सोमवार, 18 नवंबर 2019

40 के बाद 38 फीसदी में बढ़ जाती है स्वतः गर्भ पात की आशंका


15 से 20 फीसदी महिलाओं में गर्भपात का व्रजपात







 उम्र बढने के साथ बढ़ती जाती है मिसकैरिज की आशंका

सामाजिक और मानसिक रूप से कमजोर बना रहा है मिसकैरिज

कुमार संजय।  लखनऊ

28 वर्षीया आरोही विवाह के दो साल बाद जब प्रिगनेंसी टेस्ट किया और टेस्ट पाजिटिव आया तो पूरा परिवार खूशी से झूम उठा। डाक्टर के पास गए सारी –देख रेख होती रही लेकिन गर्भधारण कारण के 12 सप्ताह से पहले रक्त स्राव होने लगा तुरंत डाक्टर के पास गए तो बताया कि मां नहीं बन सकती है क्योंकि गर्भपात हो गया । भ्रण को तुरंत निकालना पडेगा। भ्रूण तो निकाल दिया गया डाक्टर ने दवा लिख कर घर भेज दिया। मां बनने की खुशी छिनने से आरोही शारीरिक और मानसिक रूप से टूट गयी। ऐसी एक नहीं कई आरोही की कहानी है जो गर्भधारण तो करती है लेकिन स्वतः गर्भपात के कारण मां नहीं बन पाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकडो पर गौर करें तो पता लगता है कि 26 लाख मृत शिशु का जंम होता है जिसमें 85 फीसदी मिसकैरेज होता है। संजय गांधी पीजीआइ के मैटर्नल एंड रीप्रेक्टिव मेडिसिन विभाग की स्त्री रोग विशेषज्ञ और इंर्फटलिटी एक्पसर्ट प्रो. इंदु साहू कहती है कि 20 से 25 आयु वर्ग के महिलाओं में 15 से 16 फीसदी प्रिगनेंसी मिस कैरिज होती है। 30 से 38 आयु वर्ग में यह दर 18 से 22 फीसदी देखी गयी है। और 45 के बाद में 70 फीसदी मामलों में मिस कैरिज होता है।  मिस कैरिज की शिकार महिलाएं मां न बनने के कारण समाज से कट जाती है। हमारे समाज में मां बनना एक बडी उपलब्धि मानी जाती है। हम लोग कारण पता कर कुछ हद गर्भधारण में भ्रूण को बचाने की कोशिश करते हैं। तमाम मामलों में कारण का पता नहीं लगता है।
क्या है गर्भपात

जब गर्भावस्था के 20वें सप्ताह से पहले गर्भ में भ्रूण की मृत्यु हो जाए, तो उसे गर्भपात कहते हैं। इसे स्वत: गर्भपात भी कहा जाता है। बहुत से लोगों को लगता है कि गर्भपात बहुत दुर्लभ स्थिति में होता है, लेकिन ऐसा नहीं है।


कारण

-हार्मोनल असंतुलन

-रोग-प्रतिरोधक क्षमता या ब्लड क्लॉटिंग की समस्या।

-थायरॉयड या मधुमेह जैसी समस्याएं।

-क्रोमोजोम असामान्यता

-गर्भाशय असामान्यताएं और असमर्थ सर्विक्स

-इम्यूनोलॉजी डिसऑर्डर

- पीसीओएस (पॉलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम)


रविवार, 17 नवंबर 2019

पीजीआई अब दिमाग के पिछले हिस्से में एन्यूरिज्म का होगा बाईपास से इलाज

पीजीआई में वेस्कुलर न्यूरो सर्जरी अपडेट
अब दिमाग के पिछले हिस्से में एन्यूरिज्म का होगा बाईपास से इलाज
नस की रूकावट को दूर करेगा एम्बोलेक्टमी
















अब दिमाग की पिछले हिस्से में स्थित एन्यूरिज्म का इलाज संभव होगा। संजय गांधी पीजीआइ में आयोजित वेस्कुलर सर्जरी अपडेट में जपाना के प्रो. रूकैया सी दिमाग के पिछले हिस्से के एन्यूरिज्म के इलाज में बाईपास सर्जरी के तकनीक के बारे में जानकारी दी। अपडेट के आयोजक न्यूरोसर्जन प्रो. कुंतल कांति दास, प्रो. कमलेश बैसवारा और मेंदांता के डा. रवि शंकर ने बताया कि एन्यूरिज्म होने पर मुंह पर क्लिप लगाते है। एन्यूरिज्म में क्वायल डालते है लेकिन यह सब तकनीक दिमाग के अगले हिस्से में एन्यूरिज्म होने पर करते है पिछले हिस्से में होने पर केवल इटरवेंशन तकनीक से क्वायल डालते है जो काफी मंहगा है लेकिन आक्सीपोटल पाइवा बाईपास जैसी तकनीक से हम लोग पिछले हिस्से में बाई पास कर सकते हैं। अभी हम लोग इस तकनीक का अधिक इस्तेमाल नहीं करते थे लेकिन इस तकनीक की तमाम चटिलता को सरल बनाने की तकनीक बतायी गयी जिससे हम लोग भी अब करेगे। बाई पास के लिए हाथ और खोपडी की आर्टरी का इस्तेमाल करते है। इस तकनीक में जिस रक्त वाहिका में एन्यूरिज्म होता है उस वाहिका के रक्त प्रवाह को बंद करने के साथ नया रास्ता का रक्त प्रवाह के लिए बनाते हैं। क्वायल तकनीक में खून पतला करने की दवा चलानी पड़ती है । बाई पास में इसकी भी जरूरत खत्म हो जाएगी। इसमें खर्च पचास हजार तक ही आता है। इसके आलावा नसो की गुच्छा बनने की बीमारी एवीएम में सर्जरी के तकनी के बारे में जानकारी दी गयी। प्रो. अरूण श्रीवास्तव ने बताया कि  कई बार नस में क्लाट इंटरवेंशन से नहीं निकल पाता है ऐसे में नस को खोलकर क्लाट निकाल कर दोबारा नस को जोडा जा सकता है ।  यह माइक्रो सर्जरी है जो काफी जटिल होती है।  इस तकनीक  को एम्बोलेक्टमी कहते हैं। 

 क्या है एन्यूरिज्म
    प्रो. अरूण श्रीवास्तव ने बताया कि   धमनी के किसी स्थानीय हिस्से में उभार आ जाता हैं ।  धमनी एक नलिका के सामान होती हैं जहाँ रक्त संचार होता हैं लेकिन जब कही धमनी की दीवार कमजोर हो जाती हैं तो इस जगह दवाब बहुत अधिक बढ़ जाता हैं और उभार आ जाता हैं और यह गुब्बारे का आकर ले लेता हैं | यह दवाब कई बार इतना अधिक हो जाता हैं की धमनी की नलिका फट जाती हैं और खून आने लगता हैं और आसपास के उतकों में प्रभाव दिखना शुरू हो जाता हैं | इससे दिमाग के न्यूरान डैमेज हो जाते है

मिर्गी है तो न हो परेशान दवा से पूरी तरह संभव है इलाज

मिर्गी है तो न हो परेशान दवा से पूरी तरह संभव है इलाज


70 फीसदी पूरी तरह हो जाते है ठीक
 कुमार संजय। लखनऊ
25 वर्षीया रागिनी को 6 साल से मिर्गी के दौरे पड़ते हैं। जांच में पता लगा कि उन्हें मिर्गी है। शुरुआती 2-3 साल तो मैं लापरवाह रही। वक्त पर दवा और खाना नहीं खाती थी। न जब समस्या बढ़ गई तो मैंने ढंग से इलाज कराया। अब मैं वक्त पर पौष्टिक खाना खाती हूं । पूरी 8 घंटे की नींद लेती हूं। तनाव से दूर रहती हूं।  किसी वजह से नींद पूरी न हो या तनाव हो जाए तो दौरा पड़ने के चांस रहते हैं।  शरीर अकड़ जाता है, चक्कर आने लगते हैं, बोल नहीं पाती और कई बार गिर भी जाती थी।  चोट भी लगती है।  किसी भी बीमारी को अपनी जिंदगी से बड़ा न बनने दें। ऐसी तमाम मरीज रोज संजय गांधी पीजीआइ के न्यूरोलाजी विभाग में फालोअप पर वाले बयां करते है। विश्व मिर्गी जागरूकता दिवस (17 नवंबर) के मौके पर  संजय गांधी पीजीआइ के न्यूरोलाजिस्ट प्रो.सुनील प्रधान , प्रो,संजीव क्षा , प्रो.वीके पालीवाल , प्रो.विनीता एलिथाबेज ने बताया कि मिर्गी की  रुटीन ब्लड टेस्ट ,ईईजी एआरआई, सीटी स्कैन से बीमारी की पुष्टि होती है। 70 फीसदी तक मरीज सिर्फ एक दवा खाने से ठीक हो जाते हैं।  करीब 15 फीसदी मरीजों को  2-3 दवाएं खानी पड़ती है।  15 फीसदी को ज्यादा दवाओं या सर्जरी आदि की जरूरत पड़ती है। 
प्रति एक हजार में पांच लोगों में मिर्गी की परेशानी
हमारे देश में औसतन प्रति हजार में से 5-6 लोग इस रोग से पीड़ित हैं।  देश में मिर्गी रोगियों की संख्या प्रति वर्ष पांच लाख की दर से बढ़ रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, प्रतिवर्ष 25 लाख लोग इसकी चपेट में आ जाते हैं।



क्या है मिर्गी 
दिमाग में असामान्य तरंगें पैदा होने लगती हैं। यह कुछ वैसा ही है जैसे कि शॉर्ट सर्किट में दो तारों के बीच गलत दिशा में तेज करंट दौड़ता है। इसमें मरीज को झटके-से महसूस होते हैं, वह जमीन पर गिर जाता है, दांत भिंच जाते हैं और वह कुछ देर के लिए बेहोश हो जाता है। 1 दिन के बच्चे से लेकर सौ साल के बुजुर्ग तक को मिर्गी हो सकती है।
किन स्थितियों में पड़ता है दौरा 
-बेहद तनाव 
-दवा मिस कर देना 
-कम नींद लेना 
-हॉर्मोंस में बदलाव 
-ज्यादा शराब पीना 
-ब्लड शुगर का गिर जाना 
-ब्लड प्रेशर का कम हो जाना 
-बेहद तेज रोशनी में आना 
लक्षण 
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आंखों के आगे अंधेरा छाना 
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शरीर का अकड़ जाना 
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दांत भिच जाना 
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मुंह से झाग आना 
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अचानक गिर जाना 
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बेहोश हो जाना 
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आंखों की पुतलियों ऊपर की तरफ खिंचना 
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हाथ या पैर का लगातार चलना या झटके से लगना 
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होंठ या जीभ काट लेना 
कारण 
जनेटिक,इन्फेक्शन, सिर पर गंभीर चोट, स्ट्रोक या ब्रेन ट्यूमर, गर्भ में चोट, ऑटिजम होना,   बढ़ती उम्र,दिमाग में टेपवर्म- न्यूरोसाइटिसरकोसिस  यानी दिमाग में टेपवर्म (कीड़ा) चला गया हो, ब्रेन टीबी, कैल्शियम और सोडियम की कमी से भी छोटे बच्चों में दौरा पड़ सकता है। 

बुधवार, 13 नवंबर 2019

एक तिहाई लोगों को यह नहीं पता कि वह डायबटिक - हर तीसरे में डायबटीज की आशंका

वर्ल्ड डायबिटीज-डे आज



एक तिहाई लोगों को यह नहीं पता  कि वह डायबटिक  
हर तीसरे में डायबटीज की आशंका
 कुमार संजय। लखनऊ
संजय गांधी पीजीआइ के इंडोक्राइनोलाजिस्ट प्रो.सुशील गुप्ता और प्रो.सुभाष यादव ने तमाम शोध के बाद कहा कि राजधानी के बुजुर्गों में हर तीसरे को डायबिटीज अपनी चपेट में ले रहा है। वहीं 20 से 70 वर्ष की कुल आबादी को मिला लें तो इस रोग से 9 प्रतिशत लोग जूझ रहे हैं। इनमें से एक तिहाई लोगों को पता ही नहीं होता कि वे डायबेटिक हैं, जो डायबिटीज से जुड़ी कॉम्प्लीकेशन को और बढ़ा देती है। प्रो. सुभाष कहते है कि हमने शोध किया तो पाया कि 16 प्रतिशत नागरिकों का शुगर लेवल उन्हें डायबिटिक बताने के लिए काफी था। साथ ही सामने आया कि इनमें से एक तिहाई लोगों को यह नहीं पता था कि वे इस रोग से पीड़ित हैं।

दिल और किडनी की बीमारी का गहरा रिश्ता

संजय गांधी पीजीआइ के हृदय रोग विशेषज्ञ प्रो. सुदीप कुमार के मुताबिक डायबटीज नियंत्रित न होने पर दिल और किडनी की बीमारी की आशंका बढ़ जाती है। देेखा गया है कि डायबटीज के साथ 10 से 12 साल जिंदगी गुजारने वाले 15 से 20 फीसदी लोग अनियंत्रित शुगर के कारण दिल औक कीडनी की बीमारी  के चपेट में आते है। फालो अप पर लगातार रहना चाहिए। 
     
क्या है डायबिटीज
प्रो.सुभाष यादव के मुताबिक  जो भोजन लेते हैं उसे हमारी पाचन ग्रंथियां पचा कर ऊर्जा और हमारी वृद्धि के लिए उपयोग करती हैं। इस प्रक्रिया में भोजन का अधिकतर हिस्सा टूट कर ग्लूकोज बनाता है। ग्लूकोज एक किस्म की शुगर है और यह हमारे शरीर के लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। यह ग्लूकोज हमारी रक्त में घुलकर कोशिकाओं तक पहुंचता है जिसका उपयोग कोशिकाएं करती हैं। लेकिन ग्लूकोज को कोशिकाओं में पहुंचाने के लिए इंसुलिन हार्मोन की जरूरत होती है जो पैंक्रियाज की बीटा सेल्स पैदा करती हैं। जब भी हम कुछ खाते हैं तो पैंक्रियाज यह इंसुलिन अपने आप जरूरी मात्रा में छोड़ती है। यही इंसुलिन शुगर कंट्रोलर की भूमिका अदा करता है। इंसुलिन को लेकर आई समस्या ही डायबिटीज का कारण होती है।

डायबिटीज टाइप
टाइप 1 : टाइप 1 डायबिटीज में पैंक्रियाज इंसुलिन बनाना पूरी तरह से बंद कर देता है। कुल डायबिटीज में यह करीब 10 प्रतिशत मामलों में है।
टाइप 2 : यहां इंसुलिन तो बनता है, लेकिन वह काफी कम होता है जो ग्लूकोज को कोशिकाओं में पहुंचाने के लिए काफी नहीं होता। 90 फीसदी डायबिटीज के मामले टाइप 2 के मिल रहे हैं।

  

इंसुलिन को बोझ नहीं मानें

 इंसुलिन लेने को पेशेंट्स बोझ मानने लगते हैं। ऐसा करना खतरे को बढ़ाता है। इसे जीवन भर के लिए अपनाना है, इसलिए गंभीरता से अपनाएं। जब शुगर का स्तर गोली से कंट्रोल नहीं होता तो हम लोग इंसुलिन देते है देखा गया कि तमाम लोग  बाद फिर गोली पर आ जाते है।  


बच्चों में बढ़ता मोटापा बढ़ा रहा रिस्क
प्रो. सुभाष यादव कहते है कि बच्चों में अब तक केवल डायबिटीज टाइप 1 ही मिलता रहा है क्योंकि इसकी प्रमुख वजह अनुवांशिक होती है। लखनऊ में हर 10 हजार बच्चों में से एक में टाइप 1 डायबिटीज पाया जा रहा है। लेकिन जैसे-जैसे बच्चों के खाने-पीने की आदतों में बदलाव आते जा रहे हैं, उनमें मोटापा बढ़ रहा है और यही उन्हें डायबिटीज के रिस्क फैक्टर की ओर धकेल रहा है। 12 से 14 वर्ष की उम्र में बढ़ना शुरू हुआ मोटापा 20-22 की उम्र तक डायबिटीज में बदल रहा है।

आकंडे दे रहे है गवाही

-50  लाख लोग हर वर्ष दुनिया भर में डायबिटीज से मर रहे हैं
-40 करोड़ लोग डायबिटीज के साथ जी रहे हैं दुनिया में, इनमें 7 करोड़ भारत में और 1.10 करोड़ यूपी में और 2.70 लाख लखनऊ में रह रहे हैं।
-225 खरब रुपये इसके इलाज पर दुनिया भर में लोगों को हर साल खर्च करने पड़ रहे हैं।
-10 हजार में से एक बच्चा डायबिटीज टाइप 1 का पेशेंट।
-12 से 14 वर्ष की उम्र में बढ़ते वजन की वजह से भी डायबिटीज टाइप 1 का रिस्क।

लक्षण : हो जाइए सजग अगर
-बार-बार पेशाब जाने की जरूरत महसूस होती है।
-अचानक वजन तेजी से घटने लगा है
-शरीर में एनर्जी की कमी महसूस हो रही है
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प्यास और भूख बहुत लगने लगी है

नाश्ते में पौष्टिकता का रखें ध्यान
पीजीआइ की पोषण विशेषज्ञ अर्चना सिन्हा और निरूपमा सिंह के मुताबिक 70 प्रतिशत टाइप-2 डायबिटीज के रोगी इसकी चपेट में आने से बच सकते थे सही खान-पान और नियमित व्यायाम की आदतें विकसित की होती। नाश्ते में फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज, मेवे, मछली, अंडे का उपयोग बढ़ाएं। साथ ही भोजन में स्वाद के बजाय पौष्टिकता को महत्व दें।
क्या नहीं खाएं 
-स्वादिष्ट लगने वाली पेस्ट्री, नाश्ते में परोसे जाने वाले अधिकतर सीरियल्स, फ्राइड फूड, कोल्ड ड्रिंक्स, मीठा दही, आदि।

मंगलवार, 12 नवंबर 2019

अब नेशनल हेल्थ मिशन में शामिल होगा पेरीटोनियल डायलसिस

अब नेशनल हेल्थ मिशन में शामिल होगा पेरीटोनियल डायलसिस
पीजीआइ के प्रो.नरायन प्रसाद के प्रयास शामिल हुई नई डायलसिस तकनीक

कुमार संजय। लखनऊ
नेशनल डायलसिस प्रोग्राम के तहत देश के हर जिले में किडनी मरीजों की जिंदगी बेहतर रखने  लिए फ्री डायलिस की व्यवस्था प्रधानमंत्री नेशनल डायलसिस योजना चलायी जा रही है जिसमें केवल हीमोडायलसिस की व्यवस्था की थ्री पी माडल पर की गयी। संजय गांधी पीजीआइ के गुर्दा रोग विशेषज्ञ एवं इंडियन सोसाइटी आफ नेफ्रोलाजिस्ट के सचिव प्रो.नरायन प्रसाद ने नेशनल हेल्थ मिशन को संस्थान और देश  में चल रहे पेरीटोनियल डायलसिस प्रोग्राम के तमाम सफलता के आंकडों के साथ इसे नेशनल डायलसिस प्रोग्राम में शामिल करने की सिफारिश की थी जिसके बाद मिशन के अधिकारियों ने इसे डायलसिस प्रोग्राम में शामिल करने के साथ ही प्रो.नरायन को मुख्य संचालन समिति में सलाहकार के रूप भी शामिल किया है। प्रो.नरायन ने मिशन को बताया कि कैसे  इसे लागू करना है और क्या फायदे है। देखा गया है कि हम लोग इस तकनीक से डायलसिस पर रहने वाले किडनी के मरीज 10 साल से अधिक समय तक बढिया जिंदगी जीते है और अपने रोज मर्रा के काम भी करते हैं। 

हर साल 2.2 लाख नए हो रहे है इंड स्टेज रीनल डिजीज के शिकार
हर साल इंड स्टेज रीनल डिजीज के 2.2 लाख नए मरीज शिकार होते है । इनमें किडनी ट्रांसप्लांट ही अंतिम उपचार होता है । इन लोगों को ट्रांसप्लांट तक ठीक रखने या जिनमें ट्रांसप्लांट संभव नहीं है उन्हें ठीक रखने के लिए डायलसिस की जरूरत होती है। इन्हें फ्री डायलसिस सुविधा देने के लिए देश के 444 जिलों के 765 केंद्रों पर 4471 मशीन से हीमोडायलसिस सुविधा दी जा रही है इसके लिए मरीज को हफ्ते दो से तीन बार डायलसिस सेंटर पर आना होता है लेकिन पेरीटोनियल डायलसिस में घर पर ही डायलसिस करना संभव होगा। 

क्या पेरीटोनियल डायलसिस

इस प्रकार के डायालिसिस में अनेक छेदोंवाली नली सीएपीडी कैथेटर  को पेट में नाभि के नीचे छोटा चीरा लगाकर रखा जाता है। सी. ए. पी. डी. कैथेटर इस प्रक्रिया  शुरू करने से 10 से 14 दिन पहले पेट के अंदर डाला जाता है। यह नली सिलिकॉन जैसे विशेष पदार्थ की बनी होती है। यह नरम और लचीली होती है एवं पेट अथवा आँतों के अंगों को नुकसान पहुँचाए बिना पेट में आराम से स्थित रहती है।
  • -इस नली द्वारा दिन में तीन से चार बार दो लिटर डायालिसिस द्रव पेट में डाला जाता है और निश्चित घंटों के बाद उस द्रव को बाहर निकाला जाता है।
  • -डायालिसिस के लिए प्लास्टिक की नरम थैली में रखा दो लिटर द्रव पेट में डालने के बाद खाली थैली कमर में पटटे के साथ बांधकर आराम से घूमा फिरा जा सकता है।
  •  -सी. ए. पी. डी. द्रव, पेट के अंदर रहता है ।  अवधि दिन के समय 4 - 6 घंटे की होती है और रात में 6 - 8 घंटे की होती है। रक्त की सफाई की प्रक्रिया इसी समय होती है। पेरिटोनियम झिल्ली एक फिल्टर की तरह काम करती है। यह अपशिष्ट उत्पादों, अवांछित तत्वों और अतिरिक्त तरल पदार्थों को खून से पारित कर पी. डी. तरल पदार्थ में लेने का कार्य करती है। मरीज इस दौरान सभी कार्य कर सकता है। 
  • -तय समय के बाद  पी. डी. द्रव को उसी खाली संग्रह बैग में निकाल दिया जाता है।  ताजे घोल के साथ निकासी और प्रतिस्थापना में 30 - 40 मिनट का समय लगता है। यह विनमय दिन के दौरान 3 - 5 बार और रात में एक बार किया जा सकता है।

अब सेंटीग्रा बताएंगा सीटी स्कैन और एमआराई में कंट्रास का सेफ डोज

अब सेंटीग्रा बताएंगा सीटी स्कैन और एमआराई में  कंट्रास का सेफ डोज
रेडिएशन का नहीं पडेगा मरीज पर कुप्रभाव
दो से आठ फीसदी में होता है कुप्रभाव
कुमार संजय। लखनऊ
बीमारी पकड़ने के लिए सीटी स्कैन, एमआरआइ सहित तमाम जांच में मरीज कंट्रास दिया जाता है जिसमें रेडियोएक्टिव तत्व होते है इसकी शरीर में अधिक मात्रा कई तरह के कुप्रभाव डालती है। कुछ कुप्रभाव तुरंत तो कुछ कुप्रभाव लंबे समय के बाद मरीज में आते है। किस मरीज में कितनी मात्रा में कंट्रास दिया जाए यह सटीक जानकारी अब सेंटीग्रा साफ्टवेयर से मिलना संभव हो गया है। इस तकनीक में मरीज के शरीर का भार, उम्र, किस अंग का जांच होना है , किस तरह का कंट्रास दिया जाना डाटा फीड किया जाता है जिसके बाद साफ्टवेयर इस मरीज में कितनी मात्रा में कंट्रास देना है सटीक जानकारी देता है। संजय गांधी पीजीआइ के रेडियोलाजी विभाग की प्रो. अर्चना गुप्ता के मुताबिक अभी हम लोग कंट्रास का खुद आकल करते है जिसमें एक मिली लीटर प्रति किलो शऱीर भार के अनुसार देते है जिसमें कई बार डोज के अधिकता या कमी की गुंजाइस रहती है लेकिन सेंटीग्रा से हर मरीज में सटीक मात्रा का आकलन संभव है। संस्थान में यह तकनीक स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। रेडियोलाजिस्ट सरोज वर्मा और धर्मेंद्र कुमार के मुताबिक सीटी स्कैन , एमआरआई जांच में दो तरह का कंट्रास दिया जाता है जिसे आयोडीन बेस और गैडोलीनियम बेस कहते हैं। देखा गया तो इससे दो से आठ फीसदी मरीजों में साइड इफेक्ट होता है। कंट्रास की सही मात्रा देने से ही साइड इफेक्ट को कम किया जा सकता है।  
क्या होता है कंट्रास
कंट्रास एक तरह का रसायन होता है जिसे सीटी स्कैन के दौरान इंजेक्ट किया जाता है। यह शरीर की सारी नसों में फैल जाता है जिससे स्कैन लेते समय उससे निकलने वाले रेडिएशन के कारण स्पष्ट इंमेज आती है

हजार में 6 बच्चों में होती है कम सुनने की परेशानी

हजार में 6 बच्चों में होती है कम सुनने की परेशानी
जंम के दो से तीन माह बाद ही करें  सुनने  क्षमता का आकलन
जागरण संवाददाता। लखनऊ
यदि आपके एक से चार वर्ष तक के बच्चे को बोलने और सुनने में दिक्कत है तो ईएनटी सर्जन तुंरत दिखाए ।  परिवारीजन बच्चे के पैदा होने पर उसके बोलने और सुनने की क्षमता का आंकलन दो से तीन वर्ष या उससे अधिक समय तक करते रहते हैं। ऐसा करना सही नहीं है। संजय गांधी पीजीआइ के न्यूरो ईएनटी सर्जनी प्रो. अमित केसरी ने संस्थान में आयोजित 37वें यूपीएओआई कॉन 2019  में बताया कि विदेशों में बच्चे के पैदा होने पर ही उसके कान का टेस्ट किया जाता है पर भारत में ऐसा नहीं है। कान के तीन हिस्से होते हैं, जिनमें एक बाहरी आवरण होता है जो कि सामान्य तरीके से दिखता है। दूसरा मिडिल ईयर जिसमें कान में पर्दा और हड्डी होती है। तीसरे हिस्से को चिकित्सा की भाषा में काकलिया बोलते हैं। यह काकलिया दिमाग और कान के बीच आने वाला हिस्सा है जो कि गर्भावस्था के दौरान (18 से 20 सप्ताह) ही विकसित हो जाता है। यदि पैदा होने के कुछ दिन बाद से बच्चा सही से नहीं सुनता और बोलता है तो उसका मतलब है कि काकलिया सही से विकसित नहीं हुआ है। इससे आवाज दिमाग तक नहीं पहुंच पाती है। एक हजार बच्चों में से चार से छह बच्चों को सुनने की समस्या होती है।
कान की हड्डी मूवमेंट न होने सुनना हो सकता है बंद
अचानक  सुनाई देना बंद हो गया तो सलाह लें कई बार  कान का पर्दा तो ठीक है पर कान की एक हड्डी का मूवमेंट न होने से सुनने की क्षमता खत्म हो जाती है। दूरबीन विधि से 0.5 एमएम के छेद से पिस्टन इम्प्लांट डाला जाता । जबकि पहले कान के पीछे 1 एमएम का चीरा लगाकर किया जाता था। डॉक्टरों का कहना है कि पहले सर्जरी के बाद करीब दस प्रतिशत मरीजों में चक्कर की दिक्कत आती है, लेकिन दूरबीन विधि से यह समस्याएं नहीं आती है।

  
नाक बंद और नाक से खून तो संभव है ट्यूमर
सांस लेने में तकलीफ हो जो इसे  नजरअंदाज न करें कई बार नाक का एक हिस्सा बंद हो जाता है।  उसके आठ महीने बाद नाक से खून आने लगता है।  नाक का दूसरा हिस्सा भी बंद होने की स्थिति में आ जाता है।  इससे मरीज की सांस उखड़ने लगी। हम लोग जांच में देखते तो कई बार  ट्यूमर होता है। समय पर न निकालने से आंख तक पहुंच जाता है।  एंडोस्कोपी विधि से नाक के रास्ते जाकर  ट्यूमर निकाल देते है।

गुरुवार, 7 नवंबर 2019

उम्रेंद्र बनकर उमरी की उम्मीद पूरी--पीजीआइ ने बनाया लड़का

तो उमरी अब बन जाएगा उमेंद्र


बचपन से लड़की की तरह पला लेकिन निकला लड़का
पीजीआइ दो विभाग मिल कर निकाले  फीमेल आर्गन  विकसित कर रहे है मेल आर्गन

कुमार संजय़। लखनऊ


वह उमरी थी। बचपन से शारीरिक विकास लड़की की तरह हुआ तो पालन-पोषण भी उसी तरह किया गया। हां, उमरी को मानसिक उलझन हमेशा बनी रही। वह खुद को लड़की मानने के लिए तैयार नहीं हुआ। वजह, बढ़ती उम्र के साथ शरीर में मेल हार्मोन प्रभावी होते रहे। असमंजस के बीच आखिर परिजन लखनऊ स्थित संजय गांधी पीजीआइ में प्लास्टिक सर्जरी विभाग के प्रो. अंकुर भटनागर के पास पहुंचे। तमाम परीक्षण के बाद तय किया कि यह लड़का ही बन सकता है। अब पहली सर्जरी के बाद महिला वाले अंग निकाल दिए गए जिससे फीमेल हारमोन का असर खत्म हो रहा है। हारमोन रिप्लेसमेंट थिरेपी देकर मेल हारमोन को बढा कर पहले से बने पुरूष लिंग को विकसित किया जा रहा है। शाहजहां पुर के रहने वाले एक उमरी के नाम इस बच्चे का पालन पोषण हुआ। उम्र बढने के साथ स्तन पूरा विकसित हो गया। जंम से पुरूष लिंग, अंडकोश कम वकसित बना था साथ ही यूट्रस, योनि, ओवरी भी बना था । इस परेशानी को डिजीज आफ सेक्सुअल डिफ्रेनसिएशन कहते है जिसमें महिला और पुरूष के दोनो अंग बने होते है। इसका प्रभाव जब यौवन अवस्था पर पहुंचता तब लगता या तो जंम के समय ही विशेषज्ञ ध्यान दे तो लगता है। जब उमरी 13 साल का हुआ तो उसे लगा कि वह लड़की नहीं है। जब यहां आए तो पहले हमने साइकोलाजिकल एनालसिस कराया तो साइकोलाजिस्ट ने कहा कि मेल हारमोन ही प्रभावी है और लड़को की तरह की रह सकता है। इसके साथ हारमोन और क्रोमोसमल स्टडी भी कराया जिससे साभित हुआ कि एक्स -वाई क्रमोजोम ही प्रभावी है।

 दो सर्जरी के बाद बना लड़का
उमरी में यूरो सर्जन प्रो.एमएस अंसारी के साथ मिल कर पहले चरण में ओवरी, यूट्रस निकाला इसके साथ योनि को बंद किया।  साथ ही विकसित स्तन को इनफीरियर पेडिकल रेडिकल रीडक्शन सर्जरी  तकनीक से स्तन को निकाला।   इसमें विशेष ध्यान देना होता है चेस्ट परूषो जैसा ही दिखे। फीमेल आर्गन निकल जाने से फीमेल हारमोन प्रोजेस्ट्रान, ईस्ट्रोजन का स्तर भी कम हो जाता है। इसके बाद पहले से बने पुरूष लिंग को विकसित करने के लिए थिरेपी शुरू की गयी है। प्रो. भटनागर के मुताबिक दवा से जितना पूरा विकसित नहीं हुुआ तो उसके लिए भी विशेष सर्जरी की जाएगी। इसके बाद पेशाब का रास्ता जो बना है उसका छिद्र सही जगह पर करने की सर्जरी होगी। उमरी ने अपना नाम भी उमेंद्र कर लिया है।