शनिवार, 27 जून 2026

बेरोजगारी के कारण बढ़ रही कुंवारों की संख्या, बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा बनी सबसे बड़ी वजह





  बेरोजगारी के कारण बढ़ रही कुंवारों की संख्या, बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा बनी सबसे बड़ी वजह

स्थायी नौकरी वाले युवकों को वरीयता दे रहा वधू पक्ष, रोजगार की अनिश्चितता से बढ़ रही विवाह की औसत आयु

भारत में युवाओं के विवाह में देरी और अविवाहित रहने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। लंबे समय तक इसे घटते लिंगानुपात और कन्या भ्रूण हत्या का परिणाम माना जाता रहा, लेकिन अब एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने इस धारणा को चुनौती दी है। अध्ययन के अनुसार आज विवाह में सबसे बड़ी बाधा बेरोजगारी, अस्थायी रोजगार और आर्थिक असुरक्षा बन गई है। वधू पक्ष अब ऐसे वर को प्राथमिकता दे रहा है जिसके पास स्थायी नौकरी और आर्थिक सुरक्षा हो। इसके कारण बड़ी संख्या में युवा विवाह के दायरे से बाहर रह जा रहे हैं।

अध्ययन में कहा गया है कि भारत में विवाह की सामाजिक व्यवस्था तेजी से बदल रही है। पहले जहां परिवार और सामाजिक प्रतिष्ठा को अधिक महत्व दिया जाता था, वहीं अब नौकरी, नियमित आय और आर्थिक स्थिरता विवाह तय करने का सबसे महत्वपूर्ण आधार बन गई है। इसका सबसे अधिक असर उन युवाओं पर पड़ रहा है जो शिक्षित होने के बावजूद स्थायी रोजगार हासिल नहीं कर सके हैं।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5, 2019-21) के अनुसार 25 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 53 प्रतिशत पुरुष और करीब 23 प्रतिशत महिलाएं अब भी अविवाहित हैं। यह दर्शाता है कि विशेष रूप से युवकों में विवाह की आयु लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि रोजगार की अनिश्चितता और आर्थिक दबाव इस बदलाव के प्रमुख कारण हैं।

अध्ययन में भारतीय युवाओं को तीन वर्गों में बांटा गया है। पहला वर्ग कम शिक्षित और बेरोजगार युवाओं का है, जिन्हें विवाह के लिए सबसे अधिक इंतजार करना पड़ रहा है। दूसरा वर्ग शिक्षित लेकिन बेरोजगार युवाओं का है, जिनकी स्थिति भी लगभग ऐसी ही है। तीसरे वर्ग में वे युवा शामिल हैं जो शिक्षित होने के साथ स्थायी रोजगार में हैं। विवाह के लिए सबसे अधिक मांग इसी वर्ग के युवाओं की देखी गई है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बड़ी संख्या में युवा पहले नौकरी पाने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की कोशिश में उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और कौशल प्रशिक्षण में वर्षों बिताते हैं। इसके बाद ही वे विवाह के बारे में सोचते हैं। परिणामस्वरूप देश में विवाह की औसत आयु लगातार बढ़ रही है।

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि लंबे समय तक बेरोजगारी और विवाह में देरी का असर केवल सामाजिक जीवन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रभाव डालता है। बेरोजगार और लंबे समय तक अविवाहित रहने वाले युवाओं में तनाव, अवसाद, अकेलापन, आत्मविश्वास में कमी और भविष्य को लेकर निराशा जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। यदि रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं बढ़ाए गए तो आने वाले वर्षों में यह सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य की गंभीर चुनौती बन सकती है।

भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है, जहां लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। हर वर्ष लाखों युवा रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं, लेकिन गुणवत्तापूर्ण और स्थायी नौकरियों की उपलब्धता उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही। यही कारण है कि शिक्षित युवाओं में भी रोजगार को लेकर असुरक्षा बनी हुई है और विवाह जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक निर्णय लगातार टल रहे हैं।

समाजशास्त्रियों का मानना है कि विवाह का बदलता स्वरूप भारतीय समाज में आर्थिक परिस्थितियों के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है। उनका कहना है कि यदि रोजगार सृजन, कौशल विकास और युवाओं की आय सुरक्षा पर प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में विवाह की औसत आयु और बढ़ सकती है तथा अविवाहित युवाओं की संख्या में भी लगातार वृद्धि देखने को मिल सकती है। इससे पारिवारिक संरचना, सामाजिक संतुलन और जनसांख्यिकीय परिदृश्य पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ने की आशंका है।

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