गुरुवार, 6 फ़रवरी 2025

नेहरू ,अटल जी सोनिया गांधी ने भी कुंभ में किया था स्नान

 

संगम में डूबे मोदी-योगी के धार्मिक ध्रुवीकरण के नारे

महात्मा गांधी और कुंभ मेला

महात्मा गांधी का कुंभ मेले से जुड़ाव ऐतिहासिक रहा है। 1915 के हरिद्वार कुंभ के दौरान उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले से मुलाकात की थी। यह भेंट ऐतिहासिक थी, क्योंकि इसी दौरान गोखले ने गांधीजी को भारतीय समाज और राजनीति को नजदीक से समझने की सलाह दी थी। गोखले ने गांधीजी को कुंभ मेले की आध्यात्मिक और सामाजिक महत्ता बताते हुए उनसे इसमें स्नान करने का आग्रह किया। 1918 में जब प्रयागराज में कुंभ मेला आयोजित हुआ, तब देश में अंग्रेजों का शासन था और स्वतंत्रता संग्राम जोरों पर था। ब्रिटिश सरकार ने इस आयोजन पर कड़ी नजर रखी थी और कई नेताओं की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा रखा था। इसके बावजूद, महात्मा गांधी ने गुप्त रूप से प्रयागराज पहुंचकर संगम में स्नान किया। वे यहां एक साधु के आश्रम में ठहरे और बिना किसी प्रचार के कुंभ स्नान किया।

इस ऐतिहासिक स्नान का जिक्र गांधीजी ने बाद में 10 फरवरी 1918 को फैजाबाद में हुए कांग्रेस अधिवेशन में किया। उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने ब्रिटिश सरकार की सख्ती के बावजूद कुंभ मेले में भाग लिया। इस घटना का उल्लेख राजकीय अभिलेखागार में मौजूद ब्रिटिश अफसरों की खुफिया रिपोर्ट में भी दर्ज है।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद: राष्ट्रपति के रूप में कुंभ में कल्पवासः 1954 के प्रयागराज कुंभ में भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कुंभ मेले में कल्पवास किया। यह पहली बार था जब किसी राष्ट्राध्यक्ष ने आधिकारिक रूप से इस धार्मिक आयोजन में भाग लिया। संगम तट पर स्थित अकबर किले में उनके रहने की विशेष व्यवस्था की गई थी। राष्ट्रपति होने के बावजूद उन्होंने सादगी और आध्यात्मिक अनुशासन का पालन किया। उनकी उपस्थिति ने कुंभ मेले की धार्मिक और राष्ट्रीय महत्ता को और बढ़ाया। अब वह स्थान जहाँ डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कल्पवास किया था, "प्रेसिडेंट व्यू" के नाम से प्रसिद्ध है और कुंभ मेले में विशेष आकर्षण का केंद्र बन गया है।

पंडित नेहरू भी गये थे कुंभ

पंडित जवाहरलाल नेहरू का तो जन्म ही 14 नवंबर 1889 को गंगा किनारे बसे इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुआ था। नेहरू ने अपनी आत्मकथा "टुवर्ड फ्रीडम" में गंगा के प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए लिखा है: "गंगा, विशेष रूप से, भारत की नदी है, जिसके साथ हमारी सभ्यता के पूरे इतिहास में गहरा संबंध रहा है।" लेकिन वे आज के नेताओं की तरह ढकोसले बाज नहीं थे। जब 10 जनवरी 1938 को नेहरू की मां, स्वरूप रानी नेहरू, का निधन हुआ, तो नेहरू ने इलाहाबाद में संगम तट पर उनकी अस्थियों का विसर्जन किया था। इस अवसर पर ली गई एक तस्वीर में नेहरू जी गंगा में स्नान करते हुए दिखाई देते हैं। इस तस्वीर को कभी-कभी उनके कुंभ मेले में स्नान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जो सही नहीं है। 1954 के प्रयागराज कुंभ मेले में पंडित जवाहरलाल नेहरू गये जरूर थे, पर वे व्यवस्थाओं की समीक्षा करने के लिए पहुंचे थे। और राज्यसभा में दिए अपने बयान में उन्होंने साफ कहा था कि वे संगम में स्नान करने नहीं गए।

कामा मैकलीन की पुस्तक “Pilgrimage and Power: The Kumbh Mela in Allahabad from 1776-1954” में नेहरू की 1954 के कुंभ मेले की तस्वीर छपी है, जिसमें वह भीड़ के बीच नजर आ रहे हैं। मैकलीन लिखती हैं कि जब नेहरू से संगम में स्नान के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने हंसते हुए जवाब दिया—"मैंने शारीरिक रूप से नहीं, लेकिन अन्य रूप में स्नान किया।"

 - Satya Hindi

लाल बहादुर शास्त्री के सचिव सी.पी. श्रीवास्तव ने अपनी जीवनी में लिखा है कि नेहरू ने शास्त्रीजी के कुंभ स्नान के अनुरोध को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया था कि "मुझे गंगा नदी से प्रेम है, लेकिन कुंभ में स्नान नहीं करूंगा।"

अन्य प्रधानमंत्रियों और राजनेताओं का कुंभ से संबंध

इंदिरा गांधी: इंदिरा गांधी का इलाहाबाद, गंगा नदी और कुंभ मेले से गहरा संबंध था। वह इलाहाबाद में पली-बढ़ीं, जहां उनके परिवार का निवास आनंद भवन स्थित है। गंगा नदी के तट पर बसे इस शहर में उनका बचपन बीता, जिससे गंगा के प्रति उनका विशेष लगाव विकसित हुआ। 1966 में, जब प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का ताशकंद में निधन हुआ, तो इंदिरा गांधी उनकी अस्थियां लेकर इलाहाबाद पहुंचीं और उन्हें गंगा नदी में विसर्जित किया, जो उनकी गंगा के प्रति श्रद्धा को दर्शाता है। लेकिन उनके संगम में स्नान का कोई प्रमाण नहीं है।

भारतीय राजनीति के प्रखर समाजवादी नेता, अपनी स्पष्टवादिता और सिद्धांतों के प्रति अडिग पहचान वाले प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का जन्म भी गंगा नदी के समीप उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के इब्राहिमपट्टी गांव में 17 अप्रैल 1927 को हुआ था। "बागी बलिया" के नाम से मशहूर बलिया की सबसे बड़ी झील सुरहाताल, कटहल नाले के माध्यम से गंगा से जुड़ी हुई है, और जिसने बलिया को एक समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान दी है। चंद्रशेखर गंगा को भारतीय संस्कृति की आत्मा और भारत की सांस्कृतिक-आध्यात्मिक चेतना की वाहक मानते थे।  1989 के कुंभ मेले में संतों-महंतों से संवाद के दौरान उन्होंने कहा था कि गंगा हमारी सभ्यता की पहचान है और इसकी पवित्रता को बनाए रखना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।  10 नवंबर 1990 से 21 जून 1991 तक भारत के नौवें प्रधानमंत्री रहे चंद्रशेखर ने अपने छोटे लेकिन प्रभावशाली कार्यकाल में भी राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक विरासत के महत्व पर बल दिया। लेकिन धर्म के नाम पर आडंबर और धार्मिक भावनाओं को राजनीतिक लाभ के लिए उन्होंने कभी इस्तेमाल नहीं किया।  

नेहरू और चंद्रशेखर की तरह अटल बिहारी वाजपेयी का भी कुंभ मेले के प्रति विशेष सम्मान था। उन्होंने भारतीय संस्कृति और परंपराओं को सदैव महत्व दिया। पर वे अंधविश्वासी नहीं, दार्शनिक थे। 2001 के प्रयागराज में आयोजित कुंभ महापर्व में तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने भाग लिया था। अटल जी भारतीय संस्कृति और परंपराओं के प्रति गहरा सम्मान रखते थे, और कुंभ मेले जैसे आयोजनों के महत्व को भली-भांति समझते थे। प्रधानमंत्री के तौर पर उन्होंने कुंभ मेले की व्यवस्थाओं की समीक्षा की और संतों-महंतों से मुलाकात की। लेकिन उनके संगम में स्नान करने का कोई प्रमाण नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी की अस्थियों का संगम में विसर्जन जरूर किया गया था।

•      2001 में कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने भी कुंभ मेले में भाग लिया और गंगा में डुबकी लगाई थी।•      2019 के अर्धकुंभ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गंगा में डुबकी लगाई थी। 

मुगल सम्राट और कुंभ मेला

मुगल सम्राट अकबर ने 1583 के प्रयागराज कुंभ में भाग लिया था और इसी कुंभ के दौरान उन्होंने प्रयागराज में एक विशाल किला बनवाया था, जिसे आज भी "अकबर किला" कहा जाता है।जहांगीर ने अपने संस्मरण "तुजुक-ए-जहांगीरी" में 1612 के कुंभ मेले का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा कि किस प्रकार इस आयोजन में लाखों श्रद्धालु एकत्रित होते थे।1665 के कुंभ में औरंगजेब ने हिंदू संतों की बढ़ती शक्ति को देखकर इस मेले पर विशेष निगरानी रखने का आदेश दिया था।

ब्रिटिश गवर्नर जनरल और कुंभ

  • 1838 के कुंभ मेले के दौरान लॉर्ड विलियम बेंटिक ने भीड़ और अव्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए प्रशासनिक हस्तक्षेप किया था। यह पहला अवसर था जब अंग्रेजों ने मेले के संचालन में हस्तक्षेप किया।
  • 1858 के कुंभ मेले के दौरान लॉर्ड डलहौजी ने पहली बार मेले की जनगणना करवाई और इसे "दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक मेला" बताया।
  • 1820 के दशक में ब्रिटिश अधिकारी जेम्स प्रिंसेप ने कुंभ मेले पर व्यापक अध्ययन किया और इसे पश्चिमी जगत में लोकप्रिय बनाया।

रोचक प्रसंग और किस्से

•      1867 कुंभ में साधु-संतों और अंग्रेजों की झड़प: प्रयागराज कुंभ में नागा साधुओं और ब्रिटिश अधिकारियों के बीच विवाद हुआ था, जिसमें कई साधु घायल हुए।•      1954 कुंभ त्रासदी: कुंभ मेले में भगदड़ मचने से 800 से अधिक लोग मारे गए थे।•      2025 महाकुंभ त्रासदी: इस साल महाकुंभ में भगदड़ मचने की छह घटनाओं का चर्चा हो रही है। दो बार आगजनी की घटनाएं भी हो चुकी हैं। सरकारी आंकड़ों में महज 30 लोगों के मरने की बातें कही गयी हैं। लेकिन सोशल मीडिया में सैकड़ों लोगों के मारे जाने और करीब 1500 लोगों के लापता होने की पुष्ट अपुष्ट खबरें चल रही हैं।

संसद में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने हजारों मृतक श्रद्धालुओं को श्रद्धांजलि देने की बात कही तो बवाल मच गया। दोनों नेताओं ने हादसे की जांच के लिए जेपीसी गठित करने और सर्वदलीय बैठक बुलाने की भी मांग की। पर सरकार खामोश है।

अनेक साधु संतों और शंकराचार्यों ने कुंभ को धार्मिक-राजनीतिक पर्यटन से जोड़ने और एक तथाकथित सनातनी भावनाओं को उभारने वाले इवेंट की तरह इस्तेमाल करने पर कड़ी आपत्ति जतायी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर अपनी मनमर्जी से अर्ध कुंभ को कुंभ और पूर्ण कुंभ को महा कुम्भ बनाने पर भी विरोध जताया गया है। भगदड़ में हुई मौतों का आंकड़ा न देने पर सवाल उठाते हुए शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इस्तीफे की मांग की और कहा कि इस सरकार ने तो मृतकों का श्राद्ध या उनकी आत्मा की शांति के लिए मौन तक रखने का मौका नहीं दिया। उन्होंने कहा कि जो सरकार 2700 अत्याधुनिक कैमरों से मेले में आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं के आंकड़े जारी कर रही थी, वह मौतों और लापता लोगों की सूची नहीं दे पा रही। जिन हेलीकॉप्टरों को घायलों के अस्पताल ले जाने के लिए लगाना चाहिए था, उनसे हादसे के बावजूद फूल बरसाकर घाव पर नमक छिड़का जाता रहा।

सबसे दुखद तो यह था कि जहां योगी सरकार लाखों श्रद्धालुओं को राहत की मूलभूत सुविधाएं देने की बजाय डंडों से भगाती रही, मुसलमानों के मेला क्षेत्र में प्रवेश पर रोक लगाती रही, वहीं उनके कटोगे तो बंटोगे के नारे के बावजूद इलाहाबाद की मुस्लिम बस्तियों के हजारों लोगों ने लाखों श्रद्धालुओं को रहने खाने, दिनचर्या और राहत की सुविधाएं देकर गंगा-जमुनी एकता की मिसाल कायम की। प्रयागराज में महाकुंभ के दौरान मौनी अमावस्या (29 जनवरी 2025) के दौरान हुई भगदड़ के बाद, प्रयागराज की गंगा-जमुनी तहजीब ने एक बार फिर मानवता और भाईचारे की मिसाल पेश की। स्थानीय मुस्लिम समुदाय ने श्रद्धालुओं की मदद के लिए अपने घरों, स्कूलों और संस्थानों के दरवाजे खोल दिए, जिससे कई लोगों की जान बचाई जा सकी।

चाहे नखास कोहना, चौक, रौशनबाग, सेवई मंडी का इलाका हो या रानीमंडी से लेकर हिम्मतगंज का इलाका, इस सारे इलाके के मुस्लिम समुदाय के लोगों ने अपने घरों के दरवाजे श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए। उन्होंने आराम के लिए दरी, चादर, प्लास्टिक बिछाई और चाय, बिस्किट, पूड़ी, सब्जी आदि का प्रबंध किया। दो दिनों तक हजारों श्रद्धालु यहां ठहरे रहे।

28 जनवरी की रात को, जिस दिन भगदड़ हुई, तो कोतवाली क्षेत्र में यादगार हुसैनी इंटर कॉलेज के प्रबंधक गौहर काज़मी ने कॉलेज खोलने का आदेश दिया। क्षेत्रवासियों के सहयोग से श्रद्धालुओं के ठहरने, खाने-पीने की सभी सुविधाएं प्रदान की गईं। कॉलेज परिसर का मैदान और कक्षाएं श्रद्धालुओं से भर गईं, जहां उनके आराम के लिए दरी, चादर, प्लास्टिक बिछाई गई थी और चाय, बिस्किट, पूड़ी, सब्जी का बंदोबस्त किया गया था।

इसी तरह चौक क्षेत्र के निवासियों ने मिलकर थके हुए श्रद्धालुओं को भोजन कराया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रावासों, जैसे शताब्दी छात्रावास, केपीयूसी, पीसी बनर्जी, सर सुंदरलाल छात्रावास, महादेवी वर्मा छात्रावास और कल्पना चावला छात्रावास की छात्राओं ने भी श्रद्धालुओं की सहायता में योगदान दिया।

इन प्रयासों ने प्रयागराज की गंगा-जमुनी संस्कृति और मानवता की गहरी जड़ों को उजागर किया, जहां सभी समुदायों ने मिलकर संकट के समय में एक-दूसरे की मदद की। और इसके साथ ही मोदी-योगी और भाजपा के धार्मिक ध्रुवीकरण के नारे संगम में डूब गये।

बुधवार, 5 फ़रवरी 2025

संजय गांधी पीजीआइ के निदेशक को तीन वर्ष का मिल सकेगा सेवा विस्तार

 

संजय गांधी पीजीआइ के निदेशक को तीन वर्ष का मिल सकेगा सेवा विस्तार

 : संजय गांधी

पीजीआइ के निदेशक का कार्यकाल, आयु सीमा तय करने और उसके साथ ही उन्हें तीन वर्ष का सेवा विस्तार दिए जाने के लिए संस्थान के अधिनियम, 1983 (संशोधन) अध्यादेश 2025 को मंजूरी दे दी गई है। अब निदेशक का कार्यकाल पांच वर्ष या फिर 65 वर्ष की आयु सीमा जो भी पहले हो उस तक होगा। यही नहीं अगर निदेशक की आयु 65 वर्ष से कम है तो उसे तीन वर्ष का सेवा विस्तार भी दिया जा सकेगा।

पांच वर्ष के कार्यकाल और तीन वर्ष के अतिरिक्त सेवा विस्तार के साथ वह 68 वर्ष की उम्र तक निदेशक पद पर कार्यरत रह सकेगा। चिकित्सा शिक्षा विभाग के इस प्रस्ताव पर कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है।  पीजीआइ में केवल उप्र ही नहीं आसपास के राज्यों और पड़ोसी देशों से भी लोग इलाज कराने आते हैं। ऐसे में संस्थान के संचालन में निदेशक की भूमिका काफी अहम होती है। गौरतलब है कि प्रो. आरके धीमन ने संस्थान के निदेशक पद का कार्यभार आठ फरवरी 2020 को संभाला था। ऐसे में प्रो. धीमन का पांच वर्ष का कार्यकाल सात फरवरी को पूरा हो रहा है। हालांकि, जून में वह 65 वर्ष के होंगे। बेहतर कार्यों को देखते हुए उनको सेवा विस्तार मिलना तय माना जा रहा है।

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2025

धर्म और जनहित के मुद्दे करेंगे तेज

 

पहले की अपेक्षा महिलाओं में संन्यास की भावना बढ़ी है। इसमें वंचित समाज की महिलाएं भी शामिल हैं। महाकुंभ में विदेशी महिलाओं ने भी संन्यास लिया है। यह सनातन धर्म का बढ़ता वैभव है। इस परिणाम से हम उत्साहित हैं। धर्म और जनहित में मुहिम तेज करेंगे।


- डा. देव्या गिरि, अध्यक्ष दशनामी संन्यासिनी अखाड़ा, मनकामेश्वर मंदिर लखनऊ



महाकुंभ नगर धर्म ज्ञान है, वैराग्य है। धर्म काम और मोक्ष है। धर्म व्यक्ति का आधार है। धर्म संस्कारों का संसार है। धर्म सत्य सनातन है। उसी सनातन के धर्म ध्वजावाहक बने हैं नए नागा। अखाड़े उनका नया ठिकाना हैं। इस बार महाकुंभमें अलग-अलग अखाड़ों में 8.715 नए नागा संन्यासी और संन्यासिनी बने। इनमें 1850 दलित, आदिवासी हैं। महिलाओं की संख्या लगभग 250 है। महाकुंभ में पहली बार वंचित समाज से इतने अधिक लोगों ने संन्यास लिया है। अधिकतर छत्तीसगढ़, बंगाल, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, मध्य प्रदेश के पिछड़े क्षेत्रों के हैं।


मतांतरण रोकने के लिए अखाड़े देश के सीमावर्ती क्षेत्रों, आदिवासियों व उपेक्षितों के बीच अभियान चला रहे हैं। शिक्षा, चिकित्सा व भंडारा चलाने के साथ धार्मिक गतिविधियां चलाई जा रही हैं। इसलिए बड़ी संख्या में लोग संन्यास लेकर सनातन धर्म से जुड़े हैं। अखाड़ों ने महाकुंभ में 16 जनवरी से पहली फरवरी के बीच नागा संन्यासी बनाए।




4700 संन्यासी, 2170 संन्यासिनी, महानिर्वाणी में 250 संन्यासी, निरंजनी में 1100 संन्यासी व 150 संन्यासिनी, अटल में 85 संन्यासी, आवाहन में 150 संन्यासी, बड़ा उदासीन में 110 तंगतोड़ा (नागा) बनाए गए। 



पीजीआई में पहली बार दूरबीन विधि से पित नली ब्रांच की रेयर सर्जरी

 

पीजीआई में पहली बार दूरबीन विधि से  पित नली ब्रांच की रेयर सर्जरी


 


गाल ब्लैडर स्टोन की सर्जरी के दौरान कट गई थी बाइल डक्ट 


 


हाई ग्रेड की थी इंजरी जिससे पेट में जमा हो रहा था पित्त


 कुमार संजय


 संजय गांधी पीजीआई का गैस्ट्रो सर्जरी विभाग उत्तर भारत का पहला विभाग हो गया है जहां पर लेप्रोस्कोपिक विधि से  आइसोलेट राइट हैपेटिक डक्ट इंजरी रिपेयर सर्जरी ( तीन से चार मिलीमीटर )  सफलता पूर्व की गयी। । संस्थान में दूरबीन विधि से बाइल डक्ट की दाहिनी ब्रांच की सर्जरी पहली बार  हुई है। सर्जरी बिहार की रहने वाली 24 वर्षीय खुशबु कुमारी में की गई है। गाल ब्लैडर स्टोन की सर्जरी के दौरान बाइल डक्ट में इंजरी हो गयी थी जिसके कारण पित्त पेट में जमा हो रहा था। बुखार , उल्टी , पेट दर्द सहित अन्य की परेशानी से साथ  संजय गांधी पीजीआई के गैस्ट्रो सर्जन प्रो. अशोक कुमार सेकेंड से संपर्क किया।  प्रो. अशोक परीक्षण और एमआरसीपी स्कैन के बाद पता लगा कि  हाई ग्रेड बाइल डक्ट इंजरी( स्ट्रिक्चर) की परेशानी से ग्रस्त है। इंजरी गाल ब्लैडर स्टोन की सर्जरी के दौरान हुई थी।


मरीज 2022 से गॉल ब्लैडर में स्टोन होने कि वजह पेट दर्द से ग्रस्त थीं। इस समस्या से निजात पाने के लिए अगस्त 2024 में प्राइवेट अस्पताल में ऑपरेशन कराया। हमने सबसे पहले  मरीज के पेट में नली डाल कर संक्रमण को जमा हो रहे पित्त को ड्रेन किया।  2 महीने बाद में एमआरआई  अन्य जांच करके सर्जरी के लिये तैयारी कि गई। बाइल डक्ट की इंजरी की गंभीरता पांच ग्रेड में देखा जाता है। महक को अधिकतम ग्रेड की इंजरी थी।  दाहिने तरफ की पित नली की एक  ब्रांच कट के अलग हो गई थी।  दूरबीन विधि से 3-4 मिलीमीटर आकार की नली की सर्जरी किए जाने की कोई रिपोर्ट अभी तक उपलब्ध नहीं है। वयस्क महिला मरीज होने के कारण, दूरबीन विधि से ऑपरेशन करने की संभावनाएं तलाशी गयी। पूर्ण  तैयारी के बाद इसे सफलतापूर्वक सर्जरी की गई।  3-4 मिलीमीटर कि पित्त नली को ब्रांच से जोडा गया।

इस तरह की जटिल सर्जरी को निपुण और अनुभवी सर्जन द्वारा ही मिनिमल इनवेसिव सर्जरी  किया जाना ही सम्भव है। लेप्रोस्कोपी

 विधि द्वारा सर्जरी किए जाने में कोई बड़ा चीरा नहीं देना पड़ता है और मरीज़ों कि रिकवरी भी तेजी से होती है तथा दर्द भी कम होता है।


 


 

सभी गाल ब्लैडर  के मरीज में नहीं होती है सर्जरी की जरूरत

 

 प्रो, अशोक का कहना है कि जिनमें परेशानी (एसिंप्टोमेटिक) नहीं है, उन मरीज़ों को गॉल ब्लैडर सर्जरी की हमेशा जरूरत नहीं होती है। सर्जरी का निर्णय मरीज की उम्र तथा गंभीर दूसरी बीमारी को ध्यान में रखकर करना चाहिए। सर्जरी करने से पहले उसके फायदे और नुकसान को ध्यान में रखना जरूरी है।

जिन मरीज़ों में स्टोन साइज  2 cm से अधिक, गॉल ब्लैडर वाल में कैल्शियम (प्रोसिलिन गॉल ब्लैडर) हो गया।  गॉल ब्लैडर में पोलिप गांठ एक सेंटीमीटर से अधिक , पित्ताशय की दीवार चार मिमी से अधिक होना, परिवार में गॉल ब्लैडर कैंसर की हिस्ट्री हो तो बिना लक्षण के भी एक्सपर्ट की सलाह के बाद ही ऑपरेशन का निर्णय लेना चाहिए।  अधिक उम्र  और अन्य बीमारियों से ग्रसित मरीजों में गॉल ब्लैडर ऑपरेशन का निर्णय बहुत ही सावधानी पूर्ण लेना चाहिए।


 


 


 


क्या है बाइल डक्ट इंजरी 


 


गाल ब्लैडर स्टोन की सर्जरी के दौरान पित्त नलिका कट जाती है जिसे बाइल डक्ट इंजरी कहते हैं। इसके कारण बुखार, पेट दर्द, मतली, खुजली, और आहार को सहन करने में असमर्थता की परेशानी होती है। तीव्र दर्द या सेप्सिस के साथ मरीज आते है।


  


इन्होने की सर्जरी


 


मुख्य सर्जन प्रो. अशोक कुमार सेकेंड, डा. अंकित, डा. जुविन. डा. सिद्धोबा,

ऩिश्चेतना विभाग डा. चेतना , डा. श्रेया, नर्सिंग ऑफिसर सीमा, दीपमाला, संतोष ।



प्रोफेसर अशोक कुमार सेकंड सर्जरीक बाद मरीज के साथ

हर ट्यूमर यानी गांठ कैंसर नहीं होता

 दूर करें कैंसर का डर




अगर कैंसर का सही वक्त पर पता चल जाए तो मुमकिन है कि यह पूरी तरह ठीक हो जाए। इसलिए लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए। इससे बचाव के लिए भी कुछ कदम उठा सकते हैं। संजय गांधी पीजीआई के गैस्ट्रो सर्जरी विभाग के प्रोफेसर अशोक कुमार सेकंड ने कई पहलुओं पर जानकारी दी


वक्त पर जांच हो तो इलाज नहीं मुश्किल

करीब 6 महीने पहले एक परिवार में शादी का आयोजन हो रहा था। परिवार के एक बुजुर्ग सदस्य को 5-7 दिनों से यूरिन करने के दौरान खून आ रहा था। उन्होंने परिवार में बताया तो बेटा और बहू उन्हें डॉक्टर के पास ले गए। डॉक्टर ने बेटा-बहू से कहा कि उनकी कुछ जरूरी जांच करा लें। साथ ही कैंसर से जुड़ी शंका भी जता दी। इस पर उन लोगों ने डॉक्टर से कहा कि अभी कुछ दिनों के लिए कोई दवा दे दें, हमारे यहां 15 दिनों बाद शादी होनी है। उसके बाद आकर जांच करा लेंगे। डॉक्टर ने जल्दी जांच कराने की सलाह दी लेकिन वे नहीं माने। आखिरकार कुछ दवा देकर उन्हें 15 दिनों बाद जांच जरूर कराने की हिदायत दी। वैसे इस तरह के मामलों में देरी बिलकुल नहीं करनी चाहिए। लेकिन करीब 6 महीने के बाद वे लोग डॉक्टर से मिलने पहुंचे तो बुजुर्ग की स्थिति ज्यादा खराब हो चुकी थी। वह काफी कमजोर लग रहे थे। डॉक्टर ने थोड़ा सख्ती से कहा कि इन्हें जल्दी लेकर आना चाहिए था। फिर से वही सब जांच कराने के लिए कहा है। रिपोर्ट का फिलहाल इंतजार है।


कैंसर को समझें

हमारे शरीर में कोशिकाओं (सेल्स) का लगातार विभाजन होता रहता है और यह सामान्य-सी प्रक्रिया है, जिस पर शरीर का पूरा कंट्रोल रहता है। लेकिन जब शरीर के किसी खास अंग की कोशिकाओं पर शरीर का कंट्रोल नहीं रहता और वे असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं तो उसे कैंसर कहते हैं। जैसे-जैसे कैंसर ग्रस्त कोशिकाएं बढ़ती हैं, वे ट्यूमर (गांठ) के रूप में उभर आती हैं। हालांकि हर ट्यूमर में कैंसर वाली सेल्स नहीं होतीं लेकिन जो ट्यूमर कैंसर ग्रस्त है, अगर उसका इलाज नहीं किया जाता है तो यह पूरे शरीर में फैल सकता है। इसे चौथी स्टेज कहते हैं। पहली और दूसरी स्टेज में इलाज आसान होता है।

  आज भी लोग जितना कैंसर के नाम से डरते हैं, शायद ही किसी दूसरी बीमारी से डरते हों। हालांकि इसका इलाज हो जाता है। लेकिन डर की वजह यह कि एक तो इसका पता जल्दी नहीं चलता और दूसरा देर हो जाए तो ज्यादा मुसीबत हो जाती है। इसलिए यह जरूरी है कि पैरामेडिकल स्टाफ (नर्स आदि) और फिजिशन से लेकर आम आदमी को भी कैंसर के शुरुआती लक्षणों के बारे में पता हो। कैंसर शरीर के किसी भी अंग में हो सकता है और हर अंग के लिए इसके लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं। फिर भी शुरुआती कुछ लक्षण कॉमन हैं। वैसे यह भी मुमकिन है कि नीचे बताए जा रहे लक्षणों में से कोई एक लक्षण न आए या बहुत कम उभरे, पर शक करने की वजह बन सकता है। यह भी सच है कि कैंसर की जांच कराने पर 90% लोगों में कैंसर अमूमन नहीं निकलता, लेकिन जिन 10% लोगों में इसका पता चलता है, उनमें सही वक्त पर पता न चलने से स्थिति खराब होती है। इसलिए शुरुआती लक्षणों की समझ जरूर होनी चाहिए।


जब शरीर दे ऐसे संकेत तो ध्यान दें

कोई भी असामान्य लक्षण जो हर दिन की रुटीन लाइफ का हिस्सा न हों और वह लगातार 3 हफ्ते तक बरकरार रहे। सामान्य दवा या इलाज से ठीक न हो या फिर ठीक होने के बाद बार-बार हो जाए तो संदेह की स्थिति बनती है। यहां यह भी समझें कि नीचे जो भी लक्षण बताए जा रहे हैं, वे किसी दूसरी सामान्य बीमारी के भी हो सकते हैं। अगर किसी को ऐसे लक्षण महसूस हों या दिखें तो वह सचेत हो जाए, डॉक्टर से मिले, जांच कराए और मन से कैंसर का खौफ निकाल दें। 

बेवजह वजन कम हो जाएयह कैंसर का सबसे अहम लक्षण है। किसी शख्स का वजन कम होना ही कैंसर का लक्षण नहीं हो सकता, लेकिन जब वह वजन कम करने की कोशिश नहीं कर रहा हो, उसने डाइट कंट्रोल न की हो, वह बीमार न पड़ा हो, उसे कई दिनों तक बुखार न हुआ हो, दस्त न हुए हों, पाइल्स न हो, ग्लूटेन इंटॉलरेंस (गेहूं या इससे बने उत्पाद पचाने में परेशानी) न हो, डायबीटीज भी न हो लेकिन वजन एक महीने में 4 से 5 किलो कम हो जाए तो इसे गंभीरता से लें। पहले किसी जनरल फिजिशन या एमडी डॉक्टर से मिले। सारी बातें बताएं और जांच के लिए पूछें। उन्हें यह भी साफ-साफ बताएं कि आपका वजन बिना किसी कोशिश के कम हुआ है। वजन कम होने के बाद जांच कराने पर हो सकता है, कोई दूसरी परेशानी ही निकले क्योंकि ऐसे लोगों में भी महज 10 फीसदी लोगों को ही कैंसर डिटेक्ट होने की आशंका रहती है। सच तो यह है अगर कैंसर शुरुआत में पकड़ लिया जाए तो इसे पूरी तरह खत्म किया जा सकता है। मुमकिन है कि इसके लिए कीमोथेरपी या रेडियोथेरपी या किसी दूसरी थेरपी की जरूरत भी न पड़े, सिर्फ दवाओं और सही लाइफस्टाइल से ही वह शख्स कैंसर को हरा दे।


अचानक गंभीर कब्ज हो जाए 

 कब्ज की परेशानी बहुत आम है। लेकिन जब किसी शख्स को पहले से कब्ज की परेशानी न रहती हो और अचानक ही गंभीर कब्ज की परेशानी रहने लगे तो सचेत जरूर हो जाना चाहिए। इसी तरह पहले सामान्य खाने के बाद भी एसिडिटी, गैस, कुपच आदि की परेशानी न हो, लेकिन यह अचानक शुरू हो गया हो। ये एंटासिड (डाइजीन, एसिलॉक आदि) जैसी दवाएं लेने के बाद भी कम न हों। सीधे कहें तो जिन दवाओं से सामान्य लोग ठीक हो जाते हैं, उन्हीं दवाओं को बार-बार लेने से वह  शख्स ठीक न हो। ऐसा बार-बार हो। किसी के स्टूल में खून कई दिनों (2 हफ्ते से ज्यादा वक्त) से आ रहा हो या फिर बिना वजह स्टूल काला आने लगा हो (कई बार आयरन सप्लिमेंट खाने से या चुकंदर खाने से भी लाल या काला रंग होता है) तो आगे जांच की जरूरत हो सकती है। इसलिए यह सलाह दी जाती है कि महीने में कम से कम एक बार अपने स्टूल का कलर जरूर देखना चाहिए ताकि किसी भी असामान्य स्थिति का पता चल सके। इनके अलावा लगातार उलटी की परेशानी और उसमें खून आए, पेट के राइट साइड के ऊपरी हिस्से में लगातार दर्द रहता हो तो यह पाचन और लिवर से जुड़ी किसी गंभीर परेशानी का भी संकेत हो सकता है।


बुखार आए तो जाए नहीं

अगर किसी शख्स को ऐंटिबायॉटिक दवा लेने से ज्यादा फायदा न हो, बार-बार बुखार आता हो या फिर बुखार की वजह पता न चल पाती हो। अगर किसी को लगातार 3 हफ्ते से ज्यादा बुखार रहे तो यह खून में गंभीर इन्फेक्शन का संकेत हो सकता है। ब्लड कैंसर के मामलों में भी ऐसा होता है।


आवाज में बदलाव हो जाए

बिना सर्दी-जुकाम के या कोई चोट भी न लगी हो और किसी शख्स की आवाज बदल जाए। यह उस स्थिति में ज्यादा गंंभीर हो जाता है जब वह शख्स स्मोकिंग करता हो या गुटखा, खैनी आदि चबाता हो। मुमकिन है कि गले में दर्द न भी हो, फिर भी खाना निगलने में परेशानी होे तो सचेत हो जाएं। 


मुंह में छाले बार-बार हों

किसी शख्स को मुंह में बार-बार छाले हो रहे हैं। दवा लेने से कुछ कम हों लेकिन फिर हो जाते हों, स्मोकिंग, गुटखे की लत भी हो तो गंभीरता से लें।


मेनोपॉज के बाद ब्लीडिंग

अगर किसी महिला को मेनोपॉज के बाद ब्लीडिंग हो तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए। यह कई बार कैंसर का शुरुआती संकेत भी हो सकता है।


कहीं गांठ हो जाए तो... 

हर ट्यूमर यानी गांठ कैंसर नहीं होता। सच तो यह है कि ज्यादातर ट्यूमर कैंसर नहीं होते। पर किसी को ट्यूमर हो और डॉक्टर ने उसे निकलवाने की सलाह दी है तो उसकी बायोप्सी जरूर करानी चाहिए। इससे पता चल जाता है कि ट्यूमर में कैंसर सेल थी या नहीं। कई बार महिलाओं की ब्रेस्ट में गांठ हॉर्मोनल गड़बड़ी की वजह से होती है। उस गांठ में दर्द होता है। साइज़ कम या ज्यादा होता रहता है। अमूमन ऐसी गांठ बिनाइन ट्यूमर (खतरनाक नहीं) होती है। लेकिन जब गांठ में दर्द न हो और यह बढ़ती ही जाए तो यह मैलिग्नेंट कैंसर हो सकता है। इसलिए ब्रेस्ट की जांच खुद से भी करनी चाहिए। साथ ही 40 साल के बाद उसे मैमोग्रफी टेस्ट जरूर करवानी चाहिए। वैसे कुछ मामलों में पुरुषों के ब्रेस्ट में भी गांठ की परेशानी होती है, पर यह बहुत कम है।


कोई भी असामान्य बदलाव 

शरीर में कहीं असामान्य ब्लीडिंग हो, चाहे मुंह से, नाक से, स्टूल के रास्ते से या यूरिन से। माहवारी भी 5-7 दिन से ज्यादा चले और ऐसा कई महीनों से हो रहा हो। सहवास के समय भी बार-बार खून आए। अगर कोई भी बदलाव असामान्य लगे तो अपने फैमिली डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए। कैंसर का शुरुआत में पता चलना जंग करीब-करीब जीतने जैसा ही है।


इन्हें ज्यादा खतरा

-सिगरेट, तंबाकू आदि चीजों का नशा करने वाले लोगों को मुंह या फेफड़ों के कैंसर की आशंका 200 फीसदी तक ज्यादा होती है। शराब से लिवर कैंसर का खतरा बढ़ता है।

-पैक्ड फूड, फ्रोजन फूड, जंक फूड (बर्गर, नूडल्स आदि), प्रोसेस्ड फूड का लगातार सेवन करने वाले लोगों को, दूसरे लोगों की तुलना में कैंसर का रिस्क कुछ ज्यादा होता है। 

-किसी खतरनाक रेज़ (किरणें: गामा रेज, एक्सरे की जरूरत से बहुत ज्यादा मात्रा) या केमिकल आदि के संपर्क में आने वाले लोगों को भी कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। 

-बरसों तक जमीन, पानी, हवा आदि में फर्टिलाइजर्स, पेस्टिसाइड आदि के संपर्क में आने वाली चीजें खाने वाले लोगों को भी खतरा कुछ ज्यादा रहता है। 

-अमूमन 70 फीसदी से ज्यादा मोटे लोगों को डायबीटीज और हाई बीपी का भी खतरा रहता है। वहीं मोटे लोगों, शुगर वाले मरीजों को कैंसर का खतरा ज्यादा रहता है।

-किसी फैमिली में कम उम्र में किसी को कैंसर हुआ हो तो आनेवाली पीढ़ी को सचेत होना चाहिए। किसी भी लक्षण को नजरअंदाज न करें। कुछ टेस्ट 6 महीने या 1 साल पर कराने चाहिए।

-स्ट्रेस सीधे तौर पर कैंसर नहीं लाता, लेकिन दूसरी परेशानियां पैदा होती हैं। पाचन कमजोर होता है। हॉर्मोन, एंजाइम्स सही से काम नहीं कर पाते। नींद पूरी नहीं होती।


ऐसे बचे रह सकते हैं...

कैंसर या फिर किसी भी दूसरी बीमारी में भी करीब-करीब उन्हीं हानिकारक चीजों से दूरी बनाने की सलाह दी जाती है जो नई परेशानी पैदा करते हैं। ऐसी लत से ग्रस्त शख्स को एक सामान्य शख्स की तुलना में कैंसर या फिर दूसरी बीमारी का खतरा ज्यादा रहता है। उदाहरण के लिए बड़े शहरों में पलूशन का स्तर ज्यादा रहता है। पलूशन की वजह से उन शहरों में रहने वाले ज्यादातर लोग फेफड़े, इम्यूनिटी की कमजोरी जैसी परेशानियों से जूझते रहते हैं। ऐसे में अगर उस शहर के रहने लोग स्मोकिंग करते हैं, गुटखा खाते हैं, दूसरी तरह का नशा करते हैं तो स्वाभाविक है कि जो लोग नशा नहीं करते, उनकी तुलना में नशे की लत वाले लोग ज्यादा रिस्क पर होंगे।


लाइफस्टाइल, डाइट में बदलाव 

शरीर को चलाना जरूरी

यह जरूरी नहीं कि हर कोई 1 घंटा एक्सरसाइज करे, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि फिजिकल ऐक्टिविटी हरगिज न करें या न करने के बहाने खोजते रहें। अगर कोई शख्स हफ्ते में 4 से 5 दिन भी 30 से 40 मिनट एक्सरसाइज कर लेता है तो वह कई तरह की परेशानियों से बच सकता है। यह एक्सरसाइज मांसपेशियों की मजबूती के लिए होनी चाहिए। हर दिन बिना रुके 40 से 50 मिनट का वॉक भी बहुत कारगर है।


अच्छी नींद से कैंसर की हार  

अगर कोई शख्स हर रात 7 से 8 घंटे की गहरी और लगातार नींद ले पाता है तो इसका मतलब है कि उसका स्ट्रेस लेवल उसे परेशान नहीं कर रहा। वैसे भी गहरी और पूरी नींद के दौरान ही शरीर की मरम्मत होती है और इम्यूनिटी मजबूत होती है। नींद के दौरान ही शरीर खुद को मजबूत कर पाता है और बीमारियों को हरा पाता है। इसलिए अपनी नींद पूरी करने की जरूर कोशिश करें।


खानपान में ये-ये हों शामिल

हमारे भोजन में कम से कम आधा हिस्सा फाइबर (सलाद और फल) का होना चाहिए। यह हमें कई तरह की परेशानियों से बचाता है। इसमें कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी भी है। 


सलाद और स्प्राउट्स

सुबह खाली पेट चाय या कॉफी की जगह अगर सुबह पहली बाइट सलाद या स्प्राउट्स हो तो इससे अच्छा कुछ नहीं हो सकता। मौसमी सलाद ( चुकंदर, गाजर, टमाटर, मूली आदि) 1 प्लेट खाने से फाइबर और कई तरह के मिनरल्स की कमी पूरी हो जाती है। साथ ही एक कटोरी स्प्राउट्स खाने से भी काफी फायदा होता है।


फलों से हमें जरूरी विटामिन और मिनरल मिलते हैं। मौसमी फल ज्यादा से ज्यादा खाएं। ये सस्ते और ताजे होते हैं।

1. पपीता: इस फल में विटामिन-C, A, B समेत लगभग सभी विटामिन मिलते हैं।

2. अमरूद: विटामिन-C का सोर्स

3. सेब या नाशपाती: विटामिन A से भरपूर

4. संतरा या मौसमी: विटामिन C से भरपूर है। 

5. अंगूर: एलर्जी दूर करता है। विटामिन भी खूब मिलते हैं।


साग-सब्जियां

खानपान में साग-सब्जियों की भूमिका फलों से भी ज्यादा अहम होती है, लेकिन हम इन्हें सबसे पीछे रखते हैं। इसी वजह से हमारे शरीर में विटामिन और मिनरल की कमी हो जाती है। जब शरीर में सभी विटामिन्स और मिनरल्स पर्याप्त मात्रा में मौजूद होंगे तो स्वाभाविक है कि कैंसर या फिर कई दूसरी तरह की बीमारियों जैसे खतरे से हम दूर रहेंगे।


 1. घीया/लौकी: विटामिन-A, B समेत कई तरह के विटामिन और फाइबर मिलते हैं। इसे सभी लोग खा सकते हैं। 1 किलो घीया को 1 से 2 चम्मच तेल में पकाएं तो ज्यादा बेहतर होगा।

2. पत्तागोभी, फूलगोभी, पालक, मेथी, बथुआ आदि: विटामिन-A, B, C, E

3. मौसमी सब्जियां: मौसमी सब्जियां सस्ती और ताजा होती हैं। छिलका समेत उबालें तो बेहतर है, लेकिन तेल में फ्राई किया हुआ नहीं चलेगा।

 

 रंगारंग खाना

हरा रंग: पत्ते वाली और बाकी हरी सब्जियां लौकी, तौरी, कद्दू, ब्रोकली, साग, पालक, पत्ता गोभी, अमरूद आदि। ये सूजन घटाने में मदद करती हैं। हरी सब्जियां जरूर खानी चाहिए।

पीला और संतरी रंग: केला, संतरा, नींबू, पपीता, बेल, गाजर आदि।

नीला और बैंगनी रंग: बैंगन, चुकंदर, पत्ता गोभी, बैंगनी रंग के अंगूर, जामुन, अनार।

गहरा लाल: शकरकंदी, टमाटर।

सफेद और भूरा: प्याज, मूली, लहसुन, गोभी, शलगम। 

नोट: इनके अलावा इन रंगों की और भी चीजें हैं जो खाई जा सकती हैं।


प्रोटीन और मिनरल्स लें

दालें

प्रोटीन का अच्छा जरिया मानी जाती हैं, पर अलग-अलग दालों में प्रोटीन की मात्रा भी अलग-अलग होती है:

1. मूंग: प्रोटीन की मात्रा कम, इसलिए पचाने में आसान। अक्सर मरीजों को यही दी जाती है।

2. मसूर, अरहर, चना, राजमा: प्रोटीन की मात्रा ज्यादा। सर्दियों में कुलथी की दाल भी खाएं।

3. सीड्स: चीया, फ्लैक्स, पंपकीन आदि सीड्स भी लेना चाहिए।

4. नट्स: सर्दियों में बादाम, अखरोट भी खाना चाहिए।


नॉनवेज

अंडा, मछली, चिकन और मटन: नॉनवेज के रूप में ज्यादातर उपयोग में आने वाले फूड आइटम्स। जो लोग नॉनवेज खाते हैं, उनके लिए ये प्रोटीन के बेहतरीन सोर्स हैं, पर इन्हें पकाने का तरीका बहुत अहम है।


अनाज 

हमारी थाली में अमूमन अनाज यानी कार्बोहाइड्रेट्स की मात्रा सबसे ज्यादा (50 फीसदी) होती है। ये सही चुनाव नहीं है। इसे 50 फीसदी से घटाकर 20 फीसदी कर दें:

1. चावल: कार्बोहाइड्रेट का सबसे बेहतरीन जरिया। इसे पचाना भी आसान है। चावल बिना पॉलिश वाले खाएं।

2. रागी, जुआर, बाजरा: ये सभी अच्छे हैं, लेकिन रागी बेहतरीन है। कुछ लोग इसे गेहूं के साथ मिलाकर मिक्स्ड यानी मल्टिग्रेन के रूप में भी लेते हैं। वैसे मल्टिग्रेन आटे में दाल की मात्रा भी 20 से 40 फीसदी रखनी चाहिए। इससे प्रोटीन की कमी नहीं होती। अगर किसी को गेहूं पचाने में परेशानी है तो इसे छोड़ भी सकते हैं। ग्लूटेन प्रोटीन से कुछ लोगों को परेशानी होती है।

3. दलिया: वजन कम करने में मददगार और मिनरल्स का भी बेहतरीन जरिया


तेल-घी

तेल/घी भी शरीर के लिए जरूरी है लेकिन बीमार करने में जितनी अहम भूमिका खराब तेल की होती है, शायद ही किसी दूसरे की। महीने में एक व्यक्ति 500 ml से ज्यादा तेल न ले।


1. सरसों का तेल: हर दिन 2 से 3 चम्मच से ज्यादा नहीं होना चाहिए। भारतीयों के लिए बेहतर विकल्प है।

2. घी: गाय का देसी घी बेहतरीन माना जाता है, लेकिन वनस्पति घी से बचें।

3. ऑलिव ऑयल: ऑलिव यानी जैतून के तेल को काफी हेल्दी माना जाता है। हर दिन 2 से 3 चम्मच से ज्यादा नहीं लेना चाहिए। नारियल तेल उत्तर भारतीयों के लिए भी ठीक है।


इन्हें या तो बंद कर दें या मात्रा काफी कम

जितना अहम है इस बात को समझना कि क्या खाना चाहिए, उससे ज्यादा अहम है क्या कम या बंद करना:

1. रिफाइंड प्रोडक्ट: किसी भी तरह के रिफाइंड प्रोडक्ट का इस्तेमाल रोक देना या फिर महीने में एक से दो बार कर देना चाहिए। इसमें रिफाइंड तेल, चीनी, सफेद नमक, मैदा आदि शामिल हैं।

2. डीप फ्राई: हाजमा खराब करने में डीप फ्राई वाली चीजों का अहम योगदान होता है। खासकर इसमें जंक फूड (नूडल्स, समोसा, बर्गर) शामिल हैं।


ये टेस्ट दूर करेंगे डर 

लंग्स के लिए: 

कोई शख्स 8-10 साल से से स्मोक कर रहा है, खांसी भी है तो फेफड़ों का CT स्कैन करा लेना चाहिए। रिस्क नहीं है तो भी 40 साल की उम्र में एक बार फेफड़ों का एक्स-रे या CT स्कैन और 40 के बाद हर साल। टेस्ट: एक्सरे, खर्च: 300 से 500 रुपये


प्रोस्टेट के लिए: 

50 साल की उम्र में पुरुषों को PSA टेस्ट करा लेना चाहिए, हालांकि जरूरत महसूस होने पर उससे पहले भी करा सकते हैं। इसके नॉर्मल आने पर हर 2 साल या डॉक्टर के बताए वक्त के मुताबिक रिपीट कराएं। फैमिली हिस्ट्री या पेशाब से जुड़ी परेशानी है तो 40 साल की उम्र में ही यह टेस्ट करा लें।

टेस्ट: PSA, खर्च: 300 से 1000 रुपये


सर्वाइकल के लिए: 

पहली बार शारीरिक संबंध बनाने के 3 से 5 साल बाद पेप स्मियर (PAP Smear) टेस्ट कराएं। नॉर्मल आने पर 35 साल की उम्र के बाद हर 3 से 5 साल पर।

खर्च: 1200-1600 रुपये


ब्रेस्ट के लिए: 

महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के मामले काफी बढ़े हैं। ऐसे में मैमोग्रफी से यह पता लगाना आसान हो जाता है कि कोई गांठ तो नहीं बन गई है। 40 की उम्र से 70 साल तक साल में एक बार मैमोग्रफी कराने की सलाह दी जाती है।

मैमोग्राम, खर्च: 2000 से 2500 रुपये


फेफड़ों-लिवर के लिए

इससे कैंसर की स्टेज की जानकारी भी मिल जाती है। कैंसर का पता लगाने के लिए पहले सिर्फ PET इस्तेमाल होती थी, लेकिन अब PET/CT या PET/MRI भी होती हैं। पूरी बॉडी की स्कैनिंग हो जाती है। कहीं भी कैंसर सेल बढ़ रहे हों तो जानकारी मिल जाती है।

खर्च: PET/CT: 10 से 20,000 रुपये


कोलोन के लिए:

 अगर स्टूल में खून आ रहा है या उसका रंग बिना कारण के काला है तो स्टूल ऑकल्ट ब्लड टेस्ट कराएं। कोई गड़बड़ी निकलने पर कोलोनोस्कोपी करा सकते हैं, जिससे कैंसर की जानकारी मिल जाती है।

टेस्ट: कोलोनोस्कोपी 

खर्च: 2500 से 12000 हजार रुपये


ब्लड कैंसर की शुरुआती जांच

इसके लिए शुरुआती जांच बहुत सस्ती है। कोई अपना CBC टेस्ट कराए और उसमें WBC (वाइट ब्लड सेल: ये हमारे शरीर के सैनिक हैं जो बीमारियों से लड़ते हैं) की संख्या पर ध्यान दे तो शुरुआत में ही इसका पता चल जाता है। WBC की संख्या सामान्य से बहुत कम या बहुत ज्यादा हुई तो डॉक्टर से मिलें।


WBC की सामान्य संख्या  4,500 से 11,000

जब WBC बहुत कम हो 2000 से नीचे

जब WBC बहुत ज्यादा हो 16 हजार से ऊपर

CBC टेस्ट में खर्च:  300 रुपये


शक दूर करने के लिए बायोप्सी

कैंसर की जांच में ट्यूमर होने पर बायोप्सी कराना सामान्य जांच की प्रक्रिया है। इसमें ट्यूमर से टिशू का एक हिस्सा ऑपरेट करके निकाल लिया जाता है और फिर देखा जाता है कि ट्यूमर का नेचर बिनाइन (जिसमें कैंसर सेल न हों यानी जो खतरनाक न हो) है या फिर मैलिग्नेंट (जिनमें कैंसर सेल्स मौजूद हों यानी खतरनाक)। अगर रिजल्ट मैलिग्नेंट आता है तो फिर उस ट्यूमर को निकाल दिया जाता है। वैसे आजकल लिक्विड बायोप्सी भी होती है। इसमें ऑपरेशन की जरूरत नहीं होती।



सोमवार, 3 फ़रवरी 2025

संगम पर वासंतिक हिलोर


 संगम पर वासंतिक हिलोर

अम्‍ब‍िका वाजपेयी : 


तीर्थराज प्रयाग और ऋतुराज वसंत के पावन संगम पर अमृत स्‍नान की लालसा। स्‍नान को जाते समय आस्‍थायुक्‍त अधीरता और डुबकी लगाकर आते समय मुखमंडल पर असीम संतोष। इस पावन पर्व की व्‍याख्‍या के लिए स‍िर्फ यही दो भाव पर्याप्‍त हैं। सूर्योदय के पहले ही तटों पर कल्‍पवास‍ियों ने स्‍नान पुण्‍य लूटा तो सुबह सवा नौ बजे के बाद वसंत पंचमी लगने वालों की प्रतीक्षा समाप्‍त हुई। हर-हर महादेव और जय गंगा मैया के जयघोष के साथ प्रारंभ इस स्‍नान क्रम ने रात्र‍ि होते-होते डेढ़ करोड़ की संख्‍या स्‍पर्श कर ली। यह संख्‍या साेमवार को और बढ़ेगी जब उदया ति‍थ‍ि की प्रतीक्षा कर रहे अखाड़ों के साथ ही अन्‍य श्रद्धालु इस महाकुंभ के अंत‍िम अमृत स्‍नान में डुबकी लगाएंगे।

प्रात:काल से ही संगम जाने वाले हर मार्ग पर तो आस्‍था का वेग प्रवाहमान था। त्र‍िवेणी तट पर उमड़े पीतांबरधारी भक्‍त सूर्योदय की ला‍ल‍िमा में दमक रहे थे। वासंत‍िक प्रवाह में हर घाट संगम था तो प्रत्‍येक डुबकी में मोक्ष की संतुष्‍ट‍ि। स्‍नान की आतुरता ऐसी क‍ि जहां जगह मिली, वहीं डुबकी लगाकर स्‍वयं को धन्‍य कर लिया। पुलिसकर्मी  लगातार अपील कर रहे थे क‍ि स्‍नान करने के बाद घाट खाली कर दें। अपील का व‍िपरीत असर भी द‍िखा क‍ि लोग गंगा की गोद से निकलना ही नहीं चाह रहे थे। तीन, सात और ग्‍यारह डुबकि‍यों का स्‍नान लंबे समय तक चल रहा था। घाटों पर तैनात जल पुलिस कर्मी कई लोगों को टोकते भी दिखे क‍ि बस हो गया बाहर निकलि‍ए। इसका असर भी द‍िखा और लोग सुगम स्‍नान करके निर्धारि‍त मार्गों से वापस जा रहे थे। स्‍नान करने के उपरांत पीतवस्‍त्र धारण करके लौटते श्रद्धालु अलग ही आभा उत्‍पन्‍न कर रहे थे। डुबकी के बाद समस्‍त शीश गंगा मैया के समक्ष श्रद्धावनत थे तो आंखों में देव और संतदर्शन की लालसा जन्‍म ले चुकी थी। यही लालसा अक्षयवट और लेटे हनुमानजी तक पहुुंचने का रास्‍ता पूछ रही थी। अखाड़ों के मार्ग पर वेगवान जनसमूह के मुखमंडल पर हठयोगियों के प्रति व‍िस्‍मययुक्‍त आस्‍था स्‍पष्‍ट थी। बच्‍चों और म‍हि‍लाओं को अपने सुरक्षा घेरे में लेकर चल रहे लोगों में इहलोक में स्‍थाान सुरक्षित कर लेने का संतोष छलक रहा था। स्‍नान के बाद लेटे हनुमानजी के दर्शन की आतुर लोगों की पंक्‍त‍ि से भगवा और पीत का अदभुत संगम दिखा। स्‍नान करके लौट रहे अयोध्‍या के संत सीतारमण कहते हैं क‍ि कुंभ सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं है। कुंभ के भाव में गोते लगाएं और इसके सरोकारों  पर दृष्टि गड़ाकर आगे बढ़ें तो कई मंतव्य तथा जीवन व समाज के संचालन के लिए आवश्यक संदेश सामने आएंगे। सनातन संस्कृति का शंखनाद दिखेगा। सनातन की व्याख्या का पूरा सार मिलेगा। अखाड़ों में सुशोभ‍ित विभ‍िन्‍न पंथ और अखाड़ाें के संतों को देख‍िए उनके उपक्रम भले ही विभ‍िन्‍न हों लेक‍िन लक्ष्‍य बस एक है सर्वकल्‍याण और मोक्ष।

मां वीणावादि‍नी की उपासना के पर्व पर उमड़े विभिन्‍न जाति-वर्ग के समूह से सनातन धर्म का यह स‍िद्धांत पुष्‍ट होता दि‍खा क‍ि 'एकम सत विप्रा बहुधा वदन्ति ।' यानी सत्य एक है, लेकिन विद्वानों ने अनेक प्रकार से इसकी व्याख्या की है। सनातन के अलावा कोई धर्म ऐसा नहीं है जो यह न कहता हो कि ईश्वर को सिर्फ उसी के रास्ते से पाया जा सकता है । सिर्फ सनातन ही ऐसे किसी दावे से दूर रहता है। वसंत पंचमी पर यह सत्‍य भी पुष्‍ट होता दिखा क‍ि श्रद्धालु भले ही विभिन्‍न प्रांतों और अनेक मार्गों से आए हों, लेक‍िन उनका साध्‍य  एक ही था एक डुबकी से अनंत पुण्‍य की कामना।  कुंभ सनातन में छिपी देश की समृद्धि, शक्ति, शांति, एकता और अखंडता  को अक्षुण्ण रखने की सामर्थ्य की उद्घोषणा का भी माध्यम है । हमारे पूर्वजों ने बहुत सोच-समझकर कुंभ की परंपरा डाली होगी विश्व को समझाने के लिए अनेकता में एकता ही सनातन और भारत की विशेषता है। मतभिन्नता भारत की कमजोरी नहीं बल्कि शक्ति है ।

इस संदेश को पूरा विश्‍व आत्‍मसात और ग्रहण कर रहा है।

सरस्वती का अवतरण और धर्म दंड सी सशक्त आस्था

 

संगम लाइव

 

अम्बिका वाजपेयी : 


उपमाएं गौण हैं...मन विह्वल और आनंद अकथनीय। आप उस पावन पुण्य की कल्पना मात्र कर सकते हैं जो ऋतुराज और 'नदीतमा' के संगम पर लोगों ने प्राप्त किया। भगवान कृष्ण ने गीता में जिस वसंत को ऋतुनां कुसुमाकर: कहकर अपनी सृष्टि माना है, उसी की पंचमी को नदियों में श्रेष्ठ  यानी नदीतमा सरस्वती का उद्भव हुआ था। सोमवार को भी उसी अदृश्य सरस्वती का अवतरण जनसमूह के अविरल प्रवाह के रूप में हुआ। अवसर तो वीणावादिनी के पूजन का था लेकिन हर दिशा में वेगवान जनप्रवाह नए आनंद का सृजन कर रहा था। अमावस में मिली वेदना को विस्मृत करता संगम तट अनूठे अमृत स्नान का साक्षी बना। संगम के जल से रेती निकालकर झोली में रख रहे विष्णुवर्धन मेरा विस्मयवर्धन करते हैं। उत्तर भी मिलता है कि पूजन स्थल पर रखेंगे। पावन रेत पर पहाड़ सी आस्था इसी सनातन में हैं। पुरातन से नूतन और अधुनातन की यात्रा में सनातन का संबल रही है। राजस्थान से आए 80 वर्षीय  राजमणि जब बताते हैं कि वह 12 किलोमीटर पैदल चल चुके हैं तो उनके हाथ में पकड़ी लाठी के प्रति धर्मदंड सी आस्था उत्पन्न हुई। आस्था तो संगम में प्रवाहमान रक्त-पीत वर्णी पुष्पों से भी उत्पन्न हो रही थी, जो गंगा यमुना के प्रवाह का वर्ण परिवर्तित करने को आतुर दिखे। लहरों में बहकर बुझ जा रहे दीपों को देखकर सनातन धर्म के ध्येय वाक्य का स्मरण हुआ कि क्षणभंगुर जीवन भी परमार्थ में लगाया जाए। परमार्थ के बारे में सोच ही रहा था कि इसे परिभाषित करते विजय कुमार मिल जाते हैं। विजय पैदल चल रहे लोगों को पानी की बोतलें बांट रहे थे। बताते हैं कि 15 मित्रों का एक समूह  जेबखर्च से  रोज पांच सौ लोगों को पानी की बोतल देता है। मन में भाव आया कि करोड़ों की भीड़ में पांच सौ बोतलों का क्या अस्तित्व... इसी उधेड़बुन में लहरों में अल्प समय को ही प्रकाशवान होने वाले दीयों का स्मरण हो आया। पीतवस्त्र में आवागमन करते श्रद्दालु, कलरव करते विदेशी पक्षी, स्क्रीन पर ही दर्शन देते बड़े हनुमानजी को निहारते हुए आगे बढ़ रहा था कि एक बालस्वर ने रोका..'टीका लगवा लीजिए'। एक साथी ने मना किया तो बोले दक्षिणा मत दीजिएगा, स्नान करके सूने मस्तक नहीं जाया जाता। सुनकर विचार आया कि यही तो है सनातन परंपरा, संस्कृति और संस्कार। इन्ही विचारों में मग्न था कि मस्तक पर तिलक विराजमान हो चुका था। स्नान से शीतल देह की शीतलता में वृद्धि करते त्रिपुंड से त्रिविध ताप नष्ट होने की कामना उपजी ही थी कि पुष्पवर्षा करते हेलीकॉप्टर ने ध्यान खींचा। दृष्टि आकाश पर थी कि एक साधु ने टोका..आगे देखिए। बात तो सही है सनातनियों के पास अब पीछे देखने का समय नहीं है।

रविवार, 2 फ़रवरी 2025

पीजीआई ने स्थापित किया पित्ताशय कैंसर के इलाज की नई तकनीक

 

पीजीआई ने स्थापित किया पित्ताशय कैंसर के इलाज की नई तकनीक


 


 


महंगी इम्यूनोथेरेपी का विकल्प साबित हो सकती है नई कंबीनेशन थिरेपी


 नई थेरेपी से लंबी हो सकती है जिंदगी की डोर


इम्यूनोथेरेपी के मुकाबले नई तकनीक से 50 गुना सस्ता इलाज पित्ताशय कैंसर का इलाज


कुमार संजय


 


संजय गांधी पीजीआई के चिकित्सा विज्ञानियों ने  पित्ताशय के कैंसर के इलाज लिए ऩई  तकनीक  विकसित किया है, जो महंगी इम्यूनोथेरेपी का विकल्प साबित होने के साथ ही जिंदगी की डोर दो गुना लंबी करने में सफल साबित हुई है। छह सप्ताह की कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी की लागत लगभग 30,000 से 40 ,000  रुपये है जबकि इम्यूनोथेरेपी में 18 से 20 लाख का खर्च आता है।  रेडियोथेरेपी विभाग की प्रोफेसर सुषमा अग्रवाल ने   पित्ताशय कैंसर के 140 ऐसे मामले जिनमें कैंसर का आस-पास नहीं  फैलाव नहीं हुआ था इनमें  कीमोथेरेपी के साथ रेडियोथेरेपी(कंबीनेशन) को जोड़ कर उपचार दिया। देखा कि  80 प्रतिशत रोगियों में काफी फायदा हुआ ।  पारंपरिक कीमोथेरेपी औसतन 8 से 9 महीने का जीवनकाल प्रदान करती है।  कंबीनेशन थिरेपी से जिंदगी दो गुनी हो जाती है ।  सरकारी अस्पताल में भी  इम्यूनोथेरेपी कोर्स की लागत 18 से 20 लाख रुपये तक हो सकती है। एसजीपीजीआई में छह सप्ताह की कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी की लागत लगभग 30,000 रुपये है।  शोध में देखा गया कि   कीमोथेरेपी  के साथ छह सप्ताह की रेडियोथेरेपी परेशानी कम होने के साथ औसत जीवन आठ महीने से बढ़कर औसतन 13 महीने हो गई है।  शोध को   इंटरनेशनल जर्नल ऑफ रेडिएशन ऑन्कोलॉजी, बायोलॉजी, फिजिक्स ने स्वीकार किया है।


 


 केवल 10 फीसदी में ही सर्जरी संभव


 


 गाल ब्लैडर कैंसर के  शुरुआती चरण में मामलों में  केवल 10 प्रतिशत मरीज ही सर्जरी करा सकते हैं।  90 से 50 प्रतिशत मेटास्टैटिक कैंसर के साथ होते हैं जिसमें कैंसर अंगों में फैली होती  है।  40 प्रतिशत में कैंसर स्थानीय ( लोकलाइज होता है यानी कैंसर दूसरे अंगों में नहीं फैला होता है।  इनमें  इलाज आमतौर पर कीमोथेरेपी से किया जाता है।


 


 


महिलाओं में तीसरा कैंसर


 


पित्ताशय का कैंसर उत्तरी भारत में, कश्मीर से लेकर उत्तर-पूर्व तक गंगा के मैदानी इलाकों में महिलाओं में तीसरा सबसे अधिक प्रचलित कैंसर है।'


 


 


 


 


 


 


यह बढ़ा  सकता है पित्ताशय कैंसर


 


पित्ताशय के कैंसर के प्राथमिक जोखिम कारकों में जल प्रदूषण, मोटापा और दूषित सरसों के तेल और अधिक पके हुए तेल का सेवन शामिल है।   पित्ताशय की बड़ी पथरी और बीमारी के बीच भी महत्वपूर्ण संबंध है, जिससे शीघ्र पता लगाने के लिए पित्ताशय की थैली को हटाने के बाद उसके पैथोलॉजिकल मूल्यांकन करना चाहिए।


 



पित्ताशय कैंसर क्या है

पित्ताशय (गॉल ब्लैडर) एक छोटा अंग होता है जो पाचन में सहायता करने वाले पित्त रस (बाइल जूस) को संग्रहित करता है। जब इसकी कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं, तो कैंसर विकसित हो सकता है। यह कैंसर शुरुआती चरणों में पहचानना मुश्किल होता है, इसलिए इसका निदान अक्सर देर से होता है।




 पित्ताशय कैंसर के लक्षण

इस कैंसर का शुरुआती पहचान मुश्किल होती है, लेकिन कुछ लक्षण ध्यान देने योग्य हैं:

- पेट के दाहिने ऊपरी भाग में लगातार दर्द

 -भूख न लगना और वजन तेजी से कम होना

- लगातार अपच और उल्टी

 -त्वचा और आंखों का पीला पड़ना 

 -पेट में सूजन

सोमवार, 20 जनवरी 2025

कबूतर व तोते के पंखों के संपर्क में लंबे समय तक रहते हैं तो फेफड़े की दुर्लभ

 

 बीट से फेफड़े की बीमारी का खतरा


अगर आपके घर के आस-पास कबूतरों का डेरा है या घर में पक्षी पले हैं तो यह आपके लिए खतरे की घंटी हो सकती है। कबूतर व तोते के पंखों के संपर्क में लंबे समय तक रहते हैं तो आप फेफड़े की दुर्लभ और गंभीर बीमारी हाइपर संसिटिविटी न्यूमोनाइटिस की चपेट में आ सकते हैं। वैसे तौ यह एक तरह की एलजीं है, लेकिन यह धीरे- धीरे फेफड़े को खोखला बना सकती है।


पक्षियों से होनी वाली वीमारियों के संबंध में विकास मिश्र की रिपोर्ट-


लखनऊः कबूतर जैसे अन्य पक्षियों के संपर्क में लंबे समय तक गाना आपकी सेहत के लिए घातक हो सकता है। केजीएमयू के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष प्रो. सूर्यकांत का कहना है कि हाइपर सेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस को यर्ड फैनसियर के फेफड़े के रूप में भी जाना जाता है, जो पक्षियों की बोट या पंखों के संपर्क में लंबे समय तक रहने के कारण होता है।


इसके अलावा बैक्टोरिया, फंगी, एनिमल एंड प्लांट प्रोटीन के साथ दूसरी एलर्जी भी हदपर सेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस का कारण हो सकते हैं। लक्षण को पहचान कर समय से सटीक इलाज करने पर बीमारी पूरी तरह ठीक हो सकती है। रोजाना ओपीडी में आने वाले 100 में से 10 मरीज हाइपर सेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस के लक्षण वाले होते हैं।


कैसे करें बचाव


यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है। इससे बचाव ही सबसे अच्छा उपचार है। अगर आप ऐसी जगहों पर काम करते हैं या रहते है, जहां पक्षियों, लकड़ी, कागज या अनाज है तो अच्छी गुणवता का मास्क लगाएं। घर के अंदर, बाहर और कबूतर, तोता या किसी पक्षी को न पालें और न ही दाना डालें।


घर को चिड़ियाघर न बनाएं, लक्षण को पहचानें: प्रो. सूर्यकांत प्रो. सूर्यकांत कहते हैं, आजकल घर के अंदर पशु- पक्षी पालने का चलन बढ़ गया है, लेकिन ज्यादातर लोग इस बात से बेफिक्र होते हैं कि इससे उनके स्वास्थ्य को भी खतरा रहता है। दरअसल, कुछ पशु पक्षी के पंखों के छोटे कण सांस की नली में एलजीं पैदा करते हैं, जिसकी वजह से सांस की नली में सिकुड़न आ जाती है। धीरे-धीरे इसका दुष्प्रभाव फेफड़े को होता है, जी हाइपर सेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस का


लक्षणों को पहचानें


सांस लेने में परेशानी, सूखी खांसी, छाती में तनाव, थकान, कमजोरी व लंबे समय तक बुखार मांसपेशियों में दर्द होना, वजन घटने लगना


अंगुली या पैर की अंगुली का मुड़ना


कारण बनता है। न्यूमोनाइटिस में मरीज के फेफड़े और सांस की नली में सूजन आ जाती है। कई बार डाक्टर इसके लक्षण की अस्थमा या टीबी मानकर इलाज करते हैं। ऐसे में गलत इलाज और शुरुआती लक्षण को नजरअंदाज करने से फेफड़े में फाइब्रोसिस (फेफड़े का सिकुड़न) हो सकता है। फाइब्रोसिस होने पर फेफड़े का एक हिस्सा निष्क्रिय हो जाता है और उतना हिस्से में आक्सीजन का प्रवाह नहीं होता है।


200 बीमारियों

का एक समूह है आइएलडी जिसमें हाइपर सेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस भी एक है।


10 शहरों के 27 केंद्रों पर आइएलडी मरीजों का पंजीकरण कराया गया


1,084 मरीजों पर


किया

: हो चुका है शोध


एचएसआइएलडी- 47.3%


सीटीडी आइएलडी-13.9%


आइपीएफ-13.7%


 आइएनएसआइपी-8.5%


सारकोहोसिस-7.8%


न्यूमोकोनियोसिस- 3%


अन्य समस्याएं मिलीं-5.7%


एडवांस स्टेज में लाइलाज है बीमारी


 प्रो. सूर्यकांत के मुताबिक, अगर समय से सही उपचार न हो तो धीरे-धीरे मरीज का आक्सीजन स्तर 90 के नीचे आ जाता है और मरीज गंभीर स्थिति में पहुंच जाता है, जहां से उबरना मुश्किल हो जाता है। ऐसे रोगी का जीवन अधिकतम एक से पांच वर्ष तक होता है। कुछ मरीजों को लंग ट्रांसप्लांट की भी जरूरत पड़ती है। अगर किसी व्यक्ति दो सप्ताह से अधिक खासी आ रही है तो उसे बलगम और एक्सरे की जांच जरूर कराना चाहिए। बलगम की जांच रिपोर्ट निगेटिव हो सकती है, लेकिन एक्सरे में फेफड़े की सिकुड़न (फाइब्रोसिस) दिखेगी। इस बीमारी की सटीक पहचान के लिए दो जांच जरूरी है। पहली हाई रिजुलेशन सीटी स्कैन और दूसरी पीएफटी। तीन से छह माह में बीमारी की पहचान कर सही इलाज हो तो पूरी तरह ठीक होना संभव है। लक्षण दिखने पर रेस्थिरेटरी मेडिसिन के विशेषज्ञ को ही दिखाएं। अगर आप छत पर गौरैया या अन्य छोटे पक्षी को दाना डालते हैं तो डरने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इनसे कोई खतरा

 200बीमारियों

का एक समूह है आइएलडी जिसमें हाइपर सेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस भी एक है।


10 शहरों के 27 केंद्रों पर आइएलडी मरीजों का पंजीकरण कराया गया


1,084 मरीजों पर


किया गया अध्ययन


में यह शोध 2017 अमेरिकन


जर्नल में प्रकाशित

रविवार, 19 जनवरी 2025

पीजीआई में रेयर डिजीज जीपीडी-1 डिफिशिएंसी से ग्रस्त देश के चौथे शिशु का इलाज

 

6 माह के  शिशु में हो सकता है फैटी लिवर 


पीजीआई में रेयर डिजीज जीपीडी-1 डिफिशिएंसी से ग्रस्त देश के चौथे शिशु का इलाज


पूरे दुनिया में अब तक 30 बच्चों में चला है इस बीमारी का पता  


संजय गांधी पीजीआई के पीडियाट्रिक गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग ने एक दुर्लभ बीमारी जीपीडी-1 डिफिशिएंसी से ग्रस्त 6 महीने के शिशु का इलाज सफलतापूर्वक किया है। यह भारत में इस बीमारी का चौथा मामला था। दुनिया भर में इस प्रकार के लगभग 30 मामले सामने आए हैं जिनकी उम्र एक माह से 13.6 वर्ष के बीच रही है। भारत में अब तक तीन मामलों की रिपोर्ट हुई है जिसमें से एशिया से केवल 9 मामले सामने आए हैं। जीपीडी-1 की कमी से बच्चों में फैटी लिवर का एक दुर्लभ कारण बन सकता है। समय पर इलाज से इसमें सुधार संभव है।  ट्राइग्लिसराइड का स्तर बढ़ा हुआ हो और लिवर की समस्या हो उनमें इस बीमारी की पुष्टि के लिए जीन परीक्षण कराना चाहिए।  


 


क्या है जीपीडी-1 डिफिशिएंसी?

जीपीडी-1 (ग्लिसरॉल-3-फास्फेट डिहाइड्रोजिनेज 1) जीन में उत्परिवर्तन (मू्यटेशन) के कारण यह समस्या उत्पन्न होती है, जो बच्चों में फैटी लिवर का कारण बनता है। इस बीमारी में ग्लिसरॉल-3-फास्फेट डिहाइड्रोजिनेज 1 रसायन की कमी हो जाती है, जिसके कारण लिवर में फैट जमा होने लगता है। समय पर इलाज न मिलने पर लिवर की कार्यक्षमता पर बुरा असर पड़ सकता है।


शिशु में यह थी परेशानी

पीजीआई में 6 महीने का शिशु इलाज के लिए आया था, जो स्वस्थ माता-पिता का दूसरा बच्चा था। उसे चार महीने की उम्र से पेट के ऊपरी हिस्से में सूजन और बढ़े हुए लिवर की समस्या थी। शिशु का वजन 3.8 किलोग्राम और लंबाई 56 सेंटीमीटर थी। उसकी रक्त जांच में यूरिया का स्तर 9.4 मिलीग्राम/डीएल, ट्राइग्लिसराइड का स्तर 627 मिलीग्राम/डीएल और लिवर एंजाइम्स (एसजीओटी 360 यू/एल और एसजीपीटी 164 आईयू/एल) बढ़े हुए थे। अल्ट्रासोनोग्राफी में ग्रेड टू फैटी लिवर पाया गया, और लिवर बायोप्सी से यह पुष्टि हुई कि लिवर में 90% फैट जमा हो चुका था।


ऐसे हुई इलाज



विशेषज्ञों ने शिशु को कम वसा और ट्राइग्लिसराइड आधारित आहार दिया। छह महीने बाद, ट्राइग्लिसराइड और लिवर एंजाइम्स के स्तर में सुधार देखा गया।  इस प्रकार के बच्चों का हर 3 से 6 महीने में लिवर प्रोफाइल, लिपिड प्रोफाइल और अल्ट्रासाउंड परीक्षण कराया जाना चाहिए।


इलाज करने वाले विशेषज्ञ

इस दुर्लभ मामले का इलाज संजय गांधी पीजीआई के पीडियाट्रिक गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के डॉ. आशय शाह और प्रिज्म बाल चिकित्सा गैस्ट्रो सेंटर, अहमदाबाद के विशेषज्ञों ने किया। इस मामले की रिपोर्ट को "ग्लिसरॉल-3-फॉस्फेट डिहाइड्रोजिनेज 1 डिफिशिएंसी: ए रेयर कारण ऑफ फैटी लिवर डिजीज इन चिल्ड्रन" विषय के तहत इंडियन पीडियाट्रिक जर्नल में जनवरी 2025 में प्रकाशित किया गया है।

बुधवार, 8 जनवरी 2025

1.38 फीसदी में वायरल निमोनिया का कारण है एचएमपीवी

 

फरवरी के बाद धीमा हो जाएगा एचएमपीवी वायरस

1.38 फीसदी में वायरल निमोनिया का कारण है एचएमपीवी


एचएमपीवी वायरस से न हों परेशान, बस बरतें सावधानी

आईसीएमआर ने वायरल निमोनिया के कारण जानने के लिए किया शोध

देश का सबसे बड़ा शोध


कुमार संजय


ह्यूमन मेटा न्यूमोवायरस (एचएमपीवी) को लेकर देश का सबसे बड़ा शोध सामने आया है, जिसमें बताया गया है कि इस वायरस से घबराने की जरूरत नहीं है। शोध के अनुसार, फरवरी के बाद वायरस का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगेगा। यह शोध मई 2022 से बाबा ऱादव दास मेडिकल कालेज कालेज के  रोग विभाग में आने वाले बच्चों पर शिरू हुआ । विशेषज्ञों के अनुसार, पांच साल से कम उम्र के बच्चों में, विशेष रूप से कमजोर इम्यून सिस्टम वाले बच्चों में संक्रमण की आशंका अधिक होती है। हालांकि, संक्रमित बच्चों में केवल 1% मामलों में गंभीर जटिलता की संभावना होती है, जिसे सपोर्टिव थेरेपी जैसे ऑक्सीजन थेरेपी, संतुलित आहार और लक्षण आधारित उपचार से नियंत्रित किया जा सकता है।


943 बच्चों पर हुआ अध्ययन

आईसीएमआर के वैज्ञानिकों ने एक्यूट रेस्पिरेटरी इंफेक्शन (एआरआई) और सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी इंफेक्शन (एसएआरआई) के शिकार पांच साल से कम उम्र के 943 बच्चों पर शोध किया। इसमें पाया गया कि 1.38% बच्चों में श्वसन तंत्र में संक्रमण का कारण एचएमपीवी वायरस था, बाकी में दूसरे वायरस थे। 


आईसीएमआर की मुख्य शोधकर्ता डॉ. हीरावती देवल ने बताया कि एचएमपीवी वायरस की सक्रियता ठंड के दौरान अधिक होती है और फरवरी-मार्च के बाद इसका प्रभाव कम होने लगता है। यह एक सामान्य वायरस है, जिससे घबराने की आवश्यकता नहीं है। यदि किसी में वायरस की पुष्टि होती है, तो सतर्कता बरतना आवश्यक है। इसके तहत, बच्चे के आसपास रहने वालों को मास्क पहनने और हाथ साफ रखने की जरूरत होती है।


श्वसन तंत्र के संक्रमण के लिए नौ प्रमुख वायरस जिम्मेदार

शोध के दौरान यह भी पाया गया कि श्वसन तंत्र के संक्रमण के लिए नौ वायरस जिम्मेदार हैं:


पैराइन्फ्लुएंजा वायरस 


एडेनोवायरस


आरएसवी-बी


इन्फ्लूएंजा-ए


सार्स-कोविड-2


एचएमपीवी


आरएसवी-ए


इन्फ्लूएंजा-बी


एचआरवी


इनमें सबसे अधिक 11.13% मामलों में पैरा इन्फ्लूएंजा वायरस और दूसरे नंबर पर एडिनोवायरस का संक्रमण देखा गया।


बच्चों को परेशान करता है निमोनिया

श्वसन तंत्र के संक्रमण के कारण निमोनिया और बाल मृत्यु दर 14.3% तक देखी गई। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के अनुसार, एक से पांच वर्ष के बच्चों की मृत्यु के 15.9% मामलों में निमोनिया प्रमुख कारण है।


वायरल संक्रमण के मुख्य लक्षण

नाक से पानी बहना


ठंड लगना और कंपकंपी


सांस लेने में परेशानी


उल्टी


पेट दर्द


कैसे हुआ यह शोध?

हॉस्पिटल बेस्ड सर्विलांस ऑफ रेस्पिरेटरी वायरस इन चिल्ड्रेन अंडर फाइव इयर्स ऑफ एज विद एआरआई पर देश का सबसे बड़ा शोध किया गया।


भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के रीजनल सेंटर, गोरखपुर से डॉ. हीरावती देवल के निर्देशन में यह शोध किया गया। शोध दल में शामिल वैज्ञानिकों में प्रमुख रूप से मिताली श्रीवास्तव, नेहा श्रीवास्तव, नीरज कुमार, रोहित बेनीवाल, राजीव सिंह, अमन अग्रवाल, गौरव राज द्विवेदी, स्थिता प्रज्ञा बेहरा, आसिफ कवाथेकर, संजय प्रजापति, सचिन यादव, दीप्ति गौतम, नलिन कुमार, आसिफ इकबाल, रजनी कांत और वर्षा पोतदार शामिल थे।


इसके अलावा, बाल रोग विभाग, बीआरडी मेडिकल कॉलेज, गोरखपुर की डॉ. अनिता मेहता, भूपेन्द्र शर्मा, माइक्रोबायोलॉजी विभाग के अमरेश कुमार सिंह, विवेक गौड़, एम्स गोरखपुर के डॉ. महिमा मित्तल और आईसीएमआर-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एपिडेमियोलॉजी, चेन्नई के डॉ. मनोज मुरहेकर भी इस शोध में सम्मिलित हुए।

शनिवार, 4 जनवरी 2025

पीजीआई - टीएमएस तकनीक से मिलेगा रोज़ सिरदर्द से छुटकारा

 

पीजीआई - टीएमएस तकनीक से मिलेगा रोज़ सिरदर्द से छुटकारा


टीएमएस थेरेपी से 50 फीसदी तक सिर दर्द में राहत 




कुमार संजय


रोज़ाना सिरदर्द की समस्या झेल रहे मरीजों के लिए राहत की खबर है। संजय गांधी पीजीआई, लखनऊ के न्यूरोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों ने ट्रांसक्रानियल मैग्नेटिक स्टिमुलेशन (टीएमएस) तकनीक से इलाज कर सिरदर्द में 50 फीसदी तक की कमी दर्ज की है। खास बात यह है कि यह थेरेपी उन मरीजों के लिए कारगर साबित हुई, जिन पर दवाओं का असर कम हो जाता था। सिर दर्द में परेशानी के साथ ही  शोध के नतीजों के अनुसार सिरदर्द की तीव्रता में 50 फीसदी तक सुधार हुआ।हर 28 दिनों में औसतन 10.84 दिन सिरदर्द कम हुआ।अवसाद और चिंता के लक्षणों में भी राहत मिली।


रोज़ाना सिरदर्द से परेशान मरीजों को राहत

डॉक्टरी भाषा में इस स्थिति को न्यू डेली पर्सिस्टेंट हेडेक (NDPH) कहा जाता है, जिसमें मरीज हर दिन सिरदर्द से जूझते हैं। यह समस्या क्रोनिक डेली हेडेक (सीडीएच) विकारों में आती है, जिससे दुनिया में करीब 4 फीसदी लोग प्रभावित हो सकते हैं। शोध में पाया गया कि टीएमएस तकनीक से सिरदर्द की तीव्रता और दर्द के दिनों में महत्वपूर्ण कमी आई। टीएमएस तकनीक उन मरीजों के लिए नई उम्मीद बन सकती है, जो रोज़ाना सिरदर्द से परेशान रहते हैं और जिन पर दवाओं का असर कम होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह थेरेपी सिरदर्द से स्थायी राहत दिलाने में मददगार साबित हो सकती है।


शोध में 50 मरीजों पर हुआ परीक्षण

पीजीआई के न्यूरोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों ने 50 मरीजों (31 महिलाएं शामिल) पर यह अध्ययन किया। मरीजों को लगातार तीन दिनों तक टीएमएस थेरेपी दी गई, जो बाएं प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स में दी जाती है। चार हफ्ते बाद 70 फीसदी मरीजों में 50 फीसदी तक दर्द में राहत मिली।


क्या है टीएमएस तकनीक?

ट्रांसक्रानियल मैग्नेटिक स्टिमुलेशन  एक नॉन-इनवेसिव (चीरा रहित) तकनीक है, जिसमें चुंबकीय तरंगों के जरिए मस्तिष्क की नर्व कोशिकाओं को उत्तेजित किया जाता है। इससे सिरदर्द की तीव्रता को कम किया जाता है और मरीज को राहत मिलती है।


अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुआ शोध

यह शोध संजय गांधी पीजीआई के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रो. विमल कुमार पालीवाल के निर्देशन में डॉ. एम.एम. भारथा, स्वांशु बत्रा, डॉ. नैना मिश्रा और डॉ. रोमिल सैनी द्वारा किया गया। शोध को इंटरनेशनल जर्नल ऑफ हेडेक एंड पेन में प्रकाशित किया गया है।

बुधवार, 1 जनवरी 2025

आर्टिफिशियल आंसू दूर करेगा ड्राई आई की परेशानी-- एसी से कमजोर कर सकती है आप की आंख




आर्टिफिशियल आंसू दूर करेगा ड्राई आई की परेशानी

एसी से कमजोर कर सकती है आप की आंख 

1.15 फीसदी लोगों की नजर है कमजोर

 
कुमार संजय। लखनऊ

विश्व नेत्र दिवस (10 अक्टूबर ) के मौके पर संजय गांधी पीजीआई नेत्र रोग विभाग के प्रमुख प्रो. विकास कनौजिया ने बताया कि  एसी में जो लोग लंबे समय तक रहते है उनकी आंख सूख सकती है। आंख में आंसू कम होने पर काली पुतली सूख जाती है जिससे रोशनी कम हो सकती है। इसे ड्राई आई कहते हैं। एसी में लंबे समय तक रहने वाले लोगों में ड्राई आई की परेशानी दूसरे लोगों की तुलना में अधिक देखी गयी है। एसी में रहने वाले लोगों को यदि किसी तरह की परेशानी हो रही है तो वह विशेषज्ञ से सलाह लें।
प्रोफेसर विकास कहते हैं कि इन लोगों में विटामिन डी की भी बहुत कमी होती है इसलिए इन्हें धूप का सेवन लगातार करना चाहिए इससे आंख की रोशनी पर भी प्रभाव पड़ता है। 
आर्टिफिशियल आंसू आने लगा है जिससे आंख का सूखापन दूर कर किया जा सकता है। बताया कि प्रदेश में सौ मे से 1.15 लोग की नजर कमजोर है। कारण मोतियाबिंद, ग्लूकोमा, रिफ्लेक्शन(नजर कमजोर), काला मोतिया , सर्जिकल कंपलिकेशन है। विशेषज्ञों का कहना है कि 80 फीसदी मामले में अंधापन को दूर किया जा सकता है। बशर्ते उनको सही समय पर सही इलाज मिल जाए।

यह है रोशनी की परेशानी का  कारण

73 फीसदी- मोतियाबिंद
 9 फीसदी - रिफ्लेक्शन
 8 फीसदी - ग्लूकोमा
2 फीसदी - सर्जिकल कंपलिकेशन 


 एक हजार में से एक बच्चे की नजर कमजोर 
भारत में एक हज़ार मे से 0.8 फीसदी बच्चों की नजर कमजोर है। इन्हें साफ दिखाई नहीं देता है। बच्चों को यदि देखने में परेशानी है तो आंख की जांच करानी चाहिए। 


कभी मत डाले आंख में यह दवा 
आंख में लाली आने पर अपने मन से कभी आई ड्राप नहीं डालना चाहिए। प्रो.विकास कनौजिया के मुताबिक आंख में एलर्जी होने पर आंख लाल हो जाती है। जलन होता है देखा गया है कि कई लोग अपने मन से आंख में दवा डाल लेते हैं। आंख में प्रिडली सिलोन, डेक्सामेथासोन और बेटनीसोल युक्त दवा कभी भी बिना डॉक्टरी सलाह के लिए नहीं डालना चाहिए। 

टीवी और मोबाइल बच्चों की नजर कर रहा है कमजोर 

प्रोफेसर रचना अग्रवाल ने बताया कि बच्चों में नजर की परेशानी बहुत तेजी से बढ़ रही है इस वर्ष का नेत्र दिवस बच्चों पर ही समर्पित है बच्चों में सबसे अधिक परेशानी का कारण मोबाइल टीवी और कंप्यूटर है इसके इस्तेमाल में सावधानी बरतने की जरूरत है । हमारी ओपीडी में आने वाले 20 फ़ीसदी बच्चे नजर की परेशानी लेकर आ रहे हैं

नजर को बचाए रखने के लिए यह करें उपाय 
-कम या तेज प्रकाश न पढ़े 
- अंधेरे में टीवी न देंखे 
- लगातार टीवी या कंप्यूटर पर नजर न लगाए रखें 
- फल, सब्जी, विटामिन ए और ई का पर्याप्त सेवन करें 
- धूप में अच्छे किस्म का यूवी प्रोटेक्टिव लेंस वाले सन ग्लास लगाए 
- तैरते या खेलते समय आंख की सुरक्षा पर ध्यान दें 
- आंख को रेस्ट दें 
- डायबिटीज है तो आंख की रेगुलर जांच कराए 
- आंख से कम या धुंधला दिख रहा है तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें 


अब युवाओं में भी कॉक्लियर इम्प्लांट सफल

 








अब युवाओं में भी कॉक्लियर इम्प्लांट सफल

-पीजीआई ने पढ़ने व नौकरी पेशा वाले 50 युवाओं का किया कॉक्लियर इंप्लांट 

कुमार संजय

अब सात वर्ष के बच्चों की तरह दिमागी बुखार व दूसरे संक्रमण से सुनने की क्षमता गंवा चुके युवाओं में भी कॉक्लियर इंप्लांट सफल है। संजय गांधी पीजीआई ने दो वर्ष में पढ़ने और नौकरी पेशा वाले 50 युवाओं का इम्प्लांट किया है। इनकी उम्र 18 से 45 वर्ष के बीच है। इनमें से 48 युवाओं को 95 फीसदी सुन सकते हैं। बचे दो 60 फीसदी तक ही सुन सकते हैं। इम्पलांट के बाद यह भी सामान्य युवाओं की तरह पढ़ाई और अन्य कामकाज कर रहे हैं। पीजीआई के न्यूरो ऑटोलॉजी विभाग के प्रो. अमित केसरी ने यह कॉक्लियर इंप्लांट किये हैं। अक्तूबर में यह पेपर इंडियन जर्नल में प्रकाशित हुआ।

90 फीसदी से अधिक सुनाई देने लगा

पीजीआई के न्यूरो ऑटोलॉजी विभाग के प्रो. अमित केसरी ने बताया कि 50 युवाओं में किये गए कॉक्लियर इंप्लांट के अच्छे परिणाम आए हैं। इंप्लांट के बाद यह 90 से 95 फीसदी तक सुन सकते हैं। इंप्लांट के बाद इन युवाओं में एक उम्मीद जगी है। अब यह सामान्य युवाओं की तरह पढ़ाई, नौकरी व अन्य दूसरे कामकाज निपटा रहे। अब इन युवाओं को सुनाई न देने की वजह से स्कूल व कार्यालय में सहपाठी व अन्य से इन्हें हीन भावना व ताने सुनने से निजात मिल गई है।

इनमें कारगर है कॉक्लियर इम्प्लांट
प्रो. अमित केसरी का कहना है कि युवाओं में न सुनाई देने की समस्या जन्मजात नहीं होती है। यह सुन नहीं सकते हैं, लेकिन बोल व समझ सकते हैं। इनमें दिमागी बुखार, ऑटो इम्यून डिजीज व संक्रमण की वजह से सुनने की क्षमता धीरे-धीरे कम होती है। संक्रमण की वजह से सुनने वाली नसे सूख जाती हैं। जिसकी वजह से 10 से 15 साल बाद दोनों कानों से सुनाई देना बंद हो जाता है। हेयरिंग हेड भी काम नहीं करता है। ऐसे में इंप्लांट ही आखिरी विकल्प बचता है। इम्पलांट में करीब साढ़े पांच लाख रुपये का खर्च आता है।

यह हैं कारण
-आनुवांशिक
-दिमागी बुखार
-ऑटो इम्यून डिजीज
-संक्रमण