मंगलवार, 22 मई 2018

रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने का विरोध कर रहे डॉक्टरों का प्रतिनिध मण्डल राज्यपाल से मिला



रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने का विरोध कर रहे डॉक्टरों का प्रतिनिध मण्डल राज्यपाल से मिला



पीजीआई फैकल्टी फोरम ने जताया विरोध कहां संस्थान की स्वायत्तता पर खतरा


पीजीआई में डॉक्टरों की रिटायरमेंट उम्र 65 से 70 वर्ष बढ़ाने के प्रस्ताव का विरोध करे संस्थान के फैकल्टी फोरम (डॉक्टरों) का एक प्रतिनिधि मण्डल राज्यपाल राम नाईक से मिलकर इस पर तत्काल रोक लगाने की मांग उठायी। संकाय सदस्यों ने राज्यपाल को अभिलेख दिए। जिसमें कहा गया है कि पीजीआई के 80 फीसदी डॉक्टर रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने के विरोध में हैं। संकाय सदस्यों ने राज्यपाल से कहा कि रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाना पीजीआई की स्वायत्तता पर खतरा बताया है। राज्यपाल ने फैकल्टी फोरम को भरोसा दिलाया कि इस गंभीर मुद्दे पर वो जल्द निर्णय लेंगे। उन्होंने कहा कि चंद डॉक्टरों के लिए युवा डॉक्टरों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं होगा। 
पीजीआई फैकल्टी फोरम के अध्यक्ष डॉ. अशोक कुमार, सचिव डॉ. एमएस अंसारी के अलावा डॉ. सुभाष यादव व डॉ. अमिताभ आर्या ने राज्यपाल राम नाईक से मिलकर अपना पक्ष रखा। संकाय सदस्यों ने राज्यपाल से कहा कि संस्थान के सिर्फ चार डॉक्टरों को खुश करने के लिए उनका सेवाकाल पांच वर्ष बढ़ाने का प्रस्ताव संस्थान हित में कतई ठीक नहीं है। पीजीआई में एम्स दिल्ली के सारे नियम कायदे लागू होते हैं। एम्स में रिटायरमेंट उम्र 65 वर्ष है। डॉक्टरों ने कहा कि पीजीआई एक्ट के साथ छेड़छाड़ करने से जूनियर फैकल्टी सदस्यों को संस्थान में मौका नहीं मिलेगा। इससे सीनियर और जूनियर डॉक्टरों के बीच दूरियां बढ़ेंगी। जो मरीजों के हित में कतई फायदेमंद नहीं है। सदस्यों ने कहा कि यदि विशेषज्ञ डॉक्टरों की सेवा लेनी ही है तो उन्हें संविदा पर तैनाती देकर प्रदेश के उन संस्थानों और मेडिकल कालेजों में तैनाती दी जाए जहां पर विशेषज्ञों के पद खाली हैं। बार-बार उम्र बढ़ाने को लेकर उम्र बढ़ाने से पीजीआई के एक्ट में भी तब्दीली करनी पड़ रही है जो कि उचित नहीं है क्योंकि इससे पहले 58 साल रिटायरमेंट की उम्र थी जिसे बढ़ाकर 60 किया गया फिर 62 और 65 किया गया थाl अब फिर से 4 डॉक्टरों को खुश करने के लिए रिटायरमेंट की उम्र 65 से 70 करने जा रहे हैं। हालांकि इसके विरोध में करीब 210  संकाय सदस्यों में से 175 डॉक्टरों ने इसके विरोध में हस्ताक्षर करकर दिया है।

लम्बे समय तक पेट खराब होने पर इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज की आंशका

लम्बे समय तक पेट खराब होने पर इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज की आंशका
विश्व इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज दिवस

 अगर लम्बे समय से पेट खराब है। तमाम इलाज के बाद भी ठीक नहीं हो रहा है। तो इसे नजरअंदाज नही करना चाहिए। क्योंकि यह गंभीर बीमारी इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज (आईबीडी) हो सकती है। भागदौड़ भरी जिदंगी तथा जंक और फास्ट फूड  की वजह से आईबीडी के मामलों में तेजी से इजाफा हो रहा है। अफसोस की बात यह है कि अधिकांश डॉक्टर आईबीडी को समझ नहीं पाते हैं वो इसे पाइल्स समझ कर इलाज शुरू कर देते हैं। ये डॉक्टर ऑपरेशन करने में भी गुरेज नहीं करते हैं। इससे मरीज की हालत गंभीर हो जाती है। यह बातें गुरुवार को पीजीआई के गेस्ट्रोलॉजी विभाग के डॉ. यूसी घोसाल ने वर्ल्ड इफ्लेमेटरी बावल डिजीज (आईबीडी) डे पर आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में कहीं। उन्होंने कहा कि यदि लम्बे समय तक पेट खराब है तो पेट रोग विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। उन्होंने पंजाब में हुए एक शोध का हवाला देते हुए बताया कि एक लाख में 44 लोग आईबीडी से पीड़ित हैं।

अल्सरेटिव कोलाइटिस और क्रोंस बीमारी
दो तरह का होता आईबीडी

डा. यूसी घोषाल बताते हैं कि इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज दो तरह की होती है। जिसमें अल्सरेटिव कोलाइटिस और क्रोंस बीमारी है। अल्सरेटिव कोलाइटिस में लगातार पतली दस्ता आने के साथ ही खून आता है। बड़ी आंत में घाव हो जाता है। अक्सर डॉक्टर इसकी बिना जांच किए इसे पाइल्स समझ कर इलाज शुरू कर देते हैं। आपरेशन भी कर देते हैं। जबकि इसका पता लगाने के लिए कोलोनीस्कोपी की जांच जरूरी है। इसके अलावा क्रोन डिजीज आंतों से जुड़ी एक बीमारी है। इस बीमारी के कारण आंतों में लंबे समय के लिए सूजन आ जाती है, जिससे पाचन क्रिया प्रभावित होती है। लंबे समय तक इस बीमारी के प्रभाव में रहने से आंतों में छेद भी हो सकता है और ये जानलेवा हो सकता है। इस रोग के लक्षण पेट दर्द, डायरिया, मल के साथ खून आना और तेजी से वजन घटना आदि हैं। डॉ. घोषाल बताते हैं कि देश में आईबीडी का इलाज सस्ता हो गया है। 10 वर्ष पहले एक खुराक की कीमत 75 हजार थी वो अब 10 हजार रुपए में उपलब्ध है। इस बीमारी में दवाएं, बायोलॉजिकल और फेकल ट्रांसप्लांट से इलाज संभव है।

डॉक्टरों और लोगों में जानकारी का अभाव

डा. घोषाल बताते हैं कि अल्सरेटिव कोलाइटिस और क्रोंस बीमारी के प्रति डॉक्टरों और लोगों में जागरुकता की भारी कमी है। आमतौर पर ग्रामीण व शहरी क्षेत्र में डॉक्टर भी इसे शुरूआती दौर में पाइल्स समझकर इलाज करते हैं। आपरेशन के करने के बाद मरीज की हालत बिगड़ जाती है। उसके बाद वो पीजीआई पहुंचता है। तब उसका इलाज करना चुनौती भरा होता है। आईबीडी का पता लगाने के लिए कोलोनोस्कोपी की जांच जरूरी है। डॉक्टरों को प्रशिक्षण देने की जरूरत है। ताकि मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ हो।  

गलत इलाज कराते हैं लोग

डॉ. यूसी घोषाल ने जौनपुर में किए गए एक सर्वे का हवाला देते हुए बताया कि गांव में 17 फीसदी लोग पेट की बीमारी से पीड़ित थे। उनमें से तीन फीसदी मरीज एमबीबीएस डॉक्टर के पास इलाज कराने गए, पांच फीसदी होम्योपैथिक, आठ फीसदी आयुर्वेदिक तथा एक फीसदी यूनानी के पास गए। उनका कहना है कि आईबीडी की पुष्टि सिर्फ कोलोनोस्कोपी के जरिए ही संभव है। ऐसे में ये डॉक्टर मरीज की बीमारी ठीक करने के बजाए उसे गंभीर बना रहे हैं।

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मंगलवार, 1 मई 2018

डाक्टरों की तीन बार रिटारमेंट अायु बढी लेकिन समस्या जस की तस - फैकल्टी फोरम

डाक्टरों की तीन बार रिटारमेंट अायु बढी लेकिन समस्या जस की तस  - फैकल्टी फोरम


डाक्टरों की तीन बार रिटारमेंट अायु बढी लेकिन समस्या जस की तस  - फैकल्टी फोरम

रिटारमेंट अायु बढाना नहीं है विकल्प

 रिटारमेंट अायु बढती है तो केंद्र सरकार के नियम की अवहेलना



 डाक्टरों की रिटायरमेंट अायु बढाती है तो यह केंद्र सरकार के नियम के अवहेलना है। 2017 में केंद्र सरकार ने डाक्टरों की रियारमेंट अायु 62 से बढा कर 65 किया जिसमें साफ -साफ कहा गया कि इन लोगों को कोई भी प्रशासनिक पद नहीं दिया जाएगा । बढे तीन साल में केवल यह मरीज देखेंगे। संजय गांधी पीजीआई के फैकल्टी फोरम के अध्यक्ष प्रो. अशोक कुमार और सचिव प्रो. एमएस अंसारी सहित अन्य पदाधिकारियों  ने फोरम की बैठक के बाद कहा कि सरकार के इस प्रस्ताव का हर स्तर तक विरोध करेंगे जरूरत पडी तो कार्य बहिष्कार तक कर सकते हैं। कहा कि डाक्टरों की रियारमेंट अायु बीते सालों में तीन बार बढा चुकी है। पहले 58 से 60 किया फिर 60 से 62 किया इसके बाद 62 से 65 किया लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है। इससे साबित होता है रिटारमेंट अायु बढाना कोई सही समस्या का हल नहीं है। इससे अागे सरकार के सामने और विषम स्थिति अा सकती है। 

अाखिर क्यों पीजीआई छोड़ गए 80 से अधिक  
जूनियर डाक्टरों( फैकल्टी) को मौका न मिलने  वह संस्थान को छोड कर कारपोरेट अस्पताल का रूख कर सकते हैं। पीजीआई से बीते सालों में 80 से अधिक डाक्टर छोड़ कर जा चुके हैं। 65 से 70 रिटारमेंट अायु करने पर संस्थान से काफी  छोड़ कर कारपोरेट अस्पताल का रूख कर सकते हैं। पदाधिकारियों ने बताया कि संस्थान के एक विभाग से सात संकाय सदस्य छोड़ कर जा जुके है जिसमें डा. विजय खेर, प्रदीप अरोडा, डा. संजीव गुलाटी, डा. डीके अग्रवाल, डा. अजय प्रकाश शर्मा, डा. मुफ्फजल, डा. अालोक कुमार शामिल है। इसी तरह से हाल में  ही एक दूसे डा. अऩिल मंधानी, डा. सौऱभ वशिष्ठ छोड़ कर चले गए। संस्थान से डाकटरों को रोकने के लिए नए सिरे से सोचना होगा । सरकार के तुगलकी फरमान जारी करेंगे तो इससे संस्थान की प्रतिभा का पलायन होगा।

सालों से जमें रहे नहीं तैयार की सेकेंड लाइन

मेडिकल विवि के टीचर एसोसिएशन के सचिव प्रो.संतोष कुमार 65 के बाद डाक्टर को उनके अनुभव को देखते हुए एेसी जगह भेजा जाए जहां पर विशेषज्ञ नहीं है। डाक्टर में सेवा भाव है तो यह लोग 65 के बाद फ्री कहीं भी लोगों को सलाह दे सकते हैं। सेवा के लिए संस्थान में जमे रहने की क्या जरूरत  है। कहा कि एक 65 के बाद पांच साल अौर काम करने की चाह रखने वाले विभाग के प्रमुखों ने कहा कि एक ही पद है इनके रहने से एमसीआई से मान्यता खत्म हो जाएगी तो अाज इन्होंने सेकेंड लाइन क्यों नहीं तैयार किया यह इनका फेल्योर है।  अपने कार्य काल में पद क्यों नहीं बढवाया। 

4 से 6 रूपए में ले सकते है अच्छी सांस



पल्मोनरी फंक्सन टेस्ट से चलता है अस्थमा का पता

4 से 6 रूपए में ले सकते है अच्छी सांस

इनहेलेशन थिरेपी ही है  दमा में कारगर

लखनऊ। कुमार संजय 

देश का हर दसवां व्यक्ति अस्थमा का शिकार है। यह बच्चों और बड़ों दोनों में ही कुछ महीने में उभर कर आ जाता है। दमा का सही इलाज नहीं होने पर यह जानलेवा भी साबित होता है। इनहेल्ोशन थेरेपी सबसे कारगर इलाज है, जो 4 से 6 रुपये प्रतिदिन की कीमत में उपलब्ध है। संजय गांधीपीजीआई के पल्मोनरी मेडिसिन के विशेषज्ञ प्रो.आलोक और प्रोफेसर जिया हासिम के मुताबिक सांस फूलने के दूसरे कारण भी होते है। इसका पता लगाने के लिए पल्मोनरी फंक्सन टेस्ट किया जाता है जिसमें फेफड़े की क्षमता का आकलन किया जाता है। कितनी फ्लो में आक्सीजन इन्हेल हो रहा है। इसमें लंबे समय तक उपचार की आवश्यकता पड़ती है। अधिकांश रोगी जब दवा के सेवन से बेहतर महसूस करने लगते हैं, तब वे कुछ सप्ताह के बाद ही इलाज बंद कर देते हैं। इससे रोग की दोबारा होने का खतरा बढ़ जाता है और रोगी अस्थमा के अटैक से ग्रस्त हो सकता है। विश्व अस्थमा दिवस पर उन्होंने कहा कि अस्थमा से से ग्रस्त लोगों में 10 से 12 फीसदी बच्चे होते हैं। बच्चे में इनहेलेशन थेरेपी की शुरुआत जल्द से जल्द करनी चाहिए। इससे बीमारी को नियंत्रित करने और उसे अटैक से बचाने और फेफड़ों को सुरक्षित रखने में मदद मिलती है।ज्यादातर लोग बार-बार होनी वाली कफिंग, सांस लेने में तकलीफ, छींक आने जैसे लक्ष्णों का उपचार कफ दवाइयों या बिना डॉक्टर की सलाह के दवा लेकर करते हैं। 

80 फीसदी अस्थमा के मरीज गोली पर रहते हैं निर्भर

अस्थमा और इनहेलर्स को लेकर डर भी व्याप्त है। वहीं, डॉक्टर भी ऐसे समय में अस्थमा के लिए 'ब्रोंकियल स्पाज्म' और 'व्हीजिंग कफ' आदि वैकल्पिक नामों का इस्तेमाल करते हैं।उन्होंने कहा कि अस्थमा और इनहेलर्स को लेकर व्याप्त मिथकों के कारण भारत में लगभग 80 प्रतिशत अस्थमा रोगी ओरल टैब्लेट पर निर्भर हैं, जबकि इनहेलर ही सटीक और सुरक्षित इलाज है। 

अस्थमा होने के कारण:
धूल, सर्दी-जुकाम, परागकण, पालतू जानवरों के बाल, विषाणु और वायु प्रदूषक साथ ही भवानात्मक आवेश भी दमा के आघात का कारण बन जाता है। जब एक व्यक्ति इसके संक्रमण से ग्रस्त हो जाता है। तब सूजे हुए वायुछिद्र विचलित हो उठते हैं, जिससे वहां की मांसपेशियों में जकड़न उत्पन्न हो जाती है। इससे फेफड़ों की नलिकाएं अपना कार्य स्वाभाविक रूप से नहीं कर पाती हैं और व्यक्ति को सामान्य तरीके से सांस लेने में दिक्कत होने लगती है। यह स्थिति कभी-कभी घातक भी हो जाती है।

अस्थमा के सामान्य लक्षण:
सीने में बार-बार जकड़न, सांस लेने में परेशानी, कफ का लगातार आना। हालांकि दमा के लक्षण अलग-अलग लोगों में अलग-अलग प्रकार के होते हैं और बेहद जरूरी है कि इनकी निगरानी उचित चिकित्सक द्वारा की जाए। आज दुनियाभर में दमा क उपचार का सबसे सुरक्षित तरीका इनहेलेशन थेरेपी को माना जाता है, क्योंकि यह सीधे रोगी के फेफड़ों में पहुंचकर अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर देता है। टैबलेट और सीरप पेट में जाने के बाद रक्त के माध्यम से फेफड़ों में पहुंचता है। इसके अनेक साइड इफेक्ट भी हो सकते हैं। वहीं, इनहेलेशन थेरेपी टैबलेट्स और सीरप की अपेक्षा कहीं अधिक प्रभावी है।

 प्री मेच्योर बेबी में अधिक अाशंका
  


के फेफड़े को मेच्योर बनाने के लिए गर्भवती को दी जाने वाली स्टेरॉयड दवाएं हैं।  अस्थमा (दमा) अनुवांशिक बीमारी है। साथ ही यह बचपन से ही उभरती है। ऐसे में हमें जेनेटिक रिस्क फैक्टर को कम करने पर फोकस करना पड़ेगा। उन्होंने बताया कि वर्तमान में महिलाओं में पेन लेस डिलीवरी का चलन बढ़ा है। खासकर, निजी अस्पताल 60 फीसद तक डिलीवरी सिजेरियन कर रहे हैं। ऐसे में गर्भवती को स्टेरॉयड का डोज देकर प्री-मेच्योर बेबी का फेफड़ा मेच्योर किया जाता है। कारण, बच्चे के जन्म वक्त उसका फेफड़ा ही पहले एक्टिव होता है। ऐसे में गर्भ के दौरान दी जाने वाली स्टेरॉयड की डोज बच्चों के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालती हैं। हाल में हुई स्टडी में पाया गया कि सिजेरियन डिलीवरी से होने वाले बच्चों में अस्थमा का प्रकोप अधिक पाया गया है। ऐसे में महिलाओं को नॉर्मल व फुल टर्म डिलीवरी पर फोकस करना होगा। वहीं चिकित्सक इमरजेंसी पड़ने पर ही सिजेरियन का विकल्प चुनें।

सांस लेने में हर परेशानी अस्थमा नहीं

 सांस की हर तकलीफ दमा नहीं होती है। ऐसे में डॉक्टरों को डायग्नोसिस पर फोकस करना होगा। बेवजह मरीजों पर एंटीबायोटिक व स्टेरॉयड का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। देखने में आया कि सीओपीडी, इंटस्टीसियल लंग डिजीज को कई चिकित्सक अस्थमा समझकर दवाएं चला देते हैं।


बरतें सावधानी
-घर में धूल व नमी न रहने दें।
-बारिश में भीगने से बचें।
-ठंड से बचाव करें। 
-धूल, धुआं आदि से एलर्जी के बचाव के लिए मुंह पर मास्क या रूमाल लगा लें।
-खान-पान पर नियंत्रण रखें। खाना धीरे-धीरे चबाकर खाएं।
-गरम मसाला, लाल मिर्च, अचार, चाय, कॉफी आदि का सेवन सीमित मात्र में करें।
-प्राणायाम नियमित करें।
-अटैक पड़ने पर डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाओं का सेवन करें। सीधे बैठ जाएं, लेटे नहीं। कपड़ों को ढीला कर लें। शांत रहने का प्रयास करें।

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018

एम्स में रिटायरमेंट अायु 65 तो पीजीआई में 70 क्यों- फैकल्टी फोरम



एम्स  में रिटायरमेंट अायु 65 तो पीजीआई में 70 क्यों- फैकल्टी फोरम

रिटारमेंट अायु बढाने के मामले पर एक मंच पर अाए पीजीआई और मेडिकल विवि के डाक्टर
एक प्रोफेसर की सेलरी में अाएंगे तीन असिस्टेंट प्रोफेसर होगा तीन गुना काम


संजय गांधी पीजीआई और मेडिकल विवि के डाक्टर रिटारमेंट की उम्र बढाए जाने के मामले पर एक मंच पर अा गए है। शुक्रवार को संस्थान के फैकल्टी फोरम की अाम सभा में मेडिकल विवि के टीचर एसोसिएशन का सचिव डा. संतोष कुमार. डा.हरिराम भी पहुंचे। अाम सभा संस्थान के 150 से अधिक डाक्टरों ने रिटारमेंट की उम्र बढाए पर विरोध जताया। सभा के प्रेस वार्ता में फैकल्टी फोरम के अधयक्ष प्रो. अशोक कुमार एवं सचिव प्रो.एसएस अंसारी, सदस्य डा.अमिताभ अार्या और मेडिकल विवि के पदाधिकारियो ने कहा कि संस्थान में एम्स दिल्ली के रूल लागू होते है। एम्स दिल्ली में फैकल्टी की रिटायरमेंट 65 साल ही है जब वहां पर 70 साल नहीं है तो यहां कैसे कर सकते हैं। एम्स के नियम पीजीआई में लागू होगा एेसा संस्थान के 1989 के एक्ट में लिखा है। रिटारमेंट अायु बढाए जाने से पांच साल के लिए नए डाक्टर की तैनाती रूक जाएगी। नए डाक्टर ही इमरजेंसी में काम करते हैं। प्रदेश की सबसे बडी समस्या इमरजेंसी में इलाज मिलना है। कहा कि एक प्रोफेसर की सेलरी लगभग तीन लाख है इतने सेलनी में तीन असिस्टेंट प्रोफेसर संस्थान को मिलेंगे जिससे तीन गुना अधिक काम होगा। प्रो. अशोक ने कहा कि नए डाक्टर शोध में रूचि रखते है उनके पास नए अाइडिया होता है। किसी भी संस्थान में शोध का एक खास बजट होता है । रिटारमेंट अायु बढाए जाने से बजट कम होता है। लाभ लेने के लिए संस्थान के चार संकाय सदस्य यह तथ्य दे रहे है कि डाक्टर अधिक संख्या में जा रहे है और कम अा रहे है यह लगत है। संस्थान से इस साल तीन डाक्टर रिटार होने वाले है तो  70 नए डाक्टर अा रहे हैं।

मुख्य सचिव से मिला फैकल्टी फोरम

संजय गांधी पीजीआई के फैकल्टी फोरम के पदाधिकारियों ने मुख्य सचिव राजीव कुमार से मुलाकाता कर रिटारमेंट अायु बढाए जाने के प्रस्ताव के वस्तु स्थित के बारे में जानकारी दे कर इसका विरोध  किया। कहा कि कुछ मंत्री और विधायकों को जरिए लाभ लेने वाले लोग गलत तथ्य देकर पत्र लिखवा रहे हैं। कहा कि हम लोग अब मुख्यमंत्री . चिकित्सा शिक्षा मंत्री और राज्यपाल से मिल कर रिटारमेंट की अायु बढाने का विरोध करेंगे। 

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

पीजीआई संकाय सदस्यों का रिटायरमेंट 65 से बढ़ाकर 70 साल करने की तैयारी-फैकल्टी फोरम ने जताया एतराज

पीजीआई संकाय सदस्यों का रिटायरमेंट 65 से बढ़ाकर 70 साल करने की तैयारी



फैकल्टी फोरम ने  जताया एतराज
पुर्ननियुक्त के डॉक्टरों को नए मेडिकल कॉलेजों में तैनाती की मांग


संजय गांधी पीजीआई में संकाय सदस्यों की रिटारमेंट की  उम्र 65 से बढ़ाकर 70 साल किए जाने की सुगबुगाहट से बखेड़ा खड़ा हो गया है। संस्थान के संकाय सदस्यों के एक गुट ( जूनियर संकाय सदस्य)
 ने इसका विरोध शुरू कर दिया है।  डॉक्टरों का कहना पुर्ननियुक्ति की नई नीति बनाई जानी चाहिए। पुर्ननियुक्ति के बाद डॉक्टरों की तैनाती दूसरे मेडिकल कॉलेज में की जानी चाहिए। इससे दूसरे मेडिकल कॉलेज में विशेषज्ञों की कमी का संकट भी दूर होगा। इनकी विशेषज्ञता का लाभ दूर -दराज  इलाकों में लोगों को मिलेगा। संस्थान में वैसे भी संकाय सदस्यों की कमी नहीं है । 
पीजीआई में करीब 1000 बेड हैं। ज्यादातर बेड भरे रहते हैं। 225 से ज्यादा डॉक्टरों की फौज है। 500 से ज्यादा सीनियर रेजीडेंट हैं। ओपीडी में ढाई हजार से ज्यादा मरीज रोज आ रहे हैं। संस्थान में डॉक्टरों की फौज है। इसके बावजूद डॉक्टरों की रिटारमेंट की उम्र बढ़ाने की तैयारी है। इसको लेकर डॉक्टरों में जबरदस्त गुस्सा है। डॉक्टरों का कहना है कि रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाना गलत है। इससे नए डॉक्टरों को नौकरी मिलने की उम्मीद कम हो जाएगी। वहीं उम्र अधिक होने की वजह से वह मरीजों की भरपूर सेवा भी नहीं कर पाते हैं। जबकि नई उम्र के डॉक्टर की भर्ती से मरीजों को फायदे हैं। नई उर्जा से डॉक्टर मरीजों की सेवा करते हैं।

पुर्ननियुक्ति डॉक्टरों की तैनाती हो दूसरे संस्थान में
पीजीआई डॉक्टरों का कहना है कि तमाम चिकित्सक रिटायरमेंट के बाद जोर-जुगाड़ के बूते पुर्ननियुक्ति हासिल कर रहे हैं। ऐसे डॉक्टरों का मकसद सिर्फ पीजीआई में बने रहने का है। सरकारी आवास समेत दूसरी सुविधाओं का लाभ भी पा जाते हैं। मोटी रकम भी मिलती है। आरोप हैं कि पुर्ननियुक्त डॉक्टर के साथ विभाग के जूनियरों को काम करने की खासी अड़चन झेलनी पड़ रही है। काम कम अडंगेबाजी अधिक हो रही है। पीजीआई फैकल्टी फोरम के सचिव व यूरोलॉजी विभाग के प्रो. एमएस अंसारी बताते हैं कि एक उम्र के बाद इंसान की सोचने और कार्य करने की क्षमता कम हो जाती है। साथ ही जनरेशन गैप बढ़ता है। ऐसे में सुपर स्पेशयलिटी संस्थान के सीनियर डॉक्टरों को सेवा विस्तार देने के बजाए उन्हें रिटायर करना बेहतर होगा।

बुधवार, 11 अप्रैल 2018

जापानी इंसेफेलाइिटस से बचा सकती है गाय

गाय जेई से करेगी बचाव


एक्यूट इंसेफेलाइिटस के इलाज से पहले कारण की जांच है जरूरी 


जागरणसंवाददाता। लखनऊ

गौ सेवा से अाप अपने और अपने परिवार को जपानी इंसेफेलाइिटस से बचा सकते हैं। देखा गया है कि जहां पर गाय की संख्या अधिक होती है वहां पर जेई का प्रकोप कम होता है। संजय गांधी पीजीआई में अायोजित एडवांस पिडियाट्रिक केयर पर अायोजत वर्कशाप में न्यूरोलाजी विभाग के प्रमुख प्रो.सुनील प्रधान ने सलाह दिया कि गाय पालन को बढावा देकर काफी हद तक जेई के प्रकोप को कम कर सकता है। मच्छर पहले गाय को काटता है लेकिन गाय में जेई का वायरस नहीं होता है इसलिए मच्छर जब मनुष्य को काटता है तो उसमें जेई वायरस नहीं जाता है। जेई वायरस सूअर में रहता है जिससे मच्छर के जरिए मनुष्य में पहुंचता है।  सूअर पालन अाबादी से दूर होना चाहिए । प्रो. प्रधान ने कहा कि जेई से बचाव के लिए मच्छर दानी के इस्तेमाल को बढावा देने के साथ ही लोगों को जागरूक करने की जरूरत है। विभाग के प्रो. संजीव झा, प्रो.वीके पालीवाल और प्रो.विनीता ने बताया कि एक्यूट इंसेफेलाइटिस के लक्षण वाले बच्चों का इलाज शुरू करने से पहले कारण का पता करना जरूरी है। जांच की सुविधा हर जिले में होनी चाहिए। इंसेफेलाइिटस वायरस के अलावा बैक्टीरिया से होते है। बैक्टीरिया के कारण होने वाले इंसेफेलाइटिस एंटीबायोटिक से काफी हद तक ठीक हो जाते है। वायरल इंसेफेलाइिटस से बचने के बाद बच्चों में विकलांगता अा जाती है जिसमें मांस पेशियों में कडा पन, कंपन सहित कई परेशानी को दवा और एक्सरसाइज से काफी हद तक अाराम दिलाया जा सकता है।

पेशेंट सेफ्टी के मानको का हो पालन

 प्रो. राजेश हर्ष वर्धन ने कहा कि अस्पताल में सामान्य इलाज या आईसीयू में अाने वाले मरीजों के लिए पेशेंट सेफ्टी के मानको का इस्तेमाल 66  फीसदी अस्पतालों में मानक के अनुरूप नहीं हो रहा है। कहा कि पेशेंट सेफ्टी में संक्रमण की रोक -थाम, अनजाने में गलत इलाज सहित कई मानक हैं।   

50 फीसदी में होता है बैक्टीरिया इंसेफेलाइिटस

विशेषज्ञों ने कहा कि एक्यूट इंसेफेलाइिस कई कारण से होता है। जेई के अलावा वेस्टनाइल वायरस, चांदीपुरा वायरस, नीफा वायरस भी इंसेफेलाइिटस का कारण होता है। इसके अलावा टीबी, स्क्रब टाइफी, लेप्टोस्पाइjरेसिस सहित अन्य बैक्टीरिया भी जिम्मेदार होते है। देखा गया है कि 30 फीसदी लोगों में स्क्रब टाइफी कारण साबित हो रहा है जिसमें केवल डाक्सी साइक्लीन से मरीज ठीक हो जाता है। देखा गया है कि 50 फीसदी लोगों में इंसेफेलाइिटस का कारण बैक्टीरिया होता है। विशेषज्ञों ने कहा कि इलाज की प्रक्रिया में मरीज की तीमारदार को भी शामिल करें । 

मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

केवल नाम के है प्रदेश के 66 फीसदी अाईसीयू



 केवल नाम के है प्रदेश के 66 फीसदी अाईसीयू


मानको का नहीं हो रहा है पालन

मानक का पालन न होने के कारण इंफेक्शन ग्रस्त बना रहे है यह आईसीयू

जागरण संवाददाता। लखनऊ   


प्रदेश के 66 फीसदी अाईसीयू केवल नाम के है। बेड लगा है, वेंटीलेटर लगा है लेकिन न उसे चलाने वाले प्रशिक्षित लोग है और न ही मानको का पालन हो रहा है। यह आईसीयू लोगों को और बीमार बना रहे हैं। संजय गांधी पीजीआई के अस्पताल प्रशासन विभाग के प्रो. राजेश हर्षवर्धन और उनकी टीम ने अाईसीयू के 156 तय मानकों को अाधार पर 36 जिलों के सरकारी अाईसीयू पर शोध करने के बाद इस तथ्य का खुलासा किया है। प्रो. राजेश ने इस हकीकत से प्रदेश सरकार को भी रू-ब-रू करा दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अाईसीयू के एक बेड पर चार नर्सेज की तौनाती होनी चाहिए। राउंड द क्लाक डाक्टर होना चाहिए। अाईसीयू में संक्रमण की स्थित को कंट्रोल करने के लिए एयर सैंपलिंग सहित कई मानक है जिसको पूरा करके ही अच्छा अाईसीयू तैयार किया जा सकता है। बताया कि हास्पिटल एक्वायर्ड इंफेक्शन की दर 0.8 से 8 फीसदी के बीच ही होना चाहिए लेकिन देखा कि यह दर 35 फीसदी से ऊपर है यानि अाईसीयू भी लोगों को बीमार बना रहा है। संस्थान में अायोजित एडवांस पिडियाट्रिक केयर वर्कशाप में बताया कि सरकार ने अाईसीयू में सुधार के लिए काम करना शुरू कर दिया जिसमें ट्रेनिंग एक मुख्य मुद्दा था जो शुरू हो चुका है । 

सीपीआऱ से बच सकती है 50 सकती है जान
संस्थान के निश्चेतना विभाग के प्रो. अऩिल अग्रवाल एवं प्रो. संजय धीराज ने बाल रोग विशेषज्ञों को प्रशिक्षण में बताया कि  सही कार्डियो पल्मोनरी रीसक्सऩ(सीपीअाऱ) से हदय के काम न करने पर भी 50 फीसदी लोगों के दिल को दोबारा कार्य लिया जा सकता है। सीपीअाऱ के तीन लोगों की टीम होनी चाहिए जिसमें एक सांस दे, दूसरा चेस्ट को कंप्रेश करें और तीसरा व्यक्ति डी फ्रेबीलेटर से शांक दे । कहा कि दिल के काम न करने पर 80 फीसदी लोगों को सीपीआऱ नहीं मिलता है इनमें से 80 फीसदी लोगों को घर में दिल का दौरा पड़ता है इसलिए घर वालों को भी सीपीआर अाना चाहिए।  

सोमवार, 9 अप्रैल 2018

बच्चों का जीवन देने के लिए तैयार हो रहे हैं जीवन दूत



बच्चों का जीवन देने के लिए तैयार हो रहे हैं जीवन दूत





पिडियाट्रिक आईसीयू के लिए पीजीआई तैयार करेगा विशेषज्ञ

सरकार ने सौंपा जिम्मा पहले बैच की ट्रेनिंग शुरू

गोरखपुर मेडिकल कालेज में बच्चों की मौत पर पीजीआई कमेटी के प्रस्ताव पर शुरू हुअा ट्रेनिंग 
जागरणसंवाददाता। लखनऊ
पूर्वाचंल के बच्चों को बचाने के लिए प्रदेश सरकार ने जीवन दूत तैयार करने का सिलसिला शुरू कर दिया है। जिलों में तैनात बाल रोग विशेषज्ञों को इलाज की नई तकनीक , बच्चों को बिगड़ती स्थित को नियंत्रित करने सहित कई जानकारी से लैस करने के लिए एडवांस पिडियाट्रिक केयर कोर्स शुरू किया है। इन्हे ट्रेंड का करने का जिम्मा संजय गांधी पीजीआई को सौंपा गया। इसी सिलसिले में पहला कोर्स शुरू हुअा जिसमें बच्चों में पेट की बीमारी सहित कई जनाकारी दी गयी। कोर्स को अायोजक संस्थान के अस्पताल प्रशासन विभाग के प्रो. राजेश हर्ष वर्धन ने बताया कि गोरखपुर मेडिकल कालेज में बच्चों की मौत होने पर सरकार ने एक कमेटी का गठन किया था जो वहां जाकर स्थित का अकलान कर सरकार को रिपोर्ट दी थी जिसमें प्रशिक्षण शामिल था। सरकार ने इस प्रस्ताव को मान कर हमें ट्रेंड करने का जिम्मा सौंपा जिसमें पूर्वाचल के जिलों में तौनात 48 बाल रोग विशेषज्ञों को चरण बद्ध तरीके से  पिडियाट्रिक आईसीयू ट्रेंड करना है ।  प्रो. हर्ष वर्धन ने बताया कि हमने देखा था कि  33 फीसदी अस्पताल में संसाधन है लेकिन जानकारी के अभाव में  उसका पूरा इस्तेमाल नहीं हो रहा है। इस प्रशिक्षण से संसाधन का पूरा इस्तेमाल संभव होगा। 33 फीसदी अस्पताल में संसाधन नहीं है जिसे पूरा सरकार को करना है। बाकी में मानीटरिंग की जरूरत है। ट्रेंड करने के लिए संस्थान बाल पेट रोग विशेषज्ञ, बाल सर्जन, न्यूरोलाजिस्ट, सीसीएम सहित कई विभाग के 15 विशेषज्ञों की टीम है जो कई पहलुअों पर जानकारी देगी। 


50 फीसदी लिवर फेल्योर से ग्रस्त बच्चे बिना इलाज अाते है पीजीआई
 
संस्थान के पिडियाट्रिक गैस्ट्रो इंट्रोलाजिस्ट प्रो. मोनिक सेन शर्मा ने बताया कि लेविर फेल्योर या पीलिया युक्त बच्चों को हायर सेंटर भेजने से पहले उन्हें ग्लूकोज देकर, सोयिडम की कमी पूरा कर, दौरा पडने से रोकने की दवा देने के साथ ही प्राइमरी ट्रीटमेंट देकर भेजना चाहिए लेकिन जानकारी के अाभाव में 50 फीसदी बच्चे बिना प्राइमरी ट्रीटमेंट के भेज दिए जाते है। 250 किमी दूर से अाने वाले बच्चे के पर्चे में बीमारी ग्रेड वन लिखी होती है लेकिन यहां अाते-अाते ग्रेड फोर की स्थित में अा जाती है। इसी तरह बिना दर्द अधिक मात्रा में खून की उल्टी होने पर बच्चे के पोर्टव वेन में रक्त स्राव की परेशानी की अाशंका रहती है एेसे बच्चों को हायर सेंटर भेजने से पहले अाक्ट्रिटाइड दवा देकर भेजना चाहिए। इसी तरह एक्यूट पैक्रिएटाइिटस होने पर फ्लूड चला कर भेजना चाहिए। बाल रोग विशेषज्ञ डा. पियाली भट्टाचार्य ने बताया कि बच्चे की अावाज और शक्ल से ही काफी हद तक बच्चे की स्थित का अनुमान लग जाता है। कहा कि बच्चे की स्थिति का मूल्याकन करने के साथ ही ट्रीटमेंट प्लान तय करना चाहिए इसे ट्राइएजिंग कहते है। नियोनेटल यूनिट के प्रमुख प्रो. गिऱीश गुप्ता ने कहा कि बच्चे  के परिजनों को बीमारी की स्थित के बार में सहानभूति पूर्वक विस्तार से बताएं।    

मंगलवार, 3 अप्रैल 2018

खुद कैंसर से जंग जीत 86 की उम्र में बढा है कैंसर ग्रस्त का हौसला



खुद कैंसर से जंग जीत 86 की उम्र में बढा है कैंसर ग्रस्त का  हौसला

जज्बे के लिए राज्यपाल ने किया अाज सम्मानित


कुमार संजय। लखनऊ

खुद कैंसर पर विजय हासिल करने के बाद रोज अाठ से दस लोगों को कैंसर से निपटने का हौसला बढा रहे हैं। यह है 86 वर्षीय डा. वाई सी अग्रवाल जो जेके कैंसर इंस्टीट्यूट 1990 से रिटायर हैं। इनके जज्बे को देखते हुए राज्यपाल श्री राम नाइक ने  इन्हें सोमवार को  सम्मानित किया। डा. अग्रवाल के मुताबिक 2005 में उन्हें रेक्टम कैंसर ( मल द्वार ) हुअा जांच करायी तो पता चला कि कैंसर लिवर तक फैल चुका है। दूसरे डाक्टर ने भी बताया कि जिंदगी 6 महीने है लेकिन हिम्मत न हारते हुए संजय गांधी पीजीआई के गैस्ट्रो सर्जरी विभाग में सलाह लिया जहां पर जांच के बाद रेक्टम कैंसर की सर्जरी की गयी । सर्जरी के पाच दिन बाद ही अस्पताल से छुट्टी मिल गयी। कैंसर लिवर में भी इसमें सर्जरी संभव नहीं थी इस लिए विशेषज्ञों ने इसके लिए रेडियोथिरेपी की सलाह दी। डा. अग्रवाल ने तीन रेडियोथिरेपी करायी जिसके बाद वह बिल्कुल फिट है। कैंसर से पहले भी सेवा कर रहे थे कैंसर से  उबरने के बाद भी   लखनऊ में भी एक कैंसर सेंटर पर वह  मरीजों की सेवा में लगे हैं।  यहां पर रोज कैंसर के साथ अाने वाले मरीजों की काउंसलिंग कर उनका मनोबल बढ़ाते है जिससे तमाम मरीज कैंसर से जंग जीत भी रहे हैं। डा. अग्रवाल कहते है कि जिंदगी मे उतार -चढाव अाता रहता है बस हिम्मत के साथ मुकाबला करने की जरूरत है। 

लडकियों की शिक्षित बनाने के पक्षधर रहे है डा. अग्रवाल

डा. अग्रवाल की तीन लड़किया है। इन्होंने तीनो लड़कियों को अच्छी शिक्षा दी जिसकी देन है कि इनकी एक लड़की डाक्टर, एक सीए और एक लड़की अार्टीटेक्ट हैं। डा. अग्रवाल कहते है कि लड़के और लड़की में कोई अंतर नही है यह सोच तभी विकिसत होगी जब लोगों के पास शिक्षा होगी।  

रविवार, 1 अप्रैल 2018

वाफ्ट ने अासान कर दिया फेस्चुला का इलाज --- 30 से 40 फीसदी लोगों में दोबारा फेस्चुला की अाशंका

वाफ्ट ने अासान कर दिया फेस्चुला का इलाज

 30 से 40 फीसदी लोगों में दोबारा फेस्चुला की अाशंका


 जागरणसंवाददाता। लखनऊ
वीडियो अस्टिटेड फेस्चुला सर्जरी टेक्नीक ( वाफ्ट) तकनीक से फेस्चुला ( भंगंदर) का इलाज काफी हद तक अासान हो गया है। इस तकनीक में दूरबीन से मल द्वार के अंदर जाकर जहां छेद होता है इस रास्ते को साफ कर बंद करते हैं। इससे कितने कहां छेद है इसका पता भी पता काफी हद कर लग जाता है। इस तकनीक का सजीव प्रदर्शन शुक्रवार को संजय गांधी पीजीआई में गैस्ट्रो सर्जरी वीक में किया गया। संस्थान के गैस्ट्रो सर्जन प्रो. अशोक कुमारप्रो. अशोक कुमार दितीय और प्रो. सुप्रिया शर्मा ने बताया कि फेस्चुला में एक बार सर्जरी होने के बाद भी 30 से 40 फीसदी लोगों में दोबारा होने की अाशंका रहती है इसलिए इन लोगों को लगातार फालोइप पर रहना चाहिए। विशेषज्ञों ने बताया कि फेस्चुला की सर्जरी से पहले कहां पर किस स्थित में फेस्चुला इनकी एनाटमी जानना बहुत जरूरी है जिसके लिए एमअारअाई,  इंडो रेक्टल अंट्रासाउंड  कराना चाहिए। अंदाजे से सर्जरी करने पर मल पर नियंत्रण रखने वाले स्फिंटर क्षति ग्रस्त हो जाता है जिसके कारण नियंत्रण खत्म हो जाता है । यह स्थित काफी परेशानी वाली होती है। 

हाई ग्रेड फेस्चुला का इलाज कठिन

संस्थान के गैस्ट्रो सर्जन प्रो. अशोक कुमार द्तीय ने बताया कि फेस्चुला दो तरह का होता है। लो फेस्चुला में मल द्वार के अलावा अन्य छेद या रास्ता डेंटट लाइन के नीचे रहता है जिसमें सर्जरी अासान होती है लेकिन हाई फेस्चुला में डेंटड लाइन के ऊपर छेद होने पर सर्जरी में काफी सावधानी बरतनी होती है। सर्जरी के बाद घाव को अाराम नहीं मिलता क्योंकि मल त्याग करना ही होता है। एेसे में इंफेक्शन की अाशंका रहती है ।


लैट्रिन को कभी न रोकें
प्रो. अशोक कुमार द्तीय ने बताया कि जब लैट्रिन लगे तुरंत त्याग करना चाहिए कई बार लोग रोक लेते है जिसके कारण मद द्वार के अास -पास स्थित ग्लैंड में सूजन और इंफेक्शन के कारण छेद हो जाता है। इसके अलावा यह भी कारण साबित होता है 
गुदामार्ग के पास फोड़े होना
गुदामार्ग का अस्वच्छ रहना।
-पुरानी कव्ज।
-बैक्टीरियल इन्फेक्शन के कारण।
-एनोरेक्टल कैंसर से।
-गुदा में खुजली होने या किसी और कारण से गुदा में घाव का हो जाना।
-ज्यादा समय तक किसी सख्त या ठंडी जगह पर बैठना।
-इसके अलावा यह रोग बूढ़े लोगो में गुदा में रक्तप्रवाह के घटने से हो सकता हैं।
  

यह परेशानी तो कराएं जांच 
-बार-बार गुदा के पास फोड़े का निर्माण होता
-मवाद का स्राव होना
-मल त्याग करते समय दर्द होना
-मलद्वार से खून का स्राव होना
-मलद्वार के आसपास जलन होना
-मलद्वार के आसपास सूजन
-मलद्वार के आसपास दर्द
-खूनी या दुर्गंधयुक्त स्राव निकलना
-थकान महसूस होना
-इन्फेक्शन (संक्रमण) के कारण बुखार होना और ठंड लगना

बचने के लिए कब्ज से बचें

बचाव के लिए  मलत्याग करते समय ज़ोर लगाने से बचनाकब्ज़ तथा डायरिया से बचें।  उच्च रेशेदार भोजन तथा पर्याप्त तरल को पीना या रेशेदार पूरकों को लेना तथा पर्याप्त व्यायाम करें। मल त्याग   के प्रयास में कम समय खर्च करना।  शौच के समय कुछ पढ़ने से बचें।  अधिक वज़न वाले लोगों के लिए वजन कम करें। 

पीजीआई तैयार कर रहा है विशेषज्ञ 

प्रो. अशोक कुमार ने बताया कि संस्थान में गैस्ट्रो सर्जरी के जटिल मामलों के काफी लोड पहले से हैं। इसी लिए गोरखपुर,बरेलीप्रतापगढ़ सीतापुर जैसे प्रदेश के जिलों के सर्जन को फेस्चुलापाइल्स की सर्जरी के लिए ट्रेनिंग दे रहे है इससे लोगों को अपने घर के पास सर्जरी की अच्छी सुविधा मिलेगी। हम लोग पाइल्स की सर्जरी अभी कर रहे है लेकिन फेस्चुला की केवल जटिल सर्जरी ही कर रहे हैं। 



गुरुवार, 22 मार्च 2018

20 फीसदी टीबी के मरीजों बैक्टीरिया पर बेअसर साबित हो रही दवाएं

20 फीसदी टीबी के मरीजों बैक्टीरिया पर बेअसर साबित हो रही दवाएं

एक साल में दो हजार मरीजों में  जांच के बाद सामने अाय तथ्य

जीन एक्सपर्ट जांच से सात घंटे में चल जाता है एमडीआऱ का पता  



जागरणसंवाददाता। लखनऊ

सही मात्रा सही समय तक टीबी की दवा न खाने के कारण 20 फीसदी लोगों में टीबी की दवाअों के खिलाफ प्रतिरोध पैदा हो गया है। यह टीबी के मरीज खुद के साथ दूसरो को भी प्रतिरोध टीबी के शिकार बना रहे हैं। प्रतिरोध वाले मरीजों को एमडीअार टीबी डाक्टरी भाषा में कहा जाता है। इस तथ्य का खुलासा संजय गांधी पीजीआई में विश्व टीबी दिवस ( 24 मार्च) के मौके पर अायोजित सीएमई में विशेषज्ञों ने दी। संस्थान के माइक्रोबायोलोजी विभाग की प्रो.रिचा मिश्रा ने बताया कि एमडीआर पता करने के नई तकनीक जीन एक्सपर्ट तकनीक हमारे विभाग में स्थापित है। साल भर में दो हजार मरीजों के बलगम को लेकर परीक्षण किया तो देखा बीस फीसदी में रिफाम्पशीन दवा के खिलाफ प्रतिरोध था यानि यह दवा इनमें काम नहीं कर रही थी। नई तकनीक से सात घंटे में हम जांच कर रिपोर्ट दे रहे हैं।  बताया कि टीबी की पुष्टि के लिए अाज भी चेस्ट एक्स-रे, बलगम स्मेयर और कल्चर है। हम लोग लाइन प्रोसेसस एेसे तकनीक भी स्थापित कर रहे है जिससे बाकी टीबी के खिलाफ भी प्रतिरोध का पता लगाना संभव हो गया है। संस्थान के पल्मोनरी मेडिसिन के प्रमुख प्रो.अालोक नाथ ने बताया कि जांच तकनीक के कारण एमडीअार टीबी के मामले तेजी से सामने अा रहे है । इनमें दवा 12 से 24 महीने तक देनी पड़ती है। बताया कि सबसे अधिक 20 से 50 अायु वर्ग के लोग टीबी के शिकार है। संस्थान के निदेशक प्रो.राकेश कपूर ने कहा कि टीबी को 2025 तक खत्म करने के लिए प्रधानमंत्री ने लक्ष्य तय किया है । इस लक्ष्य को पाने के लिए नीचे के स्तर पर काम करना होगा। शऱीर के किसी भी अंग में टीबी हो सकता है।      


बच्चों में टीबी पता करने के लिए पेट से लिया जाता है पानी

प्रो. अालोक नाथ ने बताया कि बच्चों में टीबी का पता लगना थोडा कठिन होता है क्यों कि बच्चे बलगम थूक नहीं पाते । बलगम को निगल लेते है एेसे स्थित में हम लोग इंडोस्कोप पेट से पानी लेकर उसमें टीबी की जांच करते हैं। बताया कि टीबी का टीका करण 0 से 80 फीसदी तक ही कारगर साबित हो रहा है। अब एेसे टीके की जरूरत है जो पूरी तरह बचाव कर सके।  टीबी को खत्म करने के लिए जिस एरिया में टीबी की अधिक अाशंका है उस स्थान का पता लगा कर लोगों की जांच कर टीबी का इलाज करने की जरूरत है। मैन पावर बढा कर की टीबी को खत्म किया जा सकता है। लैब और क्लीनीशियन दोनों में बैलेंस बनाने की जरूरत है। 

15 फीसदी नहीं लेते सही दवा

संजय गांधी पीजीआई के पल्मोनरी मेडिसिन के प्रो. जिया हाशिम ने कहा कि 10 से 20 फीसदी लोग शरीर के भार के अनुसार सही मात्रा में दवा नहीं खाते। सही समय तक दवा नहीं खाते बीच में छोड़ देते हैं। कई बार दवा की गुणवत्ता कम होती है तो कई बार जितनी दवा बतायी गयी उतनी नहीं खाते एक दवा या दो दवा कम कर देते है जिसके कारण टीबी के मामले खराब हो रहे हैं। इस लिए सही मात्रा में सही समय तक सही दवा लेकर टीबी के मुक्ति मिल जाती है।  
देखा गया है कि नए टीबी के तीन फीसदी मामलों में एमडीआर मिल रहा है यानि एमडीअार वाले मरीजों से इन्हे टीबी का इंफेक्शन हो रहा है। प्रो. हाशिम ने कहा कि टीबी की दवा खा रहे 5 से 10 फीसदी मरीजों में लिवर फंक्शन बिगड़ जाता है जिसके कारण लिवर फंक्शन प्रोफाइल की जांच गड़बड़ आती है जिसे हम लोग ठीक कर लेते हैं। इस लिए मरीजों को लगाातार फालोअप पर रहना चाहिए।    

पीजीआई ने निकाला बंगलादेशी का ग्लैंड और थम गया पारा

पीजीआई ने निकाला बंगलादेशी का ग्लैंड और थम गया पारा

इंडो क्राइन ग्लैंड ट्यूमर की परेशानी से जूझ रहे थे समसुद 


ढाका के रहने वाले 43 वर्षीय मुहम्द समसुद जमन मिया का ब्लड प्रेशर तमाम दवाअों के बाद तीन सौ से ऊपर रहता था यह तो गनीमत थी कि बढे पारे की वजह से कोई और परेशानी नहीं खडी हुई । ढाका में तमाम डाक्टरों  को दिखाय़ा  लेकिन राहत न मिलने पर सिंगापुर में नेशनल यूनिवर्सटी हास्पिटल में सलाह लेने पहुंचे वहां पता चला कि इन्हे फीयोक्रोमोसाइटोमा की परेशानी है जिसमें सर्जरी ही इलाज है। सिंगपुर सर्जरी का खर्च 25 लाख रूपया बताया । इनकी इतनी क्षमता न होने के कारण सिंगपुर के ही सर्जन से भारत में संजय गांधी पीजीआई में सर्जरी कराने की सलाह दी। सिंगपुर के सर्जन से इंडो सर्जन प्रो.अमित अग्रवाल को समसुद की पूरी डिटेल भेजी। प्रो.अमित ने सारी रिपोर्ट देखने के बाद समसुद को 10 मार्च को लखनऊ बुला लिया और 16 मार्च को इनके एड्रिनल ग्लैड की सर्जरी की । आज इन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गयी। प्रो. अमित अग्रवाल ने बताया कि पहले इनका ब्लड प्रेशर कम किया गया इसके बाद लेप्रोस्कोप से सर्जरी की गयी। सर्जरी में इंडो सर्जन सवारत्मन, डा. सुनील मट्टू, डा. रऊफ, एनेस्थेसिया के प्रो. अाशीष कनौजिया के अलावा रंजना, फणीष , दीप्ती शामिल हुए।  

क्या फीयोक्रोमोसाइटोमा 


प्रो.अमित अग्रवाल ने बताया कि गुर्दे के पासका एड्रिनल ग्रंथि होती है। यह ग्रंथि एड्रलीन हारमोन का स्राव करती है जो रक्त दाब को नियंत्रित करने में मदद करती है। एड्रिनल ग्रंथि में ट्यूमर दो तरह के हो स·ते हैं। एक ट्यूमर को फियोक्रोमोसाइटोमा कहते हैं इससे रक्तदाब अनियंत्रित रहता है। 
 इस बीमारी का पता लगाने के लिए एल्डोस्टेरान हारमोन एवं पोटेशियम का परीक्षण कराया जाता है। दोनों की मात्रा में वृद्घि से बीमारी की पुष्टि होती है। यह बीमारी पोटेशियम की मात्रा मिलने से कुछ हद तक ठी· हो जाती है लेकिन बीमारी का पूर्ण इलाज सर्जरी है। उच्च रक्त दाब नियंत्रित न होने पर फियोक्रोमोसाइटोमा ट्यूमर का परीक्षण किया जाता है। 



निजि अस्पताल से भी अच्छा है पीजीआई 



समसुद का कहना है कि पीजीआई के सुविधा किसी कारपोरेट अस्पताल से कम नहीं है अाने -जाने और सर्जरी तक में कुल एक लाख के अास -पास खर्च हुअा जबकि यही इलाज सिंगपुर में 25  लाख तक बताया जा रहा था। 

मंगलवार, 20 मार्च 2018

सामान्य बच्चों से भी आगे है यह स्पेशल चाइल्ड... साहिल


सामान्य बच्चों से भी आगे है यह स्पेशल चाइल्ड... साहिल







साहिल दे रहे है योगा का ज्ञान आगे बनेंगे योगा टीचर

कुमार संजय। विनय तिवारी 

 यदि आप का बच्चा डाउन सिंड्रोम( मानसिक रूप से कमजोर) का शिकार है तो हार मान कर बैठने की जरूरत नहीं है। आप सभी लोग साहिल सिंह के परिजनों से सीख लें सकते है। साहिल भी डाउन सिंड्रोम के शिकार है लेकिन उपबल्धियों की लिस्ट इतनी लंबी है कि सामान्य बच्चा भी इनकी बराबरी नहीं कर सकता है। आज विश्व डाउन सिंड्रोम जागरूरकता दिवस है ऐसे मौके पर साहिल तमाम उन बच्चों के परिजनों के लिए उम्मीद की किरण साबित हो सकता है जो हार मान कर बच्चों को घर में बैठौ दिए हैं। साहिल सिंह के पिता प्रो. रजनीश कुमार सिंह और माता डा. भवना सिंह की मेहनत का नतीजा है कि आज साहिल एक स्कूल में योगा प्रशिक्षक के रूप में काम कर रहे है आगे योगा के अध्यापक के रूप में तैनाती इसी स्कूल में होने की पूरी संभावना है। साहिल ने एशिया पेस्फिक रीजनल स्पेशल चाइल्ड ओलंपिक में तैराकी में सिलवर मेडल जीता । इस ओलंपित में एक हजार से अधिक बच्चों ने भाग लिया था। लखनऊ मैनेजमेंट एसोसिएशन ने यंग एचीवर का अवार्ड दिया। प्रदेश सरकार ने 2014 में बेस्ट रोल माडल का अवार्ड दिया। इनके अभिभावक कहते है कि आगे अपने पैर में कैसे खडे हो इसके लिए योगा का प्रशिक्षण लिया । योगा शिक्षक राजेश सिंह और कल्पना ने इन्हें प्रशिक्षित किया। अब इसी स्कूल में योगा का प्रशिक्षण दे रहे है। इस तरह स्कूल में तैनाती के बाद यह अपने पैर में खडे हो जाएंगे। इसी तरह हर अभिभावक थोडा हिम्मत से काम लें तो इनका स्पेशल चाइल्ड सामान्य चाइल्ड की तरह सब कुछ कर सकता है। 


डाउन सिंड्रोम ग्रस्त बच्चों के लिए अलग स्कूल क्यो

संजय गांधी पीजीआई के प्रो. रजनीश कुमार सिंह और डा. भवना सिंह कहते है कि डाउन सिंड्रोम ग्रस्त बच्चों के लिए अलग स्कूल की जरूरत नहीं है। सामान्य स्कूल में ही अलग सेक्शन हो जिससे बच्चे हर एक्टीविटी में भाग लें । स्पेशल बच्चे अपने को अलग न समझें। स्टडी हाल स्कूल में ऐसे बच्चों के लिए अलग सेक्शन है जिससे साहिल पढ़ते है। इनके विकास में स्कूल की अहम भूमिका है। 

इन बच्चों को मिले डाटा इंट्री आपरेटर जैसे जांब

यह बच्चे कंप्यूटर चलाने में भी दक्ष हो सकते है साहिल काफी काम कर लेते है । इस लिए ऐसे बच्चों को डाटा इंट्री जैसे जांब संस्थानों को देना चाहिए। पढने के लिए ओपेन स्कूल बेस्ट है क्योंकि इसमें एक या दो विषय की परीक्षा दे कर धीर-धीरे पास किया जा सकता है। साहिल ने हाई स्कूल पास कर लिया है अब इंटर कर रहे हैं।       


क्या है डाउन सिंड्रोम

 डाउन सिंड्रोम एक अनुवांशिकी बीमारी है। इस बीमारी के साथ पैदा होने वाले बच्चे मंद बुद्धि के होते हैं।  यह गुणसूत्रों की खराबी के कारण होती है। बच्चे के ं 21 वें नंबर के गुणसूत्र की 2 कापी होने बजाए तीन कापी हो जाती है। इस बीमारी से ग्रस्त बच्चों की आई क्यू 40 से 60 तक पायी जाती है। चलना, बोलना यह सामान्य बच्चों के मुकाबले देर से शुरू करते हैं।   प्रो.रजनीश कहते है कि जल्दी  बीमारी का पता लगने पर स्टीमुलेशन थिरेपी देने से बच्चों के दिमाग विकसित होता है और मासपेशियां म जबूत  हो जाती है जिससे बच्चा  सामान्य तरह से जीवन जीता है।  





कैसे लगता है बीमारी का पता

शिशु में डाउन सिंड्रोम का पता लगाने के लिए ट्रिपल टेस्ट पाजिटिव आने के बाद अमीनीयोसेंटेसिस परीक्षण किया जाता है। इसमें गर्भ से पानी निकाल कर उसमें 21 वें गुणसूत्र की खराबी को केरिओटाइपिंग परीक्षण के जरिए देखा जाता है। गर्भ 18 से 19 हफ्ते का भी है तो फिश तकनीक से बीमारी का पता लग जाता है। इस परीक्षण से मां एवं गर्भस्थ शिशु पर कोई कुप्रभाव नहीं पड़ता है। संस्थान में इस परीक्षण की कीमत पांच हजार रूपया है। 





यह जरूर ले अनुवांशिकी विशेषज्ञ से सलाह

- उम्र 35 से अधिक

-गर्भावस्था के दौरान मधुमेह

- परिवार में जंमजात शारीरिक बनावट में विकृति के अलावा दिल, दिमाग, हाथ पैर, आंख या आंत में बनावटी खराबी

- परिवार में किसी को थैलेसीमिया, हीमोफीलिया, डाउन सिंड्रोम की बीमारी

- परिवार में कोई मंद बुद्धि वाला बच्चा या व्यक्ति

- मृत शिशु का जंम







उम्र के साथ बढ़ती जाती है डाउन सिंड्रोम ग्रस्त बच्चा पैदा होने की आशंका

उम्र जंम लेने वाले बच्चों में से एक में डीएस की आशंका

20 ----  1450

25------ 1305

28 ----1150

35 ----350

38 ----150

40 ----110