सर्तकता से कम करें इलाज में चूक
बुधवार, 4 मई 2022
10 फीसदी में इलाज के दौरान चूक की आशंका
शनिवार, 23 अप्रैल 2022
पहले 24 घंटे गंभीर मरीजों के लिए महत्वपूर्ण
पीजीआई में फंडामेंटल क्रिटिकल केयर सपोर्ट पर कोर्स
पहले 24 घंटे गंभीर मरीजों के लिए महत्वपूर्ण
किसी भी गंभीर मरीज के लिए पहले 24 घंटे बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं खास तौर पर जब मरीज को सांस लेने की परेशानी हो और ऑक्सीजन लेवल बहुत ही कम हो । ऐसे में मरीज को क्रिटिकल केयर की जरूरत पड़ती है। आवश्यक है कि परेशानी का कारण पता किया जाए और उसका सही तरीके से निदान किया जाय । यह जानकारी संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान के एनेस्थीसिया विभाग द्वारा आयोजित
एफसीसीएस ( फंडामेंटल क्रिटिकल केयर सपोर्ट )प्रोवाइडर एंड इंस्ट्रक्टर कोर्स के संयोजक प्रो संदीप साहू ने कही। प्रो साहू ने बताया कि यह कोर्स सोसाइटी ऑफ क्रिटिकल केयर मेडिसिन (एससीसीएम), यूएसए स्वीकृत है। पाठ्यक्रम का नेतृत्व एफसीसीएस सलाहकार प्रोफेसर कुंदन मित्तल ने किया। आईसीयू में किसी भी अस्थिर बीमार रोगी के प्रारंभिक प्रबंधन को सिखाया गया । एफसीसीएस पाठ्यक्रम निदेशक डॉ. सिमंत कुमार झा ने एक्यूट रेस्पिरेट्री फेलियर का प्रबंधन सिखाया। प्रो. संदीप साहू ने वायुमार्ग और श्वास प्रबंधन सिखाया। कोर्स का उद्घाटन आज सुबह 11 बजे निदेशक प्रो आर के धीमान, डीन प्रोफेसर अनीश श्रीवास्तव और एनर्जी सा विभाग के प्रमुख प्रोफेसर एसपी अंबेश ने किया। कोर्स में भारत से लगभग 60 डॉक्टर और पाठ्यक्रम के 15 फैकल्टी मौजूद थे। बताया कि एफसीसीएस पाठ्य क्रम का उद्देश्य स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं द्वारा गंभीर रूप से बीमा, घायलों की प्रारंभिक देखभाल न सावधानी के बारे में
जानकारी देना है। कोविड युग के आज के महामारी के समय में यह पाठ्यक्रम अधिक महत्वपूर्ण है जो गंभीर रूप से बीमार या गंभीर रूप से बीमार रोगियों के प्रारंभिक आईसीयू प्रबंधन के ज्ञान और कौशल को कवर करता है। पाठ्यक्रम में इलेक्ट्रोलाइट्स और मेटाबोलिक गड़बड़ी, एक्यूट कोरोनरी सिंड्रोम, वायुमार्ग प्रबंधन, गर्भावस्था में गंभीर देखभाल, कार्डियोपल्मोनरी / सेरेब्रल रिससिटेशन, शॉक का निदान और प्रबंधन, तीव्र श्वसन विफलता का निदान और प्रबंधन, जीवन के लिए खतरा संक्रमण, बुनियादी न्यूरोलॉजिकल समर्थन, यांत्रिक वेंटिलेशन, विशेष विचार, सामान्य बाल चिकित्सा बनाम वयस्क रोगी, रक्त प्रवाह की निगरानी, ऑक्सीजन, एसिड और आधार की स्थिति, तीव्र देखभाल के दौरान नैतिक विचार, आघात और जलन प्रबंधन, यांत्रिक वेंटिलेशन (मूल और उन्नत), इलेक्ट्रोलाइट्स और मेटाबोलिक गड़बड़ी, कौशल स्टेशन: वायुमार्ग प्रबंधन, सीपीआर, आघात सहित अन्य विधियों के बारे में जानकारी दी जा रही है
ब्रेन डेड व्यक्ति के पोस्टमार्टम और ग्रीन कॉरिडोर में पुलिस की अहम भूमिका
ब्रेन डेड व्यक्ति के पोस्टमार्टम और ग्रीन कॉरिडोर में पुलिस की अहम भूमिका
-पुलिस मुख्यालय में अंग और ऊतक दान में पुलिस की भूमिका विषय पर कार्यशाला
-प्रदेश के 26 जिलों के अंग प्रत्यारोपण करने वाले अस्पतालों के
जिम्मेदार और वहां के पुलिस अधिकारी शामिल हुए
ब्रेन डेड व्यक्ति के परिजनों द्वारा अंग प्रत्यारोपण की सहमति देने के
बाद पुलिस की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। इन्हें कम समय में पंचनामा समेत
दूसरी कानूनी कार्रवाई कराकर जल्द पोस्टमार्टम कराना। ग्रीन कॉरिडोर
बनाकर अंगों को जल्द पहुंचाने का काम बिना पुलिस के संभव नहीं है। इससे
जरूरतमंद को जल्द अंग प्रत्यारोपित कर जीवन दिया जा सकता है। यह बातें
शनिवार को राज्य अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (सोटो) और पीजीआई के
अस्पताल प्रशासन विभाग द्वारा पुलिस मुख्यालय में आयोजित कार्यशाला में
सोटो के नोडल अफसर डॉ. राजेश हर्षवर्धन ने कहीं। कार्यशाला में डीजीपी
मुकुल गोयल समेत प्रदेश के अंग प्रत्यारोपण करने वाले 26 अस्पताल व उस
इलाके इंस्पेक्टर और वहां के एसपी मौजूद रहे। डीजीपी मुकुल गोयल ने
मातहतों को सम्बोधित करते हुए कहा कि वह ब्रेन डेड व्यक्ति के परिजनों
द्वारा अंगदान की सहमित देने के बाद बिना किसी विलंब के कानूनी कार्रवाई
सुनिश्चित कराएं।
कई को मिल सकता है जीवन
पीजीआई निदेशक डॉ. आरके धीमान ने कहा कि अंगदान जीवन दान का उपहार है।
किसी जीवित या मृत व्यक्ति के शरीर का ऊतक या कोई अंग दान कई लोगों को
जीवन दे सकता है। ब्रेन डेड व्यक्ति के अंग एक नियत समय में प्रत्यारोपित
करने होते हैं। ऐसे में ब्रेन डेड व्यक्ति के परिजनों की सहमित के बाद
पुलिस, अंगों का रखरखाव, प्रत्यारोपण केन्द्र तक पहुंचाना और
प्रत्यारोपित करने में समय लगता है। पीजीआई चण्डीगढ़ के जनरल सर्जरी
विभाग के प्रमुख डॉ. अरुणांशु बेहरा मानव अंग और ऊतक अधिनियम और नियमों
के प्रत्यारोपण के साथ-साथ मेडिकोलेगल मामलों के प्रबंधन में पुलिस का
काम होता है। इस मौके पर एडीजी जीआरपी पीयूष आनंद, पीजीआई के नेफ्रोलॉजी
विभाग के प्रमुख डॉ. नारायण प्रसाद ने विचार रखे।
बुधवार, 20 अप्रैल 2022
जन्मजात थायराइड हार्मोन की कमी से मंदबुद्धि की आशंका -हार्मोन की दवा का कभी न करें नागा
पीजीआई में हाइपोथायरायडिज्म ग्रस्त बच्चों का केयर प्रोग्राम
जन्मजात थायराइड हार्मोन की कमी से मंदबुद्धि की आशंका
-हाइपोथायरायडिज्म ग्रस्त इलमा साइंटिस्ट बनने का सपना करेगी पूरा
- हार्मोन की दवा का कभी न करें नागा
कंजनाइटल हाइपोथायरायडिज्म( जंम से ही थायराइड हार्मोन की कमी) से ग्रस्त सिधौली सीतापुर की इलमा अब साइंटिस्ट बनने का सपना पूरा कर सकेगी। इलमा के पिता मुख्तार की जागरूकता के कारण जन्म के सात दिन के अंदर पता चला कि इलमा में थायराइड हार्मोन की कमी है। इसका पता समय पर लगता तो शायद मंदबुद्धि की शिकार होती। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान के जेनेटिक्स विभाग ने एक विशेष परियोजना के तहत नवजात शिशुओं के मानसिक विकास की कमी से रोकने के लिए थायराइड स्क्रीनिंग प्रोग्राम चलाया जिसमें जन्म के तुरंत बाद शिशु का रक्त लेकर उनमें थायराइड सहित अन्य जांचें की जाती है। इसी योजना के तहत कई जिलों में जन्म के यह परियोजना चलाई गयी जिसमें लगभग 67 हजार बच्चों की स्क्रीनिंग की गयी जिसमें 40 बच्चों में हार्मोन की कमी मिली। इस योजना के कारण इन बच्चों को मंदबुद्धि होने से बचाने में कामयाबी मिली। इन बच्चों के केयर के लिए विभाग ने बुधवार को परीक्षण कार्यक्रम रखा जिसमें परीक्षण के बाद माता-पिता और अभिभावकों देखभाल की जानकारी दी गयी। विभाग की प्रमुख प्रो. शुभा फड़के ने बताया कि पहले एनएचएम के तहत यह योजना कई जिलों में चलायी जा रही थी लेकिन फंड बंद होने के बाद डीबीटी( डिपार्टमेंट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी) से मिले प्रोजेक्टर से श्रावस्ती और बहराइच में योजना उम्मीद के नाम चल रही है। इंडोक्राइनोलॉजी
विभाग की प्रो. विजय लक्ष्मी भाटिया ने सलाह दिया कि
दवा कभी भी बंद न करें। जैसे जीने के लिए हवा –पानी की
जरूरत है वैसे ही हार्मोन की दवा रोज लेना है।
तीन माह पहले पता चला कि थायराइड हार्मोन की कमी
बहराइच जिले के रामकुमार और पत्नी कृष्णा वती ने बताया कि जन्म के तीन दिन बाद डाक्टर ने बताया कि इनके बच्ची में हार्मोन की कमी है जिसके बाद इलाज चल रहा है। बच्ची का विकास सामान्य है।
मंगलवार, 19 अप्रैल 2022
.....बियर पीते थे शराब नहीं ------ लिवर सिरोसिस का सबसे बड़ा कारण है शराब
.....बियर पीते थे शराब नहीं
लिवर सिरोसिस का सबसे बड़ा कारण है शराब
फैटी लिवर भी लिवर की परेशानी का बड़ा कारण मोटापे पर रखें नियंत्रण
विश्व लीवर डे आज ( 19 अप्रैल)
केस वन- डॉक्टर साहब शराब तो पीता था लेकिन खाता नहीं था जिसके कारण शराब लिवर पर प्रभाव डाल दिया। ब्रांडेड पीता था उससे तो लिवर नहीं खराब होता है
केस दो- शराब कभी नहीं पिया हां बियर जरूर पीता था बियर शराब नहीं होता है।
ऐसी ही तमाम भ्रांतियां लोगों में शराब को लेकर है । संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान के पेट रोग विशेषज्ञ डा. आकाश माथुर और मेडिकल विवि के पेट रोग विशेषज्ञ डा. अनिल कुमार गंगवार कहते है कि बियर भी शराब है उसमें भी अल्कोहल है कम या अधिक । इसी तरह शराब खाने के साथ पिए खाली पेट नुकसान बराबर करेंगी। ब्रांडेड शराब भी अल्कोहल है। शराब लिवर सिरोसिस का सबसे बडा कारण है। लिवर सिरोसिस के लगभग 40 फीसदी लोगों में कारण शराब देखा गया है। शराब से दूरी बनाने के जरूरत है। फैटी लिवर भी बडा कारण है इसके लिए मोटापे पर नियंत्रण जरूरी है। हर दसवें व्यक्ति का पेट सीने से बाहर मिलेगा इसको नियंत्रित करना है इसके लिए नियमित व्यायाम, खान-पान पर नियंत्रण जरूरी है। यह अपने हाथ है रही बात हेपेटाइटिस बी और सी तो यह संक्रमण है। इसका इलाज है जिससे काफी लोगों का लिवर बच जाता है। हेपेटाइटिस बी का टीका जरूर लेना चाहिए।
क्या है लिवर सिरोसिस
लीवर सिरोसिस एक ऐसी स्थिति है, जिसमें आपका लीवर धीरे-धीरे खराब होने लगता है। खराबी के चलते यह पहले की तरह काम नहीं करता। खास बात यह है कि आप इस बात से पूरी तरह से अंजान होते हैं। लीवर खराब होने के सबसे बड़े कारणों में लंबे समय से शराब की लत और हेपेटाइटिस है। लीवर सिरोसिस को लीवर के फाइब्रोसिस के रूप में जाना जाता है।
यह परेशानी तो तुरंत ले सलाह
-त्वचा और आंखों के पीला होने की वजह से पीलिया हो जाता है। शरीर का पीला रंग लीवर द्वारा स्रावित बाइल पिगमेंट के कारण होता है।
-पेट में द्रव जमा होना। पेट टाइट और सूजा हुआ दिखता है। लीवर की खराबी के कारण पेट की परत और अंगों के बीच की खाली जगह में तरल पदार्थ भरने लगता है।
-पैरों या टखनों में सूजन आना । एल्ब्यूमिन नामक प्रोटीन में उत्पादन में कमी के कारण पैरों और टखनों में सूजन आ जाती है। यह प्रोटीन खून को ब्लड वेसल्स से आसपास के टिशू में बहने से रोकता है जो सूजन का कारण बनता है।
-खून बहना या चोट लगना। हल्की सी ठोकर या किसी वजह से ज्यादा चोट लग जाए या खून बहने लगता है। रक्त के थक्के जमने के लिए जिम्मेदार पर्याप्त प्रोटीन नहीं बन पाता।
-वजन कम होना। बिना किसी एक्सरसाइज और डाइटिंग के बाद भी वजन कम होना।
रविवार, 17 अप्रैल 2022
पीजीआई में पहली बार रोटा प्रो तकनीक से महिला की धमनी का ब्लॉकेज खोला
मंगलवार, 12 अप्रैल 2022
पार्किंसंस के 80 फीसदी बीमारी के बिगड़ी स्थिति में पहुंचते है विशेषज्ञ के पास
विश्व पार्किंसंस जागरूकता दिवस पर पीजीआई में कार्यक्रम
पार्किंसंस के 80 फीसदी बीमारी के बिगड़ी स्थिति में पहुंचते है विशेषज्ञ के पास
कई चिकित्सक एक साथ चला देते है कई तरह की दवाएं
शुरूआती दौर में काफी हद तक दवाओं से इलाज
युवा भी हो रहे है इस परेशानी के शिकार
डोपामिन की कमी से होती है पार्किंसंस
जागरण संवाददाता। लखनऊ
पार्किंसंस के 80 फीसदी मरीज संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान के विशेषज्ञों के पास तब पहुंचते है जब दवाओं का असर कम हो जाता है। ऐसी स्थिति तब आती है जब कई दवाएं यानि प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी की दवाएं साथ चिकित्सक चला देते इससे दवाओं का प्रभाव कम होने लगता है। संस्थान के न्यूरोलॉजी विभाग की प्रो. रुचिका टंडन ने विश्व पार्किंसंस जागरूकता दिवस पर आयोजित कार्यक्रम मे सलाह दिया कि लक्षण महसूस होते ही किसी भी न्यूरोलॉजिस्ट से सलाह लेना चाहिए । तमाम दवाएं एक साथ शुरू करने पर दवाएं चार-पाच साल तक काम करती है फिर बेअसर होने लगती है ऐसे में दवा से इलाज का विकल्प खत्म हो जाता है ऐसे में डीप ब्रेन स्टीमुलेशन जैसी ही विशेष इलाज का तरीका बचता है। प्रो. रुचिका ने बताया कि दिमाग में डोपामिन न्यूरोट्रासमीटर ( एक तरह का रसायन) की कमी से यह परेशानी होती है। मरीज के शुरुआती दौर में आने पर उचित मात्रा में इस रसायन को बढाने की दवाएं देते है लक्षण के आधार पर दवा की मात्रा कम या अधिक करते है। जब इन दवाओं का असर कम होने लगता है जब सीओएमटी इनहैबिटर दवाएं देते है। यह रक्त में डोपामिन को क्षतिग्रस्त होने से रोकता है। ब्रेन में अधिक मात्रा में डोपामिन पहुंचता है। तमाम चिकित्सक यह दोनों दवाएं एक साथ शुरू कर देते है जिससे दवा का असर जल्दी कम होने लगता है। कानपुर मेडिकल कालेज के न्यूरोलाजिस्ट प्रो. नवनीत कुमार ने कहा कि बीमारी का कारण पता नहीं है लेकिन सिर में चोट, पेस्टीसाइड, आटोइम्यून डिजीज भी कारण माना जा रहा है। पुरूष इस बीमारी से महिलाओं के मुकाबले दो गुना अधिक प्रभावित होते है।
क्या है पार्किंसंस
ब्रेन डिसऑर्डर है। यह समस्या 60 के बाद होने की आशंका रहती है है। दिमाग की विशिष्ट मस्तिष्क कोशिकाओं में नुकसान होने के कारण मूवमेंट प्रभावित होती है।
पाजिटिव रहे है मरीज
विभाग के प्रमुख प्रो.सुनील प्रधान ने बताया कि इस बीमारी से ग्रस्त लोगों को पाजिटिव रहने की जरूरत है। दवा कभी भी बिना डाक्टर के सलाह के बंद न करें। हम लोग पांच मरीजों में डीप ब्रेन स्टिमुलेशन न्यूरोसर्जरी के सहयोग कर चुके है आगे भी कई में तैयारी है। प्रो, संजीव झा और प्रो.वीके पालीवाल ने कहा कि नियमित व्यायाम करना चाहिए इससे उनकी परेशानी कम होती है।
यह परेशानी तो तुरंत लें सलाह
पार्किंसंस रोग के लक्षण धीरे-धीरे होते हैं । ध्यान नहीं जाता है।
- हाथ-पैर में कंपन
- अंगों में जकड़न
- हर काम में धीमापन
- असंतुलित चाल और शरीर असंतुलन
शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022
पीजीआईः 150 किलो वजन के मरीज में पहली बार लगा पेसमेकर लगा गया
पीजीआईः 150 किलो वजन के मरीज में पहली बार लगा पेसमेकर लगा गया
संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान में कार्डियोलॉजिस्ट ने 150 किलोग्राम वजन वाले गंभीर रूप से मोटे मरीज में पेसमेकर इम्प्लांटेशन किया है। यह प्रक्रिया एक 61 वर्षीय पुरुष में की गई थी, जिसे पूर्ण हृदय ब्लॉक था। मरीज लखनऊ का रहने वाला है और उसे 5 दिन पहले सांस फूलने की शिकायत के साथ एसजीपीजीआई इमरजेंसी में आए इनका पल्स रेट काफी कम था। पेसमेकर इम्प्लांटेशन की सलाह दी गई। उसके वजन को देखते हुए,इस प्रक्रिया में काफी जोखिम था। एसजीपीजीआई में कार्डियोलॉजी विभाग की हृदय रोग विशेषज्ञ डा. रूपाली खन्ना के मुताबिक मोटापे के रोगियों में प्रक्रिया करने में कई चुनौतियां होती है जिसे हम लोगों ने स्वीकार किया। पेसमेकर लगाने के लिए गले की नस में पहुंचना होता है । मोटापे और वसा ऊतक के कारण गर्दन में नस को पंचर करना मुश्किल था। आम तौर पर पंचर करने के लिए 5 सेमी लंबाई की सुई का उपयोग किया जाता है, लेकिन उसके वजन और बड़े शरीर के कारण, नस को पंचर करने के लिए एक विशेष बड़ी सुई का उपयोग किया गया । विभाग के प्रमुख प्रो. आदित्य कपूर और हृदय रोग विशेषज्ञ प्रो. सत्येंद्र तिवारी ने बताया कि अल्ट्रासाउंड गाइडेड पंक्चर भी एक तरीके है जिससे नस पंक्चर किया जाता है । यह तकनीकें इस प्रकार के रोगियों के सामने आने वाली समस्याओं से निपटने में मदद कर सकती हैं। दुनिया भर में मोटापे से ग्रस्त लोगों में में पेसमेकर लगाने के बहुत कम मामले सामने आते हैं। सफल प्रक्रिया के बाद, रोगी चलने में भी सक्षम है और 2 दिनों के भीतर उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है।
क्या होता है पेसमेकर
पेसमेकर मेडिकल उपकरण होता है, जिसका संचालन बैटरी के माध्यम से किया जाता है। इसे दिल की धड़कनों को नियमति करने के लिए लगाते हैं। उपकरण के दो भाग होते हैं। पहले भाग को पल्स जनरेटर कहा जाता है, जिसमें बैटरी और इलेक्ट्रॉनकि होता है, जो दिल की धड़कनों को नियंत्रित करता है।दूसरे भाग में तार होते हैं, जो दिल को इलेक्ट्रिकल सिंग्नल भेजता है।पेसमेकर का इस्तेमाल उन लोगों के लिए किया जाता है, जिनकी दिल की धड़कने या तो काफी धीमी चलता है अथवा काफी तेज़ चलती हैं।
सोमवार, 28 मार्च 2022
जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र आवश्यक दस्तावेज
जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र आवश्यक दस्तावेज
- पीजीआई में जन्म, मृत्यु अधिनियम के पंजीकरण पर सिद्धांत एवं व्यवहार पर हुई संगोष्ठी
किसी भी व्यक्ति का जन्म और मृत्यु का पंजीकरण होना एक व्यवहारिक और जरुरी प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया को अनिवार्य रूप से ऑनलाइन माध्यम से पूरे भारत में लागू किया गया है। जन्म और मृत्यु के पंजीकरण से आबादी का डेटा भी सुरक्षित होता है, जिससे उस शहर से लेकर देश की आबादी की सही जानकारी प्राप्त होती है। साथ ही व्यक्ति के बारे में भी सही विवरण परिवारीजनों से लेकर सरकार तक के पास सुरक्षित रहता है। यह जानकारी शनिवार को पीजीआई के अस्पताल प्रशासन विभाग के प्रमुख और रजिस्ट्रार जन्म व मृत्यु विभाग ने दी। अस्पताल प्रशासन विभाग के प्रमुख प्रोफेसर राजेश हषर्वर्धन ने बताया कि
जन्म, मृत्यु अधिनियम के पंजीकरण पर सिद्धांत एवं व्यवहार पर एक राज्य स्तरीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। वक्ताओं ने अस्पताल के कर्मचारियों को विशेष रूप से किसी भी व्यक्ति के जन्म और मृत्यु के प्रमाण पत्र को निर्गत करने में तमाम प्रकार की सावधानी बरतने को कहा। उसके कानूनी प्रावधानों आदि के बारे में बताया गया। इस मौके निदेशक और संयुक्त रजिस्ट्रार जनरल सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम आईएएस शीतल वर्मा, निदेशक पीजीआई डॉ. आरके धीमन, डीसीओ सीआरएस सहायक निदेशक डॉ. गौरव पांडेय, डीसीओ आईटी उप निदेशक अनुपम सिंह सोमवंशी, राज्य सलाहकार यूनिसेफ डॉ. आकांक्षा पटेल, टाटा मेमोरियल सेंटर से डॉ. शारवरी महापंकर समेत अन्य लोग मौजूद रहे।
30 फीसदी मरीज सही विभाग सही विशेषज्ञ के पास नहीं पहुंच पाते है
30 फीसदी मरीज सही विभाग सही विशेषज्ञ के पास नहीं पहुंच पाते है
सुपरस्पेशल्टी अस्पतालों में 70 फीसदी मरीजों का गलत होता है रेफरल
70 फीसदी से अधिक मरीज सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल में गलत रेफर हो कर आते है जिसके कारण इनमें से 30 फीसदी से अधिक मरीजों सही विभाग और सही विशेषज्ञ के पास इलाज के लिए जिस दिन आते है उस दिन नहीं पहुंच पाते है। शाम तक जब डॉक्टर के पास नंबर आता है तो पता चलता है कि इनकी बीमारी दूसरे विभाग की है फिर वह विभाग सही डॉक्टर या विभाग के पास इलाज के लिए रेफर करते है। इसलिए किसी भी बडे अस्पताल के लिए रेफर करते समय सही तरीके से रेफरेंस लेटर चिकित्सक को बनाना चाहिए। संजय स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान में आल इंडिया एसोसिएशन आफ मेडिकल सोशल वर्क प्रोफेसनल के 9 वें वार्षिक अधिवेशन में आयोजक डा. आरपी सिंह ने बताया कि हमने देखा है कि रिफर करने वाले डॉक्टर मरीज के पर्चे पर लिखते है रिफर टू हायर सेंटर मरीज हायर सेंटर पर जब आते है तो सही बीमारी और विभाग न लिखे होने के कारण कई बार गलत विभाग में पंजीकृत हो जाते है। हमने एसजीपीजीआई, मेडिकल विवि, लोहिया संस्थान, सैफई जैसे बडे संस्थान में मरीजों पर शोध के पाया कि 70 फीसदी मरीज बिना सही रेफरेंस के आते है। इसलिए मरीज को जागरूक होना पड़ेगा। रिफर कराते समय सही विभाग और बीमारी रिफर लेटर पर लिखा हो इसका ध्यान रखें। मेडिकल सोशल वेलफेयर ऑफिसर रमेश कुमार ने कहा कि 60 फीसदी मरीज जब अस्पताल आते है उनके लिए अस्पताल का वातावरण नया होता है ऐसे में मेडिकल सोशल वेलफेयर ऑफिसर( एमएसओ) की भूमिका बढ़ जाती है। सैफई संस्थान के निदेशक प्रो. पीके सिंह, संस्थान के निदेशक प्रो.आरके धीमन, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रो. गौरव अग्रवाल और लोहिया ला कॉलेज के पूर्व कुलपति प्रो. बलराज चौहान ने एमएसओ की भूमिका पर प्रकाश डाला।
बीच में न बंद करें दवा
एमएसओ दिव्या सिंह, मदांसा द्विवेदी, अवनीश त्रिपाठी, ने बताया कि कई बार मरीज दवा बीच में बंद करत देते क्यों कि उन्हें परेशानी से आराम मिल जाता है जिसमें डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, दिल, टीबी , न्यूरोला जिस्कल सहित अन्य में देखने को मिलता है। मरीजों को इलाज पूरा करने के लिए काउंसलिंग में एमएसओओ की अहम भूमिका है।
40 फीसदी मरीजों को होती है फाइनेंशियल हेल्प की जरूरत
डा. आरपी सिंह ने बताया कि सरकारी अस्पताल में आने वाले 40 फीसदी से अधिक लोगों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती है इन्हें फाइनसिय़ल सपोर्ट की जरूरत होती है जिसके आयुष्मान , आसाध्य रोग, काम धेनु से सहायता योजना सरकार और संस्थान संचालित है। हम लोग दो से तीन फीसदी लोगों को ही मदद दे पा रहे है। मदद दिलाने में एमएसओ की अहम भूमिका है।
गुरुवार, 24 मार्च 2022
रक्त में बढ़ा शुगर बेअसर कर देता है टीबी की दवा
रक्त में बढ़ा शुगर बेअसर कर देता है टीबी की दवा
अनियंत्रित शुगर तो काम नहीं करती टीबी की दवाएं
एनीमिया और कैल्शियम की कमी के कारण बच्चों में काम
नहीं करती है टीबी की दवाएं
डायबिटीज के परेशानी पहले से है और टीबी का संक्रमण हो
जाए तो टीबी की दवा के साथ शुगर के स्तर पर नजर
रखने की जरूरत है। शुगर का स्तर नियंत्रण में नहीं है
तो टीबी की दवा काम नहीं करेगी। संजय गांधी पीजीआई के
पल्मोनरी मेडिसिन विभाग में हर सप्ताह चार से पांच ऐसे
मरीज आते है जिनमें टीबी की दवा का असर नहीं होता है
कारण पता करने पर कारण अनियंत्रित शुगर का स्तर होता
है। विभाग के प्रमुख प्रो. आलोक नाथ ने विश्व टीबी दिवस
पर बताया कि शुगर का स्तर बढा होने पर इम्यून सिस्टम
कमजोर होता है जिसके कारण दवा का असर नहीं होता है।
किडनी, लिवर की परेशानी है तो भी दवा का नए तरीके से
निर्धारित करनी होती है। प्रो. आलोक के मुताबिक बच्चों में
टीबी का इलाज देने के समय इनमें कैल्शियम और आयरन
स्तर पर नजर रखने की जरूरत है। इसका स्तर कम है तो
दवा का ठीक तरीके से काम नहीं करती है। कैल्शियम और
आयरन की कमी के कारण इम्यून रिस्पांस कम हो जाता है।
बच्चों में आयरन की कमी एक बड़ी परेशानी है। देखा गया है
कि 25 फीसदी बच्चे कुपोषित होते है। इस लिए बच्चों में
पोषण पर ध्यान रखने की जरूरत है जिससे टीबी की दवा का
पूरा लाभ मिले।
ब्रोंकोस्कोपी से चलता है टीबी का पता
रोज दो से तीन मरीजों में टीबी का पता लगाने के लिए
ब्रोंकोस्कोपी का सहारा लेना पड़ता है। इनमें टीबी ग्लैड फेफड़े
के अंदर होती है जिसके लिए इस तकनीक से फेफड़े के
अंदर
से द्रव लेकर उसमें टीबी की जांच की जाती है।
यह परेशानी तो तुरंत ले सलाह
-छाती में दर्द
- खांसी: खून के साथ या दीर्घकालीन
-अच्छा महसूस न करना, थकान, पसीना आना, बुखार, भूख न लगना, या रात में पसीना
- बलगम
- बिना कारण वज़न में बहुत ज़्यादा कमी होना
- मांसपेशी का नुकसान
- सांस फूलना
- सूजी हुई लसीका ग्रंथियां यानी लिम्फ़ नोड (छोटे बीज के आकार की ग्रंथियां जो पूरे शरीर में होती हैं)
बुधवार, 23 मार्च 2022
बीपाल 6 महीने में ठीक करेगा एमडीआर टीबी
बीपाल 6 महीने में ठीक करेगा एमडीआर टीबी
नई दवाओं से एमडीआर टीबी का इलाज समय घटा
टीबी के फर्स्ट लाइन दवाओं से प्रतिरोध होने की दशा में एमडीआर( मल्टी ड्रग रजिस्टेंस) हो जाता है जिसमें इलाज के लिए दूसरी दवाएं देनी होती है। पहले एमडीआर के मामले में 24 महीने इलाज देना होता था लेकिन कई नई दवाएं आ गयी है जिससे इलाज 18 महीने में ही पूरा हो जाता है। बेडाक्वीलिन दवा से ऐसा संभव हुआ है। यह जानकारी संजय गांधी पीजीआई में विश्व टीबी दिवस दिवस पर आयोजित सतत चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम में संस्थान के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के प्रमुख प्रो. आलोक नाथ ने दी। बीपाल रेजीमेंट ( गाइडलाइन ) भी है जिसमें 6 महीने में टीबी का पूरा इलाज संभव है। पूरी तरह से मौखिक, तीन-दवा आहार है जिसका उपयोग टीबी के अत्यधिक दवा प्रतिरोधी रूपों वाले लोगों के इलाज के लिए किया जाता है। इसमें एंटीबायोटिक प्रीटोमेनिड के साथ-साथ दो अन्य एंटीबायोटिक्स शामिल हैं बेडाक्विलाइन और लाइनज़ोलिड। साल भारत में दवा नियामक द्वारा बीपीएल आहार को मंजूरी दी गई थी। मेडिकल विवि के प्रो. सूर्यकांत ने कहा कि 2025 तक टीबी खत्म करने के लिए मिशन मोड पर काम करने की जरूरत है। एसजीपीजीआई के प्रो. जिया हाशिम ने टीबी के लक्षण दिखते है तुरंत जांच कराने की सलाह दिया।
कहीं टीबी का गलत इलाज तो नहीं
डॉक्टरों और मरीजों को इलाज के प्रति जागरूक करना होगा। टीबी का इलाज सभी डॉक्टर कर रहे है लेकिन जानकारी न होने की वजह से हर सप्ताह दो से तीन मरीज ऐसे आते है जिनमें दवा का पर्चा गलत होता है। प्रो. आलोक नाथ का कहना है कि इन पर्चों में एमडीआर का पता न होना, दवा की सही मात्रा न होना देखने को मिलता है। नेशनल एकेडमी आफ मेडिकल साइंस के प्रो. इमिरेटस प्रो. राजेंद्र प्रसाद कहते है कि हमने स्टडी किया तो देखा कि गलत इलाज 40 फीसदी लोगों में गलत इलाज देखने को मिला। इस लिए सामान्य चिकित्सकों के लिए भी एजुकेशनल प्रोग्राम चलाने की जरूरत है।
50 हजार ही पा रहे है इलाज
प्रो. राजेंद्र प्रसाद के मुताबिक पिछले साल एक लाख 24 नए एमडीआर के केस सामने आए जिसमें 50 हजार को ही इलाज मिल रहा है बाकी लोग लोगों को खोज कर इलाज देना जरूरी है क्योंकि यह तमाम लोगों को संक्रमित कर सकते हैं। सबसे अधिक पल्मोनरी टीबी से संक्रमण का खतरा रहता है। एमडीआर से बचाव के लिए जरूरी है कि सही मात्रा पर सही समय तक इलाज ले कर ही बचा जा सकता है।
12 बच्चों को डॉक्टरों ने लिया जिम्मा
टीबी ग्रस्त 12 बच्चों के पोषण और इलाज का जिम्मा डा. प्रीति दबड घाव, प्रो. अमिता अग्रवाल. डा. मोइनक सेन , डा. भावना सहित अन्य लोगों ने लिया। प्रदेश में अभी राज्यपाल के अपील 38 हजार बच्चों का जिम्मा पोषण के लिए गया है।
सोमवार, 21 मार्च 2022
सिर मे लगी किसी भी चोट को हल्के में मत लें.
विश्व सिर चोट जागरूकता दिवस पर पीजीआई में कार्यक्रम













