शुक्रवार, 9 मार्च 2018

अपनो के लिए खुद का जीवन नही रखता मायने

अपनो के लिए खुद का जीवन नही रखता मायने 


किडनी देकर बचायी इन लोगों ने जिंदगी 

वो जिंदगी से कभी हार नहीं मानती हैं। घर-परिवार से लेकर बाहर तक जिम्मेदारियां हंसकर निभाती हैं। इतना ही नहीं, यदि अपनों की जान पर बन आए तो अपनी जान तक देने को हो जाती हैं तैयार। ऐसी हैं ये वीरांगनाएं। जी हां, इस दौर में भी सीता, सावित्री और गांधारी जैसी महिलाओं की कमी नहीं है जो हर हाल में पति का साथ देने के लिए तैयार रहती हैं। फिर चाहे वह अंगदान ही क्यों न हो। आठ मार्च को मनाए गए वल्र्ड किडनी डे और महिला दिवस के मौके पर ऐसी ही कुछ शक्ति स्वरूपा महिलाओं से रूबरू होने का मौका मिला। ये वो महिलाएं थीं जिन्होंने पति की जान बचाने के लिए अपनी किडनी तक दान कर दी। ऐसे मामलों में पुरुष थोड़ा कतराते हैं, इस बात को कुछ महिलाओं ने स्वीकारा भी। पांच से दस मार्च तक मनाए गए ‘वल्र्ड किडनी डे’ के मौके पर पीजीआइ हॉस्पिटल में बुलाई गईं सक्सेसफुल किडनी डोनर महिलाओं ने संगिनी में साझा किए अपने अनुभव। कुसुम भारती की रिपोर्ट..

पति भी दे सकते हैं किडनी

आजमगढ़ की नीलम त्रिपाठी कहती हैं, मेरी शादी 2001 में हुई थी। पति की दोनों किडनी खराब होने की बात साल 2013 में पता चली। इसके बाद डायलिसिस शुरू हुआ। मेरी ज्वाइंट फैमिली है और जब बात आई पति को किडनी दान करने की तो कोई आगे नहीं आया। जब परिवार के किसी सदस्य ने साथ नहीं दिया तो मैंने अपनी किडनी दान करने का फैसला लिया। यदि मुङो जरूरत पड़ती तो वह भी मुङो किडनी दे सकते थे।

पति अपनी किडनी न देते शायद!

जौनपुर से चेकअप कराने आईं, अनीता देवी कहती हैं, एक अगस्त 2016 में पता चला कि पति की दोनों किडनी खराब हैं। यह सुनकर मैं परेशान हो गई कि अब क्या होगा। उस वक्त पति की पूना में पान की दुकान थी जिससे घर का खर्च चलता था। उनका इलाज कैसे होगा यही सोचकर परेशान थी। पूना में ही उनका डायलिसिस शुरू हो चुका था। मैं किसी भी तरह उनकी जान बचाना चाहती थी। फिर मैंने अपनी किडनी देकर उनकी जान बचाई। परिवार में बारह साल का बेटा और आठ साल की बेटी है। पति के इलाज के लिए सांसद निधि से तीन लाख रुपये और मुख्यमंत्री की ओर से पांच लाख रुपये दिए गए जिससे इलाज हुआ। वह कहती हैं, प}ी हमेशा पति का साथ देने को खड़ी रहती है। यदि यह रोग मुङो होता तो शायद पति कभी अपनी किडनी नहीं देते।

भाई-बहन भी नहीं हुए तैयार

कानपुर की विनीता यादव कहती हैं, 2012 में पति की किडनी खराब हुई थीं। तब से लगातार उनका इलाज चला। पति का लोहे के बुरादे का कारोबार है। किसी तरह कई सालों तक हम इलाज कराते रहे। डायलिसिस कराने से पति को भी कष्ट होता था। बार-बार कष्ट के साथ पैसा भी खर्च हो रहा था। पति के तीन भाई और तीन बहने हैं। मगर, किडनी देने के लिए कोई भी तैयार नहीं हुआ। पर, मैं तो प}ी हूं इसलिए मुङो तो उनका साथ देना ही था। इस साल फरवरी में मैंने पति को अपनी किडनी दी। मेरा मानना तो यही है कि ऐसे काम केवल प}ियां ही कर सकती हैं।


पति की सोच पर निर्भर करता है सब

गोंडा की मंजू सिंह कहती हैं, पति सउदी अरब में काम करते थे। जब वहां उनकी तबियत ज्यादा खराब हुई तो वह इंडिया आ गए। इलाज के दौरान 2013 में पता चला कि उनकी दोनों किडनी खराब हैं। परिवार में ससुर, सास हैं जो शुगर की मरीज हैं। दो देवर और दो ननद हैं। किडनी देने के नाम पर कोई आगे आने को तैयार नहीं था। फिर मैंने उन्हें किडनी देने का फैसला लिया। जांच के दौरान जब मेरी किडनी में पथरी का पता चला तो डॉक्टरों ने कहा कि पहले तुम्हारा ऑपरेशन करेंगे उसके बाद किडनी ट्रांसप्लांट करेंगे। वह कहती हैं, पति-प}ी गाड़ी के दो पहिए हैं और एक-दूसरे के बिना दोनों अधूरे हैं। पर, अंगदान जैसे गंभीर मुद्दे पर प}ी तो तुरंत तैयार हो जाती है, लेकिन पति ऐसा करेगा या नहीं यह उसकी सोच पर निर्भर करता है।

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पति से है पत्नी की पहचान

ट्रांसपोर्ट नगर, लखनऊ निवासी, नविता श्रीवास्तव कहती हैं, अपने शरीर का एक अंग देना किसी के लिए भी बड़ी बात है। हर किसी के लिए यह इतना आसान नहीं है, पर एक प}ी की पहचान तो पति से ही होती है इसीलिए प}ियां आसानी से अपनी किडनी देने को तैयार हो जाती हैं। 2014 में मैंने पति को अपनी किडनी दी। वह पहले ही मुङो बहुत प्यार करते थे। ट्रांसप्लांट के बाद अब तो और भी चाहने लगे हैं क्योंकि उनका कहना है कि इतना बड़ा काम प}ी ही कर सकती है।

बड़ी हिम्मत का काम है अंगदान

महानगर निवासी साधना मिश्र कहती हैं, पति दिनेश मिश्र पीएसी में पुलिस इंस्पेक्टर हैं। 2011 में धीरे-धीरे लक्षण दिखने लगे फिर इलाज शुरू हुआ। सख्त ड्यूटी के चलते उनका ठीक से इलाज शुरू नहीं हो पाया। मैंने सोचा कि बार-बार डायलिसिस कराने से अच्छा है कि किडनी ट्रांसप्लांट करा दी जाए। परिवार में ससुर और देवर भी हैं पर ससुर को कैंसर और देवर डायबिटिक हैं इसलिए उनसे कह नहीं सकती थी। मैं खुद अस्थमा की मरीज हूं पर डॉक्टरों ने मुङो दिलासा दिया कि इलाज के बाद मैं पति को किडनी दे सकती हूं। 2015 में मैंने अपनी किडनी पति को दान दी। अपने शरीर का हिस्सा किसी को देना बहुत हिम्मत का काम है पर मुङो लगता है ज्यादातर प}ियां इस काम को आसानी से निभा ले जाती है।

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जागरूकता की कमी है

इंदिरानगर निवासी, श्रीवृद्धि शर्मा कहती हैं, किडनी को लेकर अभी भी लोगों में अवेयरनेस नहीं है, खासतौर से महिलाओं में। जब मुङो यह पता चला कि नेफ्रोटिक सिंड्रोम की बीमारी से ग्रस्त हूं तो मैं खुद हैरान रह गई थी। पीजीआइ में मेरा इलाज कर रहे डॉ. नारायन ने बताया कि यह किडनी की ऐसी बीमारी है जो बहुत रेयर है और लाखों में किसी एक को होती है। इस बीमारी के बारे में लोगों को जागरूक होने की जरूरत है। 2017 में मेरे चेहरे वगैरह पर सूजन आने लगी थी। उस वक्त मैं एमबीए करने इंदौर गई थी। डॉ. नारायन के इलाज के बाद मैं बिल्कुल ठीक हो गई। हालांकि, बीमारी का पता लगने के बाद मेरे पापा किडनी देने को तैयार थे, पर ऐसी नौबत आई नहीं।







तो हर दसवें के गुर्दे में कोई न कोई परेशानी




तो हर दसवें के गुर्दे में कोई न कोई परेशानी



परिवार की सेहत के प्रति संजीदा रहने वाली महिलाएं अक्सर खुद पर उतना ध्यान नहीं देती हैं। घर-गृहस्थी और नौकरी की व्यस्तता के चलते अपनी डाइट का ख्याल नहीं रखती हैं। ऐसे में, कब और किस बीमारी का शिकार हो जाएं, वे खुद नहीं जानती। अनुचित खानपान और बदलती लाइफ स्टाइल के चलते महिलाओं में किडनी की समस्या भी आम हो चुकी है। विश्व गुर्दा दिवस का उद्देश्य भी यही है कि दुनिया की सभी महिलाओं और लड़कियों को गुर्दा रोग के प्रति जागरूक करके विकराल होती इस बीमारी की रोकथाम के लिए प्रयास करना है। किडनी रोग के लक्षण व सावधानियों पर जानकारी दे रहे हैं, पीजीआइ में नेफ्रोलॉजी डिपार्टमेंट में प्रोफेसर, डॉ. नारायण प्रसाद


क्रॉनिक किडनी रोग (सीकेडी)
यह एक ग्लोबल पब्लिक हेल्थ समस्या है। प्रत्येक दस में से एक व्यक्ति गुर्दा रोग से ग्रसित है। सीकेडी से दुनिया भर में करीब डेढ़ करोड़ महिलाएं प्रभावित हैं और वर्तमान में महिलाओं में मौत का आठवां प्रमुख कारण है। हर साल करीब छह लाख महिलाओं की मौत गुर्दा रोग से संबंधित रोगों के कारण होती है। कुछ अध्ययनों के मुताबिक सीकेडी पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में होने की ज्यादा संभावना होती है। हालांकि, कुछ प्रारंभिक जांचों से इस बीमारी का पता लगाया जा सकता है।

सेहत को लेकर रहें सावधान
अक्सर महिलाएं घर के काम करने के बाद थकावट महसूस करती हैं। घरेलू कामों में थोड़ी-बहुत थकावट होना आम है, लेकिन ज्यादा थकावट होना भी इस बीमारी का एक लक्षण है। ऐसे में, लापरवाही न करें और तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।

गर्भवती महिलाएं रखें खास ख्याल

गर्भावस्था के दौरान दूसरी जांचों के साथ ही किडनी संबंधी जांचें भी महिलाओं को करानी चाहिए। इसके लिए वे अपनी गाइनोकोलॉजिस्ट से परामर्श ले सकती हैं। यदि किडनी की बीमारी किसी गर्भवती महिला को हो जाती है तो यह उसके बच्चे के लिए भी खतरनाक हो सकती है। वहीं, प्री-मैच्योर डिलीवरी होने के ज्यादा चांस होते हैं।

हर छह माह पर कराएं जांच1
चालीस से पचास वर्ष के ऊपर की महिलाएं समय-समय पर अपना ब्लड प्रेशर, शुगर और ब्लड शुगर की जांच जरूर कराएं। बेवजह दवाओं के सेवन से बचें। महिलाएं अक्सर अपनी सेहत के प्रति लापरवाही बरतती हैं जो उनके लिए कई बार खतरनाक साबित होता है। पूरे परिवार का ख्याल रखने वाली महिलाओं को सबसे पहले अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए तभी तो वह परिवार का ख्याल रख सकेंगी।

प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थो से बनाएं दूरी
वैसे तो खान-पान का संबंध किडनी से नहीं है। लेकिन किसी कारणवश यदि किडनी खराब हो जाती है तो ऐसे में प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थ नहीं खाने चाहिए क्योंकि यह किडनी के मरीजों के लिए हानिकारक होते हैं।

नशीले पदार्थो से रहें दूर
यह बीमारी किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकती है। आजकल तो बच्चों में भी किडनी संबंधी रोग बढ़ रहे हैं। युवा अक्सर छिपकर नशा करने लगते हैं। नशीले पदार्थ भी किडनी को प्रभावित करते हैं, इससे बचने के लिए सिगरेट, शराब व अन्य नशीले पदार्थो का सेवन नहीं करना चाहिए।

व्यायाम बहुत जरूरी है

संतुलित भोजन के साथ ही नियमित व्यायाम करना भी जरूरी है। इसके अलावा शरीर में चर्बी न बढ़ने दें। किडनी की बीमारियों में ओबेसिटी भी एक मुख्य कारण है। घर के काम-काज खुद करने का प्रयास करें जिससे फिजिकल एक्सरसाइज होती रहे।
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 करें बचाव

-चालीस वर्ष से अधिक उम्र के पुरुष व महिलाओं को खून में क्रिटिनाइन, पेशाब में प्रोटीन व लाल रक्त कण और ब्लड प्रेशर की जांच हर छह महीने में जरूर करानी चाहिए।
-पानी खूब पीना चाहिए। दिनभर में एक स्वस्थ व्यक्ति को आठ-दस गिलास पानी का सेवन करना चाहिए।
-सेक्सुअली एक्टिव महिलाओं को सेक्स के बाद यूरीनेट (पेशाब) करना चाहिए।
-प्रेगनेंसी में 20 हफ्ते के बाद यदि बीपी बढ़ जाए तो तुरंत जांच करानी चाहिए।
-प्रेगनेंसी के दौरान हाइपर टेंशन में अचार, पापड़ व ब्रेड आदि का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इनमें सोडियम की मात्र अधिक होती है।
-40 वर्ष से ऊपर की महिलाएं अपना खास ख्याल रखें। हेल्दी डाइट लें और मोटापा न बढ़ने दें।
-बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआइ) को संतुलित रखें और इसे 25 से कम रखें।
-सामान्य व स्वस्थ महिलाएं अपने भोजन में काबरेहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, मिनरल और विटामिन की मात्र को संतुलित रखें
-मोटी महिलाएं प्रोटीन व फाइबर को अपनी डाइट में अधिक शामिल करें। वसायुक्त व काबरेहाइड्रेट युक्त पदार्थ न खाएं। समय पर नाश्ता व भोजन करें।

इन लक्षणों को न करें अनदेखा

ब्लड प्रेशर बढ़ना, पैरों और चेहरे पर सूजन आना, खून की कमी होना, बार-बार और बहुत ज्यादा पेशाब आना। पेशाब के रास्ते में संक्रमण या जलन, गर्भपात और प्रसव के समय अत्यधिक रक्तस्राव आदि कारणों से महिलाओं में किडनी रोग की आशंका बढ़ जाती है। प्रेगनेंसी के दौरान हाइपर टेंशन होना। यदि इस प्रकार के लक्षण किसी में दिखाई दें तो तुरंत जांच करानी चाहिए क्योंकि किडनी संबंधी बीमारियां जल्दी पकड़ में नहीं आती हैं।

गुरुवार, 8 मार्च 2018

किडनी की खराबी से लड़ चुके लोगों दिया लड़ने का मंत्र

किडनी की खराबी से लड़ चुके लोगों दिया लड़ने का मंत्र

किडनी ठीक करने की कोई दवा नहीं सपोर्टिव इलाज से रूक जाती बीमारी की बढ़त

किडनी मरीज नमक का मान लें दुश्मन


विश्व किडनी दिवस के मौके पर किडनी की खराबी से निपट चुके सामान्य लोगों ने इस बीमारी के साथ संघर्ष कर रहे लोगों हौसला रखने का संदेश दिया। परेशानी तो सबके जीवन में अाती है कुछ में कम तो कुछ में अधिक लेकिन मुकाबले हिम्मत के साथ करना है। अपने अंदर मानसिक कमजोरी कभी मत अाने दें। पुलिस विभाग के पूर्व बडे अधिकारी रहे एल बनर्जी ने बताया कि  2011 में किडनी ट्रांसप्लांट कराया जिसके बाद से बिल्कुल फिट हूं। बताया कि किडनी को ठीक करने की कोई दवा नहीं है लेकिन सपोर्टिव ट्रीटमेंट से बीमारी को बढने की गति को कम किया जा सकता है। किडनी के इलाज के चरन -चटनी के चक्कर मे कतई न पड़े देखा है कि इससे किडनी और खराब हो जाती है। बनर्जी ने कहा कि किडनी ट्रांसपालंट के बाद लोग बहुत अच्छी पुरानी जिंदगी जी रहे है जिसमें मै भी शामिल हूं। कहा कि अपने को एक्टिव रखें इससे अाप में डिप्रेशन नहीं होगा। सलाह दिया कि जैसे गांधी ने नमक सत्याग्रह चलाया था उसी तरह किडनी के मरीजों को नमक के इस्तेमाल से बचने की जरूरत है। वरिष्ठ पत्रकार दिलीप अवस्थी ने कहा मेरी पत्नी जैसे पहले साथ दिया वैसे ही मेरी किडनी खराब होने के बाद किडनी देकर धर्म निभाया । महिलाएं हमेशा से अादरणीय रही है रहेंगी क्योंकि उन्हें अपनों के अपना जीवन लगाती है। पहले मैं नानवेंज के साथ ड्रिंक ले लेता था लेकिन पत्नी के शाकाहारी किडनी लगने के बाद बिल्कुल किडनी शाकाहारी हो गई जिसमें मेंनटेन रखा है। सलाह दिया कि किडनी ट्रांसप्लांट के बाद रेगुलर फालोअप पर रहें इससे किडनी रिजेक्शन की अाशंका कम हो जाती है। 

पेरीटोनियल डायलसिस पर दस से कर रहा सारा काम

कई बार कई लोग किडनी ट्रांसप्लांट नहीं करा पाते है एेसे में पेरीटोनियल डायलसिस जिंदगी जीने के लिए बढिया तरीका है। पेशे से अध्यापक रहे प्रो. केपी कुलश्रेष्ठ ने बताया कि वह 2010 से पेरीटोनियल डायलिसस पर बिल्कुल फिट है। इसके साथ वह पूरी अध्यापन का कार्य किए । रोज वाक करते है। केवल फालोअप पर रहते हैं। इनकी किडनी ने 2008 में जवाब दिया लेकिन वह ट्रांसप्लांट नहीं करा पाए इसके बाद से पीजीआई के विशेषज्ञों ने पेरीटोनिलल डायलिसस पर रहनेका सलाह दिया। कहा कि पत्नी ने पूरा साथ दिया। 59 वर्षीय मीना चौधरी ने बताया कि वह 9 साल से पेरीटोनियल डायलसिस पर है । घर के लोग कहते है कि खानाा मत बनाओ लेकिन खाना बनाने के साथ ही घर के छोटे -मोटे काम करने के साथ एक्टिव रहती है। 

समय से पहले जंम लिए बच्चों में हो सकती है आगे किडनी की परेशानी

किंग जार्ज मेडिकल विवि की प्रो. माधवी गौतम ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान 35 वें सप्ताह तक गर्भस्थ शिशु में अंगों का निर्माण होता है जिसमें किडनी भी शामिल है। समय से पहले जंम लेने वाले बच्चों के किडनी में नफ्रान की संख्या कम होने की अाशंका रहती है जिससे इनमें आगे चल कर किडनी की परेशानी की अाशंका रहती है। एेसे बच्चों का समय पर जांच कराते रहना जरूरी है। प्री मेच्योर प्रसव से बचने के लिए गर्भवती को डाक्टर से सपर्क में रहना चाहिए। 

किडनी की परेशानी तो गर्भधारण से बचे

संजय गांधी पीजीआई के गुर्दा रोग विशेषज्ञ प्रो. धर्मेंद्र भदौरिया ने कहा कि किडनी की परेशानी है तो गर्भधारण करने से पहले विशेषज्ञ से सलाह लें सीरम क्रिएटनिन 1.5 से 2.0 की बीच है तो गर्भधारण करना ठीक रहता है। कई बार गर्भावस्था के दौरान किडनी फक्शन गड़बड़ा जाता है। गुर्दे की परेशानी वाली महिलाअों गर्भधारण से बचने के लिए अोरल पिल्स नहीं लेना चाहिए केवल बैरियन ( कंडोम , डायफ्राम, स्पंज) का इस्तेमाल करना चाहिए। 

यूटीआई से बचने के लिए रखें यह ध्यान

डा.राम मनोहर लोहिया की किडनी रोग विशेषज्ञ डा. नम्रता राव ने कहा कि यूटीआई( मूत्र मार्ग संक्रमण) के कारण भी कई किडनी खराब हो सकती है। इससे बचने के लिए मासिक के दौरान सेनटरी पैड बदलें। सेक्स से पहले और बाद में यूरीन करने जरूर जाएं। स्पर्म जेली का इस्तेमाल मत करें। खूब पानी पीएं। जनांग को साफ रखें। जब भी जब पेशाब में जलन हो पेशाब की जांच करााएं दवा से इंफेक्शन ठीक हो जाती है। 

किडनी का स्टोन तो तुरंत कराएं इलाज

संजय गांधी पीजीआई के यूरोलैाजिस्ट प्रो.एमएस अंसारी ने कहा कि किडनी में स्टोन है तुरंत इलाज कराना चाहिए 10 से 15 फीसदी मामलों में किडनी की खराबी का कारण स्टोन होता है। स्टोन की परेशानी पुरूषों में अधिक होती है। कैल्शियम अधिक लेने से स्टोन नहीं बनता बल्कि अाक्जलेट अदिक होने पर दोनों मिल कर स्टोन बनाते हैं। प्रो.संजय सुरेखा ने कहा कि किडनी कैंसर होने पर तुरंत निकाल देना चाहिए यह भी किडनी की खारबी का बडा कारण है। 

अंगदान में हम पीछे

किंग जार्ज मेडिकल विवि के प्रो.संत पाण्डेय ने कहा कि ब्रेन डेड के प्रति जागरूकता न होने, संसाधान की कमी सहित अन्य कारणों से अंग प्रत्यारोपण के लिए अंग नहीं मिल रहे है। देश में दो लाख किडनी की जरूरत है लेकिन केवल पांच हजार किडनी का प्रत्यारोपण हो रहा है। पचास हजार लिवर की जरूरत है केवल 750 लिवर प्रत्यारोपण हो रहा है।

पुरूष भी महिलाअों का रखें ध्यान- प्रो.राकेश कपूर 

 पीजीआई के नेफ्रोलाजिस्ट प्रो. अार के शर्मा, प्रो. नरायान प्रसाद, डा. अार पी एल्हेस, डा. अनिल कुमार सिंह , डा. सिद्रार्थ सोनकर सहित अन्य विशेषज्ञों ने तमाम पहलुअों पर जानकारी दी। इस मौके पर वाक थान का अायोजन किया गया जिससे प्रो. निदेश कपूर ने रवाना किया कहा कि किडनी खराब होने पर कई मामलों में इलाज मंहगा है इसलिए बचाव की तरफ ध्यान देने की जरूरत है। कहा कि महिलाएं कभी मां, बहन , पत्नी के रूप में हमेशा पुरूषों की देखभाल करती है हमारी भी जिम्मेदारी है कि हम इनका ध्यान रखें। 

इन्हों ने तो पति और बेटे के लिए लगा दिया दांव पर अपना जीवन

पति और बेटे के जीवन के लिए लगा दिया अपना जीवन 
महिलाएं अंग दान में सबसे अागे 



केस वन-  बलरामपुर  निवासी  सरताज मुहम्मद की किडनी खराबी का पता चला तो परिवार में मातम छा गया । परिवार वाले लेकर पीजीआई अाए जहां पर तमाम इलाज के बाद बीमारी की गति तो रूक गयी लेकिन इलाज केवल किडनी ट्रांसप्लांट ही था । परिवार में कोई किडनी देने वाला नहीं था इनकी पत्नी 28 वर्षीया नजमा खातून ने पति के जीवन के लिए खुद किडनी देने का फैसला लिया। पीजीआई में इनकी कई जांच हुई जिसमें इन्हे फिट पाया गया। 2011 में किडनी खराबी के बाद 2012 में किडनी ट्रांसप्लांट हो गया जिसके बाद पति बिल्कुल ठीक है। नजमा ने बताया कि किडनी देने के बाद वह गर्भवती हुई और एक शिशु को जंम भी दिया। नजमा ने कहा कि पति हमारे पीएससी में जवान भी और बिल्कुल ठीक है। 


केस -दो-  तेलीबाग लखनऊ 32 साल के अंशुमान कुशवाहा को किडनी खराबी का पता 2013 में चला तो यह भी पीजीआई में यहां पर डाक्टर ने किडनी ट्रांसप्लांट का सलाह दिया। इनकी मां राज श्री कुशवाहा ने बेटे को बचाने के लिए  खुद की किडनी देने का फैसला लिया। 2014 में पीजीआई में कडनी ट्रांसप्लांट हुअा जिसके बाद अंशुमान पूरी तरह फिट है। अंशुमान की शादी किडनी ट्रांसप्लांट के बाद 2015 में हुई । ईश्वर की कृपा से सब ठीक है। 

केस -तीन- कानपुर के 40 वर्षीय महेंद्र यादव की किडनी खराबी की परेशानी 2012 में हुई जिसके बाद कई जगह इलाज कराया लेकिन इलाज का विकल्प केवल किडनी ट्रांसप्लांट ही था । वह डायलसिस पर लगातार जीवन जी रहे थे। इनकी पत्नी विनीता यादव ने किडनी देने का फैसला लिया। पांच फरवरी 2018 को इनके पति में किडनी ट्रांसप्लांट हुआ फिलहाल महेंद्र पूरी तरह फिट है। विनीता कहती है कि पति को भगवान इनको बचाने के लिए हर स्तर त्याग करने को तैयार हैं।

पुरूषों से अधिक है महिलाअों में किडनी डिजीज की अाशंका



पुरूषों से अधिक है महिलाअों में किडनी डिजीज की अाशंका

असुरक्षित गर्भपात और प्रसव के दौरान रक्त स्राव बन सकता है किडनी का दुश्मन

एंटी नेटल केयर पर देना होगा विशेष ध्यान

 पीजीआई में अाज जागरूकता कार्यक्रम


देश में महिलाअों के मौत का अाठवां कारण किडनी की खराबी है । महिलाअों में किडनी की परेशानी परूषों के मुकाबले अधिक होती है क्यों कि इनमें प्रजनन प्रक्रिया के कारण कई तरह की परेशानी होती है जिसके कारण किडनी पर असर पडने की काफी अाशंका रहती है। इसके अलावा महिलाअों में कुछ खास तरह की किडनी डिजीज होती है जिसके साथ काफी अच्छी और लंबी जिंदगी दवाअों से मिल सकती है। महिलाअों को किडनी की परेशानी के प्रति जागरूक करने के लिए इंडियन सोसाइटी अाफ नेफ्रोलाजी ने इनको केंद्र मान कर विश्व किडनी दिवस का अायोजन किया है। सोसाइटी के सचिव एवं संजय गांधी पीजीआई के किडनी रोग विशेषज्ञ प्रो. नरायन प्रसाद, विभाग के प्रमुख प्रो. अार के शर्मा, प्रो. अमित गुप्ता, प्रो. धर्मेंद्र भदौरिया, प्रो. अनुपमा कौल और प्रो. मानस रंजन पटेल ने  ने बताया कि प्रसव के दौरान अधिक रक्त स्राव होने पर एक्यूट कांटिकल नेक्रोसिस किडनी में हो जाती है जिसके कारण किडनी कम काम करने लगती है। यह स्थित क्रिनक किडनी डिजीज में बदल सकती है। इसके अलावा असुरक्षित गर्भ पात के कारण में किडनी प्रभावित हो जाती है। इसमें भी रक्त स्राव और संक्रमण कारण बनता है। प्रो. नरायन प्रसाद ने बताया कि प्रजनन उम्र के दौरान महिलाअों में यूटीआई( यूरनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन) की अाशंका रहती है। गर्भावस्था के दौरान यूटीअाई होने पर समय से पहले प्रसव की अाशंका रहती है। गर्भावस्था के दौरान बढा रक्त दाब भी बडा कारण है।  एंटी नेटल केयर के जरिए काफी हद किडनी की तमाम परेशानियों से बचा जा सकता है। इसके अलावा अाटोइम्यून डिजीज ल्यूपस नेफ्राइिटस भी महिलाअों में किडनी की खराबी का बडा कारण है इस परेशानी में दवाअों से काफी हद तक लंबी जिंदगी दी जा सकती है। बताया कि महिलाअों किडनी बीमारी अधिक होती है लेकिन बीमारी धीरे-धीरे असर डालती है इसलिए इलाज के लिए देर से अाती है। महिलाअों को अधिक सजग रहने की जरूरत है। 

पुरूषों से कम होता है महिलाअों का इलाज

किडनी की परेशानी होने पर परूषों का इलाज तो होता है लेकिन महिलाअों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। इसके पीछे कारण सामाजिक असमानता के साथ अार्थिक कारण भी हो सकता है। पुरूष  ही कमाने वाला होती है इसलिए इनके इलाज पर जोर दिया जाता है। इसके साथ ही बीमारी की धीमी गति भी कारण हो सकता है। प्रो. नरायन प्रसाद का कहना है कि यदि 6 लोगों में किडनी ट्रांसप्लांट होता है तो पांच परूष होते है और एक महिला होती है। 2017 में 109 लोगों में किडनी ट्रांसप्लांट हुअा जिसमें 89 पुूरूष थे महिलाअों की संख्या 30 थी जबकि किडनी देने के मामले में महिलाअों की संख्या 90 और पुरूषों की संख्या 29 थी।  

एक्यूट किडनी डिजीज वाले न हो जाए निश्चिंत

प्रो. नरायन प्रसाद ने बताया कि एक्यूट किडनी डिजीज तुरंत तो दवा से ठीक हो जाती है लेकिन इनमें अागे चल कर पांच से अाठ गुना क्रानिक किडनी डिजीज की अाशंका रहती है। एक्यूट किडनी इंजरी वाले मरीजों को लगातार फालोअप में रहने की जरूरत है जिससे इन्हें क्रानिक किडनी डिजीज से बचाया जा सकें। 

महंगा है इलाज इसलिए बचाव पर दें ध्यान

बताया कि क्रानिक किडनी डिजीज होने पर डायलिसस और किडनी ट्रांसप्लांट ही इलाज का रास्ता है जो काफी खर्चीला है। एेसे में बीमारी को शुरूअाती दौर में कंट्रोल करने की जरूरत है। खराबी का पता लगाने के लिए 6 महीने में एक बार पेशाब में प्रोटीन, रक्त  में क्रिएटनिन की जांच करानी चाहिए। डायबटीज और उच्च रक्त चाप के मरीजों को विशेष ध्यान देने की जरूरत है। लक्षण 50 फीसदी से अधिक किडनी खराब होने के बाद प्रकट होते हैं। 


विश्व किडनी दिवस पर होगा कार्यक्रम

विश्व किडनी दिवस के मौके पर संस्थान में प्रो.अारके शर्मा,  प्रो. नरायन प्रसाद, प्रो. अनुपमा कौल, प्रो, धर्मेद्र भदौरिया, डा. नम्रता राव, डा. देवाशीष शाहा, डा. रवि एल्हेंस, डा. मुफ्फजल एहमद, डा. रवि कुशवाहा, डा. संत पाण्डेय, डा. अभिलाष चंद्रा सहित अन्य विशेषज्ञ जानकारी देंगे। इसके अलावा वाक थान का अायोजन होगा जो संस्थान परिसर से होते हुए मुख्य गेट पर खत्म होगा। किडनी की बीमारी से उबर चुके लोग अपने अनुभव से लोगों का मनोबल बढाएंगे।    

पीजीआई लखनऊ बना उत्कृष्ठ चिकित्सीय सेवाओ की मिसाल

   संवाददाता : उत्तर प्रदेश का महवपूर्ण चिकित्सा संस्थान पीजीआई लखनऊ ने अपनी कीर्ति को बना कर रखने में कोई कसर नही छोड़ी है। अपनी उपलब्धियों के कारण जाने वाले इस संस्थान में समस्त उच्च तकनीक की मशीनें लगी हुई है जो कि चिकित्सा जगत में बहुत ही महवपूर्ण स्थान रखता है। रोगो के परीक्षण के उपयोग में लाये जाने वाली मशीनों के माध्य्म से अति गंभीर रोगों की पहचान अत्यंत सुलभ ढंग से की जाती है। संस्थान के प्रमुख (निदेशक) महोदय से लेकर संस्थान के समस्त कर्मचारियों की अपनी अलग ही कार्यप्रणाली दिखती है जो कि अपने आप मे किसी उपलब्धिता से कम नही है। 

रविवार, 25 फ़रवरी 2018

स्वछ्ता के साथ लोगों को स्वस्थ्य रखने के लिए जांच शिविर



स्वछ्ता के साथ लोगों को स्वस्थ्य रखने के लिए जांच शिविर

सामाजिक सरोकार मंच के अजय कुमार सिंह ने चला रखा है अभियान

  


स्वच्छ वातावरण प्रोत्साहन समिति इब्राहिम पुर  दो और सामाजिक सरोकार मंच सामान्य लोगों के स्वास्थ्य की जांच करने के लिए गोल मार्केट  साउथ सिटी एल्डिको में शिविर का अायोजन किया गया शिविर में 200 से अधिक लोगों का परीक्षण किया गयाा संजय गांधी पीजीआई के ईएनटी स्पेशलिस्ट प्रोफेसर अमित केसरी के अलावा क्लीनिकल इम्यूनोलॉजी विभाग स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर आंचल केसरी के अलावा कई अन्य विशेषज्ञों ने परीक्षण किया । इस मौके पर निशुल्क सामान्य जांच के अलावा कम दर पर विशेष जांच भी की गई। सिमित के अध्यक्ष एवं ट्रेंड नर्सेज एसोसिएशन के सदस्य  अजय कुमार सिंह और सामाजिक सरोकार मंच के संयोजक डा. पीके गुप्ता ने बताया कि दस से पंद्रह लोगों को पता ही नहीं होता कि उन्हे कोई बीमारी है।   उद्घाटन प्रशांत भाटिया एवं रीशू भाटिया ने किया।

प्री एनेस्थेसिया चेक अप में तीस फीसदी में पकड़ अाती है बीमारी- सर्जरी के लिए जाएं तो बताएं पहले से कौन सी खा रहे हैं दवा



पीजीआई में पीजी एनेस्थेसिया रिफ्रेशर कोर्स



प्री एनेस्थेसिया चेक अप में तीस फीसदी में पकड़ अाती है बीमारी

प्री एनेस्थेसिया चेक अप से एनेस्थेसिया विशेषज्ञ पहले से होता है एलर्ट 

बिना चेक अप सर्जरी से 20  फीसदी में हो सकती है गंभीर परेशानी

जागरणसंवाददाता। लखनऊ      

सर्जरी से पहले प्री एनेस्थेसिया चेक अप में तीस फीसदी लोगों में सालों से शरीर में घर बना चुकी बीमारी पकड़ में अाती है  लेकिन प्री एनेस्थेसिया चेक अप तमाम अस्पतालों में नहीं होता है। इससे सर्जरी के दौरान एनेस्थेसिया के कारण परेशानी की अाशंका बढ़ जाती है। कई बार है यह काफी गंभीर होती है। संजय गांधी पीजीआई में पीजी एनेस्थेसिया रिफ्रेशर कोर्स में विशेषज्ञों ने कहा कि मरीज के तीमार दार भी  सर्जरी से पहले प्री एनेस्थेसिया चेक अप की मांग करें। एनेस्थेसिया के डाक्टर भी जहां काम कर रहे है वहां सिस्टम विकसित करें। कोर्स के अायोजक प्रो.संदीप साहू ने बताया कि 45 साल की अायु की बाद सर्जरी के लिए अाने वाले 30 फीसदी से अधिक लोगों में हाई बीपी, डायबटीज, अस्थमा, फैटी लिवर डिजीज, लिपिड प्रोफाइल में गड़बडी, एनीमिया सहित कई परेशानी मिलती है। इन परेशानियों का इलाज करने के बाद सर्जरी प्लान करना चाहिए। सर्जरी की इमरजेंसी है तो एनेस्थेसिया विशेषज्ञ को उस परेशानी के साथ एनेस्थेसिया देने की तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए। इससे जटिलता की अाशंका कम हो जाती है। प्रो.साहू ने कहा कि प्री एनेस्थेसिया चेक अप न होने से सीधे सर्जरी करने पर सात से 20 फीसदी में गंभीरता जटिलता की अाशंका रहती है। 


दिल के मरीजों में सर्जरी से पहले जाने दिल की परेशानी की गंभीरता
 
एसजीपीजीआर्ई के प्रो. प्रभात तिवारी ने कहा कि दिल की मरीजों में दिल की बीमारी कितनी है इसका पता लगाने के बाद सर्जरी के लिए एनेस्थेसिया प्लान करना चाहिए। मरीज का ईसीजी, इको जांच कर बीमारी का गंभीरता देेखते है। एनेस्थेसिया की दवाएं और मात्रा बीमारी के अनुसार तय करनी चाहिए। कहा कि सर्जरी के दौरान मरीज में हार्ट एटैक भी पड़ सकता है इससे निपटने के लिए तैयार रहना चाहिए। मरीज में पहले से दिल की परेशानी से बचाने के लिए दवाएं देनी चाहिए।   


मोटापा ग्रस्त मरीजों में शरीर के अंगों पर अधिक रहता है लोड

एम्स दिल्ली के प्रो.लोकेश कश्यप ने कहा कि मोटापे से ग्रस्त लोगों में उनके दिल, लिवर और फेफडे को अधिक काम करना पड़ता है जिससे वह जल्दी जबाव देने लगता है। एेसे लोगों के शऱीर के अंगों पर पहले से अदिक लोड़ है एेसे में इनकी सर्जरी के दौरान बेहोशी देने के लिए दवा और डोज तय करने में अधिक सावधानी की जरूरत है। दवा की मात्रा शरीर के भार के अनुसार दी जाती है एेसे में अगों पर और अधिक लोड पड़ने पर फेल्योर की स्थित अा सकती है। 


सर्जरी से पहले डाक्टर को बताएं कौन सी चल रही है दवा

किसी भी सर्जरी के लिए जाने से पहले अपने डाक्टर को जरूर बताएं कौन -कौन सी दवाएं चल रही है। सर्जरी से पहले खून पतला करने की दवाएं बंद करते है। बीटा ब्लाक जैसी दवाएं नहीं बंद की जाती है। डायबटीज है तो खाने की गोली बंद कर इंसुलिन पर लेते है। एनेस्थेसिस्ट को पहले से चल रही दवाओं के बारे में जानकारी नहीं है तो वह अपने हिसाब से दवाएं तय करते है जिसमें रिस्क हो सकता है। 

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

अब बिना चीरा -टांका संभव है पीजीाई में गर्भाशय के फाब्रायड से निजात



अब बिना चीरा -टांका संभव है पीजीाई में  गर्भाशय के फाब्रायड से निजात

फायब्रायड ( ट्यूमर) की खून सप्लाई करने वाली नस  इटरवेशन रेडियोलाजिस्कल तकनीक किया जाता है बंद




गर्भाशय में फायब्रायड ( ट्यूमर)  की परेशानी तीस से चालिस वर्ष उम्र की 20 से 30 फीसदी महिलाअों में देखी जाती है। इसकी वजह से महिला गर्भधारण नहीं कर पाती है । कई बार गर्भधारण करने के बाद पाइब्रायड का अाकार बढ़ जाता है जिससे गर्भ में फल रहे शिशु में दबाव पडता है। इससे शिशु का विकास नहीं पाता है। इसके अलावा फायब्रायड की वजह से अनियमित रक्त स्राव की परेशानी होती है। इस परेशानी का इलाज सामान्य तौर पर सर्जरी कर किया जाता है। इसमें कई तरह के रिस्क होते है लेकिन अब इंटरवेशन रेडियोलाजिकल तकनीक से बिना किसी चीरा या टांका के ट्यूमर को खून सप्लाई करने वाली नस को क्वायल , पाली विनायल एल्कोहल से नस को बंद कर दिया जाता है। ट्यूमर को खून न मिलने पर कुछ दिनों में ट्यूमर सूख कर खत्म या छोटा हो जाता है। संजय गांधी पीजीआई में इंटरवेंशन रेडियोलाजिकल तकनीक पर अायोजित अधिवेशन में संस्थान के इंटरवेंशन रेडियोलाजिस्ट प्रो.शिव कुमार और आईएलबीएस दिल्ली के इंरटवेंशन रेडियोलाजिस्ट डा.यशवंत पट्टीदार ने बताया कि पहले गर्भाशय में ट्यूमर की स्थित और अाकार की जानकारी लेने है। इसके बाद देखते है कि किस से नस से इसे खून मिल रहा है।    अल्ट्रासाउंड से देखते हुए उस नस तक निडिल से पहुंच कर उसे बंद कर देते है। प्रो.शिव कुमार ने बताया कि विभाग में यह तकनीक स्थापित है जिससे यह परेशानी है है वह सीधे विभाग में संपर्क कर सकता है। 


एमअार हाइफू से फाब्रायड का और अच्छा होगा इलाज
प्रो.शिव कुमार ने बताया कि हम लोग फाब्रायड के और बेहतर इलाज के लिए एमअार हाई इंटेस्टी फोकस अल्ट्रासाउंड तकनीक स्थापित करने जा रहे है जिसमें उच्च तीव्रता के अल्ट्रा साउंड तरंग से सीधे ट्यूमर पर प्रहार करते है । इससे ट्यूमर नष्ट हो जाता है। यह तकनीक बिल्कुल सुरक्षित है क्योंकि कोई निडिल भी शरीर के अंदर नहीं जानी है जैसे अल्ट्रासाउंड होता है वैसे ही इलाज किया जाता है। 


क्रायोथिरेपी से नष्ट होगा कैंसर

विशेषज्ञों ने बताया कि लिवर, लंग, किडनी सहित शरीर के दूसरे अंगों में ट्यूमर होने पर अभी तक हम लोग इंटरवेंशन तकनीक से कैंसर को खत्म करने की दवा सीधे ट्यूमर में इंजेक्ट करते है। इसके अलावा रेडियोफ्रिक्वेंसी एबीलेशन तकनीक से ट्यूमर पर हाई करंट देकर नश्ट करते है।  अब हम लोग क्रायोथिरेपी तकनीक स्थापित करने जा रहे है जिसमें ट्यूमर तक पहुंच कर उसका तापमान माइनस 40 डिग्री सेल्यिस किया जाएगा। इस तापमान पर कैंसर सेल मर जाएगा। यह तकनीक अधिक सफल है। 


नहीं रूकेगी डायलिसस खुल जाएगा फेस्चुला

विशेषज्ञों ने बताया कि किडनी के खराबी वाले मरीजों को बार-बार डायलसिस करानी होती है। इसके लिए फेस्चुला बनाया जाता है। फेस्तुला बनने के एक से दो साल में 70 फीसदी से अधिक लोगों में यह बंद हो जाता है या नस पतली हो जाती है एेसे में दोबारा फेस्चुला बनना काफी जटिल होता है। हम लोग इंटरवेंंशन तकनीक से बंद नस को खोल देते है साथ ही वैलूनिंग कर देते है जिससे डायलसिस चलती रहती है। 

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

दिल ही नहीं पैर की रक्त वाहिका में होती है स्टंटिंग

दिल ही नहीं पैर की रक्त वाहिका में होती है स्टंटिंग

पेऱीफेरल अार्टरी डिजीज में इंटरवेंशन तकनीक से की जाती है वैलूनिंग


अभी तक यही पता था कि दिल की रक्त वाहिका में रूकावट होने पर उसमें स्टंट डालकर रक्त प्रवाह सामान्य किया जाता है अब पैर की रक्त मुख्य रक्त वाहिका में रूकावट होने पर वैलूनिंग और स्टंटिंग कर रक्त प्रवाह को सामान्य किया जाता है। संजय गांधी पीजीआई में सोसाइटी फार इंटरवेंशन रेडियोलाजी के अधिवेशन में अायोजक प्रो.शिव कुमार ने बताया कि  शरीर के निचले हिस्से पैर, पेलविस, जनांग में रक्त मुख्य रक्त वाहिका एरोटा और इलियक से पहुंचता है । उम्र बढ़ने के साथ इस रक्त वाहिका में रूकावट अा जाती है जिसके कारण इन अंगों में रक्त संचार रूक जाता है या कम हो जाता है जिसके कारण पैर में दर्द, पैर ठंडा, पहना , पैर में घाव, गैंगरीन की परेशानी होती है। जनांग में रक्त संचार कम होने के कारण नपुंसकता की स्थित तक अा जाती है। विशेषज्ञों ने बताया कि हम लोग केथेडर से जहां पर रूकावट होती है नस में  वहां पर पहुंच रूकावट को दूर कर वैलूनिंग करने के बाद स्टंट लगा देते है जिससे रक्त प्रवाह सामान्य हो जाता है। बताया कि   65 के बाद 12 से 20 फीसदी लोगों में पेरीफेरल अार्टरी डिजीज की परेशानी होती है।   

सूई से ब्रर्टीब्रा में बोन सीमेंट भर कर ठीक होगा फ्रैक्टर
 
सूई से ब्रर्टीब्रा( रीढ़ की हड्डी की कशेरूका) में बोन सीमेट भर कर इसके फ्रैक्टर को ठीक करना संभव हो गया है। इस तकनीक को ब्रर्टीब्रा प्लास्टी या केफैलोप्लास्टी कहा जाता है। उम्र बढ़ने के साथ हड्डी में कैल्शियम की कमी के कारण कशेरूका में फ्रैक्टर हो जाता है जिसके कारण रीढ़ की हड्डी में दर्द के कारण पीढ़ में दर्द, कमर सीधे न होने की परेशानी होती है । इंटरवेंशन तकनीक से जिस कशेरूका में फ्रैक्टर होता है वहां पर उसके अंदर निडिन से पहले होल बनाते है फिर उसके अंदर बोन सीमेंट भर देते है इसमें एक घंटे का समय लगता है और मरीज अोपेन सर्जरी से बच जाता है। लाइफ स्टाइन ठीक हो जाती है।

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

पीजीआई में ब्रासकान-2018-- ट्यूमर का अाकार घटा कर बचाया जा सकता है स्तन

पीजीआई में ब्रासकान-2018

ट्यूमर का अाकार घटा कर बचाया जा सकता है स्तन

बढ़ रही है स्तन कैंसर के प्रति जागरूरकता
अब चालिस फीसदी महिलाएं स्तन कैंसर के शुरूअाती दौर में ले रही है विशेषज्ञ से सलाह
   

स्तन कैंसर के मामले में ट्यूमर के अाकार को दवा से छोटा करने के साथ एक्सिला की गांठ को निकाल कर स्तन को बचाया जा सकता है लेकिन यह तभी संभव है जब स्तन कैंसर के  मरीज विशेषज्ञ के पास शुरूअाती दौर में  पहुंचे। संजय गांधी पीजीआई में अायोजित सोसाइटी फार ब्रेस्ट एस्थेटिक एंड रीकांस्ट्रेक्टिव सर्जरी ब्रास कान 2018 में अर्ली ब्रेस्ट कैंसर को लेकर विशेषज्ञों ने चार्चा की है। संस्थान के इंडोक्राइनोलाजिस्ट प्रो. गौरव अग्रवाल, प्रो. ज्ञान चंद और प्लास्टिक सर्जन प्रो. अंकुर भटनागर ने बताया कि महिलाअों में स्तन कैंसर को लेकर जागरूकता अायी है पहले शुरूअाती दौर में 10 फीसदी से भी  महिलाएं विशेषज्ञ के पास पहुंचती थी लेकिन अब 40 फीसदी महिलाएं शुरूअाती दौर में पहुंच रही है लेकिन इलाज में अभी भ्रांति है कि कैंसर है तो पूरा स्तन ही निकाल दें। प्रो.ज्ञान चंद ने बताया कि शुरूअाती दौर में अाने पर हम लोग कीमोथिरेपी से गांठ के अाकारा को कम करते है इससे पूरा कैंसर युक्त ट्यूमर निकल जाता है। एक्सिला( कांख) में सेंनटेनियल ग्लैड बायोप्सी कर देख कैंसर की अाशंका देखते है यदि इसमें कैंसर है ग्लैड को निकाल देते है इससे दोबारा कैंसर की अाशंका बिल्कुल कम हो जाती है।इस तरीके हम लोग 60 फीसदी से अधिक स्तन कैंसर की महिलाअों के स्तन को बचा सकते है । 

नहीं है जीवन के अायु पर फर्क

प्रो.ज्ञान चंद का कहना है कि  स्तन कैंसर के इलाज में पूरा स्तन निकलाने और स्तन को बचाने दोनों इलाज की तकनीक में टोटल सर्वाइवल लगभग बराबर है। कहने का मतलब है कि स्तन कैंसर युक्त महिला का जीवन दस साल है दोनों तकनीक से इलाज में जीवन दस साल ही रहेगा। देखा गया है कि स्तन बचाने वाली सर्जरी में कुछ मामलों में लोकल रीकरेंश होता है जिसका इलाज कर दिया जाता है। 


पीठ और पेट की चर्बी से बनाते है स्तन

प्रो. अंकुर भटनागर ने बताया कि स्तन निकल जाने पर हम लोग पीठ की मांसपेशी ( लैटिमस डोरसाई) , पेट की चर्बी से स्तन बना देते है इसके अलावा जिन महिलाअों में केवल स्तन में ट्यूमर को निकाला जाता है वहां गडढे को स्तन की मांसपेशी से भर जाते है जिससे स्तन का अाकार खराब नहीं होता है। जिनमें यह संभव नहीं होता उनमें इंप्लांट लगाते हैं। अब तक पीजीआई में हम लोग 30 से अधिक महिलाअों में ब्रेस्ट रीकांस्ट्रेक्टिव सर्जरी कर चुके हैं। 

वहीं कराएं इलाज जहां हो सब सुविधा
विशेषज्ञों ने कहा कि ब्रेस्ट कैंसर का इलाज उसी सेंटर पर कराना चाहिए जहां पर मल्टी स्पेशिएल्टी हो जिससे इलाज की सफलता दर बढ़ती है और मरीज को दौड़ना नहीं पड़ता है।     स्तन कैंसर के इलाज के लिए मल्टी डिस्पेलेनरी विशेषज्ञता की जरूरत होती है जिसमें इंडो सर्जन ,प्लास्टिक , रेडियोथिरेपी, हिस्टोपैथोलाजिस्ट , रेडियोलाजिस्ट की अहम भूमिका है
 

गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018

पीजीआई में ब्रांसकान -2018 --- स्तन कैंसर के बाद भी नहीं रहेंगी अधूरी



पीजीआई में ब्रांसकान -2018 

स्तन कैंसर के बाद भी नहीं रहेंगी अधूरी 

बकरार रखी जा सकती है ब्रेस्ट की सुंदरता

ब्रेस्ट कैंसर की सर्जरी के दौरान ही होती है रीकांस्ट्रेक्टिव सर्जरी नहीं बढ़ता खर्च



स्तन कैंसर के इलाज  अब महिला अधूरी नहीं रहेगी।  स्तन निकलाने के बाद भी स्तन की सुंदरता को रीकंस्ट्रेक्टिव सर्जरी से बकरार रखा जा सकता है लेकिन  दस फीसदी से कम महिलाएं और उनके परिजन स्तन की सुंदरता बनाए रखने के लिए रीकंस्ट्रेक्टिव सर्जरी पर अमल करते है । इनका मानना होता है कि  सर्जरी में खर्चा बढ़ जाएगा।  विशेषज्ञों का कहना है कि  स्तन कैंसर की सर्जरी के दौरान ही यदि रीकंट्रेक्टिव सर्जरी की जाए तो इलाज के खर्च पर कोई असर नहीं पड़ता है । बस सर्जरी का समय एक से 1.5 घंटे बढ जाता है। स्तन कैंसर से जुडी तमाम  जनाकारी देने के लिए पहली बार संजय गांधी पीजीआई में सोसाइटी अाफ रीकांस्ट्रेक्टिव एंड एस्थेटिक(ब्रांसकांन 2018)  विशष कार्यशाला का अायोजन कर रहा है। संस्थान के इंडो सर्जरी विभाग के प्रो.गौरव अग्रवाल , प्लास्टिक सर्जरी विभाग के प्रो. अंकुर भटनागर और इंडो सर्जन प्रो.सबारत्नम ने बताया कि स्तन कैंसर के इलाज के लिए मल्टी डिस्पेलेनरी विशेषज्ञता की जरूरत होती है जिसमें इंडो सर्जन ,प्लास्टिक , रेडियोथिरेपी, हिस्टोपैथोलाजिस्ट , रेडियोलाजिस्ट की अहम भूमिका है इस एसोसिएशन के जरिए सभी को मंच पर लाया गया है। इस कार्यशाला में सभी विधाअों से जुडे लोगों के अलावा महिला रोग विशेषज्ञ, एमबीबीएस छात्रों को स्तन कैंसर के इलाज के बारे में जानकारी दी जाएगी। वर्कशाप में यूनिवर्सटी मलाया कुअालालम्पुर की प्रो.एमीरेटस चेंग हर चिप, सिंगापुर से माइकल हार्टमैन, अमेरिका से डा. पीटर कैरीडो सहित कई विशेषज्ञ जानकारी देने अा रहे हैं। 

पीठ और पेट की चर्बी से बनाते है स्तन

प्रो. अंकुर भटनागर ने बताया कि स्तन निकल जाने पर हम लोग पीठ की मांसपेशी ( लैटिमस डोरसाई) , पेट की चर्बी से स्तन बना देते है इसके अलावा जिन महिलाअों में केवल स्तन में ट्यूमर को निकाला जाता है वहां गडढे को स्तन की मांसपेशी से भर जाते है जिससे स्तन का अाकार खराब नहीं होता है। जिनमें यह संभव नहीं होता उनमें इंप्लांट लगाते हैं। अब तक पीजीआई में हम लोग 30 से अधिक महिलाअों में ब्रेस्ट रीकांस्ट्रेक्टिव सर्जरी कर चुके हैं। 

वहीं कराएं इलाज जहां हो सब सुविधा
विशेषज्ञों ने कहा कि ब्रेस्ट कैंसर का इलाज उसी सेंटर पर कराना चाहिए जहां पर मल्टी स्पेशिएल्टी हो जिससे इलाज की सफलता दर बढ़ती है और मरीज को दौड़ना नहीं पड़ता है।    

मनोवैज्ञानिक इलाज करने में नर्सेज की भूमिका अहम- अाशुतोष टंडन

मनोवैज्ञानिक इलाज करने में नर्सेज की भूमिका अहम- अाशुतोष टंडन


बदल रही नर्सेज की भूमिका

तकनीक अौर मानवता के बीच रखना होगा सामंजस्य





















संजय गांधी पीजीाई के  नर्सिग कालेज के दसवें स्थापना दिवस और अाठवें लैंप लाइटिंग सिरोमनी में वह बतौर मुख्य अतिथि अाशुतोष टंडन ने कहा चिकित्सा शिक्षा मंत्री अाशुतोष टंडन ने कहा कि मरीज के इलाज में दवा के अलावा मनोवैज्ञानिक इलाज की भूमिका काफी अहम है। मरीज बात -चीत और स्नेह से काफी संतुष्ट होता है । देखा गया है कि मरीज का मनोबल अच्छा है तो वह जल्दी ठीक होता है इस काम नर्सेज काफी अहम भूमिका निभा सकती है। कहा कि प्रदेश में जितने भी चिकित्सा शिक्षा संस्थान है उनमें एसजीपीजीआई का नाम सबसे ऊपर है यह गर्व की बात है। यहां के छात्र जहां भी जाए संस्थान नाम एेसे ही ऊंचा करते रहे ।  
   संस्थान के निदेशक प्रो.राकेश कपूर ने कहा कि मृदु भाषी बने। नर्सिग की पढाई कर रही छात्राअों के कहा कि वह अच्छी नर्स के साथ ही अच्छा इंसान बन कर यहां से निकलें। समय के साथ नर्सिग बदल रहा है अागे चल कर क्लीनिकल असिसटेंट के रूप में बायोप्सी,अल्ट्रासाउंड जैसे काम भी करने होंगे।  मुख्य चिकित्सा अधीक्षक ने कहा कि जंम अौर मृत्यु दोनों समय व्यक्ति नर्स के हाथ में होता है इस कभी अपना टेंपर लूज न करें। काम के दबाव के साथ अपने को सामान्य बनाए रखें। 
कालेज अाफ नर्सिग के नोडल अाफीसर प्रो.राजेश हर्षवर्धन ने कहा कि अब नई तकनीक अौर मानवीय संवेदना दोनों के साथ नर्स को सामंजस्य बनना है । दोहरा चैलेंज है जिसे स्वीकार करना है। संस्थान के अतिरिक्त निदेशक जयंत नारलीकर, डीन प्रो.अारएन मिश्रा, कर्मचारी महासंघ की अध्यक्ष सावित्री सिंह, न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग के प्रमुख प्रो.एके शुक्ला , बायोस्टेटिक्स विभाग के प्रमुख प्रो.सीएम पाण्डेय ने कहा कि  नर्स अस्पताल की हृदय है बिना इनके अस्पताल संभव नहीं है। मरीज से सबसे अधिक करीब यही रहती है इस लिए इनकी सजगता और संवेदना काफी महत्वपूर्ण है।   


बीएससी की छात्रों ने ली शपथ

लैंप लाइटिंग समारोह में अग्नि को साक्षी मानकर सेवा की शपत छात्रों ने लिया। पहले साल की किताबी पढाई के बाद अब यह छात्र वार्ड में मरीजों के साथ काम करके प्रैक्टिकल ज्ञान हासिल करेंगी। 







इन टापरों को मिला सम्मान

बीएससी फोर्थ ईयर- प्रथम- आदित्य कुशवाहा, दूसरा - सौम्या प्रकाश  , तीसरा- प्रियंका स्पेंसर

बीएससी थर्ड ईयर- प्रथम- प्रियंका राय, दूसरा- राखी रावत, तीसरा- गुंजन सोनी

बीएससी सेकेंड ईयर- प्रथम- निकिता तिवारी, दूसरा स्थान- रसिक लाल, तीसरा स्थान- श्वेता राव

बीएसएसी फर्सट ईयर- प्रथम-स्नेहा सिंह दूसरा -प्रियंका यादव , तीसरा स्थान- शिखा भदौरिया

नेशनल कांफ्रेंस विनर
प्रथम पुरस्कार- जतिन जोसफ, रितिका टंडन, क्विज विनर- डेनिश सिंह, , पर्सनालटी कंटेस्ट विनर- रितिका टंडन