बुधवार, 20 दिसंबर 2017

पीजीआई में वेंटीलेटर युक्त सीसीएम में 18 बेड के लिए 280 की वेटिंग

पीजीआई में सीसीएम के 18 बेड के लिए  280  की वेटिंग





रोज अाठ से दस  वीाईपी काल  वेंटीलेटर के लिए 
गंभीर मरीज को लेकर न अाए पीजीआई



38 वर्षीय अारती की हालत गंभीर है । बनारस से डाक्टर ने पीजीआई रिफर कर दिया सीधे लेकर परिजन पीजीआई अा गए यहां पर सीसीएम में वेड न खाली होने के कारण भर्ती नही किया गया। परिजन पीजीआई के निकट ही एक निजि अस्पताल में ले गए जहां पर भर्ती कराया लेकिन रोज का 30 से 35 हजार का बिल परिजनों पर भारी पड़ रहा है। परिजन पीजीआई के सीसीएम में वेटिंग कराए है लेकिन यहां पर पहले से 279  मरीज वेटिंग में है । यह तो एक उदाहरण है रोज संस्थान में अाठ से दस मरीज एेसे ही गंभीर हालत में पहुंचते है। सूत्रों की माने तो रोज 15 से 20 फोन काल वीआईपी के सीसीएम में भर्ती के लिए अाते है । संस्थान के क्रिटिकल केयर वेटिंग में 18 बेड लाइफ सपोर्ट सिस्टम से लैस है जिसके लिए अाज तक 280 गंभीर मरीज वेटिंग में हैं। बेड के लिए मंत्री, अाईएएस, विधायक अौर सांसदों के सिफारशी पत्र के साथ मरीज के तीमारदारों की लंभी कतार निदेशक के सामने को देखने को मिला। हर किसी से निदेशक से मिलते हैं वह भी लाचार हो जाते हैं। सिफारिश अाने पर वह सीसीएम में फोन मिलाते यही बताते के लिए भईया हमारे पास बेड नहीं है।  फिर भी वेंटिग लिस्ट में नाम नोट करा दीजिए । बेड खाली होने पर अाप के पास काल जाएगी। मरीज के तीमारदार निराश हो कर यही कहते है कहां जाए निजि अस्पताल में जहां रखा है रोज 40 से 50 हजार लग रहा है।  संस्थान के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रो.अमित अग्रवाल कहते है कि कि स्थित तब अौर नाजुक हो जाती है जब लोग गंभीर मरीज लेकर अा जाते है एेसे में आसीयू में बेड खाली नहीं रहता है।  मरीज की जिंदगी को खतरा रहता है। 



गंभीर मरीज लेकर सीधे पीजीआई न अाएंं। पहले यहां केस समरी दिखा कर बेड की स्थित पता कर लें. हम लोग वेटिंग लिस्ट बनाते है जिस मरीज में हम कुछ कर सकते है इसके अाधार पर मरीज के परिजनों को काल करते है । वेंटीलेचर वाले मरीज को वेंटीलर युक्त ही बेड दिया जा सकता है ....निदेशक प्रो.राकेश कपूर 





शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

अफगानिस्तानी 16 महीने के बच्चे की पीजीआई में हुई दिल की सर्जरी ---- नहीं बना था बच्चे के दिल में ट्राइक्सपिड वाल्व

अफगानिस्तानी 16 महीने के बच्चे की पीजीआई में हुई दिल की सर्जरी
नहीं बना था बच्चे के दिल में ट्राइक्सपिड वाल्व 
फोनटान तकनीक से सीधे फेफडे में पहुंचाया खून


      



संजय गांधी पीजीआई के कार्डियो वेस्कुलर सर्जरी विभाग के प्रो.निर्मल गुप्ता की टीम ने अफगानिस्तान के काबुल शहर के 16 महीने के बच्चे नसीउल्लाह 
के दिल की सर्जरी को बीती देर रात में  अंजाम दिया है। बच्चे के दिल के चेम्बर  को विभाजित करने वाले एक खास वाल्व  ट्राइक्सपिड में जंमजात बनावटी खराबी थी जिसके कारण उसे सांस लेने में परेशानी हो रही थी। शरीर पर नीला पन था। वाल्व में खराबी के कारण खून फेफडे में सही तरीके से नहीं जा पा रहा था जिसके कारण शरीर में अाक्सीजन की कमी हो रही थी। प्रो.गुप्ता की टीम ने फोनटान तकनीक से दिल की सर्जरी कर रक्त प्रवाह को सामान्य किया  जिसमें दिल के चेम्बर राइट वेंट्रिकल को बाई पास कर इंफीरियन वेना कावा और सुपीरियर वेना कावा के जरिए सधी वेनस से खून के प्रवाह को पल्मोनरी अार्टरी में कर दिया। अब पल्मोनरी अार्टरी से खून फेफडे में जाकर वहां से अाक्सीजन लेकर मुख्य रक्त वाहिका के जरिए अाक्सीजन युक्त खून का संचार शरीर में होगा।  यह काबुल का चौथा मरीज है जो संस्थान में इलाज के लिए अा चुके हैं। टीम में डा नरेश . डा. अंकिता , डा. पुनीत , राज कुमार यादव , सुनीता जोसफ, अस्तर हैरून विशेष रूप से शामिल हैं।   

क्या है ट्राइक्सपिड एटरेसिया
दिल में चार चेम्बर होते है जिसे राइट एट्रियम, लेफ्ट एट्रियम और राइट वेंट्रीकल और लेफ्ट वेंट्रीकल कहा जाता है दिल में लेफ्ट साइड से खून एओटा में जाता है जहां से शऱीर में पहुंचता है। वाल्व खून को फ्लो की दिशा को नियंत्रित करता है । ट्राइक्सपिड वाल्व में बनावटी खराबी होने पर राइट तरफ का हार्ट ठीक से काम नहीं करेगा शुद्ध और खराब खून अाफस में मिक्स हो जाएगा। खून फेफडे में नहीं जाएगा जिससे खून का अाक्सीजनेशन नहीं होगा शरीर में अाक्सीजन की कमी हो जाएगी। 


गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

ताकि बच सके किसी का जीवन

ताकि बच सके किसी का जीवन
कोई कमजोरी नहीं अाती 
जागरण संवाददाता। लखनऊ 
जब किसी का परिजन बीमार पड़ता है और डाक्टर कहते है कि खून की जरूरत है।  इसके लिए रक्त दाता लाएं ..एेसे में परिजनों के सामने बडी परेशानी खड़ी हो जाती है एेसे ही तमाम परिजनों की परेशानी दूर करने के लिए संजय गांधी पीजीआई के स्थापना दिवस के मौके कई लोगों ने स्वैछिक रक्तदान किया। कर्मचारी महासंघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष धर्मेश कुमार का ब्लड ग्रुप अो निगेटिव है जो बहुत ही महत्व पूर्ण है । कम लोगों मे मिलता है इस ग्रुप के मरीजों का जीवन बचाने में सहयोग के लिए खुद रक्तदान करने आए। कहा कि देकर अच्छा लगता है। इसी तरह हृदय रोग विशेषज्ञ प्रो.सुदीप कुमार इनकी पत्नी  नीमा पंत भी रक्तदान करने पहुंचे कहा कि इससे बडा कोई दान नहीं है। संस्थान के रेडियोथिरेपी विभाग के प्रमुख प्रो.शालीन कुमार भी स्वैछिक रक्त दान किए कहा कि एक व्यक्ति के रक्त दान से चार मरीजों का भला हो जाता है हमारे संस्थान में कंपोनेंट सेपरेट कर अलग -अलग दिया जाता है। इनके अलावा तकनीकि अधिकारी डीके सिंह ने हर बार रक्तदान करके लिए 102 बार रक्तदान का अांकडा पूरा किया। इनके अलावा तकनीकि अधिकारी  अखिलेश कुमार, राम सरन , शशांक सिंडे , डा.  अतुल गर्ग, डा. वरूण कुमार, डा. लक्ष्मी सिंह. डा.सुमित कुमार, डा.वानी,  सतीश चंद्रा ने 83 वीं बार , मो, इमरान,अरविंद कुमार वर्मा , कमलेश भराती, केके चतुर्वेदी ने  सहित कई लोगों ने रक्तदान के बाद  कहा कि हर व्यकित् को रक्तदान करने का संकल्प लेना चाहिए कोई कमजोरी नहीं अाती है।

सरकार कैंसर संस्थान पीजीआई को सौंपे तो बना देंगे टाटा कैंसर जैसा संस्थान- प्रो.राकेश कपूर

सरकार कैंसर संस्थान  पीजीआई को सौंपे तो बना देंगे टाटा कैंसर जैसा संस्थान- प्रो.राकेश कपूर
काम के बदौलत हम उत्तर भारत के तीसरे बडे अस्पताल
जागरणसंवाददादा। लखनऊ
संस्थान के निदेशक प्रो.राकेश कपूर ने कहा गंजरिया में बनने वाले कैंसर संस्थान को हम टाटा कैंसर इंस्टीट्यूट की तरह अतिविशिष्ट संस्थान बनाना चाहते है यदि सरकार यह संस्थान हमें ट्रामा सेंटर की तरह दे तो एेसा करना हमारे लिए संभव है क्योंकि हमारे पास पहले से देश के जाने माने विशेषज्ञ उपलब्ध है। हमारे पास योजनाएं है और काम करने का अनुभाव है जिसके कारण हम कुछ ही दिनों में उत्तर भारत की तीन बडे अस्पतालो में शामिल है। हमसे पहले के संस्थान काफी पीछे है। कहा कि हमारा किसी से कंपटीशन नहीं है हम काम करते है और करते रहेंगे। अाज हम जो भी वह हमारे संस्थान के संकाय सदस्यों, लैब टेक्नोलाजिस्ट और नर्सेज की कार्य में समपर्ण की भावना के कारण है। कहा कि हर सवंर्ग में कुछ समस्याएं है जिनकों हम धीरे-धीरे दूर रहे है क्योंकि हमारे संस्थान के लोग दुःखी रहेंगे तो हमरे मरीज का दर्द कैसे दूर करेंगे। कहा कि हमारे काम की गुणवत्ता हमारे लिए परेशानी खडी कर रही है हर मरीज यही रिफर हो रहा है जिसके कारण हम कई लोगों को बेड नहीं दे पा रहे है जिसके लिए हमें खेद है। हम इमरजेंसी मेडिसिन, किडनी ट्रांसप्लांट सेंटर के लिए सेंटर बना रहे है लिवर ट्रांसप्लांट को भी बूस्ट करने की योजना है। 

ऊंचाहार घटना के सभी मरीज हमने ठीक किया

ऊंचाहार घटना के शिकार सभी मरीज को हमारे संस्थान के डाक्टरों ने चैलेंज के रूप में लेकर बचा लिया बाकी संस्थान मरीजों को दिल्ली भेज दिए । हमारे पास बर्न सेंटर भी नहीं था लेकिन हमने कम संसाधन में सबको ठीक कर लिया। स्वाइन फ्लू वार्ड जो निष्क्रिय था उसे घटना के दिन रात में 12 बजे एक्टीवेट कराया । 

यह ह्ए सम्मानित

-डा. साई सरन पीवी सीसीएम बेस्ट रेजीडेंट एवार्ड
- डा. पीयूष वार्षनेय गैस्ट्रो सर्जरी बेस्ट एमसीएच
- अजय नरायण वर्मा गैस्ट्रो मेडिसिन बेस्ट टेक्नोलाजिस्ट ग्रेड-1
- अल्का मोहन सीवीटीएस बेस्ट नर्स ग्रेड -1
-रोजिला मनी एब्राहम सीसीएम बेस्ट नर्स ग्रेड -2

सरकारी अस्पताल एनएबीएच से कराएं प्रमाणीकरण-प्रो.एसके सरीन






सरकारी अस्पताल एनएबीएच से कराएं प्रमाणीकरण-प्रो.एसके सरीन
एबीबीएस स्तर पर शिक्षा में बदलाव की जरूरत
पीजीआई ने शुरू की है एनएबीएच प्रमाणीकरण की प्रक्रिया


हर अस्पताल को नेशनल एक्रीडेशन बोर्ड फार हास्पिटल एंड हेल्थ केयर( एनएबीएच) से प्रमाणित कराना चाहिए। इससे अस्पताल कमी का पता चलता है जिसे दूर किया जा सकता है। इससे एक मानक तय हो जाता है कि मरीज को कितनी देर  और किस तरह का इलाज मिल रहा है।यह बात गुरूवार को संजय गांधी पीजीआई के 34 वें स्थापना दिवस के मौके पर इंस्टीट्यूट अाफ लिवर एंड हिपैटोबिलेरी साइंस( अाईएलबीएस) के निदेशक एवं एमसीआई के पूर्व चेयरमैन प्रो.एसके सरीन ने कही । कहा कि कारपोरेट अस्पताल तो एनएबीएच से प्रमाणीकरण कराते है लिकन सरकारी अस्पताल उसे पुराने ढर्रे पर चल रही है। इसमें बदलाव की जरूरत है। कहा कि 68 हजार एबीबीएस की सीटे है जबिक पीजी की 35 हजार सीट है । इस तरह 32 हजार बच्चे पीजी नहीं कर पाते है इस लिए एबीबीएस स्तर पर ही पढाई का स्तर काफी उंचा करना पडेगा। एमबीबीएस करने वाले छात्रो को विशेषज्ञ बनना बडी चुनौती है । इनको बढिया डाक्टर बनाने के लिए उनमें सीखने की रूचि पैदा करनी होगी। मरीज को अच्छा सपोर्ट दे। डाटा अच्छी तरह से कलेक्ट करे। बात-चीत का तरीका सौम्य होना चाहिए इसके साथ ही वह समाज , मरीज और प्रोफेशन के लिए जवाबदेह यह गुण पैदा करने के लिए एमबीबीएस स्तर ही काफी बदलाव की जरूरत है। क्लीनिकल सर्विस, मेडिकल प्रोफेशन में पैरा मेड़िकल स्टाफ जैसे नर्सेज    में उन्ही को लेना चाहिए जिनके पास सेवा भाव हो हम लोग एक्जाम उसका ज्ञान देखते है जिससे उसमें कितनी मानवता है , सेवा भाव है इसका पता नहीं लगता है। इस लिए इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है। मेडिकल छात्रों के बारे में कहा कि उनका लक्ष्य हमेशा उंचा रहना चाहिए , गुणवत्ता से कभी समझौता न करें। छात्र ही टीचर की क्वालिटी का अाकलन करें और जो छात्र अच्छे है उनके संस्थान कैसे अपने यहां रोके इसके लिए पालसी की जरूरत है। सीएमएस प्रो.अमित अग्रवाल ने कहा कि हम एनएबीएच से प्रमाणीकरण के लिए प्रक्रिया शुरू कर दिए है।




बीस फीसदी मामलों में होता है डायग्नोसिस की गल्ती
प्रो.सरीन ने कहा कि हमारे देश में बीस फीसदी मामलों में गलत बीमारी डायग्नोस होती है अमेरिका में यह 17 फीसदी है इस लिए गल्ती को छिपाएं नहीं । होता यह है कि एक बार जो डायग्नोसिस बन जाती है वहीं अाखिरी तक मान कर इलाज चलता रहता है प्राइमरी डायग्नोसिस को क्रास चेक करना चाहिए। नर्सेज भी इस तरह की गल्ती करती है जिसमें मिलते-जुलते नाम की दवा दी जाती है इसमें तुरंत गल्ती को बताना चाहिए इससे सुधार या बचाव के उपाय संभव हो सकेंगे। 

बनने जा रहा है नेशनल मेडिकल कमीशन 

मेडिकल एजूकेशन और चिकित्सा पर नियंत्रण के लिए भारत सरकार नेशनल मेडिकल कमीशन बिल अाने जा रहा है। प्रो.सरीन ने कहा कि इसमें सभी  भाग  एबीबीएस, पीजी, नियंत्रण नियमावली शामिल , नियंत्रण शामिल होंगे। इसमें परेशानी यह है कि 99 फीसदी सरकारी नियंत्रण में होगा इससे ब्यरोक्रेसी उस विषय़ पर फैसला लेना जिस पर डाक्टरों को फैसला लेना है एेसा न हो कि अच्छा के चक्कर में बुरा हो जाए इसलिए सरकार को इसमें डाक्टरों को ही भागीदार बनाना चाहिए। 



मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

भर्ती होने के बाद अस्पताल में चालिस फीसदी में होता है इंफेक्शन

भर्ती होने के बाद अस्पताल में चालिस फीसदी में होता है इंफेक्शन


इंफेक्शन के कारण बढ़ जाता है इलाज का खर्च

यूटीआई है भर्ती मरीजों के लिए सबसे बडा दुश्मन



अस्पताली इंफेक्शन मरीज के  इलाज का खर्च बढा रहा है। लंबे समय तक बेड पर रहने के कारण दूसरे मरीज को भर्ती होने का मौका नहीं मिलता। इस तरह अस्पताल में होने वाले संक्रमण के कारण मरीज तो खुद परेशान हो ही रहा है। साथ में दूसरे मरीज को भी परेशान कर रहा इसके साथ इलाज करने वाले डाक्टर के लिए भी परेशानी खड़ी कर रहा है। संजय गांधी पीजीआई के हास्पिटल इंफेक्शन कमेटी के नोडल अाफीसर प्रो. राजेश हर्ष वर्धन ने कहा कि हास्पिटल इंफेक्शन की गाइड लाइन को फालो कर अस्पताल में होने वाले संक्रमण को घटा कर 33 फीसदी तक लाया जा सकता है। मरीज के भर्ती होने के बाद इंफेक्शन होने के कारण मरीज तीन से 14 दिन अधिक भर्ती रहना पड़ता है। सबसे अधिक हास्पिटल जनित इंफेक्शन का खतरा सर्जरी वाले , अाईसीयू वाले मरीजों में होता है। इस पर रोक लगाने के लिए संस्थान के माइक्रोबायलोजी विभाग के साथ मिल कर कार्यशाला का अायोजन किया है। प्रो. राजेश ने कहा कि आईसीयू में हास्पिटल जनित संक्रमण अाठ फीसदी मानक है लेकिन विकासशील देशों में यह चालिस फीसदी तक है। देखा गया है कि  यूटीआई( यूरनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन) 15 से 40 फीसदी , सर्जरी वाली जगह पर 15 से 25 फीसदी, सेप्टीसीमिया 7 से 10 फीसदी और वेंटीलेटर के कारण निमोनिया दो से पांच फीसदी मरीजों में होता है। इसके कारण मरीजों को अस्पताल में अधिक समय तक भर्ती रहना पड़ता है। 

केवल हैंड हाइजिन से कम हो सकता है इंफेक्शन

प्रो. हर्ष वर्धन ने कहा कि केवल हाथ धुल कर मरीज को छूने से हास्पिटल जनित इंफेक्शन को 20 फीसदी तक कम किया जा सकता है लेकिन काम के दबाव और सुविधा की कमी के कारण 70 फीसदी लोग इसे फालोनहीं करते । 


80 फीसदी अस्पतालों में 20 फीसदी गाइड लाइन का नहीं होता फालो

विशेषज्ञों का कहना है कि 20 फीसदी अस्पताल 80 फीसदी गाइड लाइन फालो करते है लेकिन 80 फीसदी अस्पताल बीस फीसदी भी गाइड लाइन फालो नहीं करते है जिसके कारण भर्ती होने के बाद मरीज में अस्पताल में इंफेक्शन होता है। 



 

अस्पताल फालो करें ये गाइड लाइन
- हास्पिटल इंफेक्शन कमेटी बने
- सार्विलांस यानि एयर सैम्पल कर देखा जाए कहां कितना इंफेक्शन है
- इंफेक्शन खत्म करने के उपाय के बाद उसका अाडिट किया जाए  

रविवार, 10 दिसंबर 2017

पीजीआई के चार विभाग के विशेषज्ञों ने एक साथ मिल कर बचायी जान

पीजीआई के चार विभाग के विशेषज्ञों ने एक साथ मिल कर बचायी जान

नार्थ इंडिया में इस तरह की हुई पहली सर्जरी

एड्रिनल ग्लैड से दिल में चला गया खून का थक्का

दिल की बाईपास सर्जरी के साथ ही एड्रिनल ग्लैड, लिवर और किडनी की हुई सर्जरी


नार्थ इंडिया का यह पहला मामला है जिसमें  दिल की बाईपास सर्जरी के साथ ही एड्रिनल ग्लैड, लिवर और किडनी की सर्जरी कर किसी मरीज को जीवन दिया गया हो। पैतिस वर्षीय रूकमी के चेहरे पर बाल, अनियंत्रित ब्लड प्रेशर की परेशानी लेकर संजय गांधी पीजीआई के इंडोक्राइनो सर्जरी विभाग के प्रो.अमित अग्रवाल से संपर्क किया तो अनुभाव के अाधार पर देखते ही जान गए कि एड्रिनल ग्लैंड में परेशानी है जांच करायी तो पुष्टि हुई कि एड्रिनल ग्लैंड में ट्यूमर है लेकिन प्रो.अमित की परेशानी तब बढ़ गयी जब देखा कि ग्लैंड से दिल को जाने वाली नली रीनल वेन से खून का थक्का इंफीरियर वेना केवा के जरिए दिल के दहिने एट्रियम में फंस गयी है जिससे इसकी जान भी जा सकती है। इसके साथ कैंसर किडनी और लिवर को भी अपने चपेट में ले लिया था। किसी दूसरे अस्पताल के लिए यह ला इलाज मामला था लेकिन हमारे पास हार्ट सर्जन सहित अन्य विशेषज्ञता की टीम एक छत के नीचे है जिसका फायदा इस मामले में मिला। हमने हार्ट सर्जन प्रो. गौरंग मजूमदार, प्रो.एसके अग्रवाल,गैस्ट्रो सर्जन प्रो. अानंद प्रकाश, यूरोलाजिस्ट प्रो. राकेश कपूर और प्रो.संजय सुरेका और निश्चेतना विशेषज्ञ प्रो. प्रभात तिवारी के साथ पूरा मामला रखा सबने तय किया कि पहले हार्ट की बाई पास सर्जरी कर थक्का निकाला जाए। हार्ट सजर्न की टीम ने बाई पास सर्जरी थक्का निकाला। साथ हम लोगों ने एड्रिनल ग्लैंड के साथ , लिवर और किडनी के प्रभावित भाग को निकाला। काफी जद्दोजहद के बात रूकमी के हालत में सुधार होने लगा । फालोअप पर आयी रूकमी ने सभी के प्रति अाभार प्रकट किया। प्रो. अमित का कहना है संस्थान में डेडीकेटेड टीम के कारण एेसे जटिल कैस को हैंडिल करना संभव हुअा। विशेषज्ञों का कहना है कि नार्थ इंडिया में अभी इस तरह का केस रिपोर्ट नहीं हुअा है। 


टीईओ से पल -पल रखा थक्के पर नजर

प्रो.प्रभात तिवारी ने ट्रांस इंसोफेजियल इकोग्राफी ( टीईअो) कर थक्के के स्थित पर नजर रखा यदि थक्का फट जाता तो दिल की रक्त वाहिका बंद हो जाती है जिससे बडी परेशानी खडी हो सकती थी । इसके अलावा एनेस्थेसिया देने में भी विशेष सावधानी की जरूरत पडी। 

भोजन, शारीरिक गतिविध और दवा के बीच ही डायबटीज मरीजों में सीधा रिश्ता

पीजीआई में इंडोक्राइन साइंस समिट

केवल दवा से नहीं संभव है डायबिटीज पर कंट्रोल
भोजन, शारीरिक गतिविध और दवा के बीच ही सीधा रिश्ता
बिस्कुट और अालू को करें ना


डायबिटीज पर नियंत्रण के लिए तीन तरफ से प्रहार करने की जरूरत है। भोजन, शारीरिक गतिविधि और दवा तीनो में खास रिश्ता है। तीनो के बीच सामंजस्य बना कर ही लंबे समय तक शुगर को नियंत्रित किया जा सकता है। हर डायबिटीज मरीज को पोषण विशेषज्ञ के सलाह से भोजन लेना चाहिए सलाह के इतर जाने पर शुगर का स्तर बढ़ जाता है। इसके साथ कम से अाधे घंटे फिजिकल रूप क्रियाशील यानि तेज चलना, व्यायाम शामिल है करने की जरूरत है तभी दवा से फायदा होगा नहीं तो दवा लेने के बाद शुगर के स्तर उतार -चढाव होता रहेगा। यह बात संजय गांंधी पीजीआइ में अायोजित इंडोक्राइन साइंस समिट में संस्थान की डा. मनीषा काकाजी ने कही। कहा कि तीनों के बीच जरा सा भी तालमेल गड़बड़ होने पर शुगर का स्तर गड़बडा जाता है। कहा कि इनको भूखे भी नहीं रहना है और पार्टी भी नहीं करनी है। खाने में अालू का इस्तेमाल न करने की भी सलाह दिया कहा कि अालू में एेसा कुछ नहीं है जो फायदा देता हो। हम लोगों के हर सब्जी में अालू जरूर होता है हम अालू की जगह सोयाबीन का इस्तेमाल कर सकते है। इसके अलावा घर में बिस्कुट तो रखना ही नहीं चाहिए क्योंकि यह चीनी और घी से बनता है तो किसी भी तरह से फायदेमंद नहीं है। बच्चों को भी लोग बिस्कुट पकडा देते है इससे इनमें अागे चल कर परेशानी की अांशका रहती है। पीजीआई के इंडोक्राइन विभाग के प्रो.सुशील गुप्ता ने कहा कि  वर्तमान समय में 7.2 करोड़ लोग डायबटीज से ग्रस्त है 2045 यह संख्या दो गुना हो जाएगी जिसके कारण इससे जुडी बीमारियों के मरीजों की संख्या भी बढेगी। 


85 फीसदी में विटामिन बी 12 की कमी

डा. मनीषा ने बताया कि केवल दो फीसदी लोग मांसाहारी जिसके कारण 98 फीसदी महिलाअों में विटामिन बी 12 की कमी देखने को मिली इसके साथ 80 फीसदी में कैल्शियम की कमी देखने को मिली है। बी 12 की कमी से एनीमिया की अाशंका बढ़ जाती है देखा गया है कि एनीमिया एक हजार में से पांच से अाठ मामलों में बी 12 की कमी के कारण एनिमिया की परेशानी होती है। कैल्शियम की कमी के कारण हड्डी में फ्रैक्चर की अाशंका बढ़ जाती है। बी 12 मासांहार के अलावा हरे पत्ते वाली सब्जी में वो भी कम मात्रा मिलता है जिसके कारण बी 12 की कमी हो जाती है। इसकी कमी की जांच करा कर एनिमाय से बचा जा सकता है। इसके सप्लीमेंट भी अाते हैं।     


एड्रिनल ग्लैड के ट्यूमर की गंभीरता का पता देगा मार्कर

एसजीपीजीआई के इंडो सर्जन प्रो.अमित अग्रवाल ने बताया कि एड्रिनल ग्लैड का ट्यूमर कितना गंभीर है इसका पता केआई 67 मार्कर से लगता है। हमारे संस्थान में इस मार्कर के जांच की सुविधा है। ट्यूमर की बायोप्सी लेकर उसमें इस मार्कर को देखा जाता है । मार्कर का स्तर बढ़ा है तो यह हाई ग्रेड एड्रिनल कैंसर कहा जाता है इन मरीजों में कीमोथिरेपी अादि इलाज की दिशा अाक्रामक रूप से करनी होती है।   
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जितनी जरूरत उतनी ही इंसुलीन स्रावित करेगा पैक्रियाज..डायबटीज मरीजों को राहत

अब सप्ताह में एक बार डायबटीज की दवा लेने से मिलेगी राहत
जितनी जरूरत उतनी ही इंसुलीन स्रावित करेगा पैक्रियाज


अब डायबटीज मरीजों को रोज-रोज एंटी डायबटिक दवा की गोली लेेने की जरूरत नहीं पडेगी। ग्लूकागन डिराइवड पेप्पटाइड( जीएलपी -1 ) एंटा गोनिस्ट की केवल एक खुराक लेनी होगी। यह दवा शरीर में ग्लूकोज के स्तर के अाधार पर प्रैक्रियाज को नियंत्रित कर उतनी ही इंसुलिन स्रावित करेगा जितने में ग्लूकोज मेटाबोलाइज हो जाए इससे शरीर में शुगर का स्तर एक स्तर से कम नहीं होगा।। इस दवा के बारे में लंबी चर्चा शनिवार को संजय गांधी पीजीआई में अायोजित इंडोक्राइन साइंस समिट में हुई। पीजीआई रोहतक के इंडोक्राइन विभाग के प्रमुख प्रो. राजेश राजपूत ने कहा कि यह दवा थोडी मंहगी है लेकिन अाने वाले दिनों में सस्ती हो जाएगी। इसके अलावा सोडियम ग्लूकोज को ट्रांसपोर्टर(  एसजीएलटी -2  ) दवा भी अा गयी है जो किडनी से शुगर को निकाल कर बाहर करती है। रक्त में जमा अतिरिक्त शुगर पेशाब से बाहर निकल जाता है। इससे किडनी फंक्शन भी सामान्य रहता है। शरीर का भार भी कम होता है क्योंकि यह दवा भूख को कम करती है। देखा गया है कि डायबटीज के साथ दिल की बीमारी वाले मरीजों में भी यह दवा दिल की बीमारी को कम करती है। यह दवाएं अभी रिसर्च मालीक्यूल है जिसके कारण मंहगी है । अागे यह दवाएं देश में सस्ती हो जाएगी। देश में तेजी से डायबटीज बढ़ रहा है पर लगाम लगाने के लिए खुद को जागरूक होना पडेगा। मोटापा और भोजन पर नियंत्रण से काफी हद तक बचा जा सकता है। 

बाक्स...

एड्रिनल ग्लैड में ट्यूमर होने पर दवा से नहीं नियंत्रित होती है बीपी

एसजीपीजीआई के इंडो सर्जरी विभाग के प्रो.अमित अग्रवाल और मेडिकल विवि के प्रो.अानंद मिश्रा ने बताया कि एड्रिनल ग्लैंड में ट्यूमर होने पर एेसे हारमोन की मात्रा बढ़ जाती है जो ब्लड प्रेशर के कंट्रोलिंग में अहम रोल निभाते है। कम उम्र में ब्लड प्रेशर की परेशानी है , दो या तीन दवा के कंबीनेशन से भी नियंत्रित नहीं हो रहा है तो इसकी जांच इंडो क्राइन सर्जन से करानी चाहिए।     




डायबटीज कंट्रोल करने के लिए दिया जाएगा  विटामिन डी का डोज

विटामिन डी कम करता है  33 फीसदी  डायबटीज की अाशंका
जागरण संवाददाता। लखनऊ  

डायबटीज मरीजों में शुगर को नियंत्रित करने के लिए अब विशेषज्ञ विटामिन डी की भी डोज देंगे। इस बात पर शनिवार को संजय गांधी पीजीआई में अायोजित इंडोक्राइन साइंस समिट में काफी चर्चा हुई जिसमें तर्क -वितर्क के बाद तय हुअा कि एंटी डायबटिक दवाअों के साथ विटामिन डी भी डोज दी जाए कोशिश की जाए मरीज में 25 हाइड्राक्सी विटामिन डी स्तर 20 नैनोग्राम प्रति मिली लीटर बनी रहे। समयअंतराल पर रक्त में इसके स्तर पर नजर रखा जाए। इंटरनेशनल लाइफ साइंस इंस्टीट्यूट के साइटफिक एडवाइजर मेजर जर्नल डा. रमन कुमार मारवाहा ने कहा कि विटामिन डी और डायबटीज के बीच ऱिश्ता देखने के लिए कई स्टडी हुई एक स्टडी में 70 हजार लोगों में देखा गया कि जिनमें विटामिन डी का स्तर सामान्य था उनमें डायबटीज का की दर कम थी। इसी में देखा गया कि दो हजार अाईयू विटामिन डी के साथ कैल्शियम लेने वाले मरीजों में डायबटीज 33 फीसदी तक कम मिला। एक दूसरी स्टडी में एक साल से कम उम्र के बच्चों और गर्भवती महिलाअों को विटामिन डी दिया गया तो देखा गया कि इनमें टाइप वन डायबटीज की दर कम थी। 


विटामिन डी देने से नहीं नुकसान

एसजीपीजीआई के प्रो.सुशील गुप्ता ने कहा कि विटामिन डी इंसुलीन का स्राव बढाता है। इंसुलीन की क्रियाशीलता को बढाता है। बी सेल को खराब होने से बचाता है। सबसे बडी बात यह कि विटामिन डी देने से कोई नुकसान नहीं है इसलिए देने में कोई हर्ज नहीं है। इस बात पर सहमति बनी है।  

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

डायबटीज मरीजों के रूटीन चेकअप में शामिल होगा फुट

पीजीआई में इंडोक्राइन साइंस समिट



डायबटीज मरीजों के रूटीन चेकअप में शामिल होगा फुट 

रूटीन चेकअप में दिल, किडनी, अांख की जांच से पहले से है शामिल


डायबटीज मरीजों के दिल, अांख को बचाने के साथ ही अब देश के विशेषज्ञ पैर को बचाने के लिए भी रूटीन चेक अप करेंगे। पैर में घाव की अाशंका का पता लगा कर पहले से सचेत और इलाज कर पैर को कटने से बचाया जा सकेगा। इस बारे में देश के विशेषज्ञों के बीच एक राय बनाने के लिए संजय गांधी पीजीआई का इंडोक्राइनोली और इंडो सर्जरी विभाग तीन दिवसीय  इंडोक्राइन साइंस समिट  का अायोजन किया है।  विभाग के प्रो.सुशील गुप्ता और प्रो. अमित अग्रवाल ने प्रेस वार्ता में बताया कि अभी तक हम लोग डायबटीज मरीज जब फालोअप पर अाता है तो हर 6 महीने में दिल, किडनी, अांख सहित अन्य अंगों में बीमारी की अाशंका का पता लगाने के लिए जांच कराते है जिसके अाधार पर इन परेशानियों से बचाने के लिए उपाय करते है । अब इस रूटीन चेक अप में हम लोग पैर की भी जांच करेंगे जिसमें डाप्लर कर पैर में रक्त संचार, फुट प्रेशर , पैर का तापमान और बाइब्रेशन के अलावा पैर की त्वचा में गांठ की जांच भी शामिल करेंगे। इससे पैर को कटने से बचाया जा सकेगा। इसके लिए हम लोगों ने आज कार्यशाला का भी अायोजन किया।  विशेषज्ञों से इस जांच को रूटीन चेक अप में शामिल करने की सिफारिश की जाएगी। 

एेसे संभव पैर को कटने से बचाना
- पैर में गांठ( गोखरू) होने पर खुद से न काटे
- ठंड में सीधे ब्लोअर के सामने पैर न रखे
- गर्म पानी से नहाने से पहले तापमान घर वालों से चेक कराएं
- जूता हमेशा एक नंबर बडा और शाम को खरीदे
- नया जूता दो से तीन घंटे बाद बदल कर पुराना जूता पहने
- हमेशा काटन के मोजे पहने और इसे चार पांच घंटे बाद बदल दें
- नंगे पैर न चले

हर तीस सेकेंड में कट जाता है एक डायबटिक मरीज का पैर

प्रो.सुशील गुप्ता और प्रो.अमित अग्रवाल ने बताया कि 250 डायबटिक मरीजों में से पांच से सात फीसदी मरीजों के पैर में घाव की अाशंका रहती है जिसका सही समय पर इलाज न होने पर पैर को काटना पड़ जाता है। देखा गया है कि हर तीस सेंकेेडे में एक डायबटिक मरीज का पैर काटा जाता है । 50 फीसदी डायबटिक मरीज पैर में घाव के कारण भर्ती होते है। डायबटिक मरीज के पैर में घाव होने की अाशंका सामान्य के मुकाबले 15 गुना अधिक होती है। बताया कि एक पैर कटने के बाद दूसरे पैर में घाव की अाशंका काफी बढ़ जाती है क्योंकि दूसरे पैर पर प्रेशर बढ़ जाता है साथ दिल की बीमारी भी अाशंका बढ़ जाती है। इस लिए पैर को कटने से बचाने के लिए पहले से एहितायत जरूरी है।  


बुधवार, 6 दिसंबर 2017

पीजीआइ नियमावली के बदलाव में अायी तेजी

पीजीआइ नियमावली के बदलाव में अायी तेजी






संस्थान प्रशासन शुरू की नियमावली में बदलाव की  प्रक्रिया
जागरण के खबर का असर
जागरणसंवाददाता। लखनऊ
संजय गांधी पीजीआई ने संस्थान प्रशासन के नियमावली 2011 में उस खास बिंदु में बदलाव की प्रक्रिया शुरू कर दिया है जिसमें कहा गया है कि एम्स के अनुरूप भत्ते या अन्य सुविधाएं लेने के लिए अलग से शासन से अनुमति लेनी होगी। इस मामले को दैनिक जागरण ने हाल में ही प्रमुखता से उठाया था । 
 इस बिंदु पर बदलाव के लिए कर्मचारी महासंघ पीजीआइ की अध्यक्ष सावित्री सिंह और महामंत्री एसपी यादव, सलाहकार अजय कुमार सिंह , एसपी राय ने राज्यपाल और मुख्यमंत्री से मुलाकात कर बदलाव के लिए अनुरोध किया था जिस पर संस्थान के निदेशक प्रो.राकेश कपूर को बदलाव के लिए एक्सन प्लान बनाने को कहा गया था। निदेशक ने संयुक्त निदेशक प्रशासन प्रो. उत्तम सिंह ,  वित्त अधिकारी पंकज , मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रो. अमित अग्रवाल  सहित अन्य लोगॆं की पांच लोगों की समिति बना दिया। सूत्रों का कहना है कि समिति ने बदलाव के लिए पूरा प्रारूप तैयार करने का काम शुरू कर दिया  जिसे शासन को भेजा जाएगा। शासन इसे मुख्यमंत्री और राज्यपाल को पास अनुमोदन के लिए भेजेगा जिसके बाद बदलाव संभव है। नियमावाली में बदलाव की प्रक्रिया शुरू होने पर कर्मचारी नेताअों के अलावा संकाय सदस्यों ने खुशी जाहिर की है। इस बदलाव से संस्थान के तीन हजार लोगों का फायदा होगा जिसमें संकाय सदस्य, पैरा मेडिकल स्टाफ के अलावा अधिकारियों को फायदा होगा। निदेशक प्रो. राकेश कपूर का कहना है कि पूरा मामला संज्ञान में है उचित एक्शन लिया जाएगा। 

सतवें वेतन अायोग का मांगा भत्ता
अध्यक्ष सावित्री सिंह ने सतवें वेतन अायोग के अनुसार भत्ते देने की मांग की है कहा कि एम्स दिल्ली में भत्ते लागू हो चुके है लेकिन पीजीआइ में अभी लागू नहीं हुअा है। इससे संस्थान में कुंठा व्याप्त है।  

रविवार, 3 दिसंबर 2017

गुड बैक्टीरिया प्रीवोटेला ठीक करेगा लाइलाज मल्टीपिल स्केलेरोसिस

प्रीवोटेला ठीक करेगा लाइलाज मल्टीपिल स्केलेरोसिस

पीजीआइ के एल्यूमिनाई और अमेरकी वैज्ञानिक ने खोजा इलाज
तंत्रिता तंत्र की बीमारी से ग्रस्त मरीजों के पेट कम हो जाते है अच्छे बैक्टीरिया

कुमार संजय। लखनऊ
भारतीय मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक एवं संजय गांधी पीजीआई के क्लीनिकल इम्यूनोलाजी विभाग के एल्यूमिनाई और उत्तर प्रदेश को गोडा जिले के रहने वाले  डॉ. आशुतोष मंगलम की अगुवाई में शोधकर्ताओं की एक टीम ने आंत के बैक्टीरिया  प्रीवोटेलाकी खोज की है। जिसका इस्तेमाल  मल्टीपल स्क्लेरोसिस  और इससे मिलती-जुलती अन्य बीमारियों का इलाज संभव होगा। संजय गांधी पीजीआइ में अायोजित इंडियन एसोसिएशन अाफ रूमैटोलाजी के वार्षिक अधिवेशन में भाग लेने अाए अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ आयोवा के पैथोलॉजी विभाग में सहायक प्रोफेसर डा. मंगलम ने बताया कि हमारी आंत में खरबों अच्छे बैक्टीरिया रहते हैं।  वह हमें सेहतमंद बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।  अच्छे बैक्टीरिया हमारे भोजन को पचाने के अलावा हमारे शरीर की विभिन्न क्रियाओं में मदद करते हैं।  नए शोध के मुताबिक हमारी आंत के अच्छे बैक्टीरिया हमारी प्रतिरक्षा कोशिकाओं के विकास में मदद करते हैं। मल्टीपल स्क्लेरोसिस के मरीजों की आंतों में अच्छे बैक्टीरिया की कमी हो जाती हैजिसकी वजह से कुछ लोगों में यह बीमारी होती है। इसलिए हमने मल्टीपल स्क्लेरोसिस के मरीजों की आंतों में बैक्टीरिया की जांच की और उनकी तुलना सेहतमंद लोगों की आंत के बैक्टीरिया से की देखा कि मल्टीपल स्क्लेरोसिस के मरीजों की आंत के बैक्टीरिया सेहतमंद लोगों से भिन्न थे। हमने उन विशेष बैक्टीरिया की पहचान की जिनकी कमी मल्टीपल स्क्लेरोसिस के मरीजों में थी।  खासकर हमने पाया कि मल्टीपल स्क्लेरोसिस’ के मरीजों में प्रीवोटेला नाम के बैक्टीरिया की कमी थी।  प्रीवोटेला के विभिन्न उपभेदों (स्ट्रेन्स) को सेहतमंद लोगों की आंत से निकाला और उनका परीक्षण चूहों पर किया।  पाया कि बहुत सारे बैक्टीरिया में से एक प्रीवोटेला हिस्टीकोला में मल्टीपल स्क्लेरोसिस वाले चूहों में बीमारी को सुधारने की क्षमता थी। प्रीवोटेला हिस्टीकोला ने बीमारी के लक्षण में सुधार लाने के साथ-साथ दिमाग और रीढ़ में सूजन को भी कम किया।


मजबूत हो सकता है इम्यून सिस्टम
उनकी टीम ने यह भी दिखाया की प्रीवोटेला हिस्टीकोला’ ने शरीर की प्रतिरक्षा कोशिकाओं को बढ़ाया. यह खोज इसी साल अगस्त महीने में सेल रिपोर्ट’ पत्रिका में प्रकाशित हुई ।  अभी इस बैक्टीरिया पर और शोध करने की जरूरत है ताकि इसके प्रभाव की जांच ठीक से की जा सके । इस टीम को यह खोज करने में करीब चार साल का वक्त लगा।  दुनिया भर में करीब 30 लाख लोग इस बीमारी की चपेट में हैं. साल 2015 में इस बीमारी से करीब 20,000 लोगों की मौत हुई थी।


क्या है मल्टीपल स्केलेरोसिस

 मल्टीपल स्क्लेरोसिस केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की बीमारी है जो दिमाग और रीढ़ को प्रभावित करती है. यह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) के कमजोर होने और माइलिन कोशिकाओं का बनना बंद होने के कारण होती है. आनुवांशिक और पर्यावरणीय कारकों से भी यह बीमारी हो सकती है.  इसमें शरीर के विभिन्न अंग प्रभावित होते हैं.  करीब 20 से 50 साल की उम्र के बीच के लोगों को अपना शिकार बनाने वाली इस बीमारी की चपेट में लंबे समय तक रहने से मरीज को विकलांगता का शिकार होना पड़ता है. 

यह लकवा से अलग तरह की बीमारी है
भारत में मल्टीपल स्क्लेरोसिस रोग की चपेट में आने वाले लोगों की तादाद काफी बढ़ी है। इस रोग का निदान थोड़ा कठिन होने के कारण डॉक्टरों का मानना है कि भारत में इसके मरीजों की सही से पहचान नहीं हो पाती. उन्होंने कहा कि लोगों में मल्टीपल स्क्लेरोसिस के बारे में और जागरूकता फैलाने की जरूरत है. सही पहचान न होने पर मरीजों को गलत दवा देने की आशंका रहती है।