शनिवार, 13 जून 2026

हार्ट फेलियर का खतरा पहले ही बताएंगे पांच रिस्क स्कोर

 





 हार्ट फेलियर का खतरा पहले ही बताएंगे पांच रिस्क स्कोर




 पीजीआइ और एससीटीआईएमएस के अध्ययन में भारतीय मरीजों पर भी साबित हुई उपयोगिता


 कुमार संजय


 हार्ट फेलियर जैसी गंभीर हृदय बीमारी का खतरा अब पहले ही पहचाना जा सकेगा। संजय गांधी गांधी पीजीआइ और तिरुवनंतपुरम के श्री चित्रा तिरुनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी (एससीटीआईएमएस) के विशेषज्ञों के अध्ययन में पाया गया है कि पांच अंतरराष्ट्रीय रिस्क स्कोर भारतीय मरीजों में भी हार्ट फेलियर के जोखिम, दोबारा अस्पताल में भर्ती होने की आशंका और मृत्यु के खतरे का सटीक आकलन कर सकते हैं। इन स्कोरों को नियमित चिकित्सा अभ्यास का हिस्सा बनाकर उच्च जोखिम वाले मरीजों की समय रहते पहचान की जा सकती है, जिससे जटिलताओं और मृत्यु दर को कम करने में मदद मिलेगी। शोध को इंडियन हार्ट जर्नल ने स्वीकार किया है। ढाई साल तक चले शोध में 280 मरीजों को शामिल किया गया। इनमें कुछ मरीज ऐसे थे जिनमें हार्ट फेलियर होने का जोखिम था, जबकि कुछ पहले से इस बीमारी से ग्रस्त थे। शोधकर्ताओं ने करीब 30 महीने तक इन मरीजों का फॉलोअप किया। इस दौरान जोखिम वाले समूह के लगभग 32 प्रतिशत मरीजों में नया हार्ट फेलियर विकसित हुआ। वहीं पहले से हार्ट फेलियर से पीड़ित मरीजों में 37 प्रतिशत को दोबारा अस्पताल में भर्ती होना पड़ा और करीब नौ प्रतिशत मरीजों की मृत्यु हुई।




 पांच अंतरराष्ट्रीय स्कोरों की परखी गई सटीकता




 शोध में हेल्थ एबीसी , टीआरएस-एचएफडीएम , लेस इंडेक्स , मैजिक और एच2एफपीईएफ जैसे पांच स्थापित अंतरराष्ट्रीय रिस्क स्कोर का मूल्यांकन किया गया। इनका उपयोग दुनिया के विभिन्न देशों में हार्ट फेलियर के जोखिम का अनुमान लगाने के लिए किया जाता है। अलग-अलग मरीजों में अलग स्कोर रहे प्रभावी हेल्थ एबीसी स्कोर भविष्य में हार्ट फेलियर विकसित होने के जोखिम का बेहतर अनुमान देता है। मधुमेह से पीड़ित मरीजों में टीआरएस-एचएफडीएम स्कोर अधिक उपयोगी साबित हुआ। वहीं लेस इंडेक्स दोबारा भर्ती होने और मृत्यु के खतरे की पहचान करने में सबसे प्रभावी पाया गया। मैजिक और एच2एफपीईएफ स्कोर भी जोखिम का आकलन करने में उपयोगी रहे।




 कैसे तैयार होते हैं ये स्कोर ये रिस्क स्कोर




 मरीज की उम्र, रक्तचाप, मधुमेह, किडनी की कार्यक्षमता, हृदय की पंपिंग क्षमता, सांस फूलने या शरीर में सूजन जैसे लक्षण, रक्त जांच और अस्पताल में भर्ती होने के इतिहास जैसी जानकारियों के आधार पर तैयार किए जाते हैं। विभिन्न कारकों को अंक देकर कुल स्कोर निकाला जाता है, जिससे मरीज के जोखिम स्तर का निर्धारण किया जाता है।




 समय रहते हो सकेगी पहचान




 इन स्कोरों के नियमित उपयोग से ऐसे मरीजों की पहचान पहले ही की जा सकती है, जिनमें हार्ट फेलियर या उससे जुड़ी जटिलताओं का खतरा अधिक है। इससे चिकित्सक मरीजों की निगरानी बढ़ाकर समय पर उपचार शुरू कर सकेंगे और गंभीर परिणामों को रोकने में मदद मिलेगी।




 इन्होंने किया शोध 




पीजीआइ कार्डियोलॉजी विभाग के डॉ. अनुपम कुमार, डॉ. आदित्य कपूर, डॉ. एस. हरिकृष्णन, डॉ. अर्पिता काथेरिया, डॉ. हर्षित खरे, डॉ. अरशद नजीर, डॉ. अंकित कुमार साहू, डॉ. रूपाली खन्ना, डॉ. सुदीप कुमार, डॉ. नवीन गर्ग और डॉ. सत्येंद्र तिवारी ने किया। अध्ययन में एससीटीआईएमएस, तिरुवनंतपुरम के विशेषज्ञ भी शामिल रहे।

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