गुरुवार, 7 मई 2020

डाक्टर के साथ दिखाया इंजीनियरी का हुनर

डाक्टर के साथ दिखाया इंजीनियरी का हुनर
देशी मेड विज लर्निग सिस्टम से आसान हुई पढाई
कुमार संजय।  लखनऊ

कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए लाक डाउन में पढाई न रूके और लाक डाउन खत्म होने के बाद भी घर बैठे जब चाहे पढाई करें शारीरिक दूरी बनी रहे इसके लिए हमेशा बीमारी के इलाज के कौन सी दवा कितनी देनी है या बीमारी के इलाज के सर्जरी करने वाले हमेशा नश्तर चलाने वाले डाक्टर ने देशी लर्निंग मैनेजमेंट सिस्टम बनाया है जो आज प्रचलित लर्निग ऐप से काफी हद तक सुरक्षित है। सिस्टम का क्लाउड( सर्वर) देश में ही है जिससे डाटा चोरी होना का कोई शक नहीं है। डाक्टरी करने वाले यह डाक्टर है संजय गांधी पीजीआई के डा. अजय शुक्ला और फोर्टीस अस्पताल के सर्जन डा. अलोक तिवारी जिन्हों ने सूचान विभाग का हनुर दिखायाहै। मेडविज लर्निंग मैनेजमेंट सिस्टम को राजीव गांधी यूनिवर्सिटी आफ हेल्थ साइंस के समस्त कॉलेज  के आलावा भोपाल और बनारस के शिक्षण संस्थानों ने अपनाया है। दावा है कि पांच हजार मेडिकल छात्र इस सिस्टम से पढाई कर रहे है। यह सिस्टम पेस बुक, जी मेल की तरह काम करता है जिससे पाठन सामग्री को सुरक्षित रखा जा सकता है। सिस्टम पर कंट्रोल भी तीन स्तर है जिसमें अध्यापक , छात्र सहित अन्य अलग –अलग हस्ताक्षेप का नियंत्रण है। इसके बारे डा. अजय शुक्ला ने बताया कि जूम के बारे में जब पता चला कि डाटा लीक हो रहा है तो हम लोगों ने विशेष सिस्टम बनाने की दिशा में काम किया जिसे लोग पसंद कर रहे है। डाक्टरी पेशे और पढाई के बीच सूचना तकनीक पर काम करने  के लिए एक्सट्रा मेहनत की जरूरत थी जो साकार हुआ। हम विभिन्न 3D ऐनिमेशन टेक्नीक पर भी काम कर रहें हैं जो आपके सीखने के अनुभव को और भी आसान करता है। इसमें सहयोग डा. स्वपना वर्मा और डा.आलोक वर्मा का भी सहयोग है। यह दोनों लोग बंगलौर में है। www.amci.net.in( डब्लूडब्लूडब्लू.एएमसीआई,नेट,इंन पर जाकर इस सिस्टम में शामिल हुआ जा सकता है।  
1. वर्चूअल क्लास रूम
 एक बार रेजिस्टर होने के बाद आप अपने आईडी  पास्वर्ड और लिंक की सहायता से लोगों को इससे जोड़ सकते हैं।  200 तक छात्रों के लिए वर्चूअल क्लास रूम ।आप ऐसी कई कक्षाएँ ले सकते हैं।    शिक्षक पीपीटी वीडियो  ऐनिमेशन सारे ही माध्यम से पढ़ा सकता है अटेंडन्स ,पोल,असाइनमेट ,इंटरैक्शन की पूरी सुविधा हैं ।ऑनलाइन प्रशिक्षण सामग्री का आसान निर्माण। ऑनलाइन टेस्ट की सुविधा 

  
2. -इस प्रणाली को हमने तीन स्तर में बाँटा है,विद्यार्थी,शिक्षक और प्रबंधक।प्रबंधक शिक्षक के कार्यों पर निगरानी और सुझाव दे सकता है और जान सकता है की पूरे संस्थान में कौन कितनी क्लास कैसे ले रहा है,कितने लोग सम्मलित हों रहें हैं। रिपोर्ट, ट्रैक, विश्लेषण आदि की पूरी सुविधा है
3.- ऑनलाइन, ऑफलाइन ,मोबाइल और कम्प्यूटर माध्यमों से आसानी से जुड़ सकते हैं। विश्व भर में कँही भी ऐक्सेस कर सकते हैं
4.  – आपके डेटा की सुरक्षा एंक्रिप्शन तकनीक से की जाती है।आपके अलावा दूसरा कोई भी जब तक आप ना चाहें आपका कांटेंट नही देख सकता है।
5.  कांटेंट इंटरापरबिलिटी , वेब कॉन्फ्रेंसिंग और तृतीय-पक्ष एकीकरण, इन बिल्ट वीडियो प्लेयर और सहज डैशबोर्ड ,वाइट बोर्ड आदि आपका कार्य बहुत आसान कर देते हैं।  

मंगलवार, 5 मई 2020

इम्यूनिटी पासपोर्ट यानी काम पर जाने का ओके का ठप्पाB

इम्यूनिटी पासपोर्ट यात्रा और काम पर जाने  लिए ओ के का ठप्पा
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जारी किया निर्देश
 वायरस या बैक्टीरिया के संपर्क में आने पर स्वतः शरीर में तैयार हो जाते है सिपाही 

कुमार संजय। लखनऊ

इम्यूनिटी पासपोर्ट आप के लिए यात्रा और काम पर लौटने के लिए ओके का ठप्पा हो सकता है। कोरोना संक्रमण से निपटने या प्राकृतिक रूप से यदि शरीर में वायरस के खिलाफ एंटी बाडी बन जाती है तो उसमें संक्रमण की आशंका कम हो जाती है। एंटी बाडी जांच की प्रक्रिया तेजी से शुरू हो रही है। किंग जार्ज मेडिकल विवि, राममनोहर लोहिया और संजय गांधी पीजीआई एंटी बाडी जांच शुरू करने की कोशिश में लगे हैं। कोरोना वायरस के खिलाफ जिनमें एंटी बाडी होगी उनमें ओके की मुंहर लग जाएगी। इम्युनिटी  पासपोर्ट पर काम पूरे विश्व में तेजी से हो  रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस पर कहा है कि इम्यूनिटी पासपोर्ट के शोध जारी है देखा जा रहा है कि  किसी के शरीर में कोविद -19 के खिलाफ एंटी बाडी बनने पर देखा जा रहा है कि दोबारा उस व्यक्ति में संक्रमण तो  नहीं होगा। होगा भी कितने फीसदी लोगों में संक्रमण की आशंका है। विशेषज्ञों का कहना है कि एंटी बाडी बनने के बाद 80 से 90 फीसदी लोगों में संक्रमण की  आशंका नहीं होगी वह काम पर जा सकते हैं।  एंटीबाडी जिनमें बन चुकी है वह काम पर जा सकेंगे लेकिन दूसरे एहतियात की जरूरत रहेगी।  एंटी बाडी बनने की जांच के बाद इम्यूनिटी पासपोर्ट दिया जा सकता है।  विश्व स्वास्थ्य संगठन ने  ने इम्यूनिटी पासपोर्ट इन केंटेक्सट आफ कोविद -19 विषय़ पर जारी गाइड लाइन में कहा कि  वायरस एसएआरएस-कोवी-2 का मुकाबला इसके कारण शरीर में बनने वाली एंटीबॉडी कर सकती है। यह एंटीबॉडी एक तरह से दुनियाभर के लोगों के लिए काम पर लौटने और यात्रा करने के लिए इम्यूनिटी पासपोर्ट की तरह हो सकती है।

क्या है इम्यूनिटी पासपोर्ट

कुदरती संक्रमण के माध्यम से एक वायरस से शरीर में इम्यूनिटी पाना लम्बी प्रक्रिया है और आमतौर पर इसमें 7 से 15 दिन तक का समय लग जाता है। देश में क्लीनिकल इण्यूनोलाजी के संस्थापक प्रो. आरएन  मिश्रा और पीजीआई के क्लीनिकल इम्यूनोलाजिस्ट प्रो.विकास अग्रवाल कहते है कि  एंटीबॉडी इम्यूनोग्लोबुलिन नाम का प्रोटीन हैं। शरीर टी-सेल्स भी बनाता है जो वायरस से संक्रमित अन्य कोशिकाओं को ढूंढ़कर मारती हैं। इसे सेल्यूलर इम्यूनिटी कहा जाता है। एंटीबॉडी और टी-सेल्स साथ मिलकर वायरस का सफाया कर सकती हैं, और अगर इनका रिस्पांस अच्छा होता है तो आगे दोबारा संक्रमण को रोका जा सकता है। एंटी जांच के बाद किसी को भी काम पर जाने के लिए ओके किया जा सकता है।

सोमवार, 4 मई 2020

कोरोना संक्रमित खून से संक्रमण की आशँका नगण्य - कोरोना संक्रमित खून से संक्रमण का अभी तक नहीं मिला कोई मामला

कोरोना संक्रमित खून से संक्रमण की आशँका नगण्य 
कोरोना संक्रमित खून से संक्रमण का अभी तक विशअव नहीं मिला कोई मामला 
कोरोना संक्रमित रक्त दान रोकने के लिए  निगरानी   
ब्लड डोनर की हो रही है थर्मल और फिजिकल स्क्रिनिंग
हेल्दी डोनर के सलेक्शन के लिए नाको ने  जारी गाइड लाइन   
कुमार संजय। लखनऊ

रक्तदाता का चयन करने में तमाम सावधानी के बाद भी कोरोना संक्रमित रक्त दाता का खून किसी मरीज में चढ जाए तो भी मरीज में कोरोना संक्रमण की आशंका नगण्य है। संजय गांधी पीजीआइ के ट्रांसफ्यूनजन मेडिसिन विभाग के प्रो. अतुल  विश्व की सबसे संस्था अमेरिकल रेड क्रास जो रक्त दान के मानक तय करती है  के तमाम निष्कर्ष का हवाला देते हुए बताते है कि अभी तक ब्लड ट्रांसफ्यूनजन ( रक्त चढाने) से किसी में कोरोना संक्रमण की पुष्टि नहीं हुई है। न ही कहीं से कोई इस तरह का केस रिपोर्ट हुआ है जिसमें संक्रमण रक्त चढाने से हुआ हो। विशषज्ञ कहते है कि  इसके बाद स्वस्थ्य रक्त दाता के चयन के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के अधीन काम करने वाले  नेशनल एडस् कंट्रोल अर्गनाजेशन ने रक्त दाता की स्क्रिनिंग के गाइड लाइन जारी किया है। इसमें रक्त दाता का थर्मल स्क्रिनिंग के बाद पूरी हिस्ट्री ली जाती है। हिस्ट्री किस एरिया से है। घर या परिवार या आस पास कोई संक्रमित है। यात्रा की क्या हिस्ट्री रही सहित तमाम सवाल पर रक्त दाता के खरा उतरने के बाद ही रक्त दान लिया जाता है। रत्त दान के लिए स्वस्थ्य रक्त दाता को सलेक्ट किया जाता है । इसके लिए पहले से मानक तय है जिसमें शरीर का भार, हीमोग्लोबीन का स्तर , पहले से बीमारी और किसी दवा का इस्तेमाल तो नहीं कर रहे है तमाम जानकारी लेने के बाद स्वस्थ्य रक्त दाता को सलेक्ट किया जाता है। संजय गांधी पीजीआई के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन के प्रो. अतुल के मुताबिक कोरोनो के संक्रमण की आशंका के बाद स्क्रीनिंग के मानत बढा दिए गए है।
कोरोना संक्रमित  रक्त चढाने ने मरीज में नहीं होगा संक्रमण
प्रो. अतुल का कहना है कि तमाम सावधानी के बाद भी यदि किसी कोरोना संक्रमित का रक्त ले कर किसी मरीज में चढ गया तो मरीज में संक्रमण की आशँका 0.1 फीसदी ही है क्यों कि रक्त वहीं रक्त दाता देगा जिसको लक्षण नहीं होगे ऐसे में वायरल लोड बहुत ही कम होगा। इसके आलावा संभव है कि संक्रमण के बाद उस रक्त दाता में एंटीबाडी बन गयी है जिसके कारण वह दूसरे को संक्रमित नहीं करेंगा।

रक्त दाता के रक्त में शुरू होगा कोरोना स्क्रिनिंग


अभी रक्त दाता का रक्त लेने के बाद हिपेटाइटस, एचआईवी सहित तमाम  जांच की जाती है जिस पर खरा उतरने के बाद ही रक्त मरीज को चढाने के लिए ओके किया जाता है। अब हम लोग कोरोना एंटी बाडी की जांच के लिए कार्य योजना तैयार कर लिए है । मई के अंत तक केमी इल्युमिनेशन तकनीक से जांच के लिए किट मिल जाएगी। इससे जो थोडी बहुत आशंका है वह खत्म हो जाएगी।  

ओरल हाइजिन से कम होगी कोरना के संक्रमण की आशंका

ओरल हाइजिन से कम होगी कोरना के संक्रमण की आशंका


भारतीय विशेषज्ञों ने की हैंड हाइजन के साथ गाइड लाइन में शामिल करने की सिफाऱिश
कुमार संजय़। लखनऊ
हैंड हाइजिन के साथ ही ओरल हाइजल कोरोना वायरस के संक्रमण के फैलाव में कागर हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि पोवीडोन-आयोडीन( रसायन) से गरारा या कुल्ला करने से वायरस के संक्रमणको रोका जा सकता है। इस रसायन का  माउथ वास आसानी से 40 से 50 रूपए में उपलब्ध है जो काफी बचाव में कारगर साबित हो सकता है। पहले के शोधों में देखा गया है कि आईसीयू में भर्ती मरीजों में क्लोरोहैक्साडीन या पोवीडोन आयोडीन से गरारा या कुल्ला  कराने से वेंटीलेटर के कारण होने वाले निमोनिया से काफी बचाव होता है। वेंटीलेटर के कारण होने वाले निमोनिया को वेंटीलेटर एसिएसेटेड निमोनिया कहते है। यह आईसीयू मरीजों के लिए कई बार घातक साबित होता है। इसके सामान्य भर्ती मरीजों में इससे गरारा करने पर निमोनिया की आशंका कम होती है। इसी आधार पर विशेषज्ञों ने कोरोना से बचाव में हैंड हाइजिन के साथ ही ओरल हाइजन को बचाव के लिए गाइड लाइन में शामिल करने की सिफारिश की है। इंटरनेशनश मेडिकल जर्नल ओरल डिजीज में भारतीय दंत विशेषज्ञों ने पोवीडोन –आयोडीन गारगल एस ए प्रोफाइलिटिक इंटरवेंशन टू इट्रप्ट द ट्रांसमिसन आफ सार्स-कोवि-2 विषय पर रिपोर्ट में कहा है कि ओरल हाइजिन से गले और मुंह की सफाई होती है जिससे वायरस नष्ट हो हो सकता है।

कैसे करें ओरल हाइजन
विशेषज्ञों ने कम से कम दिन में दो बार या हर बार ब्रश करने के बाद 30 सेकंड के लिए 15 मिलीलीटर माउथवाश  से मुंह रख कर मुंह में हिलाएं। इसका इस्तेमाल करने के तुरंत बाद पानी से कुल्ला करने, खाने या पीने की कोशिश न करें।
ओरल हाइजीन के फायदे: फेफड़े रहते हैं हेल्दी 
मसूड़ों की बीमारी और संक्रमण का दूर रहना अच्छी डेंटल हाइजीन के फायदे हैं जो की हमारे लंग्स के स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी है। ओरल केयर न करने से मुंह में पनपने वाले बैक्टीरिया की वजह से मसूड़ों की बीमारी और संक्रमण हो सकता है। ये बैक्टीरिया सांस के द्वारा फेफड़ों में प्रवेश कर सकते हैं। इससे श्वसन संबंधी संक्रमण जैसे क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज  और निमोनिया का खतरा बढ़ जाता है।

गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

बायो मार्कर बताएगा कितनी होगी कोरोना संक्रमित में गंभीर परेशानी

बायो मार्कर बताएगा कितनी होगी कोरोना संक्रमित में गंभीर परेशानी



कोशिकाओं की संख्या बताएगी कितना गंभीर होगा कोरोना

एनएलआर के आधार पर काफी पहले लगता है आंदाजा

सामान्य पैथोलाजी में 40 रूपए में जांच है संभव

कुमार संजय़। लखनऊ  

कोरोना संक्रमित मरीज में गंभीरता कितनी अधिक होगी इसका अंदाजा काफी पहले लगाया जा सकता है। गंभीरता को खास कोशिकाओं की संख्या के आधार पर भांपा जा सकेगा। यह खास कोशिकाएं है न्यूट्रोफिल और लिम्फोसाइट । यह दोनों कोशिकाएं शरीर के इम्यून सिस्सटम में अहम भूमिका निभाती है। विशेषज्ञों ने साबित किया है कि इस बायो मार्कर को  एनएलआर( न्यूट्रोफिल –लिम्फोसाइट रेसिओ) नाम दिया है। इस जांच के लिए खर्च 40 से 50 रूपया है । सामान्य पैथोलाजी में भी बल्ड पिक्चर जांच होती है वह भी यह जांच कर सकते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक  न्यूट्रोफिल और लिम्फोसाइट की संख्या के आधार पर अनुपात निकाला जाता है। देखा गया है कि एनएलआर बढा है तो मरीजों में बीमारी की गंभीरता बढ़ सकती है । गंभीरता को भांप कर पहले से एहितायत बरत कर  परेशानी को कम करने की योजना पर काम किया जा सकता है। इस जांच के लिए केवल दो मिली रक्त की जरूरत होती है। इंटरनेशनल इम्यूनो फार्माकोलाजी जर्नल के शोध रिपोर्ट के मूताबिक विशेषज्ञों ने द डायग्नोस्टिक एंड प्रिडेक्टिव रोल आफ एलएलआर( न्यूट्रोफिल –लिम्फोसाइट रेसिओ, पीएलआर( प्लेटलेट्स –लिफ्मोसाइट रेसिओ) , लिम्फोसाइट –मोनासाइट रेसिओ विषय़ पर शोध 93 कोरोना संक्रमित मरीजों पर किया। इनमें 83.8 फीसदी में बुखार और 70.9 कफ सामान्य लक्षण पाया गया। देखा कि जिन मरीजों में एलएलआर बढा था उनमें बीमारी की गभीरता अधिक हुई। उनमें सांस लेने में परेशानी के आलावा दूसरी परेशानी दूसरे मरीजों के मुकाबले अधिक देखी गयी। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका उम्र से भी संबंध देखा गया जिनकी उम्र अधिक थी उनमें यह बढा हुआ था। इस बायोमार्कर की दक्षता 88 फीसदी तक बतायी गयी है यानि यह बायो मार्कर 88 फीसदी मामले में सटीक जानकारी देता है।



छोटे अस्पताल में भी संभव होगा यह जांच

संजय गांधी पीजीआइ के क्लीनिकल इम्यूनोलाजिस्ट एंड रूमैटोलाजिस्ट प्रो. विकास अग्रवाल और एसोसिएशन आफ पैथोलाजिस्ट एंड माइक्रोबायलोजिस्ट के अध्यक्ष डा. पीके गुप्ता कहते है कि यह बायोमार्कर उन मरीजों के कारगर साबित होगा जो जिलों और सामान्य अस्पताल में भर्ती है उनमें स्थित की गंभीरता का अंदाजा लगा कर योजना बनाने में मदद मिलेगी।      





क्या एनएलआर

कुल न्यूट्रोफिल की कुल संख्या को लिम्फोसाइट की कुल संख्या से भाग दिया जाता है जो परिणाम आता है उसे एलएलआर कहते हैं।    

रविवार, 26 अप्रैल 2020

कोरोना वायरस फेफड़े के साथ गुर्दे को कर सकता है बीमार किडनी की परेशानी के कारण भी हो सकती है-- सांस लेने में परेशानी

कोरोना वायरस फेफड़े के साथ गुर्दे को कर सकता है बीमार


किडनी  की परेशानी के कारण भी  हो सकती है सांस लेने में परेशानी 

-खून व पेशाब की जांच में सीरम क्रिटनिन, प्रोटीन और रक्त कणिकाओं की
मात्रा अधिक 

कुमार संजय। लखनऊ
कोरोना वायरस का संक्रमण सिर्फ फेफड़े तक ही सीमित नहीं है। यह गुर्दे के
लिए भी घातक है। कोरोना संक्रमित मरीज के गुर्दे भी परेशानी हो सकती है। 
गुर्दा मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। किडनी के परेशानी के कारण सांस फूलने की भी परेशानी हो सकती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कोरोना संक्रमण है। हम लोगों के पास कई मामले ऐसे भी आए जिनमें सांस लेने की परेशानी के साथ , बुखार की परेशानी थी लेकिन कोरोना निगेटिव आया है। इस लिए किडनी की परेशानी है और सांस लेने में परेशानी है तो परेशान न हो केवल एहतियात बरतें।  कोरोना वायरस संक्रमित मरीजों पर शोध हुआ तो देखा गया कि   मरीजों में सीरम क्रिटनिन के साथ ही कई खून की जांचें गड़बड़ मिली। शोध पत्र इंटरनेशनल किडनी जर्नलमें प्रकाशित हुआ है। यह जर्नल इंडियन सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी का है।
100 मरीजों पर हुआ शोध
इंडियन सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी के सचिव व पीजीआई के वरिष्ठ नेफ्रोलॉजिस्ट
प्रो. नारायण प्रसाद बताते हैं कि कोरोना वायरस से पीड़ित चीन और ताइवान के
करीब 100 मरीजों पर शोध किया गया। इंडियन सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी के सदस्य
और गुर्दा विशेषज्ञों इनकी खून और पेशाब की जांच से लेकर दूसरी अन्य
जांचों का अध्ययन किया गया। जिसमें पाया गया है कि कोरोना का फेफड़े को
सक्रमण की गिरफ्त में लेने के साथ ही गुर्दे की सेहत बिगाड़ रहा है।
इनमें से 15 फीसदी पीड़ितों में सीरम क्रिटनिन बढ़ा हुआ पाया गया। इसके
अलावा इनमें 50 प्रतिशत मरीजों में प्रोटीन की मात्रा अधिक मिली। 26
प्रतिशत मरीजों में लाल रक्त कणिकाएं बढ़ी हुई पायी गईं।


भीड़भाड़ की जगहों में जाने से बचें

प्रो. नारायण प्रसाद बताते हैं कि किडनी की बीमारी से पीड़ित मरीज बाजार
आदि भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचें। मुंह में मास्क का प्रयोग
करें। दिन में कई बार हाथ धुलें। सेनेटाइज करें। खुद के साथ ही अपने
आसपास भी साफ सफाई रखें। बाहर के खानपान की चीजों से परहेज करें।

यह रहें सतर्कं

गुर्दे की बीमारी से पीड़ित मरीज जो इलाज कराने के साथ ही डायलिसिस और
गुर्दा प्रत्यारोपण करा चुके लोग सावधानी बरतें। इसके अलावा 60 साल से
अधिक उम्र के लोग खासतौर पर सतर्क रहें। उम्र बढ़ने के साथ ही इनके शरीर
की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। सर्दी, जुखाम, खांसी व बुखार आने पर
डॉक्टर की सलाह लें।

दिमाग और त्वचा पर भी असर दिखा रहा है कोरोना

डब्लूएचओ ने नए लक्षणों के लेकर किया सचेत


दिमाग और त्वचा पर भी असर दिखा रहा है कोरोना
 सिरदर्द, बोलते-बोलते सुध-बुध खो देना, पेट में दर्द और दिमाग में खून के थक्के जमना
कुमार संजय। लखनऊ
कोरोना महामारी की शुरुआत में विश्व स्वास्थ्य संगठन और सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) ने इसके लक्षणों पर एडवाइजरी जारी की थी। जिसके मुताबिक, बुखार, सांस लेने में तकलीफ, खांसी, सीने में तेज दर्द, चेहरा या होंठ नीला पड़ना, संक्रमण का लक्षण था। लेकिन पिछले 4 महीने में जो मामने सामने आए उसमें कई और लक्षण सामने आए, इसे समझना बेहद जरूरी है। अब पेट में दर्द महसूस होना, गंध या स्वाद का पता न चलना, लगातार सिरदर्द महसूस, पैर में जामुनी रंग का घाव होने पर इसे नजरअंदाज न करें और डॉक्टरी सलाह लें। विशेषज्ञों का कहना है कि आमतौर पर चिकनपॉक्स में पैरों पर दिखने वाला जामुनी रंग का घाव भी कोरोना संक्रमण का एक लक्षण हो सकता है। कोरोना पॉजिटिव पाए गए, जिनके अंगूठे में गहरे घाव थे। ये लक्षण खासतौर पर बच्चों और किशोरों में देखे गए। दुनियाभर में जितनी तेजी से कोरोनावायरस के संक्रमण का दायरा बढ़ रहा है, उतना ही लक्षणों में भी बदलाव आ रहा है। दुनियाभर के देशों में हुई रिसर्च के मुताबिक, पिछले 4 महीने के अंदर कोरोना के 15 से ज्यादा नए लक्षण देखे गए हैं। सबसे खास बात है कि ऐसे मामलों की संख्या बढ़ रही है जिसमें कोरोना के वे आम लक्षण नहीं दिखाई देते जैसे बुखार, मांसपेशियों में अकड़न और सांस में तकलीफ। संक्रमण की शुरुआत में ही ऐसे बदलाव दिखाई दे रहे हैं जिसे लोग संक्रमण का इशारा नहीं समझ पा रहे जैसे सिरदर्द, बोलते-बोलते सुध-बुध खो देना, पेट में दर्द, डायरिया और दिमाग में खून के थक्के जमना

केस-1 : पहले पैर में गहरे रंग का घाव फिर शरीर में खुजली और अकड़न
पैरों में गहरे रंग का घाव जैसा था जिसे मकड़ी के काटने का निशान मना गया। घाव बढ़ने पर दो दिन बाद, बुखार, सिरदर्द, शरीर में खुजली, घाव पर जलन, मांसपेशियों में दर्द के लक्षण दिखे।
केस-2 : फूड पॉइजनिंग से संक्रमण का इशारा
50 फीसदी कोरोना मरीजों में पेट में दर्द, उल्टी और डायरिया जैसे लक्षण देखे गए। अमेरिकन जर्नल ऑफ गेस्ट्रोएंट्रोलॉजी में प्रकाशित शोध के मुताबिक 204 मरीजों पर हुई रिसर्च में इसकी पुष्टि हुई है। एक मरीज ने बताया कि पेट में अजीब किस्म का दर्द महसूस हुआ।  एक दिन सुबह उठी तो लगा कि फूड पॉइजनिंग हुई है। कुछ घंटों बाद गले में सूजन और सांस लेने में तकलीफ जैसे लक्षण दिखे। रात तक नाक पूरी बंद हो चुकी थी। शरीर में अकड़न हो रही थी और काफी भारीपन महसूस होने के साथ बुखार चढ़ रहा था।

केस-3 : बोलते-बोलते सुध-बुध खोई और नाम तक नहीं बता पाया मरीज
50 साल की एक महिला को कोरोना का संक्रमण हुआ। जब ब्रेन स्कैनिंग की गई तो सामने आया कि दिमाग के कई हिस्सों अलग तरह की सूजन है। दिमाग के एक हिस्से की कुछ कोशिकाएं डैमेज होकर खत्म हो गई थीं।  ब्रेन स्ट्रोक, दिमागी दौरे, एन्सेफेलाइटिस के लक्षण, दिमाग में खून के थक्के जमना, सुन्न हो जाना जैसी स्थिति शामिल हैं। कुछ मामलों में कोरोना का मरीज बुखार और सांस में तकलीफ जैसे लक्षण दिखने से पहले ही बेसुध हो जाता है।

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

हर पल अपने को खतरे में डाल कर आप के लिए कर रहे है कोरोना से सामना




हर पल अपने को खतरे में डाल कर आप के लिए कर रहे है कोरोना से सामना



 बिना लक्षण के भी कोरोना पाजिटिव ट्रेंड थोड़ा डर तो पैदा करता ही है 

हर दिन हर पल  डर के साये में हम लोग लोगों की जिंदगी के लिए अपने को दांव पर लगाए है। 23 अप्रैल को जांच शुरू हुई थी आज एक महीना हो गया है। घर नहीं गए है। जब तक जांच चलेगी शायद घर जाना नहीं होगा।  संजय गांधी पीजीआइ के माइक्रोबायलोजी विभाग के कोरोना जांच टीम के लोगों का कहना है कि हम लोग क्वंरटाइन होने के बाद जब घर जाएंगे तो भी परिवार को संक्रमण का खतरा लग रहा है क्योंकि देखने में आ रहा है 50 से 60 फीसदी लोगों में लक्षण न होने के बाद कोरोना पाजिटिव आ रहा है। हम लोग 14 दिन क्वरटाइन रहेंगे जांच भी निगेटिव आ जाएगी लेकिन खतरा तो 14 दिन बाद भी है। टेक्निकल आफीसर वीके मिश्रा, टेक्नोलाजिस्ट हेमंत वर्मा, डा. धर्मवीर सिंह, डा. अकिता पाण्डेय, डा. जसमीत, डा. संजय सिंह, डा. सौरभ मिश्रा और सीनियर रिसर्च फेलो श्रुति शुक्ला विभाग की कोर टीम है जो 24 घंटे काम कर रही है। यह लोग आपस में ताल मेल बना कर थोडा रेस्ट भी कर लेते हैं। टीम में शामिल वीके मिश्रा, हेमंत और धर्मवीर कहते है कि हम लोगों ने 2009 में पहली बार स्वाइन फ्लू आया  तो जांच पहली बार शुरू किया । यह भी आरएनए वायरस था जिसका अनुभव कोरोना में काम आया।  विभाग की प्रमुख उज्वला घोषाल न हर स्तर पर हम लोगों का मनोबल बढाया जिसके कारण हम लोग सब कुछ भूल कर अपने काम को अंजाम दे रहे है लेकिन नए एसिम्पोटोमेटिक ट्रेंड को देख कर थोडा तो डर लगता ही है। 

रोज 250 मरीजों की हो रही जांच
 विभाग की प्रमुख प्रो.उज्वला घोषाल कहती है कि टीम भावना से काम होने के कारण हम रोज 250 से अधिक मरीजों के नमूनों की जांच कर रहे हैं। हमारे साथ विभाग  डा. रूंगमी, डा. एसके मर्क, डा. चिन्मय साहू. डा अतुल गर्गस डा. संग्राम सिंह पटेल हर कदम साथ दे रहे हैं।  औरया, शामली, कानपुर नगर, कानपुर देहात, रायबरेली, अंबेडकर नगर, अमेठी, बाराबंकी जिले के मरीजों के साथ वहां हेल्थ केयर वर्कर की जांच के नूमने हमारे पास आ रहे हैं। 



जरा सी चूक पड़ सकती है भारी
टीम के लोगो का कहना है कि जांच के दौरान पूरी सावधानी बरतनी होती है जरा सी चूक संक्रमण का कारण बन सकता है। पूरी तरह से कवर होने के बाद नमूने आरएनए को अलग करना फिर पीसीआऱ से उसकी संख्या बढाना फिर उसमें कोरोना बैंड देख कर रिपोर्ट करना बडा टास्क होता है। जांच में जरा सी चूक भी मरीज के लिए मानसिक परेशानी खडी कर सकता है जो रिपोर्ट की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है।   

पारा थामने वाली दवा पर कोरोना नहीं पडेगा भारी - बिना डाक्टर के सलाह न बंद करे बीपी की दवा

पारा थामने वाली  दवा पर कोरोना नहीं पडेगा भारी

एसीई इंहिबिटर दवाओं  से कोरोना के संक्रमण की आशंका पर लगा ब्रेक

 बिना डाक्टर के सलाह न बंद करे बीपी की दवा

  कुमार संजय़। लखनऊ

पारा थामने वाली दवा  एसीई( एंजियो टेंसिन कनर्टिंग एजाइम) इंहिबिटर दवाएं खाने से कोरोना वायरस के संक्रमण की आशंका को विशेषज्ञों ने खारिज कर दिया है। इस रसायन वाली दवाओं का हाई बीपी से 50 से 60 मरीज इस्तेमाल करते है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस दवा के बंद करने से कई तरह की परेशानी हो सकती है। इस लिए इस दवा को बीपी जो मरीज लेना बंद न करें। हृय रोग विशेषज्ञों के मुताबिक  कुछ दिन  शोध पत्रों में कहा गया था कि ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने वाली दवा  एसीई इनहैबिटर दवाओं के खाने से संक्रमण की आशंका बढ़ जाती है। इस शोध पत्र के आने के बाद दिल,किडनी ,शुगर के मरीजों में रक्त दाब नियंत्रित करने के लिए डाक्टर विकल्पों पर विचार करने लगे थे। सबसे बडी परेशानी थी कि एक दम दवा बदलने से यदि बीपी कंट्रोल न हुआ तो मरीजों के ब्रेन स्ट्रोक सहित दूसरी परेशानी हो सकती है। इसी बीच राहतदेने वाली खबर दूसरे शोध पत्रों में आयी जिसमें कहा गया कि शुरूआती दौर के शोध में जो तथ्य दिया गया उस पर शोध किया गया तो देखा गया कि इससे कोई नुकसान नहीं है। यह एडाप्टिव इम्युनिटी को सप्रेस करता है जिससे वायरल इंफेक्शन के चांस कम हो होते है। इसी तरह के एडाप्टिव इम्यून रिसपांस स्टेरायड विहीन एंटी इंफलामेंटरी दवाओं में देखा गया है।
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संजय गांधी पीजीआई के हृदय रोग विशेषज्ञ न्यू इंग्लैंड मेडिकल जर्नल और यूरोपियन सोसाइटी आफ हाइपरटेंशन के गाइड लाइन का हवाले देते हुए कहते है कि  हाई रिस्क वाले दिल के मरीज जैसे हार्ट फेल्योर, बीपी के मरीज, मायोकार्डियल इंफ्रैक्सन के मरीजों में एसीई इन हैबिटर दवा बंद करने से मरीजों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए जब और अधिक कोरोना मरीजों पर शोध न हो जाएतब इसे बंद करने की जरूरत नहीं है।



 कैसे काम करती है यह



विशेषज्ञों के मुताबिक  एंजियोटेंनसिन 2 नामक का यह रसायन रक्त प्रवाह के जरिए नसों में दौड़ता है । यह रक्त वाहिकाअों को पतला कर देता है जिससे रक्त संचार बाधित होने लगता है। शरीर में रक्त संचार बढाने के लिए दिल को अधिक प्रेशर देना पड़ता है जिसके कारण ही ब्लड प्रेशर बढ़ जात है। एंजियोटेंसिन 2 लिवर में स्वतः बनने वाले एंजियोटेंसिन -1 के जरिए एंजियो टेंसिन कनवर्टिंग एजाइम की सहायता से बनता है। एसीई इनबैहिटर दवाएं एंजियोटेंसिन कनवर्टिंग एजाइम की क्रियाशलीत को कम करती है जिससे एंजियोटेंनसिन2 रसायन बनने की मात्रा कम हो जाती है। इससे  रक्त वाहिकाएं समान्य होने लगती है ।सिकुडन कम हो जाता है । रक्त प्रवाह सामान्य हो जाता है। इससे बीपी कम होता है।

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

कोरोना स्टेप्स बनेगा सुरक्षा कवच- हेल्थ केयर वर्कर में रहती है संक्रमण की आशंका

कोरोना स्टेप्स  बनेगा सुरक्षा कवच

हेल्थ केयर वर्कर  में रहती है संक्रमण की आशंका   

इनटरनेशनल स्तर पर जारी हुई गाइड लाइन

कुमार संजय। लखनऊ

कोरोना वायरस के संक्रमण की आशंका उनकी जिंदगी बचाने के लिए लगे डाक्टर, नर्सेज सबसे अधिक होती है। तमाम शोध में देखा गया है कि 10 फीसदी हेल्थ केयर वर्कर जिसमें डाक्टर, नर्सेज अन्य नजदीक रहने वाले संक्रमित हुए है। इनके बचाव के लिए कोरोना केयर टिप्स जारी की गयी है। विशेषज्ञों का कहना है कि वेंटीलेटर लगाने के लिए ट्रेकीयोस्टोमी किया जाता है गले में स्थित ट्रेकिया में कट लगा कर वेंटीलेटर से जुंडी ट्यूब लगायी जाती है। वेंटीलर लगाने के लिए मुंह में ट्यूब डाला जाता है।  इस दौरान गले से वायरस अधिक मात्रा में निकलने की आशंका रहती है। इस दौरान विशेष सावधानी की जरूरत होती है। इटरनेशनल मेडिकल जर्नल ओरल आंकोलाजी में विशेषज्ञों ने पूरी गाइड लाइन जारी की है। विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रेकियोस्टोमी एक व्यापक रूप से प्रचलित और बतायी गयी सर्जिकल तकनीक है लेकिन वर्तमान के किसी भी रिपोर्ट में कोविद 19  पाजिटिव  रोगियों में इस प्रक्रिया के सुरक्षित तरीके से  और प्रबंधन पर गाइड लाइन नहीं थी जिसके कारण  कोरोना-स्टेप्स के जरिए  पॉजिटिव रोगियों में ट्रेकियोस्टोमी प्रबंधन के लिए एक सुरक्षित विधि का विस्तार करना और लोगों को जानकारी देना है। 

 

कोरोना स्टेप्स से मिलेगी सुरक्षा

 

 रिसर्च सोसाइटी आफ एनेस्थेसिया एंड फार्माकोलाजी के प्रदेश सचिव प्रो.संदीप साहू ने इंटरनेशनल मेडिकल जर्नल ओरल आंकोलाजी का हवाला देते हुए बताया कि  मुताबिक ब्रांकोस्कोपी, वेंटीलेटर लगाने के लिए मुंह में ट्यूब डालने के साथ  ट्रेकियोस्टोमी यानि गले में छेड कर ट्यूब ( केनुला) डालने के दौरान संक्रमण की आशंका रहती है। इस दौरान  सुरक्षित रहने की जनकारी कोरोना स्टेप्स  उन  लोगों को मिलेगी जो दूर –दराज इलाके में हेल्थ वर्कर है।

स्टेरायड लेने वाले हो सकते है कोरोना सुपर स्प्रेडर

स्टेरायड लेने वाले हो सकते है कोरोना सुपर स्प्रेडर

चालिस दिन बाद मिला संक्रमण जब पिता और बहन में हुए संक्रमित   
लंबे समय से ग्लूको कार्टिस्टेरायड दवा खा रहे लोगों में 14 दिन बाद भी हो सकती है संक्रमण की पुष्टि
कुमार संजय़। लखनऊ
 किसी दूसरी परेसानी के कारण यदि आप स्टेरायड( ग्लूको कार्टिकोस्टेराय़) दवा लंबे समय से रहे है जो आप को विशेष सावधानी बरतने की सलाह विशेषज्ञों को दी है। आप सुपर स्प्रेडर हो सकते हैं।  एक केस स्टडी के आधार पर कहा गया है कि संभव है कि 14 दिन भी आपको कोई परेशानी न हो और अपने नजदीक रहने वाले लोगों को संक्रमित कर दें। इस लिए शारिरिक दूरी का अच्छी तरह पालन करें। आटो इम्यून डिजीज से ग्रस्त एक 47 वर्षीय महिला लंबे समय से  इम्यूनो सप्रेसिव ग्लूकोकार्टोइकोड्स ले रही थी। इन्हे कोरोना संक्रमण की आशंका के साथ क्वारंटाइन किया गया। 14 दिन में कोई लक्षण नहीं आया। चालिस दिन बाद संक्रमण की पुष्टि हुई । इसी बीच महिला ने शहर छोड़ दिया। इसी बीच महिला के पिता और बहन में कोरोना के संक्रमण की पुष्टि हुई। इस केस के  बारे में क्नीकिल इम्यूनोलाजी मेडिकल जर्नल ने कहा है कि जो लोग किसी दूसरे परेशानी के कारण ग्लूकोकार्टोकोड्स ने रहे है उनमें कोराना वायरस के संपर्क के बाद  तय समय के काफी बाद लक्षण प्रकट हो सकते है। विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना वायरस का  औसत लक्षण दिखने का  समय दो से 14  है।  अधिकतर मामलों में तीन से  सात दिन में लक्षण प्रकट हो जाते है लेकिन इस महिला में चालिस दिन बाद संक्रमण की पुष्टि हुई। इस महिला से घर के दो लोग संक्रमित हुए। विशेषज्ञो का कहना है कि यदि पिता और बहन में परशानी न होती तो शायद इस महिला में संक्रमण की पुष्टि नहीं होती क्यों कि लक्षण नहीं थे। स्टेरायड   लंबे समय से खाने वाले  लोगों में लक्षण दिखने और वायरस के मजबूत होने सा समय लंबा हो सकता है। इनसे सीओवीआईडी -19 का अतिरिक्त संचरण हो सकता है।
क्या है ग्लूकोकार्टकोस्टेराड
ग्लूकोकार्टोइकोड्स (कोर्टिसोल, कोर्टिसोन और कॉर्टिकोस्टेरोन) कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन चयापचय को क्रियाशील करता है   और नियंत्रित करते हैं।  इसे इम्यून सिस्टम की क्रिशा शीलता कम करने के लिए विशेषज्ञ तमाम दूसरी बीमारियों में करते हैं।
कैसे बनते है सुपर स्प्रेडर

क्लीनिकल इम्यूनोलाजिस्ट एंड रूमैटोलाजिस्ट पीजीआइ के एल्यूमिनाई डा. स्कंद शुक्ला के मुताबिक  सुपरस्प्रेडर बनने में व्यक्ति का अपना प्रतिरक्षा-तन्त्र और विषाणु की भी सहभूमिका होती है। सुपरस्प्रेडर अधिक विषाणु-कणों को छोड़ा करते हैं , क्योंकि उनका प्रतिरक्षा-तन्त्र कमज़ोर होता है। इनमें लक्षण कम या न-के-बराबर होते हैं , इस कारण ये अपना काम-काज समाज में जारी रखते हैं। कमज़ोर प्रतिरक्षा-तन्त्र के कारण इनकी कोशिकाओं के भीतर विषाणु ढेर सारी प्रतिलिपियाँ बना रहा होता है।

कौन है सुपर स्प्रेडर
एक गृहिणी-सुपरस्प्रेडर कम लोगों को संक्रमित कर सकती है। एक डॉक्टर-सुपरस्प्रेडर ढेर सारे लोगों को एवं एक अन्तरराष्ट्रीय व्यापारी-सुपरस्प्रेडर और भी ढेर-सारे लोगों को। सुपरस्प्रेडर केवल कोविड-19 में ही होते हों , ऐसा नहीं है। अनेक संक्रमणों में इनकी पुष्टि पहले भी हो चुकी है। 20फीसदी  लोग समाज में 80 फीसदी  रोगियों को जन्म देते हैं । सभी रोगी समाज में एक-बराबर बीमारी नहीं बाँट रहे होते।

इन्हे नहीं होता पता
इन-सब जानकारियों के बावजूद सुपरस्प्रेडर-जनों को बहुधा यह नहीं पता होता कि वे समाज के लिए कितने ख़तरनाक हैं। सुपरस्प्रेडर बनने या होने में उनका कोई दोष नहीं है। किन्तु वे समाज के प्रति उतना उत्तदायित्व ज़रूर निभाएँ , जितना हर समझदार व्यक्ति निभा रहा है और उससे अपेक्षा की जाती है। लोगों से दूरी रखना, अकारण मिलना-मिलाना नहीं।