शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

डायबटीज मरीजों के रूटीन चेकअप में शामिल होगा फुट

पीजीआई में इंडोक्राइन साइंस समिट



डायबटीज मरीजों के रूटीन चेकअप में शामिल होगा फुट 

रूटीन चेकअप में दिल, किडनी, अांख की जांच से पहले से है शामिल


डायबटीज मरीजों के दिल, अांख को बचाने के साथ ही अब देश के विशेषज्ञ पैर को बचाने के लिए भी रूटीन चेक अप करेंगे। पैर में घाव की अाशंका का पता लगा कर पहले से सचेत और इलाज कर पैर को कटने से बचाया जा सकेगा। इस बारे में देश के विशेषज्ञों के बीच एक राय बनाने के लिए संजय गांधी पीजीआई का इंडोक्राइनोली और इंडो सर्जरी विभाग तीन दिवसीय  इंडोक्राइन साइंस समिट  का अायोजन किया है।  विभाग के प्रो.सुशील गुप्ता और प्रो. अमित अग्रवाल ने प्रेस वार्ता में बताया कि अभी तक हम लोग डायबटीज मरीज जब फालोअप पर अाता है तो हर 6 महीने में दिल, किडनी, अांख सहित अन्य अंगों में बीमारी की अाशंका का पता लगाने के लिए जांच कराते है जिसके अाधार पर इन परेशानियों से बचाने के लिए उपाय करते है । अब इस रूटीन चेक अप में हम लोग पैर की भी जांच करेंगे जिसमें डाप्लर कर पैर में रक्त संचार, फुट प्रेशर , पैर का तापमान और बाइब्रेशन के अलावा पैर की त्वचा में गांठ की जांच भी शामिल करेंगे। इससे पैर को कटने से बचाया जा सकेगा। इसके लिए हम लोगों ने आज कार्यशाला का भी अायोजन किया।  विशेषज्ञों से इस जांच को रूटीन चेक अप में शामिल करने की सिफारिश की जाएगी। 

एेसे संभव पैर को कटने से बचाना
- पैर में गांठ( गोखरू) होने पर खुद से न काटे
- ठंड में सीधे ब्लोअर के सामने पैर न रखे
- गर्म पानी से नहाने से पहले तापमान घर वालों से चेक कराएं
- जूता हमेशा एक नंबर बडा और शाम को खरीदे
- नया जूता दो से तीन घंटे बाद बदल कर पुराना जूता पहने
- हमेशा काटन के मोजे पहने और इसे चार पांच घंटे बाद बदल दें
- नंगे पैर न चले

हर तीस सेकेंड में कट जाता है एक डायबटिक मरीज का पैर

प्रो.सुशील गुप्ता और प्रो.अमित अग्रवाल ने बताया कि 250 डायबटिक मरीजों में से पांच से सात फीसदी मरीजों के पैर में घाव की अाशंका रहती है जिसका सही समय पर इलाज न होने पर पैर को काटना पड़ जाता है। देखा गया है कि हर तीस सेंकेेडे में एक डायबटिक मरीज का पैर काटा जाता है । 50 फीसदी डायबटिक मरीज पैर में घाव के कारण भर्ती होते है। डायबटिक मरीज के पैर में घाव होने की अाशंका सामान्य के मुकाबले 15 गुना अधिक होती है। बताया कि एक पैर कटने के बाद दूसरे पैर में घाव की अाशंका काफी बढ़ जाती है क्योंकि दूसरे पैर पर प्रेशर बढ़ जाता है साथ दिल की बीमारी भी अाशंका बढ़ जाती है। इस लिए पैर को कटने से बचाने के लिए पहले से एहितायत जरूरी है।  


बुधवार, 6 दिसंबर 2017

पीजीआइ नियमावली के बदलाव में अायी तेजी

पीजीआइ नियमावली के बदलाव में अायी तेजी






संस्थान प्रशासन शुरू की नियमावली में बदलाव की  प्रक्रिया
जागरण के खबर का असर
जागरणसंवाददाता। लखनऊ
संजय गांधी पीजीआई ने संस्थान प्रशासन के नियमावली 2011 में उस खास बिंदु में बदलाव की प्रक्रिया शुरू कर दिया है जिसमें कहा गया है कि एम्स के अनुरूप भत्ते या अन्य सुविधाएं लेने के लिए अलग से शासन से अनुमति लेनी होगी। इस मामले को दैनिक जागरण ने हाल में ही प्रमुखता से उठाया था । 
 इस बिंदु पर बदलाव के लिए कर्मचारी महासंघ पीजीआइ की अध्यक्ष सावित्री सिंह और महामंत्री एसपी यादव, सलाहकार अजय कुमार सिंह , एसपी राय ने राज्यपाल और मुख्यमंत्री से मुलाकात कर बदलाव के लिए अनुरोध किया था जिस पर संस्थान के निदेशक प्रो.राकेश कपूर को बदलाव के लिए एक्सन प्लान बनाने को कहा गया था। निदेशक ने संयुक्त निदेशक प्रशासन प्रो. उत्तम सिंह ,  वित्त अधिकारी पंकज , मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रो. अमित अग्रवाल  सहित अन्य लोगॆं की पांच लोगों की समिति बना दिया। सूत्रों का कहना है कि समिति ने बदलाव के लिए पूरा प्रारूप तैयार करने का काम शुरू कर दिया  जिसे शासन को भेजा जाएगा। शासन इसे मुख्यमंत्री और राज्यपाल को पास अनुमोदन के लिए भेजेगा जिसके बाद बदलाव संभव है। नियमावाली में बदलाव की प्रक्रिया शुरू होने पर कर्मचारी नेताअों के अलावा संकाय सदस्यों ने खुशी जाहिर की है। इस बदलाव से संस्थान के तीन हजार लोगों का फायदा होगा जिसमें संकाय सदस्य, पैरा मेडिकल स्टाफ के अलावा अधिकारियों को फायदा होगा। निदेशक प्रो. राकेश कपूर का कहना है कि पूरा मामला संज्ञान में है उचित एक्शन लिया जाएगा। 

सतवें वेतन अायोग का मांगा भत्ता
अध्यक्ष सावित्री सिंह ने सतवें वेतन अायोग के अनुसार भत्ते देने की मांग की है कहा कि एम्स दिल्ली में भत्ते लागू हो चुके है लेकिन पीजीआइ में अभी लागू नहीं हुअा है। इससे संस्थान में कुंठा व्याप्त है।  

रविवार, 3 दिसंबर 2017

गुड बैक्टीरिया प्रीवोटेला ठीक करेगा लाइलाज मल्टीपिल स्केलेरोसिस

प्रीवोटेला ठीक करेगा लाइलाज मल्टीपिल स्केलेरोसिस

पीजीआइ के एल्यूमिनाई और अमेरकी वैज्ञानिक ने खोजा इलाज
तंत्रिता तंत्र की बीमारी से ग्रस्त मरीजों के पेट कम हो जाते है अच्छे बैक्टीरिया

कुमार संजय। लखनऊ
भारतीय मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक एवं संजय गांधी पीजीआई के क्लीनिकल इम्यूनोलाजी विभाग के एल्यूमिनाई और उत्तर प्रदेश को गोडा जिले के रहने वाले  डॉ. आशुतोष मंगलम की अगुवाई में शोधकर्ताओं की एक टीम ने आंत के बैक्टीरिया  प्रीवोटेलाकी खोज की है। जिसका इस्तेमाल  मल्टीपल स्क्लेरोसिस  और इससे मिलती-जुलती अन्य बीमारियों का इलाज संभव होगा। संजय गांधी पीजीआइ में अायोजित इंडियन एसोसिएशन अाफ रूमैटोलाजी के वार्षिक अधिवेशन में भाग लेने अाए अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ आयोवा के पैथोलॉजी विभाग में सहायक प्रोफेसर डा. मंगलम ने बताया कि हमारी आंत में खरबों अच्छे बैक्टीरिया रहते हैं।  वह हमें सेहतमंद बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।  अच्छे बैक्टीरिया हमारे भोजन को पचाने के अलावा हमारे शरीर की विभिन्न क्रियाओं में मदद करते हैं।  नए शोध के मुताबिक हमारी आंत के अच्छे बैक्टीरिया हमारी प्रतिरक्षा कोशिकाओं के विकास में मदद करते हैं। मल्टीपल स्क्लेरोसिस के मरीजों की आंतों में अच्छे बैक्टीरिया की कमी हो जाती हैजिसकी वजह से कुछ लोगों में यह बीमारी होती है। इसलिए हमने मल्टीपल स्क्लेरोसिस के मरीजों की आंतों में बैक्टीरिया की जांच की और उनकी तुलना सेहतमंद लोगों की आंत के बैक्टीरिया से की देखा कि मल्टीपल स्क्लेरोसिस के मरीजों की आंत के बैक्टीरिया सेहतमंद लोगों से भिन्न थे। हमने उन विशेष बैक्टीरिया की पहचान की जिनकी कमी मल्टीपल स्क्लेरोसिस के मरीजों में थी।  खासकर हमने पाया कि मल्टीपल स्क्लेरोसिस’ के मरीजों में प्रीवोटेला नाम के बैक्टीरिया की कमी थी।  प्रीवोटेला के विभिन्न उपभेदों (स्ट्रेन्स) को सेहतमंद लोगों की आंत से निकाला और उनका परीक्षण चूहों पर किया।  पाया कि बहुत सारे बैक्टीरिया में से एक प्रीवोटेला हिस्टीकोला में मल्टीपल स्क्लेरोसिस वाले चूहों में बीमारी को सुधारने की क्षमता थी। प्रीवोटेला हिस्टीकोला ने बीमारी के लक्षण में सुधार लाने के साथ-साथ दिमाग और रीढ़ में सूजन को भी कम किया।


मजबूत हो सकता है इम्यून सिस्टम
उनकी टीम ने यह भी दिखाया की प्रीवोटेला हिस्टीकोला’ ने शरीर की प्रतिरक्षा कोशिकाओं को बढ़ाया. यह खोज इसी साल अगस्त महीने में सेल रिपोर्ट’ पत्रिका में प्रकाशित हुई ।  अभी इस बैक्टीरिया पर और शोध करने की जरूरत है ताकि इसके प्रभाव की जांच ठीक से की जा सके । इस टीम को यह खोज करने में करीब चार साल का वक्त लगा।  दुनिया भर में करीब 30 लाख लोग इस बीमारी की चपेट में हैं. साल 2015 में इस बीमारी से करीब 20,000 लोगों की मौत हुई थी।


क्या है मल्टीपल स्केलेरोसिस

 मल्टीपल स्क्लेरोसिस केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की बीमारी है जो दिमाग और रीढ़ को प्रभावित करती है. यह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) के कमजोर होने और माइलिन कोशिकाओं का बनना बंद होने के कारण होती है. आनुवांशिक और पर्यावरणीय कारकों से भी यह बीमारी हो सकती है.  इसमें शरीर के विभिन्न अंग प्रभावित होते हैं.  करीब 20 से 50 साल की उम्र के बीच के लोगों को अपना शिकार बनाने वाली इस बीमारी की चपेट में लंबे समय तक रहने से मरीज को विकलांगता का शिकार होना पड़ता है. 

यह लकवा से अलग तरह की बीमारी है
भारत में मल्टीपल स्क्लेरोसिस रोग की चपेट में आने वाले लोगों की तादाद काफी बढ़ी है। इस रोग का निदान थोड़ा कठिन होने के कारण डॉक्टरों का मानना है कि भारत में इसके मरीजों की सही से पहचान नहीं हो पाती. उन्होंने कहा कि लोगों में मल्टीपल स्क्लेरोसिस के बारे में और जागरूकता फैलाने की जरूरत है. सही पहचान न होने पर मरीजों को गलत दवा देने की आशंका रहती है।

एमअारआई ने बदल दी एंकलाइजिंग स्पांडलाइिटस के इलाज की दिशा , जल्दी लगता है पता

एमअारआई जांच से  एंकलाइजिंग स्पांडलाइिटस का जल्दी लगता है पता
जल्दी बीमारी का पता लगने के कारण स्पाइन को बचाना हो रहा है संभव

एंकलाइजिंग स्पांडलाइिटस (एएस) के इलाज की दिशा में एमअारअाई जांच ने बडा बदलाव ला दिया है। स्पाइन की एमअारअाई जांच से बीमारी का पता शुरूअाती दौर में  ही लग रहा है जिसके कारण रीढ़ की हड्डी को अापस में चिपकने से रोकने, मरीज को कुछ साल बाद दाव से मु्क्ति , 50 फीसदी मरीजों में बीमरी से पूरा अाराम मिल रहा है। यह जानकारी कनाडा के रूमैटोलाजिस्ट प्रो. निजिल हारून ने दी। बताया कि एंकलाइिजंग स्पांडलाइिटस भी एक तरह की अर्थराइिटस ही जिसमें रीढ़ की हड्डी के बर्टीब्रा में सूजन अा जाता है। सूजन बढने के साथ ही कुछ साल में हड्डी अापस में जुड़ जाती है एेसे में कमर झुकने के साथ हड्डी का लचीलापन खत्म हो जाता है। पहले जांच की विशेष सुविधा न होने के कारण अाठ से दस साल बीमारी का पता लगता था जब तक रीढ़ की हड्डी काफी खराब हो जाती जिससे ठीक करना संभव नहीं था लेकिन अब जल्दी पता लगने के कारण हड्डी को खराब होने से बचाना संभव हो गया है। पहले इलाज के लिए एंटी इंफलामेट्री दवाएं दी जाती थी जिससे केवल 10 फीसदी लोगों को ही अाराम मिलता था लेकिन नई दवाअों से जल्दी डायग्नोसिस होने के कारण पचास फीसदी लोगों में दवा हमेशा के लिए बंद हो जाती है। 50 पीसदी लोगों को पूरा अाराम मिल जाता है। 

अब बच्चों को भी एएस 
एंकलाइजिंग स्पाडलाइिटस सबसे अधिक युवाअों को गिरफ्त में लेती है जिसमें 20 से 40  अायु वर्ग के लोग शामिल है लेकिन अब देखने में अा रहा है कि अाठ से 10  साल के बच्चे भी बीमारी के चपेट में आ रहे हैं। 

क्या है एएस

इस बीमारी से प्रभावित लोगों में प्रात:काल उठने पर पीठ में अकडऩ रहती है जो धीरे-धीरे कम हो जाती है। लंबे समय कत बैठे रहने पर दर्द बढ़ जाता है। व्यायाम करने पर दर्द कम हो जाता है।  लंबे समय तक बीमारी के साथ रहने पर हिप व कूल्हे का जोड़ २५ से ३० प्रतिशत लोगों में प्रभावित हो सकता है। ५० प्रतिशत लोगों की आंख प्रभावित हो सकती है। आंख में लालपन,दर्द व धुंधला दिखाई पडऩे की परेशानी हो सकती है।  पांच प्रतिशत मरीजों का दिल प्रबावित हो सकता है।



स्कैलोडर्मा के 90 फीसदी मरीज त्वचा रोग विशेषज्ञ के पास करते है बर्बाद समय

पीजीआइ में अाइराकान-2017



स्कैलोडर्मा के 90 फीसदी मरीज त्वचा रोग विशेषज्ञ के पास करते है बर्बाद समय

भारत ही नहीं अास्ट्रेलिया में भी यही हाल

बीमारी का पता देर से लगने के कारण बढ़ रही है गंभीरता

स्कैलोडर्मा के 90 फीसदी मरीज त्वचा रोग विशेषज्ञ के पास भटकते रहते है इससे उनकी यह बीमारी और बढ़ जाती है। एेसे में बीमारी के गंभीर होने पर मरीज के मौत की आशंका बढ़ जाती है। इस लिए इस बीमारी के लक्षण प्रकट होते ही है रूमैटोलाजिस्ट से सलाह लेकर बीमारी को वहीं पर रोक कर जिंदगी को काफी हद तक सामान्य किया जा सकता है। एेसे केवल भारत में नहीं अास्ट्रेलिया जैसे देशों में भी होता है। संजय गांधी पीजीआइ में इंडियन एसोसिएशन अाफ रूमैटोलाजी के वार्षिक अधिवेशन में भाग लेने अाए रायल एलीज हास्पिटल अास्ट्रेलिया के और पीजीआई लखनऊ के एल्यूमिनाई  प्रो. प्रवीण हिसारिया ने बताया कि इस बीमारी में शरीर में एंटी न्यूक्लियर एंटी बाडी बन जाती है। यह एंटी बाडी त्वचा के साथ ही फेफडो, खाने की नली, किडनी, मांस पेशियों में सूजन पैदा कर देती है। शुरूअात त्वचा के साथ होती जिसकी वजह से मरीज त्वचा रोग विशेषज्ञ के पास जाते है। समय पर सही इलाज न मिलने से बाकी अंग प्रभावित हो जाते है। इस बीमारी का पता लगाने के लिए एंटी न्यूक्लियर एंटीबाडी के साथ ही ईएनए प्रोफाइल कराना चाहिए। एंटीबाडी पाजिटिव है तो तुरंत इलाज शुरू कर बीमारी को वहीं पर रोका जा सकता है। देखा गया है कि इस बीमारी के एससीएल-70, एंटी सेंट्रोमीयर, एंटी फ्रिबलीन, अारएवए पालीमरेज , टीएचअो एंटीजान के कारण बीमारी होती है जिसके क्रियाशीलता को कम किया जाता है। इलाज के लिए दो तरह के वेसोडाइलेटर देते है एक है कैल्शियम चेनल ब्लाकर और पीडी 5 इनहैबिटर जिससे मरीज को काफी अाराम मिल जाता है। 

यह है तो त्वचा रोग विशेषज्ञ के पास समय न करें नष्ट

स्कैलोडर्मा में त्वचा मोटी हो जाती। त्वचा का लचीला पन खत्म हो जाता है। कई बार त्वचा पर स्कार बन जाता है। इसके अलावा सांस लेने, खाना निगलने में परेशानी होती है। ठंड में ऊंगलिया नीली पड़ जाती है। देखा गया है कि यदि बीमारी कुहनी और घुटने के ऊपर त्वचा में पहुंच गयी है तो यह कैसर की तरह खतरनाक साबित हो सकता है। देखा 30 से 35 फीसदी लोगों में बीमारी कुहनी और त्वचा के ऊपर पहुंच जाती है जिसे डिफ्यूड स्कैलोडर्मा कहते हैं। 



शनिवार, 2 दिसंबर 2017

वेस्कुलाइटिस से ग्रस्त 90 फीसदी में बिना जरूरत चल जाती है टीबी की दवा



वेस्कुलाइटिस से ग्रस्त 90 फीसदी में बिना जरूरत चल जाती है टीबी की दवा



किसी भी अंग को प्रभावित कर सकता है वेस्कुलाइिटस
दस हजार में एक होती है वेस्कुलाइिटस की परेशानी
जागरण संवाददाता। लखनऊ 
अाटो इम्यून डिजीज वेस्कुलाइटिस से ग्रस्त 90 फीसदी मरीजों में बिना जरूरत टीबी की दवा ( एंटी ट्यूबर कुलर ) चल जाती है । इन मरीजों में इस दवा से कोई फायदा नहीं होता उल्टे वेस्कुलाइिटस की वजह से मरीज में परेशानी और बढ जाती है। इस लिए सामान्य चिकित्सक को भी एटीटी शुरू करने से पहले इस अाटो इम्यून डिजीज के बारे में सोचना चाहिए। मरीज या तीमारदारों को भी थोडा जागरूक होना पडेगा। वेस्कुलाइिटस से लक्षण है तो एक बार रूमैटोलाजिस्ट से सलाह जरूर लेना चाहिए। यह जानकारी संजय गांधी पीजीआई में इंडियन एसोसिएशन अाफ रूमैटोलाजी ( अाइराकांन-2017) के वार्षिक अधिवेशन में हैदराबाद अोपोलो से रूमैटोलाजिस्ट एवं एसजीपीजीआई के एल्यूमिनाई प्रो. सर्वजीत पाल ने दी । बताया कि वेस्कुलाइिटस शरीर के किसी भी अंग में हो सकता है। जिस अंग होता है वह अंग प्रभावित होता है। सबेसे अधिक हाथ, पैर में होता है जिसे पेरीफेरल वेस्कुलाइिटस कहते है। इसके अलावा दिल में होता है जिसे टाकायासू अार्टराइिटस कहते है। ब्रेन में होता है तो इसे सीएनएस वेस्कुलाइिटस कहते है। बताया कि दस हजार में से एक में यह बीमारी होती है। देखा गया है कि 30 से 40 अायु वर्ष के लोगों में यह बीमारी अधिक होती है। 65 से अधिक उम्र  के लोगों में सीएनएस वेस्कुलाइिटस होती है। समय से सही इलाज दिया जाए तो इस बीमारी पर वहीं पर रोक कर जिंदगी बिना परेशानी के बढाई जा सकती है। बताया कि इस बीमारी में वेसोडाइलेटर दवाएं दी जाती है। अब टारगेट थिरेपी( एंटी टीएनएफ) दवाएं अा गयी है जिससे इलाज  की सफलता दर बढ़ गयी है।

क्या है वेस्कुलाइिटस
पीजीआई के क्लीनिकल इम्यूनोलाजी विभाग के प्रो.विकास अग्रवाल ने बताया कि इस बीमारी में शरीर के रक्त वाहिकाअों के खिलाफ एंटी बाडी बन जाती है  जिससे रक्त वाहिका संकरी हो जाती है जिस अंग के रक्त वाहिका संकरी होती है उसमें खून का प्रवाह कम हो जाता है। इलाज न होने पर वाहिका बंद भी हो सकती है जिससे वह अंग काम करना बंद कर देता है। 

कैसे लगता है बीमारी का पता
- ईएसअार काफी बढा होता है
- ब्लड पिक्चर कराने कोशिकाअों में असंतुलन 
- एमपीअो और पीअारथ्री एंटी बाडी का स्तर बढा होता है

लक्षण - ठंड में हाथ पैर नीले पड़ जाते है साथ ऊंगिलयों के पोर नीले हो जाते है। हाथ पैर में झनझनाहट होती है। शरीर का भार तेजी से कम होता है। लगातार बुखार की परेशानी होती है। 



रूमटायड अर्थराइिटस के चालिस फीसदी में डिप्रेशन

इंग्लैंड के वासलेडन अस्पताल के रूमैटोलाजी विभाग के प्रमुख प्रो. अनुराग भाद्वाज ने रूमटायड अर्थराइिटस से ग्रस्त मरीजों में शोध कर देखा कि इस बीमारी से ग्रस्त 40 फीसदी लोगों में डिप्रेशन की परेशानी होती है। इनमें डिप्रेशन का इलाज न किया जाए तो अर्थराइिटस का इलाज काम नहीं करता है। इस लिए इन मरीजों में अर्थराइटिस का इलाज करने से पहले इनमें डिप्रेशन की स्थित का भी पता करने के बाद दोनों स्तर पर इलाज करना चाहिए। इस शोध को विश्व स्तर पर कई फोरम में स्वीकार कर लोगों ने सहमति जतायी है। डिप्रेशन का पता करने के लिए जब मरीज अाता है उसी समय कुछ सवाल पूछे जाते है जिससे डिप्रेशन का पता लग जाता है । डिप्रेशन की वजह से व्यक्ति खुश नही रहता, जीवन उसे बेकार लगता है कई बार यह स्थित उसे अात्महत्या के लिए प्रेरित करती है। 

योगा और फिजियोथिरेपी है फ्राइब्रोमायलेजिया का इलाज
 
 प्रो. अनुराग पीजीआई के क्लीनिकल इम्यूनोलाजी विभाग के एल्यूमिनाई है । इसके अलावा फ्राइब्रोमायलजिया पर बताया कि इसमें शरीर में दर्द, पेट में परेशानी थकान, नींद न अाने की सहित कई परेशानी होती है लेकिन किसी जांच में कुछ नहीं अाता  है। हम लोग दर्द के शरीर पर बने 11 से 18 प्वाइंट की जांच कर बीमारी का पता करते है। इस बीमारी का खास इलाज नहीं है लेकिन हम लोग कुछ दवाअों, योगा, फिजियोथिरेपी से जीवन सामान्य करने की कोशिश करते हैं।  

गुरुवार, 30 नवंबर 2017

अब जोडो के अल्ट्रासाउंड से शुरूअाती दौर में लगेगा खराबी का पता -पीजीआइ में स्थापित हो गयी है यह तकनीक



पीजीआइ में इराकांन 2017

अब जोडो के अल्ट्रासाउंड से शुरूअाती दौर में लगेगा खराबी का पता
पीजीआइ में स्थापित हो गयी है यह तकनीक   
रूमटायड अर्थराइटिस होने के पांच  से 6 साल बाद मिलता है सही इलाज  
जागरण संवाददाता। लखनऊ
अब शरीर के जोड़ो का अल्ट्रासाउंड कर जोडो की खराबी का पता शुरूअाती दौर में लगा कर जोडों को और खराब होने से बचाया जा सकता है। ज्वाइंट अल्ट्रासाउंड की तकनीक संजय गांधी पीजीआइ के क्लीनिकल इम्यूनोलाजी विभाग में स्थापित हो गयी । इसके तकनीक के बारे में देश भर के रूमैटोलाजिस्ट को कार्यशाला कर गुरूवार को दी गयी। रूमटायड अर्थराइिटस के इलाज और बीमारी पता करने के तमाम तकनीक पर जानकारी देने के लिए संस्थान ने इंडियन रूमैटोलाजी एसोसिएशन( इराकांन 2017) का आयोजन किया है । अधिवेशन के बारे में जानकारी देते विभाग के प्रमुख प्रो.अारएन मिश्रा एवं यूनिवर्सटी अाफ कैलीफोर्निया लांस एजलिस के प्रो. राम राज सिंह ने बताया कि अर्थराइिटस एक तरह की अाटो इम्यून डिजीजी है जिसमें शरीर के जोडो के खिलाफ एंटीबाडी बनने लगती है जिससे जोड़ खराब हो जाते है। शुरूअात हाथ की उंगलियों से होती है। जोड की खराबी पता करने के लिए हम लोग पहले एक्स-रे कराते थे लेकिन एक्स-रे से जोडो की खराबी का पता देर से लगता है। जोड जितना खराब हो जाता है उसे वापस अच्छी स्थिति में लाना संभव नहीं होता है। ज्वाइंट अल्ट्रासाउंड से खराबी का पता शुरूअाती दौर में लग जाता है जिसे डिजीज माडी फाइंग ड्रग से अागे खराब होने से रोका जा सकता है। कहा कि इस बीमारी से ग्रस्त 90 फीसदी मरीज बीमारी शुरू होने के चार से पांच साल बाद अाते है लोग हड्डी रोग विशेषज्ञों से सलाह और इलाज लेते रहते है जबकि इलाज रूमैटोलाजिस्ट ही कर सकता है।  बताया कि अधिवेशन में 600 से अधिक देश और विदेश विशेषज्ञ शामिल हो रहे हैं। 

तीस से अधिक होती है अाटो इम्यून डिजीज

विभाग के प्रो. विकास अग्रवाल और प्रो. दुर्गा प्रसन्ना ने बताया कि अाटो इम्यून डिजीज तीस से अधिक होती है। इसमें रूमटायड अर्थराइिटस ही सौ से अधिक प्रकार की होती है।  अाटो इम्यून डिजीज में मुख्य रूप से एलएलई, एंकलाइजिंग स्पांडलाइिटस, मायसाइिटस, वेस्कुलाइिटस सहित कई बीमारियां है। हर बीमारी के इलाज और बीमारी पता करने की तकनीक अलग है। बताया कि अब दुनिया भर में शोध से पता चल रहा है कि बीमारी का कारण कौन सा साइटो काइन उसे कमजोर करने के लिए दवाएं अा गयी है। जिसे टारगेट थिरेपी कहा जाता है। संस्थान इसका इस्तेमाल कर रहा है। 

फ्री मिलने वाली दवाअों में नहीं शामिल है अर्थराइिटस की दवा

विशेषज्ञों ने कहा कि सरकार कुछ बीमारी के इलाज के फ्री दवा उपलब्ध कराती है लेकिन सरकारी लिस्ट में रूमटायड अर्थराइिटस की दवाएं शामिल नही है जिसके कारण कई मरीज इलाज नहीं करा पाते है। इससे उनकी दैनिक दिन चर्या प्रभावित होती है। विशेषज्ञों से सरकार से अपील की है कि इन दवाअों को भी शामिल किया जाए। इसके अलावा शोध पर वजट बढाने की मांग की।  

बुधवार, 22 नवंबर 2017

जीआइ में क्रास मैच न होने के कारण नहीं मिल रही किडनी ट्रांसप्लाट की डेट

पीजीआइ में क्रास मैच न होने के कारण नहीं मिल रही किडनी ट्रांसप्लाट की डेट

 कर्ज लेकर करा रहे है इलाज ऊपर से पीजीआइ कर रहा है परेशान 
एक साल से  भटक रहे है तमाम मरीज

जागरणसंवाददाता। लखनऊ


अाजमगढ के मनोज कुमार श्रीवास्तव के 17 वर्षीय लड़के की  किडनी खराब है। डायलसिस पर किसी तरह जिंदगी के दिन काट रहे है। संजय गांधी पीजीआइ में किडनी ट्रांसप्लांट के लिए दौड़ रहे है लेकिन एचएलए मैच की जांच न हो पाने के कारण उन्हे डेट नहीं मिल पा रही है। काफी परेशान होने के बाद मनोज जी ने मुख्यमंत्री, निदेशक से गुहार लगाते हुए कहा कि जांच के लिए संस्थान का नेफ्रोलाजी विभाग परेशान कर रहा है। कहा है कि जांच के लिए कहा गया कि केमिकल नहीं जब केमिकल जाएंगा जो फोन कर बताया जाएगा लेकिन कोई फोन नहीं अाया। तीन नवंबर को मैं खुद अाया लेकिन सात नवंबर को अाएं। सात को अाने से पहले फोन कर पूछा भी अानन फानन में कर्ज लेकर जांच कराने अाया तो फिर कहा गया कि केमिल नहीं है। कहा कि गैर जिम्मेदाराना हरकत के कारण मरीज और परिजन परेशान हो रहे है। जीवन के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। हम लोग गहना और खेत बेच कर इलाज करा रहा है एेसे में सहानभूति तो दूर विभाग मानसिक परेशानी खड़ी कर रहा है। इसी तरह पहले भी हरीराम ने शिकायत दर्ज करायी थी। रायबरेली के हरीराम की किडनी खराब है इनकी पत्नी सुधा किडनी दे रही है। सुधा किडनी हरीराम से कितना मैच करेगी इसके इसके लिए एचएलए( ह्यूमन लाइकोसाइट एटीजन) मैच जांच होती है। यह जांच संजय गांधी पीजीआई के रीनल लैब में शिफ्ट की गयी है । जांच में देरी के कारण हरीराम को किडनी ट्रांसप्लांट के लिए डेट नहीं मिल पा रही है। हरीराम का कहना था कि 6 महीने से एचएलए जांच के लिए भटक रहे है निजि क्षेत्र में जांच मंहगी होने के कारण यहां जांच कराना मजबूरी है। इसी तरह दिलीप भी चार महीने से एचएलए अौर सीडीसी जांच के लिए भटक रहे है।  

अागे भी जांच कैसे होगी कोई तैयारी नहीं 

पहले एचएलए क्रास मैच की जांच जेनटिक्स विभाग में प्रो.सुरक्षा अग्रवाल की लैब में होती थी लेकिन रिटायरमेंट के बाद यह जांच संस्थान के नेफ्रोलाजी विभाग के रीनल लैब में शिफ्ट हो गयी।  लैब जिसके हवाले है वह अक्टूबर 2018 में रिटायर भी हो रहे है। इनके बाद विशेष जांचे कैसे होगी इसकी कोई तैयारी नहीं है।  संस्थान रीनल ट्रांसप्लांट सेंटर की बात कर रहा है लेकिन जांच कहां और कैसे होगी इस कर कोई तैयारी नहीं है। 



मामले की पूरी जानकारी है। मरीज की शिकायत अायी थी जिस पर गंभीरता पूर्वक विचार किया जा रहा है जल्दी ही जांच व्यवस्था को ठीक करेंगे जिससे मरीजों को ट्रांसप्लांट संबंधी जांच के लिए परेशान न होना पडे...निदेशक प्रो.राकेश कपूर

30.84 फीसदी पुरूषों के स्पर्म की क्वालिटी में मिली गड़बडी-दस हजार में एक को हो सकती है विक्की डोनर की जरूरत

35 के बाद पिता बनने में खडी हो सकती है बाधा

पहली बार 1219 पुरूषों के स्पर्म पर हुअा शोध  

30.84 फीसदी पुरूषों के स्पर्म की क्वालिटी में मिली गड़बडी
35 के बाद साल दर साल खराब होने लगती है स्पर्म की क्वालिटी
कुमार संजय। लखनऊ
    

उम्र बढने के साथ संभव है कि मर्द शारीरिक रूप से 60 से 70 साल तक फिट रहे लेकिन इनमें प्रजनन क्षमता कम होने लगती है। इनके स्पर्म की गुणवत्ता में कमी अाने लगती है । पहली बार देश के कई भागों में रहने वाले पुरूषों के  स्पर्म की क्वालिटी पर दस साल तक शोध के बाद शोध वैज्ञानिकों ने कहा कि 35 की उम्र के बाद स्पर्म की गुणवत्ता में कमी अाने लगती है। इससे वह  पिता नहीं बन पाते है। शोध वैज्ञानिकों ने हरियाणा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र के 1219 एेेसे पुरूषों के स्पर्म की क्वालिटी पर शोध किया जो दंपति पिता नहीं बन पा रहे था। गर्भ धारण नहीं करा पा रहे थे इसे डाक्टरी भाषा में इंनफर्टलिटी कहते है। देखा कि शोध में शामिल पुरूषों में से 30.84 फीसदी पुरूषों की स्पर्म की क्वालिटी मानक के  अनुरूप नहीं था। 35  की उम्र के बाद क्वालिटी में धीरे-धीरे कमी अाती गयी। शोध में जिन पुरूषों को शामिल किया गया उम्र के अनुसार पांच अायु वर्ग में बांटा गया जिसमें 21 से 28, 29 से 35, 36 से 42, 43 से 49, 50 से 60 अायुर्वग के पुरूषों के स्पर्म को लेकर स्पर्म की मात्रा, उसमें शुक्राणअों की संख्या, गति और बनावट का अध्ययन किया गया जिसके बाद यह तथ्य सामने अाया। एमएणआईएमएस अंबाला हरियाणा के गायनकोलाजी विभाग के डा. नैना कुमार, सेफैई विवि इटावा से डा. अमित कुमार सिंह और एमजीआईएस सेवाग्राम वर्धा से डाय अजय अार चौधरी ने दस साल तक इस काम में लगे  रहे। इनके शोध को इंटरनेशनल जर्नल अाफ रीप्रोडेक्टिव मेडिसिन ने स्वीकार किया। 

क्या है इंनफर्टलिटी
शोध पत्र में विशेषज्ञों ने बताया है कि एक साल बिना गर्भ निरोधक के सेक्सुअल रिलेशन के बाद भी स्त्री गर्भधारण न करें तो इसे इंफर्टलिटी मान कर दोनों का मेडिकल परीक्षण करना चाहिए। 

इंनफर्टलिटी के 35 से 40 फीसदी मामले में पुरूष जिम्मेदार  
शोध पत्र में कहा गया है कि इंफर्टलिटी के लिए 35 से 40 फीसदी जोडों में पुरूष जिम्मेदार होता है। इनके स्पर्म की क्वालिटी खराब होती है जिसके कारण गर्भधारण नहीं होता है। बताया कि उम्र बढने के साथ जनांनग के जर्मिनल एपीथिलियम में क्षरण होने लगता है जिसके कारण सपर्म में शुक्राणुअों की संख्या में कमी( अलिगो अोजो स्पर्मिया) , शुक्राण् न होना ( एजो स्पर्मिया), शुक्राणु के गति में कमी( एस्थोनोजो स्पर्मिया), बनावट में खराबी( टीराटोजो स्पर्मिया) की परेशानी होती है। 





उम्र            शुक्राणु संख्य़ा(मिलियल)             गति( प्रतिशत)                         मात्रा( एमएल)                           
21 -28          144.8                                  47.47                                      2.86
29-35           149.46                                48.14                                      2.74
36-42            120.41                                 40.0                                       2.48
43-49            112.33                                 33.12                                    2.44
50-60             61.03                                  31.33                                   1.73   





विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जारी किया नया स्पर्म का नार्मल रेंज
दस हजार में एक को हो सकती है विक्की डोनर की जरूरत 
कुमार संजय। लखनऊ
विक्की डोनर की जरूरत दस हजार में से किसी एक मे होती है। किस दंपति को विक्की डोनर की जरूरत है इसका पता केवल  परीक्षण से ही संभव है। सीमेन की गुणवत्ता को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने नई गाइड लाइन जारी किया है। इस दायरे में आपका सीमेन परीक्षण आता है तो आप पूर्ण रूप से संतान पैदा करने में सछम हैं। सीमेन की क्वालिटी को लेकर कई तरह की भ्रांतियां है जिसको दूर करने के लिए विश्वस्वास्थ्य संघटन ने विश्व के 14 देशों से 4500 लोगों के सीमेन का परीक्षण कर डाटा एकत्र किया है। परीक्षण रिपोर्ट को ह्यूमन रिप्रोडेक्शन अपडेट जर्नल ने स्वीकार भी किया है। रिर्पोट के मुताबिक 17 से 67 आयु वर्ग के लोगों के सीमेन का परीक्षण करने के बाद नार्मल रेंज तय किया गया है। स्पर्म काउंट, सीमेन वाल्यूम, स्पर्म कंनसट्रेशन, मोटैलिटी और वाइटैलिटी के मानकों पर सीमेन का परीक्षण किया गया। प्राइवेट प्रैक्टिशिंग पैथोलाजिस्ट एंड माइक्रोबायलोजिस्ट एसोसिएशन लखनऊ शाखा के डा. पीके गुप्ता कहते हैं कि नार्मल रेंज के तहत यदि सीमेन की रिपोर्ट आती है तो वह व्यक्ति पूर्ण रूप से स्वस्थ्य हैं। 
मानक               नार्मल वैल्यू 
सीमेन वाल्यूम  ....      1.4 से 1.7 एमएल 
टोटल स्पर्म   .....       39 मिलियिन पर एजूकुलेशन 
स्पर्म कंसेनट्रेशन  .....  1.5मिलियन प्रति एमएल 
मोर्टलिटी   .....         40 फीसदी 
वाइटैलिटी   .....       58 फीसदी लाइव 

सब कुछ ठीक तो भी 7 महीने लगता है गर्भधारण में 
सब कुछ ठीक है तो भी  गर्भधारण में 6 महीने का समय लग जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि पति -पत्नी दोनो सामान्य है तो भी महीने में गर्भधारण  करने की संभावना 20 फीसदी प्रति माह होती है। इस तरह सब कुछ सामान्य तौर पर चले तो भी महिला को गर्भवती होने में 6 से 7 माह का समय लग सकता है। सात माह भी पति और पत्नी को किसी परीक्षण के लिए जाना चाहिए





मंगलवार, 21 नवंबर 2017

पीजीआइ कर्मचारियों ने मांगा सातवें वेतन अायोग के अनुसार भत्ता

             
पीजीआइ कर्मचारियों ने मांगा सातवें वेतन अायोग के अनुसार भत्ता
चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को मिले एम्स के समान ग्रेड  

निदेशक को मिल कर दिया ज्ञापन
जागरणसंवाददाता। लखनऊ

कर्मचारी महासंघ पीजीआइ की अध्यक्ष सावित्री सिंह, महामंत्री एसपी यादव, सलाहकार एवं टीएनए( ट्रेंड नर्सेज एसोसिएशन) के पदाधिकारी  एसके राय, अजय कुमार सिंह ने निदेशक से मिल कर ज्ञापन सौंपा जिसमें एम्स दिल्ली के कर्मचारियों को सतवें वेतन अायोग के अाधार भत्ते देने के अादेश हो गए जिसके अाधार पर संस्थान के कर्मचारियों को भत्ते दिए जाएं। भत्ते  न मिलने के कारण कर्मचारियों को अार्थिक नुकसान हो रहा है। मांग पत्र अपर निदेशक, संयुक्त निदशक प्रशासन एवं वित्त  अधिकारी को भी दिया है। इसके अलावा चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को एम्स से समान ग्रेड पे एवं प्रमोशन देने की मांग की कहा कि संस्थान के इस वर्ग के कर्मचारी लंबे समय से पहले के ग्रेड पे पर काम कर रहे है। कर्मचारी नेताअों के कहना है कि एम्स दिल्ली में गैर संकाय कर्मचारियों को एक जुलाई 2016 एवं एक जुलाई 2017 से देने का अादेश जारी हो गया है। कहा कि संस्थान में सतवां वेतन अायोग निदेशक और संस्थान प्रशासन के सहयोग से लग गया है। दूसरी तरफ संस्थान प्रशासन का कहना है कि प्रदेश सरकार ने अभी भत्ते देने का अादेश जारी नहीं किया है। संस्थान के नियमावली में कहा गया है कि एम्स में लागू भत्ते एवं वेतन लागू होगे लेकिन प्रदेश सरकार से अनुमति के बाद ही लागू होगा। जब प्रदेश में अभी अादेश ही हुअा है तो सहमति शासन से कैसे मिलेगी। 

वोटर लिस्ट -ब्राह्मण के पिता श्रीवास्तव और निगम के पिता ब्राह्मण हो गए

ब्राह्मण के पिता श्रीवास्तव और निगम के पिता ब्राह्मण हो गए
विधान सभा, लोक सभा में वोट दिया अब नाम गायब
कानपुर रोड सेक्टर एल के मतदाता सूची में गड़बडी
 
 
जागरणसंवाददाता। लखनऊ
हर बार चुनाव से पहले वोटर लिस्ट को लेकर तैयारी होती है। बडे –बडे दावे होते है लेकिन वोटर लिस्ट में कमी का आलम यह है कि ब्राह्मण के पिता श्रीवास्तव जी हो गए । निगम जी के पिता ब्राह्मण हो गए। मुहल्ले के कई परिवार का नाम ही गायब है।  सेक्टर एल कानपुर रोड भवन संख्या एल -199 के पिता संजय द्वेदी के पिता राकेश कुमार श्रीवास्तव हो गए है। राजा बिजली पासी प्रथम वार्ड भाग संख्या 49 क्रम संख्या 381 पर दर्ज है। इसी तरह भवन संख्या एल -179 के निवासी विनोद कुमार निगम के पिता का नाम डीसी भारद्वाज अंकित है। विनोद कुमार निगम का नाम इसी वार्ड के भाग संख्या 47 क्रम संख्या 653  पर दर्ज है। यह केवल दो बानगी है। संजय बताते है कि इनकी पत्नी का नाम ही गायब है। इसी कालोनी के बीके त्रिपाठी के पूरे परिवार का नाम गायब है। हैरत की बात तो विधान सभा के चुनाव में सबका नाम सही था। सभी ने वोट डाला था लेकिन नगर निगम के चुनाव में यह कैसे हुआ सभी हैरत में हैं। सभासद प्रत्याशियों का कहना है कि इसी वार्ड के बंगला बाजार इलाके के पांच सौ वोटर के नाम ही गायब है। इस वार्ड के पांच लोगों का नाम दूसरे वार्ड में चला गया है। प्रत्याशी परेशान है कि जो हमारे वोट थे वहीं गायब है ऐसे में नैया कैसे पार लगेगी।  

सोमवार, 20 नवंबर 2017

पीजीआइ बना उत्तर भारत का तीसरा बढिया अस्पताल

कम उम्र में ही पीजीआइ करा रहा है बडो से मुकाबला

पीजीआइ बना उत्तर भारत का तीसरा बढिया अस्पताल
एम्स दिल्ली, पीजीआइ चंडीगढ के बाद पीजीआइ लखनऊ ने दिखाया दम 
न्यूरोलाजी, पल्मोनरी, गैस्ट्रो, कार्डियोडायबटिक केयर   में इलाज की गुणवत्ता की अाधार पर हुई रैंकिंग

                     


कुमार संजय। लखनऊ
संजय गांधी पीजीआइ कम उम्र में ही उत्तर भारत के तीसरा अस्पताल बन गया है जहां पर इलाज की गुणवत्ता इंटरनेशनल लेवल की है। पहले नंबर पर एम्स दिल्ली और दूसरे नंबर पर पीजीआई चंडीगढ है जो काफी पुराने संस्थान है। यह दोनों संस्थान केंद्र सरकार के अधीन है। इन संस्थानों में संकाय सदस्यों की संख्या  और विभाग भी अधिक है। एसजीपीजीआइ को यह स्थान इसी सप्ताह द वीक ने देश स्तर पर सर्वे के बाद किया है। इसमें लखनऊ के अलावा दिल्ली, चंडीगढ, भोपाल सहित कई शहरों से अार्थोपैडिक, कार्डियलोजी, गायनकोलाजी, डायबटीज केयर, बाल रोग, अाप्थेलमोलाजी, न्यूरोलाजी, गैस्ट्रोइंट्रोलाजी, अांकोलाजी, पल्मोनरी , जनरल मेडिसिन विशेषज्ञता में इलाज की सुविधा पर सर्वे किया गया । सर्वे में न्यूरोलाजी के क्षेत्र में सरकारी संस्थानों में चौथा स्थान मिला है पहले नंबर पर एम्स दिल्ली, दूसरे स्थान निमहांस बंगलौर, तीसरे स्थान पर पीजीआई चंडीगढ और चौथे स्थान पर पीजीआइ लखनऊ है । निजि और सरकारी मिला कर न्यीरोलाजी का दसवां स्थान है। गैस्ट्रोइंट्रोलाजी के इलाज में सरकारी संस्थानों में तीसरा स्थान है। कार्डियोलाजी में सरकारी संस्थानों में तीसरे स्थान पर है। डायबटिक केयर के मामले में सरकारी संस्थानों में पीजीआइ लखनऊ तीसरे नंबर पर है। पल्मोनरी मेडिसिन के मामले में यह विभाग संस्थान में एक दम नया है।   इसके बाद विभाग के स्थापना के सात साल में ही देश में सरकारी संस्थानों में चौथा रैंक हासिल किया है। निजि और सरकारी मिला कर इस विभाग को सातवां रैंक मिला है। इस विशेषज्ञता में किंग जार्ज मेडिकल विवि को भी 15 रैंक मिला है। 


हमारा संस्थान नया है । एम्स दिल्ली और पीजीआई चंडीगढ हमसे पहले के संस्थान है । हमारे पास कई विशेषज्ञता नहीं है जिन के अाधार पर सर्वे हुअा उसके अाधार पर कुछ ही विभाग यहां है जिसके अाधार पर उत्तर भारत में तीसरी रैंक मिली है। यह हमारे संस्थान के संकाय सदस्यों और दक्ष पैरामेडिकल स्टाफ के मेहनत का फल है....निदेशक प्रो.राकेश कपूर