सोमवार, 1 जून 2026

पहले ही लगेगा पता कितना खतरनाक होगा ब्लड कैंसर

 

पहले ही लगेगा पता कितना खतरनाक होगा ब्लड कैंसर


नॉर्मल एसएफएलसी रेशियो से कम आक्रामक हो सकता है मल्टीपल मायलोमा


शोध में मिले संकेत—कम जोखिम वाले मरीजों में बेहतर इलाज प्रतिक्रिया, शुरुआती पहचान और जोखिम निर्धारण में मिल सकती है मदद

कुमार संजय

लखनऊ। ब्लड कैंसर मल्टीपल मायलोमा को लेकर संजय गांधी पीजीआइ के शोधकर्ताओं ने ऐसे मार्कर का पता लगाया है, जिससे बीमारी की गंभीरता समझने में मदद मिल सकती है। अध्ययन में पाया गया कि जिन मरीजों का सीरम फ्री लाइट चेन (एसएफएलसी) अनुपात सामान्य या लगभग सामान्य रहता है, उनमें बीमारी अपेक्षाकृत कम आक्रामक होती है और इलाज का असर बेहतर देखने को मिलता है।

अध्ययन में 306 मरीजों को शामिल किया गया, जिनमें 240 मरीज मल्टीपल मायलोमा से पीड़ित थे। 9.6 प्रतिशत मरीजों में एसएफएलसी रेशियो सामान्य पाया गया। इनमें बीमारी का व्यवहार कम आक्रामक रहा और इलाज के प्रति बेहतर प्रतिक्रिया देखी गई। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि नॉर्मल एसएफएलसी समूह के 88.9 प्रतिशत मरीजों ने बेहतर इलाज प्रतिक्रिया यानी वेरी गुड पार्टियल रिस्पॉन्स हासिल किया, जबकि असामान्य एसएफएलसी समूह में यह दर 65.4 प्रतिशत रही।

शोध के अनुसार, नॉर्मल या लगभग नॉर्मल एसएफएलसी रेशियो वाले मरीजों में बीमारी कम खतरनाक होती है और इलाज पर बेहतर रिस्पॉन्स मिलता है। इसलिए यह पैरामीटर भविष्य में मल्टीपल मायलोमा मरीजों की जोखिम श्रेणी तय करने में महत्वपूर्ण बायोमार्कर साबित हो सकता है।



भारत में कितनी है बीमारी की दर

मल्टीपल मायलोमा अपेक्षाकृत दुर्लभ लेकिन गंभीर ब्लड कैंसर है। भारत में यह सभी कैंसर मामलों का करीब 1.2 प्रतिशत हिस्सा है। हर एक लाख पुरुषों में लगभग 1.3 और हर एक लाख महिलाओं में करीब 1 व्यक्ति इस बीमारी से प्रभावित होता है। यह ब्लड कैंसर के प्रमुख प्रकारों में शामिल है और आमतौर पर 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में ज्यादा देखा जाता है, हालांकि अब कम उम्र के मरीज भी सामने आने लगे हैं।

क्या होता है मल्टीपल मायलोमा?

मल्टीपल मायलोमा एक प्रकार का ब्लड कैंसर है, जिसमें शरीर की प्लाज्मा कोशिकाएं असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं। ये कोशिकाएं हड्डियों के अंदर पाई जाती हैं और संक्रमण से लड़ने वाली एंटीबॉडी बनाती हैं। बीमारी में ये असामान्य प्रोटीन बनाने लगती हैं, जिससे हड्डियों में दर्द, कमजोरी, खून की कमी और किडनी पर असर जैसी समस्याएं हो सकती हैं।


इन्होंने किया शोध


संजय गांधी पीजीआइ के हेमेटोलॉजी विभाग के डा. मनीष के. सिंह, डा. यादव संजीव, डा. अक्षिता पांडेय, डा. खलीकुर रहमान, डा. मोना विजयरण, डा. पूरवी कपूर, डा. सायन सिन्हा रॉय, डा. रुचि गुप्ता, डा. दिनेश चंद्र, डा. कौशल कुमार, डा. विनीता शर्मा और प्रो. राजेश कश्यप ने यह शोध किया।

अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुआ शोध

यह अध्ययन वर्ष 2026 में अंतरराष्ट्रीय जर्नल इंटरनेशनल जर्नल ऑफ लेबोरेटरी हेमेटोलॉजी में प्रकाशित हुआ है।

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