मंगलवार, 30 जून 2026

केदारनाथ से एक इंच छोटा, इटावा में बन रहा भव्य केदारेश्वर

 


केदारनाथ से एक इंच छोटा, इटावा में बन रहा भव्य केदारेश्वर धाम


84 फीट ऊंचे मंदिर का गर्भगृह केदारनाथ की तर्ज पर, मूल धाम के सम्मान में रखी गई एक इंच कम ऊंचाई; उत्तर और दक्षिण भारतीय स्थापत्य का अद्भुत संगम


इटावा जिले के लोहन्ना चौराहे से ग्वालियर रोड पर लायन सफारी पार्क की तरफ बढ़ते ही सड़क के बाईं ओर अचानक एक विशाल मंदिर का शिखर नजर आता है। कुछ क्षणों के लिए ऐसा भ्रम होता है मानो उत्तराखंड का केदारनाथ मंदिर मैदानों में उतर आया हो। जैसे-जैसे मंदिर करीब आता है, लगभग दस फीट ऊंचे चबूतरे पर स्थापित काले ग्रेनाइट के विशाल नंदी की प्रतिमा श्रद्धालुओं का स्वागत करती है। नंदी की दृष्टि सीधे गर्भगृह की ओर है और उसके पीछे पत्थरों से आकार ले रहा है केदारेश्वर महादेव मंदिर पहली ही नजर में अपनी भव्यता का अहसास करा देता है।

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी ऊंचाई है। करीब 84 फीट ऊंचे इस मंदिर का गर्भगृह उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर की तर्ज पर बनाया जा रहा है। निर्माणकर्ताओं के अनुसार इसकी कुल ऊंचाई जानबूझकर केदारनाथ मंदिर से लगभग एक इंच कम रखी गई है, ताकि मूल धाम के प्रति सम्मान व्यक्त किया जा सके। करीब 11 एकड़ क्षेत्र में विकसित हो रहा यह मंदिर केवल धार्मिक परियोजना नहीं है, बल्कि उत्तराखंड की नागर शैली और दक्षिण भारत की द्रविड़ मंदिर परंपरा का दुर्लभ संगम भी है। मंदिर अभी निर्माणाधीन है, लेकिन सावन शुरू होने से पहले ही यहां प्रतिदिन दो हजार से अधिक श्रद्धालुओं के आने का दावा किया जा रहा है।

यही वह मंदिर है, जिसके बारे में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कई बार सार्वजनिक मंचों से कह चुके हैं कि मंदिर के पूर्ण होने के बाद वह सबसे पहले यहां भगवान शिव के दर्शन करेंगे और उसके बाद अयोध्या जाकर रामलला के दर्शन करेंगे। उनके इस बयान के बाद यह मंदिर केवल धार्मिक कारणों से ही नहीं, बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श के केंद्र में भी आ गया।

दिलचस्प बात यह है कि इस मंदिर की कहानी किसी राजनीतिक रणनीति या चुनावी योजना से शुरू नहीं हुई थी। इसकी शुरुआत करीब 17 वर्ष पहले एक विशाल नंदी की प्रतिमा बनाने की इच्छा से हुई थी।

दरअसल, मैसूर के जयचामाराजेंद्र कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में पढ़ाई के दौरान अखिलेश यादव अक्सर प्रसिद्ध चामुंडेश्वरी मंदिर जाया करते थे। वहां स्थापित काले ग्रेनाइट के विशाल नंदी की प्रतिमा ने उनके मन पर गहरी छाप छोड़ी थी। वर्षों बाद वर्ष 2009 में नई दिल्ली में आंध्र प्रदेश के शिल्प विशेषज्ञ और मंदिर निर्माण कर रही कंपनी के निदेशक मधु बोट्टा से मुलाकात के दौरान उन्होंने उसी शैली की एक विशाल नंदी प्रतिमा इटावा में स्थापित करने की इच्छा जताई।

करीब आठ वर्षों की तैयारी के बाद वर्ष 2017 में मैसूर के नंदी की लगभग हूबहू प्रतिकृति इटावा लाई गई। जब अखिलेश यादव ने उस प्रतिमा को देखा तो वह इतने प्रभावित हुए कि यहीं से एक भव्य शिव मंदिर बनाने का विचार सामने आया। इसके बाद वर्ष 2018 में इटावा लायन सफारी पार्क के सामने शीतलपुर गांव में ट्रस्ट के माध्यम से भूमि खरीदी गई और मंदिर की परिकल्पना पर काम शुरू हुआ।

मंदिर निर्माण से पहले देश के अनेक प्राचीन शिव मंदिरों का अध्ययन किया गया। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और उत्तराखंड के मंदिरों की स्थापत्य शैली का गहन सर्वेक्षण किया गया। अंततः निर्णय लिया गया कि मंदिर का गर्भगृह उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर की शैली पर आधारित होगा, जबकि पूरा परिसर दक्षिण भारतीय द्रविड़ वास्तुकला से प्रेरित होगा। इसी कारण यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय मंदिर वास्तुकला की दो महान परंपराओं के संगम का भी प्रतीक बनकर उभर रहा है।

मंदिर को लेकर चर्चा पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर फरवरी 2024 में हुई, जब नेपाल से लाई गई शालिग्राम शिला लखनऊ स्थित समाजवादी पार्टी के प्रदेश मुख्यालय पहुंची। अगले दिन अखिलेश यादव, उनकी पत्नी डिंपल यादव और पार्टी नेताओं ने वैदिक रीति से उसकी पूजा-अर्चना की। बाद में यही शिला इटावा लाई गई और अब मंदिर के गर्भगृह में स्थापित की जा रही है। इसके बाद से यह मंदिर लगातार धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है।

आज निर्माणाधीन होने के बावजूद केदारेश्वर महादेव मंदिर केवल इटावा की पहचान नहीं बन रहा, बल्कि उत्तर प्रदेश में आस्था, प्राचीन भारतीय शिल्पकला, सांस्कृतिक विरासत और बदलते राजनीतिक विमर्श के एक नए प्रतीक के रूप में भी देखा जा रहा है। मंदिर के पूर्ण होने के बाद यह केवल श्रद्धालुओं का नया आस्था केंद्र ही नहीं, बल्कि देश के प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थलों में अपनी जगह बनाने की क्षमता भी रखता है। साभार आशीष मिश्रा इंडिया टुडे 

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