सोमवार, 1 जून 2026

मृतक अंगदाताओं ने दी जीवन की नई उम्मीद, 30 से अधिक मरीजों को मिला नया जीवन

 



जागरूकता से मिल रही है जिंदगी

21 मृतक अंगदाताओं ने दी जीवन की नई उम्मीद, 30 से अधिक मरीजों को मिला नया जीवन

लखनऊ। किसी परिवार के लिए अपने प्रियजन को खोने का दुख शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। लेकिन जब वही परिवार अपने दुःख के बीच मानवता का सबसे बड़ा निर्णय लेते हुए अंगदान का संकल्प करता है, तो कई अनजान लोगों के जीवन में नई उम्मीद और नई सुबह का जन्म होता है। उत्तर प्रदेश में पिछले छह वर्षों के दौरान 21 परिवारों ने ऐसा ही साहसिक निर्णय लिया, जिसके परिणामस्वरूप 30 से अधिक मरीजों को नया जीवन मिल सका।

वर्ष 2020 में कोरोना काल के दौरान संजय गांधी पीजीआई के अस्पताल प्रशासन विभाग और स्टेट ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (सोटो) द्वारा शुरू किए गए जागरूकता अभियान का प्रभाव अब स्पष्ट दिखाई दे रहा है। सोटो के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 से 2026 तक प्रदेश में कुल 21 कैडेवरिक अंगदान हुए हैं।

वर्ष 2020 में 2, वर्ष 2021 में 1, वर्ष 2022 में 6, वर्ष 2023 में 4, वर्ष 2024 में कोई कैडेवरिक अंगदान नहीं हुआ, जबकि वर्ष 2025 और 2026 में अब तक 4-4 कैडेवरिक अंगदान दर्ज किए गए हैं। इन अंगदानों के माध्यम से 30 से अधिक मरीजों को नया जीवन मिला।

किन संस्थानों ने निभाई अहम भूमिका

सबसे अधिक 6 कैडेवरिक अंगदान अपोलोमेडिक्स अस्पताल में हुए। इसके बाद केजीएमयू में 5, एसजीपीजीआई में 3, कमांड अस्पताल में 2, जबकि जयपी अस्पताल, नोएडा और आरएमएलआईएमएस में 1-1 अंगदान हुआ। इन संस्थानों ने प्रदेश में मृतक अंगदान कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जागरूकता अभियान ने बदली सोच

स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और सामाजिक संगठनों में लगातार चलाए गए जागरूकता कार्यक्रमों ने अंगदान को लेकर लोगों की सोच बदली है। ब्रेन डेथ और अंगदान से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने के लिए नियमित जनसंवाद और कार्यशालाएं आयोजित की गईं।

सोटो के संयुक्त निदेशक प्रो. राजेश हर्षवर्धन ने इस अभियान को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहीं प्रो. नारायण प्रसाद ने विभिन्न राष्ट्रीय मंचों के माध्यम से अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने में उल्लेखनीय योगदान दिया।

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पर्दे के पीछे के नायक

अंगदान की सफलता में ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर्स और काउंसलिंग टीम की भूमिका बेहद अहम रही है। भोलेश्वर पाठक, नीलिमा दीक्षित, संजय सिंह, हरीश चोपड़ा, सचित्रा वी.पी., हिमांशु सिंह तथा अन्य कोऑर्डिनेटर्स ने परिजनों को संवेदनशील तरीके से समझाकर कई परिवारों को अंगदान के लिए प्रेरित किया।

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सफल अंगदान के लिए समन्वय भी जरूरी

ब्रेन डेड घोषित होने के बाद अंगों की हार्वेस्टिंग, संरक्षण और प्रत्यारोपण एक जटिल प्रक्रिया है। एसजीपीजीआई में इंटरनल ऑर्गन ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेशन कमेटी के अध्यक्ष प्रो. नारायण प्रसाद विभिन्न विभागों के बीच समन्वय स्थापित करते हैं, जिससे अंगदान से लेकर प्रत्यारोपण तक की प्रक्रिया समयबद्ध और सफल हो सके।

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फनीश मणि त्रिपाठी ने दी मानवता की मिसाल

एसजीपीजीआई के सेवानिवृत्त कर्मचारी फनीश मणि त्रिपाठी के परिवार ने सड़क दुर्घटना के बाद ब्रेन डेड घोषित होने पर अंगदान का निर्णय लिया। एनेस्थीसिया विभाग की प्रोफेसर एवं कैडेवर ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर डॉ. सुरुचि और उनकी टीम की काउंसलिंग के बाद हुए इस निर्णय से पांच जरूरतमंद मरीजों को नया जीवन मिला।

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फनीश मणि त्रिपाठी की तस्वीर लगाने की मांग

एसजीपीजीआई कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष धर्मेश कुमार और महामंत्री सीमा शुक्ला ने मांग की है कि स्वर्गीय फनीश मणि त्रिपाठी की बड़ी तस्वीर एपेक्स ट्रॉमा सेंटर और संस्थान की ओपीडी में लगाई जाए।

तस्वीर के नीचे लिखा जाए— "स्व. फनीश मणि त्रिपाठी : जिन्होंने मृत्यु के बाद भी पांच लोगों को नया जीवन दिया।"

महासंघ का कहना है कि इससे अस्पताल आने वाले लोगों में अंगदान के प्रति जागरूकता और प्रेरणा बढ़ेगी।


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