खून की जांच से पहले ही पकड़ में आ सकता है अग्नाशय कैंसर, एसजीपीजीआई के शोध से जगी नई उम्मीद
लखनऊ। अग्नाशय कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी की पहचान अब सिर्फ खून की जांच से शुरुआती दौर में करने का रास्ता खुल सकता है। संजय गांधी पीजीआई, किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी और मेदांता अस्पताल के वैज्ञानिकों के एक संयुक्त शोध में शरीर में होने वाले ऐसे बदलावों का पता चला है, जिनकी मदद से भविष्य में बीमारी का पता काफी पहले लगाया जा सकेगा।
यह शोध अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुआ है।
एसजीपीजीआई के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के प्रो. गौरव पांडे ने बताया कि अग्नाशय कैंसर की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इसके लक्षण बहुत देर से सामने आते हैं। पेट दर्द, वजन कम होना या भूख कम लगना जैसे लक्षण तब दिखाई देते हैं, जब बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है। यही वजह है कि मरीजों का इलाज भी अक्सर देर से शुरू हो पाता है।
उन्होंने बताया कि इस अध्ययन में 35 अग्नाशय कैंसर मरीजों और 21 स्वस्थ लोगों समेत कुल 56 लोगों के खून के नमूनों का अध्ययन किया गया। मरीजों के नमूने इलाज शुरू होने से पहले लिए गए, ताकि बीमारी से जुड़े वास्तविक बदलावों को समझा जा सके।
शोध में खून में मौजूद छोटे-छोटे रासायनिक पदार्थों का विशेष तकनीक से विश्लेषण किया गया। इससे पता चला कि अग्नाशय कैंसर के मरीजों के शरीर में ऊर्जा बनाने और उसका इस्तेमाल करने का तरीका सामान्य लोगों से अलग हो जाता है।
अध्ययन में पाया गया कि मरीजों में अमीनो अम्ल का स्तर करीब 12 प्रतिशत कम था, जबकि ग्लूकोज और लैक्टेट जैसे ऊर्जा से जुड़े पदार्थों का स्तर करीब 57 प्रतिशत अधिक था। इसका मतलब है कि कैंसर कोशिकाएं तेजी से बढ़ने के लिए ज्यादा ऊर्जा जुटाने लगती हैं।
शोध में एलानिन, आइसोल्यूसिन और वेलिन नाम के तीन महत्वपूर्ण जैविक संकेतकों की पहचान हुई, जो भविष्य में बीमारी का पता लगाने में मददगार साबित हो सकते हैं।
प्रो. गौरव पांडे ने बताया कि यह अभी शुरुआती स्तर का शोध है और इसे अधिक मरीजों पर परखने की जरूरत है। अगर आगे भी ऐसे ही परिणाम मिलते हैं तो भविष्य में बिना दर्द, बिना सर्जरी और बिना जटिल जांच के सिर्फ खून की जांच से अग्नाशय कैंसर की शुरुआती पहचान करना संभव हो सकता है। इससे मरीजों का इलाज जल्दी शुरू होगा और उनके ठीक होने की संभावना बढ़ेगी।
शोध दल में किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के डॉ. सुधीर कुमार शेखर और डॉ. दिलुतपाल शर्मा, एसजीपीजीआई के जैव चिकित्सा अनुसंधान केंद्र से डॉ. उमेश कुमार और डॉ. आशीष गुप्ता, मेदांता अस्पताल के डॉ. अभय वर्मा तथा एसजीपीजीआई के प्रो. गौरव पांडे शामिल रहे।

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