर किया गया तो देखा गया कि ट्रामा के शिकार 83.57 पुरुष थे, जिनकी उम्र 24 से 57 वर्ष थी। के अनुसार कि 32.44 फीसद लोगों के सिर में चोट थी। 29 फीसद लोगों के शरीर के निचले हिस्से और 11.11 फीसद लोगों के हाथ-पैर में चोट थी। विशेषज्ञों ने देखा कि सिर के दूसरे अंगों में 10.84 फीसद लोगों के चोट थी। ट्रामा का सबसे बड़ा कारण 66.40 फीसद लोगों में रोड ट्रैफिक एक्सीडेंट मिला, जबकि 23.37 फीसद में गिरने के कारण ट्रामा हुआ। एक साल में ट्रामा के शिकार जितने लोग मेडिकल विवि पहुंचे उसमें से 980 सीधे ट्रामा सेंटर आए, जबकि 1308 लोग दूसरे अस्पताल से रेफर हो कर आए। ट्रामा के शिकार 68.95 फीसद को सेंटर से छुट्टी दी गयी। यानि वह लगभग सामान्य हो कर घर गए वहीं 11.69 फीसद लोग लामा करा कर अपने मरीज को ले गए। शोध  करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि इससे ट्रामा मैनेजमेंट की प्लानिंग में मदद मिलेगी। से साबित होता है कि ट्रामा मैनेजमेंट में न्यूरो व ऑर्थोपैडिक सर्जन की अहम् भूमिका के साथ चेस्ट और गेस्ट्रो सर्जन की भी भूमिका है, क्योंकि 2.80 फीसद लोगों के चेस्ट में इंजरी देखने को मिली।


इन्होंने किया शोध

केजीएमयू के ऑर्थोपैडिक विभाग के डॉ.विकास वर्मा, डॉ.अजय सिंह, डॉ. गिरीश कुमार सिंह, डॉ.संतोष कुमार, डॉ.विनीत शर्मा, डॉ.आशीष कुमार, डॉ. विनीत कुमार का यह इंटरनेशनल जर्नल ऑफ क्लीनिकल इलनेस एंड इंजरी साइंस ने स्वीकार किया है।’






जाम की समस्या से जूझ रहा है पीजीआई गेट ............

जाम की समस्या से जूझ रहा है पीजीआई गेट ............
पीजीआई लखनऊ जो की विश्व स्तर की पहचान रखने वाला चिकित्सा संस्थान है , वही आज जाम की समस्या से परेशान है , फिलहाल अवगत कराना चाहते हैं कि हर दिन पीजीआई गेट पर आप को लम्बी वाहनों की कतारें नज़र आयेगी उन कतारो में मरीजों के हित में चलाये जाने वाली एमबुलेंस108 भी आप को बेबस नज़र आयेंगी । इस बात से किसी को कोई भी फर्क नहीँ पड़ता की मरीज जो की एमबुलेंस में है उसका उपचार किस प्रकार होगा जो की पीजीआई रेफर किया गया है। ट्रैफिक कंट्रोल की कोई भी व्यवस्था नज़र नहीँ है यहां । भगवान भरोसे ही चल रहा है ट्रैफिक ।.............

मेडिकल एंड साइंस पत्रकारिता की नींव रूमा सिन्हा अौर जफर इरशाद

बात 1992-93 की है जब में केवल समाचार पढ़ता खास तौर पर रूमा  सिन्हा अौर जफर इरशाद की लिखी खबरे क्यों कि मेरी रूचि शुरू से इस विषय पर रही । इन दोनों को पढ़ते -पढ़ते मैने लिखना सीखा अौर स्वंत्र चेतना से शुरूअात किया उस समय यहां संपादक नरेंद्र भदौरिया जी थे...इसके बाद जो सफर शुरू हुअा वह कुबेर टाइम्स, हिन्दुस्तान, अमर उजाला, जनसत्ता एक्सप्रेसे से अाज तक जारी है। रूमा सिन्हा अौर जफर इरशाद से पहले मेडिकल एंड साइंस पर कोई ध्यान नहीं देता था छपता भी तो केवल इतना कि सेमीनार शुरू अौर खत्म किसने क्या कहा ...कैसे बीमारी पहचानी जाए, किसने क्या शोध किया यह सब नहीं छपता था . इससे शोध करने वाले वैज्ञानिकों अौर काम करने वाले चिकित्सक भी केवल अपनी बिरादरी में चर्चिच होते थे लेकिन पत्रकारिता की नई शुरूअात करने वाले इन दोनों लोगों को कारण इन्हें भी चर्चा मिलने लगी। रूमा सिन्हा अौर जफर इरशाद मेरे मेंटर है...इनकी लेखऩी को एक बार फिर नमन करता हूं....

पहले तो खूब करते थे पुरानी पेंशन व्यवस्था की सिफारिश अब गए भूल




 भारतीय जनता पार्टी के नेता जब सत्ता में नहीं होते है तो देश और प्रदेश की जनता से कई सारे वादे  करते है और उसके लिए दूसरी सरकारों को जमकर कोसते हैं। मगर जब ये सत्ता में आते हैं तो जनता को किये वाडे भूल जाते है और सत्ता की मलाई काटने लग जाते हैं और जब उनसे जनता किये गए वादों का हिसाब मांगती है तब यही नेता कहते है कि वो तो चुनाव जितने के लिए सिर्फ एक जुमला था। ऐसा ही एक मामला पुरानी पेंशन को लागू करने का है जिसके लिए कई भाजपा नेताओं ने प्रदर्शन कर रहे है लोगों को वादा किया कि उनकी सरकार आते ही वो इसे लागू करवाएंगे।
उत्तर प्रदेश के शिक्षक पुरानी पेंशन की बहाली की मांग कर रहे हैं जिसके लिए कई बार धरना प्रदर्शन कर चुके है और कई बार लाठियां भी खा चुके हैं। प्रदर्शनकारियों से भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और वर्तमान डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या ने वादा किया था कि वो सत्ता में आते ही पुरानी पेंशन को बहाल करवाएंगे तथा तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पत्र लिखकर इस मामले को संज्ञान में लेनी की मांग की थी।
केशव प्रसाद मौर्या के अतिरिक्त वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी पुरानी पेंशन की बहाली की मांग करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को 2013 में पत्र लिखा और पुरानी पेंशन स्कीम की बहाली की मांग की। जिसका पूरा विवरण नीचे दिए गए पत्र में दिया हुआ है।

अब जब केंद्र में भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और उत्तर प्रदेश में भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार है यही नहीं अब तो योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री है और पीएम मोदी के बेहद करीबी है तो ऐसे में पुरानी पेंशन स्कीम लागू हो जानी चाहिए थी मगर यहाँ पर भाजपा नेताओं ने पलटी मारते हुए कहा है कि पुरानी पेंशन स्कीम को लागू करने का कोई औचित्य ही नहीं बनता। डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा का पत्र नीचे दिया गया है जिसमें पुरानी पेंशन को लेकर उन्होंने क्या कहा है दिया है।

सोमवार, 3 जुलाई 2017

आई ड्रॉप का संभल कर करें इस्तेमाल --स्टेरायड युक्त अाई ड्राप से नुकसान

कंजंक्टिवाइटिस में आई ड्रॉप का ज्यादा इस्तेमाल हो सकता है नुकसानदेह


बारिश का मौसम शुरू हो चुका है और इस दौरान सबसे ज्यादा जो बीमारी लोगों को परेशान करती है वह है आई इंफेक्शन कंजंक्टिवाइटिस। ऐसे में यह सवाल भी लोगों के जेहन में है कि क्या ऐंटीबायॉटिक आई ड्रॉप्स कंजंक्टिवाइटिस के इलाज में कारगर है? इस बारे में हुई रिसर्च की मानें तो आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल नुकसानदेह साबित हो सकता है।

इंटरनैशनल जर्नल ऑप्थैलमॉलजी में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक करीब 60 प्रतिशत कंजंक्टिवाइटिस इंफेक्शन वायरस की वजह से होता है और इसके इलाज में ऐंटीबायॉटिक का कोई रोल नहीं होता। कंजंक्टिवाइटिस एक ऐसी परिस्थिति है जिसमें कंजंक्टिवा- जो आंखों के आगे की सतह में पाई जाने वाली बेहद महीन झिल्ली होती है उसमें जलन और लालीपन आ जाता है और इस वजह से आंखें खुद को सेल्फ लिमिट कर लेती हैं। मॉनसून के सीजन में कंजंक्टिवाइटिस होना सामान्य बात है क्योंकि इस दौरान नमी बहुत ज्यादा रहती है जो बैक्टीरिया और वायरस के ग्रोथ में सहायता करती है।

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ऐंटीबायॉटिक्स पहले इसलिए प्रिस्क्राइब की जाती थीं ताकि कॉर्निया को किसी तरह का सेकंडरी इंफेक्शन न हो। भारत में बैक्टीरियल इंफेक्शन की वजह से अमेरिका की तुलना में ज्यादा कंजंक्टिवाइटिस के केस देखने को मिलते हैं। कई मौको पर ऐंटीबायॉटिक्स देना जरूरी होता है। लेकिन इनके बहुत अधिक इस्तेमाल से बचना चाहिए अन्यथा आंखों की सतह को नुकसान पहुंच सकता है।' 


विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार कंजंक्टिवाइटिस से बचाव के लिए भी ऐंटीबायॉटिक्स प्रिस्क्राइब की जाती हैं। बैक्टीरियल इंफेक्शन की वजह से कंजंक्टिवाइटिस होने का चांस बेहद कम होता है। ज्यादातर केस में इसके लिए वायरस ही जिम्मेदार होते हैं। लेकिन डॉक्टर्स किसी तरह का चांस नहीं लेना चाहते क्योंकि अगर किसी भी वजह से इंफेक्शन और बढ़ता है तो मरीज उन्हें लापरवाही बरतने के लिए जिम्मेदार ठहराएंगे।'

संजय गांधी पीजीआइ के नेत्र रोग विशेषज्ञ कहते है कि
 यह जांच करवाना संभव नहीं है कि कंजंक्टिवाइटिस का इंफेक्शन वायरस की वजह से है या बैक्टीरिया की वजह से। इसलिए प्रिकॉशन के तौर पर डॉक्टर्स माइल्ड ऐंटीबायॉटिक्स प्रिस्क्राइब कर देते हैं।' वायरस की वजह से होने वाला कंजंक्टिवाइटिस अपने आप ही एक सप्ताह के अंदर ठीक हो जाता है लेकिन डॉक्टर्स कहते हैं कि बैक्टीरियल इंफेक्शन की वजह से होने वाला कंजंक्टिवाइटिस कई केस में कॉर्निया तक फैल जाता है। कॉर्निया में इंफेक्शन और घाव आंखों को स्थायी तौर पर नुकसान पहुंचा सकता है।

स्मार्ट फोन बदल रहा है चाल

स्मार्टफोन अब सिर्फ फोन नहीं रहा बल्कि हमारी जिंदगी का ऐसा अभिन्न हिस्सा बन गया है जिस पर हमारी निर्भरता दिनों दिन बढ़ती जा रही है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि जितना यह उपयोगी है, उतना ही स्वास्थ्य के लिए घातक भी। इसका अति उपयोग युवाओं को वृद्धावस्था की ओर ले जा रहा है और युवावस्था में ही लोगों की चाल 80 साल के बुर्जुगों जैसी होने लगी है। इसके साथ ही शारीरिक बीमारियों जैसे गर्दन और कमर में दर्द रहने की शिकायत भी बढ़ती जा रही है।

वैज्ञानिकों ने 21 लोगों पर आई ट्रैकर से नजर रखी और उनके 252 तरह के मूवमेंट को कैमरे में कैद करके उन पर रिसर्च की। इस रिसर्च में पाया गया कि 46 प्रतिशत लोग चलते समय मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं। फिर चाहे फोन पर बात करने के लिए हो, मेसेज पढ़ने के लिए या मेसेज टाइप करने के लिए। लिहाजा स्मार्टफोन इस्तेमाल करते हुए चलने के दौरान उनकी गति में कमी आ जाती है और वे इस तरह से चलते हैं जैसे कोई बुजुर्ग चल रहा हो। 

 ऐसे लोगों पर रिसर्च करने का ध्यान उन्हें तब आया जब उन्होंने एक इंसान को चलते देखा और उसे पीछे से देखकर उन्हें लगा कि उसने कई बोतल दारू पी रखी है। लेकिन हकीकत यह थी कि वह एक स्मार्टफोन यूज कर रहा था।
भर में ऐसे स्मार्टफोन यूजर्स के लिए अलग-अलग सुविधाएं दी जा रही हैं। जैसे चीन में ऐसे लोगों के लिए अलग से फुटपाथ बनवाए गए हैं। वहां स्मार्टफोन यूजर आराम से चल सकते हैं। वहीं नीदरलैंड में तो ऐसे यूजर्स के लिए अलग से पेवमेंट बना दिए गए हैं। इतना ही नहीं प्लस वन नाम की पत्रिका की स्टडी में पता चला है कि स्मार्टफोन की वजह से लोगों की रिश्तेदारियां भी खत्म होती जा रही हैं क्योंकि लोग उनसे ज्यादा फोन के साथ वक्त गुजारने लगे हैं।

पीजीआइ में पंजीकरण के समय दर्ज नाम में संसोधन के लिए बनेगी गाइड लाइन

पीजीआइ में पंजीकरण के समय दर्ज नाम में संसोधन के लिए बनेगी गाइड लाइन

सीएमएस मामले को सुलझाने के लिए निदेशक ने दिया निर्देश
सैकडों मरीजों को नाम में संसोधन हो पाने के कारण नहीं कर पा रहे क्लेम
    


संजय गांधी पीजीआइ में पीजकरण के समय दर्ज नाम अौर पते में संसोधन में अवरोध को मामले को निदेशक प्रो.राकेश कपूर ने गंभीरता से लेते हुए कहा है कि जल्दी इसके लिए गाइड लाइन जारी की जाएगी। मृत्यु के मामले में नाम अौर पते में संसोधऩ में थोडी कानूनी बाध्यता है लेकिन सामान्य मरीजों में नाम अौर पते में बदलाव के लिए प्रमाण लेकर बदलाव प्रक्रिया पहले की तरह जारी रहेंगी। मुख्य चिकित्सा अधिकारी  प्रो.अमित अग्रवाल इस मामले में हो रही मरीजों की परेशानी दूर करने के लिए लगें हुए हैं।  मेडिकल रिकार्ड अाफिस अौर एचअाईएस सेल के बीच कुछ गलफहमी के वजह से संसोधन रूका हुअा है जिससे दूर करने के लिए गाइड लाइन जारी की जाएगी। संसोधन के लिए मेडिकल रिकार्ड अाफिस से कहा गया कि संयक्त निदेशक प्रशासन एवं एचअाईएस सेल के इंजार्ज ने संसोधन पर रोक गया दिया लेकिन सेल के इंचार्ज प्रो.उत्तम सिंह ने कहा कि हमने कोई रोक नहीं लगायी है। फिलहाल इस गलतफहमी के वजह से सैकडों मरीज परेशान है। अाज भी तमाम मरीज संसोधन के लिए परेशान रहें।   



यह सही है कि  कई बार इमरजेंसी में नाम अौर पता गलत हो जाता है। कई बार मरीज के साथ वालों को अभिलेखों में दर्ज नाम नहीं पता होता है जिससे इश्योरेंस या विभाग के प्रति पूर्ति लेने में परेशानी होती है .इस लिए संसोधन का विकल्प रहेगा...निदेशक प्रो.राकेश कपूर 

पीजीआई जीम एक दिन के अनुपस्थिति पर काट रहा है दो दिन का वेतन

पीजीआइ में संविदा कर्मचारियों के शोषण पर बवाल

जीम एक दिन के अनुपस्थिति पर काट रहा है दो दिन का वेतन



संजय गांधी पीजीअाइ में संविदा पर तैनात पैरा मेडिकल स्टाफ लैब टेक्नीशियन, नर्सेज का शोषण शुरू हो गया है। इंटक की महिला प्रकोष्ठ की जिला अध्यक्ष सावित्री सिंह , कर्मचारी संगठन के महामंत्री राजेश शर्मा सहित तमाम कर्मचारी नेताअों ने संविदा कर्मचारियों को शोषण पर संस्थान प्रशासन के अधिकारियों के सामने जबजस्त विरोध जताया। पैरामेडिकल अाउट सोर्सिग एजेंसी के खिलाफ अाक्रोश जताया। जीम के तहत संस्थान में पांच सौ से अधिक पैरा मेडिकल स्टाफ तैनात है। संविदा पर तैनात कर्मचारियों ने दबी जुबान से यह जानकारी कर्मचारी संगठनों को दी तो कर्मचारी नेता एक जुट होकर शोषण के खिलाफ अाक्रोश जताया। नर्सिंग स्टाफ एसोसिएशन की अध्यक्ष सीमा शुक्ला ने कहा कि यहां पर खुले अाम श्रम कानून का उलंघन हो रहा है। कई बार कर्मचारी बीमार पड जाता है या कोई अौर परेशानी खडी हो जाती है।  जिसकी सूचना भी देते है कि अाज वह काम पर नही अा पा रहे है लेकिन ठेकादार कमाई के लिए उनके दो दिन के वेतन काट लेता है क्यों कि संविदा में रोज के अनुसार वेतन दिया जाता है। इसी तरह कर्मचारियों को उनका पीएल( पर्सनल लीव) भी एकत्र नहीं करने दिया जा रहा है ठेकेदार कह रहा है कि उस महीने का अवकाश उसी महीने लो जबकि अवकाश एकत्र कर जब जरूरत हो तब लेने का नियम है।

खत्म हो बिचौलिया सिस्टम
 कर्मचारी नेताअों ने अारोप लगया कि अाउट सोर्सिग ही लगत है लेकिन यदि तुरंत परामनेंट तैनाती नहीं हो पा रही है तो सीधे संस्थान संविदा पर रखें बीच मे बिचौलिया रखने से संस्थान को अतिरिक्त भुगतान करना पड रहा है जिसमें हर महीने अाठ से दस लाख ठेकेदार के पास जा रहा है यह संस्थान की वित्तीय हानि है।

जीएफअार से संभव है किडनी खराबी के स्टेज का खुलासा

जीएफअार से संभव है किडनी खराबी के स्टेज का खुलासा

नेशनल किडनी फाउंडेशन ने जारी की नई गाइड लाइन

पहले, दूसरे अौर तीसरे स्टेज पर ही उपाय से संभव है खराबी को रोकना

कुमार संजय। लखनऊ

किस हद तक किडनी खराबी के चपेट में अा चुके है यह जानने के लिए नेशनल किडनी फाउंडेशन ने नई गाइड लाइन जारी की है जिसमें ग्लूमलर फिल्टरेशन रेट( जीएफअार) के अाधार पर बीमारी की स्टेज पता करना संभव हो गया है। स्टेज के अाधार पर इलाज के विकल्पों की भी जानकारी हासिल की जा सकती है। संजय गांधी पीजीआइ के किडनी रोग विशेषज्ञ प्रो.नरायन प्रसाद ने बताया कि फाउंडेशन ने पाच स्टेज बनाया है जिसमें दूसरे अौर तीसरे स्टेज पर किडनी की खराबी को अागे बढने से दवाअों से रोका जा सकता है। इसमें रक्तदाब, शुगर कंट्रोल के साथ लाइफ स्टाइन में बदलाव लाने की सलाह दी जाती है। स्टेज चार अौर पांच में डायलसिस , किडनी ट्रांसप्लांट जैसे विकल्प ही बचते हैं। प्रो.नरायन प्रसाद ने कहा कि 70 फीसदी लोग किडनी खराबी के चौथे अौर पांचवे स्टेज पर ही हम लोगों के पास अाते है। बताया कि जीएफअार की गणना मरीज के उम्र, लिंग, नश्ल( भारतीय, यूरोपियना अादि) अौर सीरम क्रिएटनिन के अाधार पर गणना कर निकला जाता है। स्टेज टू अौर थ्री में ब्लड प्रेशर 130-85  से कम रखने की जरूरत होती है। इसके लिए भऱीर के भार में कमी, खाने में कंट्रोल , कम नमक का सेवन के साथ एंजियो टेंसिन कनवर्टिग एंजाइम दवाएं दी जाती है जिससे बीमारी का प्रोगेशन रूक जाता है। बताया डायबटीज मरीजों को एचबीएवन सी का 6.5 फीसदी से कम होना चाहिए। 


पहली स्टेज: पेशाब में कुछ गड़बड़ी पता चलती है लेकिन क्रिएटनिन और ईजीएफआर (ग्लोमेरुलर फिल्टरेशन रेट) सामान्य होता है। ईजीएफआर से पता चलता है कि किडनी कितना फिल्टर कर पा रही है।
दूसरी स्टेज: जीएफआर 90-60 के बीच में होता है लेकिन क्रिएटनिन सामान्य ही रहता है। इस स्टेज में भी पेशाब की जांच में प्रोटीन ज्यादा होने के संकेत मिलने लगते हैं। शुगर या हाई बीपी रहने लगता है।
तीसरी स्टेज: जीएफआर 60-30 के बीच में होने लगता है, वहीं क्रिएटनिन भी बढ़ने लगता है। इसी स्टेज में किडनी की बीमारी के लक्षण सामने आने लगते हैं। एनीमिया हो सकता है।  ब्लड टेस्ट में यूरिया ज्यादा आ सकता है। शरीर में खुजली होती है। यहां मरीज को डॉक्टर से सलाह लेकर अपना लाइफस्टाइल सुधारना चाहिए।
चौथी स्टेज: जीएफआर 30-15 के बीच होता है और क्रिएटनिन भी 2-4 के बीच होने लगता है। यह वह स्टेज है, जब मरीज को अपनी डायट और लाइफस्टाइल में जबरदस्त सुधार लाना चाहिए नहीं तो डायलसिस या ट्रांसप्लांट की स्टेज जल्दी आ सकती है। इसमें मरीज जल्दी थकने लगता है। शरीर में कहीं सूजन आ सकती है।
पांचवीं स्टेज :ईजीएफआर 15 से कम हो जाता है और क्रिएटनिन 4-5 या उससे ज्यादा हो जाता है। फिर मरीज के लिए डायलसिस या ट्रांसप्लांट जरूरी हो जाता है।

एमएस के नुस्खे के प्रमाणिकता पर मुहर लगाएगा पीजीआई

एमएस के नुस्खे के प्रमाणिकता पर मुहर लगाएगा पीजीआई

मोनोक्लोनल एंटीबाडी सीडी 20 प्रोटीन से मिल सकती है राहत 
क्लीनिकल ट्रायल में देश के साथ संस्थान होंगे शामिल 
कुमार संजय। लखनऊ
तंत्रिका तंत्र की बीमारी मल्टिपल स्किलरोसिस(एमएस)  के इलाज के लिए विश्व स्तर पर तैयार की गए नए  नुस्खे की प्रमाणिकता पर संजय गांधी पीजीआइ भी मुहर लगाएगा।  ड्रग कंट्रोलर आफ इंडिया ने इस बीमारी की नई दवा के क्लीनिकल ट्रायल के लिए देश के साथ संस्थानों को हरी झंडी दी है। नई दवा का क्लीनिकल ट्रायल 33 देशों में 900 लोगों पर किया जा रहा है। इनमें भारत के सात संस्थान शामिल है । यह  कुल 120 मरीजों पर दवा के प्रभाव का अध्ययन करेंगे। नयी दवा कई चरणों के परीक्षण को पार कर चुका है देखा गया है कि यह दवा इस समय जी रही टेरीफ्लूनोमाइड से अधिक प्रभावी और कुप्रभाव विहीन है। ड्रग कंट्रोलर ने पीजीआइ चंडीगढ, एम्स दिल्ली, अमृता इंस्टीट्यूट केरल सहित अन्य देश के सात संस्थानों को अनुमति दी है जिसमें पीजीआई लखनऊ का न्यूरोलाजी विभाग भी शामिल है। संस्थान के न्यूरोलाजी विभाग के विशेषज्ञों का कहना है कि मल्टीपिल स्कैलोरोसिस तंत्रिका तंत्र की ऐसी परेशानी है जिसमें उपचार के समिति विकल्प है। ओफाट्युमैब कारगर और सुरक्षित साबित होती है तो इलाज के एक नया विकल्प मिलेगा जो मरीजों को हित में होगा। यह  मोनोक्लोनल एंटीबाडी सीडी 20 प्रोटीन है बी लिम्फोसाइट के क्रियाशीलता को शुरूअती दौर में रोकती है।         

आटो इम्यून डिजीज है मल्टीपिल स्कैलोरोसिस
मस्तिष्क तथा स्पाइनल कार्ड तंत्रिका नर्व को सुरक्षा प्रदान करने वाले वसायुक्त माइलिन के आवरण क्षतिग्रस्त हो जाते हैं।  आवरण नष्ट होने और घाव के निशान होने के साथ-साथ परेशानी होती है। आम तौर पर युवा वयस्कों में पायी जाती है।  यह महिलाओं में ज्यादा आम होती है। इसकी व्यापकता प्रति 100,000 में से  2 से 150 के बीच होती है। संजय गांधी पीजीआइ के तंत्रिका रोग विभाग के प्रमुख प्रो.सुनील प्रधान के मुताबिक यह परेशानी  मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी में तंत्रिका कोशिकाओं के एक दूसरे से संवाद करने की क्षमता को प्रभावित करता है। तंत्रिका कोशिकाएं लम्बे तंतुओं के नीचे विद्युत संकेत भेज कर संवाद स्थापित करते हैं।  माइलिन नामक एक रोधक पदार्थ में लिपटे हुए रहते हैं। शरीर का अपना प्रतिरोधी तंत्र माइलिन पर हमला करता है और उसे नुकसान पहुंचाता है। जब माइलिन नष्ट हो जाता है तो प्रभावकारी ढंग से संकेतों को बिलकुल ही संचालित नहीं कर सकता है। 

यह होती है परेशानी
एम्एस से प्रभावित व्यक्ति तंत्रिका संबंधी किसी भी रोग लक्षण या संकेतों से पीड़ित हो सकता है
-संवेदना में परिवर्तन 
- मांसपेशी की कमजोरी
- मांसपेशी में ऐंठन
- चलने- फिरने में कठिनाई
- समन्वय और संतुलन में कठिनाई 
-भाषा में कठिनाई 
- निगलने में कठिनाई
- दृश्य संबंधी समस्याएं 
-थकान
- मूत्राशय तथा आंत संबंधी 

साफ्ट ड्रिक पीने वाले 75 फीसदी फैटी लिवर डिजीज के शिकार

साफ्ट ड्रिक पीने वाले 75 फीसदी फैटी लिवर डिजीज के शिकार

500 मिली लीटर से अधिक साफ्ट ड्रिक पीते है तो हो सकते है लिवर डिजीज, डायबटीज अौर उच्च रक्तचाप के शिकार
कुमार संजय। लखनऊ

अमूमन माना जाता है शराब के कारण लिवर खराब होता है लेकिन विशेषज्ञों ने साबित किया है साफ्ट ड्रिक का अदिक सेवन भी लिवर की खराबी यहां तक कि सिरोसिस का भी कारण साबित हो सकता है। यह पहला शोध है जिसमें साबित किया गया है कि 6 महीने से अधिक 500 मिली लीटर( दो बोतल) साफ्ट ड्रिक पीने वाले लोगों 75 फीसदी लोगों में फैटी लिवर( नान एल्कोहलिक फैटी लिवर) डिजीज मिला। दो कम साफ्ट ड्रिक पीने वाले 16 फीसदी अौर एक से कम साफ्ट ड्रिक पीने वाले केवल चार फीसदी में फैटी लिवर मिला।  इस लिए साफ्ट ड्रिक से दूर रहने की सलाह शोध वैज्ञानिको ने दिया है। शोध वैज्ञानिकों ने दो बोतल कोल्ड ड्रिक पीने वाले लोगों में देखा कि वह मोटापे के शिकार थे ।  बीएमअाई( बाडी मास इंडेक्स) 26.87 किलोग्राम प्रति वर्ग मीटर था जबकि एक से कम साफ्ट ड्रिक पीने वाले लोगों का बीएमअाई 23.15 था। इसके अलावा दो अधिक साफ्ट  ड्रिक पीने वाले लोगों के कमर का घेरा 92 सेमी जबकि एक से कम पीने वाले लोगों के कमर का घेरा 88 सेमी था। विशेषज्ञों ने देखा कि दो अधिक कोल्ड ड्रिक पीने वाले 40 फीसदी लोग  मेटाबोविक सिड्रोम( डायबटीज, उच्च रक्तचाप की अाशंका) के शिकार थे। 
एेसे हुअा शोध
जर्नल अाफ एसोसिएशन अाफ इंडिया के शोध रिपोर्ट के मुताबिक इरा मेडिकल कालेज के शोध वैज्ञानिक डा. जेबा सिद्दकी, डा. रितू करोली, डा.जलीस फातिमा,डा. सचिन खंडूरी, डा. शिशिर वाष्णेय . डा. शारा सरीन सिद्दकी ने 242 लोगों पर शोध किया यह भी एमबीबीएस के छात्र थे। चालिस लोग दो अधिक साफ्ट ड्रिक रोज पीते थे। 97 लोग रोज एक साफ्ट ड्रिक पीते थे अौर 105 लोग एक से कम साफ्ट ड्रिक पीते थे। इन सभी के लिवर प्रोफाइल, लिपिड प्रोफाइल, बीएमअाई, रक्त दाब, रक्त में शुगर, इंसुलीन रसिसटेंट के परीक्षण के साथ लिवर की स्थिति जानने के लिए अल्ट्रासाउंड जांच किया गया। 

क्या है मेटाबोलिक सिंड्रेम
ट्राइ ग्लिसराइड- 150 से अधिक
एचडीएल -40 ( पुरूष) अौर 50( महिला) से कम
रक्तदाब- 130-85 से अधिक
फास्टिंग शुगर- 100 से अधिक होने पर व्यक्ति दिल, उच्च रक्तचाप अौर डायबटीज के मुबाने पर होता है इस स्थित में लाइप स्टाइल बदल कर इन परेशानियों से मुक्ति पा सकता है। 

साफ्ट ड्रिंक में होता अधिक कैलोरी

संजय गांधी पीजीआइ की पोषण विशेषज्ञा अर्चना के मुताबिक खास किस्म के भूरे वाले  में 10.6 ग्राम शुगर प्रति 100 मिली लीटर में होता है जबकि दूसरे खास किस्म में 6.6 ग्राम शुगर प्रति सौ मिलीलीटर में होता है इसमें कैलोरी अधिक होती है जिसके कारण मोटापा होता है। इसके फ्रूट जूस में 5 से 8 ग्राम शुगर प्रति 100 मिली लीचर होता है। 

रविवार, 2 जुलाई 2017

पीजीआई स्टाफ कैंटीन मिटा रहा है भूख

सम्वाददाता
(न्यूज़ 30डेज़)
पीजीआई स्टाफ कैंटीन मिटा रहा है भूख 

बैसे तो पीजीआइ स्टाफ कैंटीन केवल कर्मचारियों के लिए बनी है लेकिन तमाम एेसे मरीजों के तीमारदारों की भी भूख मिटाता है जो अपने मरीज को छोड़ कर गेट के बाहर नहीं जा सकते है। तीमारदारों को संचालक भोजन पैक कर देते है । रात में सात बजे के बाद एेसे लोगों को कम पैसे पूरा भोजन खिलाते भी . संचालक की इस भूमिका पर तमाम तीमरदारों का कहना है कि यहां अभी मानवता बची हुई है।  तीमरदारो का कहना है कि  स्टाफ कैंटीन में मिलने वाला भोजन बेहद ही स्वादिष्ट व शुद है। कैंटीन के संचालक श्री विष्णु जी से बातचीत के दौरान हमने वहाँ पर पकायें जाने वाली खाद्य सामग्री की गुडवत्ता के बारे में विशेष जानकारी प्राप्त की तो यह बोध हुआ की इस चिकित्सा संस्थान में हर तरफ़ सेवा की भावना कायम है। 
विशेष : ॥ उचित मूल्य पर मिलता है स्वाद व शुदता का संगम ॥ ॥ पीजीआई स्टाफ कैंटीन ॥
सौजन्य : ॥ न्यूज़30डेज़ पोर्टल ॥

पीजीआइ के अधिकारियों की मनमानी नहीं ठीक करेंगे नाम अौर पता


शनिवार, 1 जुलाई 2017

ट्रांसपोर्ट नगर अारटीअो अाफिस में अधिकारियों के कक्ष के सामने अाराम फरमा है कुत्ता





यह सीन है ट्रांसपोर्ट नगर अारटीअो अाफिस का जहां पर अाफिस को सुंदर बनाने के लिए छतों पर गूब्बारे टंगे है लेकिन मुख्य प्रवेश द्वार जहां से अारटीअो, एअारटीअो सहित तमाम अधिकारियों प्रवेश करते है ठीक सामने बायो मेट्रिक रूम के सामने फर्श पर एक कुत्ता अाराम फरमा रहा है। अाफिस में तमाम काम के लिए अाने वाले लोग बगल से बचा कर निकल रहे हैं। अधिकारियों अौर कर्मचारियों की लंबी फौज के बाद किसी ने कुत्ते को भगाने की हिमायत नहीं की। संवाददाता किसी काम से अाफिस गया था जहां पर वह दो घंटे तक रहा लेकिन किसी ने कुत्ते को नहीं भगाया । इसी बीच एक कर्मचारी से पूछा कि कुत्ते को लोग भगा क्यों नहीं रहे है तो बताया कि अाफिस के एक कर्मचारी का पालतू कुत्ता है किसी हिम्मत है भगाने की।   अाफिस में काम के लिए अाने वाले लोगों का कहा है कि कुत्ता किसी को काट ले तो परेशानी खडी हो जाएगी।   







बुधवार, 28 जून 2017

पीजीआइ के कर्मचारी के साथ पुलिस ने की बदसलूकी

संजय गांधी पीजीआइ के प्रशासनिक भवन के एक अधिकारी के साथ पीजीआइ थाने के पुलिस ने बदसलूकी की है। मंगलवार की शाम को यह अधिकारी ड्यूटी के बाद घर जा रहे थे कि पीजीआइ गेट के सामने उनकी बाइक के सामने एक टेम्पो चालक अा गया तुरंत उक्त अधिकारी ने गाडी में ब्रेक लगा कर कंट्रोल कर लिया इस चालक ने गाली देने लगा इस पर उक्त अधिकारी ने एतराज जताते हुए कहा कि कुछ हुअा तो नहीं मैने जान बूझ कर कुछ नहीं किया इस पर हाथापायी होने लगी इतने में थाने में तैनात एक पुलिस कर्मचारी वहां पहुंच कर पीजीआइ के कर्मचारी के साथ बदसलूकी करते हुए कहा कि होगे पीजीआइ के कर्मचारी या अधिकारी तेरी .......मां बहन को गाली देने लगा ..उक्त अधिकारी एसपी यादव , कर्मचारी नेता केके तिवारी, अोम प्रकाश सिंह , अमर सिंह सहित कई नेता सुबह निदेशक से मिल कर उक्त पुलिस के खिलाफ शिकायत दर्ज करायी निदेशक से मांग की उक्त पुलिस कर्मचारी के खिलाफ एक्शन के लिए संस्थान प्रशासन लिखे। निदेशक ने अाश्वासन दिया कि उक्त पुलिस कर्मचारी की शिकायत थाना अध्यक्ष, सीअो से की जाएगी देखा जाएगा कि कितनी किसकी गल्ती है। 

सोमवार, 26 जून 2017

news30deys: थैक्स डाक्टर ...तीन महीने में घट गया 17 किलो वजन

news30deys: थैक्स डाक्टर ...तीन महीने में घट गया 17 किलो वजन: थैक्स डाक्टर ...तीन महीने में घट गया 17 किलो वजन मोटापे के साथ उच्च रक्त चाप और सांस लेने में परेशानी से मिला छुटकारा पीजीआई में बैरिएटिक...

थैक्स डाक्टर ...तीन महीने में घट गया 17 किलो वजन

थैक्स डाक्टर ...तीन महीने में घट गया 17 किलो वजन
मोटापे के साथ उच्च रक्त चाप और सांस लेने में परेशानी से मिला छुटकारा
पीजीआई में बैरिएटिक सर्जरी शुरू
सात विभाग के विशेषज्ञों ने तय किया इलाज का रास्ता
लखनऊ। कुमार संजय
देवरिया की रहने वाली 55 वर्षीय मीनाक्षी का वजन तीन महीने में 95 किलों से घट 78 किलो रह गया साथ ही सांस लेने की परेशानी, उच्च रक्त चाप के परेशानी से छुटकारा मिल गया। यह संभव हुआ है संजय गांधी पीजीआई में हुई पेट की सर्जरी( बैरिएटिक सर्जरी) के जरिए। सर्जरी के बाद पहली बार फालोअप पर आयी मीनाक्षी ने इस खुशी को जाहिर किया। मीनाक्षी हाइपोथायरडिज्म(हारमोन असंतुलन), उच्च रक्तचाप, एयर वे आब्सट्रेक्सन की परेशानी से ग्रस्त इसके साथ इनके शरीर का वजन 95 किलो के आस पास था। रात में शरीर में आक्सीजन का स्तर कम हो जाता है जिसे पूरा करने के लिए सोते समय उन्हें बाई पेप लगाना पड़ता था। कुल मिला तक मीनाक्षी की जिदंगी बड़ी कठिन हो गयी थी। मोटापे के साथ तीन बीमारी से लड़ रही मीनाक्षी पीजीआई आयी तो विशेषज्ञों ने तमाम परेशानी से मुक्ति के लिए गैस्ट्रोसर्जन प्रो.आनंद प्रकाश के पास भेजा। प्रो.प्रकाश ने इंडोमेडिसिन, कार्डियोलाजी, गैस्ट्रोमेडिसिन, पोषण विशेषज्ञ के साथ पल्मोनरी मेडिसिन के विशेषज्ञों को शामिल कर मीनाक्षी के केस पर गहन विचार विमर्श के बाद बैरिएटिक सर्जरी का फैसला लिया। यह सर्जरी पीजीआई में इससे पहले कभी नहीं हुई थी। पहली बार होना था इसके लिए प्रो.प्रकाश पूरी तैयारी की। प्रो.प्रकाश के मुताबिक मीनाक्षी के मामले में स्लीब गैस्ट्रेक्टमी किया जिसमें आमाशाय के आकार को 75 फीसदी तक काट कर छोटा किया गया। मीनाक्षी के मुताबिक अब पहले से कम खाती हूं। भूख कम लगती है। फिजिकली एक्टिव होने के नाते तीन महीने में 17 किलो वजन कम हो गया है।
सर्जरी से हारमोन पर किया गया नियंत्रण
आमाशय को ऐसे काटा गया जिसमें लेप्टिन और ग्रैलिन हारमोन बनाने वाला भाग भी कम हो जाए। इससे इन हारमोन का स्तर भी कम होता है। लेप्टिन हारमोन का बढ़ा है अधिक भूख लगती है। इसकी मात्रा कम करने से भूख कम लगती है। ग्रेलिन हारमोन पेट भरने का सिगलन देता है।
अब हर गुरूवार को पीजीआई में बैरिएटिक ओपीडी
किस मरीज में सर्जरी की जरूरत है। यह तय करने के लिए हर गुरूवार को दो बजे पांच बजे तक गैस्ट्रोसर्जरी ओपीडी में विशेषज्ञ विशेष ओपीडी चलाएंगे। इसमें मरीजों को सही जनाकारी दी जाएगी। संस्थान में अब बैरिएटिक सर्जरी स्थापित हो गयी है रेगुलर सर्जरी होगी। यहां पर इस सर्झरी का खर्च एक लाख के आस पास आएगा जबकि निजि क्षेत्र में चार से पाच लाख का खर्च आता है।

शनिवार, 24 जून 2017

पीजीआई लखनऊ देश में चौथा


रेलवे पेशाब घर में ताला

रेलवें में पेशाब के लिए भी देना पड़ रहा है दो रूपया

लखनऊ रेलवे स्टेशन पर पेेशाब करने के लिए भी यात्रियों को दो रूपया देना पड़ रहा है क्योंकि पे एंड यूज शौचालय पिछले एक माह से बंद होने के कारण यात्रियों को य ह परेशानी हो रही है...रेलवे के अधिकारियों ने शौचालय पर ताला बंद कर दिया है कहा जा रहा है कि रिनोवेशन हो रहा है