ट्रांसप्लांट के साथ आम बीमारी पर भी हो कड़ी नज़र
अंग प्रत्यारोपण भी जरूरी, लेकिन स्वास्थ्य नीति का केंद्र करोड़ों आम मरीज भी हों
पिछले कुछ वर्षों में किडनी, लिवर, हार्ट और फेफड़े (लंग) प्रत्यारोपण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। जिन मरीजों के लिए अंग प्रत्यारोपण ही जीवन बचाने का अंतिम विकल्प होता है, उनके लिए यह चिकित्सा विज्ञान का वरदान है। विभिन्न चिकित्सा आकलनों के अनुसार भारत में हर वर्ष लगभग 3 लाख मरीजों को किसी न किसी अंग प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है, जबकि अंगों की कमी, सीमित केंद्रों और आर्थिक कारणों से केवल 20–25 हजार मरीजों का ही प्रत्यारोपण हो पाता है। इसलिए ट्रांसप्लांट सेवाओं का विस्तार और अंगदान को बढ़ावा देना आवश्यक है।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष कहीं अधिक बड़ा है। भारत में हर वर्ष 80 लाख से अधिक लोगों की मौत हृदय रोग, कैंसर, स्ट्रोक, मधुमेह, फेफड़ों की बीमारियों, संक्रामक रोगों और अन्य गंभीर बीमारियों से हो जाती है। यानी अंग प्रत्यारोपण की जरूरत वाले लगभग 3 लाख मरीजों की तुलना में अन्य गंभीर बीमारियों से मरने वालों की संख्या 25 गुना से भी अधिक है। ऐसे में स्वास्थ्य नीति का उद्देश्य केवल ट्रांसप्लांट कार्यक्रमों का विस्तार नहीं, बल्कि उन बीमारियों के इलाज को भी सर्वोच्च प्राथमिकता देना होना चाहिए जो सबसे अधिक लोगों की जान ले रही हैं।
आंकड़े क्या कहते हैं?
भारत में अनुमानित रूप से हर वर्ष—
हृदय रोग से लगभग 30 लाख लोगों की मृत्यु होती है।
कैंसर से लगभग 10 लाख लोगों की जान जाती है।
ब्रेन स्ट्रोक से करीब 8 लाख लोगों की मौत होती है।
फेफड़ों की गंभीर बीमारियों से लगभग 10 लाख लोग दम तोड़ते हैं।
मधुमेह से लगभग 5 लाख लोगों की मृत्यु होती है।
टीबी, निमोनिया और अन्य संक्रामक रोगों से करीब 15–18 लाख लोगों की जान जाती है।
सड़क दुर्घटनाओं में प्रतिवर्ष लगभग 1.77 लाख लोगों की मौत होती है।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि ट्रांसप्लांट चिकित्सा महत्वपूर्ण है, लेकिन देश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौती अभी भी वे बीमारियां हैं जिनसे हर वर्ष लाखों लोगों की जान जा रही है।
ट्रांसप्लांट बनाम सामान्य बीमारियां: किसे कितनी जरूरत?
देश में हर वर्ष लगभग 3 लाख मरीजों को अंग प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है। दूसरी ओर करोड़ों लोग पेट, आंत, पित्ताशय, मूत्राशय, प्रोस्टेट, कैंसर, न्यूरोसर्जरी, हड्डी, स्त्री एवं प्रसूति, संक्रमण, दुर्घटनाओं और अन्य बीमारियों के इलाज के लिए अस्पताल पहुंचते हैं।
इन मरीजों में अधिकांश को ट्रांसप्लांट नहीं, बल्कि समय पर ऑपरेशन, आईसीयू, विशेषज्ञ डॉक्टर और आवश्यक दवाओं की जरूरत होती है। यदि ये सुविधाएं समय पर मिल जाएं तो लाखों लोगों की जान बचाई जा सकती है।
इलाज का खर्च भी समझना होगा
अंग प्रत्यारोपण केवल चिकित्सा की नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी सबसे महंगी प्रक्रियाओं में से एक है।
किडनी ट्रांसप्लांट का खर्च लगभग 5–10 लाख रुपये।
लिवर ट्रांसप्लांट का खर्च लगभग 20–35 लाख रुपये।
हार्ट ट्रांसप्लांट का खर्च लगभग 20–30 लाख रुपये।
लंग ट्रांसप्लांट का खर्च लगभग 25–40 लाख रुपये या उससे अधिक हो सकता है।
यहीं खर्च समाप्त नहीं होता। ट्रांसप्लांट के बाद मरीज को जीवनभर महंगी दवाएं, नियमित जांच और विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी की आवश्यकता होती है, जिस पर हर महीने हजारों रुपये खर्च होते हैं।
इसके विपरीत, अधिकांश सामान्य और सुपर स्पेशियलिटी बीमारियों—जैसे पित्ताशय, अपेंडिक्स, हर्निया, मूत्राशय, प्रोस्टेट, कैंसर की शुरुआती सर्जरी, हड्डी, स्त्री रोग और अन्य ऑपरेशन—का इलाज सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क या बहुत कम खर्च पर उपलब्ध कराया जा सकता है। निजी अस्पतालों में भी इनका खर्च सामान्यतः 50 हजार से 3 लाख रुपये के बीच होता है। अर्थात इन बीमारियों का इलाज आम लोगों की पहुंच में लाया जा सकता है, यदि सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत हों।
सबसे बड़ी चुनौती—आईसीयू की कमी
देश के अधिकांश सरकारी अस्पतालों में आईसीयू बेड की भारी कमी है। गंभीर मरीजों को समय पर आईसीयू नहीं मिल पाता। मजबूरी में उन्हें निजी अस्पतालों में भर्ती कराना पड़ता है, जहां एक दिन का आईसीयू खर्च ही हजारों से लेकर लाख रुपये तक पहुंच सकता है। अनेक परिवार इलाज के लिए कर्ज में डूब जाते हैं या अपनी जीवनभर की जमा पूंजी गंवा देते हैं।
यदि समय पर आईसीयू उपलब्ध हो जाए तो हार्ट अटैक, स्ट्रोक, सेप्सिस, दुर्घटनाओं और जटिल सर्जरी वाले हजारों मरीजों की जान बचाई जा सकती है।
प्राथमिकता क्या होनी चाहिए
अंग प्रत्यारोपण की सुविधाओं का विस्तार होना चाहिए, लेकिन स्वास्थ्य बजट का बड़ा हिस्सा उन सेवाओं पर भी खर्च होना चाहिए जिनका लाभ सबसे अधिक लोगों को मिले।
प्रत्येक राज्य की राजधानी में कम से कम 2000 बेड का आधुनिक क्रिटिकल केयर (आईसीयू) अस्पताल विकसित किया जाए।
जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में आईसीयू और आपातकालीन सेवाओं का विस्तार किया जाए।
पेट, आंत, मूत्राशय, कैंसर, न्यूरोसर्जरी और अन्य सुपर स्पेशियलिटी सर्जरी की क्षमता बढ़ाई जाए।
संक्रामक रोगों और नॉन-कम्युनिकेबल बीमारियों की रोकथाम और उपचार पर अधिक निवेश किया जाए।
आम मरीजों के लिए सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाएं।
ट्रांसप्लांट केंद्रों का क्षेत्रीय मॉडल
अत्यधिक विशेषज्ञता और महंगे संसाधनों की आवश्यकता को देखते हुए यह भी विचार किया जा सकता है कि तीन-चार राज्यों के लिए एक विश्वस्तरीय क्षेत्रीय ट्रांसप्लांट संस्थान विकसित किया जाए, जहां केवल अंग प्रत्यारोपण और उससे जुड़ी सुपर स्पेशियलिटी सेवाएं उपलब्ध हों। इससे अन्य मेडिकल कॉलेजों और सरकारी अस्पतालों में आईसीयू, सामान्य सर्जरी और गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध कराए जा सकते हैं। यह एक नीतिगत सुझाव है, जिस पर विशेषज्ञों और सरकार को व्यापक चर्चा करनी चाहिए।
भारत को ट्रांसप्लांट की आवश्यकता है, लेकिन उससे कहीं अधिक आवश्यकता है संतुलित स्वास्थ्य नीति की।
जब एक ओर लगभग 3 लाख लोगों को हर वर्ष अंग प्रत्यारोपण की जरूरत होती है, वहीं दूसरी ओर 80 लाख से अधिक लोग अन्य गंभीर बीमारियों से अपनी जान गंवा देते हैं। इसलिए स्वास्थ्य व्यवस्था का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने ट्रांसप्लांट हुए, बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि कितने हार्ट अटैक के मरीज समय पर आईसीयू तक पहुंचे, कितने कैंसर रोगियों का समय पर ऑपरेशन हुआ, कितने स्ट्रोक मरीजों को गोल्डन ऑवर में इलाज मिला और कितने गरीब परिवार बिना आर्थिक तबाही के इलाज करा सके।
आधुनिक चिकित्सा का वास्तविक उद्देश्य केवल सबसे जटिल ऑपरेशन करना नहीं, बल्कि सबसे अधिक लोगों की जान बचाना है। यही भारत की स्वास्थ्य नीति की सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।

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