रविवार, 28 जून 2026

दुर्लभ ब्रेन एन्यूरिज्म से जूझ रहे 8 वर्षीय ओजस को मिली नई जिंदगी

 

दुर्लभ ब्रेन एन्यूरिज्म से जूझ रहे रामनगर (बाराबंकी) के 8 वर्षीय ओजस को मिली नई जिंदगी

एसजीपीजीआई में बिना स्टेंट के कॉइलिंग कर बंद किया गया एन्यूरिज्म, प्रो. विवेक सिंह बोले—“यह मामला जिंदगी भर याद रहेगा”

लखनऊ।

बाराबंकी जिले के रामनगर क्षेत्र के रहने वाले 8 वर्षीय ओजस को एसजीपीजीआई के चिकित्सकों ने एक जटिल और जानलेवा ब्रेन एन्यूरिज्म से बचाकर नई जिंदगी दी है। मस्तिष्क की रक्त वाहिनी में बने एन्यूरिज्म के कारण बच्चे में लकवे के लक्षण उभर आए थे। परिवार के सामने अपने इकलौते बेटे को बचाने की चुनौती थी, लेकिन एसजीपीजीआई के विशेषज्ञों ने आधुनिक तकनीक के जरिए सफल उपचार कर उसे स्वस्थ जीवन लौटाया।

लकवे के लक्षणों ने बढ़ाई चिंता

ओजस के पिता आदर्श कुमार मिश्रा, निवासी रामनगर, बाराबंकी, बताते हैं कि बेटे को अचानक न्यूरोलॉजिकल समस्याएं होने लगी थीं। धीरे-धीरे उसके शरीर में कमजोरी और लकवे जैसे लक्षण दिखाई देने लगे। जांच में पता चला कि मस्तिष्क की एक रक्त वाहिनी में ब्रेन एन्यूरिज्म बन गया है। यह ऐसी स्थिति होती है जिसमें रक्त वाहिनी की दीवार कमजोर होकर गुब्बारे की तरह फूल जाती है और उसके फटने पर जानलेवा रक्तस्राव हो सकता है।

बीमारी की जानकारी मिलते ही परिवार पर मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। इसके बाद ओजस को एसजीपीजीआई लाया गया, जहां वरिष्ठ रेडियोलॉजिस्ट एवं न्यूरो-इंटरवेंशनल विशेषज्ञ प्रोफेसर विवेक सिंह ने उसकी जांच की।

18 अक्टूबर 2024 को हुआ जटिल ऑपरेशन

जांच के बाद चिकित्सकों ने एंडोवैस्कुलर एम्बोलाइजेशन यानी कॉइलिंग प्रक्रिया करने का निर्णय लिया। 18 अक्टूबर 2024 को यह जटिल प्रक्रिया सफलतापूर्वक की गई। इसमें शरीर की रक्त वाहिनी के रास्ते बेहद पतले कैथेटर मस्तिष्क तक पहुंचाए गए और विशेष कॉइल्स की मदद से एन्यूरिज्म को भीतर से बंद कर दिया गया।

प्रोफेसर विवेक सिंह के अनुसार सामान्यतः ऐसे मामलों में वयस्क मरीजों को स्टेंट लगाने की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन ओजस की उम्र और रक्त वाहिनियों के आकार को देखते हुए कॉइलिंग तकनीक से ही एन्यूरिज्म को सफलतापूर्वक बंद किया गया। इससे मस्तिष्क की प्रभावित नस में रक्त का असामान्य प्रवाह रुक गया और भविष्य में उसके फटने का खतरा समाप्त हो गया।

एक सप्ताह अस्पताल में भर्ती रहा बच्चा

ऑपरेशन के बाद ओजस को लगभग एक सप्ताह तक अस्पताल में भर्ती रखा गया। इस दौरान उसकी स्थिति में लगातार सुधार होता गया। चिकित्सकों की निगरानी में उपचार पूरा होने के बाद उसे छुट्टी दे दी गई। आज वह नियमित रूप से फॉलो-अप के लिए एसजीपीजीआई आता है और पूरी तरह स्वस्थ जीवन जी रहा है।

“20 साल के करियर में यह सबसे यादगार मामलों में से एक”

प्रोफेसर विवेक सिंह बताते हैं कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से न्यूरो-इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं और एक हजार से अधिक जटिल मामलों का उपचार कर चुके हैं। इनमें अधिकांश मरीज वयस्क रहे हैं, लेकिन बच्चों में इस प्रकार का एन्यूरिज्म बेहद दुर्लभ होता है।

उन्होंने कहा, “ज्यादातर उपकरण और तकनीकें वयस्क मरीजों के लिए विकसित की गई हैं। ऐसे में किसी छोटे बच्चे की नाजुक रक्त वाहिनियों में पहुंचकर एन्यूरिज्म को सुरक्षित तरीके से बंद करना काफी चुनौतीपूर्ण होता है। ओजस का मामला इसलिए विशेष था क्योंकि यह एक बच्चे की जिंदगी से जुड़ा था। यही वजह है कि यह केस मुझे पूरी जिंदगी याद रहेगा।”

उन्होंने आगे कहा, “आज जब ओजस फॉलो-अप पर आता है और उसे पूरी तरह स्वस्थ, मुस्कुराते हुए और सामान्य बच्चों की तरह जीवन जीते देखता हूं तो मन को बहुत सुकून मिलता है। किसी बच्चे को मौत के खतरे से बाहर निकालकर सामान्य जीवन में लौटते देखना किसी भी चिकित्सक के लिए सबसे बड़ी संतुष्टि होती है।”

पिता बोले—डॉक्टर हमारे लिए भगवान से कम नहीं

ओजस के पिता आदर्श कुमार मिश्रा कहते हैं कि बीमारी का पता चलने के बाद पूरा परिवार सदमे में था। उन्हें भविष्य की चिंता सता रही थी, लेकिन प्रोफेसर विवेक सिंह और उनकी टीम ने हर कदम पर उनका हौसला बढ़ाया।

उन्होंने कहा, “जब हमें बताया गया कि बेटे के मस्तिष्क की नस में एन्यूरिज्म है और उसकी वजह से लकवे के लक्षण आ रहे हैं, तब हम पूरी तरह टूट चुके थे। लेकिन डॉक्टरों ने भरोसा दिलाया कि इलाज संभव है। आज मेरा बेटा पूरी तरह स्वस्थ है। उसे दौड़ते-भागते और सामान्य बच्चों की तरह खेलते देखना हमारे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है।”

समय पर इलाज से बची जान

विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों में ब्रेन एन्यूरिज्म के मामले बहुत कम देखने को मिलते हैं, लेकिन समय पर पहचान और उपचार न होने पर यह जानलेवा साबित हो सकता है। लगातार सिरदर्द, शरीर के किसी हिस्से में कमजोरी, बोलने में कठिनाई या लकवे जैसे लक्षण दिखाई दें तो तत्काल विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

रामनगर, बाराबंकी के ओजस की यह कहानी आधुनिक चिकित्सा, विशेषज्ञता और समय पर उपचार की सफलता का उदाहरण है। एक समय जिस बच्चे की जिंदगी खतरे में थी, आज वही बच्चा पूरी तरह स्वस्थ होकर भविष्य के सपने संजो रहा है। वहीं, इस सफलता को याद करते हुए प्रोफेसर विवेक सिंह के शब्द इस उपलब्धि की अहमियत को बयां करते हैं—“कुछ मरीज सिर्फ केस नहीं होते, वे जिंदगी भर की याद बन जाते हैं, और ओजस उन्हीं में से एक है।”

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